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जलमग्न हुआ बिहार, 16 जिलों में हाहाकार

बिहार पर प्रकृति का कहर जारी है। राज्य में बाढ़ ने विकराल रूप ले लिया है। सैकड़ों गांव जलमग्न हो चुके हैं। 16 जिलों में 1 करोड़ से ज्यादा लोग इसकी त्रासदी झेल रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 119 तो अन्य स्रोतों से 230 लोगों के मारे जाने की ख़बर है। गुरुवार को पूर्णिया, कटिहार और मधेपुरा के कई नए इलाकों में पानी आने से दहशत फैल गई। मधेपुरा में सर्वाधिक प्रभावित आलमनगर और चौसा प्रखंड के अलावा छह और प्रखंड इसकी चपेट में आ गए। जिले में भलुआही के पास एनएच 106 की सड़क लगभग 25 फीट कट जाने से यातायात ठप हो गया है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक अब बाढ़ का पानी सहरसा जिले में भी फैल गया है। उधर कटिहार के नए इलाकों में सदर प्रखंड के भसना, मनसाही और कोढ़ा प्रखंड के कुछ हिस्सों में भी पानी फैलने लगा है। वहीं पूर्णिया जिले में बायसी अनुमंडल के बाद अब पानी बनमनखी और धमदाहा क्षेत्र में बढ़ रहा है। बनमनखी प्रखंड  की 10 पंचायतें बाढ़ की चपेट में आ गई हैं। गुरुवार से वहां एनएच 107 पर वाहनों का परिचालन भी बाधित हो गया है। अररिया की हालत तो और भी बदतर है। इस जिले में हताहत लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है और अब तक 20 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है।

इन जिलों के अतिरिक्त सुपौल, किशनगंज, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, शिवहर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर भी बाढ़ से बेहाल हैं। मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों में अब तक 94 लोगों की मौत हो चुकी है। वैसे गोपालगंज, वैशाली और छपरा में जहां नए इलाके बाढ़ के पानी से घिरे, वहीं कुछ प्रभावित जिलों में पानी के धीरे-धीरे उतरने की ख़बर भी है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने गुरुवार को गोपालगंज, बगहा, बेतिया, रक्सौल और मोतिहारी के बाढ़ग्रस्त इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया और अधिकारियों को तमाम जरूरी निर्देश दिए। बता दें कि बाढ़ प्रभावित तमाम जिलों में एनडीआरएफ की 27 टीमों के 1110 जवान अपनी 114 नौकाओं, एसडीआरएफ की 16 टीमों के 446 जवान 92 नौकाओं और सेना के 630 जवान 70 नौकाओं के साथ राहत एवं बचाव कार्य में लगे हुए हैं। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम के साथ चिकित्सकों का चलंत दस्ता भी प्रभावित इलाकों में लगा हुआ है। राहत शिविर बड़े पैमाने पर बनाए गए हैं और इनमें कुल 3.19 लाख लोगों को भोजन कराया जा रहा है। राहत शिविरों के अतिरिक्त 1112 जगहों पर बाढ़ पीड़ितों के लिए कम्यूनिटी किचेन भी शुरू किया गया है। हालांकि बाढ़ ने अपने पांव जिस कदर फैला लिए हैं, उसे देखते हुए इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।

चलते-चलते एक अच्छी ख़बर। अनुमान है कि अगले कुछ दिनों में बाढ़ का तांडव कम होगा। आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत के मुताबिक भारतीय मौसम विज्ञान विभाग से मिले पूर्वानुमान के अनुसार अगले सात दिनों तक उत्तर बिहार के जिलों में बारिश के आसार नहीं हैं। हां, कुछ जगहों पर छिटपुट बारिश जरूर हो सकती है। दक्षिण बिहार के जिलों के बारे में भी यही पूर्वानुमान है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि बाढ़ से जूझ रहे लोग थोड़ी चैन की सांस ले पाएंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार को बहुत जल्द विशेष पैकेज की सौगात!

