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राहुल नहीं माने, अधीर होंगे लोकसभा में कांग्रेस के नेता

पश्चिम बंगाल के बेहरामपुर से सांसद अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में कांग्रेस के नेता होंगे। राहुल गांधी द्वारा यह पद ग्रहण करने से इनकार करने के बाद यह निर्णय लिया गया। मंगलवार सुबह इस पर लंबी रणनीतिक चर्चा के बाद यह फैसला किया गया। इस दौरान राहुल गांधी और उनकी मां व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी भी मौजूद थीं। अधीर रंजन चौधरी के साथ-साथ केरल के नेता के. सुरेश, पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी और तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर भी इस पद के लिए दौड़ में शामिल थे। लेकिन अधीर को उनके अनुभव के आधार पर लोकसभा में कांग्रेस का नेता चुना गया। वे बेहरामपुर से लगातार पांचवीं बार (1999 से लगातार) चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं।

गौरतलब है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इस बार चुनाव हार गए थे। उनके हारने के बाद लोकसभा में कांग्रेस के नेता का विकल्प देना जरूरी था। पार्टी की आम राय थी कि राहुल गांधी लोकसभा में पार्टी के नेता हों, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष पद तक से इस्तीफे की पेशकश कर चुके राहुल इसके लिए हरगिज तैयार नहीं थे। वे इस राय पर अडिग थे कि इस पद पर नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति बैठे।

बहरहाल, कांग्रेस ने अधीर रंजन चौधरी का उल्लेख करते हुए लोकसभा को पत्र लिखकर बता दिया है कि वे सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता होंगे। पत्र में यह भी लिखा गया है कि वे सभी महत्वपूर्ण चयन समितियों में पार्टी का प्रतिनिधित्व भी करेंगे।

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ओम बिड़ला होंगे अगले लोकसभा अध्यक्ष

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर पूरे देश को चौंका दिया। राजस्थान के कोटा से भाजपा सांसद ओम बिड़ला लोकसभा के अगले अध्यक्ष होंगे। इसके साथ ही इस प्रतिष्ठित पद के लिए लगाई जा रही सारी अटकलें खत्म हो गईं। गौरतलब है कि लोकसभा अध्यक्ष बनने की रेस में पूर्व केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी, राधामोहन सिंह, रमापति राम त्रिपाठी, एसएस अहलुवालिया और डॉ. वीरेंद्र कुमार जैसे नाम शामिल थे लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने आगे किया ओम बिड़ला का नाम। राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविन्द का चयन हो या विदेश मंत्री के रूप में एस जयशंकर को सामने लाना, मोदी पहले भी अपने निर्णयों से चौंकाते रहे हैं।

बहरहाल, ओम बिड़ला बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर नामांकन कर सकते हैं। जानकारी के मुताबिक उनके नाम का प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रखा था। उनकी उम्मीदवारी को 10 पार्टियों – शिवसेना, जदयू, लोजपा, अकाली दल, नेशनल पीपुल्स पार्टी, मिजो नेशनल फ्रंट, वाईएसआर कांग्रेस, अन्ना द्रमुक, अपना दल और बीजेडी – ने समर्थन दिया है। कांग्रेस ने हालांकि समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया है, लेकिन वह भी उनके नाम का विरोध नहीं करेगी।

चलने से पहले बता दें कि सांसद बनने से पहले ओम बिड़ला तीन बार कोटा सीट से विधायक भी रह चुके हैं। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में बिड़ला ने कोटा संसदीय सीट से कांग्रेस के राम नारायण मीणा को 2.5 लाख से अधिक मतों से हराया था।

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कई सीनियर नेताओं को राज्यपाल बनाएगी भाजपा !

