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स्मृतिजी, आपके यूजीसी ने ‘मरहम’ लगाते-लगाते बहुत देर कर दी..!

एमफिल या पीएचडी में 11 जुलाई 2009 से पहले रजिस्ट्रेशन कराने वाले उम्मीदवारों को अब सहायक प्रोफेसर पद के आवेदन में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) पास करने से छूट दी जाएगी। हालांकि इसके लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इस फैसले से उन हजारों पीएचडी डिग्री धारकों को लाभ होगा जो यूजीसी के 2009 के दिशानिर्देशों से प्रभावित हुए थे। इसके तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर पद के आवेदन के लिए नेट और पीएचडी न्यूनतम योग्यता निर्धारित की गई थी।

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि 11 जुलाई 2009 से पूर्व एमफिल या पीएचडी में रजिस्ट्रेशन कराने वाले उम्मीदवारों के लिए शिक्षक नियुक्ति के पुराने नियम ही लागू होंगे। उन्हें नेट या समकक्ष राज्य की परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी। विश्वविद्यालय इसके बगैर भी सहायक प्रोफेसर नियुक्त कर सकेंगे।

सरकार के इस निर्णय से हजारों उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिलेगी लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें भी लगाई गई हैं। इन शर्तों के अनुसार सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए पीएचडी डिग्री रेगुलर मोड में मिली होनी चाहिए। थीसिस के मूल्यांकन में दो बाहरी परीक्षकों को शामिल होना चाहिए। पीएचडी के लिए ओपन वायवा हुआ होना चाहिए। उम्मीदवार के दो शोधपत्र प्रस्तुत होने चाहिएं जिनमें से एक किसी जर्नल में प्रकाशित हो। इसके अलावा उम्मीदवार को कम से कम दो सेमीनार या कांफ्रेंस में प्रस्तुति (प्रेजेंटेशन) देने का अनुभव होना चाहिए। यही नहीं, उपरोक्त उपलब्धियां तभी मान्य होंगी जब कुलपति, प्रतिकुलपति या डीन उन्हें अभिप्रमाणित करेंगे।

यूजीसी के चेयरमैन वेद प्रकाश ने माना कि उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की बेहद कमी है। यूजीसी के इस नए कदम से शैक्षिक पदों पर काफी संख्या में उम्मीदवारों को आवेदन का मौका मिलेगा। निश्चित तौर पर यूजीसी के इस निर्णय के लिए भारत की शिक्षा मंत्री और यूजीसी के चेयरमैन बधाई के पात्र हैं लेकिन क्या ये एक तरीके का भूल-सुधार नहीं है..? जुलाई 2009 के दिशा-निर्देशों में अगर कोई कमी नहीं रही होती तो क्या आज का ये निर्णय लिया जाता..? और सबसे बड़ा सवाल ये कि जो उम्मीदवार जुलाई 2009 के विवादास्पद दिशा-निर्देशों के कारण साक्षात्कार देने या नियुक्ति पाने से वंचित रह गए उनके भविष्य का क्या होगा..?

ताजा उदाहरण बिहार का ही लें। वर्षों के इन्तजार के बाद यहाँ सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति-प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन हजारों उम्मीदवार जुलाई 2009 के अपरिपक्व और अव्यावहारिक दिशा-निर्देशों की बलि चढ़ गए। इन दिशा-निर्देशों में ये सोचा ही नहीं गया कि उन छात्रों का क्या होगा जो देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार ही एमफिल या पीएचडी की डिग्री ले चुके थे..? इस तरह के दिशा-निर्देश आगे के उम्मीदवारों के लिए तो हो सकते थे लेकिन पूर्व के उम्मीदवारों को इनके दायरे में लाना समझ से परे था। सच तो ये है कि यूजीसी को आज किया जा रहा भूल-सुधार और पहले करना चाहिए था। खैर, देर से ही सही, अब जब ये सुधार किया ही जा रहा है तो क्या वैसे तमाम अभ्यर्थियों के लिए भावी नियुक्तियों में कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए..?

