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पति-पत्नी ने शुरू किया था भाई-बहन का त्योहार

यह संसार रिश्तों से बना है और हर रिश्ते की अपनी अहमियत होती है, लेकिन भाई-बहन का रिश्ता अपने आप में अद्भुत है। यही एक रिश्ता है, जिसकी कोई एक परिभाषा गढ़ पाना मुश्किल है। सोच कर देखिए, अगर आपकी बहन आपसे बड़ी है तो उसमें मां की झलक पाएंगे आप, छोटी है तो बेटी लगेगी वह। दोस्त तो वो हर हाल में है ही। आप जो सुख-दुख कई बार माता-पिता से नहीं बांट पाते वो अपनी बहन से बांट लेते हैं। एक बहन ही है जो आपकी कमियों के लिए आपको डांटती नहीं और अपना ऐसा कोई सुख नहीं जो आपसे बांटती नहीं। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के इसी अटूट प्यार की निशानी है, जिसे सदियों से मनाया जाता रहा है। भाई-बहन के विश्वास को बनाए रखने वाला यह त्योहार श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। लेकिन इसकी शुरुआत कब और क्यों हुई, इसके पीछे कई दिलचस्प कहानियां हैं। चलिए जानने की कोशिश करते हैं।

आपको जानकर हैरत होगी कि भाई-बहन के इस त्योहार की शुरुआत पति-पत्नी ने की थी। पुराणों के अनुसार एक बार दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता दानवों से हारने लगे। देवराज इंद्र की पत्नी शुचि ने देवताओं की हो रही हार से घबरा कर उनकी विजय के लिए तप करना शुरू कर दिया। तप से उन्हें एक रक्षासूत्र प्राप्त हुआ, जिसे उन्होंने श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन अपने पति इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इस रक्षासूत्र से देवताओं की शक्ति बढ़ गई और उन्होंने दानवों पर जीत प्राप्त की। उसी दिन से यह परंपरा शुरू हुई कि आप जिसकी भी रक्षा व उन्नति की इच्छा रखते हैं, उसे रक्षासूत्र यानि राखी बांध सकते हैं, चाहे वह किसी भी रिश्ते में क्यों न हो।

वैसे हमारे इतिहास, खासकर पौराणिक इतिहास में ऐसी कई कहानियां दर्ज हैं जो रक्षाबंधन या राखी के महत्व को दर्शाती हैं। इनमें एक कहानी महाभारत काल से भी जुड़ी है। इस कहानी के अनुसार श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने चक्र से किया था। शिशुपाल का सिर काटने के बाद जब चक्र वापस लौटा तब उसे पुन: धारण करने के क्रम में कृष्ण की उंगली थोड़ी कट गई। उंगली से रक्त बहता देख पांडवों की पत्नी द्रौपदी से रहा नहीं गया और उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर कृष्ण की उंगली में बांध दिया। इस पर भावुक होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वचन दिया कि वे आजीवन उनकी साड़ी की लाज रखेंगे। आगे चलकर दु:शासन ने जब द्रौपदी का चीरहरण करना चाहा तो उन्होंने पूरी तत्परता से अपना कहा पूरा किया।

रक्षाबंधन से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी का ताल्लुक हमारे मध्यकालीन इतिहास से है। यह कहानी रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं से संबंधित है और उस दौर को दर्शाती है जब राजपूत शासकों और मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चित्तौड़ के राजा की विधवा थीं। राजा की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य व प्रजा की रक्षा की खातिर चिन्तित रानी ने हुमायूं से मदद मांगी। उन्होंने हुमायूं को एक राखी भेजी और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। हुमायूं ने उस राखी की मर्यादा रखी और रानी को बहन का दर्जा देते हुए उनके राज्य को सुरक्षित कर अपना दायित्व पूरा किया।

रक्षाबंधन से जुड़ी बाकी कहानियां फिर कभी। फिलहाल हमें इजाजत दें और हमारी मंगलकामनाएं स्वीकार करें। शुभ रक्षाबंधन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भारत ने जीत ली लंका

