अब वृक्षमाता कहलाने लगी है कर्नाटक की 106 वर्षीया पद्मश्री सालूमरदा थिमक्का

कर्नाटक की 106 वर्षीया थिमक्का जब शादी के 25 वर्ष बाद भी संतानहीन होने के कारण अहर्निश दुखी रहने लगी और उसका मन अवसाद से भरने लगा तो थिमक्का अपने पति बिकाला चिक्य्या से छिपकर खुदखुशी करने की सोचने लगी | यह महसूसने की बात है कि नारी के लिए मातृत्व कितना महत्वपूर्ण होता है |

बता दें कि इस दरमियान थिमक्का को अपने ही अंतर्मन से निकली कुछ देववाणी सुनाई देने लगी….. “आखिर जीने का कुछ तो मकसद होना चाहिए” | और अंततः यह मकसद बन गई- “हरियाली यानि पर्यावरण सुरक्षा |” तत्कालीन 50 वर्षीया थिमक्का ने अपने मन में यह ठान लिया कि अब वह गांव की सड़कों के दोनों किनारे बरगद आदि के पेड़ लगायेगी जो पेड़ एक बड़े क्षेत्र में हरियाली का एहसास करायेगा |

यह भी बता दें कि थिमक्का संपूर्ण समर्पण के साथ उन पेड़ों को अपने हाथों 4 किलोमीटर के परिक्षेत्रों में लगाती रही और अहर्निश अबोध संतान की तरह उसकी सही परवरिश, स्वस्थ देखभाल एवं सुदृढ़ पालन-पोषण करती रही-

थिमक्का सदैव वृक्षों के साथ माँ-बेटे की तरह एक अटूट रिश्ता कायम करने में लगी रही | उन पेड़ों से वह सदैव बातें करती….. उन्हें छूती रहती और उनके पत्तों को चुमती भी रहती…. हफ्ते में चार बार से अधिक……. कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर वह माँ थिमक्का दूर-दूर से अपने सिर पर पानी ढोकर लाती और पुत्रवत् उन पौधों की सिंचाई भी करती रहती |

यह भी जानिए कि थिमक्का द्वारा इन पेड़ों को ऐसी जमीन पर पंक्तिबंद्ध करके रोपे गये थे जिन जगहों पर बारिश बहुत कम हुआ करती है | थिमक्का द्वारा उठाये गये इस प्रेरणादायी कदमों के चलते उन्हें एक पर्यावरणविद्  के रूप में खूब ख्याति मिली और मिले ढेर सारे पुरस्कार भी | उस इलाके के सारे लोग थिमक्का को पर्यावरण का हीरो मानने लगे….. जिसके फलस्वरूप आस-पास के गाँवों में रहने वाले समस्त ग्रामीणों ने थिमक्का को “सालुमरदा” नामकरण करके सम्मानित भी किया …. यानि तब से लोग उन्हें  “सालुमारदा थिमक्का” कहने लगे | दरअसल कर्नाटक की भाषा ‘कन्नड़’ में ‘सालुमरदा’ का अर्थ होता है- ‘पेड़ों की पंक्ति’ |

और हाँ ! हाल ही में सालुमरदा थिमक्का को महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा राष्ट्रपति भवन में ‘पद्मश्री’ सम्मान से सम्मानित किए जाने के बाबत समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी से कुछ पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि जिस अद्भुत काम को एक अनपढ़ माँ के रूप में पद्मश्री सालुमरदा थिमक्का ने समाज को समर्पित किया है वह कोई आसान काम नहीं है | इस काम को बड़े-बड़े डिग्रीधारी भी नहीं कर सकते | पौधे उपलब्ध करना, गड्ढे खोदना, पौधे लगाना….. कई-कई किलोमीटर दूर से माथे पर पानी लाना तथा पौधों की निरंतर सिंचाई करना…… ये कोई आसान काम नहीं है। सृजन का यह काम आने वाली पीढ़ी के लिए एक प्रेरणादायी काम होगा |

आगे अंतरराष्ट्रीय मदर्स डे के अवसर पर डॉ.मधेपुरी ने यही कहा-

पद्मश्री सालुमरदा थिमक्का पेड़ों की ऐसी माँ है जो सभी माँओं से अलग है, सर्वोपरि है और वैसी माँ को दुनिया का पर्याय कहने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं ! ऐसी माँ के बिना इन पेड़ों के जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल है | भगवान की बनाई गई अद्वितीय रचना है यह माँ थिमक्का जो मानव को ऐसी जिंदगी जीने का हौसला देती है जिसके ऋण को आनेवाली कई पीढ़ियां भी नहीं चुका सकेंगी….. वह अनपढ़ माँ पद्मश्री ही नहीं भारतरत्न सरीखे सर्वोच्च सम्मान का भी हकदार है…..!

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