मधेपुरा’ अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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संयुक्त राष्ट्र पहली बार मनाएगा ‘भारतरत्न’ अंबेडकर की जयंती

डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिनका जीवन ही दलित अधिकारों के लिए संघर्ष का पर्याय है और जो विश्व के किसी भी मंच से सर्वोच्च सम्मान के अधिकारी हैं, संयुक्त राष्ट्र ने उनके ‘निर्वाण’ (निधन) के 60 वर्षों के बाद उनकी जयंती मनाने का फैसला किया है। इस वर्ष बाबा साहब की 125वीं जयंती है और इस तरह देर से ही सही लेकिन पहली बार उनकी जयंती मनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने बड़ा यादगार मौका चुना है।

बता दें कि संयुक्त राष्ट्र बाबा साहब की जयंती से एक दिन पहले 13 अप्रैल को अपने मुख्यालय में उनकी जयंती मनाएगा। इस अवसर पर “सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए असमानता से मुकाबला” विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैय्यद अकबरुद्दीन ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी। कार्यक्रम का आयोजन संयुक्त राष्ट्र में भारत का स्थायी मिशन ‘सरोज फाउंडेशन’ और ‘फाउंडेशन फॉर ह्यूमन होराइजन’ के साथ मिलकर करेगा।

इस मौके पर भारतीय मिशन द्वारा जारी किए गए एक नोट में कहा गया कि भारत अपने ‘राष्ट्रीय प्रेरणास्रोत’ की 125वीं जयंती मना रहा है जो करोड़ों भारतीयों और दुनिया भर में समानता एवं सामाजिक न्याय के समर्थकों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। इसमें आगे कहा गया, “हालांकि यह एक संयोग है, हम गरीबी, भुखमरी और सामाजिक-आर्थिक असमानता के 2030 तक खात्मे के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाए गए सतत विकास लक्ष्यों में उपयुक्त रूप से बाबा साहब की उज्जवल दृष्टि के निशान देख सकते हैं।”

भारतीय संविधान के रचयिता बाबा साहब अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ था और 1956 में वे ‘निर्वाण’ को प्राप्त हुए थे। दलितों अधिकारों के इस सबसे बड़े ‘प्रवक्ता’ को 1990 में मरणोपरान्त ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया था।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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50 साल बाद प्रोफेसर बनकर लौटेंगे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

भारतीय राजनीति में विद्वता, शालीनता और सौम्यता के चंद प्रतीकों में एक पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 50 साल बाद अपने पुराने संस्थान पंजाब विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में वापसी कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार इस विश्वविद्यालय में 50 साल पहले अपना आखिरी लेक्चर देने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ने यहाँ के जवाहरलाल नेहरू चेयर के लिए प्रोफेसर बनने की पेशकश स्वीकार कर ली है।

पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अरुण कुमार ग्रोवर ने बताया कि मनमोहन सिंह यहाँ आने और छात्रों से होने वाले संवाद को लेकर बहुत खुश हैं। चंडीगढ़ यात्रा के दौरान छात्रों को लेक्चर देने के साथ-साथ वे विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी उन्हें पढाएंगे। सारे जरूरी इंतजाम कर लिए गए हैं।

बता दें कि मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय से 1954 में अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रैजुएशन किया था। तीन साल बाद 1957 में वे यहाँ सीनियर लेक्चरर होकर आए और बाद में उन्होंने प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी पढ़ाया। मनमोहन सिंह ने पीएच.डी. की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से तो डी. फिल. की उपाधि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से ली थी।

डॉ. सिंह का इससे आगे का सफर अब इतिहास है। 1971 में उन्हें भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया गया। इसके तुरन्त बाद 1972 में उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य सलाहकार बनाया गया। बाद के वर्षों में वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष रहे। इसके बाद वे भारत के वित्त मंत्री और फिर प्रधानमंत्री हुए। भारत के आर्थिक सुधारों के इस प्रणेता के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि जवाहरलाल नेहरू के बाद वे पहले ऐसे प्रधानमंत्री रहे जिसे पाँच वर्षों का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला।

प्रोफेसर के रूप में अपनी पारी फिर से शुरू कर रहे डॉ. मनमोहन सिंह को हमारी शुभकामनाएं। ये निर्णय लेकर उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की याद ताजा कर दी। सच है, भारत की मिट्टी ऐसे सपूतों से कभी खाली नहीं होगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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36 साल की हुई भाजपा, ‘मोदीयुग’ में क्या है आगे का एजेंडा..?

