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अलविदा, वीर आशीष !

आज जबकि दुनिया स्वयं तक सिमटती जा रही है, ऐसे में देश और समाज की खातिर प्राण न्योछावर कर देना वाला कोई शख्स सामने आता है और यह विश्वास दिला जाता है कि दुनिया अभी भी इतनी ‘संकीर्ण’ नहीं हुई है कि इंसानियत को घुटन होने लगे। ऐसे ही थे खगड़िया में तैनात और सहरसा में जन्मे जांबाज दारोगा आशीष कुमार सिंह जो कल देर रात अपराधियों से लोहा लेते शहीद हो गए।

वीर आशीष को नाज था अपनी वर्दी पर… कर्तव्य निभाने का जुनून ऐसा कि अपराधियों के एक कुख्यात गैंग की ख़बर मिलते ही रात के एक बजे ट्रैक्टर से निकल पड़े उनका अंत करने। गोली लगने के बाद भी डटे रहे और एक अपराधी को ढेर करके ही माने। ऐसा नहीं था कि गोली उन्हें पहली बार लगी थी लेकिन इस बार एक के बाद एक चार-चार गोलियां उतर गई थीं उनके भीतर..!

2009 में दारोगा की परीक्षा पास करने के बाद आशीष जहां भी गए उस थाना क्षेत्र में अपनी अलग पहचान कायम की। बेगूसराय में भी दो थाना क्षेत्रों में उन्होंने अपराधियों को नाको चने चबवाया था। वो बेखौफ होकर अपराधियों से लोहा लेते थे। पिछले साल जब वो मुफस्सिल थाना प्रभारी थे तब भी एक मुठभेड़ में उन्हें गोली लगी थी लेकिन वो बच गए। काश इस बार भी..! लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनके साथ गए एक सिपाही को भी कमर के नीचे गोली लगी जिसका इलाज भागलपुर अस्पताल में चल रहा है।

आशीष कुमार न केवल जांबाज सिपाही थे बल्कि एक बेहद संवेदनशील व्यक्ति थे जो समाज के गरीब गुरबों और जरूरतमंदों की मदद के लिए हमेशा आगे आए। उनकी मां कैंसर की बीमारी से पीड़ित थीं। आशीष खुद उन्हें लेकर इलाज के लिए दिल्ली आया-जाया करते थे। पिता गोपाल सिंह के तीन बेटों में सबसे छोटे आशीष अपने पीछे पत्नी और दो मासूम बच्चों को, जिनमें एक बेटा है और एक बेटी, छोड गए हैं। आज सरोजा गांव में मातम पसरा हुआ है। ऐसा कोई शख्स नहीं जिसकी आँखें नम ना हों।

आशीष, मेरे भाई, मुझे गर्व है कि मैं भी कोसी की उसी मिट्टी से उपजा हूँ, जिससे तुम उपजे थे..!! ये वक्त नहीं था तुम्हारे जाने का लेकिन जब ‘महाप्रयाण’ पर तुम चले ही गए हो, मैं रोऊँगा नहीं तुम्हारे लिए, बल्कि बोऊँगा तुम्हारे व्यक्तित्व का अंश अपनी सोच, अपनी जुबान और अपनी कलम से, जितना संभव हो सके और जितनी सामर्थ्य रही, जीवन भर..!!!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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भारत में कम हुई गरीबी, स्थिति फिर भी भयावह

गरीबी कम करने की दिशा में भारत ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। संयुक्त राष्ट्र के द्वारा गरीबी को लेकर दी गई जानकारी के अनुसार साल 2005-06 से लेकर 2015-16 के बीच गरीबी दर घटकर आधी रह गई है। गरीबी दर पहले 55 फीसदी थी जो इन दस वर्षों में 28 फीसदी पर आ गई। संख्या के हिसाब से देखें तो साल 2005-06 में देश में गरीबों की तादाद 63.5 करोड़ थी, जो 2015-16 तक घटकर 36.4 करोड़ रह गई। इस आंकड़े का एक दिलचस्प पहलू यह है कि इस अवधि में कुल 27.1 करोड़ लोग गरीबी के दलदल से बाहर निकले हैं और यह आंकड़ा इंडोनेशिया की कुल आबादी से भी ज्यादा है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक इस एक दशक में भारत में तेजी से कम हो रही गरीबी का अहम ट्रेंड यह रहा कि समाज के सबसे गरीब तबके की स्थिति में खासा सुधार हुआ है। खासकर मुस्लिम, दलित और एसटी कैटिगरी के लोगों ने इस दौरान सबसे ज्यादा विकास किया। गरीबी को दूर करने की दिशा में किए जा रहे अपने प्रयत्नों के कारण ताजा मानव विकास सूचकांक में भारत 189 देशों में एक स्थान ऊपर चढ़कर 130वें स्थान पर पहुंच गया है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि ऊपर के सारे आंकड़े हमें आश्वस्त करते हैं, लेकिन हम इस सच से हरगिज मुंह नहीं चुरा सकते कि अब भी हमारे देश में 36 करोड़ से ज्यादा लोग किसी न किसी रूप में गरीबी झेल रहे हैं। हमें पता होना चाहिए कि भारत में अब भी दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब रहते हैं और यह संख्या अमेरिका की आबादी से ज्यादा है।

