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दक्षिण कोरिया की तकनीक और भारत की मैनुफैक्चरिंग ताकत

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन ने नोएडा के सेक्टर 81 में दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल फैक्ट्री का उद्घाटन किया। दक्षिण कोरिया की सुप्रसिद्ध सैमसंग कम्पनी नोएडा में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का विस्तार कर रही है। इसके लिए कंपनी ने 4915 करोड़ का निवेश किया है। उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत आज मैनुफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि दक्षिण कोरिया की तकनीक और भारत की मैनुफैक्चरिंग ताकत से दुनिया को मजबूत प्रॉडक्ट मिलेगा। साथ ही इससे ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी गति मिलेगी।

गौरतलब है कि भारत में सैमसंग 2007 से मोबाइल बना रही है और वर्तमान में यह लगभग 670 लाख स्मार्टफोन बनाती है। अनुमान है कि अब इस नई यूनिट की शुरुआत के बाद यह संख्या दोगुनी हो सकती है। हमें यह भी जानना चाहिए कि चीन, दक्षिण कोरिया और अमेरिका को छोड़कर सैमसंग ने अगर भारत में यह यूनिट शुरू की है तो इसलिए कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल मार्केट है और दुनियाभर के 10 फीसदी मोबाइल फोन यहां बिकते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 2017 में यहां लगभग 30 करोड़ मोबाइल यूजर थे जो इस साल के आखिरी तक 35 करोड़ हो सकते हैं। संभावना है कि 2022 तक भारत में 45 करोड़ मोबइल यूजर हो जाएंगे।

बता दें कि शुरू में सैमसंग अपने इस यूनिट में मोबाइल फोन बनाएगी, जबकि दूसरे चरण में फ्लैट पैनल टेलिविजन और रेफ्रिजरेटर बनाने की योजना है। उल्लेखनीय है कि अक्टूबर 2016 में नोएडा अथॉरिटी ने कंपनी को करीब 25 एकड़ जमीन अलॉट की थी और प्रदेश व केंद्र सरकार के निर्देश पर नोएडा अथॉरिटी के सहयोग से कम समय में इतनी बड़ी यूनिट बनकर तैयार हो गई। विदेशी कंपनियों का हब बनाने के लिए नोएडा प्रधानमंत्री मोदी की प्राथमिकता में है। कहने की जरूरत नहीं कि सैमसंग की ये विशाल यूनिट उसी की एक बानगी है।

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राष्ट्रीय कार्यकारिणी: जदयू ने बेबाकी से रखी बात

दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की अहम बैठक में जदयू ने कई मुद्दों पर बड़ी बेबाकी से अपना स्टैंड स्पष्ट किया। पार्टी ने जहां एक ओर क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म पर जीरो टॉलरेंस की नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, वहीं दूसरी ओर यह भी साफ-साफ कहा कि जदयू 2019 का चुनाव एनडीए के साथ लड़ेगी। बैठक के बाद पत्रकारों को संबोधित करते हुए प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने एनडीए में सीट शेयरिंग पर किसी टकराव से भी इनकार किया। साथ ही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई जारी रखने की बात भी उन्होंने कही।

गौरतलब है कि आज की इस बैठक में जदयू ने सैद्धांतिक तौर पर एक देश एक चुनाव का प्रस्ताव भी पारित किया। इस मुद्दे पर भाजपा के रूख का समर्थन करते हुए पार्टी ने कहा कि इससे चुनाव के खर्चे कम होंगे। साथ ही काला धन पर भी लगाम लगेगा। लेकिन वहीं असम में नागरिकता संशोधन बिल पर भाजपा से अलग राय जाहिर करते हुए पार्टी ने इसका विरोध करने का फैसला किया। बकौल त्‍यागी इस बिल का असम में विरोध है और इससे संवैधानिक संकट भी खड़ा हो जाएगा।

राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मणिपुर में होने जा रहे चुनाव के संदर्भ में केसी त्यागी ने कहा कि इन राज्यों में हम अपने दम पर कुछ सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। त्यागी ने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि हम बीजेपी की मदद कर रहे हैं, लेकिन हम न तो उनका सपोर्ट कर रहे हैं और न ही उनका विरोध कर रहे हैं। हम उनकी कोई मदद नहीं कर रहे हैं। वहीं पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव के बाहर होने और नई पार्टी बनाए जाने के बाद असली जदयू को लेकर चली रही बहस को लेकर केसी त्यागी ने कहा है कि जदयू एक ही है, जिसका नेतृत्व नीतीश जी कर रहे हैं।