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के कई वरिष्ठ नेता नहीं उतरे थे। माना जा रहा था कि आने वाले समय में पार्टी उन्हें संगठन या किसी अन्य भूमिका में ला सकती है। ऐसे में चुनाव से दूर रहे भाजपा के कई नेताओं का नाम राज्यपाल पद की रेस में है। इसके पीछे वजह यह है कि वर्तमान में देश के 11 राज्य ऐसे हैं जहां के राज्यपालों का कार्यकाल अगले दो से तीन महीनों में खत्म हो रहा है। अगर इन राज्यपालों का सेवा विस्तार नहीं हुआ तो इन सभी राज्यों में नए राज्यपालों का दिखना तय है।

दरअसल इस बात की चर्चा तब शुरू हुई जब कुछ दिन पहले केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने ट्वीट कर सुषमा स्वराज को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनने की बधाई दी थी। हालांकि सुषमा ने इसका खंडन किया और कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन इस घटनाक्रम के बाद भाजपा के कई सीनियर नेताओं को राज्यपाल बनाए जाने की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है।

बहरहाल, जिन नेताओं के नाम राज्यपाल बनाए जाने को लेकर चर्चा में हैं उनमें मुरली मनोहर जोशी, बंडारू दत्तात्रेय, कलराज मिश्र, करिया मुंडा, भगत सिंह कोश्यारी, बिजोय चक्रवर्ती, सुमित्रा महाजन और राधामोहन सिंह जैसे नाम चर्चा में हैं। सूत्रों की मानें तो राज्यपाल बनाकर पार्टी अपने वरिष्ठ नेताओं को साधने की कोशिश में है।

जिन राज्यों के राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है, वे हैं गोवा (मृदुला सिन्हा), गुजरात (ओम प्रकाश कोहली), कर्नाटक (वजुभाई रुडा भाई वाला), केरल (जस्टिस पी सदाशिवम), महाराष्ट्र (विद्यासागर राव), नगालैंड (पद्मनाथ बालकृष्ण आचार्य), राजस्थान (कल्याण सिंह), त्रिपुरा (कप्तान सिंह सोलंकी), उत्तर प्रदेश (राम नाईक), पश्चिम बंगाल (केशरीनाथ त्रिपाठी) और आंध्र प्रदेश (में ई. एस. एल. नरसिम्हन)। गौरतलब है कि इनमें से ज्यादातर राज्यों में राज्यपालों की उम्र 70 से पार या 80 के आसपास है। ऐसे में इन्हें दोबारा मौका मिलने की संभावना नहीं दिखती। इस प्रकार नए चेहरों को मौका मिलना तयप्राय है।

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नीति आयोग: सार्थक रही ‘टीम इंडिया’ की बैठक

शनिवार को राष्ट्रपति भवन के सांस्कृतिक केंद्र में नीति आयोग की बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की। ‘टीम इंडिया’ की इस बैठक प्रधानमंत्री ने हर भारतीय को अधिकार सम्पन्न बनाने और लोगों की जिंदगी अधिक सुगम बनाने के कार्य पर जोर दिया और देश में गरीबी, बेरोजगारी, सूखा, बाढ़, प्रदूषण भ्रष्टाचार एवं हिंसा आदि के खिलाफ सामूहिक लड़ाई का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मौके पर अपने संबोधन में कहा कि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के मंत्र को पूरा करने में नीति आयोग को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। उन्होंने आयोग की संचालन परिषद के सभी सदस्यों से सरकार का ऐसा ढांचा तैयार करने में मदद का आह्वान किया जो कारगर हो और जिसमें लोगों का भरोसा हो। सहयोगपूर्ण संघवाद के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि देश को 2024 तक 5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसमें राज्यों के संयुक्त प्रयास के साथ इसे हासिल किया जा सकता है। मार्च 2019 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 2,750 अरब डालर होने का अनुमान है।

देश के विकास में निर्यात की अहमियत को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिये केन्द्र तथा राज्य दोनों को निर्यात में वृद्धि की दिशा में काम करना चाहिए। पूर्वोत्तर समेत कई राज्यों में निर्यात के क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं जिनका उपयोग नहीं हुआ है। संबोधन के दौरान उन्होंने कृषि में संरचनात्मक सुधारों को लेकर कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा केन्द्रीय मंत्रियों को लेकर एक उच्च अधिकार प्राप्त समिति गठित करने की घोषणा भी की।

नीति आयोग की इस महत्वपूर्ण बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव को छोड़कर लगभग सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री शामिल हुए। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह स्वास्थ्य कारणों से शामिल नहीं हो पाए जबकि हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जर्मनी में होने के कारण नहीं आ सके।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बैठक में अपने संबोधन और सुझावों से सबका ध्यान खींचा। उन्होंने एक बार फिर बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग की और अपनी मांग के पक्ष में तमाम जरूरी तथ्य और तर्क रखे। इसके साथ ही उन्होंने केन्द्र प्रायोजित योजनाओं, आपदा अनुग्रह अनुदान एवं किसान सम्मान निधि योजना के क्रियान्वयन समेत कई मुद्दों पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

