पृष्ठ : भारत अबतक

राष्ट्रकवि दिनकर का मधेपुरा से गहरा लगाव- डॉ.मधेपुरी

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं में सत्ता को हिलाने की ताकत है। देश की राजनीति जब भी लड़खड़ाई तो दिनकर ने अपनी साहित्यिक क्षमता के माध्यम से उसे ऊर्जा प्रदान किया है। गांधी के चरखे को गलाकर तकली बनाने की सलाह देनेवाले राष्ट्रकवि दिनकर राजनीति और साहित्य के संबंधों के बीच हमेशा साहित्य के ही पक्ष में खड़े दिखे हैं।  उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से ताजिंदगी राष्ट्रीय चेतना का सृजन किया है।

उक्त बातें साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने 23 सितम्बर (बुधवार) को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 112वीं जयंती के मौके पर कोरोना के चलते निज निवास ‘वृंदावन’ में वर्चुअल संगोष्ठि को संबोधित करते हुए कही।

कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सचिव डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने यह भी बताया कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का मधेपुरा से गहरा लगाव रहा है। आरंभिक दिनों में दिनकर जी जब सहरसा के समीप बरियाही सब-रजिस्ट्री ऑफिस के रजिस्ट्रार हुआ करते थे तो मधेपुरा के अपने रजिस्ट्रार मित्र से प्रायः रविवार को मिलने आ जाते। यदा-कदा रात्रि भोजन और विश्राम भी किया करते।

कालांतर में पूर्णिया में रहकर “रश्मिरथी” की रचना करने के दरमियान टीपी कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य रतन चंद से भी मिलने आया करते, क्योंकि पटना कालेज में जब रतन चंद फोर्थ ईयर में पढ़ते थे तो दिनकर जी थर्ड ईयर में। दिनकर जी रतन बाबू को ताजिंदगी बड़े भाई ही कह कर पुकारते रहे।

अध्यक्षता कर रहे कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन मधेपुरा के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ जब दिनकर जी के गृह प्रखंड बरौनी में कल्याण विभाग में कार्यरत थे तो दिनकर जी से उनका ऐसा साहित्यिक संबंध बन गया था कि गांव के एक गरीब लोग को खाद्यान्न उपलब्ध कराने हेतु दिनकर जी ने उन्हें पत्र भी लिखा था।

विषय प्रवेश करते हुए अध्यक्ष शलभ ने कहा कि दिनकर उत्तर छायावाद के कवियों की पहली पीढ़ी के थे और उनकी कविता में ओज, विद्रोह, आक्रोश व क्रांति की पुकार है। दिनकर सौम्य व मृदुभाषी थे, परंतु देशहित में अपना विचार हमेशा बेबाकी से रखते रहे।

संस्थान के संरक्षक व पूर्व सांसद डॉ.आरके यादव रवि ने कहा कि ‘उर्वशी’ को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएं वीर रस से ओत-प्रोत है। ‘भूषण’ के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। प्रो.मणि भूषण वर्मा ने दिनकर की ‘हिमालय’ शीर्षक कविता का पाठ किया। कवि डॉ.अरविंद श्रीवास्तव ने अपने टेलीकास्ट में कहा कि दिनकर की रचनाएं संस्कृति के  उन्नयन का गौरवशाली इतिहास है।

सम्बंधित खबरें


पेरियार ई वी रामासामी की 142वीं जयंती डॉ.मधेपुरी ने मधेपुरा में मनाई

कोरोना के कोहराम के दरमियान ‘घर में रहें, सुरक्षित रहें’ के संदेश को जीवन का संबल बनाते हुए डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी सरीखे समाजसेवी-साहित्यकार द्वारा निज निवास ‘वृंदावन’ में पेरियार ई वी रामासामी की 142वीं जयंती मनाई गई।

डॉ.मधेपुरी ने आॅनलाइन श्रोताओं को अपने संबोधन में यही कहा कि पेरियार को हिंदू धर्म का ‘वाल्टेयर’ तथा एशिया महाद्वीप का ‘सुकरात’ कहा जाता है। उन्होंने कहा कि पेरियार ई वी रामासामी का जन्म 17 सितंबर, 1879 ईसवी को हुआ था एवं उनकी मृत्यु 24 दिसंबर, 1973 को हुई थी। बहुजनों का वह अप्रतिम योद्धा, त्यागी एवं संघर्षशील मसीहा ताजिंदगी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोही चेतना के प्रखर नायक बने रहे।

