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एनडीए माइनस मांझी यानि महागठबंधन माइनस लालू यानि बिहार में मुकाबला चौतरफा

जी हाँ, ऊपर का समीकरण चौंकाने वाला जरूर है लेकिन एनडीए में पासवान और मांझी के बीच चल रही ‘दलितों का नेता कौन’ की लड़ाई और महागठबंधन में मुलायम के ‘आफ्टर इफेक्ट’ से ऐसा कुछ हो जाय तो आश्चर्य की बात नहीं। कल तक एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा दिखने वाले मुकाबले के अब चौतरफा होने के पूरे आसार हैं। चलिए समझने की कोशिश करते हैं कैसे।

शुरू करते हैं रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी की ‘लड़ाई’ से जिसमें संभावित चौतरफा मुकाबले के ‘बीज’ छिपे हैं। कल तक दलित नेता के तौर पर पासवान बिहार के इकलौते चेहरे थे। रमई राम, श्याम रजक टाईप लोगों का कद उनके सामने बहुत छोटा था। लेकिन इस बीच नीतीश कुमार ने मांझी को मुख्यमंत्री बनाने की ‘ऐतिहासिक भूल’ की और मांझी इस मौके को भुना ले गए। एक मुख्यमंत्री के तौर पर अपने संक्षिप्त कार्यकाल में मांझी ने महादलितों में इतनी पैठ तो बना ही ली कि पासवान को चुनौती दे दें। हुआ यों कि पासवान ने कह दिया कि एनडीए में मांझी ‘ट्रायल’ पर हैं। साथ में ये भी कि वे यानि पासवान राष्ट्रीय स्तर के एकमात्र दलित नेता हैं जबकि मांझी से लेकर मायावती तक राज्यस्तरीय नेता हैं। बस फिर क्या था मांझी ने तो उनके दलितों का नेता होने पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया। उनके हिसाब से पासवान केवल परिवार की राजनीति करते हैं, उन्होंने दलितों-पिछड़ों के लिए किया ही क्या है। मांझी टिकट बंटवारे में पासवान से ज्यादा नहीं तो बराबर का हिस्सा तो चाहते ही हैं।

इनके ‘मैं बड़ा तो मैं बड़ा’ की तनातनी में पसीने छूट रहे हैं भाजपा नेतृत्व के। पासवान फिलहाल ‘स्थिर’ हैं क्योंकि एक तो वो एनडीए में मांझी से पहले आए और उम्मीद से ज्यादा ‘पाए’ हैं, दूसरे उन्हें इतना  भरोसा है कि उनका सीट शेयर मांझी से ज्यादा जरूर होगा। हालांकि मांझी ये जताने से बिल्कुल नहीं चूक रहे कि पासवान के पास कोई विधायक नहीं है जबकि उनके साथ जेडीयू से आया धड़ा है। यही नहीं, गहरे जाकर देखें तो इस पेंच के भीतर एक पेंच और है। मांझी के साथ आए विधायकों में कुछ वैसे विधायक भी हैं जो 2005 में पासवान की पार्टी से जीते थे और बाद में नीतीश के पाले में चले गए थे। अब पासवान कह रहे हैं कि इन विधायकों को टिकट ना मिले जबकि मांझी उनके टिकट के लिए अड़े हुए हैं। परेशानी का एक सबब ये भी है कि पासवान और मांझी दोनों की निगाह ‘सुरक्षित’ सीटों पर है और यहाँ भी दोनों को संतुष्ट कर पाना एनडीए के लिए टेढ़ी खीर है। इस उठापटक को देख मांझी लालू के साथ भी अपनी सम्भावना पर ‘काम’ कर रहे हैं।

देखा जाय तो ये धुआँ बिना आग के नहीं है। लालू पहले भी मांझी को बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में महागठबंधन के साथ आने का निमंत्रण दे चुके हैं। लेकिन वास्तविकता ये है कि नीतीश के रहते ऐसा सम्भव नहीं। अब मुलायम के अलग होने के बाद महागठबंधन का भीतरी ‘असंतोष’ बाहर आने लगा है। सीटों को लेकर ‘तनाव’ वहाँ भी जबरदस्त है। ऐसे में मांझी नीतीश-लालू की दोस्ती टूटने और लालू के साथ अपना समीकरण जोड़ने का विकल्प क्यों ना देखें।

बहरहाल, बनते-बिगड़ते और बिगड़ने के बाद बनते समीकरणों को एक जगह करके देखें तो बिहार चुनाव में मुकाबला चौतरफा हो सकता है और ऐसे में वे चार कोण कुछ इस तरह होंगे – 1. भाजपा की अगुआई में रामविलास पासवान की लोजपा और उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा, 2. नीतीश की जेडीयू और कांग्रेस, 3. लालू की राजद और मांझी की पार्टी ‘हम’ तथा 4. सपा के साथ एनसीपी, वामदल और पप्पू की जनअधिकार पार्टी।

गौर से देखें तो ऐसा होने पर कमोबेश लाभ में भाजपा ही होगी क्योंकि उसे जो भी नुकसान होगा वो मांझी की अनुपस्थिति में महादलित वोटों का होगा लेकिन उधर भाजपा विरोधी मत तीन अलग-अलग दिशाओं में बंट जाएंगे। इतना होने के बाद भी ये तय जान पड़ता है कि जो मुकाबला चुनाव से पहले दोतरफा नहीं हो सकेगा वो चुनाव के बाद घूम-फिरकर दोतरफा हो ही जाएगा क्योंकि 122 के जादुई आंकड़े तक पहुँचने के लिए इन चार कोणों में दो कोणों को और उन्हें रोकने के लिए शेष दो कोणों को एक होना ही होगा। जय हो राजनीति..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘साइकिल’ ढोएगी ‘कमल’, ‘किराया’ होगा डबल..!