आपको बता दें कि भारत में रहने वाले कुल गरीबों के आधे से भी ज्यादा यानि 19.6 करोड़ लोग केवल चार राज्यों – बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश – में रहते हैं, जबकि दिल्ली, केरल और गोवा में इनकी संख्या सबसे कम है। इन आंकड़ों की एक भयानक तस्वीर यह भी है कि 41 फीसदी भारतीय बच्चे या 10 साल से कम उम्र के हर 5 में से 2 बच्चे हर तरह से गरीब हैं। वहीं, वयस्कों यानि 18-60 साल उम्र वर्ग के लोगों में लगभग एक चौथाई (24 फीसदी) गरीब हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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चलो, कुछ यूँ मनाएं रक्षाबंधन

नेता और स्टेट्समैन में क्या फर्क होता है, ये जानना हो तो तो कोई नीतीश कुमार के कार्यों को देखे। एक अच्छा नेता वर्तमान को संवार सकता है, लेकिन एक स्टेट्समैन आने वाली पीढ़ियों के लिए सोचता है। विज़न दोनों के पास होता है, लेकिन दोनों के फैलाव और प्रभाव में बहुत फर्क होता है। अब रक्षाबंधन को ही लें। इस दिन अपनी बहनों के अलावे अपने जिले या राज्य की अन्य बच्चियों या महिलाओं से राखी बंधवाते कई नेता देखे जा सकते हैं, लेकिन पिछले छह वर्षों से इस दिन पेड़ों को राखी बांधते किसी राज्य का मुखिया देखा जाता है तो वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं।

जी हाँ, यह बिहार के इस अनोखे रक्षाबंधन का सिलसिला आज से छह साल पहले शुरू हुआ। वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रक्षाबंधन पर राजधानी वाटिका में वृक्षों को रक्षा-सूत्र से बांधकर इनकी हिफाजत करने तथा पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया था। आज भी रक्षाबंधन के मौके पर नीतीश कुमार ने राजधानी वाटिका स्थित अपने लगाए हुए पाटलि के वृक्षों को राखी बांधी। इस मौके पर भव्य समारोह आयोजित हुआ जिसमें उपमुख्यमंत्री एवं वन व पर्यावरण मंत्री सुशील कुमार मोदी, ऊर्जा मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव, स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय, शिक्षा मंत्री कृष्ण नंदन प्रसाद वर्मा, पथ निर्माण मंत्री नंदकिशोर यादव, मुख्य वन संरक्षक डीके शुक्ला सहित कई गणमान्य ने वृक्षों को रक्षा-सूत्र से बांधा।

इस बेहद खास मौके पर मुख्यमंत्री ने वृक्षारोपण भी किया। उन्होंने आह्वान किया कि रक्षाबंधन के दिन सभी लोग वृक्ष को रक्षा सूत्र से बांधें। बिहार में यह एक नई परम्परा शुरू हुई है जिसे आप सब आगे बढ़ाएं। मुख्यमंत्री के आह्वान पर लोगों ने इको पार्क के वृक्षों को राखी बांधी। विभिन्न स्कूलों की बच्चियों का उत्साह इस अवसर पर देखने लायक था। क्या हम यह संकल्प नहीं ले सकते कि पहले बिहार का, फिर देश का हर व्यक्ति इस दिन एक पेड़ को जरूर राखी बांधे? नीतीश कुमार के विज़न को सही विस्तार मिले, इसके लिए क्या इतनी-सी जहमत नहीं उठा सकते हमलोग?