पेरियार रामासामी का मानना था कि ईश्वरवाद से ही पुरोहितवाद का जन्म होता है और पुरोहित ईश्वर की आड़ में समाज का शोषण करता है। पेरियार की मान्यता थी कि जाति व्यवस्था जहां ब्राह्मणों की सबसे बड़ी ताकत है वहीं शूद्रों की सबसे बड़ी कमजोरी। पेरियार की इसी सोच ने मरते दम तक ब्राह्मणों की मान्यताओं एवं परंपराओं से समाज को दूर रहने की सलाहियत दी।

अंत में डॉ.मधेपुरी  ने सुनाया पेरियार का यह संदेश- “सभी मनुष्य समान रूप से पैदा होते हैं तो फिर अकेले ब्राह्मण ऊँच और अन्यों को नीच कैसे ठहराया जा सकता है। धार्मिक ग्रंथों को यह कहकर नकार दिया कि ये सारे काल्पनिक ग्रंथ हैं जो एक वर्ग को श्रेष्ठ एवं शेष समाज को नीच साबित करने के लिए लिखे गए हैं।”

सम्बंधित खबरें


महान अभियंता भारतरत्न विश्वेश्वरैया की 160वीं जयंती मधेपुरा में मनी

साहित्यकार डॉ.मधेपुरी ने कोरोना काल में निज निवास ‘वृंदावन’ में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती मनाई और बच्चों से कहा कि भारत के महान अभियंता सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1860 और मृत्यु 12 अप्रैल 1962 को हुई। वे एक महान अभियंता ही नहीं एक ख्याति प्राप्त राजनयिक भी थे। भारत के मोकामा ब्रिज जैसे बड़े-बड़े पुलों एवं पंजाब, हरियाणा के डैम आदि के डिजाइन निर्माता डॉ.विश्वेश्वरैया को 1955 में भारत रत्न सरीखे सर्वोच्च सम्मान से विभूषित किया गया था। भारत उनके जन्मदिन को अभियंता दिवस के रुप में मनाता है। बिहार सरकार ने तो उनकी याद में तकनीकी कार्यालय वाले विभागीय सचिवालय भवन का नाम ही विश्वेश्वरैया भवन रख दिया है। इस सचिवालय परिसर में उनकी आदमकद प्रतिमा भी लगी है।

जानिए कि आरंभ में उन्हें ट्यूशन करके अपनी पढ़ाई करनी पड़ी थी। शुरू में इन्होंने बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया और बाद में मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, जिसमें भी वे अव्वल रहे। इंजीनियर बन कर उन्होंने मैसूर और कर्नाटक को विकसित व समृद्धशाली बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया।  डॉ.विश्वेश्वरैया को लोग कर्नाटक का भागीरथ कहते हैं। उनके विकास के सारे सिस्टमों की प्रशंसा उन दिनों ब्रिटिश अधिकारियों ने भी खूब की, जिन्हें आज सारे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही हैं।

चलते-चलते यह भी जानिए कि डॉ.विश्वेश्वरैया अशिक्षा, गरीबी, बीमारी एवं बेरोजगारी को लेकर भी चिंतित रहा करते थे और इन्हें दूर करने हेतु चिंतन भी करते रहते थे। इन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया था और बाद में मैसूर के महाराजा ने इन्हें मैसूर का मुख्यमंत्री भी नियुक्त कर दिया। गरीबी और बीमारी का मुख्य कारण वे अशिक्षा को मानते थे। ऐसे मौलिक चिंतक की कोटि में खड़े वैसे दो नाम हैं- हरित क्रांति के जनक  एमएस स्वामीनाथन  और एटॉमिक एनर्जी के जनक  होमी जहांगीर भाभा जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में भारत को नई-नई ऊंचाइयाँ दी…. उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने हेतु समाजसेवी-साहित्यकार डॉ भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी द्वारा निरंतर भारत सरकार से अनुनय-विनय किया जाता रहा है। और आगे भी अर्जे तमन्ना का इजहार किया जाता रहेगा….।

