पृष्ठ : भारत अबतक

अमेरिका में इन 21 कंपनियों के सीईओ से मिल रहे हैं मोदी

डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली अमेरिका यात्रा पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाशिंगटन पहुंच गए हैं। ट्रंप से उनकी मुलाकात सोमवार को होगी, लेकिन उससे पहले ही ट्रंप ने अपने आधिकारिक वेबसाईट से मोदी का स्वागत किया। मोदी को सच्चा दोस्त बताते हुए उन्होंने ट्वीट किया कि भारतीय प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए व्हाइट हाउस तैयार है। अहम रणनीतिक मुद्दों पर अपने सच्चे दोस्त से चर्चा होगी।

गौरतलब है कि सोमवार को होनेवाली ट्रंप-मोदी मुलाकात में दोनों देशों के बीच कई अहम करार होने की उम्मीद है। इस दौरान द्विपक्षीय हितों के अतिरिक्त दोनों नेताओं के बीच जिन मुद्दों पर बातचीत संभावित है, उनमें एच-1बी वीजा, पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं।

बहरहाल, सोमवार की इस बहुप्रतीक्षित मुलाकात पर जहां भारत समेत पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी की रविवार को दुनिया के टॉप 21 सीईओ से हो रही मुलाकात भी कम महत्वपूर्ण नहीं। इस समय जब ये पोस्ट लिखा जा रहा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के शीर्ष बिजनेस लीडर्स के साथ संवादरत हैं।

भारतीय प्रधानमंत्री के बातचीत में मौजूद बिजनेस वर्ल्ड के 21 बड़े नाम इस प्रकार हैं – शांतनु नारायण (एडोब), जेफ बेजोस (अमेजन), जिम टैक्लेट (अमेरिकन टावर कार्पोरेशन), टिम कुक (एप्पल), जिम उम्प्लेबाई (कैटरपिलर), जॉन चैंबर्स (सिस्को), पुनित रेंजेन (डेलॉइट ग्लोबल), डेविड फार (इमर्सन), मार्क वेनबर्गर (अर्नेस्ट एंड यंग), सुंदर पिचाई (गूगल), एलेक्स गोरस्की (जॉनसन एंड जॉनसन), जेमी डिमोन (जेपी मॉर्गन चेज एंड कंपनी), मेरिलिन ए ह्यूसन (लॉकहीड मॉर्टिन), आर्ने सोरेनसन (मैरियट इंटरनेशनल), अजय बंगा (मास्टरकार्ड), इरेन रोसेनफील्ड (मोंडेलेज इंटरनेशनल), डेविड रुबेन्स्टेन (द कार्लाइल ग्रुप), डग मैकमिलन (वॉलमॉर्ट), चार्ल्स काये (वारबर्ग पिनकस), डेनियल यार्गिन (आईएचएस मार्किट) और मुकेश आघी (यूएसआईसीबी)।

गौरतलब है कि मोदी ने 2015 में भी कई कंपनियों के सीईओ के साथ राउंड टेबल मीटिंग की थी और कई संभावनाओं का बीजारोपण किया था। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार की मुलाकात के बाद वे संभावनाएं ठोस आकार लेंगी। मोदी दुनिया की इन दिग्गज कंपनियों को जीएसटी जैसे ऐतिहासिक सुधार के बाद बनी भारत की माकूल स्थिति से अवगत कराना चाहेंगे। साथ ही उन्हें ‘मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस’ का भरोसा देंगे। मोदी ये अच्छी तरह जानते हैं कि उनके कार्यकाल के तीन वर्ष बीत चुके हैं और उनका देश उन्हें बड़ी उम्मीदों से देख रहा है। जाहिर है, अपनी कोशिशों में वे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

सम्बंधित खबरें


पासवान ने कहा, बिहार के भले के लिए एनडीए में आएं नीतीश

केन्द्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री व लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशंसा करते हुए उन्हें एनडीए में आने का न्योता दिया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के निर्णय का हम स्वागत करते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि दो नाव पर पांव नहीं रखें। जल्दी से एनडीए में आ जाएं। उनके आने से एनडीए भी मजबूत होगा, वे भी मजबूत होंगे और बिहार का भला हो जाएगा।

