All posts by Dr. A Deep

कृष्ण से कलाम तक वाया गांधी, टैगोर, राधाकृष्णन

जन्माष्टमी यानि कृष्ण का जन्मदिवस और शिक्षक दिवस… दोनों एक दिन… इससे अधिक सुखद संयोग हो ही नहीं सकता। कृष्ण सभी गुणों, सारी कलाओं और समस्त लीलाओं में पूर्ण हैं। विष्णु के जितने भी अवतार हैं, उनमें ‘पूर्ण’ केवल कृष्ण हैं। लेकिन जब ‘पूर्णता’ की बात आती है तब उनके ‘प्रेमी’, ‘सखा’ या ‘सारथी’ रूपों की चर्चा तो होती है, उनके शिक्षक रूप की नहीं। जबकि सच तो ये है कि कृष्ण से बड़ा ‘शिक्षक’ सम्पूर्ण मानव-सभ्यता में हुआ ही नहीं। गीता से बड़ा अवदान और उससे बड़ा ज्ञान ना तो किसी शिक्षक ने दिया है, ना देगा। अर्जुन तो निमित्त मात्र थे, वास्तव में उन्हें सम्पूर्ण मानव-सभ्यता को ‘कर्मयोग’ का ज्ञान देना था। तब भले ही द्वापर हो और सामने महाभारत का युद्ध, उन्हें पता था कि आनेवाले समस्त युगों में जीवन का हर ‘युद्ध’ इसी ‘कर्मयोग’ से लड़ा जाना है।

आधुनिक युग में इस ‘कर्मयोग’ के कई ‘व्याख्याता’ हुए। लेकिन व्याख्या वही पूर्ण है जो कलम के साथ-साथ कर्म से भी की गई हो। इस कसौटी पर भी कई नाम खरे उतरते हैं लेकिन एक आखिरी कसौटी भी है जिस पर बिरले ही खरे उतर पाते हैं और वो है अपने कर्म को मानवमात्र के कल्याण से जोड़ देने की नैसर्गिक कला। ये कला सिर्फ एक सच्चे शिक्षक में हो सकती है। सिर्फ वही ‘शिक्षक’ कृष्ण की गौरवशाली परम्परा से जुड़ सकता है। इस कसौटी पर मैं चार नाम लूंगा और वो नाम हैं – महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सर्वपल्ली राधाकृष्णन और एपीजे अब्दुल कलाम। इन चारों ने अपने जीवन का हर क्षण ‘कर्म’ के योग, जीवन में उसके प्रयोग और मानवजाति के लिए उसके उपयोग में बिताया था। इन सबने आदर्श ‘शिक्षक’ का धर्म आजीवन निभाया था।

शिक्षक होने के लिए किसी स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी का होना जरूरी नहीं। इस तरह तो कृष्ण भी शिक्षक नहीं कहलाएंगे। देखा जाय तो, महात्मा गांधी पेशे से वकील थे, टैगोर साहित्य और कला के साधक और कलाम ‘मिसाइलमैन’। इन सबमें राधाकृष्णन जरूर पेशे से शिक्षक थे। लेकिन ये सब जो भी रहे हों, जिस भी रूप में रहे हों, जहाँ भी रहे हों, सबसे पहले ‘शिक्षक’ थे क्योंकि इन सभी में अपने कर्म को मानवमात्र के कल्याण से जोड़ देने की नैसर्गिक कला थी। गांधी और टैगोर की बात करें तो ‘साबरमती आश्रम’ और ‘शांति निकेतन’ अपने-अपने उद्देश्यों के साथ अपने समय में ‘शिक्षा’ के सबसे बड़े केन्द्र थे। उधर राधाकृष्णन और कलाम राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी अपनी असल भूमिका नहीं भूले बल्कि और बड़े मंच से उसे विस्तार ही दिया।

कृष्ण से कलाम को और इनके बीच की कड़ियों गांधी, टैगोर, राधाकृष्णन को कुछ जोड़ता है तो वो है केवल और केवल इनका ‘कर्म’, जो इतना पारदर्शी है कि कोई भी उसमें अपनी छवि देख ले। ‘व्यष्टि’ लीन हो जाय ‘समष्टि’ में और आपको पता भी ना चले। आज टीवी, मोबाइल और इंटरनेट जैसे जोड़ने और जुड़ने के बहुतेरे साधन हैं जिनकी पहले कल्पना भी सम्भव नहीं थी लेकिन क्या ऐसा कोई साधन है जो आपको स्वयं से और आपके कर्म को मानव-मर्म से जोड़ दे..? और  इस तरह जुड़-जुड़कर एक दिन इतने विराट हो जायें आप कि पूरी सृष्टि ही अपनी परछाई लगे..? ऐसा हो सकता है, अगर आपको कर्मयोग तक ले जानेवाला कोई कृष्ण या उनकी राह पर चलनेवाला कोई कर्मयोगी शिक्षक मिल जाय।

