Sharad Yadav

क्या है शरद का सस्पेंस ?

शरद यादव का अगला कदम क्या होगा? वे अंतत: नीतीश के निर्णय का समर्थन करेंगे या अपनी अलग राह चुनेंगे? अलग राह चुनने की स्थिति में वे अपनी नई पार्टी बनाएंगे या किसी और पार्टी का दामन थाम लेंगे? देश और विशेषकर बिहार की राजनीति में उनके साथ या बगावत का क्या और कितना असर होगा? ऐसे जाने कितने ही सवाल हवा में हैं जिनका फिलहाल एक निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता।

बिहार का सत्ता समीकरण बदलने के बाद 2-3 दिनों तक शरद यादव ने चुप्पी साधे रखी। इस दौरान कभी राहुल गांधी तो कभी अरुण जेटली, कभी सीताराम येचुरी तो कभी डी राजा, कभी लालू प्रसाद यादव तो कभी अली अनवर से उनकी बात या मुलाकात की ख़बरें आती रहीं। इधर दो दिनों से वे मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं। तेवर हालांकि बगावती हैं, लेकिन अभी बोल रहे हैं संभलकर। संसद में फसल बीमा योजना को लेकर तो ट्वीटर पर कालाधन के मुद्दे पर उन्होंने केन्द्र सरकार की खिंचाई भी की लेकिन मर्यादित तरीके से।

आखिर शरद चाह क्या रहे हैं? मीडिया और उनसे जुड़े लोग उन्हें ‘दुखी’, ‘नाराज’, ‘आश्चर्यचकित’ बता रहे हैं, लेकिन उनका कोई स्पष्ट निर्णय या बयान सामने नहीं आ रहा। मधेपुरा, जहां पिछले 26 सालों से वे संसदीय राजनीति कर रहे हैं, में उनके करीबी विजय कुमार वर्मा, पूर्व विधानपार्षद बयान देते हैं कि शरद यादव महागठबंधन में रहकर उसे मजबूत करेंगे, तो दिल्ली में उनके अत्यंत करीबी केसी त्यागी, जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव 19 अगस्त को पटना में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनके शामिल होने की बात कह रहे हैं।

इधर मीडिया के कुछ लोग उनमें यूपीए की अगुआई करने और भाजपाविरोधी खेमे की ‘धुरी’ बनने की संभावना  देखने लगे हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है? दूसरी ओर बदले हालात में क्या नीतीश, जेडीयू और एनडीए के लिए उनकी इतनी ‘प्रासंगिकता’ बची है कि उन्हें केन्द्र में मंत्रीपद देकर ‘संतुष्ट’ किया जा सके? यहां उल्लेखनीय है कि 2019 को लेकर नीतीश ने कल कहा था कि मोदी के मुकाबले कोई है ही नहीं। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। इस पर शरद यादव ने आज यह तो कहा कि 2019 में किसी के हारने-जीतने का सवाल अभी दूर है, लेकिन नीतीश या मोदी को ‘आंख’ नही दिखाई।

सौ बात की एक बात यह कि राजनीति ‘गिव एंड टेक’ का खेल है। शरद यादव के अनुभव, वरिष्ठता और उनकी राष्ट्रीय पहचान पर उनके विरोधी को भी संदेह नहीं हो सकता लेकिन इससे भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि इतने लंबे राजनीतिक करियर में उनकी अपनी कोई ‘राजनीतिक जमीन’ नहीं बन पाई। मूल जनता दल से लेकर अब तक अलग-अलग समय पर और अलग-अलग पार्टियों में उनका ‘सांकेतिक’ महत्व जो भी रहा हो, उनमें वोट ट्रांसफर करने की क्षमता कतई नहीं। हां, ‘टेबल पॉलिटिक्स’ के महारथी वे जरूर हैं और मुद्दों की भी अच्छी समझ रखते हैं। अपनी इन खूबियों के बल पर अगले कुछ दिनों में वे क्या निर्णय लेते हैं, इस पर सबकी निगाहें लगी रहेंगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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