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8 जून से बिहार समेत देश भर में जदयू का सदस्यता अभियान

कल 8 जून से देश भर में जदयू का सदस्यता अभियान शुरू होने जा रहा है। पटना स्थित जदयू मुख्यालय में राष्ट्रीय अध्यक्ष व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसकी शुरुआत करेंगे। पिछली बार जदयू ने 50 लाख सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा था। इस बार इस लक्ष्य में और इजाफा होने की संभावना है क्योंकि नीतीश कुमार के अध्यक्ष बनने के बाद जदयू ने कई राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज की है और अब वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने की ओर अग्रसर है।
बहरहाल, 8 जून को राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार अपने बूथ के 25 वोटरों को जदयू का सदस्य बनाकर अभियान की विधिवत शुरुआत करेंगे। उनके साथ ही बिहार प्रदेश जदयू के अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह भी अपने बूथ के 25 वोटरों को सदस्यता प्रदान करेंगे। इस मौके पर विभिन्न प्रदेशों के जदयू अध्यक्ष भी उपस्थित रहेंगे। राज्य भर में व्यापक सदस्यता अभियान चलाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। पार्टी के सभी सांसद, विधायक, विधानपार्षद, राष्ट्रीय पदाधिकारी, राज्य पदाधिकारी, पार्टी एवं प्रकोष्ठों के जिला, प्रखंड, पंचायत तथा वार्ड प्रतिनिधि अपने-अपने बूथ पर 25 लोगों को सदस्यता दिलाकर खुद क्रियाशील सदस्य बनेंगे। जदयू के संविधान के मुताबिक पार्टी की सदस्यता तीन वर्षों के लिए होती है। पूर्व में 5 जून 2016 को वर्ष 2016-2019 के लिए सदस्यता दिलाई गई थी, जिसकी अवधि पूरी हो चुकी है।
गौरतलब है कि जदयू का यह सदस्यता अभियान 5 जुलाई तक चलेगा। उसके बाद पार्टी की प्राथमिक इकाई से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक चुनाव सम्पन्न कराने की प्रक्रिया शुरू होगी। 2020 में बिहार में होने जा रहे विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी इस अभियान में कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहती। बिहार के साथ ही अन्य राज्यों में भी जदयू बड़ी संख्या में सदस्यों को जोड़ना चाहेगी ताकि नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में हाल के दिनों में मिली सफलता के बाद राष्ट्रीय पार्टी का नजदीक दिख रहा दर्जा जल्दी मिल सके। बतातें चलें कि सदस्यता अभियान के ठीक अगले दिन 1, अणे मार्ग में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी रखी गई है।

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केन्द्र सरकार में जदयू की कारगर भूमिका चाहते हैं नीतीश

केन्द्र में नई सरकार के गठन से पूर्व जदयू की भूमिका और पार्टी की भावी रणनीति को लेकर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बहुत गंभीर हैं। इस संदर्भ में बुधवार को दिल्ली में के. कामराज लेन स्थित अपने सरकारी आवास पर उन्होंने जदयू के राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ बैठक की और उससे पूर्व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मिले।

माना जा रहा है कि नीतीश कुमार जदयू कोटे से कम से कम दो कैबिनेट मंत्री और एक राज्यमंत्री चाहते हैं। कैबिनेट मंत्री पद के लिए जहां राष्ट्रीय महासचिव आरसीपी सिंह और बिहार सरकार में मंत्री रहे राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के नाम चर्चा में हैं, वहीं संतोष कुशवाहा और कहकशां परवीन को राज्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा है। वैसे राजनीतिक गलियारें में अलग-अलग स्रोतों से रामनाथ ठाकुर, दिनेशचंद्र यादव, चन्देश्वर चन्द्रवंशी और महाबली सिंह के नाम भी सामने आ रहे हैं।

