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20 मई 1570 को मिला था दुनिया को पहला एटलस

बहुत खास दिन है 20 मई। क्यों खास है, यह जानने के लिए आज से लगभग 450 साल पहले की कल्पना कीजिए। दुनिया का कोई मुकम्मल नक्शा नहीं था तब। पृथ्वी की भौगोलिक बनावट को समझ पाना कितना कठिन रहा होगा उस समय। ऐसे में एटलस की परिकल्पना करना और उसे साकार कर देना असंभव-सा प्रतीत होता है, पर 1570 ई. में आज ही के दिन यानि 20 मई को अब्राहम ऑर्टेलियस ने दुनिया का पहला आधुनिक एटलस प्रकाशित किया और इसे बड़ा सही नाम दिया – Theatrum Orbis Terrarum यानि Theatre of the World अर्थात् दुनिया का रंगमंच। सच्चे अर्थों में दुनिया का रंगमंच ही था वो। इसमें उन्होंने कई कार्टोग्राफर के काम को उनकी व्याख्या और स्रोतों के साथ समाहित किया था। कुछ खामियों और सीमाओं के बावजूद ऑर्टेलियस के इसी एटलस ने व्यवहार में लाए जाने वाले आज के सभी एटलस की नींव रखी थी।

4 अप्रैल 1527 को बेल्जियम के एंटवर्प में जन्मे अब्राहम ऑर्टेलियस पेशे से भूगोलविद और मानचित्र निर्माता थे। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में पहला मैप मिस्र का बनाया था। एशिया, स्पेन और रोमन साम्राज्य के नक्शे भी उन्होंने बनाए। 16वीं शताब्दी में प्रकाशित उनके एटलस में 53 मानचित्र थे। यह वो समय था जब दुनिया में नए-नए इलाके खोजे जा रहे थे। अमेरिका, अफ्रीका के कई देशों को इस सदी में दुनिया ने जाना। बता दें कि ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका के बारे में तब कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए इस एटलस में पांच महाद्वीपों के ही नक्शे हैं।

ऑर्टेलियस के एटलस से दुनिया की खोज में निकले लोगों को अपनी मंजिल ढूंढ़ने में खासी मदद मिली, संचार में आसानी हुई और उनके नक्शों ने लोगों को पहली बार वैश्विक दृष्टिकोण का साक्षात्कार कराया। कॉन्टिनेन्टल ड्रिफ्ट थ्योरी, जिसमें कहा जाता है कि दुनिया के सारे द्वीप आपस में जुड़े हुए थे और धीरे-धीरे वे टूटना शुरू हुए, की प्रारंभिक जानकारी भी इस एटलस से मिलती है।

अब्राहम ऑर्टेलियस असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उनका कई भाषाओं पर अधिकार था। वह बचपन से ही डच, ग्रीक, लैटिन, इटालियन, फ्रेंच, स्पैनिश और कुछ हद तक जर्मन और अंग्रेजी भी बोल सकते थे। उन्होंने क्लासिक साहित्य का अध्ययन किया और विज्ञान के विकास से भी लागातार अपने आप को जोड़े रखा। यह ऑर्टेलियस का ही भगीरथ प्रयत्न था कि दुनिया के ‘कैनवास’ को उसका सही विस्तार मिला। 1570 में अपने एटलस के प्रकाशन के बाद भी दुनिया को समझने और समझाने की उनकी ललक कम न हुई। यही कारण है कि 1622 में जब उनके एटलस का अंतिम संस्करण प्रकाशित हुआ तब उसमें 167 मैप थे। उनके इस अवदान की ऋणी पूरी मानव-सभ्यता है। इस महान शख्सियत की मृत्यु 71 वर्ष की आयु में 28 जून 1598 को हुई। उन्हें और दुनिया को उनके योगदान को हमारा नमन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश की मोदी से मांग, ‘भारत रत्न’ मिले लोहिया को

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ सम्मान से नवाजा जाए। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि 12 अक्टूबर को डॉ. लोहिया की पुण्यतिथि है, इसी दिन उन्हें भारत का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने अनुरोध किया है कि गोवा हवाई अड्डे का नामकरण भी डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम पर किया जाए क्योंकि पुर्तगालियों से गोवा को आजाद कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डॉ. राम मनोहर लोहिया के जीवन से जुड़े कई किस्सों का भी अपने पत्र में जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि संसद में नेहरू की सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए लोहिया ने पूरे विपक्ष को गैर-कांग्रेसवाद की धुरी पर इकट्ठा किया और उनकी कोशिशों की वजह से देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बन सकी।

सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह की मुहिम में लगे प्रधानमंत्री को उन्होंने खास तौर पर याद दिलाया कि ‘लोहिया ने गांवों में महिलाओं के लिए दरवाजा बंद शौचालयों के निर्माण की मांग को लेकर लगातार मुहिम चलाई और तत्कालीन सरकार पर दबाव भी बनाते रहे।’ नीतीश ने लिखा, डॉ. लोहिया नेहरू विरोधी थे और उनका कहना था कि यदि नेहरू सभी गांवों में महिलाओं के लिए शौचालय बनवा दें तो मैं उनका विरोध करना बंद कर दूंगा। लोहिया ने स्वच्छता और स्त्री स्वास्थ्य के लिए हमेशा प्रयास किया।

महिलाओं के लिए बिहार में आरक्षण समेत कई ऐतिहासिक कदम उठाने वाले मुख्यमंत्री ने महिलाओं के लिए ‘उज्जवला योजना’ लागू करने वाले प्रधानमंत्री को आगे लिखा कि किस तरह ग्रामीण क्षेत्रों की औरतों के लिए धुआंमुक्त चूल्हों की तकनीक को प्रत्येक रसोई में पहुँचाने की खातिर भी लोहिया की मजबूत आवाज संसद में और सड़कों पर लगातार गूंजती रही। पिछली सदी के मध्य में भारत की तत्कालीन सरकार और समाज को इन बिन्दुओं पर जागृत करना उनकी दूरदृष्टि का परिचायक है। इसके अलावा नीतीश कुमार ने भारत की आजादी की लड़ाई में लोहिया के योगदान और अमेरिका की रंगभेद नीति के खिलाफ उनके विचारों की चर्चा भी अपने पत्र में की।

इस तरह प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर डॉ. लोहिया के द्वारा किए कई महत्वपूर्ण कार्यों की याद दिलाते हुए उनके विज़न और अतीत के साथ-साथ वर्तमान में भी उनकी प्रांसगिकता को बड़ी मजबूती से रेखांकित किया। उनकी मांग पर केन्द्र की मोदी सरकार चाहे जब फैसला करे, लेकिन कहना गलत ना होगा कि इस बहाने देश भर में लोहिया पर एक सार्थक बहस और चर्चा तो छिड़ ही गई है। लोहिया जैसे युगपुरुष के विचार पार्टी ही नहीं, राज्य व देश की सीमाओं से भी परे हैं और समाजवाद के इस पुरोधा हेतु ‘भारत रत्न’ की मांग करने के लिए नीतीश कुमार नि:संदेह साधुवाद के पात्र हैं। यहां स्मरणीय है कि इससे पहले नीतीश कुमार बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री व देश के समाजवादी नेताओं में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले जननायक कर्पूरी ठाकुर को भी ‘भारत रत्न’ देने की मांग का समर्थन कर चुके हैं।
‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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एटीएम से खाली हाथ लौटने का कारण हम हैं, सरकार नहीं !

क्या पिछले कुछ दिनों में ऐसा हुआ है कि आप पैसे निकालने एटीएम गए हों और आपको खाली हाथ लौटना पड़ा हो, या तीन-चार एटीएम के दर्शन करने के बाद आपकी जरूरत पूरी हुई हो? इन दिनों ये बात आम-सी हो गई है कि एटीएम का शटर या तो गिरा हुआ है या फिर एटीएम के आगे ‘कैश नहीं है’ की तख्ती लगी हुई है। ऐसा आखिर हो क्यों रहा है? बहुत संभव है कि ऐसा होने पर आपने आरबीआई या सरकार को कोसा हो या किसी को कोसते हुए सुना हो! बुद्धिजीवी टाइप के लोग ये बोलते भी मिल जाएंगे कि ये सारी कवायद ‘कैशलेस इकोनोमी’ के लिए की जा रही है। लेकिन वास्तविकता कुछ और है। चलिए जानने की कोशिश करते हैं।