सम्बंधित खबरें


राष्ट्रीय एकता के लिए भारतीय रेल, खेल, सरदार पटेल और हिन्दी जरूरी- डॉ.मधेपुरी

विगत वर्षों में प्रत्येक 14 सितंबर को हिन्दी दिवस विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के साथ-साथ समाहरणालयों में समारोह पूर्वक मनाया जाता रहा, परंतु 2020 का हिन्दी दिवस समारोह कोरोना के कहर के कारण फीका रहा। 70 वर्ष पुराने कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सचिव डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी ने कोरोना के कारण इस बार निज निवास ‘वृंदावन’ में ही ऑनलाइन हिन्दी दिवस समारोह मनाया।

बता दें कि डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने संक्षेप में हिन्दी एवं हिन्दी दिवस के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियां देते हुए कहा-।

भारत को समेट कर रखने में भारतीय रेल, भारतीय खेल और सरदार पटेल का विशेष योगदान है, परंतु इससे भी अधिक योगदान है हिन्दी की, जिसमें भारत की एकता और अखंडता को बरकरार रखने की शक्ति है। यदि हिन्दी नहीं होती तो भारत एक नहीं होता…। अब हिन्दी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा का गौरव पाने में अधिक देर नहीं लगेगी बशर्ते कि हम भारतीय को अंग्रेजी के प्रति बढ़ रहे मोह-भ्रम को भंग करना होगा। मोह-भ्रम को भंग करना इसलिए जरूरी है कि चीन, जापान और जर्मनी आदि जैसे उन्नत देशों को अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा है। वे अंग्रेजी के मोह-भ्रम में कभी नहीं पड़े। डॉ.लोहिया जर्मन भाषा सीखने के बाद ही जर्मनी में पीएच.डी. की डिग्री ली थी।

आगे डॉ.मधेपुरी ने समाजवादी चिंतक व मनीषी भूपेन्द्र नारायण मंडल द्वारा हिन्दी के संबंध में भारतीय संसद में व्यक्त किए गए विचार को संदेश स्वरूप उद्धृत करते हुए कहा-

अध्यक्ष महोदय ! मैं हिन्दी के लिए पागल नहीं हूं, परंतु भारत में अंग्रेजी को बनाए रखने की कोशिश भारतीय जनक्रांति के साथ विश्वासघात है।

चलते-चलते यह भी जानिए कि हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। दुनिया भर में 65 करोड़ लोगों की मातृ भाषा है हिन्दी। दुनिया में हर पांच में से एक आदमी हिन्दी में इंटरनेट का उपयोग करता है। विश्व में हिन्दी ही वैसी समृद्ध भाषा है जिसमें शब्दों का वही उच्चारण होता है, जो लिखा जाता है। वर्ष 1953 में पहली बार 14 सितंबर को “हिन्दी दिवस” का आयोजन हुआ था। तभी से यह सिलसिला बना हुआ है। इस दिन हिन्दी भाषा की स्थिति और विकास पर मंथन-चिंतन किया जाता है। भारत में फिलहाल 77% से भी ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हैं

सम्बंधित खबरें


74 वर्षीय पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने लोहिया के विचारों एवं कर्पूरी के कर्मों से अपने जीवन को गढ़ा था- डॉ.मधेपुरी

बेदाग  एवं बेबाकी के लिए  प्रसिद्धि प्राप्त बिहार के दिग्गज नेता, तेज तर्रार वक्ता, पाँच बार एमपी रह चुके एवं पूर्व केंद्रीय  ग्रामीण विकास मंत्री  रघुवंश प्रसाद सिंह ने रविवार 13 सितंबर को  सवेरे दिल्ली में  अंतिम सांसे ली।  4 अगस्त से ही वे  सांस लेने की तकलीफ के चलते  दिल्ली के एम्स में  संघर्ष कर रहे थे।  वहां चार डॉक्टर्स  उनकी देख-रेख एवं निगरानी आईसीयू में कर रहे थे। वे विगत 4 दिनों से  वेंटिलेटर पर थे। आज रविवार को सवेरे भी उन्हें वेंटिलेटर पर ही रखा गया था। जब उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा तो संपूर्ण भारत शोकाकुल हो गया।