केसी त्‍यागी ने बिहार भाजपा के नेता व केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को आड़े हाथों लिया। बिहार में नवादा की सांप्रदायिक घटना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मंत्री जेल जाकर दंगे के आरोपितों से मिलते हैं। किसी मंत्री का बिहार की व्‍यवस्‍था पर सवाल उठाना, आरोपितों से सहानुभूति दिखाना और उनसे मिलना सर्वथा अनुचित है।

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बेहद अहम है जदयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक

बिहार के मुख्यमंत्री व जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार रविवार को दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव समेत विभिन्न मुद्दों पर अपनी पार्टी की स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं। भाजपा के साथ संबंधों में तनाव की खबरों के बीच नीतीश ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले शनिवार को पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक की।

जदयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक रविवार की सुबह 10 बजे से जंतर-मंतर स्थित पार्टी मुख्यालय में होनी है। नीतीश कुमार के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी की ये पहली बैठक है। पार्टी की इस बैठक को हालिया राजनीतिक परिदृश्य के संदर्भ में काफी अहम माना जा रहा है।

2019 में तय लोकसभा चुनाव और 2020 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जदयू के कई नेताओं ने एनडीए में अपनी पहले की प्रभावशाली स्थिति बहाल करने की मांग की है, जैसा 2013 में गठबंधन से नाता तोड़ने से पहले तक उसका प्रभाव था। उधर 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली बड़ी सफलता के बाद बिहार में भाजपा स्वयं को पहले से बेहतर स्थिति में पा रही है और बदले हुए परिदृश्य में वह जदयू को बड़ी पार्टी का दर्जा नहीं मिलने देना चाहेगी।

राजनीतिक गलियारे में खबर है कि नीतीश 2019 में 15 लोकसभा सीटें हासिल करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। बता दें कि 2014 के आम चुनावों में बीजेपी ने राज्य में 40 लोकसभा सीटों में से 22 पर जीत हासिल की थी और उसके गठबंधन सहयोगियों एलजेपी और आरएलएसपी ने क्रमश: 6 और 3 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जेडीयू तब केवल 2 सीटें जीत सकी थी।

बहरहाल, जदयू की इस महत्वपूर्ण बैठक के बाद भविष्य की राजनीति पर उसका रुख सामने आएगा। यह भी खबर है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बिहार दौरे पर आ रहे हैं और सीट शेयरिंग के मुद्दे पर उनकी और नीतीश की मुलाकात होनी है। उससे ठीक पहले हो रही इस बैठक के बाद दोनों पक्षों की ओर से हो रही अनावश्यक बयानबाजी का सिलसिला भी थम जाना चाहिए। आगे जो भी हो, राजनीतिक परिस्थिति और समझदारी का तकाजा है कि दोनों पक्षों को अपने-अपने अहं से ऊपर उठकर सीटों को लेकर कोई सम्मानजनक हल निकाल लेना चाहिए। महागठबंधन की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए इससे बेहतर कोई और विकल्प दोनों दलों के पास है भी नहीं।

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अगस्त से शुरू होगी केजरीवाल की ‘सरकार आपके द्वार’ योजना

अरविन्द केजरीवाल की महत्वाकांक्षी ‘सरकार आपके द्वार योजना’ (डोर स्टेप सर्विसेज) अगले दो महीने में शुरू हो जाएगी। इसके तहत करीब 100 तरह की सुविधाओं की होम डिलिवरी अगस्त के अंत तक शुरू होगी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अध्यक्षता में हुई दिल्ली कैबिनेट की महत्वपूर्ण बैठक में इसके लिए ठेका देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। चयनित कंपनी को यह ठेका तीन साल के लिए दिया जाएगा।

बता दें कि पिछले साल नवंबर में दिल्ली कैबिनेट ने ‘डोर स्टेप योजना’ को मंजूरी देते हुए जाति प्रमाणपत्र, ड्राइविंग लाइसेंस समेत 40 सार्वजनिक सेवाओं को घर-घर पहुंचाने की योजना बनाई थी। अब इसमें 30 और सेवाएं जोड़ी गई हैं और जल्द ही 30 और सेवाएं जोड़ी जाएंगी। अब लोगों को किसी भी प्रकार के सर्टिफिकेट के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने नहीं पड़ेंगे। सरकार घर-घर पहुंच कर 100 तरह की सुविधाओं की होम डिलीवरी करेगी।