राजनीति के रंग भी कितने निराले हैं..! महागठबंधन से अलग होना एक बात थी, अब तो मुलायम बोलने भी लगे हैं बीजेपी की तरह। कल तक महागठबंधन के मुखिया कहलाने वाले ‘मुलायम’ की इतनी ‘कठोर’ करवट ने एक बार फिर ये बता दिया कि राजनीति की ‘माया’ से बड़े-से-बड़े ‘संत’ भी डोल जाते हैं। इस समाजवादी ‘संत’ के यू टर्न से ऐसा ही हुआ जान पड़ता है।

कल तक बीजेपी को रोकने के लिए जनता परिवार की एकता को वक्त की मांग बताने वाले मुलायम आज नीतीश की ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर सवाल उठा रहे हैं। आज उन्हें ये कहने में जरा भी हिचक नहीं कि सालों तक बीजेपी के साथ सरकार चलाने वाले नीतीश काहे के सेक्युलर। नीतीश क्या हैं और क्या नहीं, इस पर हमारी कोई टिप्पणी नहीं, लेकिन नेताजी से ये ‘अलौकिक’ सच पहले छिपा क्यों था..?

सपा के उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद किरणमय नंदा के अनुसार महागठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने के कारण सपा ने अलग होने का फैसला किया। वो कहते हैं कि सपा प्रमुख ने बीजेपी को रोकने के लिए ‘केवल’ जनता परिवार के विलय की बात की थी और साथ में ये भी कि अब सपा अकेले दम रोकेगी बीजेपी को। यहाँ तक कि रोकने की लिस्ट में अब नीतीश और ‘समधी’ लालू का का नाम भी जुड़ गया है। ये जानते हुए भी कि बीजेपी को रोकने के लिए महागठबंधन में कांग्रेस का होना निहायत जरूरी था और ये भी कि सपा की अपनी कोई हैसियत नहीं है बिहार में, बचकानी बयानबाजी की जा रही है।

और तो और, सपा ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है जबकि उसे पता है कि कहीं कुछ सौ तो कहीं कुछ हजार, वोट काटने के अलावा उसकी कोई भूमिका नहीं होने जा रही है इस चुनाव में। जिस भाजपा को तथाकथित तौर पर रोकने के लिए सपा ऐसा करने जा रही है, उसका एक भी वोट काटने की स्थिति में नहीं है  वो। सपा जो भी नुकसान करेगी, महागठबंधन का करेगी।

खैर, अब ये ‘ओपेन सीक्रेट’ है कि ये सारे गुल मोदी-मुलायम और शाह-रामगोपाल की मुलाकात के बाद खिल रहे हैं और ‘साइकिल’ से ‘कमल’ को ढोने का ‘किराया’ भी तय हुआ है..!

पुनश्च:

सभी 243 सीटों पर लड़ने की घोषणा के दौरान सपा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व विधायक रामचंद्र सिंह यादव ने एक बात बड़े मजे की कही कि बिहार में एक ओर ‘सम्प्रदायवाद’ है और दूसरी ओर ‘धोखावाद’। पार्टी ने इन दोनों से मुकाबले का निर्णय ले लिया है। अब उनसे कौन पूछे कि महागठबंधन से अलग होकर और भाजपा का पथ ‘प्रशस्त’ कर कौन-सा नया ‘वाद’ पैदा कर दिया उनकी पार्टी ने..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जीतना है बिहार, भाजपा ‘यादव’ की ताजपोशी को तैयार..!

दिल्ली से सबक लेकर भाजपा बिहार में केवल नरेन्द्र मोदी का चेहरा आगे कर चुनाव की तैयारी में जुटी थी। एक ‘अनार’ के लिए भाजपा में इतने बीमार हैं कि पार्टी के लिए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सचमुच मुश्किल था। उधर इस मामले को महागठबंधन ने समय रहते समझदारी से सुलझा लिया। वहाँ नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य चेहरा था भी। आज जबकि बाकी समीकरण कमोबेश भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं, केवल यही उसके लिए कमजोर नस साबित हो रहा है। महागठबंधन के नेता हुंकार रहे हैं कि दम है तो भाजपा किसी को आगे करे क्योंकि उन्हें पता है कि भाजपा के लिए ऐसा करना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा होगा। भाजपा ने जरा भी चूक की नहीं कि डर है कि कहीं ‘दिल्ली’ ना दुहरा जाय।

प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में ताबड़तोड़ रैलियां कीं, दोनों हाथों से पैकेज लुटाया, बाकी नेताओं ने भी दिल्ली-पटना एक कर दिया लेकिन इसी एक ‘कमजोरी’ से भाजपा बैकफुट पर चली जाती है। इसका एक नजारा भागलपुर में दिखा जब मोदी की चौथी परिवर्तन रैली में उनके बाद की सारी तालियां जीतन राम मांझी बटोर ले गए। तब उन्होंने जरूर इस बात को शिद्दत से महसूस किया होगा कि इसका कारण भाजपा के पास बिहार में किसी एक ‘चेहरे’ का ना होना है।

