जी हां, आइंस्टीन के एक नोट की कीमत दस करोड़ से ज्यादा

कुछ लोग मशहूर होते हैं, कुछ महान होते हैं और जिन्हें ईश्वर ये दोनों नेमत देते हैं उनके लिए माना जाना चाहिए कि वे इस धरती पर कोई विशेष कार्य करने आए हैं और उनके जीवन का हर क्षण, उनसे जुड़ी हर चीज मानव-सभ्यता की थाती है। बुद्ध, गांधी, मार्क्स, आइंस्टीन आदि ऐसे ही बिरले लोगों में शुमार हैं, जिन्होंने हमारी सभ्यता की दिशा और दशा बदली। यही कारण है कि उनसे जुड़ी छोटी-सी-छोटी चीज भी अनमोल हो जाती है और अगर उनकी बोली लगा दी जाए तो करोड़ों भी कम पड़ जाते हैं।

ऊपर कही बात के विस्तार में जाएं उससे पहले एक सवाल। जरा सोच कर बताएं, एक पन्ने की कीमत क्या हो सकती है, जिस पर महज एक नोट लिखा हुआ हो। आप चाहे जितनी उदारता से सोच लें, कुछ सौ या हजार से आगे शायद ही बढ़ पाएं। अब अगर आपसे कहा जाए कि एक नोट वाले एक पन्ने की कीमत दस करोड़ से भी ज्यादा हो सकती है तो क्या आप यकीन कर पाएंगे? नहीं ना? लेकिन जनाब जब उस पन्ने पर अल्बर्ट आइंस्टीन का स्पर्श हो और लिखा हुआ नोट उनका हो तो यह भी मुमकिन है।

जी हां, महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के लिखे नोट वाला पन्ना येरूशलम में हुई एक नीलामी में दस करोड़ से भी ज्यादा (दस करोड़ तेईस लाख) में बिका। आपको बता दें कि आइंस्टीन ने यह नोट 1922 ई. में टोक्यो के इंपीरियल होटल में एक वेटर को बतौर इनाम लिखकर दिया था क्योंकि उस वक्त उनके पास उसे देने के लिए कैश नहीं था। आपको उत्सुकता हो रही होगी कि आखिर आइंस्टीन उस वेटर को इनाम क्यों देना चाह रहे थे? तो यह भी जान लें। दरअसल एक लेक्चर देने जापान आए आइंस्टीन को उस वेटर ने ही आकर संदेश दिया था कि उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। इस संदेश के बाद इनाम देना तो बनता ही था।

अब आपको यह भी बता बता दें कि आइंस्टीन ने उस पन्ने पर लिखा क्या था। उन्होंने उस पन्ने पर जीवन की खुशी का राज बताते हुए लिखा था कि “जीवन में मंजिल हासिल करने के बाद भी खुशी मिल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है।” जर्मन भाषा में लिखे अपने नोट में उन्होंने आगे लिखा – “कामयाबी और उसके साथ आने वाली बेचैनी के बजाय एक शांत और विनम्र जीवन आपको अधिक खुशी देगा।”

करीब इसी दौरान के एक दूसरे नोट में उन्होंने लिखा -“जहां चाह, वहां राह।” ये नोट करीब दो करोड़ रूपयों में नीलाम हुआ। नीलामी करने वाली कंपनी का कहना है कि इन दोनों नोट्स की कीमत अनुमान से कहीं अधिक है। हो भी क्यों ना? आइंस्टीन अनुमान में आने वाली शख्सियत भी नहीं। चलते–चलते बता दें कि आइंस्टीन के बेशकीमती नोट को बेचने वाला साल 1922 में आइंस्टीन तक संदेश पहुंचाने वाले व्यक्ति का भतीजा है और नोट को खरीदने वाला एक यूरोपीय।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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