भारत ने कोलंबो टेस्ट मैच में श्रीलंका को पारी और 53 रन से हराकर तीन टेस्ट मैचों की सीरीज अपने नाम कर ली, जबकि अभी सीरीज का एक टेस्ट खेला जाना बाकी है। भारत की इस जीत के नायक रहे रविन्द्र जडेजा और आर अश्विन। इन दोनों ने इस टेस्ट में अर्द्धशतक लगाने के साथ-साथ 7-7 विकेट भी झटके और भारत को टेस्ट सीरीज में लगातार आठवीं जीत दिलाई। गौरतलब है कि 2015 के बाद से टीम इंडिया को कोई भी टीम टेस्ट सीरीज में हरा नहीं पाई है।

बता दें कि भारत ने अपनी पहली पारी में 9 विकेट पर 622 रन बनाकर पारी घोषित कर दी थी। भारत की इस पारी में चेतेश्वर पुजारा ने शानदार 133 और अजिंक्य रहाणे ने 132 रन बनाए थे। इसके जवाब में श्रीलंका की पहली पारी महज 183 रनों पर सिमट गई थी। दूसरी पारी में भी श्रीलंकाई टीम 386 रनों से आगे नहीं बढ़ पाई। इस पारी में केवल दिमुथ करुणारत्ने (141 रन) और कुशल मेंडिस (110 रन) ही अपनी टीम के लिए संघर्ष कर पाए।

भारत के लिए पहली पारी में अश्विन ने 5 विकेट चटकाए थे, जबकि दूसरी पारी में यह कमाल जडेजा ने दिखाया। जडेजा ने इस टेस्ट में अपने 150 विकेट भी पूरे कर लिए। बड़ी बात यह कि इस उपलब्धि के साथ वे सबसे तेजी से 150 विकेट लेने वाले दाएं हाथ के गेंदबाज बन गए हैं। उन्होंने मात्र 32 टेस्टों में यह मुकाम हासिल किया। दूसरी ओर अश्विन के लिए भी यह टेस्ट उपलब्धियों भरा रहा। इस टेस्ट के बाद वे सबसे तेजी से 2000 से अधिक रन और 250 से अधिक विकेट हासिल करने वाले टेस्ट खिलाड़ी बन गए हैं। उन्होंने यह उपलब्धि 51 टेस्ट मैचों में हासिल की।

क्रिकेट के तीनों फॉरमेट में भारत की हाल की जीतों की एक बड़ी बात यह भी रही है कि इन जीतों से टीम में एक के बाद एक कई मैच विनर खिलाड़ी सामने आए। इसी टेस्ट की बात करें तो पुजारा, रहाणे, अश्विन, जडेजा, के एल राहुल सब के सब विजेता की तरह खेले। कोहली तो टीम की रीढ़ हैं ही। सीरीज का तीसरा और आखिरी टेस्ट पल्लीकेले में खेला जाएगा। एक पर एक जांबाजों से सजी विराट कोहली की टीम निश्चित तौर पर अपना विजय अभियान जारी रखना चाहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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वैंकेया नायडू होंगे देश के नए उपराष्ट्रपति

भाजपा के वरिष्ठ नेता और एनडीए उम्मीदवार वैंकेया नायडू भारत के नए उपराष्ट्रपति होंगे। उपराष्ट्रपति पद के लिए शनिवार को हुए चुनाव में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोते और 18 विपक्षी दलों के संयुक्त उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी को 272 वोटों से हराया। उन्हें कुल 516 वोट मिले, जबकि गोपाल कृष्ण गांधी 244 वोट ही हासिल कर पाए। इसके साथ ही देश के तीनों बड़े संवैधानिक पदों – राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री – पर भाजपा काबिज हो गई। महज 37 साल पहले 1980 में अस्तित्व में आने वाली भाजपा के लिए ये सचमुच बड़ी उपलब्धि है।

बता दें कि उपराष्ट्रपति चुनाव में कुल 785 सांसदों को वोट डालना था, लेकिन अलग-अलग कारणों से 14 सांसदों ने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया और 771 सांसदों ने ही वोट डाला। वोटिंग सुबह 10 बजे शुरू हुई और शाम 5 बजे तक चली। वोटों की गिनती शाम 6 बजे शुरू हुई और 7 बजते-बजते घोषणा हो गई कि देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाले 13वें शख्स वैंकेया नायडू हैं।

