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मिस वर्ल्ड का जवाब उससे भी सुन्दर !

1966 में रीता फारिया… भारत ही नहीं, सम्पूर्ण एशिया से बनने वाली पहली मिस वर्ल्ड… फिर 28 साल के इंतजार के बाद 1994 में ऐश्वर्या राय… इसके बाद अगले छह सालों में तीन मिस वर्ल्ड – 1997 में डायना हेडन, 1999 में युक्ता मुखी और 2000 में प्रियंका चोपड़ा… फिर 17 साल का इंतजार और अब मानुषी छिल्लर… मिस वर्ल्ड 2017… 118 देशों की सुन्दरियों में सर्वश्रेष्ठ..! भारत की बेटी ने एक बार फिर पूरी दुनिया में अपनी सुन्दरता – सिर्फ चेहरे की नहीं, सम्पूर्ण व्यक्तित्व की सुन्दरता – का लोहा मनवा लिया। चीन के सनाया में आयोजित की गई मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली मिस इंडिया मानुषी छिल्लर को मिस वर्ल्ड 2017 घोषित किया गया। इस प्रतियोगिता में दूसरे नंबर पर मिस मेक्सिको रहीं जबकि तीसरे नंबर पर मिस इंग्लैंड।

20 वर्षीया मानुषी की जीत की सबसे अहम बात यह रही कि वो ‘हेड टू हेड चैलेंज’ और ‘ब्यूटी विद पर्पस सेगमेंट’ दोनों में अव्वल रहीं। खास तौर पर अंतिम सवाल के जवाब से तो उन्होंने न केवल ज्यूरी बल्कि पूरी दुनिया का दिल जीत लिया। मानुषी से पूछा गया अंतिम सवाल था कि दुनिया में किस पेशे की सेलरी सबसे ज़्यादा होनी चाहिए और क्यों? मानुषी ने इसका बेहद खूबसूरत जवाब दिया। उन्होंने कहा, “मेरी मां मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा रही हैं। इसलिए मैं कह सकती हूं कि मां होने की जॉब सबसे बेहतरीन है। बात केवल पैसे की नहीं है, बल्कि प्यार और सम्मान के लिहाज से, कोई भी मां सबसे ज्यादा वेतन की हकदार होती है।”

67वीं मिस वर्ल्ड मानुषी के व्यक्तित्व के कई पहलू हैं। वो मेडिकल की स्टूडेंट हैं और कार्डिएक सर्जन बनना चाहती है। उन्हें पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग जैसे स्पोर्ट्स पसंद हैं। इसके अलावा मानुषी ट्रेंड इंडियन क्लासिकल डांसर हैं और स्केचिंग और पेंटिंग भी बनाती हैं। यही नहीं, मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में जाने से पहले मानुषी समाजसेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिलाओं के पीरियड के दौरान हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया है।

मिस वर्ल्ड बनना मानुषी के बचपन का सपना था। अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने अपना सपना पूरा कर लिया। अब भारत की इस बेटी को अपने सपनों को विस्तार देना है। मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में अपने प्रदर्शन से उन्होंने जैसी उम्मीद बंधाई है, उसे देख कोई भी लक्ष्य उनके लिए असंभव नहीं लगता। उज्जवल भविष्य के निमित्त उन्हें ‘मधेपुरा अबतक’ की ढेर सारी शुभकामनाएं!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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लंदन में क्यों खरीदना चाहती हैं ममता टैगोर का घर ?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लंदन के उस घर को खरीदना चाहती हैं जहां विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कुछ समय के लिए समय बिताया था। वह इसे भारतीय साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाने वाले टैगोर के संग्रहालय-सह-स्मारक का रूप देना चाहती हैं। टैगोर 1912 में कुछ महीनों के लिए उत्तरी लंदन के हैम्पस्टेड हीथ स्थित हीथ विलाज में रहे थे, जहां उन्होंने अपने कविता संग्रह ‘गीतांजलि’ का अनुवाद किया था। इस घर पर अभी भी नीले रंग की एक पट्टिका लगी हुई है, जिस पर लिखा है कि यहां भारतीय कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर रहे थे।