आज भाजपा की स्थापना के 36 साल पूरे हो गए। स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जहाँ ट्वीट के जरिए कार्यकर्ताओं को बधाई दी और विभिन्न राज्यों में पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारों की जमकर तारीफ की वहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने राष्ट्रवाद को भाजपा की पहचान बताया और स्पष्ट किया कि पार्टी फिलहाल राष्ट्रवाद के एजेंडे पर ही आगे बढ़ेगी।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भावुक ट्वीट में कहा कि “भाजपा के स्थापना दिवस पर मैं पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ताओं को सलाम करता हूँ जिन्होंने हमेशा भाजपा की सेवा उत्साह और समर्पण के साथ की।… भारत के लिए अपने प्रेम और देश को प्रगति की नई ऊँचाइयों तक ले जाने की प्रतिबद्धता से कार्यकर्ताओं की पीढ़ियों ने अपना जीवन पार्टी के लिए समर्पित कर दिया।”

भाजपाशासित राज्यों की सरकारों के काम को ‘शानदार’ बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पार्टी को अपने मेहनती मुख्यमंत्रियों पर गर्व है। उन्होंने कहा कि जहाँ भी भाजपा ने सरकार बनाई है वहाँ शानदार ढंग से काम किया है और लोगों की अभूतपूर्व सेवा की है। यही कारण है कि कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से अरुणाचल प्रदेश तक लोगों ने भाजपा में विश्वास व्यक्त किया है और पार्टी को अपने सपनों को पूरा करने वाली पार्टी के रूप में देखा है।

उधर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने राष्ट्रवाद की अलख जगाने का आह्वान किया और अगले 25 वर्षों में पंचायत से संसद तक पार्टी की जीत सुनिश्चित करने की अपील की। कार्यकर्ताओं की शहादत का हवाला देते हुए शाह ने एक कार्यक्रम में कहा कि भाजपा की पहचान राष्ट्रवादी पार्टी की है। हमें अपनी इस पहचान को और मजबूत करना है। ‘भारत माता की जय’ पर छिड़ी बहस के संदर्भ में उन्होंने साफ कर दिया कि पार्टी इस मुद्दे को भटकने नहीं देगी। पार्टी अध्यक्ष ने अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि आक्रोश के साथ भारत माता की जय के नारे लगाएं।

प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के संदेशों को एक जगह कर देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि ‘मोदीयुग’ में भाजपा ‘विकास’ और ‘राष्ट्रवाद’ पर स्वयं को केन्द्रित करना चाहती है। विकास के साथ राष्ट्रवाद की ‘खुराक’ दी जाय तो जातिवाद जैसे मुद्दे अस्तित्वविहीन हो जाते हैं। साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की बहस भी यहाँ आकर फीकी पड़ जाती है। जाहिर है कि इस आजमाए ‘नुस्खे’ को पार्टी आगे भी आजमाना चाहती है। हाँ, जरूरत के मुताबिक स्थानीय ‘जरूरतों’ का ध्यान रखना पड़ता है और पार्टी ने कश्मीर से लेकर असम तक ये काम बखूबी किया भी है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अब बिहार में नशा पर ‘पूर्ण विराम’… नीतीश के ‘साहस’ को सलाम..!