घोषणा के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत तमाम बड़े नेताओं ने वैंकेया को बधाई दी। पराजित उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी ने भी विजयी उम्मीदवार को शुभकामनाएं दीं और अपने प्रदर्शन पर ‘संतोष’ जताते हुए सभी वोट देने वालों को धन्यवाद दिया। गौरतलब है कि वैंकेया नायडू उपराष्ट्रपति बनने वाले आरएसएस पृष्ठभूमि के दूसरे नेता हैं। इससे पहले भाजपा के भैरों सिंह शेखावत 2002 में इस पद के लिए चुने गए थे।

नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने परिणाम घोषित होने के बाद कहा कि मैं कृतार्थ हूं। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सभी पार्टी नेताओं का समर्थन देने के लिए आभारी हूं। उन्होंने आगे कहा कि मैं उपराष्ट्रपति संस्था का उपयोग राष्ट्रपति के हाथ मजबूत बनाने के लिए करूंगा और ऊपरी सदन की मर्यादा को कायम रखूंगा। साधारण किसान पृष्ठभूमि से आने वाले वैंकेया नायडू ने यह भी कहा कि मैंने इसकी कल्पना नहीं की थी कि मैं यहां पहुंच सकूंगा।

चलते-चलते बता दें कि 68 वर्षीय वैंकेया के पास संसद में 25 वर्षों का अनुभव है, जबकि उनका पूरा राजनीतिक अनुभव लगभग 45 वर्षों का है। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से उन्हें हार्दिक मंगलकामनाएं!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या है शरद का सस्पेंस ?

शरद यादव का अगला कदम क्या होगा? वे अंतत: नीतीश के निर्णय का समर्थन करेंगे या अपनी अलग राह चुनेंगे? अलग राह चुनने की स्थिति में वे अपनी नई पार्टी बनाएंगे या किसी और पार्टी का दामन थाम लेंगे? देश और विशेषकर बिहार की राजनीति में उनके साथ या बगावत का क्या और कितना असर होगा? ऐसे जाने कितने ही सवाल हवा में हैं जिनका फिलहाल एक निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता।

बिहार का सत्ता समीकरण बदलने के बाद 2-3 दिनों तक शरद यादव ने चुप्पी साधे रखी। इस दौरान कभी राहुल गांधी तो कभी अरुण जेटली, कभी सीताराम येचुरी तो कभी डी राजा, कभी लालू प्रसाद यादव तो कभी अली अनवर से उनकी बात या मुलाकात की ख़बरें आती रहीं। इधर दो दिनों से वे मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं। तेवर हालांकि बगावती हैं, लेकिन अभी बोल रहे हैं संभलकर। संसद में फसल बीमा योजना को लेकर तो ट्वीटर पर कालाधन के मुद्दे पर उन्होंने केन्द्र सरकार की खिंचाई भी की लेकिन मर्यादित तरीके से।

आखिर शरद चाह क्या रहे हैं? मीडिया और उनसे जुड़े लोग उन्हें ‘दुखी’, ‘नाराज’, ‘आश्चर्यचकित’ बता रहे हैं, लेकिन उनका कोई स्पष्ट निर्णय या बयान सामने नहीं आ रहा। मधेपुरा, जहां पिछले 26 सालों से वे संसदीय राजनीति कर रहे हैं, में उनके करीबी विजय कुमार वर्मा, पूर्व विधानपार्षद बयान देते हैं कि शरद यादव महागठबंधन में रहकर उसे मजबूत करेंगे, तो दिल्ली में उनके अत्यंत करीबी केसी त्यागी, जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव 19 अगस्त को पटना में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनके शामिल होने की बात कह रहे हैं।