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप’

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लौटकर आइएगा अटलजी..!

भारत के अनमोल रत्न, देश के सार्वकालिक महान व्यक्तित्वों में एक, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे। देश भर की दुआएं काम ना आईं। कल हमलोगों ने राष्ट्रीय उत्सव मनाया और आज नियति ने सवा सौ करोड़ भारतवासियों को राष्ट्रीय शोक दे दिया। अटल जी पिछले कई वर्षों से बीमार चल रहे थे और 11 जून को तबीयत अधिक बिगड़ने के बाद उन्हें एम्स लाया गया था। दो दिनों से वे वेंटिलेटर पर थे और आज 94 वर्ष की उम्र में शाम 5 बजकर 5 मिनट पर यहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।

किसी बड़े व्यक्ति के जाने पर आमतौर कहने का चलन है कि ये ‘अपूरणीय क्षति’ है, पर अटल बिहारी वाजपेयी नाम के शख्स के जाने से बनी रिक्तता सचमुच कभी नहीं भरी जा सकती। भारत के मानचित्र पर जैसे हिमालय जैसा दूसरा संबल नहीं हो सकता, हमारी अंजुलि में जैसे गंगा जैसा दूसरा जल नहीं हो सकता, वैसे ही इस वसुंधरा पर दूसरा अटल नहीं हो सकता। संवेदना से ओतप्रोत कवि, विचारों से लबालब बेजोड़ वक्ता, विनम्रता और शालीनता की प्रतिमूर्ति, नेताओं की भीड़ में अद्वितीय स्टेट्समैन जिसकी भव्यता ना तो किसी पार्टी में समा सकती थी ना प्रधानमंत्री जैसे पद में – काजल की कोठरी कही जाने वाली राजनीति में जैसे तमाम अच्छी चीजें उन्होंने समेट रखी हो अपने भीतर।

आज जबकि राजनीति पर विश्वसनीयता का संकट आन पड़ा है, ‘सांकेतिक’ ही सही अटलजी की मौजूदगी की बेहद जरूरत थी हमें। बहरहाल, पूरा देश शोकाकुल है आज। राजनेताओं से लेकर तमाम क्षेत्रों के दिग्गज उन्हें भाव-विह्वल श्रद्धांजलि दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा, “उनका जाना पिता का साया सिर से उठने जैसा है।” बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा, “देश ने सबसे बड़े राजनीतिक शख्सियत, प्रखर वक्ता, लेखक, चिंतक, अभिभावक एवं करिश्माई व्यक्तित्व को खो दिया।” उनके निधन को लेकर सात दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई है। कई राज्यों ने भी राजकीय शोक और अवकाश की घोषणा की है। बिहार में सात दिनों के राजकीय शोक और शुक्रवार 16 अगस्त के अवकाश की घोषणा की गई है।

अटलजी का पार्थिव शरीर कृष्ण मेनन मार्ग स्थित उनके आवास पर रातभर रखा जाएगा। सुबह 9 बजे पार्थिव देह भाजपा मुख्यालय ले जाई जाएगी। दोपहर 1 बजे अंतिम यात्रा शुरू होगी, जो राजघाट तक जाएगी। वहां महात्मा गांधी के स्मृति स्थल के नजदीक 4 बजे अटलजी का अंतिम संस्कार किया जाएगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि अटलजी की अस्थियां प्रदेश की सभी नदियों में प्रवाहित की जाएंगी।

25 दिसंबर 1924 को जन्मे अटलजी 10 बार लोकसभा के सदस्य, दो बार राज्यसभा के सदस्य और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे। उनके प्रशंसक भारत ही नहीं दुनिया के हर कोने में मिल जाएंगे। उन जैसे नेता सदियों में होते हैं और इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। अटलजी, श्रद्धांजलि शब्द छोटा है आपके लिए, श्रद्धा का पूरा घट ही अर्पित करता हूँ आपको… बस अपना कहा पूरा करिएगा – मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? – लौटकर आइएगा अटलजी..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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असाधारण है राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश का सफर

