‘समान कार्य-समान वेतन’ पर कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी डॉ.संजीव कुमार सिंह की बेबाक स्वीकारोक्ति !

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा “समान कार्य – समान वेतन” पर दिनांक 10 मार्च 2019 को पारित न्यायनिर्णय के बाबत कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के शिक्षक प्रतिनिधि एमएलसी डॉ.संजीव कुमार सिंह ने मधेपुरा अबतक को दो दिन बाद यानि 13 मई 2019 को बेबाकी के साथ यही कहा- “शिक्षकों के सारे संगठनों की एकजुटता बनी रहे….. मैं शिक्षक संगठनों के द्वारा किये गये सभी संघर्षों की तरह इस संघर्ष में भी निष्ठापूर्वक साथ रहा हूँ…. और पूरी निष्ठा के साथ सदैव साथ रहूंगा….. शिक्षकों के हित के लिए सदा लड़ा हूँ और सदैव लडूंगा….. साथ दिया हूँ और सदा साथ दूंगा |”

सर्वोच्च न्यायालय के पारित न्यायनिर्णय के बाबत आप शिक्षकों के प्रिय प्रतिनिधि विधान पार्षद डॉ.संजीव कुमार सिंह द्वारा “जय शिक्षक, जय शिक्षक संघ” के प्रति अभिव्यक्त भावनाएं…. हू-ब-हू उन्हीं के शब्दों में-

“एक शिक्षक प्रतिनिधि के रूप में बेबाकी से स्वीकार करता हूँ कि ‘समान कार्य – समान वेतन’ के मामले में राज्य सरकार की बेरुखी के कारण ही विभिन्न शिक्षक संगठनों को अपेक्षित न्याय हेतु पटना उच्च न्यायालय जाना पड़ा | पुनः पटना उच्च न्यायालय द्वारा इसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ही पूर्व पारित न्यायनिर्णय के आलोक में पूर्ण सकारात्मक फैसला सुनाया गया….. लेकिन राज्य सरकार द्वारा मुख्यरूप से अपने वित्तीय संसाधनों के अभाव एवं अन्य कतिपय कारणों का हवाला देते हुए शिक्षक हित के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने….. दूसरी तरफ विभिन्न शिक्षक संगठनों के नेतृत्व द्वारा इस चुनौती को स्वीकारने के पश्चात् बड़े-बड़े विद्वान एवं नामी-गिरामी अधिवक्ताओं से तथ्यात्मक सार्थक बहस कराने के उपरांत 10.05.2019 को पारित न्यायनिर्णय से स्वयं सर्वोच्च न्यायालय आज अपनी ही न्यायिक निष्पक्षता एवं विश्वसनीयता पर विरोधाभासी स्थिति में है |

सच तो यह है कि ‘न्याय के साथ विकास’ के क्रम में आज संपूर्ण शिक्षक वर्ग ही पीछे छूट गया है….. चाहे नियोजित शिक्षक हों, वित्तरहित शिक्षक संस्थानों के शिक्षक हों, अल्पसंख्यक विद्यालय के शिक्षक हों या फिर मदरसा-संस्कृत शिक्षक हों | ऐसी स्थिति में शिक्षकों को अपने शैक्षिक दायित्व पर कम और अपनी हकमारी की लड़ाई पर ज्यादा ध्यान देना स्वाभाविक है |

लगभग 10 वर्षों के अंतराल में तो राज्य के सभी प्रमुख राजनीतिक दल मिलित में ही रहे लेकिन सफलता आंशिक ही मिली | इस मुद्दे पर आज राजनीति जितनी भी हो लेकिन जब तक शिक्षकों के विभिन्न सांगठनिक समूहों की कोई मिलित एवं कारगर रणनीति नहीं बनेगी तबतक संघर्ष भी सार्थक नहीं हो सकता | अपने संवैधानिक एवं मौलिक अधिकारों को हासिल करने हेतु अंततः हमें तरीके भी लोकतांत्रिक ही अपनाने होंगे ताकि सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति का झुकाव इस दिशा में हो |

इस आंदोलन में सभी कोटि के शिक्षकों द्वारा अपना हक प्राप्त करने की सामूहिक प्रतिबद्धता तथा उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सभी संघ-संगठनों के साथ-साथ शिक्षकों की एकजुटता से ही सफलता संभव है | मैं भी इस संघर्ष में सदैव साथ रहा हूं और सदैव रहूंगा…… जय शिक्षक, जय शिक्षक संघ !!”

चलते-चलते यह भी बता दें कि इस फैसले के बाबत जब समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी से पूछा गया तो डॉ.मधेपुरी ने यही कहा कि इस फैसले के खिलाफ सभी शिक्षक-संगठनों को एकजुट होकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका अवश्य दायर करनी चाहिए क्योंकि यह फैसला भारतीय संविधान की आत्मा की आवाज को अनसुनी करने जैसा है | डॉ.मधेपुरी ने विधायकों एवं सांसदों को ₹500 प्रतिमाह मोबाइल चार्ज की जगह ₹15,000 प्रतिमाह दिये जाने पर प्रश्न उठाते हुए यही कहा कि प्रतिनिधियों को ऐसे अनाप-सनाप रूपये भुगतान करने के लिए सरकारी खजाने में पैसे कहाँ से आते हैं…..?

सम्बंधित खबरें