इधर मीडिया के कुछ लोग उनमें यूपीए की अगुआई करने और भाजपाविरोधी खेमे की ‘धुरी’ बनने की संभावना  देखने लगे हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है? दूसरी ओर बदले हालात में क्या नीतीश, जेडीयू और एनडीए के लिए उनकी इतनी ‘प्रासंगिकता’ बची है कि उन्हें केन्द्र में मंत्रीपद देकर ‘संतुष्ट’ किया जा सके? यहां उल्लेखनीय है कि 2019 को लेकर नीतीश ने कल कहा था कि मोदी के मुकाबले कोई है ही नहीं। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। इस पर शरद यादव ने आज यह तो कहा कि 2019 में किसी के हारने-जीतने का सवाल अभी दूर है, लेकिन नीतीश या मोदी को ‘आंख’ नही दिखाई।

सौ बात की एक बात यह कि राजनीति ‘गिव एंड टेक’ का खेल है। शरद यादव के अनुभव, वरिष्ठता और उनकी राष्ट्रीय पहचान पर उनके विरोधी को भी संदेह नहीं हो सकता लेकिन इससे भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि इतने लंबे राजनीतिक करियर में उनकी अपनी कोई ‘राजनीतिक जमीन’ नहीं बन पाई। मूल जनता दल से लेकर अब तक अलग-अलग समय पर और अलग-अलग पार्टियों में उनका ‘सांकेतिक’ महत्व जो भी रहा हो, उनमें वोट ट्रांसफर करने की क्षमता कतई नहीं। हां, ‘टेबल पॉलिटिक्स’ के महारथी वे जरूर हैं और मुद्दों की भी अच्छी समझ रखते हैं। अपनी इन खूबियों के बल पर अगले कुछ दिनों में वे क्या निर्णय लेते हैं, इस पर सबकी निगाहें लगी रहेंगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में हुई साकार नीतीश-‘मोदी’ सरकार

अभी चौबीस घंटे भी नहीं हुए और बिहार की सियासत ने नई करवट ले ली। कल सुबह 10 बजे नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री थे, शाम 5 बजे अपनी पार्टी की बैठक करते हुए भी वे महागठबंधन सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, पर अभी घंटा भी नहीं बीता कि आबोहवा बदलनी शुरू हो गई और शाम के 7 बजते-बजते वे राज्यपाल को बतौर मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा सौंप कर मीडिया के सामने मुखातिब थे और आज सुबह 10 बजे वे एनडीए विधायक दल के नेता के तौर पर छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे और उसके कुछ ही मिनटों बाद उनकी बगल की कुर्सी पर बतौर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बैठे थे। जी हां, तेजस्वी-प्रकरण का पटाक्षेप चार साल बाद जेडीयू-भाजपा के दुबारा हाथ मिलाने और सत्ता में साथ वापस आने से हुआ।

बता दें कि आरजेडी के साथ चल रही तनातनी में अपनी ‘नाक’ झुकाने से इनकार करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार शाम जेडीयू की बैठक के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। गौरतलब है कि जेडीयू उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सीबीआई के एफआईआर मामले में लगातार ‘बिन्दुवार स्पष्टीकरण’ और प्रकारांतर से इस्तीफे की बात कह रही थी, लेकिन आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने न केवल इस्तीफे से साफ इंकार किया बल्कि पूरे मामले पर न तो उन्होंने और न ही तेजस्वी ने ‘स्पष्टीकरण’ ही दिया। बकौल नीतीश कुमार ऐसी परिस्थिति में उनके लिए महागठबंधन सरकार को चलाना संभव नहीं रह गया था।

बहरहाल, नीतीश कुमार के इस्तीफे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में जुड़ने के लिए’ बधाई दी। इसके बाद लालू और उनकी पार्टी अभी ‘विश्वासघात’ का आरोप लगाते हुए अपनी भड़ास ही निकाल रहे थे कि घटनाक्रम तेजी से बदला और भाजपा ने बिना देर किए नीतीश को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। फिर ये ख़बर भी आते देर न लगी कि 1 अणे मार्ग पर भाजपा और जेडीयू विधायकों की संयुक्त बैठक हो रही है और नीतीश कुमार को एनडीए का नेता चुन लिया गया है। महज चंद घंटों में बिहार की सियासत की तस्वीर पूरी तरह बदल गई और ये स्पष्ट हो गया कि मानसून सत्र से पहले नीतीश सरकार अपने नए अवतार में होगी।