गौरतलब है कि ममता बनर्जी इन दिनों ब्रिटेन के दौरे पर हैं। इस दौरान शनिवार को उन्होंने लंदन में कार्यवाहक भारतीय उच्चायुक्त दिनेश पटनायक से एक घंटे तक मुलाकात की और टैगोर से जुड़ी इस धरोहर को अपनी सरकार की ओर से खरीदने की इच्छा जताई। ममता चाहती हैं कि ऐतिहासिक महत्व वाले इस घर को टैगोर के संग्रहालय-सह-स्मारक में तब्दील कर उन्हें एक यादगार श्रद्धांजलि दी जाए। इस घर की कीमत कुछ साल पहले 2.7 मिलियन पाउंड यानि लगभग 23 करोड़ रुपए थी। बता दें कि 2015 में ममता जब लंदन गई थीं तब भी उन्होंने इस पर चर्चा की थी। अब एक बार फिर ममता ने नई उम्मीद के साथ इस मुद्दे को उठाया है।

बता दें कि टैगोर 1912 में ब्रिटेन पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने लंदन में अपनी कई कविताओं का अनुवाद किया था। उस दौर में उनके साथियों में कई ब्रिटिश कलाकार और कवि शामिल थे। इनमें डब्ल्यू बी येट्स भी शामिल थे जिन्होंने ‘गीतांजलि’ का परिचय लिखा था। यह 103 अनुवादों का संग्रह था जिसने टैगोर को 1913 में साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिलाया था। टैगोर की स्मृति को सुरक्षित और संरक्षित रखने के निमित्त अपने इस प्रयास के लिए ममता बनर्जी नि:संदेह बधाई की पात्र हैं।

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रोबोट को इंसानों से अधिक अधिकार!

रोबोट… आधुनिक विज्ञान की उपज… इंसान की बनाई हुई एक चीज जो चाहे कितनी ही उन्नत तकनीक से क्यों न बनी हो, हमारी तरह सोच और महसूस नहीं सकती। हां, उसमें ‘समझदारी’ हम स्वयं से ज्यादा जरूर भर सकते हैं। पर क्या वो ‘समझदारी’ भी कृत्रिम नहीं होगी? क्या इस रोबोट को हम इंसानों वाली जगह दे सकते हैं? शायद ऐसा सोचना भी कुदरत की तौहीन होगी। लेकिन ‘विकास’ की सही परिभाषा से भटक चुकी हमारी सभ्यता अगर उसे इंसानों से भी ऊपर की जगह और अधिकार दे दे तो क्या कहेंगे आप?

जी हां, चौंकिए नहीं। ऊपर केवल संभावना नहीं व्यक्त की गई है। बल्कि यह अभी-अभी घटित एक कड़वी सच्चाई है। इसी हफ्ते सऊदी अरब में एक महिला रोबोट को नागरिकता दी गई है। यही नहीं, इस रोबोट को उतने अधिकार दिए गए हैं, जितने खाड़ी देशों में किसी सामान्य महिला को भी नहीं मिले हैं। सोफिया नाम की यह रोबोट अपने चेहरे के हावभाव बदल सकती है और लोगों से बातचीत भी कर सकती है।

विशेष अधिकार से नवाजी गई इस महिला रोबोट को इस हफ्ते रियाद में हुई इकोनॉमिक फोरम में पहली बार पेश किया गया। इस दौरान पैनल के साथ बातचीत करते हुए सोफिया ने कहा, इस अद्भुत मौके पर मैं बेहद सम्मान और गौरवान्वित महसूस कर रही हूं। यह एक ऐतिहासिक मौका है जब किसी रोबोट को नागरिक के तौर पर पहचान मिली है। कार्यक्रम में सोफिया ने पोडियम से वहां मौजूद लोगों को संबोधित किया और कार्यक्रम के मॉडरेटर और पत्रकार एंड्रयू रॉस सोरकिन के सवालों के जवाब भी दिए।

