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पंचतत्व में विलीन हुए अटल

भारतरत्न, कविहृदय जननेता, देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी शुक्रवार शाम पंचतत्व में विलीन हो गए। दिल्ली के स्मृति स्थल पर राष्ट्र ने उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी। उनकी दत्तक पुत्री नमिता भट्टाचार्य ने उन्हें मुखाग्नि दी। उससे पहले नातिन निहारिका ने उनके पार्थिव शरीर पर से तिरंगा ग्रहण किया। बेटी, नातिन और परिवार के लोग ही नहीं स्मृति स्थल पर मौजूद ऐसा कोई नहीं था जिसकी आंखों में आंसू ना हो। अटल थे ही कुछ ऐसे। सियासत की दुनिया का उन्हें ‘अजातशत्रु’ कहा जाता था क्योंकि उन्होंने हमेशा दोस्त बनाए, दुश्मन उनका कोई नहीं था।

Leaders at Smriti-Sthal
Leaders at Smriti-Sthal

मुखाग्नि देने से पूर्व स्मृति स्थल पर तीनों सेनाओं की ओर से अटल जी को अंतिम सलामी दी गई। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वाजपेयी के पुराने साथी रहे लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, संघ प्रमुख मोहन भागवत, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और सपा नेता मुलायम सिंह यादव समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल एवं सभी विपक्षी दलों के नेता अंतिम विदाई देने मौजूद रहे। पड़ोसी देशों की ओर से भूटान नरेश जिग्मे नामग्याल वांग्चुक, अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और वाजपेयी के मित्र रहे हामिद करजई भी श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचे। बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका के विदेश मंत्री और पाकिस्तान के सूचना मंत्री ने भी इस मौके पर उपस्थिति दर्ज की।

इससे पहले वाजपेयी की अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ पड़ा। वाजपेयी की अंतिम यात्रा में भाजपा मुख्यालय से उनके पार्थिव शरीर को लेकर जा रहे वाहन के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पैदल चल रहे थे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, कई केंद्रीय मंत्री और विजय रूपाणी, शिवराज चौहान, योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी वाहन के पीछे चल रहे थे। अटल जी के अंतिम दर्शन के लिए 7 किलोमीटर लंबे मार्ग पर उमस भरी गर्मी के बावजूद हजारों हजार की संख्या में लोग उमड़े चले आ रहे थे। ‘अटल बिहारी अमर रहे’ जैसे नारे लगातार गूंजते रहे।

अटल जी का शरीर भले ही अब इस दुनिया में नहीं है पर उनके अटल विचार, सिद्धांत और नैतिक मूल्य हमेशा देशवासियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। अटल ने कविता के जरिए पहले ही अपने अंतिम सफर का जिक्र करते हुए कहा था, ‘मौत की उम्र क्या है? दो पल भी नहीं, जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?’ अपनी ऐसी ही पंक्तियों, सम्मोहित कर देने वाले भाषणों और अनगिनत अवदानों की बदौलत युगों-युगों तक याद किए जाते रहेंगे हम सबके अटल जी। उन्हें हृदय की सम्पूर्ण श्रद्धा अर्पित करते हुए सादर नमन..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप’

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लौटकर आइएगा अटलजी..!

भारत के अनमोल रत्न, देश के सार्वकालिक महान व्यक्तित्वों में एक, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे। देश भर की दुआएं काम ना आईं। कल हमलोगों ने राष्ट्रीय उत्सव मनाया और आज नियति ने सवा सौ करोड़ भारतवासियों को राष्ट्रीय शोक दे दिया। अटल जी पिछले कई वर्षों से बीमार चल रहे थे और 11 जून को तबीयत अधिक बिगड़ने के बाद उन्हें एम्स लाया गया था। दो दिनों से वे वेंटिलेटर पर थे और आज 94 वर्ष की उम्र में शाम 5 बजकर 5 मिनट पर यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।

