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नया संविधान : नया नेपाल

20 सितम्बर हमारे पड़ोसी नेपाल के लिए नया सूर्योदय लेकर आया। इस दिन 239 साल के राजतंत्र (शाहवंश का शासन) और 7 साल के अंतरिम संविधान (2008 से नया संविधान लागू होने तक) के बाद नेपाल का पहला लिखित संविधान लागू हुआ। इस संविधान के लागू होते ही दुनिया का एकमात्र ‘हिन्दू राष्ट्र’ नेपाल ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य’ में तब्दील हो गया। इस ऐतिहासिक संविधान को नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. रामबरन यादव ने बीते रविवार को आधिकारिक तौर पर राष्ट्र को समर्पित किया।

कुछ विश्व-नागरिक होने के नाते तो कुछ इस कारण कि नेपाल ना केवल ‘सीमा’ से बल्कि ‘स्वभाव’ और ‘संस्कृति’ से भी भारत के बेहद करीब है, हमें नेपाल को बधाई देते हुए ये जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उसके संविधान में खास क्या है। राजतंत्र के ‘अवशेष’ पर ‘लोकतंत्र’ की नींव रखना कतई आसान नहीं था लेकिन नेपाल बड़े धैर्य के साथ ‘परिवर्तन’ के लम्बे दौर से गुजरा है। तो चलिए, जानते हैं नेपाल के संविधान से जुड़ी 21 जरूरी बातें।

एक, “नेपाल का संविधान – 2072 बीएस” लागू होने की घोषणा से पहले राष्ट्रपति ने इसकी पाँच प्रतियों पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने कहा कि नए संविधान ने गणराज्य को अब एक संस्थाबद्ध रूप दे दिया है।

दो, बीएस का अर्थ विक्रम संवत् है। ईसवी सन में मौजूदा वर्ष 2015 है लेकिन नेपाल में विक्रम संवत् लागू है। विक्रम संवत् में वर्ष 2072 चल रहा है।

तीन, नेपाल के इस नए संविधान में 37 संभाग, 304 अनुच्छेद और 7 उपबंध हैं।

चार, 601 सदस्यों वाली संविधान सभा में 507 सदस्यों ने इसके पक्ष में और 25 सदस्यों ने विरोध में मतदान किया। तराई क्षेत्र के 69 सदस्य संविधान बनाने की प्रक्रिया का बहिष्कार करते हुए गैरमौजूद रहे। इस संविधान सभा के अध्यक्ष सुभाषचंद्र नेमवांग थे।

पाँच, नए संविधान के लागू होने के साथ ही अंतरिम संविधान रद्द हो गया है और संविधान सभा नियमित संसद में बदल गई है।

छह, संविधान लागू होते ही नेपाल की राजशाही अब इतिहास की बात हो गई। नेपाल अब संघीय गणराज्य होगा और संघवाद इसका मूल सिद्धांत।

सात, भारत की तरह नेपाल में भी राष्ट्रपति देश के संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष होंगे और कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होंगी।

आठ, धर्मनिरपेक्षता संविधान का दूसरा मूल सिद्धांत होगा। नेपाल के ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र’ में सभी धर्मों को स्वतंत्रता तो होगी लेकिन राष्ट्र का कर्तव्य सनातन धर्म और उसकी संस्कृति को बचाना होगा।

नौ, नए धर्मनिरपेक्ष संविधान में गाय को नेपाल का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। गाय को अब संवैधानिक संरक्षण मिल गया है यानि गोहत्या पर पाबंदी होगी।

दस, एक समुदाय के प्रभुत्व वाले पुराने ढांचे से निकलकर नेपाल में ‘इन्क्लूसिवनेस’ यानि आर्थिक समानता पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना होगी।

ग्यारह, आरक्षण और कोटा व्यवस्था के जरिए वंचित, क्षेत्रीय और जातीय समुदायों के सशक्तिकरण की व्यवस्था संविधान में की गई है।

बारह, संविधान में तीसरे लिंग यानि थर्ड जेंडर को भी मान्यता दी गई है।

तेरह, नेपाल में अब सात नए राज्य होंगे। संघवाद की भावना के अनुरूप इन राज्यों, केन्द्र और स्थानीय शासन की अपनी-अपनी शक्तियां होंगी। इन राज्यों के नाम और सीमाएं अभी तय नहीं हैं।

चौदह, नेपाल में अब संसदीय सरकार होगी। यहाँ दो सदनों वाली संसद, एक सदन वाली विधान सभा और जिला, प्रांतीय तथा संघीय स्तरों पर अर्थात् तीन स्तरीय न्यायपालिका होगी।

पन्द्रह, नए संविधान के तहत संविधान परिषद् मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करेगी। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला जजों की नियुक्ति न्यायिक परिषद् करेगी।

सोलह, नेपाली देश की राष्ट्रीय भाषा बनी रहेगी। हालांकि नए संविधान में सभी जातीय भाषाओं को मान्यता दी गई है और प्रांतीय सभाओं को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने का अधिकार दिया गया है।

सत्रह, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल अधिकारों की लम्बी सूची बनाई गई है। इनकी अवहेलना पर अदालत में सुनवाई हो सकेगी।

अठारह, नेपाली महिलाओं को विदेशी पुरुष से शादी करने पर अपनी संतान को नेपाली नागरिकता देने का अधिकार होगा।

उन्नीस, संविधान की मूल भावना नेपाल के शासन में हर नेपाली नागरिक की बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करना है। चुनाव में ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली’ इसी दिशा में उठाया गया कदम है।

बीस, संविधान की प्रस्तावना में बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली, मानवाधिकार, वोट देने का अधिकार, प्रेस की आजादी और कानून आधारित सामाजवाद की बात कही गई है।

इक्कीस, नए संविधान के लागू होने के बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के पदों के लिए नए सिरे से चुनाव होंगे। ये चुनाव एक महीने के अन्दर कराने होंगे।

बता दें कि साल 2008 में माओवादियों न संविधान सभा का चुनाव जीतकर देश से राजशाही को समाप्त किया था लेकिन संविधान सभा नया संविधान बनाने में नाकाम रही थी। 2012 में पहली संविधान सभा को भंग कर दिया गया था। दूसरी संविधान सभा का गठन 2013 में हुआ था।

इस संविधान को लेकर नेपाल में जहाँ एक ओर जश्न है वहीं देश के कुछ हिस्सों में तनाव और हिंसा का माहौल भी है। मधेसी, थारू, राजशाही में आस्था रखनेवाले, नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने के समर्थक और युनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी नेपाल (माओवादी) से अलग हुआ गुट इसका विरोध कर रहे हैं। भारत की सीमा और संस्कृति से सीधे तौर पर जुड़े मधेसियों को सात प्रांतों वाले संघीय ढांचे पर ऐतराज है। महिला अधिकार कार्यकर्ता महिलाओं के लिए अधिक अधिकार की मांग कर रहे हैं। कुल मिलाकर कुछ चिन्ताएं, कुछ आशंकाएं, कुछ आपत्तियां जरूर हैं लेकिन इससे इस अवसर की ऐतिहासिकता कम नहीं हो जाती। सृजन के समय ‘पीड़ा’ स्वाभाविक है और सृजन एक ही बार में ‘पूर्ण’ हो जाय, ये भी जरूरी नहीं। तमाम अवरोधों के बाबजूद जब नेपाल यहाँ तक पहुँच गया है तो आगे का सफर भी वो कर ही लेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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एक नहीं पाँच सर्वे का सार, ‘घिर’ गए नीतीश कुमार

इस बार के चुनाव में नीतीश कुमार ने अपने पॉलिटिकल करियर का सबसे बड़ा दांव खेला है। बीजेपी से संबंध तोड़ने और मांझी को मुख्यमंत्री बनाने से भी बड़ा दांव है लालू और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाना। लालू से अलग होकर समता पार्टी की नींव रखना उनके लिए सबसे बड़ा (और सबसे पॉजिटिव भी) टर्निंग प्वाइंट था। जेपी के घोषित ‘चेले’ होने के कारण कांग्रेस-विरोध भी समझ में आता था। लेकिन अपनी जिन ‘भूलों’ की भरपाई के लिए इन्होंने फिर से लालू (और साथ में कांग्रेस) से संबंध जोड़ा है, वो कहीं और बड़ी भूल ना साबित हो जाए। कम-से-कम अब तक आए पाँच सर्वे, जिनमें देश के चार बड़े चैनल/एजेंसियों के साथ-साथ बीजेपी का आंतरिक सर्वे भी शामिल है, का सार तो यही है।