बहरहाल, सोशल मीडिया पर सोफिया की ख़बर आते ही डिबेट का दौर शुरू हो गया है। लोग इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि इस रोबोट को सऊदी अरब की महिलाओं और वहां काम करने वाले विदेशी नागरिकों से ज्यादा अधिकार दे दिए गए हैं।

बहरहाल, सऊदी की मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर एंड इन्फोर्मेशन ने रोबोट के समर्थन में ट्वीट कर बताया कि हैनसन रोबोटिक्स द्वारा बनाई यह रचना फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनीशिएटिव समिट में प्रस्तुत होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जिन्ना की बेटी दीना का निधन

पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि पाकिस्तान बनने के बाद सारे मुसलमान भारत छोड़ देंगे। पर उनका यह विश्वास उस वक्त खोखला साबित हुआ जब स्वयं उनकी बेटी ने भारत छोड़ने से इनकार कर दिया। हम यहां बात कर रहे हैं जिन्ना की इकलौती संतान दीना वाडिया की, जिनका गुरुवार को न्यूयॉर्क में निधन हो गया। वह 98 वर्ष की थीं। दीना के परिवार में बेटे नुस्ली वाडिया, डायना वाडिया और पोते नेस और जहांगीर वाडिया हैं। मुंबई में वाडिया ग्रुप के प्रवक्ता की ओर से जारी बयान में दीना वाडिया के देहांत की पुष्टि की गई है।

चेहरे से हू-ब-हू अपने पिता की तरह दिखने वाली दीना का जन्म अविभाजित भारत में 14-15 अगस्त की रात को 1919 में हुआ था। इतिहासकार स्टैनेली वॉल्पर्ट के मुताबिक, ‘दुनिया में उनका आगमन नाटकीय ढंग से हुआ था। जिन्ना और उनकी मां रति जिन्ना जब लंदन में एक थियेटर में फिल्म देख रहे थे, तब उनका जन्म हुआ था।’
गौरतलब है कि दीना वाडिया ने पारसी कारोबारी नेस वाडिया से शादी की थी और भारत विभाजन के पश्चात भारत में ही रहने का फैसला लिया था। जिन्ना इस बात से सख्त नाराज थे। जिन्ना के सहायक रहे मोहम्मद अली करीम छागला की एक किताब के मुताबिक जिन्ना ने जब अपनी बेटी से पूछा था कि भारत में हजारों मुसलमान हैं लेकिन तुम्हें एक नहीं मिला। इस पर दीना ने जवाब दिया था कि इस देश में हजारों मुस्लिम लड़कियां थीं लेकिन आपको शादी करने के लिए मेरी मां ही मिली। गौरतलब है कि दीना की मां रति भी पारसी समुदाय से आती थीं।

बहरहाल, बाद के दिनों में दीना अमेरिका में ही बस गई थीं। जहां तक पाकिस्तान से उनके ताल्लुक का प्रश्न है, अपने पिता की मौत के बाद वह पाकिस्तान गई थीं। इसके बाद 2004 में मुशर्रफ के दौर में उन्होंने पाक का दौरा किया था।

 

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नेहरा ने क्रिकेट को कहा अलविदा

बुधवार को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में खेला गया टी-20 मैच न्यूजीलैंड पर भारत की धमाकेदार जीत के साथ ही शानदार तेज गेंदबाज आशीष नेहरा के क्रिकेट को अलविदा कहने के कारण भी याद किया जाएगा। 38 वर्षीय नेहरा ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि न्यूजीलैंड के खिलाफ खिलाफ खेला जाने वाला यह मैच उनका आखिरी मैच होगा। नेहरा ने कहा था, “मेरे लिये यह अहम है कि ड्रेसिंग रुम में लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं। सभी कह रहे हैं कि मैं एक-डेढ़ साल और खेल सकता था। मेरा हमेशा यह मानना रहा है कि ऐसे समय में संन्यास लेना चाहिए जब लोग ‘क्यों नहीं’ से ज्यादा यह कहें कि ‘क्यों’। मैं शिखर पर रहते हुए संन्यास लेना चाहता था।”