किसी बड़े व्यक्ति के जाने पर आमतौर कहने का चलन है कि ये ‘अपूरणीय क्षति’ है, पर अटल बिहारी वाजपेयी नाम के शख्स के जाने से बनी रिक्तता सचमुच कभी नहीं भरी जा सकती। भारत के मानचित्र पर जैसे हिमालय जैसा दूसरा संबल नहीं हो सकता, हमारी अंजुलि में जैसे गंगा जैसा दूसरा जल नहीं हो सकता, वैसे ही इस वसुंधरा पर दूसरा अटल नहीं हो सकता। संवेदना से ओतप्रोत कवि, विचारों से लबालब बेजोड़ वक्ता, विनम्रता और शालीनता की प्रतिमूर्ति, नेताओं की भीड़ में अद्वितीय स्टेट्समैन जिसकी भव्यता ना तो किसी पार्टी में समा सकती थी ना प्रधानमंत्री जैसे पद में – काजल की कोठरी कही जाने वाली राजनीति में जैसे तमाम अच्छी चीजें उन्होंने समेट रखी हो अपने भीतर।

आज जबकि राजनीति पर विश्वसनीयता का संकट आन पड़ा है, ‘सांकेतिक’ ही सही अटलजी की मौजूदगी की बेहद जरूरत थी हमें। बहरहाल, पूरा देश शोकाकुल है आज। राजनेताओं से लेकर तमाम क्षेत्रों के दिग्गज उन्हें भाव-विह्वल श्रद्धांजलि दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, “उनका जाना पिता का साया सिर से उठने जैसा है।” बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, “देश ने सबसे बड़े राजनीतिक शख्सियत, प्रखर वक्ता, लेखक, चिंतक, अभिभावक एवं करिश्माई व्यक्तित्व को खो दिया।” उनके निधन को लेकर सात दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई है। कई राज्यों ने भी राजकीय शोक और अवकाश की घोषणा की है। बिहार में सात दिनों के राजकीय शोक और शुक्रवार 16 अगस्त के अवकाश की घोषणा की गई है।

अटलजी का पार्थिव शरीर कृष्ण मेनन मार्ग स्थित उनके आवास पर रातभर रखा जाएगा। सुबह 9 बजे पार्थिव देह भाजपा मुख्यालय ले जाई जाएगी। दोपहर 1 बजे अंतिम यात्रा शुरू होगी, जो राजघाट तक जाएगी। वहां महात्मा गांधी के स्मृति स्थल के नजदीक 4 बजे अटलजी का अंतिम संस्कार किया जाएगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अटलजी की अस्थियां प्रदेश की सभी नदियों में प्रवाहित की जाएंगी।

25 दिसंबर 1924 को जन्मे अटलजी 10 बार लोकसभा के सदस्य, दो बार राज्यसभा के सदस्य और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे। उनके प्रशंसक भारत ही नहीं दुनिया के हर कोने में मिल जाएंगे। उन जैसे नेता सदियों में होते हैं और इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। अटलजी, श्रद्धांजलि शब्द छोटा है आपके लिए, श्रद्धा का पूरा घट ही अर्पित करता हूँ आपको… बस अपना कहा पूरा करिएगा – मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? – लौटकर आइएगा अटलजी..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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असाधारण है राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का सफर

पत्रकारिता जगत के बड़े स्तंभ, शालीन व्यक्तित्व के धनी, जदयू के प्रखर सांसद और एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति चुने गए। भारत जैसे बड़े देश के इतने बड़े संवैधानिक पद पर पहुँचने के मूल में सबसे पहले तो उनका अपना व्यक्तित्व है, साथ ही जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बड़े कद और कैनवास का सबूत भी इससे मिला है। भाजपा जानती थी कि उसके पास इस पद के लिए पर्याप्त संख्याबल नहीं है, लिहाजा उसने जदयू के हरिवंश का नाम आगे किया ताकि नीतीश कुमार के प्रभाव से वैसे दलों का साथ (बीजेडी, टीआरएस, पीडीपी आदि) भी उसे मिले, जो किसी अन्य स्थिति में उसे शायद ही मिलते।

