लॉक डाउन में रवीन्द्र नाथ टैगोर की 160वीं जयंती मधेपुरा में इस तरह मनी

मधेपुरा की सबसे पुरानी साहित्यिक संस्था कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन जहां कोरोना संक्रमण के कारण गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की 160वीं जयंती 7 मई को आयोजित नहीं की जा सकी। सम्मेलन के अध्यक्ष हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ के निदेशानुसार सचिव डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने लाॅकडाउन के दरमियान सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करते हुए अपने परिवार के सदस्यों के बीच नोबेल पुरस्कार से सम्मानित एक सशक्त कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, निबंधकार, नाटककार, चित्रकार के साथ-साथ एक महान शिक्षक रवीन्द्र नाथ टैगोर की जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही कहा-

कि 7 मई के ही दिन 1861 ई. में कोलकाता के देवेंद्र नाथ टैगोर के घर चौदहवीं संतान के रूप में एक बालक रवीन्द्र ने जन्म ग्रहण किया था। उसने 8 वर्ष से लिखना आरंभ किया। उसकी कविता 12 वर्ष में एवं लघु कथा 16 साल की उम्र में प्रकाशित हुई। वर्ष 1910 में उन्होंने गीतांजलि की रचना की जिसे 10 दिसंबर 1913 को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विश्व का सर्वश्रेष्ठ सम्मान “नोबेल पुरस्कार” पाने वाला पहला भारतीय बने रवीन्द्र नाथ टैगोर।

अंत में डॉ.मधेपुरी ने पुनः कहा कि 3 देशों के राष्ट्रगान से गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का नाम जुड़ा है। भारत का राष्ट्रगान “जन गण मन…..” और बांग्लादेश का राष्ट्रगान “आमार सोनार बांग्ला….” तो उनकी ही रचनाएं हैं। तीसरा देश श्रीलंका  जिसका राष्ट्रगीत “श्रीलंका मथा….” भी गुरुदेव की कविताओं की प्रेरणा से बना है।

चलते-चलते यह भी कि बचपन में इस नोबेल पुरस्कार विजेता को स्कूल की दीवारें बंधन जैसा लगता था जिसके कारण उन्होंने बड़े होकर शांति निकेतन की स्थापना की। आज दुनिया उसे विश्व भारती यूनिवर्सिटी के नाम से पुकारती है।

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