पासवान ने आगे कहा कि नीतीश महागठबंधन में असहज महसूस कर रहे हैं। हाल के दिनों में ऐसे कई मौके आए हैं जब उनकी असहजता सामने आई है। नोटबंदी पर साथ देने और कोविंद को समर्थन देने का उल्लेख करते हुए पासवान ने कहा कि ऐसे फैसलों से पता चलता है कि उनके और लालू के रास्ते अलग हैं। ऐसे में नीतीशजी को अब एनडीए में आ जाना चाहिए।

नीतीश की कल की टिप्पणी कि “विपक्षी दलों ने बिहार की बेटी (मीरा कुमार) को हारने के लिए उम्मीदवार बनाया” को सही ठहराते हुए पासवान ने कहा कि “नीतीशजी ने सही ही कहा है कि विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए मीरा कुमार को जानबूझकर चुना है, क्योंकि इसमें विपक्ष की हार निश्चित है। यूपीए के 10 वर्षों के शासनकाल में जब सत्ता कांग्रेस के हाथों में थी, तब उन्हें बिहार की बेटी की याद क्यों नहीं आई?” उन्होंने कहा कि इस बार भी जब रामनाथ कोविंद का नाम आया है तब मीरा कुमार का नाम इन लोगों ने आगे किया है।

बहरहाल, इस बीच नीतीश शनिवार को लालू द्वारा दी गई इफ्तार पार्टी में शामिल जरूर हुए, पर उनकी लाख कोशिशों के बावजूद कोविंद को समर्थन देने से पीछे नहीं हटे। बल्कि लालू की इफ्तार पार्टी से निकलने के बाद उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष ने जीत की बजाय हार की रणनीति बना ली है। अपने निर्णय का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि पहली बार बिहार के राज्यपाल को सीधे राष्ट्रपति बनाया जा रहा है। साथ में यह भी कि कोविंद आरएसएस की पृष्ठभूमि के नहीं हैं। उन्होंने मोरारजी देसाई के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत की थी। नीतीश ने यह भी दोहराया कि यह चुनाव राष्ट्रीय स्तर का है और हमारा गठबंधन बिहार में है। इससे सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

सम्बंधित खबरें


नीतीश ने ठुकराई लालू की अपील

राष्ट्रपति पद के लिए मीरा कुमार के विपक्ष की साझा उम्मीदवार बनते ही जहां एकतरफा दिख रहा चुनाव दिलचस्प हो गया है, वहीं बिहार की राजनीति पर भी ‘अनिश्चितता’ और ‘अविश्वास’ के बादल मंडराने लगे हैं। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने नीतीश द्वारा कोविंद को समर्थन दिए जाने को ‘ऐतिहासिक भूल’ करार दिया और मीरा की उम्मीदवारी की घोषणा के तत्काल बाद नीतीश से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की। लालू की इस अपील पर अपनी स्थिति साफ करने में जेडीयू ने वक्त नहीं लगाया और कहा कि राजनीतिक फैसले मिनट और सेकेंड में नहीं बदले जाते हैं। जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने स्पष्ट किया कि रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का फैसला कई बातों पर विचार करने के बाद लिया गया है। हमारी पार्टी की सर्वोच्च समिति ने यह तय किया है, इसलिए इसे बदलने का, इस पर फिर से विचार करने का कोई सवाल ही नहीं है।

बहरहाल, विपक्ष के उम्मीदवार के चयन के लिए दिल्ली में हुई 17 विपक्षी दलों की बैठक में मीरा कुमार का नाम तय किए जाने के बाद संवाददाताओं से बातचीत में लालू ने कहा था कि “मैं नीतीश कुमार से अपील करता हूं और शुक्रवार को पटना जाकर भी अपील करुंगा कि वह ऐतिहासिक भूल न करें। उनकी पार्टी से गलत निर्णय हो गया, उसे बदलें।” उन्होंने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी नीतीश कुमार से यह अपील की है। यह पूछे जाने पर कि क्या नीतीश के एनडीए उम्मीदवार को समर्थन देने से बिहार सरकार पर खतरा पैदा हो गया है और क्या उन्हें धोखा दिया गया है, लालू ने कहा कि “धोखा दिया या नहीं यह नीतीश जानें। सरकार चलती रहेगी। उस पर कोई खतरा नहीं है।”