2010 में जेडीयू ने 141 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 115 सीटों पर उसे जीत मिली थी। तब बीजेपी के साथ गठबंधन था नीतीश का। दूसरी ओर लालू के राजद का गठबंधन रामविलास पासवान की लोजपा से था। तब लालू ने 168 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और केवल 22 पर उन्हें जीत मिली थी। कांग्रेस 2010 में एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसने सारी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे जीत मिली थी मात्र 4 सीटों पर। अब इस बार का समीकरण देखिए। इस बार ये तीनों एक साथ हैं और इनका सीट शेयर इस तरह है – जेडीयू 101 + राजद 101 + कांग्रेस 41 = 243 सीटें। यानि पिछले चुनाव में 115 सीटें जीतने वाली जेडीयू इस बार लड़ ही रही है 100 सीटों पर। कहने का मतलब ये है कि अगर 100 की 100 सीटें भी जीत जाय जेडीयू तब भी 15 सीटों का तो सीधा नुकसान हो ही रहा है नीतीश को। पर नीतीश ने इतनी ही ‘कुर्बानी’ दी होती तो एक बात थी। महागठबंधन के लिए उन्होंने अपनी 25 जीती हुई सीटें राजद को और 10 जीती हुई सीटें कांग्रेस को दी हैं। यानि 35 सीटिंग विधायकों की बलि नीतीश को चढ़ानी पड़ी और बदले में मिली राजद की केवल एक सीट। महागठबंधन को नीतीश भले ही वक्त की ‘जरूरत’ और उनकी पार्टी ‘मास्टर स्ट्रोक’ कह ले लेकिन वास्तव में ये ‘कमजोर’ और ‘हताश’ हो चुके नीतीश का ‘अक्श’ मात्र है।

अब एक नज़र अब तक के सर्वे पर डालें। सबसे पहले 9 सितंबर को इंडिया टीवी/सी वोटर्स का सर्वे आया। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए को 94-110 सीटें, महागठबंधन को 116-132 सीटें और अन्य को 13-21 सीटें मिलनी चाहिएं। अगले ही दिन यानि 10 सितंबर को आए इंडिया टीवी/सिसरो के सर्वे में एनडीए को 120-130 सीटें, महागठबंधन को 102-103 सीटें और अन्य को 10-14 सीटें दी गई थीं। इसके बाद 15 सितंबर को एबीपी न्यूज/नीलसन का सर्वे सामने आया जिसमें एनडीए को 118, महागठबंधन को 122 और अन्य को 3 सीटें मिलने का अनुमान है। यहाँ तक मुकाबला कांटे का दिखता है। पहले सर्वे में महागठबंधन को बढ़त मिली थी, दूसरे में एनडीए को और तीसरे में दोनों लगभग बराबरी पर थे। कहानी में मोड़ इसके बाद हुए सर्वेक्षणों से आया।

18 सितंबर को आए जी न्यूज के सर्वे के मुताबिक 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए को 140 सीटें मिलने जा रही हैं जबकि महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट सकता है। शेष 33 सीटों पर कड़ा मुकाबला है। इस सर्वे के मुताबिक 50.8 फीसदी मतदाता भगवा रंग में रंगे हैं और नीतीश-लालू के साथ 42.5 प्रतिशत मतदाता ही हैं।

बीजेपी के आंतरिक सर्वे के अनुसार भी वो ‘आसानी’ से बहुमत हासिल करती दिख रही है। बीजेपी के अपने आकलन के मुताबिक एनडीए को 160 से 170 सीटें मिलनी चाहिएं। इस सर्वे के अनुसार महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट रहा है और इन 70 सीटों में भी ज्यादातर सीटें लालू की होने जा रही हैं। इसका अर्थ ये है कि नीतीश कुमार हर तरह से ‘घिर’ गए हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि बीजेपी ने इससे पहले भी आंतरिक सर्वे कराए थे जिनमें एनडीए पिछड़ा हुआ था। बीजेपी के अपने ‘ग्राफ’ के मुताबिक भी ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आता गया है, त्यों-त्यों बीजेपी बढ़त बनाने में सफल हुई है।

देखा जाय तो बीजेपी को बढ़त मिलने के कारण भी स्पष्ट हैं। मुलायम सिंह ने महागठबंधन से नाता तोड़कर और अब ‘थर्ड फ्रंट’ को आकार देकर बीजेपी को स्पष्ट तौर पर फायदा पहुँचाया है। इस थर्ड फ्रंट में पप्पू यादव के शामिल होने तथा तारिक अनवर को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सामने लाने से भी महागठबंधन को नुकसान होगा। मांझी महादलितों के वोट में सेंध लगा ही चुके थे और अब ओवैसी ने सीमांचल में चहलकदमी कर महागठबंधन की ही चिन्ता बढ़ाई है। वामदलों को भी थोड़ा-बहुत जो मिलेगा, महागठबंधन के हिस्से का ही। इसीलिए सारे सर्वे को किनारे भी कर दें तो भी एनडीए बेहतर स्थिति में तो है ही।

जिस तरह रंगों से रंग निकलते चले जाते हैं और उनकी गिनती सम्भव नहीं, वैसे ही राजनीति में एक समीकरण से कितने समीकरण जुड़े होते हैं और उन समीकरणों से कितने नए समीकरण बन जाएंगे इसका आकलन पूरी तरह सम्भव नहीं। लेकिन इन पंक्तियों के लिखने तक बिहार में मुकाबला कांटे का  है और इस कांटे के मुकाबले में बढ़त फिलहाल एनडीए को है यानि उसकी राह के ‘कांटे’ दूर होते दिख रहे हैं। यहाँ तक कि नीतीश के साथी लालू और कांग्रेस के हिस्से में भी ‘कांटे’ अपेक्षाकृत कम हैं लेकिन नीतीश हर तरह से ‘कांटों’ में घिरे दिख रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लोकतंत्र के पर्व में ‘परिवार’ सबसे बड़ा ‘उम्मीदवार’..!

‘परिवारवाद’ पर ताने सुनते-सुनते बेचारी कांग्रेस के कान तो सुन्न हो चले होंगे… पर ये क्या, जो दल अस्तित्व में ही आए ‘कांग्रेसवाद’ के विरोध में, वे इस ‘दलदल’ में ज्यादा गहरे उतर चले हैं..! आज कोई दल इस ‘रोग’ से अछूता नहीं। पर मजे की बात तो ये है कि कोई इसे ‘रोग’ मानने को ही तैयार नहीं। अब तो राजनीति के गलियारे में परिवारवाद पर बातें करना वक्त बर्बाद करना है। “हमाम में सब नंगे” वाली बात अब पुरानी ही नहीं अर्थहीन भी हो चली है। अब तो कहना पड़ेगा कि हमाम में सब नंगे हैं और सारे हमाम शीशे के हैं सो अलग। ऐसे में कौन, किससे और क्या कहे..? किसी के ‘हमाम’ पर पत्थर फेंकने का नैतिक बल रहा ही नहीं किसी के पास। सारे दल और दलों के सारे नेता इस मामले में मूक समझौता कर चुके हैं, वैसे ही जैसे संसद में करते हैं, जब-जब सांसदों का वेतन-भत्ता बढ़ना हो।

बहरहाल, जरा रुख करते हैं बिहार का, जहाँ लोकतंत्र के पर्व में विरासत की वंशबेलि लहलहाकर बढ़ रही है। बात सबसे पहले लालू प्रसाद यादव की। अपने दोनों सालों से चोट खाए लालू को बेसब्री से इंतजार था अपने बेटों के 25 की उमर पार करने का। 2010 में उनकी ये मुराद पूरी ना हो पाई थी, इस बार हो रही है। उनके दोनों बेटों की उम्र चुनाव लड़ने के लायक हो गई है, सो दोनों-के-दोनों मैदान में होंगे इस बार। बड़े बेटे तेजप्रताप का महुआ से तो छोटे तेजस्वी का राघोपुर से लड़ना तय है। अब ख़बर ये आ रही है कि ओबरा से लड़ने को मीसा भारती भी कमर कस चुकी हैं। वहीं अपनी पार्टी के सांसद जयप्रकाश नारायण यादव के भाई विजय प्रकाश को लालू जमुई से राजद का उम्मीदवार बनाने जा रहे हैं।

उधर ‘मौसम वैज्ञानिक’ रामविलास ने तो सारी हदें पार कर दीं। लोकसभा में उनके छह में से तीन सांसद उन्हीं के परिवार से हैं। वे स्वयं, सुपुत्र चिराग और भाई रामचंद्र पासवान। उनके एक और भाई पशुपति कुमार पारस बिहार में पार्टी की कमान सम्भालते हैं और अलौली से चुनाव लड़ते आ रहे हैं। जाहिर है, इस बार भी वे लड़ेंगे। पर बात यहीं खत्म नहीं होती। रामविलास पासवान ने अपने भतीजे और रामचंद्र पासवान के बेटे प्रिंस राज को कल्याणपुर से उम्मीदवार बनाया है। सोनबरसा से उनकी भगीन पतोहू सरिता पासवान लड़ रही हैं और राजापाकर से दामाद मृणाल। दूसरे दामाद कुटुंबा सीट ‘हम’ के खाते में जाने के बाद सिकंदरा से लड़ने को बेताब हैं सो अलग। उनकी सूची की शोभा केवल उनके परिवार के लोग ही नहीं बढ़ा रहे। उनके बाकी उम्मीदवारों में भी ज्यादातर ‘किसी ने किसी’ के ‘कोई न कोई’ हैं। उदाहरण के तौर पर सिमरी बख्तियारपुर से सांसद महबूब अली कैसर के बेटे युसूफ खान तो विभूतिपुर से पूर्व सांसद सूरजभान सिंह के बहनोई रमेश सिंह।