पत्रकारिता जगत के बड़े स्तंभ, शालीन व्यक्तित्व के धनी, जदयू के प्रखर सांसद और एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति चुने गए। भारत जैसे बड़े देश के इतने बड़े संवैधानिक पद पर पहुँचने के मूल में सबसे पहले तो उनका अपना व्यक्तित्व है, साथ ही जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बड़े कद और कैनवास का सबूत भी इससे मिला है। भाजपा जानती थी कि उसके पास इस पद के लिए पर्याप्त संख्याबल नहीं है, लिहाजा उसने जदयू के हरिवंश का नाम आगे किया ताकि नीतीश कुमार के प्रभाव से वैसे दलों का साथ (बीजेडी, टीआरएस, पीडीपी आदि) भी उसे मिले, जो किसी अन्य स्थिति में उसे शायद ही मिलते।

बहरहाल, गुरुवार को उपसभापति चुने जाने के बाद 62 वर्षीय हरिवंश ने अपने बचपन के संघर्ष के दिनों को याद किया। सम्पूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण के गांव सिताब दियारा में पैदा हुए हरिवंश ने कहा, ‘मैंने पेड़ के नीचे पढ़ाई की, मैं एक साधारण प्राइमरी स्कूल में पढ़ा। लुटियंस दिल्ली तक मेरा सफर केवल आप सबकी वजह से तय हो पाया है। हमारे गांव में सड़क नहीं थी। अगर कोई बीमार होता था तो उसे 15 किलोमीटर तक चारपाई पर ले जाना पड़ता था। हमने कई वर्षों के बाद बिजली देखी। हम दीये में पढ़ाई किया करते थे।’
हरिवंश का जन्म 1956 में बलिया उत्तर प्रदेश के सिताब दियारा गांव में हुआ था। उन्होंने 1977 में बीएचयू से अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रैजुएशन किया। इसके बाद उन्होंने ‘धर्मयुग’ से पत्रकारिता की शुरुआत की। 1990 से 91 तक उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सलाहकार के रूप में पीएमओ में भी काम किया। 1990 से 2017 तक हरिवंश बिहार-झारखंड के प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘प्रभात खबर’ के मुख्य संपादक रहे और इसके सर्कुलेशन को उन्होंने 400 से लाखों तक पहुँचाया। 2014 में जेडीयू की तरफ से उन्हें राज्यसभा सांसद चुना गया। उन्होंने 19 किताबें लिखी हैं और हिन्दी के सम्मान और स्थान के लिए सदैव संघर्षरत रहे हैं। समाज के वंचित वर्ग, विशेषकर आदिवासियों की तो वे आवाज ही रहे हैं। बता दें कि दशरथ मांझी के संघर्ष को आज जो राष्ट्रीय पहचान मिली है, उसके मूल में हरिवंश ही हैं।

चुनाव की औपचारिकता पूरी होने के बाद अपने संबोधन में हरिवंश ने कहा कि वे राज्यसभा की गरिमा बनाए रखने का हमेशा प्रयास करेंगे और आशा जताई कि बहस, सर्वसम्मति और मार्गदर्शन से मतभेदों को सुलझाया जाएगा। आगे उन्होंने दिल को छू लेने वाली एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही कि वह इस पद पर उसी तरह रहेंगे जैसे अपने गांव में गंगा और घाघरा दो नदियों के बीच रह चुके हैं। वहां अकसर बाढ़ का खतरा बन जाता था और लोग सोचते थे कि हो सकता है यही उनका आखिरी दिन हो। इतनी गहरी सोच रखने वाले हरिवंश जी को इतने बड़े पद पर पहुँचने और कलम का सम्मान करने वालों का मान विशेष तौर पर बढ़ाने के लिए हम ह्रदय से बधाई देते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इमरान का हुआ पाकिस्तान

क्रिकेट की दुनिया में कभी पाकिस्तान को शिखर पर पहुँचाने वाले इमरान खान के ऊपर अब कई संकटों और चुनौतियों से घिरे अपने पूरे मुल्क को ऊपर उठाने की जिम्मेवारी होगी। जी हाँ, पाकिस्तान में अभी-अभी हुए चुनावों में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाले इमरान अपने मुल्क के अगले कप्तान होंगे। कहा जाता है कि 2002 में तत्कालीन सैन्य तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का ऑफर दिया था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था और जनता की अदालत से इस पद तक पहुँचने की ठानी थी। आखिरकार 17 साल बाद उनकी इच्छा पूरी होती दिख रही है।