दरअसल पिछले 5-6 दिनों से आपको जिस समस्या से दो-चार होना पड़ रहा है, वो समस्या देशव्यापी है। ऐसा किसी राज्यविशेष में या देश के किसी खास हिस्से में नहीं हो रहा। आखिर इतनी बड़ी समस्या का कारण क्या है, ये पूछने पर सरकार के आर्थिक मामलों के सचिव एस. सी. गर्ग बताते हैं कि इसके मूल में पिछले 15 दिनों में सामान्य से 3 गुना ज्यादा नोटों की निकासी होना है। एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने जानकारी दी कि देशभर में हर महीने 20 हजार करोड़ रुपये के नोटों की सामान्य मांग रहती है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में कुछ इलाकों में नोटों की मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। उन्होंने कहा, ‘इस महीने के 12-13 दिनों में ही 45 हजार करोड़ करंसी की खपत हो चुकी है।’ इस अप्रत्याशित या अचानक बढ़ी मांग का कारण पूछे जाने पर गर्ग बताते हैं कि लोग इस अफवाह का शिकार होकर जल्दबाजी में पैसे निकाल रहे हैं कि आनेवाले दिनों में नोटों की कमी हो जाएगी।

बहरहाल, सरकार ने इस बाबत तमाम जरूरी कदम उठा लिए हैं। 500 रुपये के नोटों की छपाई पांच गुना करने की तैयारी की जा रही है। बता दें कि अभी हर दिन 500 करोड़ रुपये के मूल्य के 500 के नोटों की छपाई होती है, जिसे अगले कुछ दिनों में बढ़ाकर 2,500 करोड़ रुपये प्रतिदिन कर दिया जाएगा। इस तरह एक महीने में लगभग 75,000 करोड़ रुपये मूल्य के 500 के नोटों की आपूर्ति होने लगेगी।

एक सजग नागरिक के तौर पर हमें जानना चाहिए कि नोटबंदी के वक्त 17.50 लाख करोड़ मूल्य के नोट सर्कुलेशन में थे, लेकिन अभी 18 लाख करोड़ के नोट हैं, यानि जरूरत से ज्यादा। इसके अतिरिक्त अभी सरकार के पास अभी करीब 2 लाख करोड़ रुपये का भंडार भी है। कहने का मतलब यह कि यह समस्या पूरी तरह से तात्कालिक है, जिससे निपटने में हम सक्षम हैं। देश में नोटों की कोई कमी नहीं है। किसी अफवाह पर बिल्कुल ध्यान ना दें। वित्त मंत्री अरुण जेटली और वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल भी नोटों की कमी को अगले तीन दिनों में दूर करने का भरोसा दिला ही चुके हैं। बिहार की बात करें तो यहां के वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी लगातार आरबीआई और बैंकों के अधिकारियों से संवादरत हैं। उन्होंने भी इस समस्या के शीघ्र दूर होने का आश्वासन दिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भारतीय नववर्ष को आप कितना जानते हैं ?

आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम क्या-क्या छोड़े चल रहे हैं क्या इसके बारे में कभी सोचा है आपने? शहरों में रहने की हवस या जरूरत की खातिर हम अपने गांव की मिट्टी की सोंधी सुगंध भूल गए। कम्प्यूटर और स्मार्टफोन ने हमारे बच्चों की मासूमियत छीन ली। अंग्रेजी स्कूल स्टेटस का पैमाना क्या हुए हमारे बच्चे हिन्दी की गिनती तक बिसरा गए। ऐसे में हिन्दी नववर्ष और हिन्दी महीनों से वे अनजान रहें तो क्या आश्चर्य! बहरहाल, आज हिन्दी नववर्ष यानि भारतीय नववर्ष है… विक्रम संवत् 2075 का पहला दिन और साथ ही चैत्र नवरात्रि का पहला दिन भी। इसलिए पहले इस दिन के निमित्त मंगलकामनाएं और फिर कुछ जरूरी और दिलतचस्प बातें।

चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से आरंभ होता है हमारा भारतीय नववर्ष। इसे सृष्टि-दिवस, नवसंवत्सर या हिन्दू नववर्ष भी कहते हैं। मान्यता है कि इसी दिन यानि आज से एक अरब, 97 करोड़, 39 लाख, 49 हजार व 115 वर्ष पूर्व सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना शुरू की थी। लंका पर विजय हासिल करने के पश्चात् प्रभु राम का और 5120 वर्ष पूर्व धर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक इसी दिन हुआ था। यही विक्रम संवत् का प्रथम दिन है। 2073 वर्ष पूर्व सम्राट् विक्रमादित्य ने इसी दिन अपना अखंड राज्य स्थापित किया था। यही नहीं, भारत सरकार का पंचांग शक संवत् भी आज ही के दिन से शुरू होता है।

अब आगे चलें। विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त करके दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना था। सिंध प्रांत के प्रसिद्ध समाज-रक्षक वरुणावतार माने जाने वाले संत झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए थे। महान बलिदानी सिक्ख परंपरा के द्वितीय गुरु श्री अंगद देव का प्रगटोत्सव इसी दिन हुआ था और समाज को श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्यसमाज की स्थापना के लिए चुना था।

