पृष्ठ : भारत अबतक

सादगी ऐसी की खपरैल मकान में ही अंतिम सांस ली देशरत्न राजेन्द्र ने

देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद कहिए या भारत रत्न डॉ.राजेन्द्र प्रसाद….. जन्म भले ही जीरादेई में हुआ लेकिन वे वर्ष 1921 से 1946 तक पटना में कुर्जी के नजदीक मौलाना मजहरुल हक द्वारा कांग्रेस को दी गई जमीन पर स्थित बिहार विद्यापीठ परिसर में बने एक खपरैल मकान में ही रहा करते थे। हाँ! पढ़ाई और वकालत के बाद कुछ समय देश सेवा के दरमियान जेल में और भारत के राष्ट्रपति के रूप में दस वर्षों (1952-1962) तक 320 एकड़ में फैले 340 सुसज्जित कमरों वाले राष्ट्रपति भवन में बीते।

बता दें कि 1962 में ही दिल्ली के राष्ट्रपति भवन को अलविदा कहकर पटना के उसी बिहार विद्यापीठ वाले खपरैल मकान में लगभग साल भर अपना जीवन गुजारा राजेन्द्र बाबू ने। 28 फरवरी 1963 की रात बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने बिहार के विद्यापीठ परिसर में के उसी खपरैल मकान में अंतिम सांस ली।

यह भी जानिए कि इस विद्यापीठ की स्थापना 1921 में ही महात्मा गांधी द्वारा की गई थी। इसकी स्थापना के लिए गांधी ने झरिया जाकर वहाँ के एक गुजराती कोयला व्यवसायी से चंदे के रूप में कुछ राशि ली और तब मजहरुल हक द्वारा दी गई जमीन पर निर्माण हुआ।

डॉ.राजेन्द्र प्रसाद जब दिल्ली से लौटकर बिहार विद्यापीठ में पुनः स्थाई रूप से रहने लगे तो कोई ऐसा दिन नहीं होता जब नेताओं एवं आम लोगों का जमावड़ा नहीं लगता। आज भले ही देश रत्न हमारे बीच नहीं हैं परंतु उनकी स्मृतियाँ आज भी उनके होने का एहसास कराती हैं। वह पुराना खपरैलनुमा भवन आज भी हमारे मानस पटल पर ढेर सारे संस्मरणों को अंकुरित होने के लिए प्रोत्साहित करता है। पास में जमीन पर बिछी सफेद चादर पर रखा चरखा आजादी के आंदोलनों को तरोताजा कर देता है। राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी राजवंशी देवी से जुड़ी कई यादें आज भी जिंदा हो जाती हैं।

सम्बंधित खबरें


बड़ी दूर से आए हैं… गीत गाकर हमसे दूर चले गए मो.अजीज

अभी-अभी 20 नवंबर की ही तो बात है, मधेपुरा (बिहार) में गोपाष्टमी महोत्सव के समापन के अवसर पर बॉलीवुड के लोकप्रिय प्लेबैक सिंगर मोहम्मद अजीज के इस गीत (‘बड़ी दूर से आए हैं’) ने खूब तालियां बटोरी थीं… और सप्ताह भी नहीं बीता कि हमसे बहुत दूर चले गए हर दिल अजीज मो. अजीज। अब भारतरत्न लता मंगेशकर से लेकर गायक-गायिकाओं की आज तक की पीढ़ी की आवाज से आवाज मिलाने वाले मो. अजीज को कोई देख ना पाएगा..!

 

Dr.Bhupendra Madhepuri presenting his book "Chhota Lakshya Ek Apradh Hai" to Md.Aziz.
Dr.Bhupendra Madhepuri presenting his book “Chhota Lakshya Ek Apradh Hai” to Md.Aziz.

