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हिन्दी को उसका मान और स्थान देने के लिए केन्द्र का बड़ा कदम

‘अच्छे दिन’ को लेकर केन्द्र की मोदी सरकार ने कई वादे किए हैं। उनमें कितने पूरे हुए, कितने पूरे होंगे और कितने केवल कागजों में रह जाएंगे ये बहस का विषय हो सकता है लेकिन राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसका मान और स्थान देने के लिए वर्तमान सरकार जो कुछ कर रही है वह स्वागतयोग्य है। देश और विदेश के मंचों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दी को लेकर अपनी जैसी सोच और अपनी सरकार की जैसी इच्छाशक्ति दिखाई है उससे हिन्दी के भविष्य को लेकर एक उम्मीद जरूर बंधती है।

केन्द्र सरकार ने वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कार्यालय में पत्राचार के दौरान सरल और बोली जाने वाली हिन्दी ही लिखी जाए। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जरूरत पड़ने पर ट्रांसलेशन टूल का भी इस्तेमाल करें। सरकारी भाषा सचिव गिरीश शंकर ने केन्द्रीय मंत्रालयों के सचिवों समेत वरिष्ठ अधिकारियों को इस संबंध में एक महत्वपूर्ण पत्र भेजा है। इसमें लिखा गया है कि सभी पत्र और आदेश सरल और बोली जाने वाली हिन्दी में लिखें और छोटे वाक्यों का इस्तेमाल करें।

भाषा सचिव ने पत्र में लिखा है कि अगर जरूरत पड़े तो हिन्दी में लिखने के लिए गूगल वॉइस टाइपिंग एप्लिकेशन का भी प्रयोग करें। केन्द्र जल्द ही पाँच लाख शब्दों का ऑनलाइन ट्रांसलेशन टूल लाने जा रहा है। इसका इस्तेमाल भी हिन्दी सीखने के लिए किया जा सकता है।

बता दें कि आधिकारिक भाषा के मसले पर 8 जनवरी को गिरीश शंकर की अध्यक्षता में 20 मंत्रालयों की एक रिव्यू मीटिंग हुई। इसमें पता चला कि लगभग सभी मंत्रालयों में करीब-करीब सौ प्रतिशत लोग हिन्दी बोल और समझ सकते हैं। लेकिन कई मामलों में आधिकारिक पत्राचार में हिन्दी का प्रयोग 12 प्रतिशत से भी कम है। शंकर ने मीटिंग में इस बात पर बल दिया कि वरिष्ठ अधिकारियों को हिन्दी में बातचीत या काम करना चाहिए ताकि नीचे के अधिकारियों को प्रोत्साहन मिले। उन्होंने हिन्दी के इस्तेमाल को संवैधानिक दायित्व बताते हुए अधिकारियों से रोज के काम में हिन्दी का प्रयोग करने को कहा था और अब इसी आलोक में पत्र भी भेजा है।

हिन्दी को लेकर अब तक की सभी सरकारों ने कुछ-ना-कुछ किया है। हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए ‘दिवस’, ‘सप्ताह’ या ‘पखवाड़ा’ मनाना कोई नई बात नहीं। लेकिन हिन्दी के लिए केन्द्र ने जो नए निर्देश दिए हैं उसमें एक अलग किस्म की ‘गंभीरता’ है। अब से पहले इतने ‘व्यावहारिक’ निर्देश नहीं दिए गए थे। जब तक हम कार्यालयी हिन्दी को उबा देने की हद तक लम्बे व जटिल वाक्यों और अनावश्यक ‘शास्त्रीयता’ से मुक्त नहीं करेंगे तब तक वह सर्वग्राह्य नहीं बन पाएगी। इसे देखते हुए केन्द्र के वर्तमान निर्देश में बोलचाल की और सरल हिन्दी के साथ छोटे वाक्यों के प्रयोग पर बल देना वाकई सुखद है।

हिन्दी या किसी भी भाषा के विकास के लिए जरूरी है कि वह बदलते समय के साथ कदमताल करे और हर दिन नई होती तकनीक के साथ सहज रहे। इसी जरूरत को ध्यान में रखकर आवश्यकतानुसार गूगल वॉइस टाइपिंग एप्लिकेशन और ट्रांसलेशन टूल का प्रयोग करने की सलाह भी केन्द्र ने दी है। इसी कड़ी में पाँच लाख शब्दों का ऑनलाइन ट्रांसलेशन टूल एक बड़ा और सराहनीय प्रयास है। भाषा सचिव और केन्द्र सरकार अपने इन प्रयत्नों के लिए सचमुच बधाई के पात्र हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 119वीं जयंती पर सौ फाइलों की श्रद्धांजलि

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज 119वीं जयंती है। महात्मा गांधी ने उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा था। ये भारत का दुर्भाग्य है कि अपने इस सपूत को उसने असमय ‘खो’ दिया और ये उस दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है कि अब तक उस ‘खोने’ की पुष्टि ना हो सकी। कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइपेई के एक विमान हादसे में उनकी मृत्यु हो गई। पर इस तथाकथित ‘मृत्यु’ के कुछ दिनों बाद से ही यह बात जोर पकड़ने लगी कि असल में नेताजी मरे नहीं थे।