बहरहाल, अपने क्रिकेट करियर का समापन करने वाले इस तेज गेंदबाज को भारतीय टीम ने ट्रॉफी से नवाजा और उनके योगदान की सरहाना की। भारतीय टीम के पूर्व कप्तान कपिल देव ने भी अनुभवी तेज गेंदबाज आशीष नेहरा को उनके आखिरी अंतर्राष्ट्रीय मैच से पहले शुभकामनाएं दीं और कहा, “हर खिलाड़ी के लिए पहला और आखिरी मैच खास होता है। कई वर्षों तक भारतीय क्रिकेट में अपनी सेवाएं देने के बाद नेहरा अपने घर में विदाई के हकदार हैं।” नेहरा को खेल का महान दूत बताते हुए कपिल ने कहा, ‘आपने देश की सेवा काफी अच्छे से की।’

बता दें कि नेहरा की विदाई के मौके पर फिरोजशाह कोटला में साइट स्क्रीन के ऊपर ‘फेयरवेल आशीष नेहरा’ नाम का संदेश लिखा गया। यही नहीं, उनकी विदाई को यादगार बनाने के लिए फिरोजशाह कोटला स्टेडियम के एक छोर का नाम नेहरा के नाम पर रखा गया है। गौरतलब है कि नेहरा ने अपने 18 साल के लंबे करियर की शुरुआत फरवरी 1999 में कोलंबो में श्रीलंका के खिलाफ मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी में की थी।

नेहरा का करियर चोटों से काफी प्रभावित रहा, लेकिन वह भारत के बेहतरीन गेंदबाजों में से एक रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। अपने अंतर्राष्ट्रीय करियर में उन्होंने कुल 117 टेस्ट, 120 वनडे और 26 टी-20 मैच खेले। टेस्ट में उनके नाम कुल 44, वनडे में 157 और टी-20 में 34 विकेट हैं। उन्हें डरबन में 2003 विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ 23 रन देकर छह विकेट लेने के लिए खास तौर पर याद किया जाता है। उन्होंने यह शानदार प्रदर्शन बीमार होने के बावजूद किया था। इस विश्व कप में जवागल श्रीनाथ, जहीर खान और नेहरा की तिकड़ी ने भारतीय टीम की सफलता में अहम रोल निभाया था। नेहरा 2011 में धोनी की कप्तानी में विश्व कप जीतने वाली टीम के भी सदस्य थे और सेमीफाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया था।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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न्यूजीलैंड को हरा भारत ने जीती लगातार सातवीं वनडे सीरीज

कानपुर में खेले गए तीसरे और अंतिम एकदिवसीय मैच में रोहित शर्मा और विराट कोहली के धमाकेदार शतकों और दोनों के बीच रिकॉर्ड साझेदारी के बाद अंतिम ओवरों में गेंदबाजों के बेहतरीन प्रदर्शन की बदौलत न्यूजीलैंड को 6 रन से हराकर भारत ने 2-1 से सीरीज अपने नाम कर ली। एकदिवसीय मैचों में यह भारतीय टीम की लगातार सातवीं सीरीज जीत है, जो कि उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। यही नहीं, उसने न्यूजीलैंड के खिलाफ स्वदेश में द्विपक्षीय सीरीज कभी नहीं गंवाने का रिकॉर्ड भी बरकरार रखा।

अब मैच की बात थोड़े विस्तार से। भारत के 338 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए न्यूजीलैंड की टीम सलामी बल्लेबाज कोलिन मुनरो (75), कप्तान केन विलियमसन (64) और टाम लैथम (65) के अर्द्धशतकों के बावजूद सात विकेट पर 331 रन ही बना सकी। अंतिम ओवरों में भारत की जीत के सूत्रधार रहे जसप्रीत बुमराह ने 47 रन देकर तीन विकेट चटकाए। यजुवेन्द्र चहल ने भी 47 रन देकर दो विकेट हासिल किए। जबकि भुवनेश्वर कुमार 92 रन लुटाकर एक विकेट ही ले पाए।