राजनीति की उठापटक अपनी जगह है और राज्य व देश का हित अपनी जगह। उसे हर हाल में अक्षुण्ण रखना चाहिए। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी सोच के कारण महागठबंधन छोड़ने और एनडीए के साथ सरकार बनाने का बड़ा निर्णय लिया था। उनके उस निर्णय का सुखद परिणाम अब सामने आने जा रहा है। जी हां, बिहार को बहुत जल्द केन्द्र से 1.25 लाख करोड़ का विशेष पैकेज मिलने जा रहा है। बता दें कि इस पैकेज की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनाव के समय की थी, लेकिन भाजपा की करारी हार के बाद विशेष पैकेज की बात ठंडे बस्ते में चली गई थी।

गौरतलब है कि नीतीश ने पिछले सप्ताह ही दिल्ली में प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें उनके वादे की याद दिलाई थी। दरअसल नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि एनडीए के विरुद्ध जनादेश लेने के बाद फिर उसी के साथ सरकार बनाने के निर्णय को वे तभी सही ठहरा सकते हैं जब बिहारवासियों से किया वादा वे पूरा करें। अपने हाल के निर्णय में उन्होंने राजधर्म और राज्यधर्म को महागठबंधन-धर्म पर तरजीह दी जिसे बिहार को मिलने जा रही इस सौगात से निश्चित रूप से नैतिक बल मिलेगा।

वैसे देखा जाए तो जिस दिन बिहार में जेडीयू-एनडीए की सरकार बनी, उसी दिन से विशेष पैकेज मिलने की उम्मीद बढ़ गई थी। लेकिन ये खुशखबरी इतनी जल्दी मिलेगी इसकी उम्मीद नहीं थी। इन दिनों बाढ़ की विभीषिका झेल रहे बिहार के लिए ये सचमुच राहत की ख़बर है।

चलते-चलते बता दें कि जहां मोदी-नीतीश मिलकर बिहार से किये वादे पर अमल करने जा रहे हैं वहीं जेडीयू एनडीए में शामिल होने की विधिवत घोषणा भी शीघ्र करने जा रही है। यही नहीं, जेडीयू केन्द्र सरकार में भी शामिल होगी और ख़बर यह भी है कि नीतीश एनडीए के संयोजक हो सकते हैं। भारतीय राजनीति के दो शिखरपुरुषों के एक साथ आने से बिहार के विकास का हर अवरुद्ध मार्ग खुलेगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्यों और कैसे मनाएं जन्माष्टमी ?

कल जन्माष्टमी है। यानि विष्णु के समस्त अवतारों में पूर्वावतार कहे जाने श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव। समस्त गुणों का आगर होने के साथ-साथ कृष्ण की सबसे अनोखी बात यह है कि उनके भक्त उन्हें जिस रूप में पूजते हैं वे उनके साथ उसी रूप में हो लेते हैं। एकमात्र वही हैं जिन्हें कोई पुत्र के रूप में, कोई सखा के रूप में, कोई सारथि के रूप में, कोई गुरु के रूप में तो कोई प्रेमी और यहां तक कि पति के रूप में चाहता और पूजता है और वो उस भक्त के प्रेम को उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं। यही कारण है कि भक्तों का जैसा तादात्म्य श्रीकृष्ण के साथ है वैसा किन्हीं अन्य देवता के साथ नहीं।

पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने हेतु श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। उनका अवतरण देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा में हुआ और एक मान्यता के मुताबिक यह दिव्य घटना 5 हजार 243 वर्ष पूर्व हुई।

जन्माष्टमी का त्योहार भारत सहित पूरे विश्व में वर्णनातीत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं डांडिया का उत्सव, कहीं दही-हांडी फोड़ने की उमंग होती है तो कहीं भगवान कृष्ण की मोहक छवियों की झांकी। मंदिरों की रौनक इस दिन देखते ही बनती है। भगवान कृष्ण को इस दिन विशेष तौर पर सजाए गए झूले पर झुलाया जाता है और साथ ही कृष्ण रासलीलाओँ का आयोजन होता है।

शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत का पालन करने से भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। बताया जाता है कि इस दिन व्रत रखने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है, लक्ष्मी स्थिर होती है और सारे बिगड़ते काम बन जाते हैं। और हां, याद रखें कि इस दिन आपकी पूजा तभी पूर्ण होगी जब कृष्ण का नाम लेने के साथ ही आप देवकी, वासुदेव, नंद, यशोदा, राधा और लक्ष्मी का नाम भी श्रद्धापूर्वक लें। माना जाता है कि ये सभी कृष्ण के व्यक्तित्व के अनिवार्य अंग हैं और इन सबके बिना न तो उनकी पूजा पूरी होती है और न ही स्वीकार।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