मां आदि शक्ति के नवरात्र यानि बासंतिक नवरात्र का पहला दिन भी यही है। किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिए इस दिन का मुहूर्त अत्यंत शुभ माना जाता है। इस समय प्रकृति की ओर देखें तो वह नया श्रृंगार करती दिखेगी। नए रंग-बिरंगे फूलों से पौधे लदे हुए मिलेंगे। यही समय फसल काटने का होता है और किसानों को उनकी मेहनत का फल मिलता है। अर्थात् हमारा भारतीय नववर्ष वैज्ञानिक दृष्टि के साथ-साथ प्राकृतिक एवं सामाजिक संरचना को भी प्रस्तुत करता है।

भारतीय संस्कृति में वर्ष का ऐसा कोई दिन नहीं जिसके भीतर हमारे संस्कारों के कुछ बीज ना मिल जाएं। फिर यह तो वर्ष का पहला दिन है। इस दिन आप सुधी पाठकों से एक विनम्र निवेदन कि हम ‘आधुनिक’ जरूर बनें पर अपनी जड़ों को ना भूलें… अपने बच्चों को हम हिन्दी नववर्ष, हिन्दी महीनों और इनसे जुड़ी संस्कृति का ज्ञान जरूर दें..!! ये हर भारतीय का सांस्कारिक दायित्व है… इसके अभाव में हम भले ही चांद पर घर बना लें, मंगल को छूकर आ जाएं, ‘विश्वगुरु’ दुबारा कभी ना बन पाएंगे..!!!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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पाकिस्तान में भी मनाई जाती है होली

आमतौर पर जब पाकिस्तान की चर्चा होती है, तब हमारे जेहन में भारत के लिए वहां के सियासतदानों के कटुता भरे बयान, हाफिज सईद जैसे आतंकियों की नापाक हरकतें, सीमा पर आए दिन होने वाली गोलीबारी या फिर क्रिकेट के मैदान की प्रतिद्वंद्विता की तस्वीर उभरती है। ऐसे में क्या आप इस बात पर यकीन कर सकते हैं कि रंगों के त्योहार होली के दिन वहां भी जमकर अबीर-गुलाल उड़ता है, हिन्दी फिल्मों के गानों पर धमाल मचता है और वहां रह रहे अल्पसंख्यक हिन्दुओं के साथ मुस्लिम समुदाय के लोग भी इसमें शामिल होते हैं..!

जी हां, मुस्लिम मुल्क पाकिस्तान में हिंदू बिरादरी के लोग धूमधाम से होली मनाते हैं। इस दिन सारे रिश्तेदार बहन-भाई मंदिरों में इकट्ठा होते हैं और एक दूसरे पर रंग डालते हैं। वहां के लोग बताते हैं कि होली के जश्न में उनके मुस्लिम दोस्त भी शामिल होते हैं और होली भी खेलते हैं। होली के मौके पर हिंदुस्तान की तरह पाकिस्तान में भी विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। आपको जानकर खुशी होगी कि कुछ साल पहले तक यहां होली की छुट्टी नहीं होती थी, लेकिन अब होली पर यहां सार्वजनिक अवकाश हुआ करता है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान में 2 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी है। इनमें हिंदुओं के अलावा ईसाई और दूसरे सम्प्रदाय के लोग भी हैं। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदुओं की आबादी ज्यादा है, इसलिए स्वाभाविक तौर पर यहां होली की धूम अधिक होती है। वैसे कराची भी इस मामले में पीछे नहीं। इस बार हिन्दुओं ने वहां धूमधाम से भव्य होली फेस्टिवल का आयोजन किया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया और एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं।

सच तो यह है कि दोनों देशों के बीच जो दूरी आज दिखती है, वो चंद स्वार्थी तत्वों के कारण। नहीं तो इंसानियत के रंग, खुशियों के रंग, मुहब्बत और उम्मीदों के रंग भारत हो या पाकिस्तान या फिर दुनिया का कोई और मुल्क, हर जगह एक है। रही बात होली की, तो ये त्योहार ही रंगों का है, इस दिन कोई ‘बेरंग’ या ‘बदरंग’ रहे भी तो कैसे..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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तुम्हें यूं ना जाना था ‘चांदनी’!

