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आखिर शर्मिंदा होना कब सीखेगा पाकिस्तान ?

हरीश साल्वे और उनकी टीम सवा सौ करोड़ देशवासियों की अपेक्षा पर खरी उतरी। उनकी ओर से दी गई दलीलें काम आईं और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव की फांसी पर अंतरिम रोक लगा दी। भारत ने वियना कन्वेंशन के तहत काउंसिलर एक्सेस नहीं दिए जाने का हवाला दिया था और पाकिस्तान ने इस मामले के कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने की दलील दी थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा कि उसे इस मामले में सुनवाई करने का अधिकार है।

देश और दुनिया का ध्यान खींचने वाले इस मामले में अदालत ने भारत की सभी दलीलों को स्वीकार किया है। अदालत ने कहा कि उसके पास इस मामले को सुनने का अधिकार है। अदालत ने ये भी स्वीकार किया कि भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद है और उसे सुनने का अधिकार अदालत को है। अदालत ने माना कि काउंसिलर एक्सेस के मामले में 2008 के समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने भारत को काउंसिलर एक्सेस नहीं दिया, इसलिए अदालत को अंतरिम फैसला देने का हक है।

गौरतलब है कि कुलभूषण का मामला भारत के लिए काफी अलग था और इसमें समय काफी कम था। मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय न्यायलय में ये मामला इसलिए उठाया क्योंकि पाकिस्तान इस पर टाल मटोल कर रहा था। भारत का कहना है कि ये मानवाधिकार का मामला है, जिस पर अब अदालत मामले के मेरिट पर फैसला करेगी।

बहरहाल, अदालत का फैसला आने के बाद पाकिस्तान को अपना रुख बदलना पड़ सकता है। हालांकि इस फैसले के तत्काल बाद उसने जैसी प्रतिक्रिया दी है, वह कहीं से स्वागतयोग्य नहीं। कहने की जरूरत नहीं कि उसे इस मामले में मुंह की खानी पड़ी है और अपनी किरकिरी को वह पचा नहीं पा रहा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पाकिस्तान अभी कुलभूषण पर कोई कार्रवाई नहीं करे और पाकिस्तान के लिए ये फैसला मानना जरूरी है। यही नहीं, पाकिस्तान को ये भी बताना होगा कि इस फैसले पर क्या कदम उठाए गए हैं।

चलते-चलते बता दें कि अंतरराष्ट्रीय अदालत ने फिलहाल ये नहीं देखा कि पाकिस्तान की अदालत का फांसी पर फैसला सही है या नहीं। अदालत को ये भी देखना है कि वियना संधि के तहत काउंसिलर एक्सेस न देने से कुलभूषण के मामले में बचाव का सही मौका मिला या नहीं। हालांकि छुपा कुछ भी नहीं। सारी दुनिया जानती है, सच क्या है। फिर भी अदालत की अपनी मर्यादा और प्रक्रिया होती है, उसका पालन होना ही चाहिए। पर हद तो यह है कि इतना सब होने के बावजूद पाकिस्तान की आंखों में पानी नाम की कोई चीज नहीं। आखिर शर्मिंदा होना कब सीखेगा पाकिस्तान?

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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सरहदों से नहीं बदलता ‘मदर्स डे’ का सार

माँ – वो शब्द जिसे परिभाषित करने में दुनिया की सारी भाषाओं के सारे शब्द और साहित्य व कला की सारी विधाएं खर्च हो जाएं, फिर भी परिभाषा अधूरी रह जाए। संसार का साक्षात ईश्वर, सृष्टि का पर्याय, हमारे अस्तित्व का पहला अध्याय होती है मां। दुनिया के हर बच्चे के लिए सबसे खास, सबसे प्यारा, सबसे गहरा, सबसे नि:स्वार्थ रिश्ता। सच तो यह है कि हमारे जीवन के सारे दिन मां से और मां के  होते हैं, फिर भी मां को सम्मानित करने के लिए एक खास दिन को दुनिया ने ‘मदर्स डे’ का नाम दिया, जो भारत में मई माह के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि अलग-अलग देशों में इस दिन को मनाने की तारीख और इसकी शुरुआत की कहानी भी अलग-अलग है। तो आईये, मदर्स डे के इतिहास में झांकें, इस दिन को सम्पूर्णता में देखें।

मदर्स डे का इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना है। प्राचीन ग्रीक और रोमन इतिहास में मदर्स डे को मनाने के कई साक्ष्य हैं। पुराने समय में ग्रीस में मां को सम्मान देने के लिए पूजा का रिवाज था। कहा जाता है कि स्य्बेले ग्रीक देवताओं की मां थीं और उनके सम्मान में यह दिन त्योहार के रूप में मनाया जाता था। उधर एशिया माइनर के आसपास और रोम में इसे वसंत ऋतु के करीब ‘इदेस ऑफ मार्च’ यानि मां को सम्मान देने के पर्व के रूप में 15 से 18 मार्च तक मनाया जाता था।