बिहार में देसी के बाद विदेशी शराब पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब राज्य में किसी भी तरह की शराब बेचना, रखना और पीना पूरी तरह गैरकानूनी होगा। बिहार सरकार ने आज राज्य में पूर्ण शराबबंदी का आदेश जारी कर दिया। यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। इस आदेश का उल्लंघन करने वालों पर नई उत्पाद नीति के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सरकार के इस साहसिक और सराहनीय निर्णय के बाद बिहार अब गुजरात, नगालैंड और मिजोरम के बाद देश का चौथा ‘ड्राई स्टेट’ होगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कैबिनेट की बैठक के बाद कहा कि शराबबंदी के लिए बिहार पूरे देश में उदाहरण बनेगा। उन्होंने शराबबंदी के लिए राज्य के नागरिकों की भागीदारी के लिए उनका धन्यवाद किया। खासकर राज्य की महिलाओं को उन्होंने तहेदिल से शुक्रिया कहा। उन्होंने कहा कि राज्य में शराबबंदी का बेहतर माहौल है और अब तक एक करोड़ पच्चीस लाख अस्सी हजार लीटर शराब को नष्ट किया जा चुका है।

बता दें कि एक अप्रैल से राज्य में देसी और मसालेदार शराब पर पाबंदी लगाई गई थी। सरकार के इस निर्णय का स्वागत तो हुआ लेकिन ये आवाज़ भी उठी कि विदेशी शराब पर मेहरबानी क्यों..? अब विदेशी शराब पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा कर नीतीश ने तमाम आलोचकों का मुँह बंद कर दिया है। अब बिहार में होटलों और बार में शराब नहीं मिलेगी। यह केवल मिलिट्री कैंटीन में उपलब्ध होगी।

पूर्ण शराबबंदी के दायरे में ताड़ी को भी रखा गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि ताड़ी में भी मादक गुण होते हैं। वह भी नशीला पेय है। उस पर भी प्रतिबंध लागू होगा। अब हाट-बाज़ार या सार्वजनिक जगहों पर ताड़ी की दुकानें नहीं खुलेंगी। ताड़ी की जगह नीरा को प्रोत्साहित किया जाएगा। नीरा स्वास्थ्यवर्द्धक होता है और उसमें मादकता भी नहीं होती।

पूर्ण शराबबंदी के फैसले का हर तबके के लोगों ने दिल खोलकर स्वागत किया है। राज्य में खुशी के साथ ही जैसे नई ‘ऊर्जा’ का प्रवाह भी हो रहा हो। ये ‘ऊर्जा’ उस विश्वास को बल मिलने से उपजी है जिसने नीतीश को पाँचवीं बार बिहार की बागडोर दिलाई थी। नीतीश ने बिहारवासियों के विश्वास की लाज तो रखी ही, उनकी अपेक्षाओं को नए पंख भी दे दिए। इन पंखों की उड़ान बिहार को नई पहचान दिलाएगी, इस उम्मीद के साथ नीतीश और उनकी टीम को हमारी शुभकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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शरद यादव की जगह नीतीश कुमार होंगे जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष..!

जेडीयू के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे। वैसे भी नीतीश पार्टी के ‘स्वाभाविक’ और ‘सर्वमान्य’ नेता हैं और अब जबकि वर्तमान अध्यक्ष शरद यादव ने चौथी बार अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने से ‘इनकार’ कर दिया है, इस बात की केवल औपचारिक घोषणा ही शेष है। सूत्रों की मानें तो स्वयं शरद ने नीतीश के नाम का प्रस्ताव दिया है। हालांकि सब कुछ ‘तय’ है फिर भी ‘औपचारिकतावश’ अध्यक्ष के चुनाव पर विचार करने के लिए दिल्ली में राष्ट्रीय परिषद की बैठक भी बुला ली गई है।

बता दें कि शरद यादव लगातार तीन बार से जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते आ रहे हैं जबकि पार्टी संविधान किसी को भी दो बार से अधिक अध्यक्ष बनने की इजाजत नहीं देता। पिछली बार उन्हें पार्टी के संविधान में संशोधन कर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन इस बार शरद ने अध्यक्ष बनने से यह कहते हुए मना कर दिया कि पार्टी संविधान में दूसरी बार संशोधन करना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि वे भले ही अध्यक्ष नहीं रहें, लेकिन पहले की तरह ही सक्रिय रहेंगे।