बहरहाल, गुरुवार को उपसभापति चुने जाने के बाद 62 वर्षीय हरिवंश ने अपने बचपन के संघर्ष के दिनों को याद किया। सम्पूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण के गांव सिताब दियारा में पैदा हुए हरिवंश ने कहा, ‘मैंने पेड़ के नीचे पढ़ाई की, मैं एक साधारण प्राइमरी स्कूल में पढ़ा। लुटियंस दिल्ली तक मेरा सफर केवल आप सबकी वजह से तय हो पाया है। हमारे गांव में सड़क नहीं थी। अगर कोई बीमार होता था तो उसे 15 किलोमीटर तक चारपाई पर ले जाना पड़ता था। हमने कई वर्षों के बाद बिजली देखी। हम दीये में पढ़ाई किया करते थे।’
हरिवंश का जन्म 1956 में बलिया उत्तर प्रदेश के सिताब दियारा गांव में हुआ था। उन्होंने 1977 में बीएचयू से अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रैजुएशन किया। इसके बाद उन्होंने ‘धर्मयुग’ से पत्रकारिता की शुरुआत की। 1990 से 91 तक उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सलाहकार के रूप में पीएमओ में भी काम किया। 1990 से 2017 तक हरिवंश बिहार-झारखंड के प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘प्रभात खबर’ के मुख्य संपादक रहे और इसके सर्कुलेशन को उन्होंने 400 से लाखों तक पहुँचाया। 2014 में जेडीयू की तरफ से उन्हें राज्यसभा सांसद चुना गया। उन्होंने 19 किताबें लिखी हैं और हिन्दी के सम्मान और स्थान के लिए सदैव संघर्षरत रहे हैं। समाज के वंचित वर्ग, विशेषकर आदिवासियों की तो वे आवाज ही रहे हैं। बता दें कि दशरथ मांझी के संघर्ष को आज जो राष्ट्रीय पहचान मिली है, उसके मूल में हरिवंश ही हैं।

चुनाव की औपचारिकता पूरी होने के बाद अपने संबोधन में हरिवंश ने कहा कि वे राज्यसभा की गरिमा बनाए रखने का हमेशा प्रयास करेंगे और आशा जताई कि बहस, सर्वसम्मति और मार्गदर्शन से मतभेदों को सुलझाया जाएगा। आगे उन्होंने दिल को छू लेने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही कि वह इस पद पर उसी तरह रहेंगे जैसे अपने गांव में गंगा और घाघरा दो नदियों के बीच रह चुके हैं। वहां अकसर बाढ़ का खतरा बन जाता था और लोग सोचते थे कि हो सकता है यही उनका आखिरी दिन हो। इतनी गहरी सोच रखने वाले हरिवंश जी को इतने बड़े पद पर पहुँचने और कलम का सम्मान करने वालों का मान विशेष तौर पर बढ़ाने के लिए हम ह्रदय से बधाई देते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या आपको आखिरी बार ‘अप्पा’ पुकार सकता हूँ ?

करीब छह दशक तक तमिलनाडु की सियासत के केन्द्र बिन्दु रहे, द्रविड़ अस्मिता के प्रतीक, डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि बुधवार शाम चेन्नई के मरीना बीच पर चिर निद्रा में सो गए। करुणानिधि को उनके लाखों चाहने वालों की मौजूदगी में उनके गुरु अन्‍नादुरई के समीप पूरे राजकीय सम्‍मान के साथ समाधि दी गई। करुणानिधि को द्रविड़ नेताओं द्वारा अपनाई परम्परा के मुताबिक एक ताबूत में रखकर दफनाया गया जिस पर 33 साल पहले खुद उन्‍हीं का लिखा हुआ स्मृति-लेख अंकित था। तमिल में लिखे इस स्‍मृति लेख का हिन्दी में अर्थ है – “एक शख्स जो बिना आराम किए काम करता रहा, अब वह आराम कर रहा है।” करुणानिधि के इस स्‍मृति लेख में उनके पूरे जीवन का सार छिपा हुआ है।

इससे पहले पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन ने एक नेता और कार्यकर्ता की भूमिका से आगे बढ़कर एक बेटे के नाते दिवंगत कलाईनार (कलाकार) से उन्हें ‘अप्पा’ कहने की इजाजत मांगते हुए बेहद मार्मिक पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्‍होंने करुणानिधि के स्‍मृति लेख का जिक्र करते हुए लिखा है – “आप जहां भी जाते थे ,वह जगह मुझे बताते थे। अब आप मुझे बिना बताए कहां चले गए? आप हमें लड़खड़ाता छोड़ कहां चले गए? 33 साल पहले आपने बताया था कि आपकी स्मृति में क्या लिखा जाना चाहिए – ‘यहां वह शख्स लेटा है जिसने सारी जिंदगी बिना थके काम किया।’ क्या अब आपने तय कर लिया है कि आप तमिल समाज के लिए काम कर चुके हैं?”