25 फरवरी का दिन भारतीय सिनेमा के लिए एक सदमा लेकर आया। शनिवार देर रात दुबई में बॉलीवुड की पहली फीमेल सुपरस्टार श्रीदेवी की हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हो गई। अपने भावपूर्ण अभिनय, शानदार नृत्य और चुलबुली मुस्कुराहट से लाखों दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री ने अचानक हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह दिया। हिन्दी सिनेमा में ‘लेडी अमिताभ’ कही जाने वाली श्रीदेवी 54 साल की थीं। उन्होंने 5 बार बेस्ट एक्ट्रेस का ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार जीता था और साल 2013 में उन्हें ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया था। गौरतलब है कि श्रीदेवी अपने पति बोनी कपूर के भांजे मोहित मारवाह की शादी में शामिल होने के लिए सपरिवार दुबई में थीं।

श्रीदेवी ने महज 4 साल की उम्र में तमिल फिल्म ‘थुनाइवन’ से अपनी आधी सदी लंबी अभिनय यात्रा शुरू की थी। इसके बाद उन्होंने तमिल, तेलुगू, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में भी अभिनय किया लेकिन उन्हें देशभर में असली पहचान हिन्दी फिल्मों से मिली। हिन्दी फिल्मों में उन्होंने अपनी शुरुआत साल 1975 में आई फिल्म ‘जूली’ में बतौर बाल कलाकार की, लेकिन फिर उन्होंने दक्षिण का रुख कर लिया। इसके बाद उनकी वापसी ‘सोलहवां सावन’ से हुई। हिन्दी में बतौर लीड एक्ट्रेस यह उनकी पहली फिल्म थी। मगर सफलता उनको 1983 में जीतेन्द्र के साथ आई फिल्म ‘हिम्मतवाला’ से मिली। इस फिल्म ने उन्हें हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में ग्लैमरस अभिनेत्री के तौर पर स्थापित कर दिया। लेकिन इसी साल आई फिल्म ‘सदमा’ से उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का लोहा भी मनवा लिया। इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसी लड़की की भूमिका निभाई थी, जो अपनी याद्दाश्त खो बैठती है।

80 और 90 के दशक में श्रीदेवी ने बॉलीवुड पर राज किया था। सच तो यह है कि उनके जैसी धाक और धमक किसी हीरोइन की नहीं रही। उनका जलवा कुछ ऐसा था कि उनका नाम ही फिल्म की सफलता की गारंटी होता था। ‘मवाली (1983)’, ‘तोहफा’ (1984), ‘नगीना’ (1986), ‘मिस्टर इंडिया (1987)’, ‘चांदनी’ (1989), ‘चालबाज’ (1989), ‘लम्हे’ (1991), ‘खुदा गवाह’ (1992), ‘गुमराह’ (1993), ‘जुदाई’ (1997) जैसी फिल्में इस बात का सबूत हैं। ये फिल्में ना केवल उनके करियर के लिए, बल्कि हिन्दी सिनेमा के लिए मील का पत्थर रही हैं।

श्रीदेवी ने हिन्दी फिल्मों में अपनी दूसरी पारी साल 2012 में आई फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ से शुरू की, जिसमें उनके काम को जबरदस्त सराहना मिली। पिछले साल आई फिल्म ‘मॉम’ में भी उनके काम की काफी तारीफ हुई थी। माना जाता है कि शाहरुख खान की आने वाली फिल्म ‘जीरो’ में भी उन्होंने बतौर मेहमान कलाकार काम किया है। ऐसे में यह उनकी आखिरी फिल्म होगी।

नियति का चक्र देखिए शून्य से शिखर की यात्रा करने वाली श्रीदेवी की आखिरी फिल्म का नाम ‘जीरो’ (यानि शून्य) था। हम चाहे लाख शिखर पर रहें, हमें जाना ‘शून्य’ में ही होता है। शून्य जो अनंत है, अटल है। पर श्रीदेवी का असामयिक निधन वाकई बेहद खलने वाला है। जीवन का अंतिम सत्य अपनी जगह है, पर हम तो यही कहेंगे… तुम्हें यूं ना जाना था ‘चांदनी’! बहरहाल, अभिनय-कला पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली श्रीदेवी को भावभीनी श्रद्धांजलि..!