नीतीश कुमार ने ये साबित किया कि अगर आपके पास अपनी ‘छवि’ की पूंजी हो और आप धुन के पक्के हों तो सितारे भी आपके मुताबिक चलने लगते हैं और आप एक ही दिन में मुख्यमंत्री का पद छोड़कर फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। जहां तक लालू की बात है, उन्होंने जरा भी राजनीतिक परिपक्वता नहीं दिखाई। अगर उन्होंने समय रहते तेजस्वी से इस्तीफा दिलवा दिया होता तो न केवल उनका और तेजस्वी का कद बढ़ता और जनता की सहानुभूति उन्हें मिलती, बल्कि उनकी पार्टी सरकार में भी बनी रहती और महागठबंधन भी अटूट रहता। एक बात और, ऐसी स्थिति में वे वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी को उपमुख्यमंत्री बनवा कर अपने ‘माय’ समीकरण को भी मजबूत कर सकते थे। दूसरी ओर नीतीश कुमार हैं, उन्होंने समय की नब्ज को समझा और नैतिकता के साथ अपनी सरकार भी बचा ली। रही बात बेचारी कांग्रेस की, बिहार के इन दो बड़े दलों के बीच वो पिस कर रह गई है। जेडीयू-भाजपा के साथ आने के बाद अब उसके पास अधिक विकल्प ही नहीं हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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समाज सुधारक डॉ.विन्देश्वर पाठक ने किया कोसी के सत्यम को सम्मानित

‘वॉयस ऑफ़ बिहार’ के सुनहरे बैनर तले दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित बिहार प्रतिभा सम्मान समारोह में 2017 के सिविल सर्विसेज (UPSC) में चयनित कोसी अंचल के सहरसा जिले के सफल प्रतिभागी छात्र सत्यम ठाकुर को ‘बिहार गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया ख्याति प्राप्त समाज सुधारक एवं सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ.विन्देश्वर पाठक ने |

इस कार्यक्रम में बिहार में डीजीपी रहे, सुपर-30 के ख्याति प्राप्त शिक्षक अभयानन्द(IPS) जिन्होंने जिंदगी को कभी पीछे मुड़कर अफसोस की दृष्टि से नहीं देखा के साथ-साथ ‘वॉयस ऑफ़ बिहार’ के संस्थापक ब्रजेश ठाकुर और दिल्ली के डिप्टी मेयर सहित अन्य गणमान्यों के बीच सहरसा जिले के चैनपुर निवासी सत्यम ठाकुर को डॉ.बिंदेश्वर पाठक ने मोमेंटो देकर सम्मानित किया |

यह भी बता दें कि वर्ष 2017 के सिविल सेवा में बिहार से चयनित सत्यम सहित सोलह सफल प्रतियोगियों को तो सम्मानित किया ही गया साथ ही संगीत, साहित्य, खेल एवं उद्यम के क्षेत्र में बिहार का नाम रौशन करने वाले युवाओं को भी सम्मानित किया गया |

इस अवसर पर भारत के जूनियर हॉकी टीम को विश्वकप जिताने वाले कोच श्री हरेन्द्र सिंह, प्रसिद्ध लोकगीत गायिका वंदना भारद्वाज, लेखिका पल्लवी प्रकाश, युवा साहित्यकार नीलोत्पल मृणाल आदि को भी सम्मानित किया गया |

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बिहार में कांग्रेस के साथ जेडीयू-आरजेडी वाला गठबंधन अब नग्नता की ओर…….!    