यूरोप और ब्रिटेन में मां के प्रति सम्मान दर्शाने की कई परंपराएं प्रचलित हैं। उसी के अंतर्गत एक खास रविवार को मातृत्व और माताओं को सम्मानित किया जाता था, जिसे ‘मदरिंग संडे’ कहा जाता था। इंग्लैंड में 17वीं शताब्दी में 40 दिनों के उपवास के बाद चौथे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता था। इस दौरान चर्च में प्रार्थना के बाद छोटे बच्चे फूल या उपहार लेकर अपने-अपने घर जाते थे। इस दिन सम्मानस्वरूप मां को घर का कोई काम नहीं करने दिया जाता था।

दक्षिण अमेरिकी देश बोलिविया में मदर्स डे 27 मई को मनाया जाता है। यहां मदर्स डे का मतलब कोरोनिल्ला युद्ध को स्मरण करना है। दरअसल 27 मई 1812 को यहां के कोचाबाम्बा शहर में युद्ध हुआ। कई महिलाओं का स्पेनिश सेना द्वारा कत्ल कर दिया गया। ये सभी महिलाएं सैनिक होने के साथ-साथ मां भी थीं। इसीलिए 8 नवंबर 1927 को यहां एक कानून पारित किया गया कि यह दिन मदर्स डे के रूप में मनाया जाएगा।

चीन में भी मदर्स डे काफी लोकप्रिय है। इस दिन वहां उपहार के रूप में गुलनार के फूल खूब बिकते हैं। चीन में 1997 में यह दिन गरीब माताओं की, खासकर उन गरीब माताओं की जो ग्रामीण क्षेत्रों जैसे पश्चिम चीन में रहती हैं, की मदद के लिए निश्चित किया गया था।

जापान में मदर्स डे शोवा युग (1926-1989) में महारानी कोजुन (सम्राट अकिहितो की मां) के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता था। अब इस दिन को लोग वहां अपनी मां के लिए ही मनाते हैं। इसी तरह थाईलैंड में भी रानी के जन्मदिन की तारीख को मदर्स डे की तारीख में बदल दिया गया।

बहाना चाहे जो हो, आज मदर्स डे दुनिया के अधिकांश देशों में मनाया जाता है। जैसे कई कैथोलिक देशों में वर्जिन मेरी डे को तो इस्लामिक देशों में पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा के जन्मदिन को मदर्स डे के रूप में मनाया जाता है। कुछ देश 8 मार्च यानि वुमेंस डे को ही मदर्स डे की तरह मनाते हैं, लेकिन मनाते जरूर हैं। कई देशों में तो मदर्स डे पर अपनी मां का विधिवत सम्मान नहीं करना अपराध की श्रेणी में आता है।

अमेरिका में मदर्स डे की शुरुआत 1870 में जूलिया वार्ड होवे ने की थी। उनका मानना था कि महिलाओं या माताओं को राजनीतिक स्तर पर अपने समाज को आकार देने का सम्पूर्ण दायित्व मिलना चाहिए। आगे चलकर 1912 में मदर्स डे इंटरनेशनल एसोसिएशन बना और एना जॉर्विस (वर्जीनिया) ने मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे घोषित किया। गौरतलब है कि जॉर्विस शादीशुदा नहीं थीं और न ही उनका कोई बच्चा था। उन्होंने अपनी मां एना मैरी रविस जॉर्विस की मृत्यु के बाद उनके प्रति अपना प्यार और सम्मान जताने के लिए इस दिन की शुरुआत की थी। भारत में भी मई के दूसरे रविवार को ही मदर्स डे मनाया जाता है। वैसे यहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गांधी के जन्मदिन को भी मदर्स डे के तौर पर मनाने के उदाहरण देखे जा सकते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अनर्थ होने से पहले चलिए ‘अर्थ डे’ को अर्थ दें

22 अप्रैल को दुनिया ‘अर्थ डे’ के रूप में जानती है। ‘अर्थ डे’ यानि हम सबकी मां पृथ्वी का दिन, जो आज कराह रही है। शायद इस दिन की प्रासंगिकता यही है कि हम उसके कराहने को सुन सकें, समझ सकें, महसूस कर सकें। बहरहाल, पृथ्वी पर मौजूद पेड़-पौधों और दुनिया भर में पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लक्ष्य के साथ 22 अप्रैल 1970 को पहली बार अमेरिका में ‘अर्थ डे’ मनाया गया। इस दिन को मनाने का मकसद था राजनीतिक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण संबंधी नीतियों को अमल में लाने के लिए दबाव बनाना। बीस वर्षों के बाद यानि 22 अप्रैल 1990 को ‘अर्थ डे’ के बीसवें जन्मदिन पर 141 देशों में दो करोड़ से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था। तब से आज तक हर साल इस दिन दुनिया भर में पर्यावरण प्रेमी और सरकारें धरती को बचाने की प्रतिबद्धता दोहराते हैं और एकजुट होते हैं।

