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बिहार को बहुत जल्द विशेष पैकेज की सौगात!

राजनीति की उठापटक अपनी जगह है और राज्य व देश का हित अपनी जगह। उसे हर हाल में अक्षुण्ण रखना चाहिए। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसी सोच के कारण महागठबंधन छोड़ने और एनडीए के साथ सरकार बनाने का बड़ा निर्णय लिया था। उनके उस निर्णय का सुखद परिणाम अब सामने आने जा रहा है। जी हां, बिहार को बहुत जल्द केन्द्र से 1.25 लाख करोड़ का विशेष पैकेज मिलने जा रहा है। बता दें कि इस पैकेज की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनाव के समय की थी, लेकिन भाजपा की करारी हार के बाद विशेष पैकेज की बात ठंडे बस्ते में चली गई थी।

गौरतलब है कि नीतीश ने पिछले सप्ताह ही दिल्ली में प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें उनके वादे की याद दिलाई थी। दरअसल नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि एनडीए के विरुद्ध जनादेश लेने के बाद फिर उसी के साथ सरकार बनाने के निर्णय को वे तभी सही ठहरा सकते हैं जब बिहारवासियों से किया वादा वे पूरा करें। अपने हाल के निर्णय में उन्होंने राजधर्म और राज्यधर्म को महागठबंधन-धर्म पर तरजीह दी जिसे बिहार को मिलने जा रही इस सौगात से निश्चित रूप से नैतिक बल मिलेगा।

वैसे देखा जाए तो जिस दिन बिहार में जेडीयू-एनडीए की सरकार बनी, उसी दिन से विशेष पैकेज मिलने की उम्मीद बढ़ गई थी। लेकिन ये खुशखबरी इतनी जल्दी मिलेगी इसकी उम्मीद नहीं थी। इन दिनों बाढ़ की विभीषिका झेल रहे बिहार के लिए ये सचमुच राहत की ख़बर है।

चलते-चलते बता दें कि जहां मोदी-नीतीश मिलकर बिहार से किये वादे पर अमल करने जा रहे हैं वहीं जेडीयू एनडीए में शामिल होने की विधिवत घोषणा भी शीघ्र करने जा रही है। यही नहीं, जेडीयू केन्द्र सरकार में भी शामिल होगी और ख़बर यह भी है कि नीतीश एनडीए के संयोजक हो सकते हैं। भारतीय राजनीति के दो शिखरपुरुषों के एक साथ आने से बिहार के विकास का हर अवरुद्ध मार्ग खुलेगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदीविरोध के ‘तवे’ पर पाकिस्तान की ‘रोटी’

सच से पुराना बैर है पाकिस्तान का। भारत के खिलाफ अपनी भोली जनता की भावनाएं भड़का कर ‘रोटी’ सेकना कोई उससे सीखे। हालांकि पाकिस्तान के लिए ये कोई नई बात नहीं, पर ताजा मामले में तो ‘मर्यादा’ की हर सीमा ही लांघ दी उसने। जी हाँ, पाकिस्तान की पंजाब असेंबली ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। चौंक गए ना? अब जरा कारण भी जान लें। शायद आपको स्मरण हो कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण के दौरान बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि वहाँ और पीओके के लोगों ने उनकी समस्या उठाने के लिए उनको धन्यवाद ज्ञापित किया है। बस यही बात पाकिस्तान को चुभ गई। वहाँ की पंजाब असेंबली को ये बात इतनी नागवार गुजरी कि उसने पाकिस्तान की संघीय सरकार से इस मामले को संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की अपील की है।

गौरतलब है कि पंजाब प्रांत की असेंबली में वहाँ के कानून मंत्री राणा सनाउल्लाह ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया और यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास भी हो गया। प्रस्ताव में कहा गया कि सदन बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान पर मोदी के बयानों की कड़ाई से निन्दा करता है। सदन ने कहा कि पाकिस्तान की संघीय सरकार को चाहिए कि इस मामले को संयुक्त राष्ट्र समेत दूसरे अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाए। विश्व को यह बताने की जरूरत है कि मोदी सरकार पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है।