आपने कभी सोचा कि राधाकृष्णन का जन्मदिवस ही शिक्षक दिवस क्यों है..? राधाकृष्णन को चाहनेवाले उनके जन्मदिन को खास तौर पर मनाना चाहते थे और राधाकृष्णन ये सम्मान अपने ‘शिक्षक’ को देना चाहते थे। उन्होंने अपने जीवन को शिक्षक-धर्म से एकाकार कर लिया था, इसीलिए उनका जन्मदिवस शिक्षक दिवस है। उस कर्मयोगी को पता था कि जब-जब दुनिया राह भटकेगी तब-तब किसी ‘शिक्षक’ को ही राह दिखाने आना होगा। इसी सत्य को शाश्वत रखने का पर्व है ‘शिक्षक दिवस’ और इसके सबसे बड़े प्रतीक हैं संसार को ‘गीता’ की शिक्षा देनेवाले ‘कर्मयोगी कृष्ण’।

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


तो क्या मुलायम करेंगे बिहार में ‘थर्ड फ्रंट’ की अगुआई..!

‘जनता परिवार’ एक बार फिर बनते-बनते टूट गया। इस बार तो इसके मुखिया ही नाता तोड़ गए। एनसीपी के बाद सपा भी ‘महागठबंधन’ में ‘अपमान’ नहीं सह पाई और कल इसके महासचिव रामगोपाल यादव ने बिहार में अकेले दम चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। आज के हालात में जो सपा अपने बूते बिहार में शायद एक भी सीट ना जीत पाए उसमें अचानक इतना ‘आत्मसम्मान’ जागा तो कैसे..? क्या पिछले दिनों की मुलाकात में प्रधानमंत्री मोदी ने मुलायम से महागठबंधन को लेकर ज्यादा ‘मुलायम’ ना होने का मंत्र दिया..? या फिर भाजपा की यूपी विजय के रणनीतिकार अमित शाह से मिलकर रामगोपाल यादव ने ‘बिहार विजय’ का कोई फार्मूला पा लिया..?

जो भी हो, अब बिहार के ‘महागठबंधन’ में जदयू, राजद और कांग्रेस का ही ‘बंधन’ शेष बचा है। वामदल पहले ही अलग-थलग हैं। तो क्या अब मुलायम बिहार में किसी ‘थर्ड फ्रंट’ की सम्भावना पर काम कर रहे हैं..? देखा जाय तो सैद्धांतिक तौर पर सपा, एनसीपी और वामदलों का कोई खास मतभेद भी नहीं है और इन बेसहारों को किसी ‘सहारे’ की सख्त़ जरूरत भी है। ऐसे में ये तीनों मिलकर चुनाव लड़ें तो कोई आश्चर्य की बात भी नहीं होनी चाहिए। और तो और पप्पू यादव की जनअधिकार पार्टी भी देर-सबेर इस संभावित फ्रंट का हिस्सा हो सकती है। मुलायम और उनकी पार्टी से पप्पू का पुराना ‘प्रेम’ रहा है और ‘जरूरत’ में प्रेम जगने-जगाने का उनका पुराना इतिहास भी है।

बहरहाल, इन सारे प्रकरणों से अभी मजे में कोई पार्टी है तो वो है भाजपा। सपा, एनसीपी, वामदल या पप्पू की जनअधिकार पार्टी – ये सभी अकेले-अकेले लड़ें तो और मिल जायें तो – सेंधमारी हर हाल में महागठबंधन के वोट बैंक में ही करेंगे। फायदा हर हाल में भाजपा को ही होता दिख रहा है। इधर ओवैसी ने भी बिहार में चहलकदमी शुरू कर दी है और उनकी सक्रियता से भी भाजपा की ही सेहत सुधरेगी।

हालांकि, सपा की घोषणा के बाद शरद यादव मुलायम से मिल आए हैं और लालू भी अपने रूठे समधी को मना लेने का दावा कर रहे हैं, लेकिन ये इतना आसान नहीं। रिश्तेदारी एक चीज है और राजनीति दूसरी। राजनीति में रिश्ते ‘अचानक’ बनते हैं और उससे भी ज्यादा ‘अचानक’ टूट जाते हैं। इस ‘अचानक’ की व्याख्या आज तक नहीं की जा सकी है और तब तो हरगिज नहीं की जा सकती जब ‘रिश्तों’ का ताना-बाना सत्ता के सबसे ‘ऊँचे’ शिखर से बुना जा रहा हो।

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


काश गवर्नमेंट भी चलती गूगल की तरह..!

दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को सम्मान देते हुए नई दिल्ली स्थित औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड करने की घोषणा की। अभी ये घोषणा केवल घोषणा ही है। भारत में सरकारी फाइलें अब भी ‘माउस’ की बजाय ‘हाथी’ की सवारी करती हैं, इसीलिए इस घोषणा को सड़क पर उतरने में वक्त लगे शायद। बहरहाल, सरकार का काम सरकार जाने, गूगल ने अपना काम कर दिया।

जी हाँ, आपको आश्चर्य होगा कि अभी दिल्ली सरकार ने औरंगजेब रोड का बोर्ड भी नहीं हटाया है लेकिन गूगल ने बिना वक्त गंवाये अपने डाटाबेस को संशोधित कर लिया। अब आप गूगल मैप्स पर इस सड़क का नाम एपीजे अब्दुल कलाम रोड पाएंगे। यही नहीं, औरंगजेब रोड सर्च करने पर भी रिजल्ट में एपीजे अब्दुल कलाम रोड ही दिखेगा। विकिपीडिया पर भी इस रोड की मौजूदगी नये नाम के साथ हो गई है।

अरविन्द केजरीवाल की मौजूदगी में नई दिल्ली नगरपालिका (एनडीएमसी) ने ये फैसला 28 अगस्त को लिया था और अभी सप्ताह भर ही बीता है। देखा जाय तो इस फैसले को अमलीजामा पहनाने में दिल्ली सरकार ने इतनी देर नहीं की है कि हम उसे कठघरे में खड़ा कर दें। आज नहीं तो कल इस घोषणा पर अमल हो ही जाएगा। सवाल यहाँ सरकार की नीति और नीयत का नहीं, उस ‘तत्परता’ का है जिससे घोषणाएं जमीन पर उतरती हैं। हम इंडिया को जितना भी ‘डिजिटल’ और सिटी को जितना भी ‘स्मार्ट’ बना दें, फर्क ‘तत्परता’ से ही आना है।

सौ मीटर की दौड़ हो तो जीत-हार तय करने में सेकेंड के दसवें हिस्से की भी भूमिका होती है। देखा जाय तो ग्लोबलाइजोशन के दौर में वही देश दुनिया की अगुआई कर रहे हैं जो ‘मैराथन’ में भी ‘सौ मीटर’ वाली रफ्तार से दौड़ने की ‘क्षमता’ और ‘तत्परता’ रखते हैं। अपने दिल पर हाथ रखिए और बोलिए इस दौड़ में हम कहाँ हैं जबकि सच्चाई ये है कि दिल्ली से जुड़ा जो काम सात समुन्दर पार से संचालित होनेवाला गूगल कर लेता है वो दिल्ली की सरकार अपने समूचे तंत्र के साथ दिल्ली में बैठकर भी नहीं कर पाती है..!

पुनश्च :

औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड करना भी राजनीति का विषय है अपने यहाँ। जी हाँ, आजकल चर्चा में आए ओवैसी और मैडम मायावती ने इसका विरोध किया है। जिस ‘तत्परता’ की बात मैंने ऊपर की है उसकी जरूरत ये तय करने में भी है कि हमें किन ‘प्रतीकों’ के सहारे आगे बढ़ना है और ये भी कि आने वाली पीढ़ियों को हम किस ‘रोड’ पर चलते देखना चाहेंगे – औरंगजेब ‘रोड’ या एपीजे अब्दुल कलाम ‘रोड’..?

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


बिहार के चुनावी अखाड़े में ‘असली-नकली’ का खेल

सूरज नहीं बोलता, मैं रोशनी देता हूँ… नदियां नहीं बतातीं, मैं प्यास बुझाती हूँ… फूल नहीं बोलते, मेरा रंग देखो। जो है, उसे बोलना क्या..! लेकिन ये युग ‘विज्ञापन’ का है। हालात कुछ ऐसे होते जा रहे हैं कि कल को शायद इन्हें भी अपना ‘होना’ बताना पड़े..! नहीं तो कल को रोशनी, पानी और रंग पर भी कोई मल्टीनेशनल कम्पनी ‘कॉपीराइट’ का दावा ठोक दे और सूरज, नदियां और फूल नकली ठहरा दिये जायं तो कोई अचरज नहीं। जो खुद को पूरा दम लगाकर असली और सामने वाले को सारी हदें तोड़कर नकली बता दे वही आज के ‘बाजार’ में टिक सकता है।