 

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अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस

‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से 12 अगस्त यानि अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। ये संयोग है कि हमारे राष्ट्रीय युवा दिवस की तिथि भी 12 ही है, लेकिन महीना जनवरी है। 12 जनवरी स्वामी विवेकानंद, जिन्हें विश्व-इतिहास में युवा-शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, का जन्मदिवस है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को राष्ट्र-निर्माण की धुरी माना था और जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने की घोषणा की थी, तब भी उसका उद्देश्य यही बताना था कि युवाओं के बिना कोई भी राष्ट्र अपने विकास का लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता।

गौरतलब है कि पिछले साल मनाए गए विश्व युवा दिवस का विषय था – “लक्ष्य 2030: गरीबी उन्मूलन और सतत खपत और उत्पादन हासिल करना।” कहने की जरूरत नहीं कि 2030 तक इस लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है जब युवा इसके लिए अग्रणी भूमिका निभाएं। ये अत्यंत दुख व आश्चर्य का विषय है कि आज एक ओर हम मंगल तक पहुंच गए हैं, दूसरी ओर आज भी गरीबी और भूख भारत समेत पूरे विश्व की, खासकर तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देशों की, सबसे बड़ी समस्या है। एक अर्थ में यह समस्या वैश्विक आतंकवाद से भी बड़ी है। भूख से लड़े और उससे जीते बिना हम आतंकवाद से क्या पड़ पाएंगे? सच तो यह है कि जिस दिन सबके पेट में रोटी बराबर पहुंचने लग जाएगी उस दिन आतंकवाद की समस्या ही मिट जाएगी।

जिस तरह स्वस्थ शरीर में स्वस्थ आत्मा का निवास होता है, उसी तरह स्वस्थ युवाओं में ही स्वस्थ राष्ट्र और विश्व का बीज पनप सकता है। चाहे स्वास्थ्य शरीर का हो, मन और मस्तिष्क का हो, विचार और संस्कार का हो, या फिर विकास के किसी भी क्षेत्र और दुनिया के किसी भी कार्य-व्यापार का हो। भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सत्य तो भलीभांति जानते हैं। उनका शायद ही कोई भाषण हो, जिसमें वे युवाओं का आह्वान न करते हों और देश के सर्वांगीण विकास के लिए उनकी सहभागिता को अनिवार्य न बताते हों।

‘मधेपुरा अबतक’ सभी युवाओं का आह्वान करता है और कहना चाहता है कि वे जहां हैं, जिस क्षेत्र में हैं, वहां से इस देश के निमित्त अपना योगदान दे सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे खेतों में काम कर रहे हैं या विज्ञान की प्रयोगशाला में बैठे हैं, देश की सीमा की रखवाली कर रहे हैं या खेल के मैदान में पसीना बहा रहा रहे हैं, कोई साहित्य, चित्र या प्रतिमा गढ़ रहे हैं या आने वाले चुनावों में खड़े होने की तैयारी कर रहे हैं। वे जहां हैं, वहां अपना सर्वोत्तम दें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप’

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जेडीयू से विदाई की कगार पर शरद यादव

नीतीश कुमार के महागठबंधन छोड़ने और एनडीए के साथ सरकार बनाने के फैसले के खिलाफ शरद यादव खुलकर सामने आ गए हैं। जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष बिहार में महागठबंधन टूटने से नाखुश तो पहले से थे, लेकिन वक्त की नजाकत देख उन्होंने चुप्पी साध रखी थी। पर अब उनकी चुप्पी टूट चुकी है और ‘जो’ कुछ उनके भीतर चल रहा था, ‘वो’ बाहर आ गया है।

गौरतलब है कि शरद यादव इन दिनों तीन दिनों की बिहार यात्रा पर हैं। कल दौरे के पहले दिन पटना पहुंचने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने नीतीश कुमार पर बिहार की जनता को ‘धोखा’ देने का आरोप लगाया और कहा कि वे यह जानने आए हैं कि जनता की इस पर क्या राय है। साथ ही उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वे अब भी महागठबंधन के साथ हैं। शरद यादव के इस रुख के बाद जेडीयू द्वारा उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तयप्राय हो गई है।