Subhash Chandra Bose with Family
Subhash Chandra Bose with Family

तब से लेकर आज तक जितनी चर्चा नेताजी के अवदानों की हुई है उतनी ही उनकी तथाकथित ‘मृत्यु’ से जुड़े रहस्य की भी। कभी विमान हादसे में उनकी मृत्यु की बात होती तो कभी कहा जाता कि नेताजी चीन के रास्ते रूस पहुँचे थे और वहीं उनकी हत्या कर दी गई। बहुत से लोगों का मानना है कि नेताजी भारत लौट आए थे और 1985-86 तक फैजाबाद में गुमनामी बाबा के रूप में रहे। इसी क्रम में कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्होंने गांधीजी की शवयात्रा में नेताजी को देखा तो कुछ लोगों ने नेहरूजी की मृत्यु के बाद साधूवेश में नेताजी को उनके दर्शन करते देखने की बात कही। यहाँ तक कि उस अवसर की तस्वीर भी ‘सबूत’ के तौर पर पेश की गई।

Subhas Chandra Bose with Mahatma Gandhi & Sardar Patel at the Haripura Session of INC in 1938
Subhas Chandra Bose with Mahatma Gandhi & Sardar Patel at the Haripura Session of INC in 1938

नेताजी का व्यक्तित्व देश और काल में समाने वाला नहीं है। भारत समेत दुनिया भर में उनको जानने और मानने वाले लोगों की ये मांग रही है कि उनकी मृत्यु से जुड़े रहस्य को सुलझाने की आधिकारिक और ठोस पहल हो। कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए नेताजी से जुड़ी 64 फाइलों को सार्वजनिक किया। इसके बाद से केन्द्र सरकार के पास रखी नेताजी से जुड़ी फाइलों को भी सार्वजनिक करने की मांग तेज हो गई थी। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेताजी के रिश्तेदारों से वादा किया था कि 23 जनवरी को नेताजी की जयंती के अवसर पर उनसे जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक किया जाएगा।

Subhash Chandra Bose and Members of the Azad Hind Fauz in 1940
Subhash Chandra Bose and Members of the Azad Hind Fauz in 1940

अपने वादे को निभाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने आज नेताजी के कई रिश्तेदारों की मौजूदगी में उनसे जुड़ी सौ गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर दिया। इन सभी फाइलों की डिजिटल कॉपी को राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा जाएगा। पहली किस्त में सौ फाइलों को सार्वजनिक किया गया है। इसके बाद हर महीने 25-25 फाइलों को सार्वजनिक किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर नेताजी को समर्पित पोर्टल netajipapers.gov.in का भी लोकार्पण किया जिस पर ये सारे दस्तावेज देखे जा सकते हैं।

नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक कर केन्द्र सरकार ने उन्हें सचमुच एक बड़ी श्रद्धांजलि दी है। अब उम्मीद की जा सकती है कि उनकी ‘मृत्यु’ के रहस्य से पर्दा उठ जाएगा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उन बिरले लोगों में हैं जो मर कर भी नहीं मरते। उनके जीवन का कोई भी कालखंड क्यों ना उठा लें वो अपने आप में सम्पूर्ण होगा। वैसे ही जैसे हीरे के हजार टुकड़े कर देने पर भी वो हीरा ही कहलाएगा। फिर भी उस ‘इतिहासपुरुष’ के जीवन का अन्तिम अध्याय क्या था और क्यों था ये जानना बेहद जरूरी है क्योंकि ये ना केवल भारत बल्कि उन तमाम देशों के मौजूदा इतिहास के पन्नों में नई खिड़कियां खोल सकता है जिनसे अपने देश की आज़ादी के निमित्त नेताजी संवादरत थे। यही नहीं, अगर आज़ाद भारत का इतिहास नए सिरे से भी लिखना पड़ जाय, तो भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में महिलाओं को 35% आरक्षण और सरकारी नौकरी का गणित

पंचायत व नगर निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण देने के बाद शिक्षक बहाली में 50 प्रतिशत आरक्षण, फिर सिपाही बहाली में 35 प्रतिशत आरक्षण और अब अन्य सभी सेवाओं या संवर्गों में 35 प्रतिशत आरक्षण। बिहार सरकारी नौकरी में महिलाओं को इतने बड़े पैमाने पर आरक्षण देने वाला पहला राज्य बन गया है। बिहार सरकार के फैसले के मुताबिक सभी नौकरियों के सभी पदों पर सीधी भर्ती में महिलाओं को 35 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाएगा। सरकार ने आरक्षित और गैर आरक्षित श्रेणी में भी महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है।

यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि बिहार की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को 3 प्रतिशत आरक्षण पहले से ही मिल रहा है। सरकार की इस नई घोषणा के बाद भी वह यथावत रहेगा। अर्थात् अभी जिस 35 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई है वह आरक्षित एवं गैर आरक्षित कोटे की शेष 97 प्रतिशत नौकरियों पर लागू होगा।

