डोर टू डोर कैंपेन में एईएस और जेई की भी जानकारी लें: मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि कोरोना संक्रमण को लेकर चलाए जा रहे डोर टू डोर कैंपेन में चमकी बुखार (एईएस) और जेई के संबंध में भी जानकारी लें। आशा एवं आंगनबाड़ी कर्मी घर-घर जाकर लोगों को यह जरूर बताएं कि एईएस का लक्षण दिखने पर बच्चे को तुरंत अस्पताल ले जाएं। मुजफ्फरपुर के पांच प्रखंड एईएस से अधिक प्रभावित रहे हैं वहां स्कूलों में मिलने वाले मध्याह्न भोजन में 200 ग्राम दूध पाउडर भी उपलब्ध कराएं। अस्पतालों में चिकित्सक चौबीस घंटे उपलब्ध रहें। वाहनों की गांव के हिसाब से टैगिंग की जाए तथा अस्पताल पहुंचने पर उनके तत्काल भुगतान की व्यवस्था की जाए। उन्होंने अधिकारियों को जेई का पूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित कराने का आदेश भी दिया।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री मंगलवार, 28 अप्रैल को 1, अणे मार्ग में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग एवं संबंधित जिलों के डीएम के साथ एईएस और जेई की रोकथाम को लेकर किए जा रहे कार्यों की उच्चस्तरीय समीक्षा कर रहे थे। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय कुमार ने कहा कि एसओपी बनाकर पूरी तैयारी की गई है। 30 अप्रैल तक एसकेएमसीएच में 65 बेड का एईएस वार्ड बनकर तैयार हो जाएगा। इसके अतिरिक्त अलग से बन रहे पैडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट के 100 बेड में से 70 बेड इस माह के अंत तक पूरे हो जाएंगे।
समीक्षा बैठक में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय एवं मुख्य सचिव दीपक कुमार समेत कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद थे।

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मधेपुरा में कोरोना की दस्तक ने डीएम-एसपी की नींद कर दी हराम

बिहार की नीतीश सरकार ने 17 मार्च 2020 (मंगलवार) को कोरोना को महामारी घोषित कर दी थी… तब से अब तक मधेपुरा जिले में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। जिले के सभी समुदायों के लोगों द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग… से लेकर लाॅकडाउन के दरमियान घर में रहने जैसे सारे निर्देशों के पालन किए जाते रहे और सभी सुरक्षित भी रहे। परंतु 24 अप्रैल (शुक्रवार) को जिले के बिहारीगंज प्रखंड के मोहनपुर पंचायत के रहटा गांव की एक 46 वर्षीय महिला अचानक कोरोना पॉजिटिव हो गई जिसके साथ ही मधेपुरा जिला के डीएम नवदीप शुक्ला सहित एसपी संजय कुमार की पूरी टीम की चिंता बढ़ गई और नींद हराम हो गई।

बता दें कि रहटा के इस महिला को 19 अप्रैल को पेट में दर्द हुआ तो उसे बिहारीगंज पीएचसी (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) लाया गया तथा वहां से उदाकिशुनगंज रेफरल अस्पताल भेज दिया गया। जहां उदाकिशुनगंज से उस महिला को भागलपुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया वहीं डीएम मधेपुरा ने एडीएम उपेंद्र कुमार को एहतियात के तौर पर समस्त कार्यों की निगरानी का जिम्मा सौंप दिया।

जानिए कि कोरोना समर्पित हॉस्पिटल होने के बावजूद भागलपुर मेडिकल कॉलेज ने उस महिला का ना तो कोरोना टेस्ट का सैंपल लिया और ना एंबुलेंस उपलब्ध कराया जबकि कोरोना के कुछ प्रारंभिक लक्षण रहने के बावजूद उसे कैंसर रोगी मानकर पटना आईजीआईएमएस कैंसर संस्थान रेफर कर दिया गया। परंतु एंबुलेंस नहीं मिलने के कारण महिला अपने परिजनों सहित बिहारीगंज अपने घर वापस आ गई जबकि महिला बीते कई माह से गॉलब्लैडर कैंसर से पीड़ित थी और कई डॉक्टरों से भी दिखाती रही थी। घर लौटने पर दर्जनों लोग महिला के संपर्क में आए भी।