पाकिस्तान के चुनाव परिणामों की आधिकारिक और अंतिम घोषणा अभी नहीं हुई, लेकिन क्रिकेटर से नेता बने इमरान का पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय है। त्रिशंकु नेशनल असेंबली में उनकी पार्टी पीटीआई सबसे ज्यादा 119 सीटों पर आगे है, जबकि नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल-एन 62 और बिलावल भुट्टो की पीपीपी 44 सीटों तक सिमटती दिख रही है। गौरतलब है कि 272 सीटों वाले सदन में बहुमत का आंकड़ा 137 है। ऐसे में इमरान को सरकार बनाने में विशेष कठिनाई होगी, ऐसा नहीं लगता। ऐसा इसलिए भी नहीं लगता क्योंकि अब ये ‘ओपेन सिक्रेट’ है कि पाकिस्तान की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाली वहां की सेना इमरान का समर्थन कर रही है।

बहरहाल, पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को अपना रोल मॉडल मानने वाले इमरान खान ने क्रिकेट की दुनिया छोड़कर 1996 में राजनीतिक दल पीटीआई की स्थापना की थी। संयोग देखिए कि जिन्ना ने 1910 में राजनीति शुरू की थी लेकिन उन्हें सफलता 1937 में मिली थी। ठीक वैसे ही 66 साल के इमरान खान भी 22 साल के राजनीतिक संघर्ष के बाद प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। आज सुनकर किसी को आश्चर्य लग सकता है कि 1997 के चुनावों में इमरान ने केवल 9 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और सभी सीटों पर उनकी पार्टी की हार हुई थी। यहां तक कि 7 सीटों पर उनके उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी। लेकिन समय का खेल देखिए, आज वही इमरान पाकिस्तान की सियासत के सबसे बड़े खिलाड़ी बनकर उभरे हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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महाकवि नीरज: लगेंगी सदियां उन्हें भुलाने में

महान गीतकार, महाकवि गोपालदास नीरज, दिनकर ने जिन्हें ‘हिन्दी की वीणा’ कहा था, नहीं रहे। 19 जुलाई की शाम 93 वर्ष के नीरज जी का दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया। ‘दर्द दिया है’, ‘आसावरी’, ‘बादलों से सलाम लेता हूँ’, ‘गीत जो गाए नहीं’, ‘नीरज की पाती’, ‘नीरज दोहावली’, ‘गीत-अगीत’, ‘कारवां गुजर गया’, ‘पुष्प पारिजात के’, ‘काव्यांजलि’, ‘नीरज संचयन’, ‘नीरज के संग-कविता के सात रंग’, ‘बादर बरस गयो’, ‘मुक्तकी’, ‘दो गीत’, ‘नदी किनारे’, ‘लहर पुकारे’, ‘प्राण-गीत’, ‘फिर दीप जलेगा’, ‘तुम्हारे लिये’, ‘वंशीवट सूना है’ और ‘नीरज की गीतिकाएँ’ जैसी रचनाओं से हमारी भाषा और संवेदना को समृद्ध करने वाले नीरज जीवन भर कविता लिखने में लगे रहे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हिन्दी के माध्यम से जहां उन्होंने साधारण पाठकों के मन और मस्तिष्क में अपनी जगह बनाई वहीं गंभीर पाठकों को भी झंझोरा। उनकी अनेक कविताओं के अनुवाद गुजराती, मराठी, बंगाली, पंजाबी, रूसी आदि भाषाओं में हुए।

गोपाल दास नीरज का जन्म 4 जनवीर 1925 में उत्तर प्रदेश के इटावा के एक गांव में हुआ था। प्रारंभ में उनके ऊपर हरिवंश राय बच्चन जी का गहरा प्रभाव रहा। बाद में उन्होंने अपना रास्ता खुद तलाश किया। बकौल नीरज जी बच्चन जी से पहले हिन्दी कविता आकाश में घूम रही थी, वह जीवन से संबंधित नहीं थी। बच्चन जी ने आकाशीय कविता को उतारकर जमीन पर खड़ा कर दिया और सामान्य आदमी जैसा सुख-दुख भोग रहा है, उस सुख-दुख की कहानी उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से कही। ठीक यही काम नीरज जी ने किया। देश की कई पीढ़ियों के दिल की आवाज़ को वे आजीवन गुनगुनाहट में बदलते रहे। इसमें शायद ही किसी की दो राय हो कि बच्चन जी के बाद मंच पर किसी ने पूरी ठसक और धमक के साथ राज किया तो वे नीरज ही थे। एक बार की बात है कि बस में वे और बच्चनजी एक साथ यात्रा कर रहे थे। जगह कम होने के काऱण बच्चन जी ने उनसे कहा था कि मेरी गोद में बैठ जाओ। तब नीरज जी ने कहा था, आपकी गोद में तो बैठा ही हूँ, लेकिन आपकी गोद का भी सम्मान रखूँगा, एक दिन इसी तरह लोकप्रिय होऊँगा जिस तरह आप हुए हैं। बच्चन जी ने इस पर आशीर्वाद दिया था उन्हें और ये आशीर्वाद किस कदर लगा इसका सबूत उनके लाखों चाहने वाले देंगे आपको।