जब बात असली-नकली की निकली है तो वो राजनीति तलक तो जाएगी ही। असली-नकली के द्वंद्व-युद्ध का राजनीति से बड़ा ‘अखाड़ा’ है भी तो नहीं। चलिए ले चलें आपको बिहार जहाँ असली-नकली की बड़ी दिलचस्प लड़ाई छिड़ी है, वो भी एक नहीं दो-दो। पहली लड़ाई है पैकेज को लेकर। “उसका पैकेज, मेरे पैकेज से बड़ा कैसे” के बाद अब लड़ाई छिड़ गई है “मेरा पैकेज असली, तेरा पैकेज नकली” का। दरअसल बिहार के विकास के नाम पर लड़ी जा रही ये लड़ाई मोदी और नीतीश की लड़ाई है और सवालों के घेरे में दोनों ही हैं। पहला सवाल मोदी से कि उन्होंने एक करोड़ पैंसठ लाख के पैकेज की घोषणा के लिए ऐन चुनाव का ही मौका क्यों चुना जबकि बिहार के लिए ‘विशेष’ की मांग बहुत दिनों से की जा रही थी..? दूसरा सवाल नीतीश से कि जब मोदी ने पैकेज की घोषणा कर दी तभी उन्हें विकसित बिहार के लिए दो लाख सत्तर हजार करोड़ का ‘विज़न’ कैसे मिला..? तीसरा सवाल फिर मोदी से कि जब उन्होंने 18 अगस्त को एक बड़े पैकेज की घोषणा कर ही दी थी तो महज दो सप्ताह बाद यानि 1 सितम्बर को तीन लाख चौहत्तर हजार करोड़ और देने की जरूरत क्यों पड़ गई..? चौथा सवाल दोनों से कि इतने पैसे आएंगे कहाँ से और अगर आने का ‘मार्ग’ था तो पहले ‘रुकावट’ क्या थी..? बहरहाल, वादे के मामले में दोनों में से कोई पूरे अंक पाने की स्थिति में नहीं हैं। लोकसभा चुनाव के पहले मोदी ने विदेशों में जमा काला धन लाने और हर हिन्दुस्तानी के खाते में 15 लाख आने की बात कही थी लेकिन हुआ क्या..? दूसरी ओर नीतीश ने कहा था कि अगर घर-घर बिजली नहीं पहुँची तो वोट मांगने नहीं जाएंगे लेकिन वे धड़ल्ले से ‘हर घर दस्तक’ दे रहे हैं। ऐसे में किसका पैकेज असली है और किसका नकली, ये कौन तय करे और कैसे तय करे..!

असली-नकली की दूसरी लड़ाई है “मेरा गठबंधन असली, तेरा गठबंधन नकली” को लेकर। ‘महागठबंधन’ से पहले एनसीपी दूर हुई और आज सपा ने अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। लालू अपने ‘समधी’ को समझाने में सफल ना हो सके। एनडीए को मुँह चिढाने का मौका मिल गया। लेकिन खुद शीशे के घर में रहनेवाले दूसरे पर पत्थऱ उछालें भी तो कैसे। पासवान, कुशवाहा और मांझी घोषित तौर पर तो पप्पू अघोषित तौर पर सीटों के लिए ताल ठोक रहे हैं। ये सब जितनी सीटें मांग रहे हैं उनको मिला दें तो खुद भाजपा को घर बैठना पड़ जाएगा। उधर लालू-नीतीश और कांग्रेस ने आपस में सीटों की संख्या तय तो कर लीं लेकिन कौन किस सीट पर लड़े इस पर पेंच फंसा का फंसा है। समय और स्वार्थ की आग में कौन गठबंधन ‘सोना’ बनकर निकलेगा और वो सोना कितना खरा होगा ये तो आनेवाला वक्त ही बताएगा।

सच तो ये है कि आज असली और नकली की बात ही बेमानी है। जिसके हाथ में ‘लाठी’ उसकी ‘भैंस’ असली और दूसरे की क्या, आप अच्छी तरह जानते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


कहीं फेल ना हो जाय बिहार का ‘केलकुलेटर’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार में एक बार फिर एक बड़ी रैली की। 1 सितम्बर को भागलपुर में हुई ये रैली मुजफ्फरपुर, गया और सहरसा के बाद उनकी चौथी और शायद सबसे बड़ी ‘परिवर्तन’ रैली थी। जैसा कि अपेक्षित था उन्होंने तकरीबन उन सभी सवालों के जवाब दिए जो 30 अगस्त की ‘स्वाभिमान’ रैली में ‘महागठबंधन’ के नेताओं ने उन पर उठाए या ‘उछाले’ थे।

अब राजनीतिक मंचों से… चाहे वो किसी भी पार्टी के क्यों ना हों… बिहार में हों या बिहार से बाहर… कमोबेश एक तरह के ‘बयान’ सामने आते हैं। ‘संदर्भ’ और ‘सवाल’ बदल जाते हैं, ‘साधन’ और ‘साध्य’ हमेशा वही रहते हैं। यही कारण है कि इन मंचों का माहौल और बयानों की ‘तल्ख़ी’ भी कमोबेश एक जैसी रहती है। लेकिन बिहार में राजनीतिक दलों की लड़ाई ने नया रूप ले लिया है। अब हमले केवल बयानों से नहीं ‘पैकेज’ से भी किये जा रहे हैं। अभी मोदीजी के दिए एक लाख पैंसठ हजार करोड़ के ‘उपहार’ की खुशी बिहार मना ही रहा था कि नीतीशजी ने दो लाख सत्तर हजार करोड़ ‘न्योछावर’ कर दिए। जो बिहार ने सोचा ना था वो मिल गया उसे। बेचारा अभी दोनों पैकेज का ‘जोड़’ ही निकाल रहा था कि मोदीजी ने भागलपुर में तीन लाख चौहत्तर हजार करोड़ और ‘कूट’ दिए। अब तो डर है कि कहीं फेल ना हो जाय बिहार का ‘केलकुलेटर’।

बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने भागलपुर में फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए घोषणा की कि अगले पाँच वर्षों में बिहार को दिल्ली से तीन लाख चौहत्तर हजार करोड़ और मिलेंगे। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि ये पैकेज पहले घोषित एक लाख पैंसठ हजार करोड़ के अतिरिक्त है।

मोदी ने नीतीश के पैकेज पर पैकेज से ‘हमला’ ही नहीं किया, बाकी मुद्दों पर भी जमकर बोले। स्वाभिमान रैली में नीतीश और लालू के सोनिया संग एक मंच पर आने को उन्होंने जेपी, लोहिया और कर्पूरी ठाकुर को ‘तिलांजलि’ देना बताया। विकास के मुद्दे पर उन्होंने इनके शासन के 25 सालों पर सवाल उठाए तथा जाति और सम्प्रदाय की राजनीति करने का आरोप लगाया। डीएनए वाले मुद्दे पर सफाई देने से वे नहीं चूके और बिहार के लोगों को ‘धरती पर सबसे बुद्धिमान’ बताया।

मोदी की भागलपुर रैली में भाजपा की उम्मीद से ज्यादा लोग जुटे। ये अब तक की सबसे बड़ी ‘परिवर्तन’ रैली कही जा रही है। स्वयं मोदी ने भी मंच से ये स्वीकार किया। मोदी के साथ बिहार भाजपा के तमाम दिग्गज और सहयोगी दलों के सभी नेता मौजूद थे। एक बात का उल्लेख विशेष तौर पर करना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी के बाद सबसे अधिक जिन्दाबाद के नारे जीतनराम मांझी के भाषण के दौरान लगे। दलित व महादलित समुदाय के ‘वोट बैंक’ के मद्देनजर एनडीए के लिए ये अच्छी खबर है लेकिन इससे बिहार भाजपा की ‘कमजोरी’ एक बार फिर उजागर हुई कि यहाँ उसका कोई ‘प्रतिनिधि’ चेहरा नहीं है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


जवाब दीजिए मोदीजी..! जिन्हें भैंस नहीं पटक सकी उन्हें क्या आप पटकेंगे..?

‘महागठबंधन’ ने आज पटना के गांधी मैदान में स्वाभिमान रैली की। इस रैली में जुटी भीड़ ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार में मुकाबला कांटे का है। मुजफ्फरपुर, गया और सहरसा में प्रधाममंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीन बड़ी रैलियां कीं और चौथी रैली 1 सितम्बर को भागलपुर में होने जा रही है। ऐसे में महागठबंधन के लिए इन रैलियों का जवाब देना और अपनी ताकत दिखाना ‘निहायत’ जरूरी हो गया था। तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद इस रैली में जदयू, राजद, कांग्रेस और सपा का एक मंच पर इकट्ठा होना महागठबंधन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। इससे पहले महागठबंधन की मौजूदगी बयानों और मीडिया में थी आज वो जमीन और मंच पर दिखी। महागठबंधन के सभी नेता अपने-अपने ‘अभिमान’ को किनारे रख स्वाभिमान रैली में जुटे और ‘महागठबंधन’ ने वास्तविक आकार लिया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस रैली का सबसे बड़ा आकर्षण लालू और नीतीश का एक बार फिर एक साथ खड़ा होना था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके साथ मंच साझा कर इस अवसर को और खास बना दिया। मंच पर समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व शिवपाल सिंह यादव ने किया। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी (मीसा, तेजप्रताप और तेजस्वी के साथ), पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, सीपी जोशी तथा शकील अहमद, वरिष्ठ राजद नेता व पूर्व केन्द्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह, राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचन्द्र पूर्वे तथा विधायक दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी तथा विधायक दल के नेता सदानंद सिंह सहित महागठबंधन के तमाम नेताओं ने रैली में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

सोनिया गांधी ने जहाँ ये कहा कि बिहार में “नीतीशजी के नेतृत्व में अच्छा काम हुआ है”, वहीं ये कहना भी नहीं भूलीं कि “लालूजी का भी इसमें सराहनीय योगदान रहा है।“ नीतीश ने डीएनए के मुद्दे पर मोदी को घेरने की हर सम्भव कोशिश की और कहा – “बिहार का इतिहास केवल देश का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता का इतिहास है और हमारा डीएनए खराब है..?” मोदी के दिए पैकेज को उन्होंने “पुराने पैकेज की रिपैकेजिंग” बताया  और ‘जंगलराज’ का जवाब देते हुए कहा कि “भाजपा के दफ्तर से मुख्यंमंत्री की छाती तोड़ने की धमकी दी जाती है और लालू जी का नाम लेकर आप जंगलराज की बात करते हैं। बिहार में जंगलराज नहीं कानून का राज है।“ ‘जंगलराज’ पर लालू से पहले नीतीश का जवाब देना बदले हालात में बदलती राजनीति की बड़ी बानगी है। शरद यादव ने कहा कि “देश को बदलने का काम बिहार से शुरू होता है और इस बार भी ये काम बिहार से ही होगा।“

