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तीन करोड़ युवाओं को दुल्हन की दरकार, आखिर झुकी चीन की सरकार

चीन में तीन करोड़ युवाओं को अगले पाँच सालों में दुल्हन नहीं मिलेगी… अगले दस सालों में वहाँ काम करने के लिए युवा नहीं होंगे… और अगले पन्द्रह सालों में वहाँ की 75 प्रतिशत आबादी बूढ़ी होगी… हैरतअंगेज आंकड़े हैं ये, लेकिन सच हैं। इन्हीं वजहों से 37 साल के बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ को खत्म कर दिया है। अब वहाँ भी भारत की तरह ‘हम दो, हमारे दो’ का सिद्धांत लागू होगा। हमारा देश इस सिद्धांत के प्रति कितना ‘गम्भीर’ है ये बहस का विषय है लेकिन चीन की जैसी ‘विस्फोटक’ स्थिति हो गई है, उसे देखते हुए कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर वहाँ की सरकार दो बच्चों की नीति भी वैसी ही सख्ती से लागू करे जैसी सख्ती से ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ को लागू किया गया था। ये भी सम्भव है कि सरकार आने वाले दिनों में कुछ और ‘उदारता’ दिखाते हुए ‘दो से आगे’ जाने की छूट भी दे दे।

वर्तमान में 140 करोड़ की आबादी के साथ चीन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। इस देश की ये आबादी तब है जब 1979 से वहाँ ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ बहुत कड़ाई के साथ लागू है और पिछले 37 साल में 40 करोड़ बच्चों का जन्म रोका गया। इस नीति के तहत ज्यादातर शहरी दम्पतियों को एक बच्चे और ज्यादातर ग्रामीण दम्पतियों को दो बच्चे तक सीमित कर दिया गया था। दूसरे बच्चे की इजाजत तभी थी जब पहला बच्चा लड़की हो। ये नीति शुरू से ही विवादास्पद थी क्योंकि इसके चलते हजारों की संख्या में गर्भपात होते थे। कुछ मूलभूत खामियों के बावजूद चीन की जनसंख्या जिस रफ्तार से बढ़ रही थी उसे देखते हुए तत्कालीन रुदोंग सरकार की ये नीति पूरी तरह गलत भी नहीं कही जा सकती। दुनिया जानती है कि चीन को इसका फायदा भी मिला। लेकिन समय-समय पर इसकी समीक्षा जरूरी थी। पर ऐसा नहीं हुआ और स्थिति बिगड़ती चली गई। हालात बद से बदतर होते देख वर्तमान सरकार ने लगातार चार दिन तक बैठक की और ये बड़ा निर्णय लिया।

चीन में प्रति 117 पुरुषों पर मात्र 100 महिलाएं हैं। लिंगानुपात बिगड़ने से सामाजिक ढाँचा किस हद तक चरमरा चुका है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ एक लड़की से दो से ज्यादा लड़के शादी कर रहे हैं। अविवाहित युवकों की बढ़ती संख्या देख चीनी इकोनॉमिस्ट शी जुओशी ने सुझाव दिया कि दो पुरुषों की एक महिला से शादी कानूनी करार देनी चाहिए। दूर-दराज इलाके में लोग बाकायदा ऐसा कर भी रहे हैं क्योंकि लड़कियों की बोली लग रही है।

ये तो हुई लिंगानुपात से जुड़ी समस्या। अब चीन की ‘असंतुलित’ जनसंख्या को कुछ और कोणों से समझें। 1960 के दशक में चीन में ‘बेबी बूम’ की वजह से श्रमिकों की संख्या बढ़ी थी। ये आबादी 2021 तक रिटायर हो जाएगी। बाद के दिनों में आबादी पर अंकुश था इसलिए रिटायर हो रहे श्रमिकों की जगह लेने के लिए अब पर्याप्त आबादी ही नहीं है। बहुत जल्द दिहाड़ी मजदूरों का वहाँ ‘अकाल’ पड़ने वाला है। कहने का अर्थ ये है कि 2025 तक चीन की अर्थव्यवस्था धाराशायी हो सकती है।

2014 में चीन की 21.2 करोड़ की आबादी 60 साल पार कर चुकी थी। 2013 में यह संख्या करीब 17.5 करोड़ थी। इतनी तेजी से दुनिया के किसी देश में बुजुर्गों की संख्या नहीं बढ़ी। ऐसा ही रहा तो 2030 तक चीन की 75 प्रतिशत आबादी बूढ़ी होगी। दरअसल चीन में जन्म दर 1.18 बच्चा प्रति दम्पति है जबकि वैश्विक आँकड़ा 2.5 है। यही कारण है कि यहाँ युवा होने की दर सबसे धीमी है।

2014 में सरकार को उम्मीद थी कि 2 करोड़ बच्चे पैदा होंगे। लेकिन 1.69 करोड़ बच्चे ही जन्मे। एक दिलचस्प आंकड़ा यह भी है कि 2014 में योग्य 1.1 करोड़ दम्पति में से 14.5 लाख ने ही दूसरे बच्चे के लिए आवेदन दिया। और इस साल सितम्बर तक यह आँकड़ा आश्चर्यजनक रूप से मात्र 55 हजार है। स्थिति यह है कि पिछले 15 सालों में देश के आधे से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं। यानि ये समस्या दोतरफा है। सरकार की नीति ही केवल इसके लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि लोगों की दिलचस्पी भी दूसरे बच्चे में खत्म हो गई है।

खैर, देर से ही सही चीन की सरकार जागी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वहाँ के लोग भी अब जागेंगे और ‘असंतुलित’ जनसंख्या की भीषण समस्या धीरे-धीरे सुलझ जाएगी। जरूरी है कि चीन में फिर बच्चों की ‘बहार’ हो पर ये भी देखना होगा कि ‘पुरानी गलती’ फिर ना इस बार हो।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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