यह भी जानिए कि गांव का ही एक ऑटो 22 अप्रैल को किराए पर लेखकर पटना गई। 23 अप्रैल को आईजीआईएमएस गई तो वहां सर्वप्रथम उसका कोरोना सैंपल लिया गया और 24 अप्रैल को उसकी कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आई। अब सवाल यह उठता है कि संक्रमण के खतरे के घेरे में कौन-कौन लोग आते हैं उनकी सूची कैसे तैयार होगी ? फिलहाल रहटा गांव के 3 किलोमीटर के एरिया को कंटेनमेंट जोन घोषित कर सील कर दिया गया है। इस क्षेत्र में इस तरह की बैरिकेडिंग की गई है और पुलिसिंग भी कि ना कोई रहटा गांव के अंदर आ पाएगा और ना ही कोई बाहर जा पाएगा। आवश्यक सामग्रियों के लिए भी होम डिलीवरी की व्यवस्था की गई है। एहतियात के तौर पर 7 किलोमीटर के एरिया को बफर जोन बनाया गया है जिसके अंदर डोर-टू-डोर परिवार के प्रत्येक सदस्यों की स्क्रीनिंग कार्य तेजी से कराने का निर्देश भी जारी किया गया है।

 

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कोरोना वायरस से भयभीत है दुनिया !

विगत तीन-चार महीनों से समस्त संसार कोरोना वायरस से भयभीत है। दुनिया के विकसित देशों- अमेरिका, इटली, स्पेन… जैसे देश इस कोरोना के कहर के सामने घुटने टेक दिए हैं। इन देशों में कोरोना वायरस के कोहराम के चलते अमूमन 15 हजार से 50 हजार लोगों ने मौत को गले लगा लिया है।

बता दें कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समय से जगकर तथा 135 करोड़ देशवासियों का सहयोग प्राप्त कर कोरोना वायरस से सामना करने वाला विश्व का प्रथम राष्ट्र नायक बनने का गौरव प्राप्त कर लिया है। इस गौरव को प्रधानमंत्री ने देशवासियों के साथ-साथ कोरोना के समस्त वारियर्स को समर्पित किया है।

यह भी बता दें कि हमारे प्रधानमंत्री  अहर्निश देश और देशवासियों की चिंता में डूबे रहते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था से लेकर भारत में भी कोरोना के बैक गियर से उत्पन्न होने वाली खतरनाक स्थितियों व मुसीबतों से जूझते रहते हैं। इन्हीं कारणों से उनकी आंखों से नींद भी आजकल दूर होती जा रही है। भला क्यों नहीं, आजादी की जंग से अधिक कठिन है कोरोना से लड़ना और जीतना।

यह भी जानिए और मानिए कि कोरोना का कोई मजहब नहीं। यह तो चीन से निकला एक दानव है। इसे मजहबी चश्मे से कोई ना देखें तो यह दानव जल्द से जल्द हमारा पीछा छोड़ देगा। इस दानव को मिटाने में अपनी सारी ऊर्जा को लगाना है और कोरोना रूपी राक्षस से अपने संसार को बचाना है। आज हर जुबान से बस यही आवाज निकले- “कोरोना को हराओ और देश को बचाओ !!”

चलते-चलते यह भी बता दें कि फिलहाल दुनिया में 2 लाख से अधिक लोगों की मौत कोरोना के कारण हो चुकी है जबकि पूरी दुनिया में 30 लाख कोरोना संक्रमित हैं। वे जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहे हैं तथा उन्हें बचाने के लिए कोरोना वारियर्स के रूप में सरकारी तंत्र, सामाजिक संगठन और डॉक्टर्स व पुलिस प्रशासन के लोग लगे हैं।

जहां भारत में अब तक 26500 से अधिक लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं… और 6000 से अधिक लोग ठीक हो कर घर भी लौट गए हैं… तथा 824 लोगों की मौत हो चुकी है… वहीं बिहार में कोरोना संक्रमितों की संख्या 238 है– जिसमें मधेपुरा (बिहारीगंज) की एकमात्र महिला कोरोना पॉजिटिव पाई गई है। इस पर मधेपुरा के संवेदनशील-समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी ने लोगों से निवेदन किया–

सभी धैर्य और संयम के साथ घर में रहें…. सुरक्षित रहें तथा अक्षय तृतीया एवं रमजान के इस पाक महीने में- “इंसानियत की होती रहे बात… कोरोना को देने के लिए मात… सारा देश रहे एक साथ !!!”