पद्मभूषण से सम्मानित गोपाल दास नीरज ने कई प्रसिद्ध फिल्मों के गीतों की रचना भी की। महज पाँच साल के फिल्मी सफर में उन्होंने तीन बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार जीता। ‘कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे’, ‘जीवन की बगिया महकेगी’, ‘काल का पहिया घूमे रे भइया!’, ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ’, ‘ए भाई! ज़रा देख के चलो’, ‘शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब’, ‘लिखे जो खत तुझे’, ‘दिल आज शायर है’, ‘खिलते हैं गुल यहां’, ‘फूलों के रंग से’, ‘रंगीला रे! तेरे रंग में’, ‘आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं’ जैसे गीतों को भला कौन भूल सकता है। ये गीत हिन्दी सिनेमा के लिए किसी धरोहर से कम नहीं।

बहरहाल, नीरजजी कारवां लेकर आगे गुजर गए लेकिन उसका गुबार सदियों तक कायम रहेगा। उन्होंने बिल्कुल सही कहा था – इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में। शब्दो के उस मसीहा को मेरा शत्-शत् नमन।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. अमरदीप

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20 मई 1570 को मिला था दुनिया को पहला एटलस

बहुत खास दिन है 20 मई। क्यों खास है, यह जानने के लिए आज से लगभग 450 साल पहले की कल्पना कीजिए। दुनिया का कोई मुकम्मल नक्शा नहीं था तब। पृथ्वी की भौगोलिक बनावट को समझ पाना कितना कठिन रहा होगा उस समय। ऐसे में एटलस की परिकल्पना करना और उसे साकार कर देना असंभव-सा प्रतीत होता है, पर 1570 ई. में आज ही के दिन यानि 20 मई को अब्राहम ऑर्टेलियस ने दुनिया का पहला आधुनिक एटलस प्रकाशित किया और इसे बड़ा सही नाम दिया – Theatrum Orbis Terrarum यानि Theatre of the World अर्थात् दुनिया का रंगमंच। सच्चे अर्थों में दुनिया का रंगमंच ही था वो। इसमें उन्होंने कई कार्टोग्राफर के काम को उनकी व्याख्या और स्रोतों के साथ समाहित किया था। कुछ खामियों और सीमाओं के बावजूद ऑर्टेलियस के इसी एटलस ने व्यवहार में लाए जाने वाले आज के सभी एटलस की नींव रखी थी।

4 अप्रैल 1527 को बेल्जियम के एंटवर्प में जन्मे अब्राहम ऑर्टेलियस पेशे से भूगोलविद और मानचित्र निर्माता थे। उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में पहला मैप मिस्र का बनाया था। एशिया, स्पेन और रोमन साम्राज्य के नक्शे भी उन्होंने बनाए। 16वीं शताब्दी में प्रकाशित उनके एटलस में 53 मानचित्र थे। यह वो समय था जब दुनिया में नए-नए इलाके खोजे जा रहे थे। अमेरिका, अफ्रीका के कई देशों को इस सदी में दुनिया ने जाना। बता दें कि ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका के बारे में तब कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए इस एटलस में पांच महाद्वीपों के ही नक्शे हैं।

ऑर्टेलियस के एटलस से दुनिया की खोज में निकले लोगों को अपनी मंजिल ढूंढ़ने में खासी मदद मिली, संचार में आसानी हुई और उनके नक्शों ने लोगों को पहली बार वैश्विक दृष्टिकोण का साक्षात्कार कराया। कॉन्टिनेन्टल ड्रिफ्ट थ्योरी, जिसमें कहा जाता है कि दुनिया के सारे द्वीप आपस में जुड़े हुए थे और धीरे-धीरे वे टूटना शुरू हुए, की प्रारंभिक जानकारी भी इस एटलस से मिलती है।