इलाज के दरमियान ही उन्होंने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद को कई पत्र लिखा और एक पत्र लोकतंत्र को जीवित रखने हेतु बिहार के मुख्यमंत्री व जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को भी लिखा। पत्र में उन्होंने यही कहा कि आरंभ में 26 जनवरी को राज्यपाल पटना में झंडोत्तोलन करते तो मुख्यमंत्री रांची में और 15 अगस्त को सीएम पटना में ध्वजारोहण करते तो महामहिम रांची में। अब रांची की जगह प्रथम लोकतंत्र की नगरी वैशाली को चुना जाए और आगे से उसी तर्ज पर तिरंगे को राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री दोनों जगहों पर अदल-बदल कर सलामी दे तो निश्चय ही लोकतंत्र को मजबूती मिलती रहेगी।

ठेठ देहाती लहजे में  सदा सादगी के साथ बातें करने वाले  रघुवंश प्रसाद सिंह के निधन पर शोक प्रकट करते हुए समाजवादी चिंतक भूपेन्द्र नारायण मंडल के अत्यंत करीबी रहे समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने कहा कि बिहार की माटी के सपूत रघुवंश बाबू  वंचितों, अछूतों व अल्पसंख्यकों के दूत तो थे ही, साथ ही समाजवादियों के प्रेरणा स्रोत भी थे। वैशाली जिले के शाहपुर गांव में 6 जून 1946 को जन्मे रघुवंश बाबू ने लोहिया के विचार एवं कर्पूरी के संघर्ष को जीवन का संबल बनाया था। ग्रामीण भारत ने अपना सच्चा सपूत खो दिया है जिन्होंने मनरेगा में गरीबों को 100 दिनों के रोजगार की गारंटी दिया था।

डॉ.मधेपुरी ने यह भी कहा कि ग्रामीण समस्याओं को गहराई से समझने वाला बिहार का वह शेर रघुवंश प्रसाद सिंह ताजिंदगी अविचलित रहकर बेकसों के संसार को सजाते रहे। वे चौकी पर सोते थे और खुद अपने कपड़े धोते थे। वे निर्धनों के सखा और सहयोगी थे। वे ग्रामीण भारत की असाधारण समझ रखने वाले जमीन से जुड़े हुए नेता थे। तभी तो आज बिहार के निर्धनों के बीच सबसे अधिक मातम छाया हुआ है। आज गरीबों के रहनुमा तथा समाजवादी विचारधारा के एक नायक का अंत हो गया। वर्तमान राजनीति में भी अंतिम व्यक्ति के हित में बेबाकी से उठने वाली दुर्लभ आवाज आज खामोश हो गई। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे एवं उनके शोकाकुल परिवार के शोक संतप्त जनों को यह अपार कष्ट सहन करने की शक्ति दे।

चलते-चलते यह भी कि डॉ.मधेपुरी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मांग की है कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहते हुए रघुवंश बाबू ने गरीबों के लिए मनरेगा योजना चलाकर संपूर्ण देश के गरीबों के लिए साल में 100 दिन के रोजगार की गारंटी की थी…… वैसे सरजमीनी नेता, समाजवादी विचारधारा के नायक एवं गरीबों के मसीहा रघुवंश प्रसाद सिंह की आदम कद प्रतिमा राजधानी पटना के किसी उपयुक्त चौराहे पर स्थापित किए जाने हेतु शीघ्रतिशीघ्र घोषणा करने की महती कृपा की जाए।

सम्बंधित खबरें


शहीद अब्दुल हमीद को उनकी 56वीं पुण्यतिथि पर याद किया डॉ.मधेपुरी ने

शहीद अब्दुल हमीद को  उनकी 56वीं पुण्यतिथि पर  डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने अपने वृंदावन निवास में  याद किया ।  डॉ.मधेपुरी ने  वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए  जुड़े सचेतन लोगों को जानकारियां देते हुए  यही कहा कि परमवीर अब्दुल हमीद का जन्म यूपी के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में 1 जुलाई 1933 को पिता मोहम्मद उस्मान (दर्जी) के घर माता सकीना बेगम की गोद में हुआ था। देश के लिए कुछ करने का जज्बा ने हमीद को 21 वर्ष की उम्र में भारतीय सेना की सेवा के लिए तैयार कर दिया। हमीद हमेशा सेना में कुछ बड़ा करने की तमन्ना रखता था। वह देश के लिए कुछ बड़ा करना चाहता था।