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शुरू हुआ रमजान का पाक महीना

रमजान का पाक महीना शनिवार, 25 अप्रैल से शुरू हो गया। इस्लाम को मानने वाले लोग इस महीने का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं। इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से नौवां महीना रमजान का होता है। चांद दिखने के साथ ही रमजान का महीना शुरू हो जाता है और मुस्लिम समाज के लोग रोजा रखना शुरू कर देते हैं। इस बार दुनिया के तमाम मुल्क कोरोना की त्रासदी झेल रहे हैं, इसलिए रमजान भी लॉकडाउन के साये में ही होगा और लोग घरों में रहकर ही इबादत करेंगे।
रमजान के महीने में सबसे ज्यादा महत्व रोजा रखने का होता है। रोजा अल्लाह की मतलब सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की इबादत करने का एक तरीका है। इसमें मन की शुद्धता भी उतनी ही जरूरी है। रोजा रखने के लिए सूर्योदय से पहले उठकर कुछ खाने-पीने का प्रावधान है। इसे सहरी कहा जाता है। सहरी का वक्त सूर्योदय से पहले का होता है और सुबह फज्र की नमाज के साथ खत्म हो जाता है। इस तरह रोजा फज्र की नमाज के साथ शुरू होता है और शाम के समय लोग मगरीब की नमाज के बाद सामूहिक रूप से इफ्तार करते हैं। इस बीच रोजा रखने वाले दिन भर रोजा रखने के साथ अपना दैनिक काम भी कर सकते हैं। साथ ही इस महीने विशेष नमाज भी की जाती है, जिसे तराबी कहते हैं।
इस बार लॉकडाउन की वजह से इफ्तार की रौनक गायब रहेगी और लोग मस्जिद की बजाय घरों में रहकर सजदा करेंगे। माना जाता है कि यह बरकतों और रहमतों का महीना होता है और सच्चे मन से की गई हर दुआ कबूल होती है। मधेपुरा अबतक आप सभी को इस पवित्र महीने की शुभकामनाएं देता है और ईश्वर से प्रार्थना करता है कि कोरोना से संसार को जल्द मुक्ति मिले।

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बाहर से आए मजदूरों को अब घर में ही मिल रहा रोजगार

दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों से लौटे बिहार के मजदूरों को गांव फिर भाने लगे है। बिहार सरकार उन्हें घर में ही रोजगार देने को प्रतिबद्ध है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शुक्रवार 24 अप्रैल को ग्रामीण विकास विभाग एवं लघु जल संसाधन विभाग की समीक्षा बैठक में निर्देश दिया कि बाहर से आए जिन मजदूरों के पास जॉब कार्ड नहीं है, उन्हें भी जॉब कार्ड बनाकर काम दिया जाए। बैठक के दौरान दोनों विभागों के मंत्री एवं आला अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े हुए थे।
इस मौके पर ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव अरविन्द चौधरी ने प्रेजेंटेशन के माध्यम से बताया कि 24 अप्रैल तक 7,761 पंचायतों में 3 लाख 40 हजार 339 कार्य हुए हैं। इनमें 5 लाख 14 हजार 165 मजदूर कार्य कर रहे हैं। बाहर से आए लोगों की क्वारंटाइन अवधि पूर्ण होने के बाद जिन्होंने काम करने की इच्छा जताई, उन सभी लोगों को काम दिया जा रहा है। वहीं, लघु जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव अमृत लाल मीणा ने बैठक में बताया कि पहले से विभाग के 1783 कार्य स्वीकृत थे, जिनमें से लॉकडाउन के पूर्व 1400 कार्य शुरू किए गए थे। 20 अप्रैल से 231 नए कार्य शुरू किए गए हैं। 15 जून तक 1783 कार्यों में से 1200 कार्य पूर्ण कर लिए जाएंगे।
ध्यातव्य है कि दोनों विभागों द्वारा कार्यस्थल पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जा रहा है और मजदूरों को साबुन, हैंडवाश, पेयजल और वाशेबल मास्क दिए जा रहे हैं।

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कैसे सार्थक हो विश्व पुस्तक दिवस ?

किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं,
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं,
अब अक्सर गुजर जाती हैं कम्प्यूटर के पर्दों पर..!

23 अप्रैल, विश्व पुस्तक दिवस पर गुलजार की ये पंक्तियां कितनी प्रासंगिक लगती हैं। मानव सभ्यता के विकास में किताबों की कितनी बड़ी भूमिका रही है, कहने की जरूरत नहीं। लेकिन आज उन किताबों की जगह कम्प्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन लेते जा रहे हैं। आश्चर्य की बात तो ये कि इंटरनेट की सुविधा से लैस इन उपकरणों को किताबों की जगह रख हम स्वयं को अधिक विकसित समझने की भूल भी कर रहे हैं। लेकिन किताबों का कोई विकल्प नहीं हो सकता, इसमें जो तहजीब है, जो स्थायित्व है, जो अपनत्व है, मर्म को छूने की जो अद्भुत कला और अतीत और वर्तमान के बीच संवाद स्थापित करने की जो कारीगरी है वो किसी और चीज में संभव नहीं। आज के तमाम साधन ‘सूचना’ चाहे जितनी दे लें, ‘ज्ञान’ के लिए हमें हमेशा पुस्तकों की शरण में ही जाना होगा और इसे हमलोग जितनी जल्दी समझ लें हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए उतना ही बेहतर होगा।
बहरहाल, आज के अधिकांश बच्चे जो विश्व पुस्तक दिवस मना भी रहे होते हैं, उनमें से कई ये नहीं जानते होंगे कि 23 अप्रैल 1564 को विश्व के सार्वकालिक महानतम साहित्यकारों में एक विलियम शेक्सपियर का निधन हुआ था। अपने जीवनकाल में 35 नाटक और 200 से ज्यादा कविताओं की रचना कर विश्व साहित्य में उन्होंने अप्रतिम योगदान दिया था। उसी को देखते हुए यूनेस्को ने 1995 और भारत सरकार ने 2001 में 23 अप्रैल के दिन को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। लेकिन यह देखना अत्यंत पीड़ादायी है कि यह दिन अब रस्म अदायगी से ज्यादा कुछ नहीं।
आपको जानना चाहिए कि दुनियाभर की 285 यूनिवर्सिटी में ब्रिटेन और इटली की यूनिवर्सिटी ने संयुक्त अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला है कि जो छात्र डिजिटल तकनीक का अधिकतम उपयोग करते हैं, वे पढ़ाई के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ पाते और फिसड्डी साबित होते हैं। ज्यादा इंटरनेट के इस्तेमाल से उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं मिलता और अंतत: उनमें अकेलेपन की भावना घर कर जाती है।  यही नहीं, मनोभावों पर नियंत्रण रखना भी वे नहीं सीख पाते और ना ही अपनी भावी योजना और शैक्षिक वातावरण में बेहतर तालमेल बना पाते हैं।
हम ये हरगिज ना भूलें कि किताबों की उपेक्षा हमारे पिछड़ जाने का संकेत है। किताबों से दिनोंदिन बढ़ती दूरी हमें भौतिकवाद, नैतिक पतन और आत्ममुग्ध आधुनिकता से ग्रसित कर रही है। अगर हमें अपने होने का सही अर्थ पाना है तो किताबों से जुड़ना ही होगा। हम ये समझें और उस अनुरूप कदम उठाने को संकल्पित हों, यही पुस्तक दिवस की सार्थकता होगी।