बहरहाल, राष्ट्रीय पदाधिकारियों के साथ हुई बैठक में केन्द्र के साथ-साथ अरुणाचल प्रदेश की सरकार में भी जदयू के शामिल होने की चर्चा हुई। बता दें कि सात विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज करके जदयू वहां दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है और इस बात की प्रबल संभावना है कि भाजपा के साथ पार्टी वहां भी सरकार में शामिल हो। इसके साथ ही बैठक में 5 जून से पार्टी के संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया शुरू करने और 9 जून को पटना में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक करने का निर्णय भी लिया गया।

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अब ग्राहक उसी टीवी चैनल के पैसे देंगे जिसे वे देखना चाहते हैं

वर्तमान में 27 करोड़ भारतीय परिवारों में से 17 करोड़ के पास टीवी है | इनमें से जहाँ 10 करोड़ के पास ‘केबल कनेक्शन’ है वहीं चार करोड़ भारतीय परिवार के लोग डीटीएच देखते हैं जबकि लगभग तीन करोड़ केबल ग्राहकों के पास डिजिटल का कनेक्शन है……. ये सूचनाएं आपको ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन द्वारा प्राप्त डाटा के आधार पर दिया जा रहा है |

बता दें कि समस्त टीवी दर्शकों यानी ग्राहकों को उन चैनलों के भी पैसे भुगतान करने पड़ते हैं जो वो देखना नहीं चाहते | अभी सारी ब्रॉडकास्टिंग कंपनियाँ अपने बुके में ‘फ्री’ और ‘पे’ दोनो तरह के चैनल रखती हैं | केबल ऑपरेटरों या डीटीएच वालों से भी पूरे बुके के पैसे लेती है….. तदनुसार ये ऑपरेटर भी ग्राहकों से उसी हिसाब से पैसे वसूलते हैं |

अब ग्राहकों के लिए खुशी की खबर है कि वे जो चैनल देखना चाहते हैं , सिर्फ उसी के पैसे देने पड़ेंगे | जल्द ही ग्राहकों को यह अधिकार मिलने वाला है | वर्तमान में ग्राहकों को ब्रॉडकास्टिंग कंपनी का पूरा बुके खरीदना पड़ता था जिसमें फ्री और पे दोनों चैनल होते हैं |

दरअसल में दूरसंचार नियामक ट्राई द्वारा इस बाबत आदेश जारी किया गया था, परंतु ब्रॉडकास्टिंग कंपनियाँ इस आदेश के खिलाफ थी जिस कारण स्टार इंडिया ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी | कोर्ट ने स्टार की याचिका खारिज कर दी | अब ट्राई के लिए आदेश पर अमल करवाने का रास्ता साफ हो गया …… इस बीच ट्राई द्वारा जारी आदेश के मुताबिक ब्रॉडकास्ट (यानी सोनी, स्टार आदि) को 60 दिनों के भीतर हर चैनल की अलग कीमत (MRP) घोषित करनी है | डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म ऑपरेटरों को भी अपना-अपना रिटेल Price 180 दिनों में घोषित करने का निर्देश दिया गया है |

चलते-चलते बता दें कि इस फैसले से ऐसे चैनल जिनके दर्शक बहुत कम हैं वे बंद हो सकते हैं…… बड़े-बड़े ब्रॉडकास्टर अन्य छोटी-छोटी कंपनियों को अधिग्रहित भी कर सकती है….. यानि ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री की सूरत पूरी तरह बदल जाएगी |

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मोदी कैबिनेट की संभावित तस्वीर

लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के बाद भाजपा ने केन्द्र में नई सरकार बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस चुनाव में भाजपा ने अकेले अपने दम पर 303 सीटें जीती हैं। एनडीए के बाकी सहयोगियों को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 352 तक पहुँच जाता है। वहीं, महज 52 सांसदों के साथ काग्रेस लगातार दूसरी बार नेता प्रतिपक्ष बना पाने लायक संख्या भी नहीं जुटा पाई। हालांकि यूपीए के बाकी सहयोगियों के साथ उसका आंकड़ा 87 का है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई में नई सरकार के 30 मई को शपथ लेने की संभावना है। उससे पहले मोदी को नेता चुनने की औपचारिकता पूरी कर ली जाएगी।