‘मधेपुरा’ अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जापान दौरे से बिहार की संभावनाओं को नई उड़ान दे रहे नीतीश

मंगलवार को अपने जापान दौरे के दूसरे दिन मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने बिहार राज्य प्रोत्साहन संगोष्ठी को संबोधित किया, एम्बेसी ऑफ इंडिया, टोक्यो में मिथिला पेंटिंग की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया और इंडियन पार्लियामेंट्रियन फ्रेंडशिप लीग की बैठक में अध्यक्ष श्री होसादा हिरोयूकी के हाथों सम्मानित हुए। इससे पूर्व सोमवार को वे जापान के प्रधानमंत्री श्री शिंजो अवे, विदेश मंत्री श्री तारो कोनो, विदेश राज्य मंत्री श्री कजायुकी नकाने और जापान में भारत के राजदूत श्री सुजान चिनौय से मिले और वहां के बिहारी प्रवासियों के साथ भी थोड़ा वक्त बिताया।

जापान के प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान नीतीश कुमार ने बिहार में मिनी बुलेट ट्रेन के साथ ही कई अन्य बिन्दुओं पर भी चर्चा की, जिनमें पर्यटन, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने जापान सरकार से बिहार में हाई स्पीड रेल लिंक के निर्माण के संबंध में तकनीकी सहयोग देने की अपेक्षा भी जताई।

बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि जापान इंटरनैशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (जेआईसीके) के माध्यम से पटना को गया, बोधगया, राजगीर और नालंदा से जोड़ने का काम चल रहा है, जिसे वैशाली तक बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इससे इसकी प्रासंगिकता और बढ़ेगी और लोगों को सभी बौद्ध स्थलों की यात्रा करने में सुविधा होगी। साथ ही दोनों देशों के बीच पर्यटन की संभावना को और बल मिलेगा।

नीतीश कुमार ने जापान के विदेश मंत्री तारो कोनो से भी मुलाकात की। इस मुलाकात में उन्होंने विदेश मंत्री से बिहार से जापान के बीच सीधी विमान सेवा के संचालन के संबंध में विस्तृत बातचीत की। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे जापान और बिहार के आपसी संबंध और मजबूत होंगे एवं दोनों देशों के पर्यटक यात्रा कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त उन्होंने बिहार को औद्योगिक केन्द्र बनाने की बात की और कहा कि इससे बिहार के मेधावी और मेहनती युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। कहने की जरूरत नहीं कि अपने जापान दौरे से बिहार की संभावनाओं को नई उड़ान दे रहे हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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जानें, नीरव मोदी का ये घोटाला कितना बड़ा है!

इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट या सोशल मीडिया – जरिया जो भी रहा हो, नीरव मोदी को आप जान जरूर गए होंगे। अरबपति हीरा व्यापारी नीरव मोदी, जिसने देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक पंजाब नेशनल बैंक के कुछ कर्मचारियों के साथ मिलकर 11 हजार 300 करोड़ का घोटाला कर डाला। यह देश का सबसे बड़ा बैंकिंग घोटाला बताया जा रहा है।

बहरहाल, 11 हजार 300 करोड़ बहुत बड़ी रकम है, इतनी बड़ी कि एक सामान्य क्या विशिष्ट कोटि में आने वाला भारतीय भी अपनी पूरी उम्र में ऐसी रकम के बारे में सोचने या लिखने तक की हिमाकत नहीं कर सकता। धनपतियों की किंवदंती बन चुके टाटा, बिड़ला या अंबानी भी इस रकम के बारे में बहुत सोच-संभल कर कुछ बोलेंगे। ऐसे में ये जानना सचमुच दिलचस्प होगा कि असल में ये रकम कितनी बड़ी है? चलिए, जानने की कोशिश करते हैं।

जैसा कि आप जानते हैं, इसी महीने संसद में पेश हुए मोदी सरकार के आखिरी पूर्ण बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देश के लिए एक बड़े तोहफे की घोषणा की। यह तोहफा ‘मोदी केयर’ के नाम से चर्चा में है। इसके तहत सरकार देश के 10 करोड़ परिवार यानि 50 करोड़ लोगों को 5 लाख का स्वास्थ्य बीमा देगी। इसे दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम कहा जा रहा है और बजट में इसके लिए 2 हजार करोड़ रुपये का आवंटन भी किया गया है।

आपको बता दें कि आर्थिक मामलों के जानकारों ने जब यह संदेह जताया कि वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए 2 हजार करोड़ रुपये का फंड पर्याप्त नहीं है तो सरकार की ओर से कहा गया कि यह आरंभिक आवंटन है और जरूरत के हिसाब से और फंड की व्यवस्था की जाएगी। ‘मोदीकेयर’ पर कुल खर्च कितना आएगा, यह आंकड़ा हालांकि अभी स्पष्ट नहीं हुआ है, लेकिन बकौल नीति आयोग 50 करोड़ लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस देने में करीब 11 हजार करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जिसका वहन केंद्र और राज्य मिलकर करेंगे। इसका मतलब यह है कि नीरव मोदी के घोटाले की रकम और सरकार की अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना ‘मोदीकेयर’ पर संभावित खर्च की राशि बराबर है। वैसे पीएनबी घोटाले का मोदी सरकार की इस योजना पर शायद ही कोई असर पड़े, लेकिन यह तुलना घोटाले की गंभीरता को तो जाहिर करता ही है।