बहरहाल, मोदी और उनके रणनीतिकार लगता है इसका तोड़ निकालने के बहुत करीब पहुँच चुके हैं। भाजपा की कोशिश यहाँ एक तीर से दो निशाना साधने की है। पार्टी चाहती है कि ‘चेहरा’ ऐसा हो कि भाजपा का वोटबैंक बिखरे नहीं और महागठबंधन के वोटबैंक में सेंध लग जाय सो अलग।

चुनाव के लिहाज से बिहार के जातिगत समीकरणों को देखते हुए भाजपा की मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे की तलाश किसी ‘यादव’ पर जाकर खत्म होती दिखती है। इसका सबसे बड़ा कारण है लालू का ‘माय’ समीकरण। नीतीश के वोटबैंक का तोड़ उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी के रूप में भाजपा के पास है। मुस्लिम का वोट उसे मिलना नहीं है। रह गए यादव जिनकी तादाद बिहार में 14 प्रतिशत है और जो तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद बहुतायत में लालू के पीछे लामबंद हैं इस बार। इस बड़े वोटबैंक में सेंध लगाए बिना भाजपा आश्वस्त नहीं हो सकती है।

हालांकि भाजपा ने यादवों को तोड़ने की तैयारी पहले ही शुरू कर दी थी। धर्मेन्द्र प्रधान की जगह भूपेन्द्र यादव को बिहार का प्रभारी बनाना, लालू के ‘हनुमान’ रामकृपाल को मंत्रीमंडल में लेना और स्वयं मोदी का बिहार आकर गुजरात का संबंध ‘यदुवंश’ से जोड़ना इसके उदाहरण हैं। पप्पू की पीठ पर हाथ रखना भी भाजपा की इसी कोशिश का हिस्सा है। इतना सब कुछ कर लेने के बाद शायद अब भाजपा आखिरी बचा ‘ब्रह्मास्त्र’ भी छोड़ देने का मन बना रही है। जी हाँ, चौंकिए नहीं। बहुत सम्भव है कि पार्टी किसी ‘यादव’ को अपना ‘चेहरा’ बनाकर पेश करे।

वैसे अगर जातिगत समीकरणों को किनारे कर दें तो सुशील कुमार मोदी शायद मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी की पहली और स्वाभाविक पसंद होते। केन्द्र में पैठ रखनेवाले रविशंकर प्रसाद, शालीनता से समीकरण बिठानेवाले राधामोहन सिंह, तेजतर्रार महासचिव राजीवप्रताप रूडी, बिहार में पार्टी के मुस्लिम चेहरे शाहनवाज हुसैन और बिहार भाजपा के अध्यक्ष मंगल पांडेय का भी अपने-अपने हिसाब से दावा है। रेस में सीपी ठाकुर, अश्विनी चौबे, गिरिराज सिंह और प्रेम कुमार भी हैं लेकिन बहुत पीछे।

यादव चेहरे की बात आती है तो सामने सबसे पहले नंदकिशोर यादव दिखते हैं जो सदन में भाजपा के नेता हैं। पूर्व में मंत्री, नेता विरोधी दल और बिहार में पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी वरिष्ठता पर कोई संदेह नहीं लेकिन सुशील कुमार मोदी खेमे को वो शायद ही रास आएं। दूसरा नाम रामकृपाल यादव का है। लेकिन पार्टी में पैर रखते ही सीधा केन्द्र में उनके मंत्री बन जाने को ही कई लोग पचा नहीं पाए हैं। ऐसे में उनके विरोध में सभी ‘खांटी’ भाजपाई एकजुट हो जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए भाजपा ऐसे चेहरे को लाना चाहेगी जो किसी ‘खास’ खेमे का ना हो, पार्टी में पुराना हो, छवि अच्छी हो, ‘केन्द्र’ के निर्देश पर काम करे, ज्यादा महत्वाकांक्षी ना हो और यादव तो हो ही। ऐसा एक नाम हुकुमदेव नारायण यादव का हो सकता है जो अभी मधुबनी से सांसद हैं और केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं।

बहरहाल, भाजपा किस चेहरे को आगे करती है, ये कहना  भले ही मुश्किल हो, ताजपोशी किसी ‘यादव’ की होगी इसकी सम्भावना प्रबल है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तो क्या मुलायम करेंगे बिहार में ‘थर्ड फ्रंट’ की अगुआई..!

‘जनता परिवार’ एक बार फिर बनते-बनते टूट गया। इस बार तो इसके मुखिया ही नाता तोड़ गए। एनसीपी के बाद सपा भी ‘महागठबंधन’ में ‘अपमान’ नहीं सह पाई और कल इसके महासचिव रामगोपाल यादव ने बिहार में अकेले दम चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। आज के हालात में जो सपा अपने बूते बिहार में शायद एक भी सीट ना जीत पाए उसमें अचानक इतना ‘आत्मसम्मान’ जागा तो कैसे..? क्या पिछले दिनों की मुलाकात में प्रधानमंत्री मोदी ने मुलायम से महागठबंधन को लेकर ज्यादा ‘मुलायम’ ना होने का मंत्र दिया..? या फिर भाजपा की यूपी विजय के रणनीतिकार अमित शाह से मिलकर रामगोपाल यादव ने ‘बिहार विजय’ का कोई फार्मूला पा लिया..?