भारत ने इससे पहले रोहित शर्मा (147) और विराट कोहली (113) के बीच दूसरे विकेट की 230 रन की साझेदारी की बदौलत छह विकेट पर 337 रन बनाए जो कि ग्रीन पार्क पर बनाया गया सर्वाधिक स्कोर है। यह भी जानें कि शर्मा-कोहली की जोड़ी वनडे क्रिकेट में चार दोहरी शतकीय साझेदारी करने वाली दुनिया की पहली जोड़ी है। रोहित ने 138 गेंद का सामना करते हुए 18 चौके और दो छक्के जड़े जबकि कोहली ने 106 गेंद का सामना करते हुए नौ चौके और एक छक्का मारा। महेंद्र सिंह धोनी (25) और केदार जाधव (18) ने अंत में कुछ अच्छे शॉट खेले।

गौरतलब है कि अपनी पारी के दौरान 83 रन पूरे करते ही कोहली सबसे तेजी से 9000 रन पूरे करने वाले बल्लेबाज बन गए। यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे छठे भारतीय बल्लेबाज हैं। उन्होंने 194वीं पारी में यह उपलब्धि हासिल करते हुए साउथ अफ्रीका के एबी डिविलियर्स (205 पारी) का रिकॉर्ड तोड़ा। चलते-चलते बता दें कि इस पारी के दौरान ही कोहली 2017 में 2000 अंतरराष्ट्रीय रन पूरे करने वाले पहले बल्लेबाज भी बने।

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जी हां, आइंस्टीन के एक नोट की कीमत दस करोड़ से ज्यादा

कुछ लोग मशहूर होते हैं, कुछ महान होते हैं और जिन्हें ईश्वर ये दोनों नेमत देते हैं उनके लिए माना जाना चाहिए कि वे इस धरती पर कोई विशेष कार्य करने आए हैं और उनके जीवन का हर क्षण, उनसे जुड़ी हर चीज मानव-सभ्यता की थाती है। बुद्ध, गांधी, मार्क्स, आइंस्टीन आदि ऐसे ही बिरले लोगों में शुमार हैं, जिन्होंने हमारी सभ्यता की दिशा और दशा बदली। यही कारण है कि उनसे जुड़ी छोटी-सी-छोटी चीज भी अनमोल हो जाती है और अगर उनकी बोली लगा दी जाए तो करोड़ों भी कम पड़ जाते हैं।

ऊपर कही बात के विस्तार में जाएं उससे पहले एक सवाल। जरा सोच कर बताएं, एक पन्ने की कीमत क्या हो सकती है, जिस पर महज एक नोट लिखा हुआ हो। आप चाहे जितनी उदारता से सोच लें, कुछ सौ या हजार से आगे शायद ही बढ़ पाएं। अब अगर आपसे कहा जाए कि एक नोट वाले एक पन्ने की कीमत दस करोड़ से भी ज्यादा हो सकती है तो क्या आप यकीन कर पाएंगे? नहीं ना? लेकिन जनाब जब उस पन्ने पर अल्बर्ट आइंस्टीन का स्पर्श हो और लिखा हुआ नोट उनका हो तो यह भी मुमकिन है।

जी हां, महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के लिखे नोट वाला पन्ना येरूशलम में हुई एक नीलामी में दस करोड़ से भी ज्यादा (दस करोड़ तेईस लाख) में बिका। आपको बता दें कि आइंस्टीन ने यह नोट 1922 ई. में टोक्यो के इंपीरियल होटल में एक वेटर को बतौर इनाम लिखकर दिया था क्योंकि उस वक्त उनके पास उसे देने के लिए कैश नहीं था। आपको उत्सुकता हो रही होगी कि आखिर आइंस्टीन उस वेटर को इनाम क्यों देना चाह रहे थे? तो यह भी जान लें। दरअसल एक लेक्चर देने जापान आए आइंस्टीन को उस वेटर ने ही आकर संदेश दिया था कि उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। इस संदेश के बाद इनाम देना तो बनता ही था।