जब बात चली ही है तो कुछ अन्य खर्चों को भी जानें, जिनसे इस घोटाले की तुलना दिलचस्प होगी। मसलन, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 1 फरवरी को बजट भाषण में 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को जोड़ने वाले भारत नेट प्रॉजेक्ट की चर्चा करते हुए ऐलान किया था कि सरकार टेलिकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए 10,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी। इसी तरह लाखों लोगों को रोजगार देने वाले मछली पालन और पशुपालन व्यवसाय के लिए भी केन्द्रीय बजट में 10,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। उधर उत्तर प्रदेश में गरीबों को प्रधानमंत्री आवास योजना तहत पक्का मकान दिलाने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने वर्ष 2018-19 के बजट में 11,500 करोड रुपये का प्रावधान किया है।

अब शायद आपको अंदाजा हो रहा होगा कि नीरव मोदी के घोटाले की रकम वास्तव में कितनी बड़ी है। लेकिन हद तो यह है कि यहां भारत में उसको लेकर हाहाकार मचा हुआ है, और उधर वो मीडिया में आ रही ख़बरों के मुताबिक न्यूयॉर्क में दुनिया के सबसे बड़े होटलों में शुमार एक होटल के आरामगाह में ऐश कर रहा है..! आदरणीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी, कुछ करें ऐसे ‘मोदियों’ का..!!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बजट 2018: देश के विकास को गति देने वाला बजट

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को नरेन्द्र मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल का आखिरी पूर्ण बजट पेश किया। आमतौर पर चुनावी वर्ष में सरकारें लोकलुभावन (पर वास्तविक तौर पर अव्यावहारिक) बजट पेश करती रही हैं, लेकिन इसके उलट वर्तमान एनडीए सरकार ने देश की मजबूती को प्राथमिकता देते हुए बजट देने का नैतिक साहस दिखाया है। खास कर कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, इंफ्रास्ट्रक्टर आदि क्षेत्रों में कई बड़े कदम उठाए गए हैं, जो आने वाले दिनों में देश के विकास को निश्चित तौर पर गति देंगे। चलिए जानने की कोशिश करते हैं कि क्या हैं बजट 2018 की बड़ी बातें।

सबसे पहले बात करते हैं कृषि की। इस बजट में किसानों को उनकी फसल के लागत मूल्य का डेढ़ गुना देने, सभी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य, 2000 करोड़ की लागत से बनने वाले कृषि बाजार और नए ग्रामीण बाजार ‘ई-नैम’ का ऐलान किया गया है। इसके अलावे ‘ऑपरेशन ग्रीन’ के लिए 500 करोड़ रुपये, 42 मेगा फूड पार्क और जानवरों को पालने वालों को भी किसान क्रेडिट कार्ड देने की घोषणा की गई है। यही नहीं, जरूरतमंद किसानों के कर्ज के लिए 11000 करोड़ रुपये के फंड का प्रावधान भी किया गया है। निश्चित तौर पर ये योजनाएं देश में कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगी।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोदी सरकार ने देश के 10 करोड़ परिवारों के लिए हर साल 5 लाख रुपए तक के मेडिक्लेम का ऐलान किया है। दुनिया की इस सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना से 50 करोड़ लोगों को लाभ पहुँचेगा। इसके अलावा देश भर में 5 लाख स्वास्थ्य सेंटर और हर तीन संसदीय क्षेत्र पर एक मेडिकल कॉलेज खोलने की बात कही गई है। साथ ही अगले वित्त वर्ष में दो करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया गया है, जो देश की आम जनता के स्वास्थ्य के लिए कितना जरूरी है, कहने की जरूरत नहीं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी वित्तमंत्री ने कई बड़े ऐलान किए। सबसे अहम यह कि उन्होंने प्री नर्सरी से लेकर 12वीं क्लास तक को समग्र रूप से देखने की बात कही, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी तौर पर विकास हो सके। आदिवासियों के लिए नवोदय विद्यालय की तर्ज पर एकलव्य स्कूलों की स्थापना की जाएगी। सरकार प्रधानमंत्री रिसर्च फेलो स्कीम शुरू करेगी जिसमें 1000 बीटेक छात्र चुने जाएंगे और उन्हें आईआईटी से पीएचडी करने का अवसर दिया जाएगा। इसके अलावा प्लानिंग और आर्किटेक्चर स्कूल शुरू किए जाएंगे, साथ ही 18 नई आईआईटी और एनआईआईटी की स्थापना की जाएगी। मेडिकल कॉलेजों की बात हम ऊपर कह ही आए हैं।

