निर्भया के देश में ‘मॉम’

महज 4 साल की उम्र में कैमरे के सामने आने वाली श्रीदेवी अपने करियर के 50वें साल में ‘मॉम’ बनकर आई हैं। ‘इंग्लिश विंग्लिश’ के साथ उन्होंने अपनी दूसरी पारी धमाकेदार तरीके से शुरू की थी। अगर बलात्कार की पृष्ठभूमि में रची गई ‘मॉम’ की कहानी पर थोड़ी और मेहनत की गई होती तो इस फिल्म का धमाका उससे भी बड़ा हो सकता था। बल्कि यह क्लासिक का दर्जा पा सकती थी। बहरहाल, हिन्दी फिल्मों की पहली महिला सुपरस्टार की यह 300वीं फिल्म है और वो क्यों सुपरस्टार थीं (या हैं) यह जानने के लिए जरूर देखी जाने लायक है।

एक पंक्ति में कहें तो ‘मॉम’ एक मां के अपनी बेटी के साथ हुए बलात्कार के खिलाफ कानून का दरवाजा खटखटाने और इंसाफ न मिलने पर खुद ही उसे इंसाफ दिलाने की कहानी है। इस कहानी का दिलचस्प पहलू यह है कि जिस बेटी के लिए वह मां जमीन-आसमान एक कर देती है, वह न केवल उसकी सगी बेटी नहीं है, बल्कि उसने उसे मां का दर्जा भी नहीं दिया है। इस तरह मॉम केवल बदले की कहानी न होकर एक मां के मां का दर्जा पाने की तड़प और जद्दोजहद की कहानी भी है। बावजूद इसके, इसमें चौंकाने जैसी कोई बात नहीं क्योंकि यह फिल्म इंटरवल के बाद जिस क्लाइमेक्स की ओर बढ़ती है, वह काफी आजमाया हुआ-सा है और उसमें कोई नयापन नहीं है। इसके अलावा एक और चीज ‘मॉम’ के असर को कम करती है और वो यह कि दर्शक इससे पहले ऐसे ही विषय पर बनी रवीना टंडन की ‘मातृ’ देख चुके हैं। हालांकि ‘मॉम’ में ‘मातृ’ से इमोशन की एक परत ज्यादा है क्योंकि इसमें दो संघर्ष समानान्तर रूप से चलते हैं।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, फिल्म की कहानी और बेहतर हो सकती थी, पर इसका स्क्रीनप्ले बेहद क्रिस्प है। फिल्म का कैनवास बड़ा है और ट्रीटमेंट भी रिच है। सिनेमाटोग्राफी कमाल की है। डायलॉग्स धारदार हैं और अदाकारी के तो कहने ही क्या। अभिनय में श्रीदेवी ने तो अपनी छाप छोड़ी ही है, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अक्षय खन्ना और सजल अली का काम भी याद रखने लायक है। नवाज ने जहां एक बार फिर अपने लुक, लहजे और रेंज से चौंकाया है, वहीं अक्षय को देख कर यह बात कचोटती है कि अभिनय की अच्छी संभावना के बावजूद वो बीच-बीच में गायब क्यों हो जाते हैं।

निर्देशन की बात करें तो रवि उदयावर का काम बेहतरीन है। कई साल तक ऐड एजेंसी और ग्राफिक डिजाइनिंग के बाद बतौर डायरेक्टर यह उनकी डेब्यू फिल्म है। फिल्म के म्यूजिक के साथ एआर रहमान का नाम जुड़ा होने के बावजूद कुछ कमी रह गई-सी लगती है। हालांकि बैकग्राउंड स्कोर झकझोर देने वाला है।

कुल मिलाकर ‘निर्भया’ के इस देश में ‘मॉम’ इसलिए भी देखी जानी चाहिए कि इसमें जहां आप ‘बलात्कारी’ मानसिकता और सिस्टम को करीब से देखते हैं, वहीं गुनहगारों को अपने अंजाम तक पहुंचता देख (वो भी नारी-शक्ति के हाथों) अपने भीतर सुकून भरा एक अहसास भी उतरता पाते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप         

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