अब आपको यह भी बता बता दें कि आइंस्टीन ने उस पन्ने पर लिखा क्या था। उन्होंने उस पन्ने पर जीवन की खुशी का राज बताते हुए लिखा था कि “जीवन में मंजिल हासिल करने के बाद भी खुशी मिल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है।” जर्मन भाषा में लिखे अपने नोट में उन्होंने आगे लिखा – “कामयाबी और उसके साथ आने वाली बेचैनी के बजाय एक शांत और विनम्र जीवन आपको अधिक खुशी देगा।”

करीब इसी दौरान के एक दूसरे नोट में उन्होंने लिखा -“जहां चाह, वहां राह।” ये नोट करीब दो करोड़ रूपयों में नीलाम हुआ। नीलामी करने वाली कंपनी का कहना है कि इन दोनों नोट्स की कीमत अनुमान से कहीं अधिक है। हो भी क्यों ना? आइंस्टीन अनुमान में आने वाली शख्सियत भी नहीं। चलते–चलते बता दें कि आइंस्टीन के बेशकीमती नोट को बेचने वाला साल 1922 में आइंस्टीन तक संदेश पहुंचाने वाले व्यक्ति का भतीजा है और नोट को खरीदने वाला एक यूरोपीय।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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जी हां, चन्द्रमा पर है 50 किलोमीटर लंबी गुफा

पांच दशक होने को आए जब मनुष्य ने चन्द्रमा पर पहला कदम रखा था। वो दिन था 20 जुलाई 1969 जब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के दो एस्ट्रोनॉट नील आर्मस्ट्रांग और बज एल्ड्रीन अंतरिक्ष विमान अपोलो 11 में सवार होकर चांद पर पहुंचे थे। तब से अब तक विज्ञान ने बेहिसाब तरक्की की है और नई-नई खोजों का सिलसिला अनवरत जारी है। खासकर चन्द्रमा को लेकर हमारी उत्सुकता प्रारंभ से ही कुछ अलग रही है। कहना गलत न होगा कि यह हमारी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा है। न जाने कितनी ही कविताएं इस पर रची गई होंगी और कितनी ही कहानियां इससे जुड़ी हुई होंगी। अकारण नहीं कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इसके अलग-अलग पहलुओं पर तरह-तरह की जानकारियां इकट्ठी की हैं। आज हम चन्द्रमा के बारे में आपको एक ऐसी जानकारी से अवगत कराएंगे कि आप बस चौंक जाएंगे।

जी हां, सुनकर शायद अविश्वसनीय लगे लेकिन जापान के वैज्ञानिकों को चांद पर एक बहुत बड़ी गुफा का पता चला है। वैज्ञानिकों ने गुरुवार को बताया कि इस गुफा में चन्द्रमा पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट रह सकते हैं। इससे वे खतरनाक विकिरण और तापमान में बदलाव से बच सकते हैं। जापान के एईएईएनई लूनर ऑर्बिटर से मिले आंकड़ों के अनुसार चांद पर मौजूद यह गुफा 3.5 अरब साल पहले भूगर्भ के अंदर हुई हलचल की वजह से बनी होगी। इस गुफा की लंबाई 50 किलोमीटर और चौड़ाई 100 मीटर है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह गुफा भूगर्भ से निकले लावे की वजह से तैयार हुई होगी। जापानी वैज्ञानिकों के ये आंकड़े और नतीजे अमेरिकी पत्रिका जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में भी प्रकाशित हुए हैं।
जापानी वैज्ञानिक जुनिची हारुयामा ने गुरुवार को कहा, ‘हमें अभी तक ऐसी चीज के बारे में पता था और माना जाता था कि यह लावा ट्यूब हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी की पुष्टि पहले नहीं हुई थी।’ जमीन के अंदर मौजूद यह गुफा चंद्रमा के मारियस हिल्स नामक जगह के पास है। बकौल हारुयामा इस गुफा में रह कर अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा प्रवास के दौरान विकिरण और तापमान में होने वाले तेज बदलावों के दुष्प्रभाव से बच सकते हैं।
चलते-चलते बता दें कि जापान ने इसी साल जून में साल 2030 तक चंद्रमा पर अंतरिक्ष मिशन भेजने की घोषणा की है। इधर भारत और चीन भी अपने-अपने अंतरिक्ष यात्री चन्द्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहे हैं। चन्द्रमा पर इंसानी बस्ती बसाने की तैयारी जोरों पर है। अब वो दिन दूर नहीं जब चंदा मामा से हम सचमुच अपने मामा के जैसे मिल पाएंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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धनतेरस: धन ही नहीं, स्वास्थ्य का भी पर्व