डॉ मधेपुरी ने पुनः कहा कि भारतीय सैनिकों के बीच आरंभ से ही अब्दुल हमीद की बहुत कदर थी। हमीद के पराक्रम और शौर्य की चर्चा सैनिकों के साथ-साथ यदा-कदा अधिकारियों के बीच भी होती थी। हमीद की वीरता के कारण ही उसे लायंस नायक बना दिया गया। साहसिक प्रदर्शन ऐसा कि क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद 1965 के सितंबर में हुए भारत-पाक (आसल-उत्तार) युद्ध  में कश्मीर के चीमा गांव के बाहरी इलाके में गन्ने के खेतों के बीच बैठे थे। हमीद ने पाकिस्तानी पैटन टैंकों के अपनी रिकॉयलेस गन की रेंज में आने का इंतजार किया और आरसीएल रेंज में आते ही टैंकों पर अंधाधुन फायर करना शुरु कर दिया। उस दौरान पाकिस्तानी तीन-चार टैंकों को तो चंद मिनटों में ही उड़ा दिया हमीद नेे। उसके बाद भी कई टैंको को उड़ाए। जब वह आठवां टैंक को निशाना बना रहा था कि सामने वाला टैंक तो नष्ट हुआ, परंतु उसके गोले हमीद के जीप के भी परखच्चे उड़ा दिए और हमीद साहसिक प्रदर्शन करते हुए 10 सितम्बर को वीरगति को प्राप्त हुआ। तिरंगा में लिपटकर वह वीर हमीद अपने प्यारे  ग्रामीणों, अपनी पत्नी रसूलन बीबी, अपने चार बेटे और एक बेटी के पास पहुंच गया। इस वीरता के लिए अब्दुल हमीद जैसे सेना के उस शेर को मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च सेेना पुरस्कार “परमवीर चक्र” देकर सम्मानित करते हुए महामहिम राष्ट्रपति ने उस अमर शहीद अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीबी को यह सम्मान प्रदान किया।

अंत में डॉ.मधेपुरी ने यह भी कहा कि  अब्दुल हमीद को इसके अतिरिक्त समर सेवा पदक, रक्षा पदक तथा सैन्य सेवा पदक भी मिल चुका है। भारत सरकार ने इस कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अमर शहीद अब्दुल हमीद के नाम उनके सम्मान में 2000 ईस्वी में डाक टिकट भी जारी किया है।

सम्बंधित खबरें


भारत में विगत 24 घंटे में मिले 95 हजार कोरोना मरीज और अब तक मौत को गले लगा चुके हैं 75 हजार

बता दें कि भारत में सबसे ज्यादा एक्टिव केस महाराष्ट्र में है। जानिए कि महाराष्ट्र में 2 लाख से ज्यादा कोरोना संक्रमितों का इलाज वहां के अस्पतालों में चल रहा है। दूसरे और तीसरे नंबर पर आता है तमिलनाडु और दिल्ली….. चौथे व पांचवें नंबर पर क्रमशः गुजरात एवं पश्चिम बंगाल आता है। इन सभी पांचों राज्यों में कोरोना पॉजिटिवों का सर्वाधिक केस है या यह कहें कि एक्टिव कोरोना संक्रमितों के मामले में विश्व में भारत का दूसरा स्थान है यानि भारत दुनिया का दूसरा सबसे प्रभावित देश है। मौत के मामले में अमेरिका और ब्राजील के बाद भारत का ही नंबर आता है।