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के विधायक खुर्रम वाट्टू ने तो दो कदम आगे बढ़कर सदन से यहाँ तक कहा कि भारत से व्यापारिक संबंध तोड़ने के लिए संघीय सरकार से गुजारिश की जाए। वहीं पंजाब असेंबली में विपक्ष के नेता राशिद ने आरोप लगाया कि मोदी का बयान उनकी असहिष्णुता की नीति और दूसरे राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को दर्शाता है।

यहाँ गौर करने की बात ये है कि भारत-विरोध के नाम पर पाकिस्तान की तमाम पार्टियां कुल मिलाकर एक ही राग अलापती हैं। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो चुके पाक के जिस्म पर ना जाने कितने ‘पैबंद’ लगे हैं, जिन्हें जनता की नज़रों में जाने से रोकने के लिए पाक का राजनीतिक और सैनिक नेतृत्व प्रारम्भ से बस भारत-विरोध का झंडा उठाता आया है। वैसे सच कहा जाय तो जहाँ ‘हाफिज सईद’ जैसों को पलकों पर रखा जाता हो वहाँ नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने पर हमें आश्चर्य होना ही नहीं चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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तो क्या गाय सचमुच केवल दूध देती है, वोट नहीं ?

लालू तंज कसने में कभी नहीं चूकते, बस मौका मिलना चाहिए। और जब सामने प्रधानमंत्री मोदी हों तो कहना ही क्या। अब जबकि छोटे भाई नीतीश के लिए उनका सत्रह साल पुराना ‘प्रेम’ फिर से जग गया है, कांग्रेस से भी ‘अपनापा’ है, मांझी पर ‘डोरे’ ही डालने में लगे हैं और रामविलास समेत बाकी लोगों की खास चिन्ता उन्हें है नहीं, तो बचता भी कौन है भाजपा और नरेन्द्र मोदी के सिवा। हाँ, नेता तो प्रदेश भाजपा के भी कई हैं लेकिन उन्हें ना तो लालू और ना नीतीश तंज कसने के ‘लायक’ मानते हैं।

बहरहाल, ताजा मामला प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान से जुड़ा है जिसमें उन्होंने कहा था कि गाय की रक्षा के नाम पर असामाजिक तत्व अपनी दुकान चला रहे हैं। राजद सुप्रीमो ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि आखिरकार मोदीजी को ये बात समझ आ गई कि गाय दूध देती है, वोट नहीं।

बता दें कि कल प्रधानमंत्री ने गोरक्षा के नाम पर गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई के संदर्भ में बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि गोरक्षा के नाम पर असामाजिक तत्व अपनी दुकान चला रहे हैं। ऐसे लोगों पर उन्हें गुस्सा आता है। कुछ लोग पूरी रात एंटी सोशल एक्टिविटी करते हैं लेकिन दिन में गोरक्षक का चोला पहन लेते हैं। उन्होंने राज्य सरकारों कहा कि ऐसे जो स्वयंसेवी निकले हैं उनका जरा डोजियर तैयार करें, इनमें से 70-80 फीसदी एंटी सोशल एलिमेंट निकलेंगे।

इतना सुनना था कि लालू ने बिना देर किए अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा – “नागपुर वालों, यह सत्य की विजय और पाखंड की पराजय है। लगता है मेरे द्वारा दो दिन पहले कही गई बात मोदीजी को अच्छे से समझ में आ गई कि गाय दूध देती है, वोट नहीं।“ लालू ने आगे लिखा – “गौमाता इनकी सरकार बनवाना तो दूर, बनी बनाई सरकारों को हिला रही है। ये हमारी जीत और उनकी हार है।“

लालू आखिर लालू ठहरे। वो इतने पर भी नहीं रुके। उन्होंने ये भी कह डाला कि “गौमाता के नाम पर बेवकूफ बनाने चले थे, अब दाँव उल्टा पड़ गया तो भाषा बदल रही है।… आप लोग बिहार चुनाव में कैसे बड़े-बड़े विज्ञापन निकालते थे। ये उन विज्ञापनों की पराकाष्ठा थी कि चुनाव में दाल नहीं गली। हाँ, अब आपका दल जरूर गल जाएगा।”