रैली के अन्तिम वक्ता लालू प्रसाद यादव थे। भाषण के लिए उनके आने पर और पूरे भाषण के दौरान लोगों में जो उमंग और उत्साह था उसने बता दिया कि बिहार में उनका जादू आज भी बरकरार है। उन्होंने अपने अंदाज में कहा – “दो पिछड़ों का बेटा साथ आया तो कहते हैं जंगलराज आ गया..! ये जंगलराज पार्ट – 2 नहीं, मंडलराज पार्ट – 2 है।“ यादव  वोट बैंक को अपना बताने से भी वे नहीं चूके और अपनी रौ में कह डाला – “यादवों को जब भैंस नहीं पटक सकी तो नरेन्द्र मोदी क्या पटकेंगे..!“

इस रैली से बिहार का ‘स्वाभिमान’ जितना भी जुड़ा हो महागठबंधन का अस्तित्व और भविष्य बेशक जुड़ा था। लालू और नीतीश के साथ-साथ कांग्रेस को भी इसका एहसास था। ये तीनों अपने-अपने तरीके से अपनी-अपनी ‘साख’ बचाना चाहते थे। कहना पड़ेगा कि इस रैली के बाद इन सबने राहत की सांस ली होगी। अब बारी भाजपा की है। आज महागठबंधन के सारे नेताओं ने जी भर कर नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा है। देखना है कि भागलपुर में भाजपा हिसाब कितना चुकता कर पाती है।

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


‘नीतीश निश्चय’ यानि बिहार की ‘बोली’ बढ़कर दो लाख सत्तर हजार करोड़..!

18 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आरा में ‘बिहार पैकेज’ की घोषणा की। चुनावी ‘सावन’ में एक लाख पैंसठ हजार करोड़ बरसे बिहार पर। अभी ‘सावन’ बीतने ही वाला था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘निश्चय’ कर दो लाख सत्तर हजार करोड़ और बरसा दिये बिहार पर। इस खासमखास ‘सावन’ को शायद ही भूले बिहार। जब मोदी का पैकेज आया तो कहा गया ‘चुनावी रिश्वत’ है… ‘जुमला बाबू’ बहुत बड़ा ‘झांसा’ दे रहे हैं… बिहार की बोली लगाई जा रही है और ना जाने क्या-क्या। अब जो नीतीश ने दो लाख सत्तर हजार करोड़ की ‘बरसात’ की है, उसे क्या कहेंगे – ‘रिश्वत’, ‘झांसा’ या ‘बोली’..? सौ बात की एक बात ये है कि कुछ भी कह लें मोदी और कुछ भी दे दें नीतीश, जनता जानती है कि लक्ष्य दोनों का एक है। ये दोनों जो भी दे रहे हों, जिस भी तरह दे रहे हों, बदले में लेना उन्हें एक ही चीज है और वो है आनेवाले चुनाव में जीत का आंकड़ा। बहरहाल, हम किसी भी तरह जोड़, घटाव, गुणा या भाग करके देख लें, कम हो या ज्यादा बिहार का भला तो तय है। अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन दे रहा है और क्यों दे रहा है। महत्वपूर्ण ये है कि मिल बिहार को रहा है।

बहरहाल, 28 अगस्त को नीतीश कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस करके ‘व्यक्तिगत चिन्तन’ के आधार पर बिहार के लिए दो लाख सत्तर हजार करोड़ की भविष्य की योजना का प्रारूप सामने रखा। इस विज़न डॉक्यूमेंट को नाम दिया गया है – “नीतीश निश्चय : विकास की गारंटी, विकसित बिहार के सात सूत्र”। ये सात सूत्र हैं – 1. महिलाओं को सरकारी नौकरी में 35% आरक्षण, 2. युवाओं के लिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड, 3. स्वयं सहायता भत्ता जिसके तहत युवाओं को एक साल के नौ महीने के लिए एक-एक हजार रुपये दिये जाएंगे जिसका उपयोग वे फॉर्म भरने, इंटरव्यू के लिए जाने आदि में कर सकते हैं, 4. विश्वविद्यालय तथा कॉलेजों में मुफ्त वाई-फाई की सुविधा, 5. हर घर तक स्वच्छ जल की आपूर्ति, 6. हर गांव को पक्की सड़क और 7. 2016 के बाद पाँच साल में हर घर को मुफ्त बिजली कनेक्शन।