बता दें कि बिहार में वर्तमान में अनुसूचित जाति के लिए 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 1 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग के लिए 18 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग के लिए 12 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद यह गणित कुछ इस तरह होगा। अब अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 16 प्रतिशत में से महिलाओं के लिए 5.6 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 1 प्रतिशत में से .35 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित 18 प्रतिशत में से 6.3 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित 12 प्रतिशत में से 4.2 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित 50 प्रतिशत में से 17.5 प्रतिशत स्थान सुरक्षित रहेगा। कहने का अर्थ यह है कि महिलाओं को आरक्षण का लाभ जातिगत आधार पर ही मिलेगा। याद दिला दें कि केन्द्र में महिला आरक्षण बिल के लंबित होने का यह बड़ा कारण रहा है। कई विपक्षी दल जातिगत आधार पर ही महिलाओं को आरक्षण दिए जाने की मांग करते रहे हैं।

महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देते हुए यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों के लिए योग्य उम्मीदवार ना मिल पाने की स्थिति में रिक्त स्थानों को उसी भर्ती व्रर्ष में संबंधित वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों से भरा जाएगा।

विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने जो सात वादे (निश्चय) किए थे उनमें महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण एक बड़ा वादा था। उनकी सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाते हुए उस वादे को पूरा भी कर दिया। लेकिन यह बात सरकार भी जानती है, हम भी जानते हैं और जिन महिलाओं को आरक्षण मिला है वो भी जानती हैं कि इस आरक्षण का वास्तविक लाभ तभी मिल पाएगा जब महिलाएं सही मायने में पुरुषों के साथ कदमताल कर रही होंगी। उदाहरण के तौर पर पंचायत या नगर निकायों को ही लें। होने को वहाँ महिलाएं 50 प्रतिशत हैं लेकिन हम ह्रदय पर हाथ रख कर क्या ये कह पाने की स्थिति में हैं कि उनकी भागीदारी व्यवहार में भी 50 प्रतिशत है..?

सच तो यह है कि ‘आरक्षण’ की शुरुआत घर से होनी चाहिए। बेटे और बेटी के लिए 50-50 प्रतिशत का आरक्षण। अधिकार में भी और कर्तव्य में भी। स्नेह में भी और सम्मान में भी। जिस दिन ऐसा होगा उस दिन किसी ‘महिला आरक्षण’ की जरूरत ही नहीं होगी। और हाँ, यही फार्मूला जातियों के आरक्षण पर भी लागू हो सकता है। अगर हम समाज को परिवार मानें और सभी जातियों को उसकी संतानें।

कोई भी आरक्षण ‘वंचितों’ को समानता का अवसर प्रदान करने के लिए होना चाहिए। आरक्षण अगर हमें अपनी कमजोरी से लड़ने की ताकत दे तो ठीक है। अगर वो कमजोरी को ही हथियार बनाना सिखाए तो वो सत्ता में आने और बने रहने की राजनीति के सिवाय कुछ भी नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पूंजीवाद का नंगा सच… 62 अमीरों के पास है दुनिया का आधा पैसा

दुनिया के सारे नेता चाहे जो भाषण दे लें, दुनिया भर की सरकारें चाहे जितनी नीतियां बना लें, आर्थिक असमानता के विश्लेषण के लिए चाहे जितने नोबेल पुरस्कार दे दिए जाएं… सच ये है कि हर बीतते दिन के साथ अमीर और गरीब के बीच की खाई और बड़ी, और गहरी होती जा रही है। क्या आप यकीन करेंगे कि दुनिया के आधे पैसे पर महज 62 लोगों का कब्जा है। इन 62 धनकुबेरों में 53 पुरुष और 9 महिलाएं हैं। जी हाँ, इसका खुलासा कल जारी की गई ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट ‘एन इकोनॉमी फॉर द वन परसेंट’ में हुआ है।

‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए गए हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के एक प्रतिशत अमीर लोगों की दौलत शेष 99 प्रतिशत लोगों की कुल संपत्ति के बराबर हो गई है। इसमें कहा गया है कि 2010 से लेकर अब तक दुनिया भर के अमीरों की सम्पत्ति में करीब 11 लाख करोड़ का इजाफा हुआ है। इस अवधि में अमीरों की सम्पत्ति जहाँ 44 प्रतिशत बढ़ी, वहीं गरीबों की सम्पत्ति में 41 प्रतिशत की कमी आई।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि 1990 से लेकर 2010 तक वैश्विक गरीबी लगभग आधी हो गई थी। हालांकि इस दौरान आम लोगों की आमदनी में नाममात्र इजाफा हुआ। इस दौरान महज 10 प्रतिशत लोगों की सालाना आमदनी बढ़ी और वो बढोतरी थी केवल 180 रुपये की।

‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट से आर्थिक असमानता की जो भयावह तस्वीर सामने आई है उसकी भविष्यवाणी गरीबों के लिए काम करने वाली इस संस्था ने 2015 में ही कर दी थी। उसने कहा था कि जल्द ही एक प्रतिशत आबादी के पास दुनिया के शेष लोगों से ज्यादा पैसा होगा। हालांकि ये समस्या इतनी जटिल और इतने स्तरों पर है कि इसका कोई एक कारण नहीं कहा जा सकता। स्वाभाविक रूप से इसके कई कारण हैं और सबसे बड़ा कारण है राष्ट्रीय आय में गरीबों की भागीदारी कम होना। यही कारण है कि दुनिया भर में दौलत कुछ लोगों के पास सिमट कर रह गई है। अधिकतर विकसित और विकासशील देशों में कर्मचारी और मजदूरों की आय लगातार कम हो रही है।