अब निगाह महदलितों के नए ‘मसीहा’ जीतनराम मांझी की पार्टी ‘हम’ पर डालें। उनकी सूची में मखदुमपुर से वे स्वयं उम्मीदवार हैं तो कुटुंबा से उनके पुत्र संतोष कुमार सुमन। उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी तारापुर से लड़ रहे हैं तो उनके छोटे बेटे राजेश कुमार उर्फ रोहित खगड़िया से। शकुनी के बड़े बेटे सम्राट चौधरी तो विधान परिषद् में हैं ही।

बीजेपी भी किसी से रत्ती भर कम नहीं। वहाँ भी ‘विरासत’ आगे बढ़ाने वालों की लम्बी फेहरिस्त है। बक्सर के सांसद अश्विनी चौबे के बेटे अजित शाश्वत को भागलपुर से, राज्यसभा सदस्य डॉ. सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर को ब्रह्मपुर से तो पूर्व विधान पार्षद गंगा प्रसाद चौरसिया के बेटे संजीव चौरसिया को दीघा से पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है। नंदकिशोर यादव अपने बेटे के लिए फतुहा से टिकट चाह रहे थे लेकिन ये सीट लोजपा के खाते में चली गई। झंझारपुर से जगन्नाथ मिश्र के पुत्र नीतीश मिश्र और जमुई से नरेन्द्र सिंह के बेटे अजय प्रताप सिंह इस बार बीजेपी के उम्मीदवार हैं लेकिन ‘हम’ के कोटे से। नरेन्द्र सिंह के दूसरे बेटे सुमित सिंह भी ‘हम’ की ओर से भाजपा के उम्मीदवार होंगे, बस सीट की घोषणा बाकी है।

अभी तक की सारी चर्चा तमाम पार्टियों के घोषित उम्मीदवारों को लेकर है। किसी पार्टी की पूरी सूची अभी तक आई नहीं है। कांग्रेस की तो पहली सूची भी अभी आनी है। सारी पार्टियों की सारी सूची आने के बाद ‘परिवार’ के उम्मीदवारों की कतार और लम्बी होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

देखा जाय तो समस्या परिवार को लेकर नहीं, समस्या उसमें ‘वाद’ के लग जाने से है। अगर आप योग्य हैं, समाज से जुड़े हैं, राजनीति में सक्रिय हैं, कुछ करने का जज्बा रखते हैं और किसी कार्यकर्ता का हक नहीं मार रहे हैं तो किसी का बेटा, बेटी, पत्नी या भाई-भतीजा होना गुनाह नहीं। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो ‘लोकतंत्र’ के ‘परिवारतंत्र’ में तब्दील होते देर नहीं लगेगी। फिर हमें कोई हक नहीं होगा कि इतिहास के पन्नों में दबे उस ‘राजतंत्र’ को हम बुरा-भला कहें जिसके ‘परिवार’ से निकलने की कल्पना भी तब के लोग नहीं करते थे और एक ‘परिवार’ को पराजित या अपदस्थ कर दूसरा ‘परिवार’ ही हम पर शासन करने आता था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा के ‘तन’ ही नहीं, ‘मन’ के भी चिकित्सक थे ‘मेजर साहब’

कुछ लोग होते हैं जिन्हें ईश्वर विशेष तौर पर हमारे बीच भेजते हैं… हमें सींचने… हमें संस्कारित करने… हमें और हमारी कई पीढ़ियों को सम्हालने। ऐसे लोगों के भी होते और दिखते दो ही हाथ हैं हमारी तरह लेकिन जब वे नहीं रहते हमारे बीच तब हम उनके ‘अवदान’ को गिनने बैठते हैं और जब गिनते-गिनते थक जाते हैं तो सोचते हैं, पता नहीं ना दिखने वाले कितने हाथ थे उनके। जी हाँ, ऐसे लोग हमें कई-कई हाथों से, कई-कई रूपों में देते हैं और जीवन-पर्यन्त देते ही रहते हैं। ऐसे ही थे डॉ. (मेजर) उपेन्द्र नारायण मंडल… हम सबके ‘मेजर साहब’, जिन्होंने मधेपुरा की एक नहीं, दो नहीं, पूरी पाँच पीढ़ियों को दिया और ‘बहुत कुछ’ दिया। 17 सितंबर… भगवान विश्वकर्मा का दिन… इसी दिन मधेपुरा को भले ही अपनी सीमा में लेकिन अपनी तरह गढ़ने वाले इस ‘विश्वकर्मा’ का जन्मदिन था… कुल मिलाकर 90वां और हमारे बीच उनके ना रहने के बाद पहला जन्मदिन।

पेशे से चिकित्सक, व्यक्तित्व से मेजर, व्यवहार से समाजसेवी और संस्कार से संत – ये थे डॉ. (मेजर) उपेन्द्र नारायण मंडल, जिन्हें मधेपुरा ने उनकी जयंती पर बड़ी शिद्दत और श्रद्धा से याद किया। इसी वर्ष 29 जनवरी को 89 वर्ष की उम्र में उनका देहावसान हुआ था।

मेजर साहब का जन्म 17 सितम्बर 1926 को मधेपुरा के तुनियाही गाँव में हुआ था। अपने जमाने के प्रसिद्ध व अनुशासनप्रिय अधिवक्ता बाबू रघुनंदन प्रसाद मंडल के वे बड़े पुत्र थे। एमबीबीएस करने के बाद 1955 से 1960 तक वे बिहार सरकार की सेवा में रहे। 1961 में उन्होंने मेडिकल ऑफिसर के तौर पर इंडियन आर्मी ज्वाइन की। इस इलाके से ‘मेजर’ होने वाले वे पहले शख़्स थे। 1975 में जब वे सेना से सेवानिवृत्त हुए, उनके पास भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान युद्ध समेत कई बड़े अवसरों के गौरवशाली संस्मरण थे।

आर्मी में उनका काम पूरा हो गया था लेकिन ‘युद्ध’ के लिए नई भूमि तैयार थी उनके लिए। 1975 में मधेपुरा आकर उन्होंने ‘जयश्री क्लिनिक’ (जयश्री उनकी धर्मपत्नी का नाम था) की शुरुआत की। वैसे गरीब और असहाय जो अब तक चिकित्सा के लिए भगवान भरोसे थे, उनके बीच सचमुच का ‘भगवान’ आ गया था। ऐसे लोगों से उन्होंने ‘फीस’ कभी मांगी नहीं और किसी ने दी तो गिनी नहीं। अहले सुबह से देर रात तक लोगों की कतार लगी रहती थी और ये सैनिक अपनी ‘युद्धभूमि’ में डटा रहता था। ये सिलसिला अनवरत 40 वर्षों तक चलता रहा, 89 वर्ष की उम्र में बाथरूम में फिसलने पर पेल्विक बोन टूट जाने तक।

मेजर साहब जहाँ एक ओर लाजवाब चिकित्सक और आईएमए, मधेपुरा के अध्यक्ष थे, वहीं दूसरी ओर परमहंस महर्षि मेंहीदास के अनन्य शिष्य और अखिल भारतीय संत मत के उपाध्यक्ष भी। अध्यात्म की जैसी सर्वग्राह्य व्याख्या उनके पास थी, वो अन्यत्र दुर्लभ है। ईश्वर-भक्ति और शिक्षा की ‘लौ’ वो एक साथ जलाते रहे। रघुनंदन प्रसाद मंडल इंटर व डिग्री कॉलेज की स्थापना इसी का परिणाम थी। वो इन दोनों कॉलेजों के संस्थापक सचिव थे। तुनियाही में माध्यमिक विद्यालय की स्थापना भी उन्होंने की। यही नहीं, इस इलाके की शायद ही कोई सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधि ऐसी होती हो जिससे उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष जुड़ाव ना रहता हो। बता दें कि मेजर साहब विश्व हिन्दू परिषद्, मधेपुरा के अध्यक्ष और बिहार के उपाध्यक्ष भी थे।

अनुशासनप्रिय वे अपने पिता के समान थे। कर्तव्यनिष्ठ ऐसे कि उनकी कसमें खाते थे लोग। जीवन में किसी भी चीज का ‘अपव्यय’ करते उन्हें ना किसी ने देखा ना सुना। एक बहुत खास बात और, सत्संग उनकी दिनचर्या ही नहीं, उनके पूरे व्यक्तित्व का अनिवार्य अंग था। इतना अनिवार्य कि जन्मदिन हो या पुण्यतिथि, सत्संग के बिना कोई ‘अवसर’ पूरा नहीं होता था उनके लिए। अपना हर जन्मदिन वो सत्संग करके मनाते थे और उनकी इच्छा के मुताबिक उनके ना रहने पर भी सत्संग करके ही उनकी जयंती मनाई गई। उन्हीं के आवास पर और वो भी बहुत सादगी से। उनके परिवार के तमाम लोगों के साथ-साथ उनके चाहने वालों का तांता लगा रहा दिन भर। सबको विश्वास था मानो कि सत्संग है तो मेजर साहब भी होंगे ही, और रहेंगे ही ‘ना रहकर’ भी। मधेपुरा के ‘तन’ और ‘मन’ की एक साथ चिकित्सा करनेवाले उस कर्मयोगी सैनिक-संत को मधेपुरा अबतक का शत् शत् नमन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पप्पू या ओवैसी, बिहार चुनाव का ‘एक्स’ फैक्टर कौन..?