बात जहां तक महागठबंधन सरकार की है, तो उसमें बने रहना तीनों घटक दलों की जरूरत है। इन दिनों एक साथ कई मुश्किलों से घिरे लालू के लिए तो शायद सबसे अधिक। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस और लालू नीतीश की ओर से इस तरह के निर्णय के लिए बिल्कुल ‘तैयार’ नहीं थे। हालांकि जेडीयू का कहना है कि कोविंद का नाम आना नीतीश के लिए ‘धर्मसंकट’ की तरह था और विपक्ष को उनके इस निर्णय को इसी परिप्रेक्ष्य में लेना चाहिए। उनके इस निर्णय से संघमुक्त भारत की उनकी लड़ाई पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

कुल मिलाकर राजनीति शह और मात का खेल है और नीतीश ने अपनी चाल चल दी है। अब अपने निर्णय को वापस लेना उनके लिए ‘घर का न घाट का’ होने जैसा होगा। इसलिए तय है कि वे ऐसा नहीं करेंगे। लेकिन इतना जरूर है कि मीरा कुमार के सामने होने से वे कहीं-न-कहीं थोड़े ‘असहज’ जरूर होंगे। कारण यह कि मीरा कुमार कोविंद की तरह दलित होने के साथ-साथ महिला भी हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वो बिहार से हैं। उधर मतों के हिसाब से कोविंद की जीत में मोदी-शाह को अब शायद संदेह न हो, लेकिन मीरा कुमार हर लिहाज से इतनी ‘सक्षम’ उम्मीदवार हैं कि भारतीय राजनीति की ये कद्दावर जोड़ी भी ‘जश्न’ परिणाम आने के बाद ही मना पाएगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

 

 

सम्बंधित खबरें


राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश एनडीए के साथ

जैसी कि संभावना थी, बिहार के मुख्यमंत्री व जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। बुधवार को पार्टी विधायकों की मीटिंग में नीतीश ने कहा कि वे सभी कोविंद के लिए वोट करें। नीतीश के इस निर्णय के साथ ही विपक्ष बिखर-सा गया। कांग्रेस ने अंत तक नीतीश को विपक्ष में बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस क्या निर्णय लेती है और किसे अपना उम्मीदवार बनाती है, यह देखने की बात होगी। उधर कोविंद को लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का क्या रुख रहता है, यह देखना भी दिलचस्प होगा, क्योंकि अब उनके एक तरफ कांग्रेस है तो दूसरी तरफ नीतीश। और इन सबके बीच महागठबंधन सरकार कितनी ‘निर्विघ्न’ रह पाती है, इस पर भी सबकी निगाहें रहेंगी।

बहरहाल, नीतीश के समर्थन के बाद रामनाथ कोविंद की स्थिति और मजबूत हो गई है। अब उन्हें 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिल सकते हैं। यही नहीं, नीतीश की घोषणा के बाद डीएमके भी ‘धर्मसंकट’ में है। कोई आश्चर्य नहीं कि डीएमके समेत कुछ अन्य पार्टियां भी कोविंद को समर्थन दे दें। अगर ऐसा होता है तो एनडीए उम्मीदवार को 70 प्रतिशत तक मत मिल सकते हैं।

ये नीतीश ही थे, जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष को एकजुट करने की पहल की थी। अब जबकि वे एनडीए उम्मीदवार के साथ खड़े हो गए हैं, विपक्षी एकता ताश के पत्तों-सी बिखरती दिख रही है। हालांकि नीतीश कुमार ने कांग्रेस को भरोसा दिलाया है कि उनका निर्णय केवल राष्ट्रपति चुनाव की बाबत है, अन्यथा वे विपक्ष के साथ बने हुए हैं। गौरतलब है कि मंगलवार को उनकी इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद से लंबी चर्चा हुई थी।