बिहार चुनाव में महागठबंधन को और खासकर लालूजी की पार्टी को जैसी सफलता मिली उसे देखते हुए लालू अगर कह रहे हैं कि बिहार चुनाव में भाजपा की दाल नहीं गली तो गलत भी नहीं कह रहे लेकिन फिलहाल दिन-ब-दिन ‘बड़ी’ होती भाजपा के लिए गल जाने की बात हजम नहीं होती। लालूजी और उनके छोटे भाई अक्सर भूल जाते हैं कि बिहार से बाहर जहाँ और भी हैं। और हाँ, लालूजी से ये पूछना भी बनता है कि क्या उनके गठबंधन, उनके दल और खास तौर पर उनके लिए क्या सचमुच ‘गाय’ ने केवल दूध ही दिया है अब तक, कभी वोट नहीं दिलाए..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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जीएसटी : अब तक का सबसे ‘बड़ा’ और ‘कड़ा’ आर्थिक सुधार

सालों लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार कल राज्य सभा में जीएसटी बिल पास हो गया। कुछ सुझावों और शंकाओं के बावजूद कांग्रेस समेत अन्य दलों के समर्थन के बाद जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (वस्तु एवं सेवा कर) को लागू करने के लिए जरूरी संविधान संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग गई। यह अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा आर्थिक सुधार है क्योंकि इससे पूरे देश में एक समान कर लगेगा। बता दें कि राज्य सभा से बिल पास हो जाने पर अब केन्द्र सरकार इस पर लोकसभा की सहमति जुटाएगी। इसके बाद कई और विधायी प्रक्रिया प्रक्रिया पूरी करनी होंगी और नियम-कानून को अंतिम रूप देना होगा। तब कहीं जाकर ये बिल अगले साल एक अप्रैल से व्यावहारिक धरातल पर उतर पाएगा।

बहरहाल, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स केन्द्र और राज्यों के 20 से ज्यादा अप्रत्यक्ष करों की जगह लेगा। इसके लागू होने पर एक्साइज, सर्विस टैक्स, एडिशनल कस्टम ड्यूटी, वैट, सेल्स टैक्स, मनोरंजन कर, लग्जरी टैक्स और ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स जैसे कई टैक्स खत्म हो जाएंगे। पूरे देश में एक समान टैक्स लागू होने से कीमतों का अंतर घटेगा।

सरकार और उद्योग जगत दोनों का ही मानना है कि जीएसटी लागू होने से पूरे देश में कारोबार करना आसान होगा, जिससे जीडीपी में कम-सेकम दो प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। पर जीएसटी से जुड़ा एक और पहलू महंगाई का है जिसे नज़रअंदाज करना मुश्किल है। सच ये है कि पूरी दुनिया में जब भी किसी क्षेत्र में समान बिक्री कर लागू किया गया वहाँ थोड़े समय के लिए महंगाई बढ़ी। भारत में भी इससे महंगाई बढ़ेगी ये तयप्राय है। हालांकि सरकार ने पेट्रोल-डीजल, बिजली और शराब को फिलहाल जीएसटी से अलग रखकर महंगाई बढ़ने की सम्भावना को यथासंभव कम करने की कोशिश की है। इसलिए शुरुआत में इसका सबसे अधिक असर सेवाओं पर होगा।

देखा जाय तो जीएसटी अभी तक संसद में एक तकनीकी बहस का मुद्दा भर रहा है लेकिन पास होने के बाद ये सड़क पर एक राजनीतिक मुद्दा बनेगा। खास कर तब जब केन्द्र की मोदी सरकार महंगाई को काबू में रखने और राज्यों की अपेक्षा पूरी करने में असफल होगी। कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम पहले ही कह चुके हैं कि अगर टैक्स की दरें 18 प्रतिशत से अधिक रहीं तो सड़क पर विरोध किया जाएगा।