हैरानी की बात तो ये है कि दुनिया की सारी सरकारें सब कुछ देख और समझकर भी खामोश बैठी हैं। खामोश ही नहीं ये तमाम सरकारें पूंजीपतियों के हाथों की कठपुतली होकर रह गई है। ये पूंजीवाद का नंगा सच है और दिन-ब-दिन इसका रूप और विकराल और वीभत्स होता जाएगा। क्या हम कुछ नहीं करेंगे… कुछ भी नहीं..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बड़ी दिलचस्प है अमिताभ और शाहरुख के साथ मोदी की ये ‘जंग’

नरेन्द्र मोदी… यानि आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी के ‘पर्याय’, भारत के प्रधानमंत्री, विश्व के बड़े राजनेताओं में शुमार… पर ये परिचय पर्याप्त नहीं लगता इनके लिए। सत्ता के शीर्ष पर कोई शख्स पहली बार नहीं पहुँचा है, लोकप्रियता या विश्व भर में चर्चा भी किसी ने पहली बार हासिल की हो ऐसी बात नहीं, तो फिर क्या वजह है कि कोई भी परिचय पर्याप्त नहीं लगता इनके लिए..? चलिए आज की ख़बर और उसके विश्लेषण से इसका जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं।

ख़बर ये है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर फॉलोअर्स की संख्या के लिहाज से बॉलीवुड के सुपरस्टार शाहरुख खान को पीछे छोड़ दिया है। कल यानि 16 जनवरी को मोदी के फॉलोअर्स की संख्या 1 करोड़ 73 लाख 71 हजार 600 थी, जबकि शाहरुख के 1 करोड़ 73 लाख 51 हजार 100 फॉलोअर्स थे। शाहरुख को पीछे छोड़ने के साथ ही मोदी ट्विटर पर दूसरे सबसे ज्यादा फॉलोअर वाले भारतीय बन गए हैं। उनसे आगे केवल ‘सदी के महानायक’ अमिताभ बच्चन हैं। अमिताभ के फॉलोअर्स की संख्या करीब 1 करोड़ 89 लाख है।

मोदी ने ट्विटर का बड़ा रचनात्मक उपयोग किया है। इसकी मदद से उन्होंने ना केवल ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्वच्छ भारत’ और ‘सेल्फी विद डॉटर’ जैसे अभियानों को आगे बढ़ाया बल्कि देश के आम नागरिकों के साथ सीधा सम्पर्क भी स्थापित किया। उनके ट्विटर अकाउंट पर फॉलोअर्स की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले साल 22 नवंबर को उनके फोलाअर्स की संख्या डेढ़ करोड़ को पार कर गई थी। उसके बाद 20 नवंबर को यानि दो महीने से भी कम समय में उनके फॉलोअर्स की संख्या 1 करोड़ 60 लाख से अधिक हो गई। इस बार यानि 16 जनवरी को और भी कम समय में उनके फॉलोअर्स की संख्या में 10 लाख से ज्यादा वृद्धि हुई है।

नरेन्द्र मोदी ट्विटर पर 2009 से सक्रिय हैं। भारतीय नेताओं में उनके फॉलोअर्स की संख्या सर्वाधिक है। पूरी दुनिया के नेताओं की बात करें तो उनसे आगे केवल अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा हैं। देखा जाय तो मोदी के प्रति लोगों का ये आकर्षण अकारण नहीं है। सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हो रही पीढ़ी ने स्टेट्समैन की ‘गरिमा’ के साथ एक फिल्मस्टार-सा ‘ग्लैमर’ किसी में देखा तो वो नरेन्द्र मोदी हैं। लोकप्रिय होना या और चर्चा में रहना एक बात है लेकिन आम से लेकर खास तक की दिनचर्या में जिस तरह मोदी शामिल हो गए हैं उस तरह पिछले दो-तीन दशकों में कोई शामिल नहीं हुआ। उससे भी बड़ी बात ये कि भारत की राजनीति के केन्द्र में ‘व्यक्ति’ पहले भी रहे लेकिन मोदी से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि उस ‘व्यक्ति’ के कद के मुकाबले में कोई दूर-दूर तक ना दिखे – पक्ष और विपक्ष दोनों को मिलाकर भी।