गौरतलब है कि नीतीश द्वारा कोविंद को समर्थन देने के दो स्पष्ट कारण हैं। पहला यह कि बतौर राज्यपाल कोविंद ने नीतीश सरकार के लिए कभी कोई मुश्किल पैदा नहीं की। जब शराबबंदी का मामला कानूनी विवादों में आया तब भी वे नीतीश के साथ मजबूती से थे। कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर भी पूर्व के राज्यपाल की तरह उन्होंने कोई नुक्ताचीनी नहीं की थी। दूसरा, यह कि कोविंद का विरोध कर नीतीश किसी भी स्थिति में यह संदेश नहीं दे सकते थे कि वे दलितविरोधी हैं। बिहार में उन्होंने अपनी जो राजनीतिक जमीन तैयार की है, उसमें दलितों-महादलितों की भूमिका छिपी नहीं है।

कुल मिलाकर ये कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर बिहार की राजनीति में खलबली-सी मच गई है। अब बाकी जो हो, कोविंद का राष्ट्रपति बनना और उधर मोदी का और इधर नीतीश का फायदे में रहना तय है, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


कोविन्द की उम्मीदवारी और दलों के समीकरण

देश के सर्वोच्च पद के लिए एनडीए का उम्मीदवार बनाए जाने के ठीक बाद बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंजूर कर लिया है। कोविंद की जगह पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी बिहार के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार संभालेंगे। इस बीच कोविंद ने अपने नाम की घोषणा होते ही दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व एनडीए के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की और अपना आभार जताया। यही नहीं, कोविंद बिहार के लोगों को भी धन्यवाद देना नहीं भूले।

उधर राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद के उम्मीदवार बनते ही विपक्ष के सारे समीकरण धरे के धरे रह गए। मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक का जवाब फिलहाल किसी दल को नहीं सूझ रहा। कांग्रेस, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस ने अपनी ‘नाखुशी’ जरूर जाहिर की, लेकिन कोविंद के नाम का सीधा विरोध करना उनके लिए भी कठिन है। सच यह है कि शिवसेना, जिसने इस फैसले को ‘वोटबैंक’ की राजनीति करार दिया, वो भी उस ‘महादलित’ समुदाय का विरोधी कहलाना नहीं चाहेगी, जिससे कोविंद ताल्लुक रखते हैं।

वैसे जहां तक वोटबैंक की बात है, तो कोविंद से जिस पार्टी का वोटबैंक सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है, वो है बहुजन समाज पार्टी। मायावती की तो पूरी राजनीति ही इस वोटबैंक पर टिकी है। अब बदले हालात में वो भाजपा को चाहे लाख कोस लें, लेकिन कोविंद का विरोध करने की भूल वो चाह कर भी नहीं कर सकतीं। उनका ऐसा करना अपना वोटबैंक दांव पर लगाने जैसा होगा।

इधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव सहित कई नेताओं ने भाजपा के इस फैसले का स्वागत किया। नीतीश कुमार ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि ये मेरे लिए गर्व की बात है कि बिहार के राज्यपाल राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं। हालांकि, कोविंद को समर्थन देने की बाबत उन्होंने जरूर कहा कि इसका फैसला वो पार्टी की मीटिंग के बाद करेंगे, लेकिन ये तय माना जा रहा है कि नोटबंदी की तरह इस मामले में भी वे विपक्ष से अपनी राह अलग करेंगे।

राजनीति के जानकार बताते हैं कि नीतीश कोविंद को समर्थन देकर एक तीर से कई निशाने साधना चाहेंगे। सबसे पहले तो यह कि वे ऐसा कर कोविंद से अब तक अच्छे रहे रिश्ते को और ‘प्रगाढ़’ करना चाहेंगे। दूसरा, महागठबंधन से अलग भी उनके पास एक ‘विकल्प’ रहेगा और तीसरा, महादलितों के बीच इससे ‘पॉजिटिव’ मैसेज जाएगा। कुल मिलाकर ये कि राजनीति का निराला खेल देखिए, अभी हाल-हाल तक नीतीश राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी एकता की पहल कर रहे थे, और अब संभवत: विपक्षी दलों में से कोविंद को समर्थन देने की पहल भी वही करें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