बता दें कि अपनी तीन दिनों की यात्रा के दौरान शरद यादव बिहार के सात जिलों – वैशाली, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा और सहरसा – में दो दर्जन से ज्यादा जगहों पर जाकर जनता से ‘संवाद’ करेंगे। उनकी इस यात्रा को नीतीश कुमार व जेडीयू से उनके औपचारिक अलगाव के तौर पर देखा जा रहा है। कल हवाई अड्डे पर उनके स्वागत के लिए जुटे लोगों में ज्यादातर आरजेडी के थे और हद तो तब हो गई जब उनके जिन्दाबाद के साथ नीतीश मुर्दाबाद के नारे भी लगे। स्वाभाविक तौर पर जेडीयू ने उनके इस कार्यक्रम से अपने तमाम कार्यकर्ताओं को दूर रहने का कड़ा निर्देश दिया है।

इस बीच बिहार जेडीयू के अध्यक्ष व सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि शरद यादव की ये गतिविधियां जारी रहीं तो पार्टी निकट भविष्य में कोई भी निर्णय ले सकती है। बिहार जेडीयू ने उन पर और उनकी यात्रा में साथ दिख रहे रमई राम पर कार्रवाई की अनुशंसा भी कर दी है। इसका मतलब साफ है कि नीतीश कुमार किसी बड़े निर्णय पर पहुंच चुके हैं। इसकी झलक तभी देखने को मिल गई थी जब राष्ट्रीय महासचिव अरुण श्रीवास्तव को गुजरात के राज्यसभा चुनाव में नीतीश के निर्णय के खिलाफ जाकर पोलिंग एजेंट बहाल करने और वहां के एकमात्र जेडीयू विधायक का वोट कांग्रेस उम्मीदवार को जाने के कारण निलंबित कर दिया गया था। अरुण श्रीवास्तव शरद के कितने करीबी हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है।

गौर करने की बात की है कि हाल के दिनों में शरद यादव ने कई बार पार्टी लाईन से अलग स्टैंड लिया है। प्रथम दृष्टया किसी मुद्दे पर अलग राय होना गलत भी नहीं। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब तेजस्वी के मुद्दे पर महागठबंधन छोड़ने में उन्हें जनता के साथ धोखा दिखता है लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति को ताक पर रख देने में कोई आपत्ति नहीं है। लालू और उनके परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर उन्होंने चुप्पी साध रखी है। वो यह भी नहीं देख पा रहे कि पार्टी का एक भी विधायक उनके स्टैंड के साथ नहीं है।

एक बात और, 17 अगस्त को उन्होंने दिल्ली में विपक्षी दलों के सम्मेलन की योजना भी बना रखी है। अगर उन्हें विपक्षी दलों के समर्थन का इतना ही भरोसा है तो वे राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा क्यों नहीं दे देते? डेढ़ दर्जन पार्टियों में से कोई उन्हें चुनकर दुबारा भेज दे सकती है! पर शरद जानते हैं कि ऐसा होना कितना मुश्किल है। ऐसे में कहना गलत न होगा कि उन्होंने अपनी ‘विदाई की पटकथा’ स्वयं लिखी, ताकि पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दे और उनकी राज्यसभा की सदस्यता बची रहे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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पति-पत्नी ने शुरू किया था भाई-बहन का त्योहार

यह संसार रिश्तों से बना है और हर रिश्ते की अपनी अहमियत होती है, लेकिन भाई-बहन का रिश्ता अपने आप में अद्भुत है। यही एक रिश्ता है, जिसकी कोई एक परिभाषा गढ़ पाना मुश्किल है। सोच कर देखिए, अगर आपकी बहन आपसे बड़ी है तो उसमें मां की झलक पाएंगे आप, छोटी है तो बेटी लगेगी वह। दोस्त तो वो हर हाल में है ही। आप जो सुख-दुख कई बार माता-पिता से नहीं बांट पाते वो अपनी बहन से बांट लेते हैं। एक बहन ही है जो आपकी कमियों के लिए आपको डांटती नहीं और अपना ऐसा कोई सुख नहीं जो आपसे बांटती नहीं। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के इसी अटूट प्यार की निशानी है, जिसे सदियों से मनाया जाता रहा है। भाई-बहन के विश्वास को बनाए रखने वाला यह त्योहार श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। लेकिन इसकी शुरुआत कब और क्यों हुई, इसके पीछे कई दिलचस्प कहानियां हैं। चलिए जानने की कोशिश करते हैं।