जो भी हो, अब बिहार के ‘महागठबंधन’ में जदयू, राजद और कांग्रेस का ही ‘बंधन’ शेष बचा है। वामदल पहले ही अलग-थलग हैं। तो क्या अब मुलायम बिहार में किसी ‘थर्ड फ्रंट’ की सम्भावना पर काम कर रहे हैं..? देखा जाय तो सैद्धांतिक तौर पर सपा, एनसीपी और वामदलों का कोई खास मतभेद भी नहीं है और इन बेसहारों को किसी ‘सहारे’ की सख्त़ जरूरत भी है। ऐसे में ये तीनों मिलकर चुनाव लड़ें तो कोई आश्चर्य की बात भी नहीं होनी चाहिए। और तो और पप्पू यादव की जनअधिकार पार्टी भी देर-सबेर इस संभावित फ्रंट का हिस्सा हो सकती है। मुलायम और उनकी पार्टी से पप्पू का पुराना ‘प्रेम’ रहा है और ‘जरूरत’ में प्रेम जगने-जगाने का उनका पुराना इतिहास भी है।

बहरहाल, इन सारे प्रकरणों से अभी मजे में कोई पार्टी है तो वो है भाजपा। सपा, एनसीपी, वामदल या पप्पू की जनअधिकार पार्टी – ये सभी अकेले-अकेले लड़ें तो और मिल जायें तो – सेंधमारी हर हाल में महागठबंधन के वोट बैंक में ही करेंगे। फायदा हर हाल में भाजपा को ही होता दिख रहा है। इधर ओवैसी ने भी बिहार में चहलकदमी शुरू कर दी है और उनकी सक्रियता से भी भाजपा की ही सेहत सुधरेगी।

हालांकि, सपा की घोषणा के बाद शरद यादव मुलायम से मिल आए हैं और लालू भी अपने रूठे समधी को मना लेने का दावा कर रहे हैं, लेकिन ये इतना आसान नहीं। रिश्तेदारी एक चीज है और राजनीति दूसरी। राजनीति में रिश्ते ‘अचानक’ बनते हैं और उससे भी ज्यादा ‘अचानक’ टूट जाते हैं। इस ‘अचानक’ की व्याख्या आज तक नहीं की जा सकी है और तब तो हरगिज नहीं की जा सकती जब ‘रिश्तों’ का ताना-बाना सत्ता के सबसे ‘ऊँचे’ शिखर से बुना जा रहा हो।

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार के चुनावी अखाड़े में ‘असली-नकली’ का खेल

सूरज नहीं बोलता, मैं रोशनी देता हूँ… नदियां नहीं बतातीं, मैं प्यास बुझाती हूँ… फूल नहीं बोलते, मेरा रंग देखो। जो है, उसे बोलना क्या..! लेकिन ये युग ‘विज्ञापन’ का है। हालात कुछ ऐसे होते जा रहे हैं कि कल को शायद इन्हें भी अपना ‘होना’ बताना पड़े..! नहीं तो कल को रोशनी, पानी और रंग पर भी कोई मल्टीनेशनल कम्पनी ‘कॉपीराइट’ का दावा ठोक दे और सूरज, नदियां और फूल नकली ठहरा दिये जायं तो कोई अचरज नहीं। जो खुद को पूरा दम लगाकर असली और सामने वाले को सारी हदें तोड़कर नकली बता दे वही आज के ‘बाजार’ में टिक सकता है।

जब बात असली-नकली की निकली है तो वो राजनीति तलक तो जाएगी ही। असली-नकली के द्वंद्व-युद्ध का राजनीति से बड़ा ‘अखाड़ा’ है भी तो नहीं। चलिए ले चलें आपको बिहार जहाँ असली-नकली की बड़ी दिलचस्प लड़ाई छिड़ी है, वो भी एक नहीं दो-दो। पहली लड़ाई है पैकेज को लेकर। “उसका पैकेज, मेरे पैकेज से बड़ा कैसे” के बाद अब लड़ाई छिड़ गई है “मेरा पैकेज असली, तेरा पैकेज नकली” का। दरअसल बिहार के विकास के नाम पर लड़ी जा रही ये लड़ाई मोदी और नीतीश की लड़ाई है और सवालों के घेरे में दोनों ही हैं। पहला सवाल मोदी से कि उन्होंने एक करोड़ पैंसठ लाख के पैकेज की घोषणा के लिए ऐन चुनाव का ही मौका क्यों चुना जबकि बिहार के लिए ‘विशेष’ की मांग बहुत दिनों से की जा रही थी..? दूसरा सवाल नीतीश से कि जब मोदी ने पैकेज की घोषणा कर दी तभी उन्हें विकसित बिहार के लिए दो लाख सत्तर हजार करोड़ का ‘विज़न’ कैसे मिला..? तीसरा सवाल फिर मोदी से कि जब उन्होंने 18 अगस्त को एक बड़े पैकेज की घोषणा कर ही दी थी तो महज दो सप्ताह बाद यानि 1 सितम्बर को तीन लाख चौहत्तर हजार करोड़ और देने की जरूरत क्यों पड़ गई..? चौथा सवाल दोनों से कि इतने पैसे आएंगे कहाँ से और अगर आने का ‘मार्ग’ था तो पहले ‘रुकावट’ क्या थी..? बहरहाल, वादे के मामले में दोनों में से कोई पूरे अंक पाने की स्थिति में नहीं हैं। लोकसभा चुनाव के पहले मोदी ने विदेशों में जमा काला धन लाने और हर हिन्दुस्तानी के खाते में 15 लाख आने की बात कही थी लेकिन हुआ क्या..? दूसरी ओर नीतीश ने कहा था कि अगर घर-घर बिजली नहीं पहुँची तो वोट मांगने नहीं जाएंगे लेकिन वे धड़ल्ले से ‘हर घर दस्तक’ दे रहे हैं। ऐसे में किसका पैकेज असली है और किसका नकली, ये कौन तय करे और कैसे तय करे..!