जीवन और पर्यावरण को हमेशा से ही एक-दूसरे का पूरक माना जाता है। पर्यावरण के बगैर जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। मानव-जाति के लिए यह पृथ्वी ही सबसे सुरक्षित ठिकाना है लेकिन दुर्भाग्यवश आज इसका अस्तित्व ही संकट में है। अगर समय रहते इसकी रक्षा के लिए उचित कदम नहीं उठाए गए तो इसे बचाना मुश्किल हो जाएगा। प्रश्न उठता है, आखिर ऐसी क्या समस्याएं हैं जिनके कारण आज ‘पृथ्वी दिवस’ मनाने की जरूरत आ पड़ी है। चलिए, जानने की कोशिश करते हैं।

A Drawing on Earth Day By Akshay Deep, Student of class 4th'B', Litera Valley School, Patna
A Drawing on Earth Day By Akshay Deep, Student of class 4th’B’, Litera Valley School, Patna .

सबसे पहले ग्लोबल वार्मिंग। आज ग्लोबल वार्मिंग पूरे विश्व के लिए एक बड़ा और सामाजिक मुद्दा है। सूरज की रोशनी को लगातार ग्रहण करते हुए हमारी पृथ्वी दिनों-दिन गर्म होती जा रही है, जिससे वातावरण में कार्बन-डाई-ऑक्साइड का स्तर बढ़ रहा है। पृथ्वी के तापमान में पिछले सौ सालों में 0.18 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो चुकी है। माना जाता है कि अगर ऐसे ही तापमान में बढ़ोतरी हुई तो 21वीं सदी के अंत तक 1.1-6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर सूखा बढ़ेगा, बाढ़ की घटनाएं बढेंगी और मौसम का मिजाज पूरी तरह बिगड़ जाएगा।

दूसरी बड़ी वजह है ग्रीन हाउस गैसें। ग्रीन हाउस गैसें वातावरण या जलवायु में परिवर्तन और अंतत: ग्लोबल वार्मिंग के लिए उत्तरदायी होती हैं। जिन ग्रीन हाउस गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन होता है उनमें कार्बन-डाई-ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन आदि शामिल हैं। कार्बन-डाई-ऑक्साईड की ही बात करें तो पिछले 15 सालों में ही इसका उत्सर्जन 40 गुना और औद्योगिकीकरण के बाद से 100 गुना बढ़ गया है। ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन आम प्रयोग के उपकरणों, जैसे फ्रिज, कंप्यूटर, स्कूटर, कार आदि से होता है। कार्बन-डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत पेट्रोलियम ईंधन और परंपरागत चूल्हे हैं।

पृथ्वी के संकट का तीसरा बड़ा कारण है पॉलीथीन। सुविधा के लिए बनाई गई पॉलीथीन आज बहुत बड़ा सिरदर्द बन गई है। पॉलीथीन नष्ट नहीं हो सकती और इसके कारण यह धरती की उर्वरक क्षमता को खत्म कर रही है। साथ ही भूगर्मीय जल दूषित हो रहा है। इसको जलाने पर निकलने वाला धुआं ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचाता है, जो कि ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा कारण है। एक आंकड़े के मुताबिक सिर्फ भारत में ही हर साल 500 मीट्रिक टन पॉलीथीन का निर्माण होता है और रीसाइकलिंग एक प्रतिशत से भी कम की हो पाती है।

पृथ्वी के संकट की एक और वजह है हमारी खेती का असंतुलन। आजकल आमतौर पर भूमिविशेष पर एक ही फसल की खेती की जाती है, जो कि अस्थिर पर्यावरण तंत्र को बढ़ावा देती है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई किसान सिर्फ मक्का उपजाता है तो वहां विनाशकारी कीटों को खाने वाले परभक्षियों के लिए कोई स्थान नहीं होगा, जिसकी वजह से कीटनाशकों की जरूरत होगी। इस कारण दुनिया भर में करोड़ों एकड़ कृषि भूमि बेकार हो रही है और हमारी भावी पीढ़ियों के पेट भरने पर भी संकट आ रहा है।