आज 25 जुलाई है और ऐतिहासिक दिन भी ! चयनित 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के महामहिम राष्ट्रपति के पदासीन होने वाले शपथ-ग्रहण समारोह का मंगल दिन |

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गठबंधन के बंधन से दबाव में आकर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलने एवं अन्य आवश्यक कार्यों को लेकर 4 दिनों की दिल्ली यात्रा पर हैं | वे महामहिम के शपथ ग्रहण समारोह में भी शरीक होंगे | सीएम नीतीश कुमार को रामनाथ कोविंद द्वारा विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है | भला क्यों नहीं, राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश अपने तत्कालीन महामहिम राज्यपाल श्री कोविंद को भाजपा उम्मीदवार होने के बावजूद हर छोटे-बड़े नेता की बातें अनसुनी करते हुए आगे बढ़-चढ़कर मदद जो करते रहे थे |

हां ! जहाँ एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से सीबीआई के फेरे में फंसने के बाद ‘बिन्दुबार स्पष्टीकरण’ देने को कहा गया वहीं दूसरी और दिल्ली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलने के दरमियान जीरो टॉलरेंस वाले सीएम नीतीश कुमार द्वारा पुनः यही कहा जा रहा है कि इतने आरोपों के साथ सरकार में बने रहने की स्वीकृति किसी को नहीं दी जा सकती है- सोचिए तो सही, अब कहने को शेष रह ही क्या जाता है |

यह भी बता दें कि जहाँ एक ओर नीतीश सरकार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी फिलहाल दिल्ली से दौलताबाद करते हुए अपने बचाव के रास्ते तलाशने में लगे हैं यानि बड़े-बड़े वकीलों से सलाह ले रहे हैं तो कभी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलकर जदयू-राजद के बीच मध्यस्थता करने हेतु अनुरोध पर अनुरोध कर रहे हैं- वहीं दूसरी ओर एनडीए गठबंधन के शीर्ष नेताओं के बीच इस बात की चर्चा भी कल शाम से दिल्ली में जोर पकडने लगी है कि नीतीश कुमार को पार्टनर ट्रीट किया जाय या अपोजीशन……..!

अंत में यह भी जान लें कि नीतीश-तेजस्वी प्रकरण में तल्ख हो चुके रिश्तों को मुलायम किये जाने वाली कोशिशों का सफल नहीं होना, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद द्वारा बेटे उप मुख्यमंत्री तेजस्वी के इस्तीफा देने से साफ-साफ इंकार करना और जीरो टॉलरेंस वाले मुख्यमंत्री व आरोपों से घिरे उप मुख्यमंत्री द्वारा दिल्ली दरबार में हाजिरी पर हाजिरी लगाना- कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में कांग्रेस के साथ जदयू व आरजेडी वाला गठबंधन नग्नता की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है……….|

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प्रणब दा ने दिलाई सहिष्णुता, बहुलतावाद और अहिंसा की याद

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बतौर राष्ट्रपति आज देश को आखिरी बार संबोधित किया। विचार, विद्वता और विनम्रता से ओतप्रोत इस संबोधन में उन्होंने कहा कि पिछले पचास वर्षों के सार्वजनिक जीवन के दौरान, भारत का संविधान मेरा पवित्र ग्रंथ रहा है, भारत की संसद मेरा मंदिर रही है और भारत की जनता की सेवा मेरी अभिलाषा रही है। उन्होंने कहा, जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसकी उपदेश देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, परंतु मेरे पास देने के लिए कोई उपदेश नहीं है। मैंने देश को जितना दिया, उससे कहीं अधिक पाया है। इसके लिए, मैं भारत के लोगों के प्रति सदैव ऋणी रहूंगा।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने विदाई भाषण में देश की सहिष्णुता, बहुलतावाद और अहिंसा की शक्ति को खास तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा, हम एक-दूसरे से तर्क-वितर्क कर सकते हैं, सहमत-असहमत हो सकते हैं, लेकिन विविध विचारों की मौजूदगी को हम नकार नहीं सकते हैं। अनेकता में एकता को देश की पहचान बताते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न विचारों को ग्रहण करके हमारे समाज में बहुलतावाद का निर्माण हुआ है। हमें सहिष्णुता से शक्ति प्राप्त होती है। प्रतिदिन हम आसपास बढ़ती हुई हिंसा को देखते हैं तो दुख होता है। हमें इसकी निंदा करनी चाहिए। हमें अहिंसा की शक्ति को जगाना होगा। महात्मा गांधी भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखते थे जहां समावेशी माहौल हो। हमें ऐसा ही राष्ट्र बनाना होगा।