स्टालिन ने आगे लिखा – “या आप कहीं छिप कर देख रहे हैं कि क्या कोई आपके 80 साल के सामाजिक जीवन की उपलब्धियों को पीछे छोड़ सकता है? 3 जून को अपने जन्मदिन पर मैंने आपसे आपकी क्षमता का आधा मांगा था… क्या आप अपना दिल मुझे देंगे? क्योंकि उस बड़े दान से हम आपके अधूरे सपनों और आदर्शों को पूरा करेंगे।”

पत्र के अंत में स्टालिन ने करुणानिधि से उन्हें एक आखिरी बार ‘पिता’ कहने की इजाजत मांगी, तो जिसने भी इसे पढ़ा उसकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने लिखा “करोड़ों उडनपिरपुक्कलों (डीएमके काडर) की ओर से मैं आपसे अपील करता हूं कि बस एक बार ‘उडनपिरप्पे’ बोल दीजिए और हम एक सदी तक काम करते रहेंगे। मैं आपको अप्पा कहने की जगह अपने जीवन में ज्यादातर समय ‘थलाइवर’ (नेता) कहता रहा। क्या आपको आखिरी बार ‘अप्पा’ पुकार सकता हूँ?”

बता दें कि पांच बार तमिलनाडु के सीएम रहे एम करुणानिधि का मंगलवार देर शाम चेन्‍नई के कावेरी हॉस्पिटल में निधन हो गया था। तमिलनाडु की राजनीति में उनका करीब 6 दशकों तक दखल रहा। एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता के अलावा वह इकलौते ऐसे नेता थे जिन्होंने हर वर्ग में अपनी जगह बनाई। अनवरत साठ वर्षों तक विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री आदि पदों पर रहते हुए उन्होंने केन्द्र में प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र तक के कार्यकाल को देखा – ऐसा बिरला अवसर देश में किसी को नहीं मिला। करुणानिधि केवल एक दिग्गज नेता ही नहीं थे, वे एक आला दर्जे के कलाकार (कलाईनार), साहित्यकार और संपादक भी थे। उनकी शख्सियत एक संस्था में तब्दील हो चुकी थी, जिसने कई पीढ़ियों को संस्कारित और आंदोलित किया था। अखिल भारतीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति रखने वाले और 94 साल तक हम सबके बीच रहे उस हाड़-मांस वाले ‘आंदोलन’ को हमारा प्रणाम..!

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अमित शाह का मिशन 22 करोड़

2014 में भाजपा जिस धूम और धमक के साथ केन्द्र की सत्ता में आई थी, इस बार वैसी बात नहीं दिखती। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब भी आकर्षण के केन्द्र हैं लेकिन 2019 में उनका आभामंडल 2014 की तरह होगा, इसका दावा शायद उनके कट्टर समर्थक भी ना करें। महागठबंधन की बढ़ती सक्रियता से भी एनडीए को और सतर्क होने की जरूरत आन पड़ी है। ऐसे में भाजपा के चाणक्य अमित शाह कुछ ऐसा फार्मूला बनाना चाह रहे हैं जिससे 2019 में भाजपा की नैया निर्विघ्न पार हो जाए। उनके मिशन 22 करोड़ को ऐसा ही फार्मूला माना जा रहा है। आखिर क्या है ये मिशन 22 करोड़? चलिए, जानते हैं।
दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अमित शाह एक नये डेटा के साथ तैयार बैठे हैं। ये डेटा है 22 करोड़ का, जिससे भाजपा को वोटों की उम्मीद है। आपको बता दें कि ये 22 करोड़ का आंकड़ा देश के उन परिवारों का है जिनके बारे में भाजपा मानती है कि उन्हें नरेन्द्र मोदी सरकार की किसी ना किसी योजना का लाभ मिला है। 2019 में पार्टी इस आंकड़े को वोट में बदलना चाहती है। अमित शाह ने पार्टी को इन 22 करोड़ परिवारों तक पहुँचने का स्पष्ट निर्देश दिया है। यही कारण है कि भाजपा इन सभी 22 करोड़ परिवारों को खंगालने में लग गई है। टेलिग्राफ इंडिया डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक हर राज्य में एक मॉनिटरिंग सेल बनाया जाएगा। इसके बाद पार्टी कैडर को इन परिवारों से लगातार संपर्क में रहने को कहा जाएगा।
गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी सरकार की योजना के लाभार्थियों तक पहुँचने के लिए भाजपा ने ‘हर बूथ, 20 यूथ’ का नारा तैयार किया है। इसके तहत हर पोलिंग स्टेशन के लिए 20 युवा तैयार किए जाएंगे जिनका काम केन्द्र की योजना के लाभार्थियों से लगातार संपर्क बनाए रखना और अंतत: उन्हें वोट में तब्दील करना होगा। भाजपा का मानना है कि अगर 22 करोड़ परिवारों के लक्ष्य का आधा भी हासिल कर लिया जाए तो भाजपा का काम हो जाएगा। 2019 के चुनाव में 2014 से भी बड़ी जीत के अमित शाह के दावे और आत्मविश्वास के पीछे इन्हीं 22 करोड़ परिवारों का गणित है और साथ में 11 करोड़ कार्यकर्ताओं के समर्थन भरोसा। आपको पता ही होगा कि भाजपा 11 करोड़ सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है।
चलते-चलते बता दें कि पिछले चुनाव में भाजपा ने अपने दम पर 282 सीट जीते थे। उस चुनाव में उसे कुल 17 करोड़ वोट मिले थे जो कि कुल वोटों का 31 प्रतिशत है। इसमें प्रधानमंत्री मोदी की निजी लोकप्रियता और मिशन 22 करोड़ से बढ़े वोटों को जोड़ कर भाजपा पूरी तरह आश्वस्त दिख रही है।