मधेपुरा में समाजसेवी-साहित्यकार डॉ. मधेपुरी की मो. अजीज से लंबी बातचीत हुई थी। डॉ. मधेपुरी ने उन्हें पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के ऊपर लिखी अपनी चर्चित किताब ‘छोटा लक्ष्य एक अपराध है’ भेंट करते हुए उनके साथ के संस्मरणों को उनसे साझा किया था। संयोगवश मो. अजीज के भी कलाम साहब से निकट संबंध थे। फिर क्या था, दोनों लोगों के बीच कलाम साहब जैसे ‘पुल’ हों तो बातों का सिलसिला चल पड़ना लाजिमी ही था।

मो. अजीज ने बातचीत के दौरान डॉ. मधेपुरी से अपनी कुछ पंक्तियां सुनाने का आग्रह किया था, जिसे डॉ. मधेपुरी टाल ना पाए और उन्हें अपनी कुछ पंक्तियां सुनाईं जो ये थीं:
कहाँ जन्मे सुनो हम नहीं जानते
कब मरेंगे कहाँ हम नहीं जानते
काम करना है, रुकना नहीं है यहाँ
कब छुटेगा जहाँ हम नहीं जानते।
मो. अजीज को डॉ. मधेपुरी की पंक्तियां कुछ इस कदर भाईं कि वो तत्काल उसे गुनगुनाने भी लगे। शायद वो इन पंक्तियों को अपना स्वर देना चाहते थे। उन्होंने डॉ. मधेपुरी को मुंबई बुलाया। डॉ. मधेपुरी मुंबई गए भी। लेकिन मुलाकात नहीं होनी थी, सो नहीं हुई… कहाँ जन्मे सुनो हम नहीं जानते… कब मरेंगे कहाँ हम नहीं जानते..!

बहरहाल, 80-90 के दशक में एक से बढ़कर एक हिट गानों को अपनी आवाज से नवाजने वाले मो. अजीज ने मंगलवार को 64 साल की उम्र में मुंबई के नानावटी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनका जन्म 2 जुलाई 1954 को पश्चिम बंगाल में हुआ था। प्राप्त जानकारी के मुताबिक कोलकाता से एक कार्यक्रम कर मंगलवार को मुंबई आने के क्रम में मुंबई एयरपोर्ट पर ही उनकी तबीयत खराब हुई। उन्हें वहां से सीधे नानावटी अस्पताल लाया गया। डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।

चलते-चलते बता दें कि अस्सी के दशक में मो. अजीज कई बड़े अभिनेताओं की आवाज बने जिनमें अमिताभ बच्चन, मिथुन चक्रवर्ती, ऋषि कपूर, सनी देओल और गोविंदा के नाम प्रमुख हैं। अमिताभ बच्चन के ऊपर फिल्माया गया गीत ‘तू मुझे कबूल’ (फिल्म ‘खुदा गवाह’) हो या गोविन्दा के ऊपर फिल्माया गया गीत ‘आपके आ जाने से’ (फिल्म ‘खुदगर्ज’), इन गीतों को भला कौन भूल सकता है..! उन्होंने हिन्दी के अलावे मराठी, बंगाली समेत कई भारतीय भाषाओं में गीत गाए थे। उन्हें ‘मधेपुरा अबतक’ की विनम्र श्रद्धांजलि..!

सम्बंधित खबरें


भारतीय रेल की पैंट्रीकार में अब परोसा जाएगा गरमागरम ताजा भोजन !

