सामा-चकेवा भाई-बहन के अतिरिक्त पक्षियों से भी जुड़ा त्योहार है

छठ पर्व संपन्न होने के साथ ही मिथिला-कोसी का यह लोकपर्व सामा-चकेवा शुरू हो जाता है | मिथिलांचल में यह पर्व उत्सव के रूप में मनाया जाता है | 8 दिनों का यह त्योहार भाई-बहन के बीच के अटूट प्रेम को दर्शाता है जिसका वर्णन पुराणों में भी मिलता है | सामा-चकेवा से जुड़ी लोकगीत- “चुगला करे चुगली बिलैया करे म्याऊं……….. गाम के अधिकारी हमर बड़का भैया हो……. कई दिनों तक घर-आंगन में गूंजते रहते हैं | ज्ञातव्य हो कि मिथिलांचल में मवेशियों का त्योहार तो मनाया ही जाता है, पक्षियों के लिए भी त्योहार है जिसे ‘सामा-चकेवा’ के नाम से जाना जाता है |

बता दें कि लोक कथाओं के अनुसार ‘सामा’ कृष्ण की पुत्री थी | कुछ चुगलों द्वारा आरोप लगाने के कारण मथुरा के राजा भगवान कृष्ण ने क्रोधित होकर उसे मनुष्य से पक्षी बन जाने की सजा सुना दी | परंतु अपने भाई सांभ की भक्ति के कारण, ‘चकेवा’ के त्याग के साथ-साथ अटूट एवं निश्छल प्रेम होने के कारण ‘सामा’ पुनः पक्षी से मनुष्य के रूप में आ जाती है | तब से सामा-चकेवा पर्व मनाने वाली लड़कियां कार्तिक पूर्णिमा की रात में चुगला के मुंह में आग लगाकर जलाती है और विसर्जित करती है | ग्रामीण इलाके में आज भी यह पर्व उत्साह पूर्वक मनाया जाता है | महापर्व छठ की समाप्ति के साथ ही बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए कार्तिक पूर्णिमा तक प्रत्येक दिन इस खेल का आयोजन करती हैं |

Sama Chakeva celebration in Mithila.
Sama Chakeva celebration in Mithila.

यह भी बता दें कि भाई-बहन के बीच का प्रेम व त्याग लोकगीतों के माध्यम से भैयादूज से शुरु होकर कार्तिक पूर्णिमा की देर रात तक में संपन्न होता है | पूर्णिमा की रात को महिलाएं सहेलियों की टोली बनाकर सामा से सजे डाले को कंधे या सिर पर ले-लेकर गीत गाते हुए सामा खेलती है | चकेवा व चुगला सहित मिट्टी की बनाई गई विभिन्न पक्षियों की मूर्तियों को डाले में सजाकर निकट के तालाब में या जोते हुए खेतों में विसर्जित कर आती हैं |

जानकारों के अनुसार सामा-चकेवा के बाद कोसी-मिथिलांचल में आते हैं प्रवासी पक्षीगण- जिन्हें यहाँ के लोग अधंगा….. लालसर…… सुर्खाब…… नकटा….. हसुआ आदि नामों से जानते हैं | मिथिलांचल में मेहमानों की तरह इन पंक्षियों का स्वागत होना चाहिए, परंतु ऐसा होता नहीं………| लोगों द्वारा लगातार इनके शिकार होने के चलते इन पक्षियों की तादाद में सर्वाधिक कमी आती जा रही है |

चलते-चलते बता दें कि जहाँ पहले महिलाएं अपने हाथों से मिट्टी के सामा-चकेवा एवं विभिन्न पक्षियों की मूर्तियां बनाती थी और विभिन्न रंगों से सजाती थी वहीं अब बाजार में बिक रहे रंग-बिरंगे मिट्टी से बनी हुई रेडीमेड ‘सामा-चकेवा’ आदि खरीद लाती हैं | संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार की मानसिकता में सर्वाधिक वृद्धि होने के कारण आये दिनों लोग इस पर्व से दूर होते जा रहे हैं |

फिर भी मिथिलांचल की कुछ बेटियाँ आज कार्तिक पूर्णिमा के दिन सामा खेलने अपने ससुरालों से मायके अवश्य आयेंगी और नम आँखों से भावपूर्ण समदाउन गीतों के बीच अपने-अपने भाइयों को खुद से ठेकुआ, मुढ़ी, भुसवा……  खिलायेंगी……. परंपरा जीवित रहेगी, तभी ‘प्रेम’ अमर रहेगा !

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