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मधेपुरा के राजशेखर को मिला दिल्ली हिन्दी अकादमी का काव्य-सम्मान

मधेपुरा जिले के  भेलवा गाँव निवासी प्रसिद्धि प्राप्त युवा गीतकार राजशेखर को हिन्दी अकादमी का “काव्य-सम्मान” दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने दिया। इस सम्मान अर्पण समारोह की अध्यक्षता हिन्दी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष विष्णु खरे ने की। समारोह में दिल्ली हिन्दी अकादमी के सदस्यों के साथ-साथ साहित्य से जुड़े गणमान्यों की अच्छी खासी उपस्थिति देखी गई।

बता दें कि फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ से ही अनवरत लोकप्रियता बटोरते रहे इस धरती पुत्र राजशेखर को 2017-18 के लिए हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा यह काव्य सम्मान दिया गया है। जानिए कि पूर्व में यह सम्मान उन विद्वान विभूतियों को दिए गए हैं जिन्होंने साहित्य, संस्कृति, समाज सेवा एवं पत्रकारिता आदि क्षेत्रों में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है।

यह भी बता दें कि मौके पर दिल्ली सरकार के समाज कल्याण मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम इस समारोह में विशिष्ट अतिथि रहे। इस कार्यक्रम में युवा गीतकार राजशेखर को 1लाख रूपया, ताम्रपत्र, प्रशस्ति पत्र एवं शाॅल आदि देकर डिप्टी सीएम द्वारा सम्मानित किया गया।

अंत में दिल्ली सरकार की कला संस्कृति व भाषा विभाग की सचिव रिंकू दुग्गा की उपस्थिति में अकादमी के सचिव डॉ. जीतराम भट्ट ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की।

 

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कमाल के कोहली

कप्तान विराट कोहली की इंग्लैंड में पहली टेस्ट सेंचुरी की बदौलत बर्मिंगम टेस्ट में भारत की उम्मीदें अभी भी जिन्दा हैं। गुरुवार को बर्मिंगम में बेन स्टोक्स की गेंद पर चौका मारते ही कोहली ने इंग्लिश धरती पर पहली बार टेस्ट शतक लगाया। यह उनके टेस्ट करियर का 22वां शतक है। कोहली ने इस पारी में 149 रन बनाए। उनकी जुझारू पारी की बदौलत पहली पारी में भारत ने 274 रन जुटाए। हालांकि इंग्लैंड के स्कोर 287 से फिर भी वह 13 रन पीछे रहा। उधर दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक इंग्लैंड ने एलिस्टर कुक का विकेट खोकर 9 रन बनाए और इस तरह उसकी कुल बढ़त 22 रनों की हो गई है।

बहरहाल, कोहली ने 172 गेंद की पारी में 14 चौके लगाकर अपनी सेंचुरी पूरी की। यह पारी उनकी आक्रामक पारी के विपरीत रही। उन्हें इंग्लैंड की मजबूत गेंदबाजी का सामना करना पड़ा। इसके अलावा पारी में काफी लंबे समय तक उन्होंने निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ उपयोगी साझेदारी की। उन्होंने पहले नौवें विकेट के लिए इशांत शर्मा के साथ 35 रन जोड़े जिसमें इशांत का योगदान पांच रनों का रहा। कोहली को इसके बाद उमेश यादव का अच्छा साथ मिला। यादव ने हालांकि एक ही रन बनाया लेकिन उन्होंने दसवें विकेट के लिए कोहली के साथ 57 रन जोड़े। कोहली की इस पारी की क्या अहमियत है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके बाद दूसरा सबसे बड़ा स्कोर शिखर धवन का रहा जो केवल 26 रनों का है।