भारतीय रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष श्री अश्विनी लोहानी की मंजूरी के बाद से सभी रेलवे जोन के महाप्रबंधकों को निर्देश जारी कर दिए गये हैं कि आई आर सी टी सी के लिए चलती ट्रेन में पैसेंजरों को गर्म, ताजा और स्वच्छ भोजन परोसने बड़ी चुनौती है। इस चुनौती को सभी स्वीकार करें और तेजी से काम करें।
बता दें कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने सभी मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों की पैंट्रीकार को नया स्वरूप देने हेतु मरम्मत व रखरखाव का काम आईआरसीटीसी (Indian Railway Catering and Tourism Corporation Ltd.) को सौंपने का निर्णय लिया है। जबकि पूर्व में भारतीय रेल के पैंट्रीकार में यांत्रिकी, तकनीकी व विद्युतीय आदी प्रकार की कोई खराबी होने पर उसकी मरम्मत व ठीक करने का काम भारतीय रेल द्वारा किये जाने वाले नियम के तहत ठीक होने में काफी वक्त लग जाया करता क्योंकि रेलवे में अलग-अलग दर्जनों विभाग होने से कौन करे……. कौन ना करे….. इसमें विलंब होना स्वाभाविक हो जाता।
अब भारतीय रेल की पैंट्रीकार में बर्तन धोने, रखने और खाना पकाने की नहीं होगी समस्या, क्योंकि पेंट्रीकार को नया स्वरूप देने वाले फैसले के अनुरूप कार्य प्रगति पर है। और हाँ ! यदि पैसेंजरों द्वारा रेल को सहयोग किया जाए तो और गुणवत्तापूर्ण भोजन उन्हें सदैव मिलता रहेगा।
रेल यात्रियों को यह जानना और मानना होगा कि जिस वेज खाने का आप ₹120 बिना बिल लिए भुगतान करते हैं वह वास्तव में ₹50 का होता है और नॉनवेज मात्र ₹55 का जिसके लिए आप ₹140 बिना रसीद लिए देते हैं। भारतीय रेल द्वारा आरंभ से ही मेनूकार्ड और रेट जारी किया गया है…… जानकारी के अभाव में पैसेंजर मांगते नहीं और यदि मांगने पर वह बहाना बनाता तो यह कह कर छोड़ देते कि अरे  चलो साल में दो-तीन बार ही तो रेल यात्रा करता हूं…… थोड़ा ले ही लिया तो क्या हुआ ?
बता दें कि भारत में रोजाना लगभग 7000 पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं ….. यदि दो हज़ार में ही पैंट्रीकार हो तो आप हैरत में पड़ जाएंगे की गणना अनुसार भारतीय रेल में प्रतिदिन 20 से 30 करोड़ का काला धन जनरेट होता है…… 1 महीने में अरबों…… वर्ष की गिनती संभव नहीं ….। ये सारे पैसे बिना टैक्स दिये ठेकेदारों की जेब में चले जाते हैं।
यदि हम और आप छोटी सी कोशिश करें तो बदलाव ला सकते हैं ….. रेलवे से रशीद लेना न भूलें तो ….. आने वाली पीढ़ी को काले धन की बुराइयों से बचा सकते हैं। हम अपने बच्चों को गरमा-गरम, ताजा और शुद्ध भोजन उचित दाम पर खिला सकते हैं….. चाय-कॉफ़ी के बाबत लिए जा रहे डबल चार्ज को आधा करा सकते हैं….।