जेडीयू के निर्माण और उत्थान में शरद यादव की बड़ी भूमिका रही है। वे साफ-सुथरी छवि वाले, मुद्दों के लिए लड़ने वाले, सुलझे हुए और संघर्ष में यकीन रखने वाले नेता रहे हैं। मंडल कमीशन को धरातल पर उतारने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज बिहार के दिग्गज नेताओं – लालू, नीतीश या रामविलास – का कद जितना भी बड़ा हो, इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय राजनीति में इन सबके उभरने के बहुत पहले से शरद की पहचान राष्ट्रीय स्तर की रही है। लेकिन समय ने ‘करवट’ ली और अब पार्टी की कमान नीतीश के हाथों में जा रही है।

देखा जाय तो नीतीश लम्बे समय से राष्ट्रीय राजनीति में अपना ‘कद’ और ‘कैनवास’ बढ़ाने की कोशिश में लगे रहे हैं। ऐसे में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उनका सामने आना और भी अहम हो जाता है। देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश की ताजपोशी के बाद जेडीयू के ‘आन्तरिक समीकरण’ और ‘भाजपाविरोधी ध्रुवीकरण’ में क्या और कितना नया होगा..?

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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जब सीआरपीएफ के सात जवान एक कुत्ते के लिए शहीद हो गए..!

आज जहाँ एक इंसान दूसरे इंसान के काम नहीं आता, वहाँ सीआरपीएफ के सात जवान एक कुत्ते के लिए शहीद हो गए। चौंकिए नहीं, बिल्कुल सही पढ़ा है आपने। आज जबकि हमारी संवेदना भी लगभग यंत्रवत हो चुकी है, तब भी कुछ मिसालें सामने आती हैं और मरती मानवता को ‘ऑक्सीजन’ दे जाती हैं। घटना छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा की है जहाँ कल सीआरपीएफ के सात जवान नक्सलियों के बारूदी सुरंग का शिकार हो गए। ये जवान जिस कुत्ते की जान बचाने जा रहे थे वो पहले कई बार अपनी सूंघने की ताकत से जवानों की जान बचा चुका था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार ‘स्काउट’ नाम का यह कुत्ता सीआरपीएफ का स्निफर डॉग (सूंघने की क्षमता वाला कुत्ता) था। बेल्जियन मेलिनॉइस नस्ल का यह कुत्ता जंगल की परिस्थितियों में रहने की वजह से डिहाइड्रेशन का शिकार हो गया था। बीमार ‘स्काउट’ को ये जवान जानवरों के अस्पताल में भर्ती कराने के लिए जा रहे थे। बड़ी बात ये कि वे सभी जानते थे कि रास्ते में नक्सली उन पर हमला कर सकते हैं।  एहतियात के तौर पर वे सीआरपीएफ की गाड़ी की बजाय एक टेम्पो में और सफेद कपड़ों में निकले। पर नियति को कुछ और मंजूर था। नक्सली रास्ते में उनकी मौत का सामान पहले ही बिछा चुके थे। उन्होंने करीब 50 किलो विस्फोटक का इस्तेमाल कर बारूदी सुरंग से जवानों के टेम्पो को उड़ा दिया।

मानवीय संवेदना की कितनी अद्भुत मिसाल है ये। यही वो देश है जहाँ चलती बस में छह-छह दरिंदे ‘निर्भया’ का गैंगरेप करते हैं और नग्न अवस्था में उसे सड़क के किनारे फेंक देते हैं। पराकाष्ठा ये कि वो सड़क देश की राजधानी की होती है जहाँ सैकड़ों लोग उसे नग्न-निढ़ाल देखते हैं और चलते बनते हैं। ‘कृष्ण’ के इस देश की बेटी को दो गज कपड़ा भी घंटों बाद नसीब होता है और यही वो देश है जहाँ सात-सात जवान एक कुत्ते के लिए शहीद हो जाते हैं। ऐसा अनजाने में हुआ होता तो इसे ‘दुर्घटना’ कहा जाता। लेकिन अपने साथी कुत्ते के लिए उन सबने सब कुछ जानते हुए भी अपनी जान को जोखिम में डाला और अंतत: शहीद हो गए।

उन सात जवानों के नाम शायद ही हम याद रख पाएं लेकिन उनकी ये अनोखी शहादत सदियों तक मानवता के पथ से भटके हर राही को राह दिखाएगी। आइए, बहुत-बहुत आदर से उन शहीदों को सलाम करें और श्रद्धा से झुका दें अपने शीश।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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सबको जगाने वाली ‘बालिका वधु’ आखिर क्यों सो गई इस तरह..?