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विश्व पृथ्वी दिवस को जानें

22 अप्रैल को दुनिया भर में ‘अर्थ डे’ यानि विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है। साल 1970 में इसी दिन पहली बार अर्थ डे मनाया गया था। उस साल अमेरिकी सांसद और पर्यावरण संरक्षक गेलार्ड नेल्सन ने पर्यावरण की रक्षा और इसके लिए लोगों को शिक्षा देने के उद्देश्य से प्रतीक दिवस के रूप में 22 अप्रैल की स्थापना की थी, जिसके बाद से दुनिया के 192 देश हर साल 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाते आ रहे हैं और गेलार्ड नेल्सन ‘फादर ऑफ अर्थ डे’ के रूप में जाने जाते हैं। इस साल इसकी 50वीं वर्षगांठ है। अमेरिका में इस दिन को ‘ट्री डे’ यानि वृक्ष दिवस के रूप में भी मनाते हैं।
गौरतलब है कि पृथ्वी दिवस दो अलग-अलग दिन मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 21 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस के रूप में मान्यता दे रखी है। दरअसल, यह दिन पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत ऋतु का पहला दिन है। इस तरह इस दिन का वैज्ञानिक और पर्यावरण संबंधी महत्व है, लेकिन 22 अप्रैल को सामाजिक तथा राजनीतिक महत्व  हासिल है। यह अपने आप में दुनिया का सबसे बड़ा जन जागरुकता अभियान है, जिसमें एक साथ अरबों नागरिक हिस्सा लेकर पृथ्वी की रक्षा का संकल्प लेते हैं। इस दिन पृथ्वी के दक्षिणी भाग में शरद ऋतु रहती है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम पृथ्वी दिवस के मर्म को समझें। तकनीक और विज्ञान के इस युग में जिस तरह ग्लेशियर पिघल रहे हैं, औसत तापमान बढ़ रहा है, बेमौसम बारिश आम बात हो गई है, मिट्टी की गुणवत्ता घट रही है, प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं, यह हमें अवश्यंभावी विनाश की ओर ले जा रहा है। अगर हम पृथ्वी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अब भी जागरुक नहीं हुए तो हम अपने साथ-साथ करोड़ों प्रकार के जीवों और वनस्पतियों को भी खतरे में डालेंगे। हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह पृथ्वी हमारे साथ-साथ उन जीवों और वनस्पतियों का भी घर है और उन्हें बचाना हम मानवों का ही दायित्व है।
बता दें कि पृथ्वी दिवस का थीम हर साल बदलता रहता है। इस साल इसका थीम है – “क्लाइमेट एक्शन”, जबकि 2019 में इसका थीम “अपनी प्रजातियों की रक्षा करें”, 2018 में “प्लास्टिक प्रदूषण का अंत”, 2017 में “पर्यावरण और जलवायु साक्षरता” तथा 2016 में “धरती के लिए पेड़” था।

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बिहार कैबिनेट ने दी 12 एजेंडों को मंजूरी

मंगलवार 21 अप्रैल 2020 को वीडिया कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में कुल 12 एजेंडों पर मुहर लगी। इस बैठक के उपरान्त राज्य के हाइस्कूलों में 33,916 शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। कैबिनेट ने इसके लिए पदसृजन को मंजूरी दे दी।
एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय के तहत कैबिनेट ने लॉकडाउन की अवधि में संविदा कर्मियों व एजेंसी के माध्यम से कार्यरत कर्मियों की उपस्थिति और मानदेय भुगतान में कटौती नहीं करने का निर्णय लिया। इस अवधि में गैरहाजिर कर्मियों की शत-प्रतिशत उपस्थिति मानी जाएगी।
इसके अलावा राज्य कैबिनेट ने इस साल मार्च में असामयिक बारिश और ओलावृष्टि के कारण हुए फसलों के नुकसान की भरपाई के लिए 518.42 करोड़ रुपए मंजूर किए। इस राशि से पीड़ित किसानों को जल्द कृषि इनपुट दिया जाएगा।
इन निर्णयों के अलावा और भी कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए जिनमें बिहार लोक सेवाओं का अधिकार अधिनियम 2011 में संशोधन करते हुए राशन कार्ड के नए आवेदन को मंजूरी देना और आपातकालीन स्थिति में कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिए सामानों की खरीदारी के लिए स्वास्थ्य सचिव को अधिकृत करना प्रमुख हैं।

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अब राशन कार्ड के बिना भी मिलेगी सहायता राशि