गौरतलब है कि कोहली की 149 रनों की पारी किसी भारतीय कप्तान द्वारा खेली गई दूसरी सबसे बड़ी पारी है। 1990 में मोहम्मद अजहरुद्दीन ने मैनचेस्टर में 179 रनों की पारी खेली थी। वहीं मंसूर अली खान पटौदी ने 1967 के इंग्लैंड दौरे पर लीड्स में 148 रनों की पारी खेली थी।

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गावस्कर, कपिल, सिद्धू और आमिर होंगे इमरान के मेहमान

कभी खेल जगत के शीर्ष पर रहे व्यक्ति का अपने देश के शासन के शीर्ष पर जाना बड़ी बात है। इमरान खान ने यह उपलब्धि हासिल कर दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है। उन्हें चाहने वाले पहले भी दुनिया के हर हिस्से में थे पर सियासत में सक्रिय होने से लेकर उसके शिखर को छूने तक उनके व्यक्तित्व का दायरा काफी बढ़ चुका है। अब बात 11 अगस्त को होने वाले उनके शपथ-ग्रहण समारोह को ही लीजिए, भारत में इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि उनकी ओर से किन शख्सियतों को बुलावा आएगा। मानकर चला जा रहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले व्यक्ति होंगे जिन्हें इमरान निमंत्रण देंगे, लेकिन यह बड़े स्तर का कूटनीतिक निर्णय है जिसे लेने में पाकिस्तान को कई बिन्दुओं पर सोचना पड़ रहा है। लेकिन इस बीच भारत की चार शख्सियतों को इमरान का न्योता मिल चुका है। चलिए जानते हैं कौन हैं ये चारों..?

इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की ओर से जिन चार शख्सियतों को न्योता भेजा गया है उनमें दो भारतीय क्रिकेट के पर्याय और इमरान के साथ दर्जनों यादगार मैच खेले सुनील गावस्कर और कपिल देव हैं। न्योता पाने वाली तीसरी शख्सियत भी क्रिकेट से जुड़ी है और अब राजनीति में भी दखल रखती है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं नवजोत सिंह सिद्धू की। और चौथी शख्सियत जिन्हें इमरान ने आमंत्रित किया है, वो हैं भारतीय सिनेमा के महत्वपूर्ण नाम आमिर खान। इमरान की पार्टी पीटीआई के प्रवक्ता फवाद चौधरी ने ये जानकारी मीडिया से साझा की।

इससे पहले इस तरह की भी खबरें आई थीं कि इमरान की ताजपोशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अन्य विदेशी नेताओं को न्योता दिया जा सकता है। इसका खंडन करते हुए प्रवक्ता फवाद चौधरी ने मंगलवार को ट्वीट कर लिखा कि मीडिया में जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वह सही नहीं है, उनकी पार्टी पाकिस्तान के विदेश कार्यालयों से परामर्श करने के बाद सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाने के बारे में निर्णय लेगी।

गौरतलब है कि 25 जुलाई को होने वाले आम चुनावों के नतीजों में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी। हालांकि सरकार बनाने के लिए 272 सदस्यों वाली नेशनल असेंबली में 137 सदस्यों की जरूरत होगी। वहीं इमरान की पार्टी 116 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाई है और वो बहुमत से 21 सीट दूर है। इस बाबत फवाद चौधरी का दावा है कि पार्टी के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। बकौल चौधरी इमरान की पार्टी को नेशनल असेंबली में 168 सदस्यों का समर्थन हासिल है।

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गोपालकृष्ण गांधी को राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार

सांप्रदायिक सद्भाव एवं शांति को बढ़ावा देने के प्रति सक्रियता और योगदान को देखते हुए इस साल के राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार के लिए पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल व राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पौत्र गोपालकृष्ण गांधी को चुना गया है। इस पुरस्कार से जुड़ी सलाहकार समिति के सदस्य सचिव मोतालाल वोरा ने कहा कि गोपालकृष्ण गांधी को यह पुरस्कार सांप्रदायिक सद्भाव, शांति और भाईचारे के संवर्द्धन में उनके उल्लेखनीय योगदान के कारण दिया जा रहा है। सलाहकार समिति ने यह निर्णय 28 जुलाई को आयोजित बैठक में लिया।