गुस्सैल दादी सास का मन अपने संस्कार से जीत लेने वाली, पति जगिया को जीना सिखाने वाली, पूरे गांव को जगाने वाली ‘बालिका वधु’ आनंदी यानि प्रत्युषा बनर्जी नहीं रही। जाना तो एक दिन सबको है लेकिन 25 साल की उम्र किसी भी लिहाज से जाने की नहीं होती। कोई दुर्घटना हो तो कहा जा सकता है कि उस पर किसी का वश नहीं लेकिन आत्महत्या करना और वो भी शोहरत की बुलंदियों पर… क्या सारे तर्क यहाँ बेकार नहीं हो जाते..? जी हाँ, दुख की ये खबर और भी दुखद हो गई है क्योंकि प्रत्युषा ने आज शाम आत्महत्या कर ली।

जानकारी के मुताबिक कलर्स चैनल के बहुचर्चित धारावाहिक ‘बालिका वधु’ में आनंदी का किरदार निभाने वाली प्रत्युषा ने आज शाम चार से पाँच बजे के बीच आत्महत्या की कोशिश की। उन्हें अपने घर में फांसी से लटका पाया गया। अत्यंत गंभीर हालत में उन्हें कोकिलाबेन अंबानी हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

हालाँकि अभी किसी नतीजे पर पहुँचना उचित नहीं लेकिन बताया जाता है कि एक दिन पहले प्रत्युषा की लड़ाई अपने ‘ब्वायफ्रेंड’ से हुई थी। उन्हें शक था कि उनके ‘ब्वायफ्रेंड’ का अफेयर किसी और से चल रहा है। बहरहाल, उनके एक पुराने ‘ब्वायफ्रेंड’ के हवाले से यह भी पता चला है कि एक बार किसी बात पर बहस के बाद प्रत्युषा ने पहले भी चलती कार से कूदकर जान देने की कोशिश की थी।

10 अगस्त 1991 को जमशेदपुर में जन्मी प्रत्युषा को प्रसिद्धि ‘बालिका वधु’ से मिली। इस धारावाहिक के बाद लाखों लोग उन्हें अपने घर की बहू-बेटी की तरह देखने के आदी हो गए थे। इस धारावाहिक के बाद प्रत्युषा ‘झलक दिखला जा 5’ और ‘बिग बॉस 7’ में भी नज़र आईं। आखिरी बार वो धारावाहिक ‘ससुराल सिमर का’ में दिखीं।

प्रत्युषा बनर्जी की आत्महत्या झकझोर देने वाली है। केवल इसलिए नहीं कि हमने एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री को असमय खो दिया बल्कि इसलिए भी कि ये घटना हमें चकाचौंध भरी दुनिया के ‘स्याह सच’ से रूबरू कराती है। ग्लैमर की दुनिया भले ही कम उम्र और कम समय में पैसा और प्रसिद्धि दे दे लेकिन ज्यादातर मौकों पर बदले में जिस तरह की जीवन-शैली में आपको ढलना पड़ता है वो कहीं ना कहीं वास्तविक खुशी और शान्ति छीन भी लेती है। अपवादों की बात छोड़ दें तो परवीन बॉबी से लेकर जिया खान और अब प्रत्युषा का ‘अन्त’ उसी जीवन-शैली की परिणति है। नहीं तो ‘बालिका वधु’ में हर मुसीबत का सामना मुस्करा कर करने वाली आनंदी का किरदार निभाने वाली प्रत्युषा इस तरह का कदम हरगिज ना उठातीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कोहली और उनके तीन ‘टी’ के रहते ‘कप’ हमारा है..!