बकौल नीतीश ये पैकेज नहीं कमिटमेंट है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ना तो सीएम और ना ही जदयू के नेता के रूप में कोई घोषणा कर रहे हैं। उऩ्हें व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि अगले पाँच साल में यही काम होने चाहिएं। अगर उन्हें फिर से मौका मिला तो वे इन योजनाओं को अमलीजामा पहनाएंगे। साथ ही पुरानी योजनाओं को भी अपडेट करेंगे। हालांकि वे यह नहीं बता पाए कि इतने पैसे कहाँ से आएंगे।

एक तरीके से नीतीश ने अपना ‘घोषणापत्र’ जारी कर दिया। अच्छी बात है कि इस मामले में वे औरों से आगे निकल गए। लेकिन इस ‘हड़बड़ाहट’ में वे लालू को ‘भूल’ गए। उन्हें ये पता होना चाहिए कि ‘महागठबंधन’ में मिली सौ की सौ सीटें भी वे जीत जाएं तो भी बगैर लालू के उनका ‘विज़न’ जमीन पर नहीं उतर सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


क्यों खड़े हैं दो छोड़ पर जदयू के दो शीर्ष नेता..?

हार्दिक पटेल… महज 22 साल का यह युवक गुजरात समेत पूरे देश के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। गुजराती समाज और राजनीति में खासा महत्व रखने वाला पटेल समुदाय आज इस युवक के पीछे खड़ा है। पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग कर रहे इस युवक ने 25 अगस्त को जबरदस्त रैली कर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तमाम सुर्खियां अपने नाम कर ली हैं। गुजरात सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक की नींद उड़ गई दिखती है। चंद दिनों में इस शख्स़ ने हैरत में डाल देनेवाली चर्चा हासिल की है… जैसे रातोंरात चमत्कार हो गया हो कोई। हार्दिक के आन्दोलन का असर इतना व्यापक और गहरा है कि भारतीय राजनीति के तमाम दिग्गज विवश हैं अपनी राय देने को। आज या तो पटेल समुदाय को आरक्षण का समर्थन किया जा सकता है या फिर विरोध… तटस्थ रहने के सारे मार्ग इस युवक ने बंद कर दिये हों जैसे।

हालात ऐसे हैं कि इस मुद्दे पर अब एक दल में भी दो तरह की राय दिखने लगी है। जी हाँ, लगता है कि हार्दिक पटेल ने बिहार की राजनीति में भी हाहाकार मचाने की ठान ली है..! कारण ये कि पटेल समुदाय को आरक्षण देने के मुद्दे पर जदयू के दो शीर्ष नेता शरद यादव और नीतीश कुमार की राय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जहाँ हार्दिक पटेल के आन्दोलन का समर्थन किया है वहीं दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव पटेल समुदाय के आरक्षण के पक्ष में नहीं हैं। नीतीश एक ओर हार्दिक पटेल को महाक्रांति रैली के लिए बधाई देते हुए उनकी मांग को जायज बताते हैं और तर्क देते हैं कि दूसरे राज्यों में पटेल समुदाय के समकक्ष समुदायों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है। वहीं शरद की राय में पटेल समुदाय सक्षम और सम्पन्न है तथा उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं है। जब उनसे कहा गया कि नीतीश इस आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि नीतीश की बात नीतीश जानें। 26 अगस्त को मधेपुरा में प्रेस से बात करते हुए उन्होंने दो टूक अपनी बात कही। उनके अनुसार हार्दिक के नेतृत्व में हंगामा कर यह समुदाय अपनी बात मनवाना चाहता है जो सही नहीं है।

भले ही इस मुद्दे का बिहार की राजनीति से सीधे तौर पर कोई लेना-देना ना हो, भले ही ये महज शरद और नीतीश का सैद्धांतिक मतभेद भर हो लेकिन बिहार के आसन्न चुनाव को देखते हुए जदयू के इन दो शीर्ष नेताओं का इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर एकदम दो छोर पर खड़ा होना हल्के में लेने वाली बात नहीं है। खास तौर पर तब तो हर्गिज नहीं जब हार्दिक गुजरात में खड़े होकर पटेल समुदाय की मौजूदगी पूरे देश में बता रहे हों और यह विशेष तौर पर चिह्नित कर रहे हों कि बिहार में नीतीश कुमार हमारे हैं ।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


