सर्वोच्च अदालत ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया

भारत के लिए बड़ा दिन। महिला सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर। मुस्लिम महिलाओं के लिए एक नए युग की शुरुआत। जी हां, देश के सबसे जटिल सामाजिक मुद्दों में से एक तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की संविधान पीठ ने मंगलवार को अपना फैसला सुना दिया। पांच में से तीन जजों जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस फली नरीमन और जस्टिस यूयू ललित ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। वहीं चीफ जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने छह महीने के लिए एक साथ तीन तलाक पर रोक लगाने और तमाम राजनीतिक दलों को साथ बैठकर कानून बनाने की सलाह दी।

बहरहाल, पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 395 पेज के अपने आदेश में कहा कि पीठ तीन तलाक या तलाक-ए-बिद्दत को 3-2 के बहुमत से खारिज करती है। कोर्ट ने तीन तलाक को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, जबकि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का हनन करता है। यह प्रथा बिना कोई मौका दिए शादी को खत्म कर देती है। कोर्ट ने मुस्लिम देशों में तीन तलाक पर लगे बैन का जिक्र किया और पूछा कि भारत इससे आजाद क्यों नहीं हो सकता?

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए तीन तलाक पर छह महीने के लिए रोक लगाते हुए केन्द्र सरकार से कहा कि वह तीन तलाक पर कानून बनाए। इस अवधि में देश भर में कहीं भी तीन तलाक मान्य नहीं होगा। सर्वोच्च अदालत ने उम्मीद जताई कि राजनीतिक दलों को विश्वास में लेते हुए केन्द्र जो कानून बनाएगा उसमें मुस्लिम संगठनों और शरिया कानून संबंधी चिन्ताओं का ख्याल रखा जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर छह महीने में कानून नहीं बनाया जाता है तब भी तीन तलाक पर शीर्ष अदालत का आदेश जारी रहेगा।

बता दें कि इससे पूर्व 11 से 18 मई तक रोजाना सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए 22 अगस्त का दिन तय किया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय में शादी तोड़ने के लिए यह सबसे खराब तरीका है। ये गैर-जरूरी है। कोर्ट ने सवाल किया था कि जो धर्म के मुताबिक ही घिनौना है, वह कानून के तहत कैसे वैध ठहराया जा सकता है? सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया था कि कैसे कोई पापी प्रथा आस्था का विषय हो सकती है?

चलते चलते ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर इस ऐतिहासिक फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट का साधुवाद। ऐसे फैसलों के कारण ही अदालत के प्रति लोगों की आस्था अब तक बनी हुई है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप  

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