अब्राहम ऑर्टेलियस असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उनका कई भाषाओं पर अधिकार था। वह बचपन से ही डच, ग्रीक, लैटिन, इटालियन, फ्रेंच, स्पैनिश और कुछ हद तक जर्मन और अंग्रेजी भी बोल सकते थे। उन्होंने क्लासिक साहित्य का अध्ययन किया और विज्ञान के विकास से भी लागातार अपने आप को जोड़े रखा। यह ऑर्टेलियस का ही भगीरथ प्रयत्न था कि दुनिया के ‘कैनवास’ को उसका सही विस्तार मिला। 1570 में अपने एटलस के प्रकाशन के बाद भी दुनिया को समझने और समझाने की उनकी ललक कम न हुई। यही कारण है कि 1622 में जब उनके एटलस का अंतिम संस्करण प्रकाशित हुआ तब उसमें 167 मैप थे। उनके इस अवदान की ऋणी पूरी मानव-सभ्यता है। इस महान शख्सियत की मृत्यु 71 वर्ष की आयु में 28 जून 1598 को हुई। उन्हें और दुनिया को उनके योगदान को हमारा नमन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश की मोदी से मांग, ‘भारत रत्न’ मिले लोहिया को

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ सम्मान से नवाजा जाए। प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि 12 अक्टूबर को डॉ. लोहिया की पुण्यतिथि है, इसी दिन उन्हें भारत का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने अनुरोध किया है कि गोवा हवाई अड्डे का नामकरण भी डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम पर किया जाए क्योंकि पुर्तगालियों से गोवा को आजाद कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डॉ. राम मनोहर लोहिया के जीवन से जुड़े कई किस्सों का भी अपने पत्र में जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि संसद में नेहरू की सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए लोहिया ने पूरे विपक्ष को गैर-कांग्रेसवाद की धुरी पर इकट्ठा किया और उनकी कोशिशों की वजह से देश में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बन सकी।

सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह की मुहिम में लगे प्रधानमंत्री को उन्होंने खास तौर पर याद दिलाया कि ‘लोहिया ने गांवों में महिलाओं के लिए दरवाजा बंद शौचालयों के निर्माण की मांग को लेकर लगातार मुहिम चलाई और तत्कालीन सरकार पर दबाव भी बनाते रहे।’ नीतीश ने लिखा, डॉ. लोहिया नेहरू विरोधी थे और उनका कहना था कि यदि नेहरू सभी गांवों में महिलाओं के लिए शौचालय बनवा दें तो मैं उनका विरोध करना बंद कर दूंगा। लोहिया ने स्वच्छता और स्त्री स्वास्थ्य के लिए हमेशा प्रयास किया।

महिलाओं के लिए बिहार में आरक्षण समेत कई ऐतिहासिक कदम उठाने वाले मुख्यमंत्री ने महिलाओं के लिए ‘उज्जवला योजना’ लागू करने वाले प्रधानमंत्री को आगे लिखा कि किस तरह ग्रामीण क्षेत्रों की औरतों के लिए धुआंमुक्त चूल्हों की तकनीक को प्रत्येक रसोई में पहुँचाने की खातिर भी लोहिया की मजबूत आवाज संसद में और सड़कों पर लगातार गूंजती रही। पिछली सदी के मध्य में भारत की तत्कालीन सरकार और समाज को इन बिन्दुओं पर जागृत करना उनकी दूरदृष्टि का परिचायक है। इसके अलावा नीतीश कुमार ने भारत की आजादी की लड़ाई में लोहिया के योगदान और अमेरिका की रंगभेद नीति के खिलाफ उनके विचारों की चर्चा भी अपने पत्र में की।

इस तरह प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर डॉ. लोहिया के द्वारा किए कई महत्वपूर्ण कार्यों की याद दिलाते हुए उनके विज़न और अतीत के साथ-साथ वर्तमान में भी उनकी प्रांसगिकता को बड़ी मजबूती से रेखांकित किया। उनकी मांग पर केन्द्र की मोदी सरकार चाहे जब फैसला करे, लेकिन कहना गलत ना होगा कि इस बहाने देश भर में लोहिया पर एक सार्थक बहस और चर्चा तो छिड़ ही गई है। लोहिया जैसे युगपुरुष के विचार पार्टी ही नहीं, राज्य व देश की सीमाओं से भी परे हैं और समाजवाद के इस पुरोधा हेतु ‘भारत रत्न’ की मांग करने के लिए नीतीश कुमार नि:संदेह साधुवाद के पात्र हैं। यहां स्मरणीय है कि इससे पहले नीतीश कुमार बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री व देश के समाजवादी नेताओं में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले जननायक कर्पूरी ठाकुर को भी ‘भारत रत्न’ देने की मांग का समर्थन कर चुके हैं।
‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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एटीएम से खाली हाथ लौटने का कारण हम हैं, सरकार नहीं !