इस बीच मोदी कैबिनेट के नए चेहरों और उनके मंत्रालयों पर कयासबाजी तेज हो गई है। इनमें सबसे बड़ा नाम अमित शाह का है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक उन्हें गृह, रक्षा या वित्त मंत्रालय सौंपा जा सकता है। अटकलें हैं कि उन्हें कैबिनेट में प्रधानमंत्री के बाद नंबर दो का दर्जा मिल सकता है। पिछली सरकार में यह दर्जा राजनाथ सिंह के पास रहा है। ऐसे में कैबिनेट में नंबर दो के दर्जे पर नए सिरे से सोचना होगा। चर्चा यह भी है कि अगर शाह गृह मंत्री बने तो राजनाथ रक्षा मंत्री हो सकते हैं और मौजूदा रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को विदेश मंत्री बनाया जा सकता है।

बता दें कि पिछली सरकार में विदेश मंत्री रहीं सुषमा स्वराज ने इस बार चुनाव नहीं लड़ा था। फिर भी उनकी योग्यता और अनुभव को देखते हुए उन्हें फिलहाल कैबिनेट में लेकर बाद में राज्यसभा के रास्ते संसद में पहुँचाया जा सकता है। एक और वरिष्ठ मंत्री अरुण जेटली का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं, लेकिन मोदी से उनकी निकटता और बेजोड़ कार्यक्षमता को देखते हुए बहुत संभव है कि उन्हें फिर से कैबिनेट में लिया जाए। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को शिकस्त देकर सनसनी फैला देने वाली स्मृति ईरानी का कद भी सरकार में बढ़ सकता है।

अब बात बिहार की। इस बार बिहार से रिकॉर्ड 39 सीटें एनडीए की झोली में गई हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि यहां से 8 से 10 मंत्री तक मोदी कैबिनेट में जगह पा सकते हैं। चर्चा है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल में बिहार से जदयू को भाजपा के बराबर जगह दी जा सकती है। वहीं लोजपा को एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री की जगह मिल सकती है।

चलते-चलते बता दें कि नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह पिछली बार से ज्यादा भव्य होने जा रहा है। ख़बर है कि इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग को भी न्योता देने की तैयारी है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी की छवि और मजबूत होगी। पिछली बार उनके शपथ ग्रहण में सार्क देशों के प्रमुख आए थे।

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भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में इस बार सर्वाधिक महिला सांसद

मोदी की महाविजय में इस बार कई रिकॉर्ड बने तो कई टूटे, पर जो सबसे दिलचस्प और स्वागतयोग्य रिकॉर्ड बना, वो है सत्रहवीं लोकसभा में 76 महिला सांसदों का पहुँचना। जी हाँ, इस बार 723 महिला उम्‍मीदवार चुनावी मैदान में थीं, जिनमें से 76 संसद के लिए चुनी गईं। आजाद भारत के लोकतंत्रीय इतिहास में भागीदारी के लिहाज से और अब तक आम चुनावों में महिलाओं को मिली जीत के लिहाज से यह अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। गौरतलब है कि 2014 में कुल 663 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था, जिनमें से 66 महिलाएं संसद पहुंची थीं। इन 66 महिला सांसदों में 28 इस बार भी चुनाव जीतने में सफल रहीं। वैसे आगे बढ़ने से पहले यह भी जानें कि हमारी पहली लोकसभा में कुल 22 महिला सांसद चुनकर आई थीं और 1977 में उनकी संख्या सबसे कम (19) थी।

बहरहाल, विस्तार में जाकर देखें तो इस आम चुनाव में कुल 7,928 महिला उम्मीदवार मैदान में उतरी थीं। कांग्रेस ने सर्वाधिक 54, जबकि भाजपा ने 53 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। अन्य राष्ट्रीय पार्टियों में बसपा ने 24 महिला उम्मीदवारों को, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ने 23, माकपा ने 10, भाकपा ने चार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने एक महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारा था। 222 महिलाओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।

राज्यवार बात करें तो बंगाल ने इस बार गजब का उदाहरण पेश किया। यहां के 42 सीटों में से इस बार 14 पर महिलाएं जीती हैं जो 80 सीटों वाले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से भी ज्यादा है, जहाँ से इस बार 10 महिलाएं चुनाव जीतने में सफल हुई हैं। अन्य राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र से 8, गुजरात और उड़ीसा से 5-5, आंध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश से 4-4, तमिलनाडु, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और बिहार से 3-3 तथा पंजाब और झारखंड से 2-2 महिला सांसद चुनी गई हैं। संघशासित प्रदेशों में नई दिल्ली और चंडीगढ़ सीटों से महिला उम्मीदवारों ने बाजी मारी है। पार्टियों की बात करें तो इस बार तृणमूल कांग्रेस (पश्चिम बंगाल) ने सर्वाधिक 41% महिलाओं को टिकट दिया था। दूसरे नंबर पर बीजद (उड़ीसा) थी, जिसने 33% महिलाओं को मौका दिया था।

