राष्ट्रकवि दिनकर का मधेपुरा से गहरा लगाव- डॉ.मधेपुरी

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं में सत्ता को हिलाने की ताकत है। देश की राजनीति जब भी लड़खड़ाई तो दिनकर ने अपनी साहित्यिक क्षमता के माध्यम से उसे ऊर्जा प्रदान किया है। गांधी के चरखे को गलाकर तकली बनाने की सलाह देनेवाले राष्ट्रकवि दिनकर राजनीति और साहित्य के संबंधों के बीच हमेशा साहित्य के ही पक्ष में खड़े दिखे हैं।  उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से ताजिंदगी राष्ट्रीय चेतना का सृजन किया है।

उक्त बातें साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने 23 सितम्बर (बुधवार) को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 112वीं जयंती के मौके पर कोरोना के चलते निज निवास ‘वृंदावन’ में वर्चुअल संगोष्ठि को संबोधित करते हुए कही।

कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सचिव डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने यह भी बताया कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का मधेपुरा से गहरा लगाव रहा है। आरंभिक दिनों में दिनकर जी जब सहरसा के समीप बरियाही सब-रजिस्ट्री ऑफिस के रजिस्ट्रार हुआ करते थे तो मधेपुरा के अपने रजिस्ट्रार मित्र से प्रायः रविवार को मिलने आ जाते। यदा-कदा रात्रि भोजन और विश्राम भी किया करते।

कालांतर में पूर्णिया में रहकर “रश्मिरथी” की रचना करने के दरमियान टीपी कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य रतन चंद से भी मिलने आया करते, क्योंकि पटना कालेज में जब रतन चंद फोर्थ ईयर में पढ़ते थे तो दिनकर जी थर्ड ईयर में। दिनकर जी रतन बाबू को ताजिंदगी बड़े भाई ही कह कर पुकारते रहे।

अध्यक्षता कर रहे कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन मधेपुरा के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ जब दिनकर जी के गृह प्रखंड बरौनी में कल्याण विभाग में कार्यरत थे तो दिनकर जी से उनका ऐसा साहित्यिक संबंध बन गया था कि गांव के एक गरीब लोग को खाद्यान्न उपलब्ध कराने हेतु दिनकर जी ने उन्हें पत्र भी लिखा था।

विषय प्रवेश करते हुए अध्यक्ष शलभ ने कहा कि दिनकर उत्तर छायावाद के कवियों की पहली पीढ़ी के थे और उनकी कविता में ओज, विद्रोह, आक्रोश व क्रांति की पुकार है। दिनकर सौम्य व मृदुभाषी थे, परंतु देशहित में अपना विचार हमेशा बेबाकी से रखते रहे।

संस्थान के संरक्षक व पूर्व सांसद डॉ.आरके यादव रवि ने कहा कि ‘उर्वशी’ को छोड़कर दिनकर की अधिकतर रचनाएं वीर रस से ओत-प्रोत है। ‘भूषण’ के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। प्रो.मणि भूषण वर्मा ने दिनकर की ‘हिमालय’ शीर्षक कविता का पाठ किया। कवि डॉ.अरविंद श्रीवास्तव ने अपने टेलीकास्ट में कहा कि दिनकर की रचनाएं संस्कृति के  उन्नयन का गौरवशाली इतिहास है।

सम्बंधित खबरें