सम्बंधित खबरें


कोसी फिल्म फेस्टिवल की वैश्विक पहचान आगे बनेगी भारतीय सिनेमा की शान

सहरसा के कला भवन में पहली बार आयोजित दो दिवसीय कोसी फिल्म फेस्टिवल का आयोजन कोसी, मिथिलांचल और सीमांचल के लिए बहुत बड़ा आयोजन साबित होने जा रहा है। करीब 1 दर्जन से अधिक हिन्दी, मैथिली फिल्मों का प्रदर्शन जहाँ कोसी क्षेत्र की वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है वहीं आये हुए कलाकारों, गीतकारों, संगीतकारों एवं निर्देशकों ने कहा कि इस क्षेत्र में ऐसे फिल्म फेस्टिवल का आयोजन एक क्रांतिकारी कदम है जिसका असर 5 साल बाद देखने को मिलेगा।
बता दें कि दो दिनों तक कोसी प्रमंडलीय मुख्यालय सहरसा शहर के मिजाज को फिल्मी बनाये रखनेवाले फिल्म फेस्टिवल का उद्घाटन जहाँ  प्रसिद्धि प्राप्त  बिहारी सिने अभिनेता अखिलेंद्र मिश्र द्वारा सुपर बाजार स्थित कला भवन में किया गया वहीं उसी फिल्म फेस्टिवल में शामिल हुए सभी चेहरे पर्दे पर जाने-पहचाने परंतु कुछ एक  को छोड़कर अधिकतर आज भी अपनों के बीच अनजाने हैं।
जानिए कि कई फिल्मों में अपनी भूमिकाओं से सुर्खियां बटोरने वाले नवहट्टा-मुरादपुर निवासी पंकज झा, सुपौल-कोशलीपट्टी निवासी राम बहादुर रेणु, सिमरी बख्तियारपुर के  चकभारो  निवासी शाहनवाज हनीफ, बलवाहाट निवासी मनीष सिंह राजपूत, पतरघट-भागवत गांव के विपुल आनंद, सत्तर कटैया-  बारा  गांव के नवनीत झा सहित अनेक लघु चलचित्रों, वृत्तचित्रों के निर्माताओं और निर्देशकों- अमृत सिन्हा, राहुल वर्मा, संदीप कुमार, शंकर आनंद झा , अमलेश आनंद, अहमद जमाल , आशुतोष सागर , गौतम आजाद आदि को मिथिला के परंपरागत पाग के साथ चादर एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के दौरान 15 लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया गया और समीक्षा भी…. जिनमें प्रमुख लघु फिल्में हैं- आत्म-ग्लानि, महाकुंभ, नई राह, तिरंगा, गलीकूची, मातृभूमि, चरस, केसर-कस्तूरी…… आदि। इनमें से कुछ टेली फिल्में  कोसी के ऐसे कलाकारों की देन है जो कोसी की माटी में जन्मे तो सही, परन्तु अपनी प्रतिभा के दम पर मुंबई में स्थापित हो चुके हैं।
दो दिवसीय कोसी फिल्म फेस्टिवल के सफल संचालन के लिए दर्शकों नेे हृदय से सहरसा ग्रुप के इन कलानुरागियों को हृदय से साधुवाद दिया जिनकी उपस्थिति और मेहनत चर्चा का विषय बना रहा। वे  हैं- संचालक आनंद झा, डॉ.शशि शेखर झा एवं रवि शंकर सहित रजनीश रंजन, मनीष रंजन, मुक्तेश्वर सिंह मुकेश, प्रो.गौतम कुमार सिंह…… कोएंकर शैली मिश्र, साकेत आनंद, शालिनी सिंह, मृत्युंजय तिवारी, मोनू झा, अजय चौहान, बिपिन सिंह, अमर कुमार, अभिषेक वर्धन, विपिन कुमार आदि।

 

सम्बंधित खबरें


घर से घाट तक….. लोक आस्था का (चार दिवसीय) महापर्व छठ !

महापर्व छठ देखकर बिहार की ऊँचाई को देश ही नहीं विदेश के लोग भी महसूसते रहे हैं। सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है छठ जिसमें मुस्लिम और अन्य धर्मावलंबी भी बढ़-चढ़कर लेते हैं भाग…..। कहीं कोई कलह-कोलाहल नहीं…. कई जगह पर तो मुस्लिम महिलाएं भी करती हैं छठ। इस पर्व के अवसर पर दूर देशों में रहने वाले लोगों को भी खींच लाती है अपनी सरजमीन…..।

बता दें कि देश में ही नहीं…… विदेशों में भी एक दिन कद्दू भात, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य और चौथे दिन प्रातः उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा की अद्भुत छटा विखेरते रहे हैं सात समंदर पार के लोग। सिंगापुर से लेकर बहरीन…… मॉरीशस से लेकर कैलिफोर्निया में बसे बिहारियों में छठ पर्व को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है। सूर्योपासना के इस महापर्व छठ के साथ-साथ पद्मश्री शारदा सिन्हा के कर्णप्रिय छठि मैया के गीतों पर देशी महिलाऔं के साथ-साथ विदेशी महिलाएं भी झूम उठती हैं।

यह भी जानिए कि छठ ही एक ऐसा पर्व है, जिसकी पूरी सत्ता मातृ प्रधान है। इस पर्व में महिलाएं स्वामिनी की भूमिका में होती हैं और पुरुष सेवक भाव में खड़ा दिखता है। महिलाएं अर्घ्य – गीत गाती हुई घाटों की ओर जा रही होती हैं तो पुरुष अपने माथे पर पूजन सामग्रियों की टोकरी लिए हुए चलते दिखते हैं…… यानी घर से घाट तक यह पुरुष प्रकृति के सामने नतमस्तक दिखता है। तभी तो प्राचीन भारतीय समाज में पुत्र अपनी मां के नाम से जाना जाता था।