सचमुच मोदी के पेट में था राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का नाम

एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के संबंध में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने अपने अंदाज में बड़ा दिलचस्प बयान दिया था कि उनके उम्मीदवार का नाम और कहीं नहीं, नरेन्द्र मोदी के पेट में है। आज एनडीए द्वारा देश के सर्वोच्च पद के लिए अपने उम्मीदवार का नाम घोषित करते ही लालू की बात बिल्कुल सही साबित हुई। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, मोहन भागवत, सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन, द्रौपदी मुर्मू जैसे कई नाम बस कयास बनकर हवा में तैरते रहे और आज घोषणा हुई रामनाथ कोविंद के नाम की। पेशे से वकील रहे कोविंद वर्तमान में बिहार के राज्यपाल हैं। साफ-सुथरी छवि वाले, शालीन और अनुभवी व्यक्ति हैं कोविंद। राज्यपाल बनने से पूर्व दो बार राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं, लेकिन उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाएगा, ये स्वयं उनके लिए भी कल्पनातीत बात रही होगी। राजनीति के जानकार बताते हैं कि उन्हें राज्यपाल भी ‘अचानक’ ही बनाया गया था और अब राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भी वे ‘अचानक’ ही बने हैं।

बहरहाल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने आज रामनाथ कोविंद के नाम का ऐलान किया। इससे पहले राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने को लेकर राजधानी दिल्ली में भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह समेत सभी बड़े नेता इस बैठक में पहुंचे। मीटिंग में सांसदों और विधायकों को मौजूद रहने को कहा गया ताकि वे उम्मीदवार के नॉमिनेशन पेपर पर दस्तखत कर सकें। करीब 45 मिनट की मीटिंग के बाद शाह और मोदी ने अकेले में बैठक की। इसके बाद ही कोविंद के नाम का ऐलान कर दिया गया।

बता दें कि 1 अक्टूबर 1945 को कानपुर देहात में जन्मे कोविंद दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कानपुर यूनिवर्सिटी से बीकॉम और एलएलबी की डिग्री हासिल की। दिल्ली हाईकोर्ट में वकील रहे कोविंद 1994 में यूपी से राज्यसभा के लिए चुने गए और लगातार दो बार यानि 2006 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे कई संसदीय कमिटियों के चेयरमैन भी रहे। यह भी गौरतलब है कि कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज और भाजपा दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं।

कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर मोदी ने एक तीर से कई निशाना साधने की कोशिश की है। सबसे पहले तो यह कि मोदी के आभामंडल को कोविंद से दूर-दूर तक कोई ‘चुनौती’ नहीं मिल सकती। दूसरा यह कि कोविंद के दलित समुदाय से होने के कारण उनका सीधा विरोध करने से पहले हर पार्टी को कई बार सोचना पड़ेगा, यानि कि उनकी जीत सुनिश्चित। और तीसरा यह कि 2019 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में, जहां से सबसे ज्यादा सांसद चुने जाते हैं, इससे बड़ा लाभ मिलेगा, क्योंकि कानपुर से आने वाले कोविंद के राष्ट्रपति बनने से वहां की दलित नेता मायावती की राजनीतिक धार कमोबेश कुंद जरूर होगी, जिससे भाजपा फायदे में रहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


मदर्स डे का पूरक है फादर्स डे

पिता यानि हमारे सर्जक, हमारे निर्माता, हमारे ब्रह्मा… जिनकी ऊंगलियों के इशारे से हमारी दुनिया आकार लेती है, जिनके दिए संस्कार से हमारे विचार व्यवहार में ढलते हैं, जिनकी तपस्या से हम सम्पूर्ण मनुष्य बनते हैं… और दुनिया का क्रम चलता रहता है। जिस तरह मां के लिए कहा जाता है कि ईश्वर स्वयं हर जगह नहीं हो सकते, इसीलिए उन्होंने मां को बनाया, उसी तरह पिता के लिए कहना गलत न होगा कि मां के रूप में हर जगह होकर भी ईश्वर के लिए संसार चलाना संभव न था, इसीलिए उन्होंने अपनी पूर्णता के लिए अपनी ही असंख्य प्रतिकृतियां बनाईं और उन्हें पिता का नाम दे दिया। इन्हीं पिता को समर्पित दिन है – फादर्स डे। संतान के लिए पिता के अवदान के प्रति, उनके प्रेम, संघर्ष और त्याग के प्रति श्रद्धा से सिर झुकाने का दिन। दूसरे शब्दों में मदर्स डे का पूरक दिन।