गौरतलब है कि पिछले साल दिल्ली सरकार ने डोर स्टेप डिलिवरी ऑफ सर्विसेज की स्कीम बनाई थी और इस स्कीम को मंजूरी के लिए एलजी के पास भेजा था। शुरुआत में एलजी ने स्कीम को लेकर कुछ आपत्ति जताई थी, लेकिन बाद में ग्रीन सिग्नल दे दिया था। दिल्ली सरकार ने हर महीने इस सिस्टम से 30 से 35 नई सुविधाओं को जोड़ने का फैसला भी किया था और इस हिसाब से अब तक 100 सर्विसेज की लिस्ट फाइनल की गई है। इस स्कीम में लोग अपने घर बैठे सर्टिफिकेट बनवाने के लिए फोन कर सकेंगे। पेंशन के पेपर हो या राशन कार्ड, बच्चे का जन्म हो या किसी की मृत्यु, किसी प्रकार के प्रमाण पत्र के लिए ऑफिसों के चक्कर नहीं काटने होंगे। एक कॉल सेंटर होगा, जहां पर लोग कॉल करके यह बताएंगे कि उन्हें कौन सा प्रमाण पत्र बनवाना है।

बहरहाल, कहा जा सकता है कि दिल्ली सरकार की इस योजना के सफल होने पर दिल्ली की जनता को तो फायदा होगा ही, केजरीवाल की राजनीति को भी नई ऊँचाई मिल जाएगी। भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरे अरिन्द केजरीवाल की चमक पिछले कुछ समय से फीकी-सी पड़ रही थी। अब शासन की ‘होम डिलीवरी’ कर वो जनता के बीच अपनी पुरानी पैठ बनाने में बहुत हद तक सफल होंगे। यही नहीं, देश में पहली बार इस तरह की योजना लागू कर दिल्ली सरकार बाकी राज्यों के लिए भी नजीर पेश करेगी।

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लालू की जमानत अवधि छह हफ्ते और बढ़ी

चारा घोटाला मामले में सजा झेल रहे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उनकी औपबंधिक जमानत अ‍वधि छह हफ्तों के लिए बढ़ा दी है। गौरतलब है कि उन्‍होंने जमानत की अवधि बढ़ाने के लिए अर्जी दाखिल की  थी, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने फैसला सुनाया।

शुक्रवार को लालू की ओर से पक्ष रखते हुए वरीय अधिवक्ता चितरंजन सिन्हा ने अदालत को बताया कि लालू प्रसाद यादव गंभीर रूप से बीमार हैं और उनका इलाज मुंबई के एशियन हार्ट अस्पताल में चल रहा है। वह प्लेटलेट्स की कमी, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, हृदय, किडनी व डिप्रेशन सहित कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। उनका फिस्टुला का ऑपरेशन हुआ है और अभी जख्म भरा नहीं है। शुगर लेवल बढ़ा होने के कारण हर दिन उन्हें 70 यूनिट इंसुलिन दिया जा रहा है। इस तरह उनकी विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत की गई। इसके बाद अदालत ने औपबंधिक जमानत की अविध छह सप्ताह के लिए बढ़ा दी। बता दें कि लालू प्रसाद यादव की जमानत की अवधि तीन जुलाई को समाप्त हो रही थी।

बहरहाल, जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की अदालत ने 10 अगस्त को अगली सुनवाई निर्धारित करते हुए आरजेडी सुप्रीमो को मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इसी अदालत ने डॉ जगन्नाथ मिश्र की औपबंधिक जमानत की अवधि भी 25 जुलाई तक बढ़ा दी है। डॉ. मिश्र को 20 जुलाई को अपनी मेडिकल रिपोर्ट पेश करने का आदेश कोर्ट ने दिया है।

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शिष्टाचार पर राजनीति ना करें तेजस्वी

आज की राजनीति में शिष्टाचार निभाना भी आफत है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अस्वस्थ चल रहे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से उनकी तबीयत क्या पूछ ली, इस पर भी बयानबाजी शुरू हो गई। शिष्टाचार संस्कार का हिस्सा होता है और पारिवारिक जीवन हो या सार्वजनिक, उसे अनिवार्य रूप से निभाया जाना चाहिए। पर आज के ‘ट्विटरवीर’ इसे समझे तब ना..!