गौरतलब है कि यह पुरस्कार पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती के मौके पर दिया जाता है। इसे शांति, सांप्रदायिक सद्भाव के संवर्धन और हिंसा के खिलाफ लड़ाई में उनके दीर्घकालिक योगदान की याद में शुरू किया गया था। इसके तहत एक प्रशस्ति पत्र और 10 लाख रुपये नकद दिए जाते हैं।

बहरहाल, गोपालकृष्ण गांधी यह पुरस्कार पाने वाले 24वें व्यक्ति हैं। उनसे पहले यह पुरस्कार मदर टेरेसा, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, मोहम्मद युनुस, लता मंगेशकर, सुनील दत्त, दिलीप कुमार, कपिला वात्सायन, तीस्ता सीतलवाड़, स्वामी अग्निवेश, केआर नारायणन, उस्ताद अमजद अली खान, मुजफ्फर अली, शुभा मुदगल आदि को मिल चुका है।

चलते-चलते बता दें कि गोपालकृष्ण गांधी को यह पुरस्कार नई दिल्ली स्थित जवाहर भवन में 20 अगस्त को एक विशेष कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा।

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‘ब्लूमबर्ग’ की मानें तो 2029 तक मोदी बने रह सकते हैं प्रधानमंत्री

जलवायु परिवर्तन, गरीबी या शांति स्थापित करने जैसी लंबी अवधि की वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए देशविशेष के नेता का वैश्विक स्तर का कद जरूरी है और साथ ही यह भी जरूरी है कि वह नेता लंबे समय तक अपने देश का नेतृत्व करता रहे। इस पैमाने पर ब्लूमबर्ग मीडिया ने दुनिया के 16 नेताओं के राजनीतिक करियर की उम्र को लेकर एक रिपोर्ट पेश की है। विश्व के जिन नेताओं को इस रिपोर्ट में स्थान दिया गया है उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी एक हैं। शेष नेताओं में शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग-उन, सऊदी अरब के भावी किंग मोहम्मद बिन सलमान आदि शामिल हैं।

अमेरिका के ब्लूमबर्ग मीडिया समूह की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2019 ही नहीं बल्कि 2024 का भी चुनाव जीत सकते हैं और वह 2029 तक भारत के प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं। अब जबकि आम चुनाव में लगभग 10 महीने ही बचे हैं, ऐसे में ब्लूमबर्ग का अपनी रिपोर्ट में यह कहना कि 2019 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी साफ तौर पर जीतते नजर आ रहे हैं यानि 130 करोड़ की आबादी वाले देश पर 2024 तक मोदी ही राज करेंगे, सचमुच बड़ी बात है।

उक्त रिपोर्ट के मुताबिक 67 साल के नरेन्द्र मोदी वर्तमान में सबसे लोकप्रिय भारतीय नेता हैं। विपक्षी कांग्रेस पार्टी में करिश्माई नेता की कमी को भी प्रधानमंत्री मोदी की जीत की एक बड़ी वजह बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भले ही भाजपा सरकार की नीतियां भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हों लेकिन आम जनता के बीच इन नीतियों को लेकर सकारात्मक भाव है।

बहरहाल, विश्व के अन्य नेताओं की बात करें तो ब्लूमबर्ग के मुताबिक शी जिनपिंग (चीन), किम जोंग-उन (उत्तर कोरिया) और मोहम्मद बिन सलमान अपने-अपने देशों में अगले कई दशकों तक राज कर सकते हैं। वहीं पुतिन 2024 तक तो अपने पद पर रहेंगे ही, इसके बाद भी अपने पद पर बने रहने के लिए एक बार फिर वे संविधान में बदलाव का सहारा ले सकते हैं। वहीं 71 वर्षीय ट्रंप के लिए ब्लूमबर्ग का कहना है उन्हें किसी भी अमेरिकी नेता की तुलना में सबसे कम स्वीकार्यता मिली है और बहुत से लोग यह कयास लगा रहे हैं कि वे अपना मौजूदा कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाएंगे। हालांकि, फिलहाल कुछ ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। हां, अगर ट्रंप 2020 में दोबारा चुने जाते हैं तो भी संवैधानिक व्यवस्था के तहत वह 2024 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकते।

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