फादर्स डे की मूल परिकल्पना अमेरिका की है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक फादर्स डे सर्वप्रथम 19 जून 1909 को मनाया गया था। वाशिंगटन के स्पोकेन शहर में सोनोरा डॉड ने अपने पिता की स्मृति में इस दिन की शुरुआत की थी। इसकी प्रेरणा उन्हें मदर्स डे से मिली थी।

आगे चलकर 1916 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने इस दिन को मनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी। धीरे-धीरे इस दिन को मनाने का चलन बढ़ता गया और 1924 में राष्ट्रपति कैल्विन कुलिज ने इसे राष्ट्रीय आयोजन घोषित किया। इसके उपरान्त 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इसे जून के तीसरे रविवार को मनाने का फैसला किया और 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस दिन को नियमित अवकाश के रूप में घोषित किया।

माता-पिता इस धरती के साक्षात ईश्वर हैं। उन्हें सम्मान हम चाहे जिस बहाने से दें वो गलत नहीं, लेकिन अगर सम्मान केवल दिनविशेष में सिमट कर रह जाए तो ये अनैतिकता की पराकाष्ठा होगी। पर आज हो कुछ ऐसा ही रहा है। समय बीतने के साथ मदर्स डे और फादर्स डे का व्यवसायीकरण होता गया। ग्रीटिंग कार्ड और उपहार तो हमें याद रहे लेकिन इन दिनों के सार, संदर्भ और संदेश को हम भुला बैठे। आज दुनिया के लगभग हर हिस्से में ये दिन मनाए जाते हैं और विरोधाभास देखिए कि दुनिया के हर हिस्से में ओल्ड एज होम भी बढ़ रहे हैं। आज हमारे पास अपने माता-पिता के लिए वक्त नहीं, लेकिन फेसबुक और व्हाट्स एप पर ये जताने में हम सबसे आगे होते हैं कि हम उन्हें कितना चाहते हैं, हमें उनकी कितनी फिक्र है और वो हमारे लिए क्या मायने रखते हैं। आईये, इस विरोधाभास को दूर करें। माता-पिता के लिए अपने सम्मान को केवल औपचारिकता न बन जानें दें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


क्या मोदी के लिए ओबामा जैसी गर्मजोशी दिखाएंगे ट्रंप ?

अपनी विदेश यात्राओं के लिए खास तौर पर चर्चा रहने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर अमेरिका जा रहे हैं। पर ये यात्रा उनकी पिछली यात्राओं की तरह ‘चकाचौंध’ वाली नहीं होगी। इस बार वे साल 2014 के बहुचर्चित मैडिसन स्कवॉयर कार्यक्रम की तरह भारतीय मूल के लोगों से हाई-प्रोफाइल मुलाकात नहीं करेंगे। बल्कि 25 और 26 जून को राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात के दौरान भारतीय समुदाय के एक छोटे से तबके के साथ बातचीत में हिस्सा लेंगे। बताया जा रहा है कि ऐसा ‘समय की कमी’ और ‘अनुकूल वातावरण न होने’ के कारण किया जा रहा है। वैसे प्राप्त जानकारी के मुताबिक इससे पहले ह्यूस्टन में एक सामुदायिक इवेंट की योजना बनाई गई थी जिसके लिए भारतीय समुदाय के लोग खासे उत्साहित थे। लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल को देखते हुए इसे टाल दिया गया।

डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी का ये पहला अमेरिकी दौरा है। हालांकि इससे पहले दोनों नेताओं के बीच करीब तीन बार फोन पर बातचीत हो चुकी है। विदेश मंत्रालय ने 25 जून को शुरू होने वाली प्रधानमंत्री की इस अमेरिकी यात्रा के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री मोदी 26 जून को राष्ट्रपति ट्रंप के साथ आधिकारिक बातचीत करेंगे। उनकी चर्चा पारस्परिक हित के मुद्दों पर गहरे द्विपक्षीय संबंधों और भारत-अमेरिका के बीच बहुआयामी रणनीतिक भागीदारी को मजबूत बनाने के लिए नई दिशा प्रदान करेगी।

