भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं श्री कृष्ण

बरसों तक गोपाष्टमी के दिन नंद महाराज द्वारा गायों और श्रीकृष्ण के लिए एक समारोह किया जाता रहा था। भगवान श्री कृष्ण के साथ-साथ गौ पूजा देशभर में धूमधाम से मनाई जाती है। इस बार कोरोना के कहर के कारण लोग समारोह में सम्मिलित होने के बजाय घर में ही गोपाष्टमी मना कर संतोष करते नजर आ रहे हैं। समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने अपने ‘वृंदावन’ निवास पर ही ऑनलाइन गोपाष्टमी मनाया।

बता दें कि इस अवसर पर डॉ.मधेपुरी ने बताया कि बलराम एवं कृष्ण द्वारा गायों को पहली बार चराने के लिए ले जाने का दिन गोपाष्टमी के नाम से जाना जाता है। गोपाष्टमी दीपावली के दौरान आने वाला प्रसिद्ध त्योहार गोवर्धन पूजा के सात दिन बाद मनाया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि भगवान विष्णुु के आठवें अवतार माने जाने वाले श्री कृष्ण का नाम कृष्ण कैसे पड़ा ?  डॉ.मधेपुरी ने कहा कि  आचार्य गर्ग ने नंंद-यशोदा केेेे लाडले का नामकरण  कंस के भय से गौशाला में जाकर किया और भी बोल उठे कि आपके इस बेटे के कई नाम होंगे….. जैसे-जैसे कर्म करते जाएंगे वैसे-वैसे नाम होते जाएंगे। तत्काल इसके सांवले रंग के कारण इसका नाम कृष्ण होगा…… लोग इसे कान्हा, कन्हैया, किशन आदि नामों से भी पुकारेगा।

आगे डॉ.मधेपुरी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए यही कहा कि कृष्ण बचपन में गायों व ग्वालों की रक्षा में लगे रहे। कृष्ण जब आठ दिनों तक गोवर्धन पर्वत के नीचे गाय व ग्वालों को रखे थे तब इंद्र को झुकना पड़ा था। जहां श्री कृष्ण अपने बाल सखाओं से यही कहा करते कि गौ सबकी माता है वहीं डॉ.मधेपुरी लोगों से कहते हैं कि गौ, गंगा और गायत्री का भारत में आदिकाल से ही सम्मान होता रहा है क्योंकि माता के बाद मानवता की सेवा के लिए गाय का दूध ही सर्वसुलभ है। पंचगव्य के रूप में प्राप्त गाय का गोबर कीटाणुओं का नाशक ही नहीं बल्कि विषैले विकिरणों का शोषक व मानवता का पोषक भी है। हिरोशिमा-नागासाकी में बम के विषैले विकिरणों से मुक्ति पाने के लिए आज भी जापान के लोग घर-आंगन को गाय के गोबर से लिपते हैं।  गोमूत्र से कई प्रकार केे रोग दूर होते हैं।

 

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