कोहली ने भारत को एक और ‘विराट’ जीत दिलाई। इस एक अकेले खिलाड़ी के सामने कभी अजेय कहलाने वाली ऑस्ट्रेलिया की टीम असहाय नज़र आई। जिस महामुकाबले पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई थीं और हर गेंद, हर रन, हर विकेट पर लोगों की धड़कनें तेज हो रही थीं, उसमें टीम इंडिया के हाथों ऑस्ट्रेलिया को करारी हार का सामना करना पड़ा और एक बार फिर जीत के नायक बने टीम इंडिया सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज विराट कोहली। 27 साल के विराट आज टीम इंडिया की रीढ़ बन चुके हैं। अकले दम पर किसी भी मैच को विपक्षी टीम के जबड़े से छीन लेने का जुनून ही विराट को तमाम दिग्गज खिलाड़ियों के बीच भी अलग खड़ा कर देता है।

मोहाली में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ करो या मरो के मुकाबले में करोड़ों लोगों की उम्मीदों पर सोने जैसा खरा उतरने वाले विराट की पारी इतनी शानदार थी कि भारत तो भारत, ऑस्ट्रेलियाई मीडिया भी फिदा है उन पर। विराट कोहली ने भले ही ऑस्ट्रेलिया की टी-20 विश्वकप के सेमीफाइनल में पहुँचने की उम्मीद तोड़ दी हो लेकिन इस देश की मीडिया ने अकेले दम पर भारत को अंतिम चार में जगह दिलाने के लिए इस असाधारण बल्लेबाज की जमकर तारीफ की। ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच में भारत को 161 रन का लक्ष्य दिया था जो मोहाली की पिच को देखते हुए हरगिज छोटा ना था लेकिन 51 गेंदों पर विराट ने जिस तरह 82 रनों की पारी खेली उससे ये लक्ष्य भी जैसे बौना साबित हुआ और भारत बहुत शान से सेमीफाइनल में पहुँच गया।

भारत की इस ‘विराट’ जीत पर ‘द ऑस्ट्रेलियन’ के गिडोन हेग ने कहा कि “कोहली ने अपनी शानदार बल्लेबाजी से लक्ष्य का पीछा करने को बेहद सामान्य बना दिया।” ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ के क्रिस बैरेट ने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीवन स्मिथ का ये कहना कि यह ‘विराट शो’ था, बिल्कुल सही है। उन्होंने कहा कि टी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों की अब तक की सबसे महान पारियों में से एक खेल कर इस दिग्गज भारतीय बल्लेबाज ने अकेले दम पर ऑस्ट्रेलिया को 20 ओवर की विश्व चैम्पियनशिप से बाहर कर दिया। ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ ने यह भी कहा कि कोहली महान सचिन तेन्दुलकर के उत्तराधिकारी के रूप में उभरे हैं।

‘डेली टेलीग्राफ’ के बेन होर्ने ने विराट की पारी पर लिखा – “एक व्यक्ति ने जीत दिला दी।” होर्ने ने आगे कहा – “मुझे लगता है कि यह कहना सुरक्षित होगा कि फिलहाल विश्व क्रिकेट में विराट कोहली जैसी कोई प्रतिभा नहीं है।” इधर भारत में सुनील गावस्कर के भी यही उद्गार थे। कल के मैच के बाद उन्होंने कहा कि कोहली “मौजूदा दौर के सबसे उम्दा बैट्समैन” हैं। एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि “इस समय कोहली सीमित ओवरों के खेल में दुनिया के सबसे महान बल्लेबाज हैं। इसके बारे में कोई संदेह ही नहीं है, वह असाधारण और सबसे अलग हैं। मेरे जो थोड़े बाल बचे हैं, वे इस युवा जीनियस की पारी देखकर खड़े हो गए थे।“ इससे पूर्व पाकिस्तान पर भारत की धमाकेदार जीत के बाद इमरान खान ने कहा था कि विराट कोहली में ‘सार्वकालिक महान खिलाड़ी’ बनने की क्षमता है। वहीं पाकिस्तान के पूर्व बल्लेबाज मोहम्मद युसूफ के शब्दों में कोहली क्रिकेट ग्राउंड में विरोधी टीम के लिए किसी ‘बला’ से कम नहीं हैं।