आज अखबारों और पत्रिकाओं के साथ-साथ सैकड़ों चैनल, लाखों साइट्स और करोड़ों स्मार्टफोन की नज़र आप पर होती है। अनगिनत आँखों की मौजूदगी में भी आप ना केवल खुद को ‘साबित’ कर रहे हों बल्कि आपके कद में इजाफा भी हो रहा हो तो ये उपलब्धि ‘असाधारण’ कही जाएगी। एक बात और। ट्विटर और फेसबुक के ज्यादातर यूजर्स 18 से 25 साल के हैं और उन्हें लुभाने और भरमाने को हजारों चीजें हैं इंटरनेट पर, फिर भी 65 साल का कोई पॉलिटिशियन अमिताभ और शाहरुख से ना केवल होड़ लेता है बल्कि उनमें से एक को पीछे छोड़ देता है और दूसरे को भी पीछे छोड़ने की तैयारी में दिखता है तो ये सचमुच बड़ी बात है। जिस रफ्तार से इस करिश्माई राजनेता के फॉलोअर्स बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए हो सकता है अगले कुछ महीनों में ट्विटर पर वो शीर्ष पर हों। नरेन्द्र मोदी ने राजनीति में कई जंगें लड़ी हैं और जीती हैं लेकिन इस ‘जंग’ और इसमें जीत के अलग मायने हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘बिहार’ की राजधानी ‘दिल्ली’ कहने वाले शिक्षकों का मूल्यांकन कैसे करेंगे पदाधिकारी..?

शिक्षा विभाग ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्राइमरी से प्लस टू तक के बच्चों एवं शिक्षकों के मूल्यांकन (एसेसमेंट) की घोषणा की है। मूल्यांकन का कार्य फरवरी 2016 से प्रारम्भ होगा। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार को लेकर शिक्षा विभाग ने ये ‘भगीरथ’ संकल्प ले तो लिया है लेकिन मूल्यांकन की ‘गंगा’ आसानी से ‘धरती’ पर उतरने वाली नहीं हैं। जी हाँ, राह में कई मुश्किलें हैं और उनसे वाकिफ होने पर आप भी कुछ ऐसा ही सोचेंगे।

आगे बात करें उससे पहले मूल्यांकन की प्रक्रिया और उसके उद्देश्य को जानें। शिक्षा विभाग के निर्देश के अनुसार जिले से प्रखंड स्तरीय सभी शिक्षा पदाधिकारी एक-एक स्कूल का निरीक्षण करेंगे और किए गए एसेसमेंट के आधार पर जिले के सभी पदाधिकारी यानि डीईओ, डीपीओ, बीईओ आदि की रैंकिंग की जाएगी। रैंकिंग के आधार पर ही इन पदाधिकारियों को वेतन व अन्य सुविधाएं दी जाएंगी। कहने का मतलब ये कि शिक्षा विभाग ने बच्चों एवं शिक्षकों के मूल्यांकन के बहाने बड़ी सफाई से सभी अधिकारियों की नकेल भी कस दी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षा विभाग का ये कदम स्वागतयोग्य है लेकिन ये तमाम पदाधिकारी उन शिक्षकों के एसेसमेंट में क्या लिखेंगे जो वर्ष के बारहों महीने का नाम अंग्रेजी में नहीं बोल पाते या फिर भारत की राजधानी पटना और बिहार की राजधानी दिल्ली बोलते हैं। समस्या केवल शिक्षकों की ‘अशिक्षा’ की ही नहीं है। दूसरी बड़ी समस्या ये है कि सैकड़ों की तादाद में शिक्षक ‘कामचोरी’ भी करते हैं। जी हाँ, वैसे शिक्षकों की तादाद भी कम नहीं है जो ‘साधन-सम्पन्न’ और ‘दबंग’ हैं और उनकी हाजिरी बिना उनके आए बन जाया करती है। बिना सूचना के कई दिनों या कुछ हफ्तों के लिए ‘गायब’ हो जाना तो मामूली बात है।

‘मधेपुरा अबतक’ ने जब इस बाबत स्थानीय शिक्षाविदों से बात की तो ना केवल उनकी चिन्ता और आक्रोश से हम रू-ब-रू हुए बल्कि कई महत्वपूर्ण सुझाव भी सामने आए। इन बुद्धिजीवियों की राय है कि ‘कामचोर’ व बिना सूचना के गायब रहने वाले शिक्षकों पर अविलम्ब कार्रवाई होनी चाहिए। जो शिक्षक पढ़ने-पढ़ाने में दिलचस्पी नहीं लें और उन्हें नौकरी में बनाए रखने की कोई ‘विवशता’ हो सरकार की तो उन्हें अन्य सरकारी कार्यों – पोलियो अभियान, जनगणना, चुनाव आदि – में स्थायी तौर लगा दिया जाना भी एक विकल्प हो सकता है। दूसरी ओर अच्छे शिक्षकों एवं अच्छी रैंकिंग वाले पदाधिकारियों को पर्याप्त सम्मान व सुविधा मिले, सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए।

सच तो ये है कि संकल्पित और समन्वित प्रयास से ही शिक्षा की गुणवत्ता वापस लौट सकती है। केवल सरकार को कोसने से काम नहीं होगा। इसके लिए पहले हमें जागना होगा। एक जागरुक समाज में ‘अशिक्षित’ और ‘कामचोर’ शिक्षक की जगह ना तो होनी चाहिए, ना हो सकती है। और हाँ, जब शिक्षक ‘कसौटी’ पर खरे उतरने लगेंगे तब बच्चों की ‘कसौटी भी स्वत: तैयार हो जाएगी। पर क्या इस कार्य के लिए बच्चों और शिक्षकों से पहले हमें खुद का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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आइंस्टीन और हॉकिंग से अधिक है भारत की बेटी काश्मिया का आईक्यू

अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंग इस धरती पर मानव-मस्तिष्क के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। अपनी बेजोड़ उपलब्धियों से इन महान वैज्ञानिकों ने मानव-मस्तिष्क की अद्भुत क्षमता से हमारा परिचय कराया। आज मानव-जाति ने टेक्नोलॉजी के मामले में अभूतपूर्व प्रगति कर ली है और करोड़ों मस्तिष्क दिन-रात ‘असंभव’ को ‘संभव’ बनाने की जंग में जुटे हुए हैं तब भी आइंस्टीन और हॉकिंग के आगे का रास्ता अभी तय नहीं हो पाया है। ऐसे में 11 साल की एक बच्ची आईक्यू के मामले में इन दोनों दिग्गजों को पीछे छोड़ दे तो इसे कुदरत के करिश्मा के अलावा क्या कहेंगे आप..? और जब आपको कहा जाय कि ये कमाल भारत की किसी बेटी ने किया है तो क्या प्रतिक्रिया होगी आपकी..?

जी हाँ, ब्रिटेन में रह रही भारतीय मूल की 11 वर्षीया काश्मिया वाही ने ‘मेनसा’ की आईक्यू परीक्षा में सौ फीसदी यानि 162 में से 162 अंक लाकर अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंग को पीछे छोड़ दिया है। काश्मिया की ये उपलब्धि कितनी बड़ी है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि सार्वकालिक महान जिन दो वैज्ञानिकों के नाम ऊपर लिए गए हैं उनका आईक्यू 160 माना जाता है।

मुंबई में जन्मी काश्मिया के पिता विकास लंदन के एक बैंक में आईटी प्रबंधन से जुड़े हैं और माँ का नाम पूजा वाही है। पश्चिमी लंदन के नॉटिंग हिल एंड ईलिंग जूनियर स्कूल की इस छात्रा ने अपने माता-पिता की नज़र में खुद को साबित करने के लिए ‘मेनसा’ की प्रतिष्ठित परीक्षा में हिस्सा लिया था। बता दें कि ‘मेनसा’ संसार की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी उच्च आईक्यू सोसायटी मानी जाती है और “कैटल-3 बी मेनसा” आईक्यू के आकलन की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति रखने वाली प्रक्रिया है। इसके तहत कुल 150 सवाल पूछे जाते हैं और इस परीक्षा में शामिल होने की न्यूनतम आयु साढ़े दस साल है।

अपनी करिश्माई उपलब्धि के बाद काश्मिया ने कहा कि आइंस्टीन और हॉकिंग जैसी महान हस्तियों से तुलना किए जाने से अभिभूत हूँ। यह तुलना अकल्पनीय है। मेरा मानना है कि ऐसी महान हस्तियों की श्रेणी में शामिल होने के लिए ढेरों उपलब्धियां हासिल करनी होंगी। वहीं बेटी की सफलता से भाव-विभोर माता-पिता का कहना है कि हम हमेशा से महसूस करते थे कि उसके पास अलौकिक बुद्धि है और मौका दिया जाय तो अपनी बुद्धिमत्ता को वह साबित कर सकती है।

ये जानना दिलचस्प होगा कि मानव-मस्तिष्क का नया छोर बन चुकी काश्मिया शतरंज की बेजोड़ खिलाड़ी हैं और कई राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं जीत चुकी हैं। यही नहीं, उसे नेट बॉल खेलना भी पसंद है। अतुलनीय प्रतिभा की धनी भारत की इस बेटी को जगमगाते भविष्य के निमित्त मधेपुरा अबतक की ढेरों शुभकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सुशील मोदीजी, बिहार में अगर अपराध बढ़े हैं तो जवाब सीएम देंगे या लालू..?

भाजपा समेत एनडीए के तमाम दल राज्य की कानून-व्यवस्था को मुद्दा बना बिहार की महागठबंधन सरकार को घेरने में लगे हैं। सरकार कहीं की और किसी भी पार्टी की हो, विपक्षी दल का काम ही है उसे घेरना। जरूरी हो तब भी, ना हो तब भी। इसमें कोई नई बात नहीं। जहाँ तक बिहार की कानून-व्यवस्था का प्रश्न है, उस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की राय अलग-अलग हो सकती है और है भी। अगर थोड़ी देर के लिए मान लें कि बिहार में आपराधिक घटनाएं बढ़ी हैं तो भी सवाल सरकार के मुखिया से होना चाहिए ना कि सरकार में शामिल दलविशेष के मुखिया से। लेकिन बिहार में ऐसा नहीं हो रहा।

बिहार के मुख्य विपक्षी दल भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बिहार में ‘अपराधियों के कोहराम’ की बात करते हैं लेकिन सवाल पूछते हैं राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव से कि ‘ऐसा कब तक चलेगा’। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अगर पहले की तरह राबड़ी होतीं या सरकार तेजस्वी के नेतृत्व में चल रही होती या फिर मुख्यमंत्री राजद से ही कोई होता तो सुमो का लालू से सवाल करना समझ में आता। तब ये भी मान लिया जाता कि सरकार ‘रिमोट’ से चल रही है और सुमो बीच में वक्त जाया ना कर सीधे ‘रिमोट’ से मुखातिब हैं। लेकिन यहाँ सामने नीतीश हैं। ना केवल चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया बल्कि मुख्यमंत्री पद के वो घोषित उम्मीदवार थे। महागठबंधन के सरकार में आने के पीछे ये बहुत बड़ा, शायद सबसे बड़ा फैक्टर रहा है। मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश की क्षमता और सामर्थ्य भी संदेह से परे है। फिर सवाल उनसे ना कर लालू से क्यों..?