एक ओर लालू-नीतीश-कांग्रेस का महागठबंधन, दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी की अगुआई में एनडीए, तीसरी ओर मुलायम की ‘थर्ड फ्रंट’ को लेकर कोशिशें… लेकिन बिहार चुनाव का ‘एक्स’ फैक्टर पप्पू या ओवैसी होने जा रहे हैं। मत होइए हैरान, समीकरण कुछ ऐसा ही कह रहे हैं। इस बार के चुनाव में ये दोनों ‘निर्णायक’ प्रभाव डाल सकते हैं और वो भी कोसी-पूर्णिया के इलाके से। कोसी और पूर्णिया प्रमंडल की सीटों पर एनडीए और महागठबंधन की नज़र जितनी अपने प्रदर्शन पर होगी, उससे कहीं अधिक पप्पू और ओवैसी पर होगी। ये दोनों मतदाताओं पर जितना असर छोड़ेंगे, उतनी ही बीजेपी की बांछें खिलेंगी और इन ‘सूरमाओं’ के धाराशायी होने पर जश्न महागठबंधन के खेमे में होगा। चलिए, समझने की कोशिश करते हैं कैसे..?

पप्पू यादव का राजनीतिक करियर बिहार में लगभग ढाई दशक पुराना है। इस अवधि में वे कई पार्टियों में आते-जाते रहे… विवादों से घिरते, केस झेलते और जेल जाते रहे… इन सबके बीच कुछ मौकों को छोड़ ज्यादातर चुनावों में स्वयं जीतते और पत्नी रंजीत रंजन को जिताते रहे… समानान्तर रूप से संगठन ‘युवा-शक्ति’ चलाते रहे… और अब ‘जनअधिकार’ नाम से उन्होंने अपनी पार्टी भी बना ली है। पार्टी बनाने से पहले भी वो खुद को समूचे बिहार के राजनीतिक पटल पर रखने की पुरजोर कोशिश करते रहे हैं। अब तो इस मामले में इतने ‘कांसस’ हो गए हैं वो कि ‘छोटे’ मसले पर भी ‘बड़ी’ बात बोलना उनकी आदत बनती जा रही है। उनकी तमाम कोशिशें अपनी जगह हैं और ये सच अपनी जगह कि उनकी पार्टी का ‘जन’ और ‘अधिकार’ दोनों बिहार में अगर कहीं है, तो फिलहाल कोसी और पूर्णिया के इलाके में ही। अभी पप्पू मधेपुरा से सांसद हैं और पत्नी रंजीत सुपौल से। पूर्णिया का प्रतिनिधित्व वो कई बार कर चुके हैं और अच्छी पैठ रखते हैं। कटिहार, अररिया, किशनगंज में भी उनकी चहलकदमी रही है। कुल मिलाकर वर्तमान पूर्णिया और कोसी कमिश्नरी पर उनका असर है, इसमें कोई दो राय नहीं।

अब बात ओवैसी की करें। कौन हैं ये ओवैसी जिनकी चर्चा बिहार में और वो भी पूर्णिया और कोसी के ‘सीमांचल’ कहलाने वाले इलाके में हो रही है और इसी इलाके से आनेवाले तस्लीमुद्दीन, तारिक अनवर और शाहनवाज जैसे मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी के बावजूद और उनसे ज्यादा हो रही है..? देश के राजनीतिक फलक पर भले ही इस शख्स़ का ख़ास वज़ूद अभी ना दिखता हो लेकिन बहुत कम समय में मुस्लिम राजनीति का ‘चेहरा’ बनने में कामयाब तो ये हो ही गया है। फिलहाल आंध्रप्रदेश के हैदराबाद से सांसद असदउद्दीन ओवैसी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानि एआईएमआईएम के प्रमुख हैं। आंध्र में इनका परिवार कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार। इतने कम दिनों में मुसलमान इन्हें अपना ‘मोदी’ कहने लगे हैं तो ये अकारण नहीं है। कहने की जरूरत नहीं कि दिल्ली के औरंगजेब रोड का नाम डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखे जाने का विरोध करने वाले ओवैसी मुस्लिम कट्टरपंथ के हिमायती हैं। अपने बयानों और भाषणों से ‘उन्माद’ पैदा करने में फिलहाल इनकी कोई सानी नहीं है। अपनी इसी ‘काबिलियत’ और सुर्खियों में बने रहने की ‘कला’ को ओवैसी बिहार में भुनाना चाहते हैं। यही कारण है कि एनडीए जहाँ इनसे ‘उम्मीद’ लगाए बैठा है वहीं महागठबंधन इनमें अपनी ‘नाउम्मीदी’ की झलक देख रहा है।

कहने की जरूरत नहीं कि पप्पू और ओवैसी दोनों को बीजेपी का ‘मौन समर्थन’ है जो अब चीख-चीख कर ‘बोलने’ लगा है। कुशवाहा के अलग होने के बाद नीतीश लगभग उस झटके से उबर गए थे लेकिन मांझी का दिया जख़्म अभी ताजा है। ऐसे में उन्हें लालू के ‘माय’ समीकरण से बड़ी उम्मीद थी लेकिन पप्पू और ओवैसी उसी वोटबैंक में बहुत ‘घातक’ सेंध लगा रहे हैं। वैसे भी बीजेपी की सारी चिन्ता इस चुनाव में लालू के इर्द-गिर्द ही टिकी हुई है। नीतीश के साथ ‘विकास’ का जो टैग है उसका हल बीजेपी को मोदी के ‘विकास’ टैग से निकल जाने की उम्मीद है लेकिन लालू के ‘माय’ का किला उसे अभेद्य दिख रहा था। अब इसका हल पप्पू और ओवैसी से निकलता उसे दिख रहा है।

पप्पू का ताल्लुक कभी सपा, कभी एनसीपी तो कभी राजद से रहा है। अपने पूरे करियर में वे किसी दलविशेष के प्रति समर्पित नहीं रहे। या यूँ कहें कि उनकी महत्वाकांक्षा ने उन्हें समर्पित होने नहीं दिया। जिस लालू से वे राजद का ‘उत्तराधिकार’ मांग रहे थे उसकी सफलता या संघर्ष में कभी उनका याद रखने लायक कोई योगदान नहीं रहा। सब दिन अपनी राजनीति के केन्द्र में वो स्वयं रहे। पप्पू भी जानते थे कि जो चीज वो मांग रहे हैं वो उनकी है ही नहीं। उन्हें तो बस किसी बहाने लालू से ‘लड़ना’ था और जितना उन्हें लड़ना था उससे कहीं अधिक बीजेपी को उन्हें ‘लड़वाना’ था। ऐसा ही कुछ ओवैसी के साथ है। आरएसएस और बीजेपी को अपना दुश्मन नंबर वन बताने वाले ओवैसी बिहार में अपने आने का उद्देश्य बीजेपी को कमजोर करना बताते हैं। लेकिन ये बात बड़ी हास्यास्पद लगती है कि उनके आने से कोसी और पूर्णिया के ‘सीमांचल’ में बीजेपी को होनेवाले फायदे का जो गणित कोई बच्चा भी बता सकता है, उसे वो ख़ुद नहीं जान रहे हैं..!