चलते-चलते कोरोना अपडेट की जानकारी ले लीजिए- भारत में कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या 44 लाख के पार पहुंच गई है। देश में विगत 24 घंटे में 95 हजार 735 नए मामले का रिकार्ड सामने आया है जबकि 7 सितंबर को 90 हजार 802 मामले दर्ज हुए थे। देश में 2 सितंबर से लगातार प्रतिदिन 1000 से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। अबतक भारत में कोरोना के कारण काल के गाल में जाने वालों की संख्या 75000 के पार पहुंच गई है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजे आंकड़े के अनुसार भारत में कोरोना  संक्रमितों की कुल संख्या 44 लाख 62 हजार हो गई है जिसमें एक्टिव केस की संख्या 9 लाख 19 हजार ही है। अब तक 34 लाख 71 हजार भारतीय ठीक हो चुके हैं। आईसीएमआर के अनुसार कुल 5 करोड़ 40 लाख सैंपल टेस्ट किए जा चुके हैं जिसमें 11 लाख की टेस्टिंग कल की गई है।

अंत में यह कि मृत्यु दर (1.68%) एवं एक्टिव केस रेट में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है जबकि रिकवरी रेट (78%) लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावे आईजीआईएमएस द्वारा कोरोना से ठीक हुए मरीजों को फिजियोथेरेपी लाभ प्राप्त करने हेतु सलाह मुफ्त में दी जाएगी।

सम्बंधित खबरें


इंटरनेशनल लिटरेसी डे- 2020

प्रत्येक वर्ष संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने की शुरुआत 26 अक्टूबर 1966 को हुई थी । यह कार्यक्रम शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने हेतु किया जाता है। सर्वप्रथम ईरान के तेहरान में दुनिया से निरक्षरता को खत्म करने के लिए दुनिया भर में एक अभियान चलाने पर चर्चा की गई थी। इस वर्ष वैश्विक कोविड-19 महामारी के खतरे के अनुरूप यह “साक्षरता  शिक्षण और कोविड-19 संकट और उसके बाद” विषय पर केंद्रित किया गया। फलस्वरूप इस वर्ष इस वैश्विक संकट के मौके पर ‘शिक्षकों की भूमिका और बदली शिक्षा पद्धति’ पर जोर दिया गया और आगे भी दिया जाता रहेगा।

बता दें कि कोरोना काल में विश्व साक्षरता दिवस को सफल बनाने हेतु फिलहाल टीवी, रेडियो एवं इंटरनेट के जरिए शिक्षा के काम को आगे बढ़ाया जा रहा है। इस साल साक्षरता दिवस के दिन संयुक्त राष्ट्र ने शिक्षा के मुद्दे पर कई प्रकार के ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित किया है। इसका उद्देश्य यही है कि लोग साक्षर होकर अपने आने वाले कल को बेहतर बना सके तथा  अंधेरी गलियों में उजियारा ला सके।

चलते-चलते यह भी बता दें कि जहां साक्षरता के मामले में देश का शीर्ष राज्य है केरल… जहां 96.2% लोग  साक्षर हैं, वहीं आंध्र प्रदेश इस मामले में सबसे निचले पायदान पर है जहां की साक्षरता दर 66.4% है। जानिए कि ब्रिटिश हुकूमत के समय देश में सिर्फ 12% लोग ही साक्षर थे।

सम्बंधित खबरें


आशा भोंसले ने अपने जन्मदिन की 87वीं वर्षगांठ मनायी

पंडित दीनानाथ मंगेशकर सरीखे मराठी रंगमंच अभिनेता, प्रसिद्ध गायक व नाटककार पिता की दो पुत्रियों भारत रत्न लता मंगेशकर और आशा मंगेशकर ने फिल्मी दुनिया में अपनी गायकी की ऊंचाइयों के लिए प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी है। आज भी इन दोनों की आवाज के करोड़ों दीवाने हैं। शेष दो पुत्रियां मीणा व उषा एवं पुत्र हृदयनाथ मंगेशकर हैं।

बता दें कि आशा मंगेशकर का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। बेहद छोटी उम्र में ही अपने बच्चों को संगीत की तालीम देनी शुरू कर दी पिता श्री पंडित दीनानाथ ने। आशा जी ने जीवन के 9वें बसंत पार करते ही पिता को खो दिया। तब पूरा मंगेशकर परिवार मुंबई आकर रहने लगा। बड़ी बहन लता जी के कंधे पर परिवार का बोझ आने पर उसने कम ही उम्र में फिल्मों में गाना व अभिनय शुरू कर दिया था।