सुशील कुमार मोदी का कहना है कि लालू की नसीहत के बाद भी सरकार अपराधियों पर नकेल कसने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि बैंक लूट, निर्माण कम्पनियों के अधिकारियों व कर्मियों को धमकाने और हत्या का सिलसिला अभी थमा भी नहीं कि अपराधियों ने पुलिस को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। वैशाली में एएसआई अशोक कुमार यादव की हत्या राज्य सरकार के लिए गम्भीर चुनौती है। लगभग डेढ़ माह पहले वैशाली के ही लालगंज में एक दारोगा की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। मोदी ने कहा कि ऐसी स्थिति में सरकार के बड़े घटक दल का नेता होने के नाते लालू को अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए और बताना चाहिए कि बिहार में अपराधियों का यह कोहराम कब तक चलता रहेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह की घटनाएं चिन्ता का विषय हैं। इनकी कड़ी निन्दा और भर्त्सना होनी चाहिए। लेकिन बात केवल यहीं तक नहीं रहती। राजनीति की ‘गुंजाइश’ ऐसे मौकों पर भी निकल जाती है या निकाल ली जाती है। अभी दो दिन बीते हैं जब एनडीए के घटक दल ‘हम’ के नेता मांझी ने कानून-व्यवस्था के ही मुद्दे पर नीतीश के ‘बेचारा’ होने की बात कही थी और ‘बदनामी’ मोल लेने के बजाए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने की सलाह दी थी। इस्तीफे की सलाह देकर मांझी जहाँ पहुँचे, लालू से सवाल कर मोदी भी वहीं पहुँच रहे हैं लेकिन अलग कोण से। स्पष्ट है कि नीतीश को लालू के बहाने घेरने की कोशिश की जा रही है। यही कोशिश चुनाव के दौरान भी की गई थी। परिणाम क्या रहा, ये सबके सामने है। कम-से-कम कानून-व्यवस्था और विकास के मुद्दे पर तमाम दलों के बीच सीधा संवाद हो तो बेहतर है। वैसे भी नीतीश के साथ काम करने का सुमो का लम्बा अनुभव है। बदली हुई परिस्थितियों में दोनों आज भले ही अलग-अलग हों, राज्य के हित में कुछ मुद्दों पर तो साथ होकर सकारात्मक भूमिका निभा ही सकते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश के ‘बेचारा’ और ‘बदनाम’ होने से क्यों परेशान हैं मांझी..?

जी हाँ, कल तक जो मांझी नीतीश को ‘कीचड़’ से नहलाते नहीं थक रहे थे, आज वही परेशान हैं उनके ‘बेचारा’ और ‘बदनाम’ होने से। मांझी की मानें तो नीतीश ‘बेचारा’ हो गए हैं क्योंकि आज बिहार में ताज किसी और का और राज किसी और का है। ऐसे में बेवजह ‘बदनाम’ होने से बेहतर है कि नीतीश मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दें।

गुरुवार को अपने पटना स्थित सरकारी आवास पर पत्रकारों से बात करते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने कहा कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद से बढ़ते ‘अनुचित दबाव’ के कारण राज्य के करीब 35 आईएएस और आईपीएस अधिकारी लिखित रूप से केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा जता चुके हैं। इससे बिहार में शासन-व्यवस्था की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मांझी ने हाल के दिनों में दरभंगा और वैशाली जिलों में अभियंताओं की हत्या की चर्चा की और राज्य की बिगड़ती कानून-वयवस्था पर चिन्ता जताते हुए दावा किया कि बिहार में पिछले 60 दिनों के भीतर रंगदारी, अपहरण, बैंक डकैती, लूट और हत्या जैसी करीब 600 आपराधिक घटनाएं घटी हैं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ठोस कार्रवाई करने के बजाए ‘गीदड़ भभकी’ देने में लगे हैं।

मांझी ने हाल में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव द्वारा कथित तौर पर पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) का निरीक्षण करने को लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुचित बताया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में चर्चा है कि बिहार में ताज किसी और का और राज किसी और का है। अगर नीतीश कुमार इस कदर ‘बेचारा’ हो गए हैं और इतने दबाव में हैं कि कोई एक्शन नहीं ले सकते तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। बिहार में सचमुच जिनका राज है वे ही सत्ता चलाएं, नीतीश क्यों बेवजह बदनाम हो रहे हैं..?