असली-नकली की दूसरी लड़ाई है “मेरा गठबंधन असली, तेरा गठबंधन नकली” को लेकर। ‘महागठबंधन’ से पहले एनसीपी दूर हुई और आज सपा ने अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। लालू अपने ‘समधी’ को समझाने में सफल ना हो सके। एनडीए को मुँह चिढाने का मौका मिल गया। लेकिन खुद शीशे के घर में रहनेवाले दूसरे पर पत्थऱ उछालें भी तो कैसे। पासवान, कुशवाहा और मांझी घोषित तौर पर तो पप्पू अघोषित तौर पर सीटों के लिए ताल ठोक रहे हैं। ये सब जितनी सीटें मांग रहे हैं उनको मिला दें तो खुद भाजपा को घर बैठना पड़ जाएगा। उधर लालू-नीतीश और कांग्रेस ने आपस में सीटों की संख्या तय तो कर लीं लेकिन कौन किस सीट पर लड़े इस पर पेंच फंसा का फंसा है। समय और स्वार्थ की आग में कौन गठबंधन ‘सोना’ बनकर निकलेगा और वो सोना कितना खरा होगा ये तो आनेवाला वक्त ही बताएगा।

सच तो ये है कि आज असली और नकली की बात ही बेमानी है। जिसके हाथ में ‘लाठी’ उसकी ‘भैंस’ असली और दूसरे की क्या, आप अच्छी तरह जानते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कहीं फेल ना हो जाय बिहार का ‘केलकुलेटर’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार में एक बार फिर एक बड़ी रैली की। 1 सितम्बर को भागलपुर में हुई ये रैली मुजफ्फरपुर, गया और सहरसा के बाद उनकी चौथी और शायद सबसे बड़ी ‘परिवर्तन’ रैली थी। जैसा कि अपेक्षित था उन्होंने तकरीबन उन सभी सवालों के जवाब दिए जो 30 अगस्त की ‘स्वाभिमान’ रैली में ‘महागठबंधन’ के नेताओं ने उन पर उठाए या ‘उछाले’ थे।

अब राजनीतिक मंचों से… चाहे वो किसी भी पार्टी के क्यों ना हों… बिहार में हों या बिहार से बाहर… कमोबेश एक तरह के ‘बयान’ सामने आते हैं। ‘संदर्भ’ और ‘सवाल’ बदल जाते हैं, ‘साधन’ और ‘साध्य’ हमेशा वही रहते हैं। यही कारण है कि इन मंचों का माहौल और बयानों की ‘तल्ख़ी’ भी कमोबेश एक जैसी रहती है। लेकिन बिहार में राजनीतिक दलों की लड़ाई ने नया रूप ले लिया है। अब हमले केवल बयानों से नहीं ‘पैकेज’ से भी किये जा रहे हैं। अभी मोदीजी के दिए एक लाख पैंसठ हजार करोड़ के ‘उपहार’ की खुशी बिहार मना ही रहा था कि नीतीशजी ने दो लाख सत्तर हजार करोड़ ‘न्योछावर’ कर दिए। जो बिहार ने सोचा ना था वो मिल गया उसे। बेचारा अभी दोनों पैकेज का ‘जोड़’ ही निकाल रहा था कि मोदीजी ने भागलपुर में तीन लाख चौहत्तर हजार करोड़ और ‘कूट’ दिए। अब तो डर है कि कहीं फेल ना हो जाय बिहार का ‘केलकुलेटर’।

बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने भागलपुर में फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए घोषणा की कि अगले पाँच वर्षों में बिहार को दिल्ली से तीन लाख चौहत्तर हजार करोड़ और मिलेंगे। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि ये पैकेज पहले घोषित एक लाख पैंसठ हजार करोड़ के अतिरिक्त है।

मोदी ने नीतीश के पैकेज पर पैकेज से ‘हमला’ ही नहीं किया, बाकी मुद्दों पर भी जमकर बोले। स्वाभिमान रैली में नीतीश और लालू के सोनिया संग एक मंच पर आने को उन्होंने जेपी, लोहिया और कर्पूरी ठाकुर को ‘तिलांजलि’ देना बताया। विकास के मुद्दे पर उन्होंने इनके शासन के 25 सालों पर सवाल उठाए तथा जाति और सम्प्रदाय की राजनीति करने का आरोप लगाया। डीएनए वाले मुद्दे पर सफाई देने से वे नहीं चूके और बिहार के लोगों को ‘धरती पर सबसे बुद्धिमान’ बताया।

मोदी की भागलपुर रैली में भाजपा की उम्मीद से ज्यादा लोग जुटे। ये अब तक की सबसे बड़ी ‘परिवर्तन’ रैली कही जा रही है। स्वयं मोदी ने भी मंच से ये स्वीकार किया। मोदी के साथ बिहार भाजपा के तमाम दिग्गज और सहयोगी दलों के सभी नेता मौजूद थे। एक बात का उल्लेख विशेष तौर पर करना होगा कि प्रधानमंत्री मोदी के बाद सबसे अधिक जिन्दाबाद के नारे जीतनराम मांझी के भाषण के दौरान लगे। दलित व महादलित समुदाय के ‘वोट बैंक’ के मद्देनजर एनडीए के लिए ये अच्छी खबर है लेकिन इससे बिहार भाजपा की ‘कमजोरी’ एक बार फिर उजागर हुई कि यहाँ उसका कोई ‘प्रतिनिधि’ चेहरा नहीं है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जवाब दीजिए मोदीजी..! जिन्हें भैंस नहीं पटक सकी उन्हें क्या आप पटकेंगे..?