अररिया, कटिहार, पूर्णिया और किशनगंज – इन चार जिलों से मिलकर बने ‘सीमांचल’ की आबादी तकरीबन एक करोड़ है जिसमें मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत है।  किशनगंज में तो 69 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है। एक आकलन के मुताबिक सीमांचल की 21 सीटों पर ओवैसी स्पष्ट प्रभाव डाल सकते हैं। सीमांचल में आर्टिकल 371 के तहत रिजनल डेवलपमेंट काउंसिल की मांग वो यूँ ही नहीं उठा रहे हैं। जानकार तो यहाँ तक बता रहे हैं कि सीमांचल यानि कोसी-पूर्णिया डिविजन की 21 सीटों के अलावे  भागलपुर-मुंगेर डिविजन की 15 सीटों पर भी ओवैसी प्रभाव डाल सकते हैं। बताना जरूरी होगा कि बिहार की 10.50 करोड़ आबादी में 17 फीसदी मुस्लिम हैं और बिहार की कुल 243 विधान सभा सीटों में लगभग 50 सीटों के चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में बीजेपी से जो भी ‘डील’ हुई हो ओवैसी की, आंध्र और महाराष्ट्र में पैर पसार चुकने के बाद बिहार के इस चुनाव से  मुसलमानों का ‘बड़ा’ नेता बनने का अवसर भी वो खोना नहीं चाहते।

मुसलमानों के बाद इस इलाके में यादव बड़ी तादाद में हैं। सीमांचल के चार जिलों को छोड़ दें तो शेष जिलों – मधेपुरा, सहरसा और सुपौल – में यादव मुसलमान से कहीं ज्यादा हैं और हर लिहाज से प्रभावशाली हैं। सीमांचल में भी यादवों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यादवों के इसी वोट बैंक पर पप्पू निगाह गड़ाए बैठे हैं। देखा जाय तो उनका दायरा एक अर्थ में ओवैसी से अधिक बड़ा हो जाता है कि ओवैसी जहाँ मुस्लिम बहुल सीटों पर ही छाप छोड़ेंगे वहीं पप्पू कमोबेश इस इलाके की हर सीट पर कुछ-ना-कुछ बटोर लेंगे। यादव के साथ ही कुछ मुस्लिम और कुछ अन्य जातियों के वोट भी उन्हें मिल सकते हैं। मुसलमान मुख्यमंत्री की बात पप्पू सोची-समझी रणनीति के तहत ही कर रहे हैं। लालू के ‘माय’ के समानान्तर वो अपना ‘माय’ खड़ा करना चाहते हैं।

ये भी सच है और तमाम दावों के बावजूद पप्पू और ओवैसी दोनों जानते हैं कि इन्हें सीटें इक्की-दुक्की ही मिल पाएंगी। यहाँ तक कि ना भी मिले। लेकिन ‘कोसी’ और ‘पूर्णिया’ की ‘कुंजी’ कमोबेश इन्हीं दोनों के हाथों में होगी। ‘प्रतीकात्मक’ असर ओवैसी का ज्यादा दिख रहा है तो ‘व्यावहारिक’ असर पप्पू का। लेकिन राजनीति दोनों में से किसी की ‘सार्थक’ और ‘सकारात्मक’ दिशा में नहीं है, ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए किसी को।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘बधाई’ तो बनती है नरेन्द्र मोदी के लिए और वो भी नेहरू के बराबर

आपका नाम क्या है, मुझे नहीं पूछना… आप किस दल से जुड़े हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता… आप किस जाति के हैं, किस प्रांत से आते हैं, कौन-सी भाषा बोलते हैं, कुछ भी जानना जरूरी नहीं… लेकिन अगर आप भारतीय हैं तो आज आपको उस व्यक्ति को बधाई जरूर देनी चाहिए जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है। बधाई इसलिए कि आज उनका जन्मदिन है। आप असहमत हो सकते हैं उनसे, राजनीतिक तौर पर विरोध कर सकते हैं उनका लेकिन अगर आपको धरती के उस विशाल टुकड़े, जिसका नाम भारत है, की पहचान और सम्मान की चिन्ता है तो आपको इस व्यक्ति के स्वस्थ और दीर्घायु होने की कामना जरूर करनी चाहिए।

मुझे पता है, संविधान का कोई पन्ना और कानून की कोई किताब किसी को बधाई और शुभकामना देने के लिए आपको बाध्य नहीं कर सकती। आप एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं और अपना विचार रखने और व्यक्त करने की पूरी आज़ादी है आपको। फिर मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूँ..? क्या इसलिए कि मोदी प्रधानमंत्री हैं… बहुत ‘शक्तिशाली’ प्रधानमंत्री..? या इसलिए कि कमाल का बोलता है ये आदमी और इसी के दम पर भाजपा अपने स्वर्णिम दौर में है और दुनिया की ‘सबसे बड़ी’ पार्टी बन गई है..? या फिर इसलिए कि मीडिया आज मोदीमय है और तमाम सुर्खियां ये एक शख्स़ उड़ा ले जाता है और मैं चमत्कृत हूँ इस बात से..?  नहीं… बिल्कुल नहीं।

गुजरात जैसे किसी बड़े प्रांत का मुख्यमंत्री बनने और एक बार नहीं, दो बार नहीं, लगातार तीन बार बनने के बाद किसी की भी महत्वाकांक्षा हो सकती है प्रधानमंत्री बनने की। मान लेते हैं मोदी की भी यही महत्वाकांक्षा थी, परिस्थितियों ने साथ दिया उनका और बन भी गए वो। बने और प्रचंड बहुमत के साथ बने। तो फिर अब भी बेचैन क्यों हैं वो। उन्हें तो अभी ‘इंज्वाय’ करना चाहिए था अपना ‘पद’ और ‘रुतबा’। जाहिर है कोई भी ऐसा कहकर नहीं करेगा। तो फिर कम-से-कम चेहरे पर तो ‘आत्मसंतोष’ या ‘मुग्धता’ दिख ही सकती थी। लेकिन ये क्या..! इतना कुछ पाकर और बेचैन क्यों हो गया ये शख्स़..? क्या वजह है इस बेचैनी की..? यही वो ‘बिन्दु’ है जहाँ मैं आपको लाना चाहता था। जी हाँ, यही वो बिन्दु है जहाँ आकर आप नरेन्द्र मोदी को बधाई और शुभकामना दिए बिना नहीं रहेंगे।

‘प्रधानमंत्री कार्यालय’ में पैर रखते ही मोदी ने बता दिया कि ये तो बस एक ‘रनवे’ है उनके लिए। अभी तो बहुत लम्बी उड़ान भरनी है उनको। चुनाव के दौरान पूरे भारत का तूफानी दौरा कर चुके थे वो। प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी निगाह सबसे पहले ‘पड़ोसी’ मुल्कों पर गई और कुछ इस तरह गई कि लगा कि सारा ‘शेड्यूल’ तय था पहले से। ‘छोटे’ भूटान और नेपाल से लेकर ‘बड़े’ चीन और जापान तक और दूसरी ओर श्रीलंका से पाकिस्तान तक – तमाम पड़ोसियों से हमारे सम्बन्ध नए सिरे से ‘परिभाषित’ होने लग गए। ‘महाशक्तिशाली’ अमेरिका को उन्होंने बहुत सलीके से साधा। पहली बार लगा कि अमेरिका बराबरी पर बात कर रहा है हमसे। 28 साल तक जिस ऑस्ट्रेलिया को बिसराए रहे हम, सम्भावनाओं की तलाश में मोदी वहाँ भी पहुँचे। मॉरीशस, सिंगापुर, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, दक्षिण कोरिया – हर जगह मोदी दिखे और मोदी से अधिक भारत दिखा, विश्व-पटल पर अपने अस्तित्व को नए सिरे से तलाशता। कहीं हम संबंध बना रहे थे, कहीं समझौता कर रहे थे, कहीं व्यापार की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं तो फिजी और मंगोलिया जैसे देशों को हम दिल खोलकर ‘दे’ भी रहे थे। हर जगह चर्चा में था भारत।

उनके विदेश दौरों पर टिप्णियां हुईं, काला धन के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की गई, उन्हें ‘सूट-बूट’ की सरकार कहा गया, ललित मोदी और व्यापम को लेकर संसद भवन गूंजता रहा – वे खामोशी से सुनते रहे। उन्हें पता था कि समस्याएं हैं और केवल और केवल काम करके ही ‘जवाब’ दिया जा सकता है। चुनाव से पूर्व उन्होंने जो कहा वो सब ‘कर दिया’, ऐसा नहीं है लेकिन ‘कर देंगे’ का विश्वास उन्होंने जरूर हासिल किया है और ये बड़ी बात है। ये सचमुच बड़ी बात है कि भारत का प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ कर रहा हो और पूरा देश उसे ‘मन’ से सुन रहा हो।

नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री हुए। सबके कार्यकाल की अपनी-अपनी उपलब्धियां रहीं। इन सबमें इंदिरा गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी नेहरू के बाद और मोदी के पहले के दो ऐसे नाम हैं जिनकी स्वीकार्यता दलगत सीमा से ऊपर और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की थी। आज मोदी का कद भी दल और देश की सीमा को पार कर चुका है लेकिन ये जितने कम समय में और जितनी गहराई और जितने विस्तार से हुआ है, वो सचमुच अविश्वसनीय लगता है। आज उनकी उपस्थिति पूरे देश में एक समान है… राष्ट्रीय ही नहीं, राज्य स्तर के भी हर दल उन्हें देखकर अपनी रणनीति बना या बदल रहे हैं… भारत के भविष्य का ‘रूप’ गढ़ने में वो केवल मौजूद ही नहीं रहते, अपने ‘विज़न’ के साथ मौजूद रहते हैं… और देश के बाहर कहीं भी जाने पर वो भारत के प्रधानमंत्री कम और हमारे ‘प्रतिनिधि’ ज्यादा लगते हैं। हमारा सोचा हुआ हमें उनके मुँह से सुनने को मिल जाता है, ऐसा पहले या तो बहुत कम होता था या फिर होता ही नहीं था।