और इस तरह बदल जाएगी बैंकों की दुनिया

अब घर से निकलते ही आपको बैंक दिखेंगे। सड़कों को कौन पूछे, अब गली-गली में बैंक होंगे। क्या शहर, क्या कस्बा, क्या गांव… चौक हो, चौराहा हो या चौपाल और पेड़ की छांव… कहीं भी आप खड़े हों, यकीन मानिए आसपास कोई-ना-कोई बैंक आपको दिख ही जाएगा। जी हाँ, अब बदल जाएगी बैंकों की दुनिया। हम आपको बताते हैं कैसे। दरअसल एक बड़ा फैसला लेते हुए रिजर्व बैंक ने पेमेंट बैंक खोलने के लिए ग्यारह कम्पनियों की अर्जी मंजूर की है। इन कम्पनियों में कमोबेश सबसे आप परिचित होंगे। रिजर्व बैंक की मंजूरी हासिल करनेवाली इन कम्पनियों में रिलायंस, एयरटेल, आइडिया और वोडाफोन भी शामिल हैं। जी हाँ, ठीक समझ रहे हैं आप। अब इन टेलीकॉम कम्पनियों के भी बैंक होंगे। ये बैंक पेमेंट बैंक कहलाएंगे। हालांकि ये बैंक आपको लोन नहीं दे पाएंगे लेकिन पेमेंट और मनी ट्रांसफर जैसे काम बहुत आसान कर देंगे।

रिजर्व बैंक ने 19 अगस्त यानि बुधवार को जिन ग्यारह कम्पनियों को पेमेंट बैंक खोलने की मंजूरी दी है, वे हैं रिलायंस इंडस्ट्रीज, एयरटेल एम कामर्स, आदित्य बिरला नुवो लिमिटेड, वोडाफोन एम-पैसा, टेक महिंद्रा, डिपार्टमेंट ऑफ पोस्ट, नेशनल सिक्युरिटी डिपॉजिट लिमिटेड, फिनो पे टेक लिमिटेड, चोलामंडलम डिस्ट्रीब्यूशन सर्विस लिमिटेड, सन फार्मा और पे-टीएम। इन बैंकों में खाता खोलकर आप किसी भी तरह के बिल का भुगतान कर सकते हैं। अब इसके लिए आपको कैश की जरूरत नहीं पड़ेगी। इन पेमेंट बैंकों में इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा उपलब्ध होगी।

आपको बता दें कि ये बैंक डेबिट कार्ड तो जारी करेंगे लेकिन क्रेडिट कार्ड की सुविधा ये नहीं दे पाएंगे। फिर भी आज की व्यस्तता और भागदौड़ वाली दिनचर्या को देखते हुए ये पेमेंट बैंक किसी वरदान से कम नहीं होंगे। इन बैंकों का सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि आप अपने सभी बिल समय पर और सुविधा से जमा कर पाएंगे। इनकी बदौलत दूर देहात में पैसा पहुँचाना भी चुटकी बजाने जैसा होगा।

भारत में आज से 206 साल पहले 1809 में बैंक ऑफ बंगाल की स्थापना के साथ आधुनिक बैंकिंग की शुरुआत हुई। तब ब्रिटिश राज था। इसके बाद 1840 में बैंक ऑफ बॉम्बे और 1943 में बैंक ऑफ मद्रास अस्तित्व में आए। आगे चलकर इन तीनों बैंकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक बना और 1955 में उसका विलय भारतीय स्टेट बैंक में विलय कर दिया गया। इलाहाबाद बैंक भारत का पहला निजी बैंक था। भारत में ‘बैंकों का बैंक’ भारतीय रिजर्व बैंक 1935 में अस्तित्व में आया। एक दौर वो था जब बैंकों का कारोबार केवल वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों तक सीमित था और आज हर खास और आम की हर गतिविधि ही बैंकों से संचालित होने लग गई है।

एटीएम की सुविधा बैंकिंग की दुनिया में किसी क्रांति से कम नहीं थी। लेकिन बात इसी क्रांति पर नहीं रुकी। जल्द ही बैंक ने हमारे मोबाइल में जगह बना ली और अब हमारे सामने आ रहे हैं पेमेंट बैंक। इसे कहते हैं समय की करवट। बैंकों की दुनिया बदल रही है और बदल रही उसके साथ हमारी दुनिया भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


नहीं रहीं भारत की प्रथम महिला शुभ्रा मुखर्जी

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की धर्मपत्नी और भारत की प्रथम महिला शुभ्रा मुखर्जी का निधन हो गया। आज सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर दिल्ली स्थित सेना अस्पताल में उनका निधन हुआ। शुभ्रा मुखर्जी पिछले नौ दिनों से वेंटिलेटर के सहारे जीवित थीं। आज सुबह डॉक्टरों ने वेंटिलेटर हटाने का निर्णय लिया और उन्हें मृत घोषित किया।

बता दें कि शुभ्रा मुखर्जी लम्बे समय से बीमार चल रही थीं और पिछले कुछ दिनों से उनकी हालत नाजुक हो चली थी। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पारिवारिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उनकी महती भूमिका तथा उनके मृदु स्वभाव और मानवीय सरोकारों के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। स्मृतिशेष शुभ्रा मुखर्जी को मधेपुरा अबतक की भावभीनी श्रद्धांजलि..!

सम्बंधित खबरें