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों को खत्म कर हमने पृथ्वी के संकट को और भी गहरा कर दिया है। आज इस वजह से हमारा मौसम चक्र ही अनियमित हो गया है। पूरी दुनिया में गर्मियां लंबी होती जा रही हैं और सर्दियां छोटी। जलवायु में इस परिवर्तन का असर मनुष्यों के साथ-साथ वनस्पतियों और जीव-जंतुओं पर भी हो रहा है। पेड़-पौधों पर फूल और फल अब समय से पहले लग सकते हैं और पशु-पक्षी अपने क्षेत्रों से पलायन कर दूसरी जगह जा सकते हैं। हर दिन धटती हरियाली और बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण नई समस्याओं को जन्म दे रहा है।

तो ये थी ‘अर्थ डे’ मनाने की चंद बड़ी वजहें। क्या आप पल भर की भी देरी करना चाहेंगे पृथ्वी को बचाने की मुहिम से जुड़ने में। ‘अर्थ डे’ पर केवल रस्म अदायगी न करें। आईये, कुछ सार्थक करें। तभी बच पाएगी हमारी मां पृथ्वी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

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क्या है ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’?

कुख्यात अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिका ने अब तक के सबसे बड़े हथियार का इस्तेमाल किया है। जी हां, अमेरिका ने बीते गुरुवार को अफगानिस्तान के नंगरहार प्रोविंस में अचिन जिले की गुफाओं में (जो कि पाकिस्तान बॉर्डर के पास है) छिपे बैठे आईएसआईएस आतंकियों के खिलाफ सबसे बड़े गैर परमाणु बम जीबीयू-43 का इस्तेमाल किया, जिसमें 90 से ज्यादा आतंकी मारे गए। खास बात यह कि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने इस बम को ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ बताया। आपने भी अखबारों व चैनलों में इस बम के बारे में पढ़ा-सुना होगा और किसी बम के लिए ‘मदर’ संज्ञा के प्रयोग से चौंके भी होंगे। लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि आखिर जीबीयू-43 नाम का ये बम क्यों ‘मदर ऑफ ऑल बम्स है’? चलिए, जानने की कोशिश करते हैं।

जाहिर है, इस सबसे बड़े बम की ऊपर दी हुई तस्वीर आपने देख ही ली होगी, इसीलिए शुरुआत करते हैं इसके वजन से। तो जनाब दिल थाम कर सुनें। इस भीमकाय बम का वजन है 21600 पाउंड यानि 9797 किलो। यह जीपीएस आधारित गैर परमाणु बम है, जिसे अफगानिस्तान में लॉकहीड एमसी-130 एयरक्राफ्ट से गिराया गया। इस बम को अमेरिकी सेना के लिए अल्बर्ट वीमोर्ट ने विकसित किया था।

बता दें कि इस बम का पहला टेस्ट आज से 14 साल पहले 2003 में किया गया था। याद दिला दें कि यह साल इराक युद्ध का था। इसालिए टेस्ट के बाद इस बम को इसी युद्ध के दौरान बना भी लिया गया, लेकिन इसका इस्तेमाल नहीं किया गया। अमेरिकी वायुसेना के अनुसार पिछली बार जब ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ का टेस्ट किया गया था तब 20 मील यानि करीब 32 किलोमीटर दूर से भी एक बड़े मशरूम के आकार का धुआं उठते देखा गया था।

कुल मिलाकर यह कि अपने आकार, वजन और मारक क्षमता के कारण ही जीबीयू-43 ‘मदर ऑफ ऑल बम्स है’। पर बताया जाता है कि अमेरिकी के चिर प्रतिद्वंद्वी रूस ने अमेरिका के इस बम का जवाब देने के लिए ‘फादर ऑफ ऑल बम्स’ विकसित किया है, जो तथाकथित रूप से ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ से चार गुणा ज्यादा शक्तिशाली है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जी हां, भारत की ऋणी है 5जी तकनीक

टेक्नोलॉजी दिन-ब-दिन बदल रही है। अभी हम 3जी से 4जी की ओर कदम बढ़ा ही रहे थे कि 5जी ने दस्तक दे दी। वह दिन दूर नहीं जब 5जी के जरिए सुपरफास्ट इंटरनेट इस्तेमाल किया जा सकेगा। मगर क्या आप जानते हैं कि ये 5जी तकनीक भारत की ऋणी है? जी हां, ये भारत के अमर वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस थे, जिनके 100 साल से भी पहले किए प्रयोगों के कारण दुनिया 5जी से रू-ब-रू हो सकेगी।