ये स्पष्ट हो चुका है कि मोदी की राजनीति केवल प्रधानमंत्री बनने या बने रहने के लिए नहीं है। वो अपना ‘कैनवास’ अपनी तरह से रच रहे हैं। अपने ‘कार्यकाल’ पर नहीं अपने ‘युग’ पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं वो। जिस गुजरात से आते हैं मोदी वहाँ से सीख कर आए हैं वो कि ‘राष्ट्रपिता’ और ‘लौहपुरुष’ का कद किसी भी पद से बड़ा होता है और ये भी कि ऐसी ‘विरासत’ को संजोने और उस ‘कड़ी’ से जुड़ने का ‘व्रत’ कितना कठिन होता है। मोदी को पता है कि ‘राज’ से बड़ी चीज है ‘नीति’ और ‘नीति’ से बड़ा होता है ‘विचार’। विचारों से ‘संस्कार’ बनता है और संस्कार से बनती है ‘संस्कृति’। उन्हें ये भी पता है कि इन सबको एक साथ साधने के लिए उन्हें थोड़ा विवेकानन्द, थोड़ा पटेल और थोड़ा अटल बनना होगा। उन्हें अपनी संस्कृति के तारों से ‘डिजिटल’ इंडिया को बुनना होगा। बहरहाल, आज़ाद भारत के लिए जो नेहरू ने किया था वही मोदी कर रहे हैं इक्कीसवीं सदी के भारत के लिए। इसीलिए बधाई तो बनती है उनके लिए और वो भी नेहरू के बराबर।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नरेन्द्र मोदी और नीतीश नहीं, अब भी लालू हैं बिहार की राजनीति की धुरी..!

बिहार चुनाव की घोषणा के बाद सारे दल अपनी-अपनी रणनीति को अन्तिम रूप देने में जी-जान से जुटे हैं। प्रथम चरण के नोटिफिकेशन के साथ-साथ ही भाजपा के 43 प्रत्याशियों की पहली सूची भी आ गई। अब कहाँ दिन का चैन और कहाँ रातों की नींद..! मतगणना तक सबके मन के तार कितने सुरों में बजेंगे, क्या मजाल कि कोई उसकी गिनती कर दे। बहरहाल, ऊपरी तौर पर सीटों का बंटवारा भले ही हो गया हो, अन्दरूनी तौर पर अभी भी दोनों ‘गठबंधन’ सीटों की समस्या सुलझाने में उलझे हुए हैं। जब तक ये तमाम दल अन्तिम रूप से किसी निष्कर्ष पर पहुँचें, क्यों ना हमलोग ये पड़ताल करें कि इस चुनाव में बिहार की राजनीति की धुरी कौन हैं – ‘केन्द्र’ के शीर्ष पर बैठे नरेन्द्र मोदी, ‘विकास’ की अग्निपरीक्षा दे रहे ‘(विकास ?)पुरुष’ नीतीश कुमार या अपने (और अपनी अगली पीढ़ी की भी) ‘अस्तित्व’ की अब तक की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहे लालू प्रसाद यादव..? ये सवाल सुनने में शायद आसान लगा हो आपको, लेकिन इसका जवाब एक झटके में दे दें तो मान जाऊँ मैं। अगर इस सवाल का जवाब ढूँढ़ लें तो हम बिहार में होने जा रहे चुनाव ही नहीं, बिहार को भी समझ लेंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार की राजनीति को पिछले दस वर्षों से नीतीश कुमार ने डोमिनेट किया है। राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उदय से पहले तक बिहार में सब कुछ ‘नीतीशमय’ दिख रहा था। उनका ‘विकासपुरुष’ वाला टैग आमलोगों से लेकर देश-विदेश के मीडिया तक में खूब चला और ऐसा चला कि नीतीश ने पहले ‘विकास’ के नाम पर नरेन्द्र मोदी के ‘वैकल्पिक’ (याद कीजिए समग्र विकास के लिए ‘गुजरात मॉडल’ अच्छा कि ‘बिहार मॉडल’ की लड़ाई) और फिर ‘साम्प्रदायिकता’ के नाम पर ‘विपरीत’ ध्रुव के रूप में खुद को स्थापित करना चाहा। ये बताने और जताने की कोशिश भी हुई कि एनडीए में अटल के बाद की पीढ़ी में उनके जैसी स्वीकार्यता किसी की हो सकती है तो नीतीश की। यहाँ तक नीतीश और मोदी लगभग बराबर पर चल रहे थे कि अचानक तमाम अटकलों को खारिज करते हुए नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया और फिर तो उनकी ‘सुनामी’ ही चल पड़ी। हाँ, सुनामी ही कहना ठीक होगा क्योंकि मोदी जिस रफ्तार से आए और छाए वो लगभग कल्पनातीत था।

राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उदय और उनके साथ नीतीश के ‘अहं’ के टकराव की परिणति दो रूपों में हुई। पहली तो ये कि एनडीए से वे अलग हुए और बिहार में उनकी अकेले की सरकार बनी और दूसरी 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी भयानक हार हुई और अपनी ‘झेंप’ छिपाने के लिए उन्हें मांझी का चेहरा आगे करना पड़ा। यही वो बिन्दु है जहाँ से बिहार की राजनीति में एक के बाद एक कई परिवर्तन हुए।

लोकसभा चुनाव ने जहाँ बिहार में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी होने का मौका दे दिया, वहीं रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा के लिए इसने ‘संजीवनी’ का काम किया। वे अचानक नीतीश को ‘ललकारने’ की स्थिति में आ गए। यही नहीं, लोकसभा चुनाव में जो मांझी अपने क्षेत्र तक में ठीक से मुकाबले में नहीं थे, वे नीतीश की ‘अचानक’ हुई ‘कृपा’ से मुख्यमंत्री बन बैठे और कुछ दिनों तक ‘औपचारिक’ अहसान मानने के बाद उन्हें ही आँख दिखाने लगे। ये सचमुच बुरा वक्त था नीतीश के लिए। इतना बुरा कि उन्हें अन्तत: उसी लालू के पास जाना पड़ा जिनके विरोध में कभी उन्होंने अपनी समता पार्टी खड़ी की थी। बाद में जेडीयू के बनने और एनडीए से अलग होने तक उनकी पूरी राजनीति इसी ‘लालूविरोध’ पर टिकी रही। अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए उसी लालू से हाथ मिलाना विकल्प रह गया था उनके लिए। खैर, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा के उपचुनाव में इसका उन्हें फायदा भी मिला और नीतीश-लालू फिर से ‘छोटे भाई-बड़े भाई’ की भूमिका में आ गए।

नीतीश अब लालू की ‘शरण’ में थे। बदले परिदृश्य में नीतीश के लालू की ‘गोद’ में बैठने की बात हो रही थी और लालू मीडिया में और मंच से ‘लाड़’ जताते हुए ये बोलने से नहीं चूक रहे थे कि गोद में छोटा भाई नहीं बैठेगा को कौन बैठेगा। जरूरत लालू की भी कम नहीं थी। ‘जहर’ पीकर भी तेजप्रताप और तेजस्वी का ‘कैरियर’ बनाने के लिए उन्हें नीतीश को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकारना ही पड़ा। लेकिन जब आप सत्ता में रहते हुए किसी की मदद लेने को हाथ बढ़ाते हैं तो आपका हाथ अपने आप नीचे हो जाता है। यही नीतीश के साथ हुआ।

जो लालू और नीतीश को करीब से नहीं जानते हैं, वे भी वक्त की इस करवट को इन दोनों के चेहरे पर देख सकते हैं और फर्क समझ सकते हैं। नीतीश के चेहरे से जहाँ उनके बैकफुट पर होने का भाव झाँकता है वहीं लालू के चेहरे की पुरानी चमक बहुत हद तक लौट गई दिखती है। ‘स्वाभिमान रैली’ ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। वहाँ ना केवल लालू अन्तिम वक्ता थे बल्कि मौजूद भीड़ ने भी बता दिया कि ‘असर’ जो भी हो नीतीश का लेकिन ‘जादू’ तो लालू का ही चलता है बिहार में। वैसे भी तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद लालू का वोटबैंक उनके लिए जितना समर्पित है, उतना नीतीश का बनाया वोटबैंक नीतीश के लिए नहीं। यहाँ तक कि जिन महादलितों को सामाजिक और राजनीतिक ‘सुविधा’ देकर ‘अपना’ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी नीतीश ने, उनके नेता भी अब मांझी बन बैठे हैं।