बच्चों को यह जानना जरूरी है कि यह छठ पर्व हमें देता है- प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश। सूर्योपासना का यह पर्व हमें प्रकृति के करीब तो लाता ही है साथ ही किसी भी प्रतिकूल परिणाम को अनुकूल बना देता है। जब लोग जल में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं तो हानिकारक पराबैंगनी किरणें अवशोषित होकर ऑक्सीजन में परिणत हो जाती है और लोग उन किरणों के कुप्रभावों से बचते हैं। यह भी सच है कि सूर्य ही जल के स्रोत को राह देता है।

आगे यह भी जानिए कि इस पर्व के केंद्र में कृषि, किसान और मिट्टी है। हर फल व सब्जी इस पर्व का प्रसाद है। मिट्टी के बने चूल्हे पर हर तरह का प्रसाद बनाया जाता है तथा बांस से बनी सूप में पूजन सामग्री रखकर अर्घ्य दिया जाता है। बाट से लेकर घाट तक की सफाई की जाती है। आपदा प्रबंधन व सुरक्षा व्यवस्था हेतु प्रशासन एवं पब्लिक दोनों सचेत दिखते हैं।

छठ पर्व पर गाए जाने वाले गीतों में एक गीत बेटी मांगने वाला भी है। हमारे बिहार के  ग्राम्य जीवन में ‘कुंवारे आंगन’ जैसे शब्द भी हैं यानी जिस आंगन में बेटी के विवाह के फेरे नहीं पड़े तो वह आंगन कुंवारा रह गया…. ऐसा माना जाता है। परंतु सरकार द्वारा प्रायोजित ‘बेटी बचाओ…… बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम अब इस महापर्व के जरिये प्रखरता से ऊंचाई ग्रहण करता जा रहा है…..!

सम्बंधित खबरें


नीतीश को ब्रिटिश पार्लियामेंट करेगा सम्मानित

बिहार राज्य के मुंगेर जिले के छोटे से गाँव कल्याणपुर से निकलकर भारत में अपनी अलग पहचान बनाने वाले डॉ.नीतीश दुबे को होम्योपैथ चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान एवं किये गये शोध के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा सम्मानित किया जाएगा। भारत से पहली बार किसी होम्योपैथ चिकित्सक को सम्मानित करने के लिए डॉ.नीतीश को 24-26 नवंबर के बीच आयोजित होने वाले भारत कॉन्क्लेव में आमंत्रित किया गया है।
बता दें कि इस प्रकार का आयोजन भारतीय मूल के ब्रिटिश सांसदों द्वारा किया जा रहा है जिसमें वैसी हस्तियों को आमंत्रित किया गया है जो भारतीय संस्कृति, फैशन, वेद और आयुष जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट योगदान देने वाले भारतीयों में शुमार किये जाते हैं।
जानिए कि होम्योपैथ क्षेत्र से पहली बार ब्रिटिश पार्लियामेंट में किसी डॉक्टर को सम्मानित किया जाएगा। यूँ तो इस सम्मान के लिए चयनित डॉ.दुबे को पहले भी जर्मनी में दुनिया के सबसे बड़े होम्योपैथ रिसर्च संस्थान (DHU) जैसी बड़ी संस्था ने  सम्मानित किया है। जेनेवा में WHO के कार्यक्रम में भी सम्मानित हुए हैं।
यह भी बता दें कि डॉ.नीतीश दुबे हरि ओम होमियो (कल्याणपुर) के मैनेजिंग डायरेक्टर तो हैं ही , साथ ही बर्नेट होम्योपैथी प्राइवेट लिमिटेड नामक दवा कंपनी के चीफ मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं। हरिओम होमियो की शाखाएं बेगूसराय , भागलपुर , पटना और दिल्ली में भी है।
चलते-चलते बता दें कि डॉ.नीतीश दुबे के साथ-साथ प्रसिद्ध अभिनेता मनोज वाजपेयी, फिल्म निर्माता बोनी कपूर, पद्मश्री शाहनवाज हुसैन , ग्रीन मैन ऑफ़ इंडिया अब्दुल गनी एवं अनुराधा गोयल जैसी हस्तियों को भी ब्रिटिश पार्लियामेंट के इस कार्यक्रम में सम्मानित किया जाएगा।