30 नवंबर 1858 को मयमन सिंह (अब बांगलादेश में) में जन्मे सर जगदीश चंद्र बोस कलकत्ता यूनिवर्सिटी में भौतिकी की पढ़ाई करने के बाद कैब्रिज यूनिवर्सिटी गए थे। आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि बोस मिलीमीटर वेवलेंग्थ (30 GHz से 300 GHz स्पेक्ट्रम) के जरिए रेडियो का प्रदर्शन करने वाले पहले शख्स थे। उन्होंने 5mm की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे पैदा की थीं जिसकी फ्रिक्वेंसी 60GHz थी। यह उपलब्धि उन्होंने उस वक्त हासिल की थी जब इतनी लो फ्रिक्वेंसी को मापने वाले उपकरण भी ईजाद नहीं हुए थे। बहरहाल, जिन मिलीमीटर तरंगों पर जगदीश चंद्र बोस ने काम किया था, वही आज 5जी तकनीक को विकसित करने में मददगार साबित हो रही है।

बोस की ये मिलीमीटर तरंगें और भी कई रूपों में इस्तेमाल हो रही हैं। रेडियो टेलिस्कोप से लेकर रडार तक में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कारों के कोलिजन वॉर्निंग सिस्टम या क्रूज कंट्रोल में भी इसका प्रयोग होता है। इस महान वैज्ञानिक ने क्रिस्टल रेडियो डिटेक्टर, वेवगाइड, हॉर्न एंटीना जैसे कई उपकरणों का आविष्कार किया था, जिनका इस्तेमाल माइक्रोवेव फ्रिक्वेंसीज में होता है।

JC Bose
JC Bose

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बेंगलुरु में भारत की जीत की होली, ऑस्ट्रेलिया के जबड़े से छीनी जीत

बेंगलुरु टेस्ट के चौथे दिन गेंदबाजों के शानदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 75 रनों से करारी शिकस्त दी। चार टेस्ट मैचों की सीरीज अब 1-1 से बराबर हो गई है। बता दें कि ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए 188 रनों की जरूरत थी और पूरी टीम 112 रनों पर ढेर हो गई। भारत की ओर से आर अश्विन ने विकेटों का छक्का लगाया, जबकि उमेश यादव ने 2 विकेट लिए।

भारत की दूसरी पारी को 274 रनों पर समेटने के बाद सीरीज में लगातार दूसरी जीत के लिए आश्वस्त लग रही ऑस्ट्रेलिया भारतीय गेंदबाजी के आगे एकदम असहाय दिखी। लगा ही नहीं कि ये वही टीम है जिसने अभी-अभी पहले टेस्ट में भारत के विजयरथ को इतने शानदार तरीके से रोका था। अपनी दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया को कभी संभलने का मौका ही नहीं मिला। उसे एक के बाद एक लगातार झटके मिलते रहे। डेविड वॉर्नर (17) और मैट रेनशॉ (5) केवल 22 रन ही जोड़ पाए थे कि ईशांत शर्मा ने रिद्धिमान साहा के हाथों रेनशॉ को कैच आउट कर ऑस्ट्रेलिया का पहला विकेट गिराया। इसके बाद 42 के कुल स्कोर पर अश्विन ने वॉर्नर को एलबीडब्लू आउट किया।

वॉर्नर के आउट होने के बाद मेहमान टीम की पारी को आगे बढ़ाने उतरे कप्तान स्टीव स्मिथ (28) और शॉन मार्श (9) ने तीसरे विकेट के लिए 25 रन जोड़कर टीम को संभालने की कोशिश की, लेकिन उमेश यादव ने 15वें ओवर की अंतिम गेंद पर स्मिथ को एलबीडब्लू कर पवेलियन का रास्ता दिखा दिया। स्मिथ के बाद उमेश ने शॉन को टिकने नहीं दिया और 74 के कुल योग पर वे भी एलबीडब्लू हो गए।

इसके बाद का काम अश्विन ने पूरा किया। मिशेल मार्श (13) को उन्होंने सस्ते में निबटाया, मैथ्यू वेड (0) को खाता तक नहीं खोलने दिया और चाय के बाद मिशेल स्टार्क को बोल्ड कर चलता किया। अब तो बस औपचारिकता ही शेष थी। ऑस्ट्रेलिया की ढहती पारी फिर नहीं की नहीं संभली।

चलने से पहले भारत की दूसरी पारी में चेतेश्वर पुजारा (92), आजिंक्य रहाणे और लोकेश राहुल (51) की शानदार बल्लेबाजी की चर्चा न करें तो ज्यादती होगी। ये ही वे तीन कारीगर थे जिन्होंने जीत की जमीन तैयार की। और हां, ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी में रविन्द्र जडेजा ने अपनी लाजवाब गेंदबाजी से जिस तरह कहर बरपाया उसे आप कैसे भूल सकते हैं!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अमेरिका-29, रूस-37, भारत-104 : अंतरिक्ष में छा गए हम