आपको जानकर हैरत होगी कि भाई-बहन के इस त्योहार की शुरुआत पति-पत्नी ने की थी। पुराणों के अनुसार एक बार दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता दानवों से हारने लगे। देवराज इंद्र की पत्नी शुचि ने देवताओं की हो रही हार से घबरा कर उनकी विजय के लिए तप करना शुरू कर दिया। तप से उन्हें एक रक्षासूत्र प्राप्त हुआ, जिसे उन्होंने श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन अपने पति इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इस रक्षासूत्र से देवताओं की शक्ति बढ़ गई और उन्होंने दानवों पर जीत प्राप्त की। उसी दिन से यह परंपरा शुरू हुई कि आप जिसकी भी रक्षा व उन्नति की इच्छा रखते हैं, उसे रक्षासूत्र यानि राखी बांध सकते हैं, चाहे वह किसी भी रिश्ते में क्यों न हो।

वैसे हमारे इतिहास, खासकर पौराणिक इतिहास में ऐसी कई कहानियां दर्ज हैं जो रक्षाबंधन या राखी के महत्व को दर्शाती हैं। इनमें एक कहानी महाभारत काल से भी जुड़ी है। इस कहानी के अनुसार श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने चक्र से किया था। शिशुपाल का सिर काटने के बाद जब चक्र वापस लौटा तब उसे पुन: धारण करने के क्रम में कृष्ण की उंगली थोड़ी कट गई। उंगली से रक्त बहता देख पांडवों की पत्नी द्रौपदी से रहा नहीं गया और उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर कृष्ण की उंगली में बांध दिया। इस पर भावुक होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वचन दिया कि वे आजीवन उनकी साड़ी की लाज रखेंगे। आगे चलकर दु:शासन ने जब द्रौपदी का चीरहरण करना चाहा तो उन्होंने पूरी तत्परता से अपना कहा पूरा किया।

रक्षाबंधन से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी का ताल्लुक हमारे मध्यकालीन इतिहास से है। यह कहानी रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं से संबंधित है और उस दौर को दर्शाती है जब राजपूत शासकों और मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चित्तौड़ के राजा की विधवा थीं। राजा की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य व प्रजा की रक्षा की खातिर चिन्तित रानी ने हुमायूं से मदद मांगी। उन्होंने हुमायूं को एक राखी भेजी और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। हुमायूं ने उस राखी की मर्यादा रखी और रानी को बहन का दर्जा देते हुए उनके राज्य को सुरक्षित कर अपना दायित्व पूरा किया।

रक्षाबंधन से जुड़ी बाकी कहानियां फिर कभी। फिलहाल हमें इजाजत दें और हमारी मंगलकामनाएं स्वीकार करें। शुभ रक्षाबंधन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भारत ने जीत ली लंका

भारत ने कोलंबो टेस्ट मैच में श्रीलंका को पारी और 53 रन से हराकर तीन टेस्ट मैचों की सीरीज अपने नाम कर ली, जबकि अभी सीरीज का एक टेस्ट खेला जाना बाकी है। भारत की इस जीत के नायक रहे रविन्द्र जडेजा और आर अश्विन। इन दोनों ने इस टेस्ट में अर्द्धशतक लगाने के साथ-साथ 7-7 विकेट भी झटके और भारत को टेस्ट सीरीज में लगातार आठवीं जीत दिलाई। गौरतलब है कि 2015 के बाद से टीम इंडिया को कोई भी टीम टेस्ट सीरीज में हरा नहीं पाई है।

बता दें कि भारत ने अपनी पहली पारी में 9 विकेट पर 622 रन बनाकर पारी घोषित कर दी थी। भारत की इस पारी में चेतेश्वर पुजारा ने शानदार 133 और अजिंक्य रहाणे ने 132 रन बनाए थे। इसके जवाब में श्रीलंका की पहली पारी महज 183 रनों पर सिमट गई थी। दूसरी पारी में भी श्रीलंकाई टीम 386 रनों से आगे नहीं बढ़ पाई। इस पारी में केवल दिमुथ करुणारत्ने (141 रन) और कुशल मेंडिस (110 रन) ही अपनी टीम के लिए संघर्ष कर पाए।