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज मुख्य सचिव एवं अन्य वरीय अधिकारियों के साथ पल्स पोलियो अभियान की तर्ज पर डोर टू डोर कैंपेन की अद्यतन स्थिति, राशन कार्डधारियों को दी जा रही 1,000 रुपए की सहायता राशि एवं गेहूँ अधिप्राप्ति की स्थिति आदि के संबंध में गहन समीक्षा की।
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि अस्वीकृत, लंबित एवं त्रुटिपूर्ण राशन कार्डों के जांचोपरान्त सही पाए गए आवेदनों को पहले सहायता राशि एवं अन्य मदद उपलब्ध कराई जाए, तत्पश्चात् राशन कार्ड शीघ्र निर्गत करने की भी कार्रवाई करें। साथ ही उन्होंने कहा कि राशन कार्ड विहीन परिवारों को जीविका दीदी द्वारा चिह्नित सूची के अनुसार तत्काल सहायता राशि उपलब्ध कराई जाए, तत्पश्चात् राशन कार्ड निर्गत करने की भी कार्रवाई करें।
एक अन्य महत्पूर्ण निर्णय के तहत मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के अंदर चल रहे आपदा राहत केन्द्रों में दिहाड़ी मजदूरों, ठेला वेंडरों, रिक्शा चालकों एवं अन्य जरूरतमंदों को गुणवत्तापूर्ण भोजन के साथ-साथ बाढ़ राहत शिविरों की तरह बर्तन, कपड़ा और दूध जैसी तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराएं। साथ ही शिविर में खाना बनाने वाले लोगों को अलग से पारिश्रमिक देने की व्यवस्था की जाए। आवश्यकता पड़ने पर राहत केन्द्रों की संख्या भी बढ़ाई जाए।
गेहूँ अधिप्राप्ति की समीक्षा के क्रम में मुख्यमंत्री ने कहा कि गेहूँ अधिप्राप्ति के कार्य में तेजी लाई जाए ताकि किसानों को उनकी फसल का उचित लाभ मिल सके।
समीक्षा के क्रम में जानकारी दी गई कि पल्स पोलियो अभियान की तर्ज पर प्रभावित जिलो में डोर डोर स्क्रीनिंग के तहत अब तक 36 लाख 14 हजार घरों का सर्वे किया जा चुका है। राहत की बात है कि इतने घरों में से मात्र 1386 लोगों में सर्दी, खांसी एवं बुखार के सामान्य लक्षण हैं। मुख्यमंत्री ने इस दौरान डोर टू डोर स्क्रीनिंग का दायरा बढ़ाने का भी निर्देश दिया।

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भारत का पहला उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ 19 अप्रैल को किया गया था लांच

भारत और दुनिया के इतिहास में 19 अप्रैल को एक से बढ़कर एक महत्वपूर्ण घटनाएं घटती रही और आज भी घट रही है- जिनमें अमेरिकी क्रांति की शुरुआत से लेकर भारतीय प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तात्या टोपे को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा दी गई फांसी भी शामिल है। आजाद भारत में पहला उपग्रह “आर्यभट्ट” का 19 अप्रैल 1975 को लांच किया जाना भी इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।

बता दें कि यह सेटेलाइट आर्यभट्ट भारत के विश्व विख्यात एवं महान खगोल शास्त्री व गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर नामित किया गया है जिनका जन्म बिहार की राजधानी पटना में पांचवी शताब्दी 476 ईसवी में तब हुई थी जब पटना का नाम कुसुमपुर था।

Stamp in memory of 1st Satellite Aryabhatta released by Govt. Of India.
Stamp in memory of 1st Satellite Aryabhatta released by Govt. Of India.

गणितीय ज्ञान के तत्कालीन खजांची खगोल विद आर्यभट्ट द्वारा मात्र 23 वर्ष की आयु में दो भागों में आर्यभट्टियम पुस्तक लिखी गई थी जिसके कुल 121  श्लोकों द्वारा ज्योतिषीय, बीज गणितीय एवं त्रिकोणमितीय विद्याओं व सूत्रों की व्याख्या की गई। आर्यभट्ट द्वारा शून्य का आविष्कार भी उसे दुनिया में  अमरत्व दे गया है। तभी तो भारत ने अपने प्रथम उपग्रह का नाम उन्हीं के नाम पर आर्यभट्ट रखा… जिसे 19 अप्रैल 1975 को सोवियत काॅसमाॅस- 3M द्वारा कपुस्तिन से लांच किया गया। भारत सरकार ने 1975 में आर्यभट्ट के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया है।

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