सच तो ये है कि 18 प्रतिशत की दर भी बहुत सारी चीजों को महंगा बना देगी, जैसे बाहर खाना, फोन बिल, सिनेमा और इसी तरह की कई सेवाएं। कहने की जरूरत नहीं कि ये सारी चीजें उच्च मध्यवर्ग को सीधे चुभेंगी और समग्र महंगाई में योगदान करेंगी सो अलग। आने वाले समय में जीएसटी भारत का एक विवादित विषय बन जाए तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं। लेकिन फिलहाल वित्त मंत्री अरुण जेटली और सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी के लिए इस साहसिक कदम पर बधाई तो बनती ही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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भारत को नहीं मिली एनएसजी की सदस्यता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अथक प्रयास और अमेरिका समेत ज्यादातर देशों के समर्थन के बावजूद एनएसजी (परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह) में भारत की एंट्री नहीं हो पाई। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप को कहना ही पड़ा कि ‘एक देश के अड़ियल रवैये’ की वजह से भारत की कोशिश नाकाम हो गई। कहने की जरूरत नहीं कि वो ‘अड़ियल देश’ हमारा पड़ोसी चीन है। बहरहाल, आज सियोल में एनएसजी की दो दिवसीय वार्षिक बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भारत की सदस्यता के लिए नियमों में छूट नहीं दी जाएगी।

एनएसजी ने आज के अपने बयान में साफ तौर पर कहा कि एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) अन्तर्राष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था की धुरी है और वह इसके पूर्ण और प्रभावी क्रियान्वयन का समर्थन करता है। हाँ, इस बैठक में इस बात पर सहमति जरूर बनी कि एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले देशों को इस समूह में शामिल करने के मुद्दे पर बातचीत जारी रहेगी। बता दें कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए एनपीटी पर हस्ताक्षर किए बिना एनएसजी की सदस्यता चाहता है।

बहरहाल, चीन ने एनएसजी में भारत का रास्ता रोकने में केन्द्रीय भूमिका निभाई। भारतीय उपमहाद्वीप में अपना वर्चस्व बनाने के लिए चीन की हर संभव कोशिश रही है कि भारत को एनएसजी की सदस्यता नहीं मिले। इस संदर्भ में अपने भारतविरोधी अभियान के तहत निर्लज्ज चीन यहाँ तक कहता रहा है कि अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है तो पाकिस्तान को भी सदस्यता मिले। जी हाँ, चीन ने उस पाकिस्तान की वकालत की जिसकी पहचान आतंकवाद को प्रश्रय और आतंकियों को आश्रय देने वाले देश के रूप में जगजाहिर हो चुकी है। हालांकि ये अलग बात है कि एनएसजी में पाकिस्तान की एंट्री को लेकर कोई चर्चा ही नहीं हुई।

भारत को एनएसजी की सदस्यता ना मिलना नि:संदेह निराशाजनक है लेकिन सम्भावनाओं के सारे द्वार बंद हो गए हों, ऐसा नहीं है। चीन, ब्राजील, ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड, आयरलैंड और तुर्की जैसे कुछ देशों को छोड़ दें तो शेष देश आज कमोबेश भारत के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं जिनमें अमेरिका, फ्रांस, जापान और मैक्सिको जैसे देश शामिल हैं। निश्चित रूप से इसे भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। हाल के वर्षों में भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जैसी हैसियत बनाई है और एनएसजी की आज की बैठक के बाद जो माहौल बना है उसे देखते हुए भारत का रास्ता अधिक समय तक रोके रखना चीन के बूते में नहीं दिखता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बड़ी दिलचस्प है अमिताभ और शाहरुख के साथ मोदी की ये ‘जंग’

नरेन्द्र मोदी… यानि आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी के ‘पर्याय’, भारत के प्रधानमंत्री, विश्व के बड़े राजनेताओं में शुमार… पर ये परिचय पर्याप्त नहीं लगता इनके लिए। सत्ता के शीर्ष पर कोई शख्स पहली बार नहीं पहुँचा है, लोकप्रियता या विश्व भर में चर्चा भी किसी ने पहली बार हासिल की हो ऐसी बात नहीं, तो फिर क्या वजह है कि कोई भी परिचय पर्याप्त नहीं लगता इनके लिए..? चलिए आज की ख़बर और उसके विश्लेषण से इसका जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं।

