Nitish Kumar

लालू-मुलायम के बिना नई पार्टी का ‘पेड़’ लगाकर क्या पाएंगे नीतीश..?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर अपनी चहलकदमी तेज कर दी है। आगामी यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कल दिल्ली में उन्होंने अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के साथ विलय के मुद्दे पर महत्वपूर्ण बैठक की। जेडीयू और रालोद के विलय के बाद एक नई पार्टी सामने आ सकती है जिसका नाम होगा ‘जन विकास पार्टी’ और चुनाव-चिह्न होगा ‘पेड़’। इस नई पार्टी में एचडी देवगौड़ा, ओमप्रकाश चौटाला और बाबूलाल मरांडी के भी शामिल होने की सम्भावना है। सूत्रों की मानें तो इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष अजित सिंह होंगे।

नीतीश के साथ इस महत्वपूर्ण ‘मिशन’ पर जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और महासचिव केसी त्यागी के अलावे बिहार जेडीयू के अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह और नीतीश के रणनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर भी दिल्ली में हैं। ख़बर ये भी है कि अगर यूपी में जेडीयू और रालोद का विलय हो जाता है तो अजित सिंह को बिहार से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जा सकता है।

नई पार्टी के ‘संभावित’ अध्यक्ष शरद यादव ने स्वयं विलय की बात की पुष्टि करते हुए कहा कि कुछ ही दिनों में विलय की तारीख की घोषणा हो जाएगी। यूपी चुनाव में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करने के लिए ‘अपना दल’ और ‘पीस पार्टी’ के नेताओं से भी जेडीयू की बातचीत लगातार जारी है।

बहरहाल, राष्ट्रीय राजनीति में अपनी धमक पैदा करने के लिए नीतीश अनवरत ‘प्रयोग’ में लगे हैं। यूपी के अलावे असम और बंगाल चुनाव के लिए भी वे अपनी कार्ययोजना बना रहे हैं। पर इन सारी कवायद से लालू और मुलायम को दूर रखा जा रहा है। यहाँ एक साथ कई प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या लालू से ‘दूरी’ बनाकर बिहार की राजनीतिक ‘स्थिरता’ को खतरे में नहीं डाल रहे नीतीश..? दूसरा, क्या मुलायम के बिना यूपी में किसी बड़ी ‘सम्भावना’ पर काम किया जा सकता है..? तीसरा, समाजवाद की बात करें तो नीतीश की तुलना में मुलायम और लालू समाजवाद के अधिक बड़े ‘प्रतीक’ ठहरेंगे, ऐसे में इन दोनों के बिना क्या ‘जन विकास पार्टी’ की स्वीकार्यता समाजवादियों के लिए बन पाएगी..? चौथा और सबसे बड़ा सवाल ये कि यूपी में (विशेष स्थिति में बंगाल और असम में भी) भाजपाविरोधी मतों में सेंध लगाकर क्या अप्रत्यक्ष रूप से नीतीश भाजपा को ही लाभ नहीं पहुँचा रहे होंगे..?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नीतीश राजनीति में प्रारम्भ से ही ‘प्रयोगधर्मी’ रहे हैं और ‘प्रयोग’ से उन्होंने पाया भी है बहुत कुछ। लेकिन प्रयोग का ये अर्थ कतई नहीं कि हर नए राज्य में नए तर्क के साथ साथी तलाशे जाएं। ऐसे में तात्कालिक लाभ भले ही हो जाए, विश्वसनीयता और नैतिकता पर प्रश्नचिह्न भी लगने लगते हैं। एक बात और, मुलायम ने जो गलती बिहार चुनाव में की, क्या वही गलती अब नीतीश भी (खासतौर पर यूपी में) नहीं कर रहे..? अगर नीतीश राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे विकल्प की सम्भावना को लेकर सचमुच गम्भीर हैं तो उन्हें सारे ‘स्वाभाविक’ साथियों को साथ लाने और जोड़े रखने के लिए किसी ‘फेविकोल’ के फार्मूले पर काम करना होगा। अन्यथा उनकी सारी कोशिश ‘पॉलिटिकल स्टंट’ से अधिक कुछ भी ना होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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