भारत के लिए पहली पारी में अश्विन ने 5 विकेट चटकाए थे, जबकि दूसरी पारी में यह कमाल जडेजा ने दिखाया। जडेजा ने इस टेस्ट में अपने 150 विकेट भी पूरे कर लिए। बड़ी बात यह कि इस उपलब्धि के साथ वे सबसे तेजी से 150 विकेट लेने वाले दाएं हाथ के गेंदबाज बन गए हैं। उन्होंने मात्र 32 टेस्टों में यह मुकाम हासिल किया। दूसरी ओर अश्विन के लिए भी यह टेस्ट उपलब्धियों भरा रहा। इस टेस्ट के बाद वे सबसे तेजी से 2000 से अधिक रन और 250 से अधिक विकेट हासिल करने वाले टेस्ट खिलाड़ी बन गए हैं। उन्होंने यह उपलब्धि 51 टेस्ट मैचों में हासिल की।

क्रिकेट के तीनों फॉरमेट में भारत की हाल की जीतों की एक बड़ी बात यह भी रही है कि इन जीतों से टीम में एक के बाद एक कई मैच विनर खिलाड़ी सामने आए। इसी टेस्ट की बात करें तो पुजारा, रहाणे, अश्विन, जडेजा, के एल राहुल सब के सब विजेता की तरह खेले। कोहली तो टीम की रीढ़ हैं ही। सीरीज का तीसरा और आखिरी टेस्ट पल्लीकेले में खेला जाएगा। एक पर एक जांबाजों से सजी विराट कोहली की टीम निश्चित तौर पर अपना विजय अभियान जारी रखना चाहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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वैंकेया नायडू होंगे देश के नए उपराष्ट्रपति

भाजपा के वरिष्ठ नेता और एनडीए उम्मीदवार वैंकेया नायडू भारत के नए उपराष्ट्रपति होंगे। उपराष्ट्रपति पद के लिए शनिवार को हुए चुनाव में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोते और 18 विपक्षी दलों के संयुक्त उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी को 272 वोटों से हराया। उन्हें कुल 516 वोट मिले, जबकि गोपाल कृष्ण गांधी 244 वोट ही हासिल कर पाए। इसके साथ ही देश के तीनों बड़े संवैधानिक पदों – राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री – पर भाजपा काबिज हो गई। महज 37 साल पहले 1980 में अस्तित्व में आने वाली भाजपा के लिए ये सचमुच बड़ी उपलब्धि है।

बता दें कि उपराष्ट्रपति चुनाव में कुल 785 सांसदों को वोट डालना था, लेकिन अलग-अलग कारणों से 14 सांसदों ने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया और 771 सांसदों ने ही वोट डाला। वोटिंग सुबह 10 बजे शुरू हुई और शाम 5 बजे तक चली। वोटों की गिनती शाम 6 बजे शुरू हुई और 7 बजते-बजते घोषणा हो गई कि देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाले 13वें शख्स वैंकेया नायडू हैं।

घोषणा के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत तमाम बड़े नेताओं ने वैंकेया को बधाई दी। पराजित उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी ने भी विजयी उम्मीदवार को शुभकामनाएं दीं और अपने प्रदर्शन पर ‘संतोष’ जताते हुए सभी वोट देने वालों को धन्यवाद दिया। गौरतलब है कि वैंकेया नायडू उपराष्ट्रपति बनने वाले आरएसएस पृष्ठभूमि के दूसरे नेता हैं। इससे पहले भाजपा के भैरों सिंह शेखावत 2002 में इस पद के लिए चुने गए थे।

नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने परिणाम घोषित होने के बाद कहा कि मैं कृतार्थ हूं। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सभी पार्टी नेताओं का समर्थन देने के लिए आभारी हूं। उन्होंने आगे कहा कि मैं उपराष्ट्रपति संस्था का उपयोग राष्ट्रपति के हाथ मजबूत बनाने के लिए करूंगा और ऊपरी सदन की मर्यादा को कायम रखूंगा। साधारण किसान पृष्ठभूमि से आने वाले वैंकेया नायडू ने यह भी कहा कि मैंने इसकी कल्पना नहीं की थी कि मैं यहां पहुंच सकूंगा।

चलते-चलते बता दें कि 68 वर्षीय वैंकेया के पास संसद में 25 वर्षों का अनुभव है, जबकि उनका पूरा राजनीतिक अनुभव लगभग 45 वर्षों का है। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से उन्हें हार्दिक मंगलकामनाएं!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या है शरद का सस्पेंस ?