‘महागठबंधन’ ने आज पटना के गांधी मैदान में स्वाभिमान रैली की। इस रैली में जुटी भीड़ ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार में मुकाबला कांटे का है। मुजफ्फरपुर, गया और सहरसा में प्रधाममंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगातार तीन बड़ी रैलियां कीं और चौथी रैली 1 सितम्बर को भागलपुर में होने जा रही है। ऐसे में महागठबंधन के लिए इन रैलियों का जवाब देना और अपनी ताकत दिखाना ‘निहायत’ जरूरी हो गया था। तमाम अन्तर्विरोधों के बावजूद इस रैली में जदयू, राजद, कांग्रेस और सपा का एक मंच पर इकट्ठा होना महागठबंधन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। इससे पहले महागठबंधन की मौजूदगी बयानों और मीडिया में थी आज वो जमीन और मंच पर दिखी। महागठबंधन के सभी नेता अपने-अपने ‘अभिमान’ को किनारे रख स्वाभिमान रैली में जुटे और ‘महागठबंधन’ ने वास्तविक आकार लिया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस रैली का सबसे बड़ा आकर्षण लालू और नीतीश का एक बार फिर एक साथ खड़ा होना था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनके साथ मंच साझा कर इस अवसर को और खास बना दिया। मंच पर समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व शिवपाल सिंह यादव ने किया। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी (मीसा, तेजप्रताप और तेजस्वी के साथ), पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, सीपी जोशी तथा शकील अहमद, वरिष्ठ राजद नेता व पूर्व केन्द्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह, जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह, राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचन्द्र पूर्वे तथा विधायक दल के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी तथा विधायक दल के नेता सदानंद सिंह सहित महागठबंधन के तमाम नेताओं ने रैली में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

सोनिया गांधी ने जहाँ ये कहा कि बिहार में “नीतीशजी के नेतृत्व में अच्छा काम हुआ है”, वहीं ये कहना भी नहीं भूलीं कि “लालूजी का भी इसमें सराहनीय योगदान रहा है।“ नीतीश ने डीएनए के मुद्दे पर मोदी को घेरने की हर सम्भव कोशिश की और कहा – “बिहार का इतिहास केवल देश का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता का इतिहास है और हमारा डीएनए खराब है..?” मोदी के दिए पैकेज को उन्होंने “पुराने पैकेज की रिपैकेजिंग” बताया  और ‘जंगलराज’ का जवाब देते हुए कहा कि “भाजपा के दफ्तर से मुख्यंमंत्री की छाती तोड़ने की धमकी दी जाती है और लालू जी का नाम लेकर आप जंगलराज की बात करते हैं। बिहार में जंगलराज नहीं कानून का राज है।“ ‘जंगलराज’ पर लालू से पहले नीतीश का जवाब देना बदले हालात में बदलती राजनीति की बड़ी बानगी है। शरद यादव ने कहा कि “देश को बदलने का काम बिहार से शुरू होता है और इस बार भी ये काम बिहार से ही होगा।“

रैली के अन्तिम वक्ता लालू प्रसाद यादव थे। भाषण के लिए उनके आने पर और पूरे भाषण के दौरान लोगों में जो उमंग और उत्साह था उसने बता दिया कि बिहार में उनका जादू आज भी बरकरार है। उन्होंने अपने अंदाज में कहा – “दो पिछड़ों का बेटा साथ आया तो कहते हैं जंगलराज आ गया..! ये जंगलराज पार्ट – 2 नहीं, मंडलराज पार्ट – 2 है।“ यादव  वोट बैंक को अपना बताने से भी वे नहीं चूके और अपनी रौ में कह डाला – “यादवों को जब भैंस नहीं पटक सकी तो नरेन्द्र मोदी क्या पटकेंगे..!“

इस रैली से बिहार का ‘स्वाभिमान’ जितना भी जुड़ा हो महागठबंधन का अस्तित्व और भविष्य बेशक जुड़ा था। लालू और नीतीश के साथ-साथ कांग्रेस को भी इसका एहसास था। ये तीनों अपने-अपने तरीके से अपनी-अपनी ‘साख’ बचाना चाहते थे। कहना पड़ेगा कि इस रैली के बाद इन सबने राहत की सांस ली होगी। अब बारी भाजपा की है। आज महागठबंधन के सारे नेताओं ने जी भर कर नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा है। देखना है कि भागलपुर में भाजपा हिसाब कितना चुकता कर पाती है।

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘नीतीश निश्चय’ यानि बिहार की ‘बोली’ बढ़कर दो लाख सत्तर हजार करोड़..!