यह भी जानिए की बड़ी बहन लता जी के अधिक उम्र के सेक्रेटरी गणपतराव भोसले से आशा जी ने परिवार के विरुद्ध जाकर प्रेम विवाह कर लिया और इस कारण उन्हें घर भी छोड़ना पड़ा था। पहली शादी से उन्हें तीन बच्चे हैं। दो बेटे- हेमंत एवं आनंद और एक बेटी वर्षा। बाद में शादी टूटने के बाद आशा जी अपने तीनों बच्चों के साथ घर वापस आ गई।

यह भी बता दें  कि आशा जी ने दूसरी शादी प्रसिद्ध संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) से की। जानिए कि संगीतकार एसडी बर्मन के पुत्र राहुल देव बर्मन बचपन में रोते वक़्त पाँच तरह की आवाजें निकालते थे इसलिए उन्हें पंचम कहा जाने लगा और बाद में ‘पंचम दा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए। यह पारिवारिक संबंध आशा जी ने पंचम दा के निधन तक निभाया।

आरंभ में आशा भोंसले को बहुत संघर्ष करना पड़ा था। आशा जी ने 1948 में अपना पहला गीत फिल्म ‘सावन आया’ में  गाया फिर तो नया दौर, उमराव जान, तीसरी मंजिल आदि फिल्मों में  मोहम्मद रफी के साथ  मांग के साथ तुम्हारा…, उड़े जब जब जुल्फें तेरी… आदि गीतों ने धूम मचा दी और छह दशक तक  16 हजार से ज्यादे गानों में न जाने  इतने बेहतरीन  गाने गाती चली गई।

चलते-चलते यह भी जानिए कि आशा भोंसले केवल एक अच्छी गायिका ही नहीं बल्कि एक बेहद अच्छी कुक भी हैं आशा जी कुवैत एवं दुबई में “अपना रेस्तरां” चेन भी चलाती हैं।

 

सम्बंधित खबरें


ग्लोबल टीचर अवार्डी भारतीय अध्यापकों ने बताया- कैसी हो भविष्य की टीचिंग

वैश्विक आधुनिक शिक्षा जगत के नोबेल कहे जाने वाले ग्लोबल टीचर अवार्ड हेतु लगभग डेढ़ सौ देशों के 12 हजार टीचर्स में शाॅर्ट लिस्ट किए गए शीर्ष 50 शिक्षकों में जिन तीन भारतीय शिक्षकों ने अपना स्थान सुरक्षित किया, वे तीनों है-

1.रंजीत सिंह दिसाले, सरकारी स्कूल टीचर, सोलापुर (महाराष्ट्र)

2.विनीता गर्ग, दिल्ली की कंप्यूटर टीचर, और

3.शुभोजित पायने, अजमेर (राजस्थान)

बता दें कि महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने देशवासियों से कहा कि सभी को अपने विकास के लिए शिक्षा में हो रहे नए बदलावों के बारे में जानना होगा तथा बच्चों को रुचि के साथ सीखने के लिए प्रेरित करना होगा। महामहिम ने पुनः कहा कि हमारे शिक्षक डिजिटल प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिए अपने कौशल को समयानुकूल उन्नत बनाएं।

एक ओर जहां महामहिम राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि कोरोना के कारण आए इस अचानक बदलाव के समय पारंपरिक शिक्षा के माध्यमों से हटकर डिजिटल माध्यम से पढ़ाने में सभी शिक्षक सहज नहीं हो पा रहे थे, परंतु अल्पावधि में हमारे प्राध्यापकों ने डिजिटल माध्यम का उपयोग कर विद्यार्थियों से जुड़ने के लिए कड़ी मेहनत की, वहीं शिक्षक रंजीत सिंह दिसाले द्वारा 2014 में ही बनाई क्यूआर कोड किताबों से लाॅकडाउन में 8 देशों के 16 हजार बच्चे जुड़े और रूचि के साथ पढ़े। आज की तारीख में उसे एनसीईआरटी  इस्तेमाल कर रहा है। विनीता गर्ग और शुभोजीत पायने कंप्यूटर कोडिंग जैसे कठिन व जटिल विषय को सुगम बना कर संगीत और अन्य विषयों की पढ़ाई को सरल बना दिया है।

सम्बंधित खबरें