जैसा कि सब जानते हैं रविवार को लालू जी का फिस्टुला का ऑपरेशन हुआ था। इस पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शिष्टाचारवश मंगलवार को लालू जी को फोन कर कुशल उनका क्षेम पूछा था। लेकिन उनके उत्तराधिकारी तेजस्वी इस ‘मर्यादा’ को समझ ही नहीं सके (या समझना नहीं चाहते) और ट्विटर पर तपाक से लिख दिया, देर से ही सही उनको लालू जी की याद तो आई। तेजस्वी ने आगे लिखा, आश्चर्य है कि नीतीश जी ने पिछले चार महीने से बीमार लालू जी का हालचाल नहीं लिया, लेकिन आज फोन कर पूछा। शायद उन्हें पता चला कि भाजपा और एनडीए के लोग अस्पताल जाकर हालचाल ले रहे हैं तो उन्होंने भी फोन कर लिया। यही नहीं, वे इसका विशेषार्थ तक ढूंढ़ने लगे और वे स्वयं और उनकी पार्टी के बाकी धुरंधर इसे महागठबंधन में उनके शामिल होने की ‘तथाकथित इच्छा’ से जोड़ने लगे। बड़बोले शिवानंद तिवारी तो यहां तक कह बैठे कि नीतीश किस मुंह से सोच रहे हैं कि उन्हें महागठबंधन में जगह मिल जाएगी।

उधर जदयू प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा कि शिष्टाचार के तौर पर की गई बातचीत को राजनीति से जोड़ना उचित नहीं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राजद से नजदीकी बढ़ने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। भाजपा नेता नंदकिशोर यादव ने भी इस मामले में राजनीति करने पर विपक्षी दलों को घेरते हुए कहा कि यह एक सामान्य व्यवहार है, व्यक्तिगत रिश्ता के नाते नीतीश ने पूछा हाल, इसका कोई राजनीतिक मायने नहीं है। जदयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने भी कहा कि नीतीश जी ने शिष्टाचार के नाते लालू जी को फोन किया था और यह भी कि तेजस्वी को बयानबाजी से परहेज करना चाहिए। त्यागी ने स्वाभाविक तल्खी से कहा, राजनीति में शिष्टाचार सीखना भी जरूरी है।

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आईफा 2018: इरफान, श्रीदेवी और ‘तुम्हारी सुलु’ सर्वश्रेष्ठ

भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (आईफा) 2018 में विद्या बालन अभिनीत ‘तुम्हारी सुलु’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के पुरस्कार से नवाजा गया। इस फिल्म ने ‘न्यूटन’ और ‘हिन्दी मीडियम’ जैसी फिल्मों को पछाड़कर यह सम्मान पाया। वहीं न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर बीमारी से जूझ रहे अभिनेता इरफान खान को फिल्म ‘हिंदी मीडियम’ में उनकी अदाकारी के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और श्रीदेवी को उनकी फिल्म ‘मॉम’ के लिए मरणोपरांत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया। इरफान के लिए यह पुरस्कार जहां फिल्म ‘हैदर’ की उनकी सहकलाकार श्रद्धा कपूर ने स्वीकार किया, वहीं श्रीदेवी का पुरस्कार बड़े भावुक क्षण में उनके पति बोनी कपूर ने ग्रहण किया।

‘हिन्दी मीडियम’ और ‘मॉम’ के खाते में एक-एक और महत्वपूर्ण पुरस्कार गया। ‘हिंदी मीडियम’ के लिए साकेत चौधरी ने जहां सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार हासिल किया, वहीं नवाजुद्दीन सिद्दीकी को ‘मॉम’ के लिए सर्वक्ष्रेष्ठ सहकलाकार (पुरुष) का पुरस्कार दिया गया। सर्वश्रेष्ठ सहकलाकार (महिला) का पुरस्कार ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ के लिए अभिनेत्री मेहेर विज ने जीता।

अन्य पुरस्कारों की बात करें तो ऑस्कर में भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर नामित की गई ‘न्यूटन’ को सर्वश्रेष्ठ पटकथा का पुरस्कार मिला। वहीं अरिजीत सिंह को फिल्म ‘जब हैरी मेट सेजल’ के गीत ‘हवाएं’ के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक, मेघना मिश्रा को ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ के गीत ‘मैं कौन हूं’ के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका और फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ के लिए अमाल मलिक, तनिष्क बागची और अखिल सचदेवा की तिकड़ी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के पुरस्कार से नवाजा गया। इस साल का ‘आउटस्टैंडिंग अचीवमेंट अवार्ड’ 500 से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुके अनुपम खेर को दिया गया। वहीं इस खास मौके पर बॉलीवुड अपने तीन दिग्गज कलाकारों – श्रीदेवी, विनोद खन्ना और शशि कपूर – को याद करना और उन्हें श्रद्धांजलि देना भी नहीं भूला।