धनतेरस, एक अनोखा पर्व जो न केवल दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है बल्कि समृद्दि के लिए स्वास्थ्य का महत्व भी रेखांकित करता है। आम धारणा के अनुसार धन का पर्व दीपावली है, जो सही नहीं है। दीपावली तो धन के साथ-साथ अन्य सिद्धियों का दिन भी है। धन का दिन तो असल में धनतेरस है। साथ ही यह दिन औषधि और स्वास्थ्य के स्वामी धन्वंतरि का भी दिन है, जो इस बात का संदेश देता है कि धन का भोग करने के लिए लक्ष्मी की कृपा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरत उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की होती है। बता दें कि आर्युवेद, जिसकी रचना ब्रह्मा ने की थी, को प्रकाश में लाने का श्रेय भी धन्वंतरि को ही जाता है।

धनतेरस का पर्व हर वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। दीपावली की महानिशा से दो दिन पहले इसी खास दिन यक्ष-यक्षिणियों का जागरण होता है। यक्ष-यक्षिणी इस स्थूल जगत के उन सभी चमकीले तत्वों के नियंता कहे जाते हैं, जिन्हें दुनिया ‘दौलत’, ‘सम्पत्ति’, ‘वैभव’, ‘ऐश्वर्य’ जैसे नामों से जानती है। जानना दिलचस्प होगा कि कुबेर को यक्ष और लक्ष्मी को यक्षिणी का रूप माना जाता है। कुबेर और लक्ष्मी यक्ष-यक्षिणी के रूप में हमारे जीवन की उस ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं, जिससे हमारी जीवन-शैली निर्धारित और नियंत्रित होती है।

‘धनतेरस’ में ‘धन’ शब्द को धन-संपत्ति और धन्वंतरि दोनों से ही जोड़कर देखा जाता है। भगवान धन्वंतरि को हिन्दू धर्म में देव वैद्य का पद हासिल है। कुछ ग्रंथों में इन्हें विष्णु का अवतार भी माना गया है। मान्यता है कि समुद्र-मंथन के दौरान धन्वंतरि चांदी के कलश और शंख के साथ प्रकट हुए थे। इसी कारण धनतेरस के दिन शंख और चांदी का कोई पात्र, बर्तन या सिक्का खरीदना शुभ माना जाता है। सामर्थ्य के अनुसार कुछ लोग चांदी की जगह सोना तो कुछ लोग पीतल या स्टील की चीज खरीदते हैं, लेकिन ये रस्म लोग निभाते जरूर हैं। दीपावली के लिए इसी दिन लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा और पूजन सामग्री खरीदना भी शुभ माना गया है।

तंत्र शास्त्र में इस दिन लक्ष्मी, गणपति, विष्णु और धन्वंतरि के साथ कुबेर की साधना की जाती है। धनतेरस की रात्रि में कुबेर यंत्र, कनकधारा यंत्र, श्री यंत्र तथा लक्ष्मी स्वरूप श्री दक्षिणावर्ती शंख के पूजन को अचूक माना गया है। इस दिन अपने मस्तिष्क को स्वर्ण समझकर ध्यानस्थ होने से धन अर्जित करने की आन्तरिक क्षमता सक्रिय होती है, जो सही मायने में समृद्धि का कारक बनती है।