नरेन्द्र मोदी एक नहीं चार बार आए बिहार और ‘रोजाना जंगलराज का डर’ दिखा गए और साथ में गुजरात का संबंध ‘यदुवंश’ से जोड़ गए, सुशील मोदी समेत बिहार भाजपा के तमाम नेता अगर नीतीश को घेर रहे हैं तो सबसे अधिक लालू से हाथ मिलाने को ही लेकर, सोनिया बिहार आती हैं और नीतीश के ‘नेतृत्व’ के साथ लालू के ‘सराहनीय योगदान’ को चिह्नित करना नहीं भूलतीं, पप्पू को अगर राजनीतिक विरासत चाहिए तो लालू की ही, बीजेपी अगर पप्पू की पीठ पर हाथ रखती है तो लालू का ही वोट काटने, ‘मुलायम’ को ‘कठोर’ बनाया जाता है तो समधी लालू से दूर करने, रामकृपाल यादव मंत्री और भूपेन्द्र यादव बिहार भाजपा के प्रभारी बनते हैं तो लालू को ही कमजोर करने, पासवान को ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहे जाने की खीझ है तो लालू से ही, एनडीए में मनमाफिक सीटें ना मिलने पर मांझी के लिए जिनसे हाथ मिलाने की चर्चा होती है तो वो भी लालू ही हैं – क्या अब भी इसमें कोई संदेह है कि 1990 से लेकर अब तक यानि पच्चीस साल बाद भी लालू ही बिहार की राजनीति की धुरी हैं..?

लालू का ठेठ बिहारी अंदाज उन्हें औरों से अलग करता है। साधारण तबके से आनेवाला बिहारी खुद को उनके अधिक करीब पाता है। वे बिहार में पिछड़ों को राजनीति की मुख्यधारा में लाए इस सच्चाई को नकारना मुश्किल है। ये भूलना भी मुश्किल है कि रेल मंत्रालय को ज्यादातर मंत्री भले ही बिहार से मिले हों लेकिन उस रूप में भी किसी ने अलग छाप छोड़ी है तो वो लालू ही हैं। तमाम विसंगतियों और विरोधाभासों के बावजूद लालू की प्रासंगिकता बनी हुई है। रिक्शे पर जाकर और हाथी पर आकर वो ‘जेलयात्रा’ को भी महिमामंडित कर देंगे और आप ये पूछना भूल जाएंगे उनसे कि आखिर जेल गए क्यों थे। वैसे भी, इतिहास गवाह है कि बिहार की जनता ‘भूलने’ की ‘भूल’ करती रही है और इस बार भी वो कुछ लालू का भूलेगी, कुछ नीतीश का तो कुछ नरेन्द्र मोदी का। और अन्त में जो परिणाम आएगा उसे भी वो पाँच साल तक झेलेगी सब कुछ भूलकर।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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एनडीए माइनस मांझी यानि महागठबंधन माइनस लालू यानि बिहार में मुकाबला चौतरफा

जी हाँ, ऊपर का समीकरण चौंकाने वाला जरूर है लेकिन एनडीए में पासवान और मांझी के बीच चल रही ‘दलितों का नेता कौन’ की लड़ाई और महागठबंधन में मुलायम के ‘आफ्टर इफेक्ट’ से ऐसा कुछ हो जाय तो आश्चर्य की बात नहीं। कल तक एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा दिखने वाले मुकाबले के अब चौतरफा होने के पूरे आसार हैं। चलिए समझने की कोशिश करते हैं कैसे।

शुरू करते हैं रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी की ‘लड़ाई’ से जिसमें संभावित चौतरफा मुकाबले के ‘बीज’ छिपे हैं। कल तक दलित नेता के तौर पर पासवान बिहार के इकलौते चेहरे थे। रमई राम, श्याम रजक टाईप लोगों का कद उनके सामने बहुत छोटा था। लेकिन इस बीच नीतीश कुमार ने मांझी को मुख्यमंत्री बनाने की ‘ऐतिहासिक भूल’ की और मांझी इस मौके को भुना ले गए। एक मुख्यमंत्री के तौर पर अपने संक्षिप्त कार्यकाल में मांझी ने महादलितों में इतनी पैठ तो बना ही ली कि पासवान को चुनौती दे दें। हुआ यों कि पासवान ने कह दिया कि एनडीए में मांझी ‘ट्रायल’ पर हैं। साथ में ये भी कि वे यानि पासवान राष्ट्रीय स्तर के एकमात्र दलित नेता हैं जबकि मांझी से लेकर मायावती तक राज्यस्तरीय नेता हैं। बस फिर क्या था मांझी ने तो उनके दलितों का नेता होने पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया। उनके हिसाब से पासवान केवल परिवार की राजनीति करते हैं, उन्होंने दलितों-पिछड़ों के लिए किया ही क्या है। मांझी टिकट बंटवारे में पासवान से ज्यादा नहीं तो बराबर का हिस्सा तो चाहते ही हैं।

इनके ‘मैं बड़ा तो मैं बड़ा’ की तनातनी में पसीने छूट रहे हैं भाजपा नेतृत्व के। पासवान फिलहाल ‘स्थिर’ हैं क्योंकि एक तो वो एनडीए में मांझी से पहले आए और उम्मीद से ज्यादा ‘पाए’ हैं, दूसरे उन्हें इतना  भरोसा है कि उनका सीट शेयर मांझी से ज्यादा जरूर होगा। हालांकि मांझी ये जताने से बिल्कुल नहीं चूक रहे कि पासवान के पास कोई विधायक नहीं है जबकि उनके साथ जेडीयू से आया धड़ा है। यही नहीं, गहरे जाकर देखें तो इस पेंच के भीतर एक पेंच और है। मांझी के साथ आए विधायकों में कुछ वैसे विधायक भी हैं जो 2005 में पासवान की पार्टी से जीते थे और बाद में नीतीश के पाले में चले गए थे। अब पासवान कह रहे हैं कि इन विधायकों को टिकट ना मिले जबकि मांझी उनके टिकट के लिए अड़े हुए हैं। परेशानी का एक सबब ये भी है कि पासवान और मांझी दोनों की निगाह ‘सुरक्षित’ सीटों पर है और यहाँ भी दोनों को संतुष्ट कर पाना एनडीए के लिए टेढ़ी खीर है। इस उठापटक को देख मांझी लालू के साथ भी अपनी सम्भावना पर ‘काम’ कर रहे हैं।

देखा जाय तो ये धुआँ बिना आग के नहीं है। लालू पहले भी मांझी को बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में महागठबंधन के साथ आने का निमंत्रण दे चुके हैं। लेकिन वास्तविकता ये है कि नीतीश के रहते ऐसा सम्भव नहीं। अब मुलायम के अलग होने के बाद महागठबंधन का भीतरी ‘असंतोष’ बाहर आने लगा है। सीटों को लेकर ‘तनाव’ वहाँ भी जबरदस्त है। ऐसे में मांझी नीतीश-लालू की दोस्ती टूटने और लालू के साथ अपना समीकरण जोड़ने का विकल्प क्यों ना देखें।

बहरहाल, बनते-बिगड़ते और बिगड़ने के बाद बनते समीकरणों को एक जगह करके देखें तो बिहार चुनाव में मुकाबला चौतरफा हो सकता है और ऐसे में वे चार कोण कुछ इस तरह होंगे – 1. भाजपा की अगुआई में रामविलास पासवान की लोजपा और उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा, 2. नीतीश की जेडीयू और कांग्रेस, 3. लालू की राजद और मांझी की पार्टी ‘हम’ तथा 4. सपा के साथ एनसीपी, वामदल और पप्पू की जनअधिकार पार्टी।

गौर से देखें तो ऐसा होने पर कमोबेश लाभ में भाजपा ही होगी क्योंकि उसे जो भी नुकसान होगा वो मांझी की अनुपस्थिति में महादलित वोटों का होगा लेकिन उधर भाजपा विरोधी मत तीन अलग-अलग दिशाओं में बंट जाएंगे। इतना होने के बाद भी ये तय जान पड़ता है कि जो मुकाबला चुनाव से पहले दोतरफा नहीं हो सकेगा वो चुनाव के बाद घूम-फिरकर दोतरफा हो ही जाएगा क्योंकि 122 के जादुई आंकड़े तक पहुँचने के लिए इन चार कोणों में दो कोणों को और उन्हें रोकने के लिए शेष दो कोणों को एक होना ही होगा। जय हो राजनीति..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘साइकिल’ ढोएगी ‘कमल’, ‘किराया’ होगा डबल..!