सम्बंधित खबरें


कर्नाटक में भाजपा की उम्मीदों पर फिरा पानी

कर्नाटक की 3 लोकसभा और 2 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों में कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन मजबूत होकर उभरा है। दो विधानसभा और 2 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज कर गठबंधन ने भाजपा को तगड़ा झटका दिया है। भाजपा के हाथ केवल शिमोगा लोकसभा सीट आई है जबकि कांग्रेस-जेडी (एस) गठबंधन ने मांड्या और बेल्लारी लोकसभा सीटें अपने नाम की हैं। वहीं, रामनगर और जामखंडी विधानसभा सीट भी गठबंधन के खाते में गई हैं। इसी के साथ भाजपा की विधानसभा में ताकत बढ़ाने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

गौरतलब है कि जिन पांच सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे आए हैं, उनमें चार सीटें इस्तीफे की वजह से और एक सीट विधायक के निधन की वजह से खाली हुई थी। शिमोगा लोकसभा सीट बीएस येदियुरप्पा (बीजेपी), बेल्लारी लोकसभा सीट श्रीमुलु (बीजेपी) और मांड्या संसदीय सीट सीएस पुट्टाराजू (कांग्रेस) के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। वहीं रामनगर सीट से सीएम कुमारस्वामी (जेडीएस) के इस्तीफे और जामखंडी सीट कांग्रेस विधायक सिद्धू न्यामगौड़ा (कांग्रेस) के निधन के बाद खाली हुई थी। अब नतीजों के बाद बेल्लारी और मांड्या कांग्रेस के खाते में गई तो बीजेपी को सिर्फ शिमोगा से संतोष करना पड़ा। बाकी दो विधानसभा सीटों पर भी कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को ही जीत मिली। कुल मिलाकर बीजेपी को एक लोकसभा सीट का नुकसान उठाना पड़ा।

इन उपचुनावों पर सभी की निगाहें इसलिए टिकी थीं क्योंकि इनके नतीजों का असर कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन पर पड़ना तय था। मई में हुए चुनावों के दौरान दोनों पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ लड़ी थीं लेकिन नतीजे आने के बाद गठबंधन कर लिया था। पांच सीटों में कांग्रेस ने जामखंडी और बेल्लारी और जेडीएस ने शिमोगा, रामनगर और मांड्या में प्रत्याशी उतारे। ऐसे में 2019 चुनाव से पहले गठबंधन की ताकत, आपसी तालमेल और जनता पर असर की परख इन चुनावों में देखने को मिली।

कहना गलत ना होगा कि कर्नाटक में गठबंधन के प्रदर्शन से भाजपा के लिए मुश्किल हालात पैदा हो गए हैं। इन नतीजों से गठबंधन की राजनीति को ताकत मिलने की उम्मीद है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और अगले साल लोकसभा चुनाव होंगे। इन राज्यों के चुनावों पर कमोबेश कर्नाटक उपचुनाव का असर जरूर पड़ेगा। ऐसे में कर्नाटक में मिली जीत गठबंधन की राजनीति के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

सम्बंधित खबरें


पीएमसीएच बनेगा दुनिया का सबसे बड़ा अस्पताल

बिहारवासियों के लिए बड़ी खबर। पटना स्थित पीएमसीएच विश्व का सबसे बड़ा अस्पताल बनने जा रहा है। महज कुछ वर्षों के भीतर यहां बेड की संख्या 5462 होगी। जी हाँ, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में बिहार कैबिनेट ने शनिवार को पीएमसीएच को विश्व का सबसे बड़ा और अत्याधुनिक अस्पताल बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके लिए 5540 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं। अस्पताल का विस्तारीकरण तीन चरणों में और सात वर्ष के भीतर पूरा किया जाएगा। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस काम को और भी पहले कर लेने की आवश्यकता जताई है।