एक बात और, ‘धनतेरस’ में ‘धन’ से जुड़े ‘तेरस’ शब्द को लेकर एक बड़ी महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि इस दिन खरीदे गए धन, विशेषकर सोना या चांदी, में तेरह गुना वृद्धि हो जाती है। ईश्वर करे आपके धन में भी तेरह गुना की वृद्धि हो और हर धनतेरस को हो। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से इस दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

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अपने नाम को दें मंगल का मुकाम

इंसानी इच्छा और महत्वाकांक्षा का सचमुच कोई अंत नहीं। इंसान सशरीर भले ही हर जगह न जा पाए, लेकिन उसके मन को कहीं जाने से कोई कैसे रोक सकता है? हममें से हर कोई हर उस जगह पर अपनी या अपने नाम की मौजूदगी चाहता है जहां उसकी कल्पनाशक्ति सुकून पाती हो। यहां तक कि स्कूल-कॉलेज के बेंचो पर, ट्रेन के डिब्बों पर, ऐतिहासिक ईमारतों पर, पुराने पेड़ों पर और यहां तक कि पहाड़ों तक पर हममें से कई अपना नाम किसी नुकीली चीज से खुरचकर या घिसकर लिखने की कोशिश करते हैं। जीवन के एक-एक पल को जीने की ख्वाहिश कुछ ऐसी होती है कि समुद्र के किनारे बैठकर उस रेत तक पर हम अपना लिखते हैं जिसको अगले ही पल लहरों से मिल जाना होता है। जरा सोचिए, हमारी ख्वाहिशों की इस सूची में अगर मंगल ग्रह भी शामिल हो जाए तो क्या हो?

जी हां, चौंकिए नहीं। अगर आप मंगल ग्रह पर अपना नाम भेजने की ख्वाहिश रखते हैं तो आपके पास एक शानदार मौका है। यह जिम्मा अंतरिक्ष की दुनिया में अपनी पहचान और धाक रखने वाले नासा ने लिया है। दरअसल, नासा अगले साल लाल ग्रह पर पर इनसाइट लैंडर स्पेसक्राफ्ट को लॉन्च करने जा रहा है। यह स्पेसक्राफ्ट कुछ ऐसी चीजों का पता लगाने के लिए भेजा जा रहा है, जिनसे हम अब तक अनजान हैं। आप चाहें तो इसी स्पेसक्राफ्ट के जरिए अपने नाम को मंगल तक पहुंचा सकते हैं। इसके लिए बस आपको रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

वैसे यह कोई पहली बार नहीं है जब नासा की ओर से मंगल पर नाम भेजने का मौका उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे पूर्व साल 2015 में भी ऐसा हो चुका है। तब स्पेस एजेंसी ने एक सिलिकन चिप पर अपना नाम लिखने के लिए दुनिया भर से लोगों को आमंत्रित किया था। इन सभी नामों को इनसाइट मार्स लैंडर स्पेसक्राफ्ट के साथ जोडा जाएगा।

आपको जानकर हैरत होगी कि 8,27,000 लाख लोग पहले ही अपना नाम लिखने की अर्जी दे चुके हैं। नासा अब दूसरी माइक्रोचिप जोड़ने जा रहा है, जिसके जरिए अपने नाम मंगल पर भेजने का एक और मौका हर आम और खास को दिया जा रहा है।

बता दें कि नासा की तरफ से इनसाइट लैंडर को अगले साल मई में लॉन्च किया जाएगा। इसी के साथ एक सिलिकॉन चिप पर हजारों लोगों के नाम लिखकर भेजे जाएंगे। पहली चिप भर चुकी है, जबकि दूसरी चिप के लिए नासा ने नाम लिखने के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू कर दिए गए हैं। अगर आप भी अपने नाम को मंगल का मुकाम देना चाहते हैं, तो 1 नवंबर से पहले आप भी इसमें रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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