शरद यादव का अगला कदम क्या होगा? वे अंतत: नीतीश के निर्णय का समर्थन करेंगे या अपनी अलग राह चुनेंगे? अलग राह चुनने की स्थिति में वे अपनी नई पार्टी बनाएंगे या किसी और पार्टी का दामन थाम लेंगे? देश और विशेषकर बिहार की राजनीति में उनके साथ या बगावत का क्या और कितना असर होगा? ऐसे जाने कितने ही सवाल हवा में हैं जिनका फिलहाल एक निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता।

बिहार का सत्ता समीकरण बदलने के बाद 2-3 दिनों तक शरद यादव ने चुप्पी साधे रखी। इस दौरान कभी राहुल गांधी तो कभी अरुण जेटली, कभी सीताराम येचुरी तो कभी डी राजा, कभी लालू प्रसाद यादव तो कभी अली अनवर से उनकी बात या मुलाकात की ख़बरें आती रहीं। इधर दो दिनों से वे मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं। तेवर हालांकि बगावती हैं, लेकिन अभी बोल रहे हैं संभलकर। संसद में फसल बीमा योजना को लेकर तो ट्वीटर पर कालाधन के मुद्दे पर उन्होंने केन्द्र सरकार की खिंचाई भी की लेकिन मर्यादित तरीके से।

आखिर शरद चाह क्या रहे हैं? मीडिया और उनसे जुड़े लोग उन्हें ‘दुखी’, ‘नाराज’, ‘आश्चर्यचकित’ बता रहे हैं, लेकिन उनका कोई स्पष्ट निर्णय या बयान सामने नहीं आ रहा। मधेपुरा, जहां पिछले 26 सालों से वे संसदीय राजनीति कर रहे हैं, में उनके करीबी विजय कुमार वर्मा, पूर्व विधानपार्षद बयान देते हैं कि शरद यादव महागठबंधन में रहकर उसे मजबूत करेंगे, तो दिल्ली में उनके अत्यंत करीबी केसी त्यागी, जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव 19 अगस्त को पटना में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनके शामिल होने की बात कह रहे हैं।

इधर मीडिया के कुछ लोग उनमें यूपीए की अगुआई करने और भाजपाविरोधी खेमे की ‘धुरी’ बनने की संभावना  देखने लगे हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है? दूसरी ओर बदले हालात में क्या नीतीश, जेडीयू और एनडीए के लिए उनकी इतनी ‘प्रासंगिकता’ बची है कि उन्हें केन्द्र में मंत्रीपद देकर ‘संतुष्ट’ किया जा सके? यहां उल्लेखनीय है कि 2019 को लेकर नीतीश ने कल कहा था कि मोदी के मुकाबले कोई है ही नहीं। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। इस पर शरद यादव ने आज यह तो कहा कि 2019 में किसी के हारने-जीतने का सवाल अभी दूर है, लेकिन नीतीश या मोदी को ‘आंख’ नही दिखाई।

सौ बात की एक बात यह कि राजनीति ‘गिव एंड टेक’ का खेल है। शरद यादव के अनुभव, वरिष्ठता और उनकी राष्ट्रीय पहचान पर उनके विरोधी को भी संदेह नहीं हो सकता लेकिन इससे भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि इतने लंबे राजनीतिक करियर में उनकी अपनी कोई ‘राजनीतिक जमीन’ नहीं बन पाई। मूल जनता दल से लेकर अब तक अलग-अलग समय पर और अलग-अलग पार्टियों में उनका ‘सांकेतिक’ महत्व जो भी रहा हो, उनमें वोट ट्रांसफर करने की क्षमता कतई नहीं। हां, ‘टेबल पॉलिटिक्स’ के महारथी वे जरूर हैं और मुद्दों की भी अच्छी समझ रखते हैं। अपनी इन खूबियों के बल पर अगले कुछ दिनों में वे क्या निर्णय लेते हैं, इस पर सबकी निगाहें लगी रहेंगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में हुई साकार नीतीश-‘मोदी’ सरकार

अभी चौबीस घंटे भी नहीं हुए और बिहार की सियासत ने नई करवट ले ली। कल सुबह 10 बजे नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री थे, शाम 5 बजे अपनी पार्टी की बैठक करते हुए भी वे महागठबंधन सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, पर अभी घंटा भी नहीं बीता कि आबोहवा बदलनी शुरू हो गई और शाम के 7 बजते-बजते वे राज्यपाल को बतौर मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा सौंप कर मीडिया के सामने मुखातिब थे और आज सुबह 10 बजे वे एनडीए विधायक दल के नेता के तौर पर छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे और उसके कुछ ही मिनटों बाद उनकी बगल की कुर्सी पर बतौर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बैठे थे। जी हां, तेजस्वी-प्रकरण का पटाक्षेप चार साल बाद जेडीयू-भाजपा के दुबारा हाथ मिलाने और सत्ता में साथ वापस आने से हुआ।

बता दें कि आरजेडी के साथ चल रही तनातनी में अपनी ‘नाक’ झुकाने से इनकार करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार शाम जेडीयू की बैठक के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। गौरतलब है कि जेडीयू उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सीबीआई के एफआईआर मामले में लगातार ‘बिन्दुवार स्पष्टीकरण’ और प्रकारांतर से इस्तीफे की बात कह रही थी, लेकिन आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने न केवल इस्तीफे से साफ इंकार किया बल्कि पूरे मामले पर न तो उन्होंने और न ही तेजस्वी ने ‘स्पष्टीकरण’ ही दिया। बकौल नीतीश कुमार ऐसी परिस्थिति में उनके लिए महागठबंधन सरकार को चलाना संभव नहीं रह गया था।

बहरहाल, नीतीश कुमार के इस्तीफे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में जुड़ने के लिए’ बधाई दी। इसके बाद लालू और उनकी पार्टी अभी ‘विश्वासघात’ का आरोप लगाते हुए अपनी भड़ास ही निकाल रहे थे कि घटनाक्रम तेजी से बदला और भाजपा ने बिना देर किए नीतीश को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। फिर ये ख़बर भी आते देर न लगी कि 1 अणे मार्ग पर भाजपा और जेडीयू विधायकों की संयुक्त बैठक हो रही है और नीतीश कुमार को एनडीए का नेता चुन लिया गया है। महज चंद घंटों में बिहार की सियासत की तस्वीर पूरी तरह बदल गई और ये स्पष्ट हो गया कि मानसून सत्र से पहले नीतीश सरकार अपने नए अवतार में होगी।

नीतीश कुमार ने ये साबित किया कि अगर आपके पास अपनी ‘छवि’ की पूंजी हो और आप धुन के पक्के हों तो सितारे भी आपके मुताबिक चलने लगते हैं और आप एक ही दिन में मुख्यमंत्री का पद छोड़कर फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। जहां तक लालू की बात है, उन्होंने जरा भी राजनीतिक परिपक्वता नहीं दिखाई। अगर उन्होंने समय रहते तेजस्वी से इस्तीफा दिलवा दिया होता तो न केवल उनका और तेजस्वी का कद बढ़ता और जनता की सहानुभूति उन्हें मिलती, बल्कि उनकी पार्टी सरकार में भी बनी रहती और महागठबंधन भी अटूट रहता। एक बात और, ऐसी स्थिति में वे वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी को उपमुख्यमंत्री बनवा कर अपने ‘माय’ समीकरण को भी मजबूत कर सकते थे। दूसरी ओर नीतीश कुमार हैं, उन्होंने समय की नब्ज को समझा और नैतिकता के साथ अपनी सरकार भी बचा ली। रही बात बेचारी कांग्रेस की, बिहार के इन दो बड़े दलों के बीच वो पिस कर रह गई है। जेडीयू-भाजपा के साथ आने के बाद अब उसके पास अधिक विकल्प ही नहीं हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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