चलने से पहले इस बार के चुनावों में महिलाओं को लेकर एक बेहद दिलचस्प आंकड़ा यह भी कि देश के 13 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा है। ये 13 राज्य हैं: बिहार, उत्तराखंड, मणिपुर, मेघालय, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पुड्डूचेरी, दमन दीव, और लक्षद्वीप।

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सातवें चरण के साथ खत्म हुआ दुनिया का सबसे खर्चीला चुनाव

आज सातवें चरण की 59 सीटों पर मतदान के साथ भारतीय लोकतंत्र का यज्ञ पूरा हो गया। इस चरण में बिहार की आठ सीटों – नालंदा, काराकाट, जहानाबाद, पटना साहिब, पाटलिपुत्र, बक्सर, आरा और सासाराम – के अलावा उत्तर प्रदेश की 13, पंजाब की 13, पश्चिम बंगाल की 9, मध्यप्रदेश की 8, हिमाचल प्रदेश की 4, झारखंड की 3 और चंडीगढ़ की 1 शामिल थी। इस चरण में प्रत्याशियों की कुल संख्या थी 918, जबकि मतदाताओं की संख्या थी 10.1 करोड़ और मतदान केन्द्रों की संख्या 1.02 लाख। अब सबकी निगाहें 23 मई की मतगणना पर जा टिकी है। हालांकि अपने-अपने एग्जिट पोल के साथ सारे टीवी चैनल शाम से ही आ डटे हैं।

बहरहाल, देश का निर्णय तो हम 23 मई को जान ही लेंगे। फिलहाल जानते हैं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के 17वें लोकसभा चुनाव के संबंध में कुछ दिलचस्प बातें। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह चुनाव दुनिया का अब तक का सबसे खर्चीला चुनाव था। जी हाँ, नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) के अनुसार सात चरणों में कराए गए इस चुनाव का कुल खर्च 50 हजार करोड़ रुपये (सात अरब डॉलर) है, जबकि 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का खर्च इससे कम करीब 6.5 अरब डॉलर था।

आपको बता दें कि सीएमएस के अनुमान के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव का खर्च करीब 5 अरब डॉलर था। पांच साल बाद 2019 में हो रहे 17वें लोकसभा चुनाव में इस खर्च में 40 फीसद इजाफा हो चुका है। जरा सोच कर देखिए कि जिस देश की साठ प्रतिशत आबादी महज तीन डॉलर प्रतिदिन पर गुजारा करती है, उसमें प्रति मतदाता औसतन आठ डॉलर का खर्च क्या लोकतंत्र को मुंह नहीं चिढ़ाता।

अगर आपको उत्सुकता हो रही हो कि सबसे अधिक खर्च किस मद में होता है तो बता दें कि सर्वाधिक खर्च सोशल मीडिया, यात्राएं और विज्ञापन के मद में किया जाता है। इस बार यह खर्च कितना बेहिसाब बढ़ा उसका अनुमान इसी से हो जाएगा कि 2014 में सोशल मीडिया पर जहां महज 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, वहीं इस बार यह खर्च बढ़कर पांच हजार करोड़ रुपये जा पहुंचा।

आज की तारीख में शायद आपको अविश्वसनीय लगे, लेकिन बकौल चुनाव आयोग, देश के पहले तीन लोकसभा चुनावों का खर्च 10 करोड़ रुपये से कम या उसके बराबर था। इसके बाद 1984-85 में हुए आठवें लोकसभा चुनाव तक कुल खर्च सौ करोड़ रुपये से कम था। 1996 में 11वें लोकसभा चुनाव में पहली बार खर्च ने पांच सौ करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया। 2004 में 15वें लोकसभा चुनाव तक यह खर्च एक हजार करोड़ रुपये को पार कर गया। 2014 में खर्च 3870 करोड़ रुपये 2009 के खर्च से करीब तीन गुना अधिक था।

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