18 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आरा में ‘बिहार पैकेज’ की घोषणा की। चुनावी ‘सावन’ में एक लाख पैंसठ हजार करोड़ बरसे बिहार पर। अभी ‘सावन’ बीतने ही वाला था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘निश्चय’ कर दो लाख सत्तर हजार करोड़ और बरसा दिये बिहार पर। इस खासमखास ‘सावन’ को शायद ही भूले बिहार। जब मोदी का पैकेज आया तो कहा गया ‘चुनावी रिश्वत’ है… ‘जुमला बाबू’ बहुत बड़ा ‘झांसा’ दे रहे हैं… बिहार की बोली लगाई जा रही है और ना जाने क्या-क्या। अब जो नीतीश ने दो लाख सत्तर हजार करोड़ की ‘बरसात’ की है, उसे क्या कहेंगे – ‘रिश्वत’, ‘झांसा’ या ‘बोली’..? सौ बात की एक बात ये है कि कुछ भी कह लें मोदी और कुछ भी दे दें नीतीश, जनता जानती है कि लक्ष्य दोनों का एक है। ये दोनों जो भी दे रहे हों, जिस भी तरह दे रहे हों, बदले में लेना उन्हें एक ही चीज है और वो है आनेवाले चुनाव में जीत का आंकड़ा। बहरहाल, हम किसी भी तरह जोड़, घटाव, गुणा या भाग करके देख लें, कम हो या ज्यादा बिहार का भला तो तय है। अब इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन दे रहा है और क्यों दे रहा है। महत्वपूर्ण ये है कि मिल बिहार को रहा है।

बहरहाल, 28 अगस्त को नीतीश कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस करके ‘व्यक्तिगत चिन्तन’ के आधार पर बिहार के लिए दो लाख सत्तर हजार करोड़ की भविष्य की योजना का प्रारूप सामने रखा। इस विज़न डॉक्यूमेंट को नाम दिया गया है – “नीतीश निश्चय : विकास की गारंटी, विकसित बिहार के सात सूत्र”। ये सात सूत्र हैं – 1. महिलाओं को सरकारी नौकरी में 35% आरक्षण, 2. युवाओं के लिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड, 3. स्वयं सहायता भत्ता जिसके तहत युवाओं को एक साल के नौ महीने के लिए एक-एक हजार रुपये दिये जाएंगे जिसका उपयोग वे फॉर्म भरने, इंटरव्यू के लिए जाने आदि में कर सकते हैं, 4. विश्वविद्यालय तथा कॉलेजों में मुफ्त वाई-फाई की सुविधा, 5. हर घर तक स्वच्छ जल की आपूर्ति, 6. हर गांव को पक्की सड़क और 7. 2016 के बाद पाँच साल में हर घर को मुफ्त बिजली कनेक्शन।

बकौल नीतीश ये पैकेज नहीं कमिटमेंट है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे ना तो सीएम और ना ही जदयू के नेता के रूप में कोई घोषणा कर रहे हैं। उऩ्हें व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि अगले पाँच साल में यही काम होने चाहिएं। अगर उन्हें फिर से मौका मिला तो वे इन योजनाओं को अमलीजामा पहनाएंगे। साथ ही पुरानी योजनाओं को भी अपडेट करेंगे। हालांकि वे यह नहीं बता पाए कि इतने पैसे कहाँ से आएंगे।

एक तरीके से नीतीश ने अपना ‘घोषणापत्र’ जारी कर दिया। अच्छी बात है कि इस मामले में वे औरों से आगे निकल गए। लेकिन इस ‘हड़बड़ाहट’ में वे लालू को ‘भूल’ गए। उन्हें ये पता होना चाहिए कि ‘महागठबंधन’ में मिली सौ की सौ सीटें भी वे जीत जाएं तो भी बगैर लालू के उनका ‘विज़न’ जमीन पर नहीं उतर सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्यों खड़े हैं दो छोड़ पर जदयू के दो शीर्ष नेता..?

हार्दिक पटेल… महज 22 साल का यह युवक गुजरात समेत पूरे देश के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। गुजराती समाज और राजनीति में खासा महत्व रखने वाला पटेल समुदाय आज इस युवक के पीछे खड़ा है। पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग कर रहे इस युवक ने 25 अगस्त को जबरदस्त रैली कर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तमाम सुर्खियां अपने नाम कर ली हैं। गुजरात सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक की नींद उड़ गई दिखती है। चंद दिनों में इस शख्स़ ने हैरत में डाल देनेवाली चर्चा हासिल की है… जैसे रातोंरात चमत्कार हो गया हो कोई। हार्दिक के आन्दोलन का असर इतना व्यापक और गहरा है कि भारतीय राजनीति के तमाम दिग्गज विवश हैं अपनी राय देने को। आज या तो पटेल समुदाय को आरक्षण का समर्थन किया जा सकता है या फिर विरोध… तटस्थ रहने के सारे मार्ग इस युवक ने बंद कर दिये हों जैसे।

हालात ऐसे हैं कि इस मुद्दे पर अब एक दल में भी दो तरह की राय दिखने लगी है। जी हाँ, लगता है कि हार्दिक पटेल ने बिहार की राजनीति में भी हाहाकार मचाने की ठान ली है..! कारण ये कि पटेल समुदाय को आरक्षण देने के मुद्दे पर जदयू के दो शीर्ष नेता शरद यादव और नीतीश कुमार की राय एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जहाँ हार्दिक पटेल के आन्दोलन का समर्थन किया है वहीं दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव पटेल समुदाय के आरक्षण के पक्ष में नहीं हैं। नीतीश एक ओर हार्दिक पटेल को महाक्रांति रैली के लिए बधाई देते हुए उनकी मांग को जायज बताते हैं और तर्क देते हैं कि दूसरे राज्यों में पटेल समुदाय के समकक्ष समुदायों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है। वहीं शरद की राय में पटेल समुदाय सक्षम और सम्पन्न है तथा उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं है। जब उनसे कहा गया कि नीतीश इस आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि नीतीश की बात नीतीश जानें। 26 अगस्त को मधेपुरा में प्रेस से बात करते हुए उन्होंने दो टूक अपनी बात कही। उनके अनुसार हार्दिक के नेतृत्व में हंगामा कर यह समुदाय अपनी बात मनवाना चाहता है जो सही नहीं है।