इतना सब कुछ कहने के बाद मांझी ये कहना भी नहीं भूले कि वे नीतीश कुमार के प्रति ‘हमदर्दी’ रखते हैं क्योंकि नीतीश ने ही उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया था। यही कारण है कि वे उन्हें बेहतर सलाह दे रहे हैं। मांझी की मानें तो नीतीश इस्तीफा देकर ‘बदनाम’ होने से बच सकते हैं।

मांझी ने बहुत दिनों के बाद लेकिन बहुत सम्भल कर मुँह खोला है। एक ओर सरकार के कामकाज और राज्य की कानून-व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी और दूसरी ओर नीतीश को इस्तीफे के लिए कहना लेकिन उनके ‘योगदान’ को याद कर और उनसे ‘हमदर्दी’ जताते हुए, ये वास्तव में एक तीर से कई निशाने को साधने की कोशिश है। मांझी ने बेशक कड़ी आलोचना की है लेकिन हर बात के लिए ठीकरा सरकार में भागीदार लालू और उनकी पार्टी राजद पर फोड़ा है। बता दें कि विधानसभा चुनाव से पूर्व वो लालू ही थे जिन्होंने मांझी को भाजपा छोड़ महागठबंधन में आने का न्योता तक दिया था लेकिन आज जब मांझी ने मुँह खोला है तो उनके निशाने पर वही लालू हैं।

आखिर लालू के खिलाफ मोर्चा खोल क्या हासिल करेंगे मांझी..? चुनाव में एकमात्र अपनी सीट (और वो भी दो सीटों पर लड़ने के बाद) बचाने वाले मांझी को इन दिनों भाजपा से कोई तरजीह नहीं मिल रही। ऐसे में कहीं नई जमीन तलाशने की कोशिश तो नहीं कर रहे मांझी..? या फिर ‘बड़े भाई – छोटे भाई’ के बीच दरार पैदा करने के लिए ये भाजपा का ही ‘गेमप्लान’ है..?

जो भी हो, राजनीति में कभी सीधी चाल नहीं चली जाती। और आजकल तो ‘टेढ़ी’ चाल में भी इतने ‘मोड़’ और ‘घुमाव’ होने लगे हैं कि कुछ भी कहना बहुत मुश्किल हो गया है। हाँ, इतना जरूर है कि बदले हुए हालात में मांझी को अपनी ‘नाव’ और ‘पतवार’ दोनों पर फिर से विचार करना पड़ रहा है। ऐसा करना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है। नहीं तो कल तक तक खुद को बिहार में महादलितों का सबसे बड़ा नेता कहने वाले को कुछ दिनों के बाद ‘अस्तित्व’ के संकट से जूझना पड़ जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार के बाद ‘मिशन असम’ पर हैं नीतीश और उनके ‘चाणक्य’

बिहार में महागठबंधन की जीत में बड़ी भूमिका निभाने वाले नीतीश के चाणक्य प्रशांत किशोर ने अब असम का रुख किया है। नीतीश ने उन्हें बिहार की तरह असम में भी ‘महागठबंधन’ की सम्भावना तलाशने भेजा है। सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर पिछले सप्ताह असम में थे और उन्होंने असम की पार्टी एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘लम्बी’ बातचीत कराई है।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम में बड़ी कामयाबी मिली थी। तब सबको चौंकाते हुए उसने वहाँ की 14 में से 7 लोकसभा सीटें जीत ली थीं। राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत को देख उसे रोकने लिए तमाम विरोधी दल एक होने की जरूरत महसूसने लगे थे पर किसी ‘सम्भावना’ को ठोस आकार नहीं मिल पा  रहा था। बिहार में जेडीयू-राजद-कांग्रेस महागठबंधन की सफलता से इस सम्भावना को आकार और गति देने का फार्मूला मिल गया और उस फार्मूले को जमीन पर उतारने के लिए प्रशांत किशोर जैसा रणनीतिकार भी। लिहाजा राजनीति की नब़्ज पहचानने वाले नीतीश ने अपने ‘चाणक्य’ को ‘मिशन असम’ पर भजने में जरा भी देर नहीं की।

बता दें कि जेडीयू असम में एआईयूडीएफ, असम गण परिषद और कांग्रेस के ‘महागठबंधन’ को आकार देने में लगी है। पार्टी के महासचिव केसी त्यागी का मानना है कि इन दलों के एक साथ आने पर भाजपा को रोकना बहुत आसान होगा।

असम में नीतीश की ‘चहलकदमी’ अप्रत्याशित नहीं है। उनके शपथग्रहण में देश भर के तमाम मोदीविरोधी दलों और दिग्गज नेताओं के जमावड़े ने स्पष्ट कर दिया था कि वो पाँचवीं बार बिहार की सत्ता पाकर ही रुकने वाले नहीं हैं। उनका अगला कदम मोदीविरोधी राजनीति की धुरी बन स्वयं को मोदी के विकल्प के तौर पर पेश करना होगा। असम से उन्होंने इसी की शुरुआत की है। पश्चिम बंगाल और यूपी पर भी उनकी निगाह बराबर बनी हुई है। ये देखना खासा दिलचस्प होगा कि आँकड़ों के लिहाज से केवल बिहार में राजनीतिक वज़ूद रखनेवाले एक दल का नेता क्या केवल अपनी ‘छवि’ की बदौलत मोदी के राष्ट्रीय कद और भाजपा के राष्ट्रीय नेटवर्क का मुकाबला कर पाएगा..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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