क्या पिछले कुछ दिनों में ऐसा हुआ है कि आप पैसे निकालने एटीएम गए हों और आपको खाली हाथ लौटना पड़ा हो, या तीन-चार एटीएम के दर्शन करने के बाद आपकी जरूरत पूरी हुई हो? इन दिनों ये बात आम-सी हो गई है कि एटीएम का शटर या तो गिरा हुआ है या फिर एटीएम के आगे ‘कैश नहीं है’ की तख्ती लगी हुई है। ऐसा आखिर हो क्यों रहा है? बहुत संभव है कि ऐसा होने पर आपने आरबीआई या सरकार को कोसा हो या किसी को कोसते हुए सुना हो! बुद्धिजीवी टाइप के लोग ये बोलते भी मिल जाएंगे कि ये सारी कवायद ‘कैशलेस इकोनोमी’ के लिए की जा रही है। लेकिन वास्तविकता कुछ और है। चलिए जानने की कोशिश करते हैं।

दरअसल पिछले 5-6 दिनों से आपको जिस समस्या से दो-चार होना पड़ रहा है, वो समस्या देशव्यापी है। ऐसा किसी राज्यविशेष में या देश के किसी खास हिस्से में नहीं हो रहा। आखिर इतनी बड़ी समस्या का कारण क्या है, ये पूछने पर सरकार के आर्थिक मामलों के सचिव एस. सी. गर्ग बताते हैं कि इसके मूल में पिछले 15 दिनों में सामान्य से 3 गुना ज्यादा नोटों की निकासी होना है। एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने जानकारी दी कि देशभर में हर महीने 20 हजार करोड़ रुपये के नोटों की सामान्य मांग रहती है, लेकिन पिछले कुछ दिनों में कुछ इलाकों में नोटों की मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। उन्होंने कहा, ‘इस महीने के 12-13 दिनों में ही 45 हजार करोड़ करंसी की खपत हो चुकी है।’ इस अप्रत्याशित या अचानक बढ़ी मांग का कारण पूछे जाने पर गर्ग बताते हैं कि लोग इस अफवाह का शिकार होकर जल्दबाजी में पैसे निकाल रहे हैं कि आनेवाले दिनों में नोटों की कमी हो जाएगी।

बहरहाल, सरकार ने इस बाबत तमाम जरूरी कदम उठा लिए हैं। 500 रुपये के नोटों की छपाई पांच गुना करने की तैयारी की जा रही है। बता दें कि अभी हर दिन 500 करोड़ रुपये के मूल्य के 500 के नोटों की छपाई होती है, जिसे अगले कुछ दिनों में बढ़ाकर 2,500 करोड़ रुपये प्रतिदिन कर दिया जाएगा। इस तरह एक महीने में लगभग 75,000 करोड़ रुपये मूल्य के 500 के नोटों की आपूर्ति होने लगेगी।

एक सजग नागरिक के तौर पर हमें जानना चाहिए कि नोटबंदी के वक्त 17.50 लाख करोड़ मूल्य के नोट सर्कुलेशन में थे, लेकिन अभी 18 लाख करोड़ के नोट हैं, यानि जरूरत से ज्यादा। इसके अतिरिक्त अभी सरकार के पास अभी करीब 2 लाख करोड़ रुपये का भंडार भी है। कहने का मतलब यह कि यह समस्या पूरी तरह से तात्कालिक है, जिससे निपटने में हम सक्षम हैं। देश में नोटों की कोई कमी नहीं है। किसी अफवाह पर बिल्कुल ध्यान ना दें। वित्त मंत्री अरुण जेटली और वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल भी नोटों की कमी को अगले तीन दिनों में दूर करने का भरोसा दिला ही चुके हैं। बिहार की बात करें तो यहां के वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी लगातार आरबीआई और बैंकों के अधिकारियों से संवादरत हैं। उन्होंने भी इस समस्या के शीघ्र दूर होने का आश्वासन दिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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