देश के 13वें राष्ट्रपति ने अपने अंतिम संबोधन में जलवायु परिवर्तन पर भी चिन्ता जताई। उन्होंने कहा, पर्यावरण में बदलाव के कारण कृषि पर असर पड़ा है। इसके लिए हमलोगों को मिलकर काम करना होगा। तरक्की हासिल करने के लिए महामहिम मुखर्जी ने शिक्षा और शिक्षण-संस्थानों को विश्वस्तर बनाने की बात कही। बकौल मुखर्जी हमारे विश्वविद्यालय केवल नोट्स बनाने के केन्द्र नहीं बनने चाहिएं, बल्कि यहां रचनात्मकता और शोध को जगह मिलनी चाहिए।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा, मैंने पिछले पांच वर्षों में अच्छा माहौल बनाने की कोशिश की। अब मैं विदा हो रहा हूं। कल मैं जब आपसे बात कर रहा होऊंगा तो मैं भारत का राष्ट्रपति नहीं बल्कि एक आम नागरिक रहूंगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा सम्मान मातृभूमि का नागरिक होने में है। हम सभी भारत मां के बच्चे हैं। हमें जो भी जिम्मेदारी मिले, हम सब उसको पूरी निष्ठा से निभाएं। देश की उन्नति ही हमारा ध्येय होना चाहिए।

गौरतलब है कि 81 वर्षीय प्रणब मुखर्जी अब 340 कमरों वाला राष्ट्रपति भवन छोड़कर 10 राजाजी मार्ग पर रहेंगे। इस दोमंजिला बंगले में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी अपनी सेवानिवृत्ति के बाद से निधन होने तक रहे थे। देश के 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मंगलवार को दोपहर 12 बजे शपथ लेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

 

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कर्नाटक को अलग झंडा क्यों चाहिए ?

वोट की राजनीति के लिए दलों और नेताओं ने देश को धर्म, सम्प्रदाय, वर्ण, नस्ल, जाति, उपजाति, भाषा, बोली, क्षेत्र जैसी न जाने कितनी ही चीजों में बांट दिया। बंटने और बांटने की ये प्रक्रिया इतिहास के हर दौर में चली है, लेकिन अब इस प्रक्रिया ने वीभत्स रूप ले लिया है। अलगाववादी मानसिकता का इसे चरम ही कहा जाएगा कि अब भारत के किसी राज्य में अलग झंडे की मांग उठी है। हद तो इस बात की है कि यह मांग वहां के मुख्यमंत्री ने उठाई और इसके लिए बकायदा कमिटी बनाकर केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजा। आजादी के बाद से अब तक एक कश्मीर के अलग झंडे की कितनी कीमत हमें चुकानी पड़ी है, यह किसी से छिपा नहीं, ऐसे में कर्नाटक से उठी ये आवाज कितनी खतरनाक हो सकती है, यह बताने की जरूरत नहीं।

बहरहाल, कर्नाटक के अपने अलग झंडे के प्रस्ताव को वहां की मौजूदा कांग्रेस सरकार के मुखिया सिद्धारमैया की अगले साल विधानसभा चुनावों की जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि यह प्रस्ताव फिलहाल शुरुआती स्तर पर ही है।

गौरतलब है कि याचिकाकर्ताओं के एक समूह के सवालों के जवाब में राज्य सरकार ने राज्य के लिए “कानूनी तौर पर मान्य झंडे का डियाइन” तैयार करने के लिए अधिकारियों की एक समिति तैयार की थी। दिलचस्प बात यह है कि याचिका 2008-09 के बीच उस वक्त तैयार की गई थी जब कर्नाटक में भाजपा की सरकार थी। उस वक्त भाजपा सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट को बताया था कि राज्य का अलग झंडा होना देश की एकता और अखंडता के खिलाफ है।