इसरो ने इतिहास रच दिया। आंध्र प्रदेश स्थित श्रीहरिकोटा स्पेस सेंटर से एक ही रॉकेट से अंतरिक्ष में 104 सैटेलाइट छोड़कर अमेरिका और रूस को कोसों पीछे छोड़ दिया इसरो ने। अभी तक एक साथ सबसे ज्यादा 37 सैटेलाइट छोड़ने का रिकॉर्ड रूस के नाम था। अमेरिका ने एक साथ 29 सैटेलाइट ही लॉन्च किया है और इस तरह वो तीसरे नंबर पर है।

बता दें कि पीएसएलवी-सी-37 कार्टोसैट-2 सीरीज सैटेलाइट मिशन को श्रीहरिकोटा से भारतीय समयानुसार सुबह 9 बजकर 28 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया। पहले 714 किलोग्राम वजन वाले कॉर्टोसैट -2 सीरीज के सैटेलाइट को पृथ्वी पर निगरानी के लिए प्रक्षेपित किया गया। इसके बाद 103 नैनो सैटेलाइट को पृथ्वी से करीब 520 किलोमीटर दूर पोलर सन सिंक्रोनस ऑर्बिट में एक-एक कर प्रविष्ट कराया गया।  सभी सैटेलाइट 28 मिनट बाद 9 बजकर 56 मिनट पर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हो गए।   गौरतलब है कि इन सभी सैटेलाइट को जिस पीएसएलवी-सी-37 रॉकेट से छोड़ा गया, उस रॉकेट का यह 39वां मिशन था।

मंगलयान की कामयाबी के बाद हमारी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता किस कदर बढ़ गई है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसरो की कमर्शियल इकाई ‘अंतरिक्ष’ को लगातार विदेशी सैटेलाइट लॉन्च करने के ऑर्डर मिल रहे हैं। याद दिला दें कि इसरो ने पिछले साल भी जून में एक साथ 20 सैटेलाइट लॉन्च किया था। इन 20 सैटेलाइट समेत इससे पहले 50 विदेशी सैटेलाइट इसरो लॉन्च कर चुका था। इस बार भी जो नैनो सैटेलाइट छोड़े गए हैं उनमें से 101 विदेशी हैं। इसरो के मुताबिक जिन देशों ने अपने सैटेलाइट को इसरो की मदद से अंतरिक्ष में भेजा है उनमें इजरायल, कजाखिस्तान, यूएई के साथ नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और अमेरिका जैसे देश भी शामिल हैं।

बहरहाल, इसरो की बेमिसाल कामयाबी से पूरा देश गौरवान्वित है। स्पेस तकनीक के मामले में यह लगातार नए कीर्तिमान बना रहा है। खास तौर पर कम कीमत पर लॉन्चिंग को लेकर इसने दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों को पीछे छोड़ दिया है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत तमाम बड़ी हस्तियों ने इसरो को उसकी उपलब्धि के लिए बधाई दी है। अमिताभ बच्चन के उद्गार थे – “भारतीय होने पर गर्व है।” जाहिर है आज हर भारतीय यही कहना चाहेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लगातार चौथे टेस्ट सीरीज में दोहरे शतक का ‘विराट’ कारनामा

दिन-ब-दिन और विराट होते जा रहे भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने शुक्रवार को इतिहास रच दिया। उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ हैदराबाद में खेले जा रहे टेस्ट मैच के दूसरे दिन दोहरा शतक जड़कर वो कारनामा कर दिखाया जो क्रिकेट इतिहास में अब तक कोई नहीं कर पाया था। जी हाँ, कोहली अब दुनिया के अकेले ऐसे बल्लेबाज हैं जिसने लगातार चार टेस्ट सीरीज में दोहरे शतक बनाए हों। अपनी इस ऐतिहासिक पारी में कोहली ने 204 रन ठोके और और उनकी इस पारी की बदौलत भारत ने मात्र छह विकेट पर 687 रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया। गौरतलब है कि टेस्ट क्रिकेट में भारत का यह पांचवां सर्वोच्च स्कोर है और इस स्कोर के साथ भारतीय टीम लगातार तीन पारियों में 600 से ज्यादा रन बनाने वाली दुनिया की इकलौती टीम बन गई है।

फिलहाल बात विराट कोहली के डबल सेंचुरी के अद्भुत ‘चौके’ की। शुक्रवार को बांगलादेश के खिलाफ खेले जा रहे एकमात्र टेस्ट के दूसरे दिन कोहली ने अपने ओवरनाइट स्कोर 111 से आगे खेलना शुरू किया और लंच के बाद अपना चौथा शतक पूरा किया। इस दौरान क्रिकेट के इस 28 वर्षीय ‘करिश्मे’ ने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। 204 रनों के साथ ही कोहली होम सीजन में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज भी बन गए। ऐसा करते हुए उन्होंने वीरेन्द्र सहवाग का रिकॉर्ड तोड़ा।