बता दें कि मोहाली में बनाए गए नाबाद 82 रन के बाद इस साल अन्तर्राष्ट्रीय टी-20 में सबसे ज्यादा रन विराट के नाम हो गए हैं। यह पहला मौका है जब किसी बल्लेबाज ने एक सीजन में 500 रनों का आंकड़ा पार किया है। 2016 में 12 मैचों की 11 पारियों में 536 रन बनाकर विराट टॉप पर हैं। उन्होंने इन 12 मैचों में 133.66 की स्ट्राइक रेट से रन बनाते हुए छह हाफ सेंचुरी भी बनाई है। बड़ी बात ये कि इन 12 मैचों में छह दफा वो नॉट आउट रहे।

क्रिकेट के लिए अद्भुत पैशन, रन बनाने की भूख और किसी भी चुनौती से निपटने का हौसला कोहली को क्रिकेट का ‘विराट’ खिलाड़ी बनाता है। वो जब मैदान में उतरते हैं तो पिच और गेंदबाज उनके लिए जैसे मायने ही नहीं रखते। उनकी आँखें तो बस अर्जुन की तरह ‘मछली की आँख’ यानि अपने लक्ष्य को देख रही होती हैं। गेंद को मैदान के हर कोने में पहुँचाने की उनकी चाहत और कभी कम ना होने वाले उनके उत्साह से ही गेंदबाज खौफ खाते हैं। कोहली के टैलेंट, टैम्परामेंट और टाइमिंग को देख कहना ही पड़ेगा कि कोहली जैसा कोई नहीं और ये भी कि कोहली और उनके इन तीन ‘टी’ के रहते ‘कप’ हमारा है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

 

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बिहार की बदली हुई परिस्थितियों में राजीव गांधी के मंदिर का बनना

बिहार में भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का मंदिर बनने जा रहा है। जी हाँ, यहाँ के बक्सर जिले के राजपुर प्रखंड के कथराई गांव में भूमि-पूजन के उपरान्त दो दिन पहले इस मंदिर का निर्माण-कार्य भी प्रारम्भ हो चुका है। इस मंदिर में दिवंगत कांग्रेसी नेता राजीव गांधी की मूर्ति स्थापित की जाएगी। राजीव गांधी के लिए बनने जा रहा यह देश का संभवत: पहला मंदिर होगा।

बता दें कि राजीव गांधी का यह मंदिर कांग्रेस खेलकूद प्रकोष्ठ के बक्सर जिला उपाध्यक्ष मृत्युंजय राय बनवा रहे हैं। मृत्युंजय की मानें तो “राष्ट्र के नवनिर्माण में राजीव गांधी के विशेष योगदान” के प्रति यह उनकी श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। उनका कहना है कि इस मंदिर के निर्माण में सभी कांग्रेसियों से सहायता मिल रही है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि माँ इन्दिरा गांधी की मृत्यु के बाद 1984 में सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर सम्भालने वाले राजीव गांधी आज भी लाखों लोगों के ह्रदय में स्थान रखते हैं। भारत में ‘कम्प्यूटर युग’ लाने में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। 21 मई 1991 को तमिलनाडु की एक चुनावी सभा में बम विस्फोट कर उनकी हत्या कर दी गई थी। अब इस घटना के 25 साल बाद श्रद्धा की ये ‘अभिव्यक्ति’ हो रही है।

देखा जाय तो नेता, अभिनेता, क्रिकेटर आदि के लिए सम्मान व्यक्त करने की ऐसी परिपाटी दक्षिण में खूब रही है, लेकिन उत्तर भारत में इस तरह के उदाहरण बिरले ही मिलते हैं। जहाँ तक बिहार की बात है, गठबंधन का हिस्सा बनकर ही सही, लम्बे समय के बाद कांग्रेस सत्ता में आई है। ऐसे में ये बात भी जेहन में आती है कि कहीं ये बदली हुई परिस्थितियों में अपनी ‘उपस्थिति’ दर्ज कराने का बहाना तो नहीं..! अगर इस तरह का काम यहाँ कांग्रेस के ‘संघर्ष’ के दिनों में होता तो बात कुछ अलग होती।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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