ख़बर ये है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर फॉलोअर्स की संख्या के लिहाज से बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख खान को पीछे छोड़ दिया है। कल यानि 16 जनवरी को मोदी के फॉलोअर्स की संख्या 1 करोड़ 73 लाख 71 हजार 600 थी, जबकि शाहरुख के 1 करोड़ 73 लाख 51 हजार 100 फॉलोअर्स थे। शाहरुख को पीछे छोड़ने के साथ ही मोदी ट्विटर पर दूसरे सबसे ज्यादा फॉलोअर वाले भारतीय बन गए हैं। उनसे आगे केवल ‘सदी के महानायक’ अमिताभ बच्चन हैं। अमिताभ के फॉलोअर्स की संख्या करीब 1 करोड़ 89 लाख है।

मोदी ने ट्विटर का बड़ा रचनात्मक उपयोग किया है। इसकी मदद से उन्होंने ना केवल ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्वच्छ भारत’ और ‘सेल्फी विद डॉटर’ जैसे अभियानों को आगे बढ़ाया बल्कि देश के आम नागरिकों के साथ सीधा सम्पर्क भी स्थापित किया। उनके ट्विटर अकाउंट पर फॉलोअर्स की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले साल 22 नवंबर को उनके फोलाअर्स की संख्या डेढ़ करोड़ को पार कर गई थी। उसके बाद 20 नवंबर को यानि दो महीने से भी कम समय में उनके फॉलोअर्स की संख्या 1 करोड़ 60 लाख से अधिक हो गई। इस बार यानि 16 जनवरी को और भी कम समय में उनके फॉलोअर्स की संख्या में 10 लाख से ज्यादा वृद्धि हुई है।

नरेन्द्र मोदी ट्विटर पर 2009 से सक्रिय हैं। भारतीय नेताओं में उनके फॉलोअर्स की संख्या सर्वाधिक है। पूरी दुनिया के नेताओं की बात करें तो उनसे आगे केवल अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा हैं। देखा जाय तो मोदी के प्रति लोगों का ये आकर्षण अकारण नहीं है। सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हो रही पीढ़ी ने स्टेट्समैन की ‘गरिमा’ के साथ एक फिल्मस्टार-सा ‘ग्लैमर’ किसी में देखा तो वो नरेन्द्र मोदी हैं। लोकप्रिय होना या और चर्चा में रहना एक बात है लेकिन आम से लेकर खास तक की दिनचर्या में जिस तरह मोदी शामिल हो गए हैं उस तरह पिछले दो-तीन दशकों में कोई शामिल नहीं हुआ। उससे भी बड़ी बात ये कि भारत की राजनीति के केन्द्र में ‘व्यक्ति’ पहले भी रहे लेकिन मोदी से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि उस ‘व्यक्ति’ के कद के मुकाबले में कोई दूर-दूर तक ना दिखे – पक्ष और विपक्ष दोनों को मिलाकर भी।

आज अखबारों और पत्रिकाओं के साथ-साथ सैकड़ों चैनल, लाखों साइट्स और करोड़ों स्मार्टफोन की नज़र आप पर होती है। अनगिनत आँखों की मौजूदगी में भी आप ना केवल खुद को ‘साबित’ कर रहे हों बल्कि आपके कद में इजाफा भी हो रहा हो तो ये उपलब्धि ‘असाधारण’ कही जाएगी। एक बात और। ट्विटर और फेसबुक के ज्यादातर यूजर्स 18 से 25 साल के हैं और उन्हें लुभाने और भरमाने को हजारों चीजें हैं इंटरनेट पर, फिर भी 65 साल का कोई पॉलिटिशियन अमिताभ और शाहरुख से ना केवल होड़ लेता है बल्कि उनमें से एक को पीछे छोड़ देता है और दूसरे को भी पीछे छोड़ने की तैयारी में दिखता है तो ये सचमुच बड़ी बात है। जिस रफ्तार से इस करिश्माई राजनेता के फॉलोअर्स बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए हो सकता है अगले कुछ महीनों में ट्विटर पर वो शीर्ष पर हों। नरेन्द्र मोदी ने राजनीति में कई जंगें लड़ी हैं और जीती हैं लेकिन इस ‘जंग’ और इसमें जीत के अलग मायने हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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