बहरहाल, कोहली का यह दोहरा शतक क्या मायने रखता है इसका अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि अपनी इस उपलब्धि के साथ उन्होंने सर डॉन ब्रैडमैन और राहुल द्रविड़ का रिकॉर्ड तोड़ दिया जिन्होंने लगातार तीन टेस्ट सीरीज में तीन दोहरे शतक लगाए थे।

याद दिला दें कि कोहली ने अपना पहला दोहरा शतक वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले टेस्ट में बनाया था। इस मैच में उन्होंने 200 रन बनाए थे। इसके बाद न्यूजीलैंड के खिलाफ इंदौर में उन्होंने 211 रन बनाए। उनका तीसरा दोहरा शतक (235 रन) इंग्लैंड के खिलाफ था और अब बांग्लादेश के खिलाफ 204 रनों की ये यादगार पारी।

टेस्ट क्रिकेट में चार दोहरे शतक के साथ कोहली ने सुनील गावस्कर की चार डबल सेंचुरी की बराबरी भी कर ली। वैसे भारत की ओर से सचिन और सहवाग ने सर्वाधिक 6-6 दोहरे शतक बनाए हैं, जबकि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा 12 दोहरे शतक डॉन ब्रैडमैन के नाम हैं। पर महज 28 साल के कोहली के रनों का जैसा तूफानी सिलसिला चल रहा है, कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर ये धाकड़ बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन के दोहरे शतकों का रिकॉर्ड भी तोड़ दे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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प्रवासियों के बिना आप अमेरिका को नहीं पहचानेंगे !

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सात मुस्लिमबहुल देशों – सीरिया, सूडान, इराक, ईरान, सोमालिया, यमन और लीबिया – के प्रवासियों और शरणार्थियों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगा दी है। ट्रंप की ओर से जारी आदेश के अनुसार सीरियाई शरणार्थियों के अमेरिका आने पर अनिश्चित काल के लिए रोक लग गई है, जबकि अन्य छह देशों के शरणार्थियों पर 120 दिनों तक रोक रहेगी। और तो और इन देशों के सामान्य नागरिकों को भी 90 दिनों तक अमेरिकी वीजा नहीं मिलेगा। उनके इस फैसले का अमेरिका समेत दुनिया भर में विरोध हो रहा है।

ट्रंप का यह फैसला निहायत हैरतअंगेज है। साथ ही हास्यास्पद और आत्मघाती भी। कारण यह कि जिस अमेरिका के तथाकथित हित के लिए उन्होंने यह विवादास्पद कदम उठाया है, वो अमेरिका आज महाशक्ति न कहलाता अगर वहां प्रवासी न होते। आपको आश्चर्य होगा कि अमेरिका की जो हस्तियां आज वहां की पहचान बन चुके हैं, उनमें से अधिकतर प्रवासी ही हैं। ऐसी हस्तियों की फेहरिस्त खासी लंबी है। फिलहाल यहां चर्चा कुछ चुनिंदा लोगों की।

शुरुआत करते हैं ऐपल के स्टीव जॉब्स से। स्टीव जॉब्स मूलत: सीरिया के रहने वाले मुसलमान अब्दुल फतह जंदाली और जर्मन प्रवासी महिला कैरोले शिबेल की संतान थे। यही नहीं, ऐपल की स्थापना में एक और स्टीव – स्टीव वोज्नियाक – का योगदान था और वे भी जॉब्स की तरह यूक्रेनी प्रवासी के बेटे थे। इसी तरह दिग्गज अमेरिकी कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी कंपनी ओरेकल के सह-संस्थापक लैरी इलिससन इटली के एक प्रवासी के जैविक बेटे थे। उन्हें अविवाहित यहूदी महिला ने जन्म दिया था।

अब बात करते हैं गूगल की। रूस में जन्मे सेरगे ब्रिन ने लैरी पेज के साथ मिलकर दुनिया के इस सबसे बड़े सर्च इंजन की स्थापना की थी। वे फिलहाल गूगल की पैरंट कंपनी अल्फाबेट के प्रेसिडेंट हैं। और जनाब, गूगल के मौजूदा सीईओ सुंदर पिचाई को तो आप जान ही रहे होंगे। भारतीय मूल के पिचाई ने आईआईटी खड़गपुर से बीटेक किया था और 2015 में वे गूगल के सीईओ बने थे।