ट्रंप और मोदी की मुलाकात के दौरान जिन मुद्दों पर बातचीत संभावित है उनमें एच-1बी वीजा का मुद्दा भी शामिल है। इस संबंध में भारत अपनी चिन्ता जता सकता है। गौरतलब है कि इस वीजा का इस्तेमाल भारतीय आईटी कंपनियां करती हैं और ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस वीजा प्रोग्राम के ‘दुरुपयोग’ को बड़ा मुद्दा बनाया था। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन समझौता भी चर्चा के लिए एक बड़ा मुद्दा है।

बहरहाल, ओबामा शासन के दौरान मोदी और ओबामा की रिकॉर्ड आठ बार मुलाकात हुई थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाशिंगटन का तीन बार दौरा किया था, जबकि साल 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा भारत आए थे। अब जबकि दोनों देशों के संदर्भ व हालात में खासा बदलाव आ चुका है, ये देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप मोदी के लिए कितनी गर्मजोशी और आत्मीयता दिखाते हैं। कहना गलत न होगा कि मोदी के इस अमेरिकी दौरे पर उनके समर्थकों और विरोधियों की नज़र एक साथ टिकी होगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

सम्बंधित खबरें


तो अमित शाह के हिसाब से ‘चतुर बनिया’ थे राष्ट्रपिता!

भारत के संपूर्ण इतिहास के उन चंद नामों में महात्मा गांधी का नाम शुमार है जिनकी स्वीकार्यता और जिनके प्रति सम्मान दल, जाति और धर्म ही नहीं, देश और काल की सीमा से परे है। ऐसे महान व्यक्तित्व के लिए किसी भी रूप में अशोभनीय शब्द का प्रयोग निन्दायोग्य ही नहीं बल्कि अक्षम्य है। पर इन दिनों मोदी के ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के नारे के झंडाबरदार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर हालिया चुनावी सफलताओं का नशा कुछ इस कदर चढ़ गया है कि वे मर्यादा की सारी सीमा लांघकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक के लिए अनादरसूचक शब्द का इस्तेमाल कर बैठे। जी हां, उन्होंने भरी सभा में उन्हें ‘चतुर बनिया’ की संज्ञा दी। अब चाहे वो इसके संदर्भ की लाख दुहाई दे लें, सार्वजनिक जीवन में रहने वाले और भारत ही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष कहलाने वाले व्यक्ति से ऐसा कतई अपेक्षित नहीं।

बहरहाल, चलिए जानते हैं मामला क्या है। दरअसल अमित शाह शुक्रवार को छत्तीसगढ़ में एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस दौरान कांग्रेस की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, “कांग्रेस किसी एक विचारधारा के आधार पर, किसी एक सिद्धांत के आधार पर बनी हुई पार्टी ही नहीं है… यह तो आज़ादी हासिल करने के लिए एक साधन (पर्पस व्हीकल) की तरह थी। और इसीलिए महात्मा गांधी ने… बहुत चतुर बनिया था… उन्होंने कहा था कि कांग्रेस को आज़ादी के बाद बिखेर देना चाहिए।” आगे उन्होंने कहा, “भले ही महात्मा गांधी कांग्रेस को न बिखेर पाए हों, लेकिन अब वह काम कांग्रेस के ही लोग कर रहे हैं।”

अमित शाह के इस बयान की कांग्रेस समेत सारी पार्टियों ने एक स्वर से निन्दा की है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने शाह के बयान को देशद्राह की संज्ञा दी और कहा कि यह स्वतंत्रता सेनानियों, उनके बलिदान और महात्मा गांधी का अपमान है। उन्होंने अमित शाह को सत्ता का व्यापारी बताते हुए कहा कि वे देश की आज़ादी की लड़ाई को व्यापारिक मॉडल बता रहे हैं। सुरजेवाला ने कहा कि सच्चाई यह है कि आज़ादी से पहले गोरे अंग्रेज महासभा और संघ का इस्तेमाल देश के बंटवारे के लिए करते रहे और अब यही काम भाजपा के काले अंग्रेज मुट्ठी भर धन्नासेठों का स्पेशल पर्पस व्हीकल बनकर कर रहे हैं।

उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट कर कहा, सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रनायकों का उल्लेख बेहद सम्मान और संवेदनशीलता के साथ करना चाहिए। जबकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सीधे कुछ न कहकर ट्वीट के माध्यम से बस गांधीजी का ही एक कथन साझा किया, जो यह है – “मैं जब भी निराश होता हूं, मैं याद करता हूं इतिहास में हमेशा सच और प्यार की जीत हुई है। अत्याचारी और हत्यारे हुए और कुछ वक्त के लिए वो अजय भी जान पड़े, लेकिन अंत में उनका खात्मा हो ही गया… ये बात हमेशा याद रखिए।”

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


मध्य प्रदेश में किसानों से मिलने जा रहे राहुल गांधी गिरफ्तार

पहले अपनी मांगों को लेकर आवाज़ उठा रहे असहाय किसानों पर गोलीबारी, फिर उन किसानों से मिलने जा रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार, जेडीयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव समेत अन्य नेताओं को रोका जाना और फिर राहुल गांधी की गिरफ्तारी – क्या ये स्वस्थ लोकतंत्र की तस्वीर है? नहीं न? लेकिन हैरानी की बात यह कि मध्य प्रदेश में ये सब कुछ हो रहा है। हैरत तब और बढ़ जाती है जब ‘सबका साथ सबका विकास’ की बात याद आती है। ये वो नारा है जो भाजपा ने दिया और जिस नारे पर देश ने यकीन किया। सवाल उठता है, क्या इसी दिन के लिए? राजनीतिक तौर पर भी देखें, तो केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार है और इस नाते किसी ‘अवरोध’ का भी प्रश्न नहीं उठता, फिर भी किसानों का इस तरह मुद्दा बन जाना समझ से परे है।

बहरहाल, मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों से मिलने जा रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को गुरुवार दोपहर पुलिस ने हिरासत में ले लिया। राहुल के साथ ही दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, शरद पवार और शरद यादव भी थे, लेकिन इन सभी को मध्य प्रदेश बॉर्डर पर ही रोक लिया गया। इस तरह रोके जाने पर राहुल पुलिस और प्रशासन को चकमा देते हुए बाइक से मंदसौर जाने के लिए निकल पड़े, लेकिन उन्हें नीमच में रोक दिया गया। उस वक्त राहुल के साथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और काग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट भी थे। बाद में राहुल को खोर स्थित विक्रम सीमेंट के गेस्ट हाउस ले जाया गया। पुलिस ने इस जगह को तात्कालिक जेल बना दिया है।

हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल गांधी ने कहा, “मैं सिर्फ किसानों से, जो हिन्दुस्तान के नागरिक हैं, उनसे मिलना चाहता हूं। मोदीजी किसान को सिर्फ गोली दे सकते हैं। उन्हें देश के सबसे बड़े आदमी का कर्ज माफ किया है, लेकिन किसानों का कर्ज माफ नहीं कर सकते।”

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के किसान कर्जमाफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, जमीन के बदले मुआवजे और दूध के मूल्य को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। मंगलवार को मंदसौर में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने फायरिंग की थी, जिसमें पांच किसानों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद वहां किसानों का आंदोलन उग्र हो गया और प्रदर्शनकारियों ने सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। गरीबों और किसानों के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश में लगे विपक्ष को इस घटना के बाद एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। उधर इन सारे घटनाक्रम पर प्रधानमंत्री मोदी की ओर से एक ट्वीट के अलावे वैसी कोई क्रिया-प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली, जो उनसे पूरे देश को अपेक्षित है। वैसे किसान आंदोलन से निपटने में प्रशासन की ओर से रही खामी के मद्देनज़र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंदसौर समेत तीन जिलों के जिलाधिकारियों का तबादला जरूर कर दिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें