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अभिनंदन के लिए ‘वीर चक्र’ की सिफारिश

बालाकोट में आतंकियों के ठिकानों पर एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्‍तानी विमानों की घुसपैठ का मुंहतोड़ जवाब देने वाले विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान अब किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। हाल ही में देश और दुनिया का ध्यान खींचने वाले और वीरता का पर्याय बन चुके अभिनंदन के लिए भारतीय वायुसेना ने ‘वीर चक्र’ की सिफारिश की है। इसके साथ ही खबर है कि भारतीय वायुसेना ने सुरक्षा कारणों के चलते उनका कश्‍मीर से तबादला भी कर दिया है। अभी वह श्रीनगर स्थित एयरबेस पर तैनात थे। बताया जाता है कि उन्‍हें पश्चिमी सेक्‍टर के किसी महत्‍वपूर्ण बेस पर ही तैनात किया जाएगा।

गौरतलब है कि बीते 26 फरवरी को बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद पाकिस्तानी वायुसेना ने 27 फरवरी की सुबह भारतीय सीमा में दाखिल होने की कोशिश की थी। पाकिस्तानी विमानों को खदेड़ते हुए विंग कमांडर अभिनंदन ने एक एफ-16 विमान को मार गिराया था। इसी क्रम में उनके मिग बाइसन विमान में भी आग लग गई थी और वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस दुर्घटना के बाद विंग कमांडर अभिनंदन विमान से इजेक्ट कर पैराशूट के सहारे सुरक्षित उतरने में कामयाब रहे, लेकिन वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में उतरे जहां स्थानीय लोगों और पाकिस्तान की सेना ने उन्हें कब्जे में ले लिया।

पाकिस्तानियों के चंगुल में फंसने और बंदी बनाए जाने के बावजूद जांबाज अभिनंदन ने भारतीय वायुसेना के बारे में दुश्‍मनों को कुछ नहीं बताया था। आखिरकार, चौतरफा अंतरराष्‍ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्‍तान को भारतीय पायलट अभिनंदन वर्धमान को वापस सौंपना पड़ा, जिसके बाद पूरे देश ने खुशियां मनाई थीं। आज एक बार फिर पूरा देश गौरवान्वित है अपने वीर पुत्र के सम्मान पर। उन्हें ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।

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बेटियाँ बोझ नहीं, जिन्दगी का दूसरा नाम होती है

भारतीय समाज में बेटियों के प्रति लोगों की मानसिकता सर्वाधिक क्रूर हो चुकी है। धारणा यहाँ तक बन गयी है कि बेटियाँ परिवार के लिए बोझ होती है। बेटियाँ सिर्फ लेने के लिए होती है, देने के लिए नहीं। तभी तो अधिकांश परिवारों में बेटियों को बासी और बेटों को ताजा भोजन परोसा जाता है। बेटा को अच्छे पोशाक के साथ अच्छे स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजा जाता है।

बता दें कि समाज में बेटी के महत्व को लेकर लोगों को जागरुक करने तथा लिंगानुपात के अंतर को पाटने हेतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ सामाजिक योजना की शुरुआत 2015 के 22 जनवरी को की। इस योजना के लागू होते ही नन्ही-मुन्नी बेटियाँ क्या कहने लगी है अपने पापा से-

चलते-चलते थक गई….. कंधे पे बिठा लो ना पापा !

अंधेरे से डर लगता है….. सीने से लगा लो ना पापा !

अब स्कूल पूरा हो गया….. कॉलेज में पढ़ने दो ना पापा !

धरती पर बोझ नहीं होती बेटियाँ…. दुनिया को समझा दो ना पापा !

ये समझाने की नहीं, बल्कि गहराई में उतर कर महसूसने की बातें हैं। हाल ही में कोलकाता की 19 वर्षीय राखी दत्ता नाम की बेटी अपने पिता के लीवर की गंभीर बीमारी का इलाज कराते-कराते थक चुकी थी। जब कोलकाता के डॉक्टरों द्वारा इलाज करने की पूरी कोशिश नाकामयाब हो गई तो वह बेटी राखी अपने पिता को लेकर हैदराबाद के एआईजी (Asian Institute of Gastroenterology) अस्पताल चली गई।

यह भी जान लीजिए कि जांचोपरांत वहाँ के सभी डॉक्टरों ने एक स्वर से यही कहा कि इस मरीज की लंबी आयु के लिए केवल और केवल लीवर ट्रांसप्लांट ही करना होगा। यह सुनते ही बेटी राखी ने तुरंत हाँ कर दी। सारी औपचारिकताओं को पूरी करने के बाद राखी दत्ता ने अपने पिता को 65% लीवर डोनेट कर उन्हें दूसरी नई जिंदगी दे दी……। तब से जितने लोगों ने यह कहानी सुनी….. सबों ने एक स्वर से यही कहा- “बेटियाँ बोझ नहीं….. जिंदगी का दूसरा नाम होती है।”

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वाराणसी में मोदी बनाम प्रियंका की संभावना !

राजनीति के गलियारे में इन दिनों एक चर्चा काफी जोर पकड़ रही है कि कांग्रेस की नवनियुक्त महासचिव प्रियंका गांधी वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं। जी हाँ, कांग्रेस के सूत्र कह रहे हैं कि इसे लेकर पार्टी में अभी कोई फैसला नहीं हुआ है, लेकिन प्रियंका चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो चुकी हैं।

बात जहां तक कांग्रेस पार्टी की है तो वह भले ही इस मुद्दे पर अभी आधिकारिक तौर पर कुछ कहने को तैयार नहीं हो लेकिन इस बात पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं। पार्टी में ऐसा मानने वालों की कमी नहीं कि प्रियंका अगर वाराणसी से चुनाव लड़ती हैं तो मोदी को वहां घेरा जा सकता है। इसके पीछे दो तर्क दिए जा रहे हैं – पहला यह कि इस बार मोदी लहर जैसी कोई बात नहीं है और दूसरा यह कि पिछले चुनाव में करीब चार लाख वोट मोदी के खिलाफ लड़ रहे प्रत्याशियों में बंटे थे। अब अगर कांग्रेस को सपा और बसपा का सहयोग मिलता है तो मोदी को कड़ी चुनौती दी जा सकती है।

गौरतलब है कि पिछले चुनाव में वाराणसी से चुनाव जीते भाजपा उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को 5,81,022 वोट मिले थे जबकि आप के अरविन्द केजरीवाल को 2,09,238 मत। वहीं कांग्रेस को यहां 75,614, बसपा को 60,579 और सपा को 45,291 मत हासिल हुए थे। कांग्रेस की सोच यह है कि अगर भाजपाविरोधी इन सारे मतों को एक जगह कर दिया जाए तो मोदी को न केवल कड़ी टक्कर दी जा सकती है बल्कि प्रियंका गांधी के व्यक्तित्व और नेहरू-गांधी परिवार का आकर्षण भी साथ में जोर दिया जाए तो चौंकाने वाला परिणाम भी मिल सकता है।

बहरहाल, ये सारे समीकरण अपनी जगह हैं। कांग्रेस और खासकर प्रियंका गांधी सीधे मोदी को चुनौती देने का मन बना पाते हैं या नहीं, यह देखने की बात होगी।

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तो अब मुलायम स्टार प्रचारक भी नहीं ?

लोकसभा चुनाव के लिए बसपा के बाद अब समाजवादी पार्टी ने भी स्टार चुनाव प्रचारकों की सूची जारी कर दी है। इस सूची में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव समेत कुल 40 स्टार प्रचारक हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस सूची में सपा संरक्षक और अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव का नाम नदारद है। 90 के दशक में सपा की नींव रखने से लेकर उसे सत्ता के शिखर तक पहुँचाने वाले मुलायम के हाथ से पार्टी की कमान तो पहले ही निकल चुकी थी और अब 40 प्रचारकों की सूची में भी उनकी अनुपस्थिति है। इस बात को लेकर सियासी गलियारे में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
गौरतलब है कि सपा के प्रमुख राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव के हस्ताक्षर वाली स्टार प्रचारकों की सूची में अखिलेश यादव के अलावा उनकी पत्नी डिंपल यादव भी हैं। इसके अलावा स्वयं रामगोपाल यादव, वरिष्ठ नेता आजम खान और जया बच्चन के भी नाम सूची में शामिल हैं। सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी और नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी, पूर्व कैबिनेट मंत्री अहमद हसन, जावेद अली खान, तेज प्रताप यादव और प्रदेश अध्यक्ष नरेश पटेल को भी इस सूची में जगह मिली है।
बहरहाल, इस बीच समाजवादी पार्टी ने दो अन्य सीटों से अपने कैंडिडेट घोषित किए हैं। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव आजमगढ़ से और आजम खान रामपुर सीट से चुनाव लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। इसके साथ ही एसपी ने अपने कोटे की 37 में से 19 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं।

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भाजपा की पहली सूची तैयार, क्या आडवाणी-जोशी होंगे बाहर ?

लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की पहली सूची कभी भी जारी हो सकती है। ख़बर है कि सत्ताधारी दल ने लगभग 250 नाम तय कर लिए हैं और इन नामों में जहां कई नाम चौंकाने वाले हो सकते हैं, वहीं कई नामों का ना होना हैरान कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक भाजपा संसदीय समिति द्वारा तैयार की गई सूची में कई दिग्गजों का टिकट कटना तय है। ऐसे में अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी इस बार चुनावी मैदान में उतरेंगे या नहीं!

राजनीतिक गलियारे से मिल रही ख़बरों के मुताबिक उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी और बीएस कोश्यारी ने स्वयं ही चुनाव नहीं लड़ने का मन बनाया है। दोनों नेता चाहते हैं कि युवाओं को मौका दिया जाए। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र और झारखंड के करिया मुंडा भी चुनाव नहीं लड़ने के पक्ष में हैं। इससे इस बात की संभावना बढ़ गई है कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री शांता कुमार जैसे महारथियों को भी चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया जाए या वे खुद अपना नाम आगे ना बढ़ाएं।

गौरतलब है कि आडवाणी फिलहाल 91 साल के है और मुरली मनोहर जोशी के साथ उन्हें भी पार्टी नेतृत्व ने 2014 में ही मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर दिया था। तब भाजपा ने संघ परिवार के साथ मिलकर तय किया था कि 75 साल से ऊपर के किसी शख्स को कार्यकारी जिम्मेदारियां नहीं दी जाएंगी। हालांकि इसके बावजूद दोनों नेता अभी तक सदन की शोभा बढ़ा रहे थे। पर इस बार 2014 जैसी स्थिति नहीं है। भाजपा को 2 सीटों से 180 सीटों तक पहुँचाने वाले इन नेताओं का आज की तारीख में सम्मान चाहे जितना हो, राजनीतिक निर्णयों में सहभागिता लगभग नगण्य है। बहरहाल, लंबे अरसे से हाशिए पर डाल दिए गए नेताओं की इस पीढ़ी का अबकी बार संसद में नहीं दिखना खलेगा जरूर। खैर, देखते हैं कि भाजपा की किसी भी क्षण आने वाली सूची इस बारे में अंतिम रूप से क्या कहती है!!

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मुफलिसी में शहीदों की ‘शहादत’ को मिले ‘सम्मान’ का सौदा करना पड़ता है परिजनों को

दो-दो हजार में ही बिक गये भारतीय शहीदों के वीरता पदक ! सैनिकों के वीरता पदकों का सौदा देश के लिए किसी विडंबना से कम है क्या ? इन पदकों को बेचने वाले कोई और नहीं बल्कि शहीदों के लाचार माता-पिता या फिर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए बेबस उनकी पत्नी या परिजन इस शर्त पर मेडल बेचते हैं कि खरीदने वाले कभी किसी को उनका नाम नहीं बताएंगे।

कितनी विडंबना है ! जो पिता अपने इकलौता सैनिक बेटे को बचपन में कंधे पर घुमाया करता वही लाचार बाप आज उस शहीद हुए सैनिक बेटे को कंधा देता है और 3 साल का शहीद-पुत्र अपने पिता को मुखाग्नि ! उसी लाचार बाप और अबोध सैनिक-पुत्र की परवरिश के लिए सैनिक की विधवा पत्नी लाचार होकर पति की ‘शहादत’ को मिले ‘सम्मान’ का सौदा करने, दुनिया की नजर से बचकर, किसी दुकान में जाती है। कोई रोटी के लिए तो कोई बच्चे की फीस के लिए सीने पर पत्थर का टुकड़ा रखकर उस अनमोल निशानी को बेमोल बेच देती है। देश कब जगेगा और सोचेगा उन शहीदों के लिए…..।

बता दें कि लुधियाना, पंजाब का एक शख्स है इंजीनियर नरिन्दर पाल सिंह। वह एक गैरतमंद इंसान है जो लुधियाना में ‘अकाली सहाय म्यूजियम’ चलाते हैं। वहीं विगत 5 साल में सैनिकों के 300 और स्वतंत्रता सेनानियों के लगभग 200 अनमोल मेडल 2-2 हजार तक में खरीदते और सहेजते आये हैं। वे ऐसे नेक दिल और प्रतिष्ठित इंसान हैं कि बेचने वालों का नाम किसी को नहीं बताते हैं।

यह भी बता दें कि सैन्य परिवारों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव  मधेपुरी ने हाल ही में पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए 44 शहीदों के परिजनों के बैंक एकाउंट को सार्वजनिक करने हेतु प्रधानमंत्री, गृह मंत्री एवं रक्षा मंत्री को पत्र लिखा है ताकि बुद्ध – नानक – कबीर…. से लेकर भूपेन्द्र-भीम-कर्पूरी…. डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम सरीखे दानवीरों से प्रेरित भारतवासी यदि उनके खाते में एक-एक रुपए भी डालें तो करोड़ों रुपए… होंगे और शहीदों के परिजनों को ये दिन नहीं देखना पड़ेगा।

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क्या खत्म हो गया महागठबंधन ?

देश को नया विकल्प देने की बात करने वाला महागठबंधन क्या खत्म हो गया? जी हाँ, मायावती और ममता बनर्जी के अलग रास्ता अख्तियार करने के बाद लगता कुछ ऐसा ही है। तेजी से बदले घटनाक्रम में बसपा सुप्रीमो मायावती के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मंगलवार को साफ कर दिया कि चुनाव में वे कांग्रेस से अलग हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनकी जंग न सिर्फ भाजपा की अगुआई वाले एनडीए से होगी, बल्कि कांग्रेस से भी होगी।

स्पष्ट है कि सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और तीसरे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में संभावित सहयोगियों के रुख ने न सिर्फ महागठबंधन को खारिज कर दिया है बल्कि कांग्रेस के लिए दूसरे राज्यों में भी चुनौतियां बढ़ा दी हैं। खासकर बिहार में इसका असर दिख सकता है। इन सबसे भाजपा के खिलाफ विपक्ष का बड़ा धड़ा बनाने की कांग्रेस की मुहिम खतरे में पड़ती दिख रही है।

बता दें कि कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 10 सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया था। इसके पीछे सीधा संदेश था कि बसपा-सपा गठबंधन इन सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी माने या फिर कांग्रेस की अलग चुनौती के लिए तैयार रहे। पर कांग्रेस का दांव उसी के गले पड़ गया। मायावती ने दो कदम आगे जाकर स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के साथ किसी भी राज्य में कोई समझौता नहीं होगा। यही नहीं, बसपा-सपा गठबंधन ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में भी दावा ठोक दिया है। उधर पिछले एक साल से लगातार विपक्षी दलों की बैठक में शामिल हो रहीं और अपने मंच पर कांग्रेस समेत दूसरे दलों को आने के लिए बाध्य कर रहीं ममता बनर्जी ने बंगाल की सभी 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं।

रही बात बिहार की तो यहां भी आरजेडी-कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया है। बताया जा रहा है कि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सहयोगी दलों को साफ लहजे में बोल दिया है कि वे अपनी राजनीतिक हैसियत से ज्यादा न मांगे। यह बयान कांग्रेस के लिहाज से खासतौर पर अहम है क्योंकि पार्टी ने यहां अपने कद से बड़ा मुंह खोल रखा है।

अन्य राज्यों की बात करें तो तेलंगाना विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से साथ मिलकर लड़े आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू का रुख भी अब बदला-बदला है। प्रदेश की जनता को वह बताते फिर रहे हैं कि कांग्रेस के साथ केंद्र की रणनीति अलग है, लेकिन राज्य विधानसभा चुनाव में उनका कांग्रेस के साथ कोई लेना-देना नहीं है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच समझौते को भी खारिज ही किया जा रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि विपक्षी दलों का एक साझा घोषणापत्र तैयार करने की जो कवायद शुरू हुई थी अब उसका क्या होगा। ध्यान रहे कि अब तक विपक्षी दलों के जमावड़े में 21 दलों को गिना जाता था और इसमें बसपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, टीडीपी और आप भी शामिल हुआ करती थीं। इन दलों के बिना क्या महागठबंधन का कोई अस्तित्व रह जाएगा?

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भारतीय वीरता के अद्वितीय प्रतीक का अभिनंदन

पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराने वाले भारतीय वीरता के अद्वितीय प्रतीक अभिनंदन 55 घंटे से ज्यादा समय तक पड़ोसी मुल्क की हिरासत में रहने के बाद शुक्रवार रात करीब 9.20 बजे वतन पहुँचे। हालांकि आखिर तक पाकिस्तान ने उन्हें सौंपने में कागजी कार्रवाई का हवाला देते हुए घंटों की देरी की। इस बीच सम्पूर्ण देश अभिनंदन के अभिनंदन को आकुल-व्याकुल रहा। गौरतलब है कि पहले दोपहर 2 बजे का समय तय किया गया था लेकिन पाकिस्तान ने समय दो बार बदला और प्रक्रिया को अनावश्यक खींचने की कोशिश की। हालांकि इस दौरान रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण समेत सरकार व सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने समूचे घटनाक्रम पर बराबर नजर बनाए रखी।

उधर घंटों की देरी के बाद भी सुबह से रात तक बॉर्डर पर जमे भारतीयों का जोश और उत्साह देखने लायक था। यहां मौजूद लोग ढोल-नगाड़े बजाते हुए ‘अभिनंदन है, अभिनंदन है’ के नारे लगाते रहे। देश के इस बहादुर बेटे को देखने और उसका स्वागत करने के लिए बॉर्डर पर भारी संख्या में लोग पहुंचे थे। बहरहाल, देर शाम बॉर्डर पर अभिनंदन के पहुंचने के बाद कागजी कार्रवाई पूरी की गई। प्रोटोकॉल के तहत उनका मेडिकल चेकअप किया जाएगा। अभिनंदन को अटारी बॉर्डर से सीधे अमृतसर एयरपोर्ट की तरफ ले जाया जाएगा, जहां से वह वायुसेना के विशेष विमान से दिल्ली पहुंचेंगे।

बता दें कि एक दिन पहले भारत के संभावित एक्शन से घबराए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए अभिनंदन को छोड़ने की घोषणा की थी। दुश्मन के कब्जे में होने के बाद भी अभिनंदन ने पूरे साहस और दृढ़ता के साथ पाक अफसरों की आंखों में आंखें डालकर सवालों का उतना ही जवाब दिया, जितना जेनेवा कन्वेंशन के तहत ऐसे समय में दिया जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर सामने आए विडियो में साफ देखा गया कि पूछताछ के दौरान वह बड़ी बहादुरी से पाक अफसरों का जवाब देते रहे पर सिर को झुकने नहीं दिया और कोई महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी।

याद दिला दें कि दो दिन पहले पाकिस्तानी विमानों ने भारत के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी। जवाबी कार्रवाई के दौरान अभिनंदन के मिग-21 बाइसन ने पाकिस्तानी एफ-16 विमान को मार गिराया। हमले में उनका मिग-21 विमान भी चपेट में आ गया और अभिनंदन पैराशूट की मदद से नीचे उतरे लेकिन जहां वह उतरे वह धरती पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) थी, जिसके बाद पाकिस्तान ने अभिनंदन को हिरासत में ले लिया था।

 

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जवानों को अब होगी विमान से कश्मीर आने-जाने की सुविधा प्राप्त

पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। यह कि 7 लाख अस्सी हज़ार जवानों को दिल्ली-श्रीनगर एवं जम्मू-श्रीनगर रूट पर आने-जाने के लिए नियमित विमान सेवा उपलब्ध कराई जाएगी।

बता दें कि कश्मीर में सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स की 65 बटालियनों में 65 हज़ार जवान तैनात हैं। यहाँ पर बीएसएफ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल एवं राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की ईकाइयाँ भी आंतरिक सुरक्षा के विभिन्न मोर्चों पर तैनात किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा अर्धसैनिक बलों के जवानों की सुरक्षा के लिए घोषित इस फैसले को देशभक्त बुद्धिजीवियों ने सराहा है। साथ ही कुछ संवेदनशील साहित्यकारों ने यह भी कहने से बाज नहीं आया कि एक साथ 45 जवानों की कीमती जान जाने के बाद ही सरकार की आंखें खुली ?

यह भी बता दें कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी आदेश में यह कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के सभी जवानों को यह सुविधा मिलेगी। ड्यूटी ज्वाइन करने, ट्रांसफर पर जाने, टूर या छुट्टी पर जाने के लिए जवान अब विमान से यात्रा कर सकेंगे। यह सुविधा अब तक मिलती तो थी लेकिन इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर के अधिकारियों को ही मिलती थी।

चलते-चलते यह भी बता दें कि जहाँ गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार अर्धसैनिक बलों के सभी जवान व्यावसायिक उडान से कश्मीर आने-जाने की टिकट बुक करा कर यानी पॉकेट से पैसे लगाकर यात्रा करेंगे और बाद में अपने संगठन या बल के माध्यम से खर्च की गई राशि का पुनर्भुगतान प्राप्त कर सकेंगे। वहीं इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एक सेवानिवृत्त सैनिक ने कहा कि यदि वह सैनिक शहीद हो जाए तो उसके तीन-चार वर्षीय इकलौते पुत्र को वह राशि वापस लेने में कितने वर्ष लगेंगे…..?

क्या सांसद एवं विधायकों की तरह उन सैनिकों को सरकार की ओर से कूपन मुहैया नहीं किया जा सकता ?

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आलोचना को ऊँचाई देने वाले ‘नामवर’ नहीं रहे

अपनी प्रगतिशील सोच से साहित्य को नया आयाम देने वाले नामवर सिंह नहीं रहे। डॉ. नामवर सिंह के रूप में न केवल हिन्दी साहित्य ने बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य ने एक बहुत बड़ा और विश्वसनीय चेहरा खो दिया। मंगलवार देर रात 92 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली और इसके साथ ही हिन्दी साहित्य के ‘नामवर युग’ का अंत हो गया। एक चलती-फिरती ‘संस्था’ जिनसे कई पीढ़ियों ने साहित्य की सही और सच्ची समझ हासिल की, बहुत बड़ी रिक्तता छोड़ हमसे रुख़सत हो गई। पिछले दिनों नामवर जी दिल्ली के अपने घर में गिर गए थे जिसके बाद उनके सिर में चोट लगी और उनको एम्स के ट्रामा सेंटर में भर्ती करवाया गया था।
नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1926 को वाराणसी के जीयनपुर गांव में हुआ था। उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की और 1941 में उनकी पहली कविता ‘क्षत्रिय मित्र’ में छपी। 1951 में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एमए किया और फिर वहीं हिन्दी के व्याख्याता नियुक्त हुए। इसके बाद उन्होंने सागर विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया। लेकिन सबसे लंबे समय – 1974-1987 – तक वे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रहे। यहां से सेवानिवृत्त होने के कुछ वर्षों बाद उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा का चांसलर बनाया गया।
डॉ. नामवर सिंह ने हिन्दी साहित्य खासकर आलोचना को कई कालजयी कृतियां दीं जिनमें ‘कविता के नए प्रतिमान’ विशेष रूप से चर्चित है। ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’, ‘पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘कहानी: नई कहानी’, ‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘हिन्दी का गद्यपर्व’, ‘वाद विवाद संवाद’, ‘आलोचक के मुख से’, ‘बकलम खुद’ आदि उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियां हैं। उनकी जितनी प्रतिष्ठा इन पुस्तकों को लेकर थी उतना ही सम्मान उन्हें प्रखर वक्ता के तौर पर हासिल था और इन सबके ऊपर थी उनकी बेबाकी और साफगोई। कुल मिलाकर, उन्होंने हिन्दी साहित्य, खासकर आलोचना की विधा को जो ऊँचाई दी और जैसा सम्मान दिलाया उसकी कोई सानी नहीं।
साहित्य अकादमी समेत कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित नामवर सिंह नि:संदेह हिन्दी के सार्वकालिक महान साहित्यकारों में अग्रगण्य हैं। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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