कैबिनेट विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार के अनुसार पीएमसीएच अपने नए अवतार में पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल और ग्रीन बिल्डिंग के मानकों के अनुरूप होगा। अस्पताल परिसर में 450 बेड का धर्मशाला भी बनाया जाएगा। उनके द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार यहां एमबीबीएस की सीटों की संख्या को 150 से बढ़ा कर 250 किया जाएगा। वहीं पीजी सीटों की संख्या को 146 से बढ़ा कर 200 किया जाएगा। सुपर स्पेशियलिटी सीटों की संख्या 8 से बढ़ा कर 36 की जाएगी।

बता दें कि वर्तमान में बेलग्रेड (सर्बिया) में दुनिया का सबसे बड़ा अस्पताल है। वहां कुल 3500 बेड हैं। कुछ वर्षों के बाद 5462 बेड के साथ यह गौरव पीएमसीएच के नाम हो जाएगा। फिलहाल यहां बेड की संख्या 1700 है।

सम्बंधित खबरें


सरदार पटेल की जीवनी सभी स्कूलों के पाठ्यक्रमों में हो शामिल- डॉ.मधेपुरी

भारतरत्न सरदार बल्लभभाई पटेल भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सर्वश्रेष्ठ सेनानी रहे और भारत की आजादी के बाद वे प्रथम गृह मंत्री एवं उप-प्रधानमंत्री बने | बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहे पटेल को सत्याग्रह की सफलता पर वहाँ की महिलाओं ने ‘सरदार’ की उपाधि से अलंकृत की……. | उसी लौह पुरुष सरदार पटेल को एकमात्र सक्षम व्यक्ति मानते हुए महात्मा गाँधी ने बहुत सोच-विचार करने के बाद ही राज्यों की जटिल समस्याओं का हल निकालने हेतु कदम उठाने को कहा था……… जिसे सरदार ने बखूबी करके दिखा दिया…….|

बता दें कि वैसे समर्पित महान देशभक्त सरदार पटेल की 143वीं जयंती कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ एवं सम्मेलन के सचिव डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी सहित अन्य साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों द्वारा “राष्ट्रीय एकता दिवस” के रूप में स्थानीय कला कुटीर में मनाई गई |

यह भी जानिए कि इस अवसर पर इतिहास के साथ-साथ दर्जनों साहित्यक पुस्तकों के रचनाकार श्री शलभ ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगभग 3000 करोड़ की लागत से गुजरात में जहाँ संसार की सबसे ऊंची प्रतिमा हमारे लौह पुरुष सरदार पटेल की लगाकर हम भारतीयों को गौरवान्वित किया है वहीं इस सम्मेलन के यशस्वी सचिव डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी द्वारा उजागर किया गया यह विचार- “लौह पुरुष की जीवनी सभी राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रमों में शामिल हो”- उस प्रतिमा की ऊंचाई से भी अधिक ऊंचा लगता है | भला क्यों नहीं; भारतरत्न डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम एवं समाजवादी चिन्तक भूपेन्द्र नारायण मंडल जैसी हस्तियों के सानिध्य में रह चुके डॉ.मधेपुरी इतिहास पुरुष रास बिहारी लाल मंडल व आधुनिक बिहार के निर्माता शिवनंदन प्रसाद मंडल आदि की जीवनी लिखकर समादृत जो होते रहे हैं और गत वर्ष तो इनकी रचना “छोटा लक्ष्य एक अपराध है” को झारखंड सरकार ने छठे वर्ग के पाठ्यक्रम में शामिल कर इन्हें भरपूर सम्मान दिया है |

अंत में कुछ कवियों ने कविता के जरिये तो उपस्थित कुछ लेखकों ने शब्द-पुष्पों के माध्यम से कठोर निर्णय लेने वाले राजनेता द्वय सरदार पटेल एवं इंदिरा गाँधी को (उनकी पुण्यतिथि पर) श्रद्धांजलि दी |

सम्बंधित खबरें


राष्ट्र को समर्पित “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी”