अब जबकि कर्नाटक में 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं, कर्नाटक कांग्रेस की कोशिश है कि झंडे के बहाने ‘कन्नड़ अस्मिता’ को हवा दी जाए। वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मामले को उस समय तूल दे दिया जब उन्होंने राज्य के अलग झंडे की मांग का विरोध करने वाली भाजपा की आलोचना की और सवाल उठाया कि क्या संविधान में कोई ऐसा प्रावधान है जो राज्य को अलग झंडे को अपनाने से रोकता है? हालांकि बता दें कि कर्नाटक सरकार की इस मांग को केन्द्रीय गृह मंत्रालय ठुकरा चुका है। कांग्रेस हाईकमान भी इससे पल्ला झाड़ चुका है। यहां तक कि कांग्रेस आलाकमान ने बकायदा कर्नाटक कांग्रेस को इसके लिए फटकार भी लगाई है।

इस मामले के चर्चा में आने के बाद स्वाभाविक तौर पर नेताओं और दलों की प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया है। अपने नेतृत्व की राय से अलग कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि “राज्य के लिए अलग झंडे का कदम एक अच्छी पहल होगी।” वैसे उन्होंने आगे यह जरूर कहा कि “बशर्ते यह देश में अलगाव का प्रतीक न बने।” बकौल थरूर अगर राज्य का झंडा राज्य से जुड़ाव का प्रतीक है तो देश के सभी राज्यों के पास अपना झंडा होना चाहिए।

उधर शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में कर्नाटक सरकार के राज्य के लिए अलग झंडे की मांग की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को बर्खास्त कर देना चाहिए क्योंकि यह कदम इतिहास और पार्टी के आदर्शों के उलट है। शिवसेना ने इसे ‘राजद्रोह’ की संज्ञा देते हुए केन्द्र से कर्नाटक सरकार को भंग करने या राज्य को मिलने वाली सभी सहायताओं को तत्काल बंद करने की भी मांग की।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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दिल्ली दौरे पर नीतीश

बीते मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के बाद उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने जिस तरह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की और तथाकथित तौर पर अपनी बातें रखीं, उसके बाद लगा कि बिहार की राजनीतिक अनिश्चितता खत्म हो गई है। लेकिन एक बार फिर जेडीयू द्वारा तेजस्वी से ‘बिन्दुवार स्पष्टीकरण’ देने की बात कहने और इसी दौरान जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के चार दिनों की यात्रा पर दिल्ली जाने से माहौल एक बार फिर गर्म होता दिख रहा है। मजे की बात यह कि इस दौरान उनकी मुलाकात कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों के साथ होनी है।

ख़बरों के मुताबिक शनिवार शाम नीतीश टी पार्टी पर राहुल गांधी से मिलेंगे और फिर हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सम्मान में आयोजित डिनर पार्टी में शिरकत करेंगे। इसके बाद 25 जुलाई को वे नव निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे। स्वाभाविक तौर पर कोविंद ने उन्हें खास तौर पर न्योता भेजा है।

बहरहाल, सियासी तौर पर नीतीश के इस दिल्ली दौरे को बेहद अहम माना जा रहा है। खास तौर पर राहुल से उनकी मुलाकात में कुछ नए समीकरण के सामने आने की संभावना है, क्योंकि नीतीश के सामने एक ओर भ्रष्टाचार को लेकर उनकी जीरो टॉलरेंस की नीति है तो दूसरी ओर 2019 की संभावनाओं के मद्देनज़र महागठबंधन को बचाने की चुनौती। ऐसे में कांग्रेस का रुख महत्वपूर्ण हो जाता है। गौरतलब है कि तेजस्वी प्रकरण पर मचे घमासान में कांग्रेस मध्यस्थ की भूमिका निभा रही है।

बता दें कि उधर तेजस्वी भी इन दिनों दिल्ली में हैं और 28 जुलाई से बिहार विधानमंडल का मानसून सत्र शुरू होने से पहले अपने ‘बचाव’ की तैयारी में जोरशोर से लगे हैं। बताया जाता है कि इस दौरान वकीलों से राय लेने के साथ-साथ मौजूदा स्थिति पर वे राहुल गांधी से भी ‘सलाह’ लेंगे।

कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति के लिए अगले कुछ दिन बेहद अहम हैं। देखें सियासत कब कौन सी करवट लेती है!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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