आधारभूत संरचना की बात करें तो इस क्षेत्र में यह बजट अत्यन्त कारगर होगा। इसमें 16 नए इंटरनेशनल लेवल के एयरपोर्ट तैयार करने की बात कही गई है, जिसके बाद देश में एयरपोर्टों की संख्या 124 हो जाएगी। इसके अलावा 600 रेलवे स्टेशनों के आधुनिकीकरण की योजना बनाई गई है और गांवों में 1 करोड़ घर बनाने का लक्ष्य रखा गया है ताकि 2022 तक हर गरीब के पास अपना घर हो।

अब बात युवाओं की। जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में कहा करते हैं, इस देश की 65 प्रतिशत आबादी युवाओं की है। इन युवाओं को सरकार ने स्वाभाविक तौर पर अपनी प्राथमिकताओं में जगह दी है। नए वित्तीय वर्ष में 70 लाख नौकरियों का लक्ष्य रखा गया है, जबकि 50 लाख युवाओं को नौकरी के लिए ट्रेनिंग भी सरकार ही देगी। साथ ही व्यापार शुरू करने के लिए भी केन्द्र सरकार ने मुद्रा योजना के तहत 3 लाख करोड़ रुपये ऋण देने का लक्ष्य तय किया है। यही नहीं, हर जिले में स्किल सेंटर खोले जाएंगे और 2.5 लाख गांवों में ब्रॉडबैंड को बढ़ावा दिया जाएगा। ये सभी योजनाएं देश के युवाओं के लिए सीधे रोजगार का माध्यम बनेंगी।

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बुद्ध की सोच ‘लाइट ऑफ एशिया’: राष्ट्रपति कोविंद

गुरुवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद एकदिवसीय यात्रा पर बिहार के राजगीर में थे। मौका था अंतरराष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय व इंडिया फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय धर्म धम्म सम्मेलन के उद्घाटन का और उनके साथ मौजूद थे बिहार के राज्यपाल सत्य पाल मलिक, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और श्रीलंका के विदेश मंत्री तिलक मारापना सहित कई गणमान्य।

इस अवसर पर अपने संबोधन में राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि 21वीं सदी में भी भगवान बुद्ध के विचार हमें प्रेरित कर रहे हैं। सही मायने में बुद्ध की सोच ‘लाइट ऑफ एशिया’ है। उन्होंने कहा कि एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में दुनिया की आधी से अधिक आबादी ऐसी जगहों पर रह रही है जो भगवान बुद्ध के ज्ञान से प्रभावित है और उस ज्ञान से लगातार प्रेरित हो रही है।

राष्ट्रपति ने कहा कि धर्म धम्म परंपरा यह कहती है कि किस तरह निरंतरता से खुद को बेहतर करना है। इसकी क्या जरूरत और महत्ता है। किस तरह से हमें उच्च स्तर का ज्ञान हासिल करना है। यह ज्ञान ही है जिससे राजकुमार सिद्धार्थ भगवान बु्द्ध बने और महान योद्धा अशोक बन गए धम्म अशोका। बुद्ध के विचार हमें जीने के सिद्धांत की ओर प्रेरित करते हैं। ईमानदारी और पारदर्शिता की ओर हमें ले जाकर सह अस्तित्व की भावना को विकसित करते हैं।

इस मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का सपना था। यह विश्वविद्यालय उनके सपनों का मूर्त रूप है। यह महावीर, बुद्ध तथा गुरुनानक की धरती है, जिन्होंने पूरे विश्व को शांति का संदेश दिया। उन्होंने वैश्विक समस्याओं के निवारण के लिए अंतररराष्ट्रीय रिजोल्यूशन सेंटर खोलने पर भी बल दिया।

चलते-चलते यह कहना बेहद जरूरी प्रतीत होता है कि हाल के दिनों में बिहार की बौद्धिक-सांस्कृतिक सक्रियता जिस तरह बढ़ी है, वह नीतीश कुमार जैसे विचारशील और संस्कारयुक्त अगुआ के बिना मुमकिन ना थी। ऐसी तमाम गतिविधियों के लिए वे और उनकी सरकार साधुवाद के पात्र हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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