आज 31 अक्टूबर को कृतज्ञ राष्ट्र संपूर्ण श्रद्धा के साथ लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल की 143 वीं जयंती मना रहा है। सुबह सवेरे आयोजित “रन फॉर यूनिटी” ने यह साबित कर दिया कि संसार में सबसे बड़े हैं हमारे लौह पुरुष……. और लौह पुरुष की 182 मीटर सर्वाधिक ऊंची  स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भी उन्हीं के समान है- अटल और अडिग। मजबूती ऐसी की 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाओं और 6.5 रिक्टर पैमाने पर आये भूकंप के झटकों में भी मूर्ति की स्थिति बरकरार रहेगी।

Sardar Ballabh Bhai Patel
Sardar Ballabh Bhai Patel

बता दें कि आज ही गुजरात के नर्मदा जिले के केवाडिया में सुबह 10:00 बजे लौह पुरुष की प्रतिमा का लोकार्पण कर राष्ट्र को समर्पित किया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने- अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा-
सरदार पटेल एक ऐसी महान शख्सियत थे जिनकी भूमिका भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण रही। वे एक ऐसे जननेता थे जो सदैव किसानों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध रहे। सरदार पटेल को आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में याद किया जाता रहेगा…..! 550 से अधिक देशी रियासतों का एकीकरण कर एक संगठित भारत की रचना में उनके महत्वपूर्ण योगदानों को हमेशा याद करते रहेंगे हम…. सब ! भारत को एकता के सूत्र में पिरोने वाले उस महान शख्सियत सरदार पटेल की “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” के प्रति आज यह कृतज्ञ राष्ट्र श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।
संपूर्ण भारत इस मायने में एक मत है कि एकीकृत भारत का पूरा श्रेय सरदार वल्लभ भाई पटेल के रणनीतिक कौशल और उनकी बुद्धिमत्ता को जाता है। पटेल ने एक के बाद एक समाधान निकाला और देश को एक सूत्र में बांधा। उन्होंने जूनागढ़ , हैदराबाद……. राजस्थान आदि अनेकानेक राजवाड़ा को मिला-मिला कर एकीकृत भारत का निर्माण किया। तभी तो पटेल को एक मात्र सक्षम व्यक्ति मानते हुए महात्मा गांधी ने राज्यों की जटिल समस्याओं का हल निकालने हेतु उनसे कदम बढ़ाने के लिए कहा था।
देश के ऐसे लौह पुरुष की प्रतिमा की ऊंचाई दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति के रूप में होने से भारत गौरवान्वित महसूस कर रहा है। पद्मश्री रामवनजी सुतार जैसे मूर्तिकार द्वारा डिजाइन किये गये “स्टेचू ऑफ यूनिटी” को तैयार करने में 33 महीने लगे और लगे 1700 टन ब्राँज एवं 6500 टन स्टील तथा कुल व्यय  2989 करोड़ लगे जहां मूर्ति निर्माण में सिर्फ 1653 करोड़ लगे।
भला क्यों न होगा चार धातुओं से बनी स्टेचू पर इतना खर्च जबकि 1,80,000 (एक लाख अस्सी हजार) टन सीमेंट-कंक्रीट एवं 18500 (अठारह हज़ार पाँच सौ) टन स्टील नींव में ही डाला गया है। इसके अलावे 169000 गांवों के किसानों से 135 मेट्रिक टन लोहे मूर्ति निर्माण हेतु दान मिले। यही कारण है कि अमेरिका की “स्टैचू ऑफ लिबर्टी” से दुगुनी ऊंची प्रतिमा बनी है भारत में पटेल की “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी”- जिसे अनावरण करने के बाद प्रधानमंत्री ने भारत की 30 नदियों के जल से जलाभिषेक किया और सेना के हेलीकॉप्टरों द्वारा बरसाए गए फूल। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की मची रही धूम।
इस राष्ट्रीय गौरव के अवसर पर जब मधेपुरा अबतक द्वारा समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी से बातें की गई तो डॉ.मधेपुरी ने कहा कि सरदार पटेल जैसे राष्ट्र पुरुष को सम्मान दिये जाने पर देश के रहनुमाओं को किसी प्रकार की ओछी राजनीति नहीं करनी चाहिए। सरदार पटेल न होते तो क्या आज यह एकीकृत भारत होता…….! कदापि नहीं !!

सम्बंधित खबरें