राजनीति के रंग भी कितने निराले हैं..! महागठबंधन से अलग होना एक बात थी, अब तो मुलायम बोलने भी लगे हैं बीजेपी की तरह। कल तक महागठबंधन के मुखिया कहलाने वाले ‘मुलायम’ की इतनी ‘कठोर’ करवट ने एक बार फिर ये बता दिया कि राजनीति की ‘माया’ से बड़े-से-बड़े ‘संत’ भी डोल जाते हैं। इस समाजवादी ‘संत’ के यू टर्न से ऐसा ही हुआ जान पड़ता है।

कल तक बीजेपी को रोकने के लिए जनता परिवार की एकता को वक्त की मांग बताने वाले मुलायम आज नीतीश की ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर सवाल उठा रहे हैं। आज उन्हें ये कहने में जरा भी हिचक नहीं कि सालों तक बीजेपी के साथ सरकार चलाने वाले नीतीश काहे के सेक्युलर। नीतीश क्या हैं और क्या नहीं, इस पर हमारी कोई टिप्पणी नहीं, लेकिन नेताजी से ये ‘अलौकिक’ सच पहले छिपा क्यों था..?

सपा के उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद किरणमय नंदा के अनुसार महागठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने के कारण सपा ने अलग होने का फैसला किया। वो कहते हैं कि सपा प्रमुख ने बीजेपी को रोकने के लिए ‘केवल’ जनता परिवार के विलय की बात की थी और साथ में ये भी कि अब सपा अकेले दम रोकेगी बीजेपी को। यहाँ तक कि रोकने की लिस्ट में अब नीतीश और ‘समधी’ लालू का का नाम भी जुड़ गया है। ये जानते हुए भी कि बीजेपी को रोकने के लिए महागठबंधन में कांग्रेस का होना निहायत जरूरी था और ये भी कि सपा की अपनी कोई हैसियत नहीं है बिहार में, बचकानी बयानबाजी की जा रही है।

और तो और, सपा ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है जबकि उसे पता है कि कहीं कुछ सौ तो कहीं कुछ हजार, वोट काटने के अलावा उसकी कोई भूमिका नहीं होने जा रही है इस चुनाव में। जिस भाजपा को तथाकथित तौर पर रोकने के लिए सपा ऐसा करने जा रही है, उसका एक भी वोट काटने की स्थिति में नहीं है  वो। सपा जो भी नुकसान करेगी, महागठबंधन का करेगी।

खैर, अब ये ‘ओपेन सीक्रेट’ है कि ये सारे गुल मोदी-मुलायम और शाह-रामगोपाल की मुलाकात के बाद खिल रहे हैं और ‘साइकिल’ से ‘कमल’ को ढोने का ‘किराया’ भी तय हुआ है..!

पुनश्च:

सभी 243 सीटों पर लड़ने की घोषणा के दौरान सपा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व विधायक रामचंद्र सिंह यादव ने एक बात बड़े मजे की कही कि बिहार में एक ओर ‘सम्प्रदायवाद’ है और दूसरी ओर ‘धोखावाद’। पार्टी ने इन दोनों से मुकाबले का निर्णय ले लिया है। अब उनसे कौन पूछे कि महागठबंधन से अलग होकर और भाजपा का पथ ‘प्रशस्त’ कर कौन-सा नया ‘वाद’ पैदा कर दिया उनकी पार्टी ने..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जीतना है बिहार, भाजपा ‘यादव’ की ताजपोशी को तैयार..!

दिल्ली से सबक लेकर भाजपा बिहार में केवल नरेन्द्र मोदी का चेहरा आगे कर चुनाव की तैयारी में जुटी थी। एक ‘अनार’ के लिए भाजपा में इतने बीमार हैं कि पार्टी के लिए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सचमुच मुश्किल था। उधर इस मामले को महागठबंधन ने समय रहते समझदारी से सुलझा लिया। वहाँ नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य चेहरा था भी। आज जबकि बाकी समीकरण कमोबेश भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं, केवल यही उसके लिए कमजोर नस साबित हो रहा है। महागठबंधन के नेता हुंकार रहे हैं कि दम है तो भाजपा किसी को आगे करे क्योंकि उन्हें पता है कि भाजपा के लिए ऐसा करना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा होगा। भाजपा ने जरा भी चूक की नहीं कि डर है कि कहीं ‘दिल्ली’ ना दुहरा जाय।

प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में ताबड़तोड़ रैलियां कीं, दोनों हाथों से पैकेज लुटाया, बाकी नेताओं ने भी दिल्ली-पटना एक कर दिया लेकिन इसी एक ‘कमजोरी’ से भाजपा बैकफुट पर चली जाती है। इसका एक नजारा भागलपुर में दिखा जब मोदी की चौथी परिवर्तन रैली में उनके बाद की सारी तालियां जीतन राम मांझी बटोर ले गए। तब उन्होंने जरूर इस बात को शिद्दत से महसूस किया होगा कि इसका कारण भाजपा के पास बिहार में किसी एक ‘चेहरे’ का ना होना है।

बहरहाल, मोदी और उनके रणनीतिकार लगता है इसका तोड़ निकालने के बहुत करीब पहुँच चुके हैं। भाजपा की कोशिश यहाँ एक तीर से दो निशाना साधने की है। पार्टी चाहती है कि ‘चेहरा’ ऐसा हो कि भाजपा का वोटबैंक बिखरे नहीं और महागठबंधन के वोटबैंक में सेंध लग जाय सो अलग।

चुनाव के लिहाज से बिहार के जातिगत समीकरणों को देखते हुए भाजपा की मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे की तलाश किसी ‘यादव’ पर जाकर खत्म होती दिखती है। इसका सबसे बड़ा कारण है लालू का ‘माय’ समीकरण। नीतीश के वोटबैंक का तोड़ उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी के रूप में भाजपा के पास है। मुस्लिम का वोट उसे मिलना नहीं है। रह गए यादव जिनकी तादाद बिहार में 14 प्रतिशत है और जो तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद बहुतायत में लालू के पीछे लामबंद हैं इस बार। इस बड़े वोटबैंक में सेंध लगाए बिना भाजपा आश्वस्त नहीं हो सकती है।

हालांकि भाजपा ने यादवों को तोड़ने की तैयारी पहले ही शुरू कर दी थी। धर्मेन्द्र प्रधान की जगह भूपेन्द्र यादव को बिहार का प्रभारी बनाना, लालू के ‘हनुमान’ रामकृपाल को मंत्रीमंडल में लेना और स्वयं मोदी का बिहार आकर गुजरात का संबंध ‘यदुवंश’ से जोड़ना इसके उदाहरण हैं। पप्पू की पीठ पर हाथ रखना भी भाजपा की इसी कोशिश का हिस्सा है। इतना सब कुछ कर लेने के बाद शायद अब भाजपा आखिरी बचा ‘ब्रह्मास्त्र’ भी छोड़ देने का मन बना रही है। जी हाँ, चौंकिए नहीं। बहुत सम्भव है कि पार्टी किसी ‘यादव’ को अपना ‘चेहरा’ बनाकर पेश करे।

वैसे अगर जातिगत समीकरणों को किनारे कर दें तो सुशील कुमार मोदी शायद मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी की पहली और स्वाभाविक पसंद होते। केन्द्र में पैठ रखनेवाले रविशंकर प्रसाद, शालीनता से समीकरण बिठानेवाले राधामोहन सिंह, तेजतर्रार महासचिव राजीवप्रताप रूडी, बिहार में पार्टी के मुस्लिम चेहरे शाहनवाज हुसैन और बिहार भाजपा के अध्यक्ष मंगल पांडेय का भी अपने-अपने हिसाब से दावा है। रेस में सीपी ठाकुर, अश्विनी चौबे, गिरिराज सिंह और प्रेम कुमार भी हैं लेकिन बहुत पीछे।

यादव चेहरे की बात आती है तो सामने सबसे पहले नंदकिशोर यादव दिखते हैं जो सदन में भाजपा के नेता हैं। पूर्व में मंत्री, नेता विरोधी दल और बिहार में पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी वरिष्ठता पर कोई संदेह नहीं लेकिन सुशील कुमार मोदी खेमे को वो शायद ही रास आएं। दूसरा नाम रामकृपाल यादव का है। लेकिन पार्टी में पैर रखते ही सीधा केन्द्र में उनके मंत्री बन जाने को ही कई लोग पचा नहीं पाए हैं। ऐसे में उनके विरोध में सभी ‘खांटी’ भाजपाई एकजुट हो जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए भाजपा ऐसे चेहरे को लाना चाहेगी जो किसी ‘खास’ खेमे का ना हो, पार्टी में पुराना हो, छवि अच्छी हो, ‘केन्द्र’ के निर्देश पर काम करे, ज्यादा महत्वाकांक्षी ना हो और यादव तो हो ही। ऐसा एक नाम हुकुमदेव नारायण यादव का हो सकता है जो अभी मधुबनी से सांसद हैं और केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं।

बहरहाल, भाजपा किस चेहरे को आगे करती है, ये कहना  भले ही मुश्किल हो, ताजपोशी किसी ‘यादव’ की होगी इसकी सम्भावना प्रबल है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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