अगर आप सोच रहे हैं कि ये सूची खत्म हो गई है तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अभी तो कई महारथी बाकी हैं। अब अमेरिका की दिग्गज ऑटोमेकर और एनर्जी स्टोरेज कंपनी टेस्ला के फाउंडर एलन मस्क को ही लीजिए। मस्क दक्षिण अफ्रीका में जन्मे थे और कनाडा से अमेरिका प्रवासी के तौर पर आए थे। इसी तरह विश्वप्रसिद्ध ई-कॉमर्स और ऑक्शन साइट ई-बे के संस्थापक पियरे ओमिड्यार मूलत: ईरान के थे और यू-ट्यूब के सह-संस्थापक स्टीव चेन का जन्म ताइवान में हुआ था। फेसबुक के सह-संस्थापकों में एक एडुअर्डो सेवरिन भी ब्राजीली प्रवासी हैं।

थोड़ा पीछे चलकर देखें तो बैंक ऑफ अमेरिका के संस्थापक एमेडियो गियान्निनी के माता-पिता इटली के प्रवासी नागरिक थे। इसी तरह दुनिया की दिग्गज विमानन कंपनियों में से एक बोइंग एयरोस्पेस की स्थापना करने वाले विलियम बोइंग ऑस्ट्रिया और जर्मनी से आए प्रवासियों की संतान थे। दुनिया की दिग्गज कंप्यूटिंग कंपनियों में एक इंटल के संस्थापक एंड्रयू ग्रो, जिनका पिछले साल देहांत हुआ, हंगरी से आकर अमेरिका में बसे थे।

सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि प्रवासियों पर रोक लगाने का फैसला सुनाने वाले ट्रंप स्वयं स्कॉटिश महिला और जर्मन मूल के पिता की संतान हैं। उऩके ग्रैंडपैरेंट्स जर्मनी के कालस्टैड शहर से अमेरिका गए थे। यही नहीं, बराक ओबामा – ट्रंप से ठीक पहले लगातार आठ वर्षों तक व्हाइट हाउस जिनका पता रहा था – के पिता भी केन्याई मूल के मुस्लिम थे, जबकि उनकी मां अमेरिकी ईसाई थीं।

अब आप ही बतायें, क्या इन प्रवासियों के बिना अमेरिका की कल्पना भी की जा सकती है? कहने की जरूरत नहीं कि ट्रंप ने अगर समय रहते अपनी भूल नहीं सुधारी तो अमेरिका की पहचान ही संकट में पड़ जाएगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अबु धाबी के शहजादे ने कहा भारत जैसा कोई नहीं

गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत आए अबु धाबी के शहजादे शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान भारत के मुरीद हो गए। गणतंत्र दिवस परेड की भव्यता, भारत का समृद्ध अतीत और वर्तमान की उपलब्धियां, भारत की मेहमाननवाजी और भारतीय संस्कारों में बसे हमारे मूल्य – अल नाहयान कहने को बाध्य हो गए कि भारत जैसा कोई नहीं। गौरतलब है कि अल नाहयान राजपथ पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य गणमान्य हस्तियों के साथ मुख्य परेड के गवाह बने थे। उन्होंने गणतंत्र दिवस समारोह को ‘विविधता में एकता का जश्न’ की संज्ञा दी और कहा कि भारत ने इसके माध्यम से दुनिया को मानवता का संदेश दिया है।

अबु धाबी के शहजादे ने अपने औपचारिक ट्विटर अकाउंट एमबीज़ेड न्यूज पर कहा है कि मैं भारतीय लोगों के साथ गणतंत्र दिवस समारोह में शरीक होकर बहुत खुश हूँ और सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस समारोह में यूएई की भागीदारी हमारे रिश्तों की गहराई को दर्शाती है जो आपसी सम्मान और समान हितों पर आधारित है। बता दें कि भारत के इस 68वें गणतंत्र दिवस परेड के मौके पर यूएई सेना की टुकड़ी ने भी अपने देश के ध्वज के साथ हिस्सा लिया जिसमें उनका संगीत बैंड शामिल था। इस टुकड़ी में कुल 149 जवान थे जिनमें 35 संगीतकार हैं।

बता दें कि अबु धाबी के शहजादे अल नाहयान दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो गए हैं जिन्हें भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि का दर्जा दिया गया है। पिछले साल गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद थे, जबकि साल 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुख्य अतिथि थे। इसी तरह साल 2014 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे और 2013 में भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक मुख्य अतिथि थे। भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने वाले नेताओं में निकोलस सरकोजी, ब्लादीमिर पुतिन, नेल्सन मंडेला, जॉन मेजर, मोहम्मद खातमी, याक शिराक आदि प्रमुख रहे हैं।

इस साल गणतंत्र दिवस का एक बड़ा आकर्षण यह भी रहा कि इस अवसर पर दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज खलीफा को एलईडी प्रकाश के माध्यम से तिरंगे के रंग से रंगा गया। भारत-यूएई के प्रगाढ़ संबंधों के साथ-साथ इसे विश्व-मंच पर भारत के बढ़ते कद की स्वीकृति कहना भी अनुचित नहीं होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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