भले ही इस मुद्दे का बिहार की राजनीति से सीधे तौर पर कोई लेना-देना ना हो, भले ही ये महज शरद और नीतीश का सैद्धांतिक मतभेद भर हो लेकिन बिहार के आसन्न चुनाव को देखते हुए जदयू के इन दो शीर्ष नेताओं का इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर एकदम दो छोर पर खड़ा होना हल्के में लेने वाली बात नहीं है। खास तौर पर तब तो हर्गिज नहीं जब हार्दिक गुजरात में खड़े होकर पटेल समुदाय की मौजूदगी पूरे देश में बता रहे हों और यह विशेष तौर पर चिह्नित कर रहे हों कि बिहार में नीतीश कुमार हमारे हैं ।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बदहाल लिफ्ट पर बदतर राजनीति

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष… जेड श्रेणी की सुरक्षा… राजधानी पटना के स्टेट गेस्ट हाउस जैसा स्थान… फिर भी लिफ्ट खराब… और उसमें फंस जाते हैं अमित शाह..! चलिए मान लिया कि मशीन है, कभी भी खराब हो सकती है, तो क्या फंसे हुए व्यक्ति को निकालने में 40 मिनट लग जाएंगे..? और तो और, क्या इतने हाई प्रोफाइल व्यक्ति के फंसने की जानकारी भी तब होगी जब वो स्वयं अपने फंसने की सूचना देंगे..? इतनी महत्वपूर्ण जगह पर एक लिफ्टमैन तक नहीं होगा..? सचमुच बहुत शर्मनाक, बहुत चिन्ताजनक और बहुत हैरतअंगेज बात है ये..!

जी हाँ, शर्म, चिन्ता और हैरत होती है ऐसे पद और कद के व्यक्ति की लचर सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर, बिहार के सरकारी तंत्र में व्याप्त अव्यवस्था को लेकर और सबसे अधिक नेताओं के खत्म हो चुके विवेक और शिष्टाचार को लेकर..! चलिए बताते हैं कैसे..!

ये घटना 20 अगस्त की रात की है। अमित शाह पटना में थे और एक समाचारपत्र के कार्यक्रम में भाग लेकर स्टेट गेस्ट हाउस आए थे। वहीं रात के करीब 11.30 बजे पहले तल पर जाते हुए वे लिफ्ट में फंस गए। उस वक्त उनके साथ बिहार भाजपा प्रभारी भूपेन्द्र यादव समेत कुल छह लोग थे। लिफ्ट में वे पूरे चालीस मिनट तक फंसे रहे। इस बीच अफरा-तफरी मची रही और अन्त में भाजपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें लिफ्ट तोड़कर बाहर निकाला।

लेकिन जनाब यहीं बस नहीं हुआ। इसके बाद इस घटना पर नेताओं के बयान आने शुरू हुए। जेडीयू के प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा कि लिफ्ट को पता नहीं था कि उसमें अमित शाह चढ़े हैं, वरना वो ऐसा नहीं करती। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने तो हद ही कर दी। उन्होंने बिहार में लिफ्ट छोटे होने की बात की और कह दिया कि इतने मोटे शख्स को लिफ्ट में चढ़ना ही नहीं चाहिए। दूसरी ओर भाजपा इस घटना को राज्य सरकार की साजिश बता रही है।

पहली बात तो ये कि शायद ही कोई सरकार इस हद तक गिरकर कोई साजिश करेगी। भाजपा की इस प्रतिक्रिया में भी राजनीति है लेकिन वो उतनी चिन्ता की बात नहीं जितनी जेडीयू और राजद का इस घटना का मखौल उड़ाना। दोनों पार्टियों की ओर से इस तरह का बयान आना उनकी संवेदनशून्यता का परिचायक है। क्या अब राजनीति के पीछे सामान्य शिष्टाचार की भी बलि चढ़ा दी जाएगी..! राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा में क्या विवेक को भी पैरों तले रौंद दिया जाएगा..!

जेडीयू अभी सरकार में है। सरकारी भवन की अव्यव्स्था के लिए पार्टी को शर्मिन्दा होना चाहिए था और व्यंग्य करने की जगह खेद व्यक्त करऩा चाहिए था। लालू प्रसाद आज बिहार में लिफ्ट छोटे होने की बात कह रहे हैं तो उन्हें ये भी कहना चाहिए था कि पन्द्रह साल सरकार में रहते उन्होंने लिफ्ट को बड़ा करने के लिए क्या किया। ये नहीं कहते तो ना सही उन्हें किसी के मोटे या पतले होने पर मजाक उड़ाने का हक तो कम-से-कम नहीं ही था।

राजनीति अपनी जगह है और शिष्टाचार अपनी जगह। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप होते हैं, होने ही चाहिएं। सहमति-असहमति होती है, होनी ही चाहिए। सब कुछ हो लेकिन विवेक के दायरे में। राजनीति बड़ी चीज है लेकिन मनुष्यता सबसे बड़ी चीज है, ये हमें हर हाल में याद रखना चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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