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नहीं रहे झारखंड के गांधी

झारखंड की राजनीति में जीते जी किंवदंती बन जाने वाले बागुन सुम्ब्रुई नहीं रहे। पूरी ज़िन्दगी केवल आधे शरीर को कपड़ा से ढंकने वाले सुम्ब्रुई ‘झारखंड के गांधी’ कहे जाते थे। आज शायद ही कोई यकीन करे लेकिन ये सच है कि पांच बार सांसद, चार बार विधायक और उससे पहले पांच बार मुखिया रहने वाले पूर्व मंत्री और कांग्रेस के अत्यंत वरिष्ठ नेता वस्त्र के नाम पर केवल एक धोती से काम चला लेते थे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके निधन के बाद अपने ट्वीट में बिल्कुल सही कहा कि वे झारखंड की सच्चाई, सादगी और विनम्रता के प्रतीक, आदिवासी समाज की आवाज और गांधीजी के विचारों के सच्चे शिष्य थे। शुक्रवार शाम 96 वर्ष की उम्र में टाटा मेमोरियल अस्पताल में उनका निधन हो गया।
बागुन सुम्ब्रुई का जन्म 1924 में पश्चिम सिंहभूम जिले के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के एक छोटे से गांव भूता में हुआ था। प्रारंभिक जीवन भूख, अभाव व गरीबी के बीच गुजरा। प्राथमिक शिक्षा गांव के स्कूल से प्राप्त की और फिर जिला स्कूल में पढ़ाई की, लेकिन गरीबी के कारण बीच में ही स्कूल छोड़ दर्जी का काम शुरू करना पड़ा। इसी बीच 1946 में  22 वर्ष की उम्र में गांव के मुंडा बन गये। यहीं से शुरू हुई राजनीतिक जीवन में कभी न रुकने वाली उनकी यात्रा।
लगभग 50 वर्षों से भी अधिक समय तक सिंहभूम की राजनीति का केन्द्र रहे सुम्ब्रुई की पहचान झारखंड से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक रही। जयपाल सिंह के बाद इन्होंने झारखंड पार्टी की कमान संभाली और झारखंड को अलग राज्य बनाने के लिए चले आंदोलन की अग्रिम पंक्ति के नेता रहे। उनके नेतृत्व वाली झारखंड पार्टी ने 1969 के चुनाव में बिहार में 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वर्ष 1989 तक उनकी छवि एक ऐसे अपराजेय नेता की थी जिसे चुनाव में हरा पाना असंभव-सा था। सिंहभूम से पांच बार सांसद और चार बार विधायक रहे सुम्ब्रुई वर्ष 1999 में बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद वे झारखंड का पहले विधानसभा उपाध्यक्ष चुने गए।
सादा जीवन उच्च विचार का आजीवन अनुसरण करने वाले बागुन सुम्ब्रुई ने डायन प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत की थी। अपनी धुन और अपने सिद्धांत के इतने पक्के थे वे कि 1970 में अविभाजित बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय, जिनकी सरकार सुम्ब्रुई की झारखंड पार्टी के 11 विधायकों के समर्थन से चल रही थी, द्वारा बिहार राज्य पथ परिवहन में काम करने वाले एक आदिवासी कंडक्टर के निलंबन को वापस लेने के अपने अनुरोध के नहीं सुने जाने के कारण उन्होंने अपना समर्थन वापस ले लिया था। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसके बाद कर्पूरी ठाकुर की सरकार बनी, जिसमें सुम्ब्रुई परिवहन एवं वन कल्याण मंत्री बने और मंत्री बनते ही उन्होंने सबसे पहले उस कंडक्टर का निलंबन वापस लिया। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।

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जम्मू-कश्मीर में भाजपा ने क्यों बदली राह ?

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ भाजपा का तीन साल पुराना बेमेल गठबंधन आखिरकार टूट गया। भाजपा ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत गठबंधन से अलग होने का कड़ा फैसला लिया और बड़ी सफाई से ठीकरा पीडीपी के सिर फोड़ा। वहां विधानसभा में राजनीतिक दलों की जो शक्ति है उसे देखते हुए यह तयप्राय है कि परिस्थिति सामान्य होने तक राज्य में राज्यपाल शासन ही रहेगा और फिर से चुनाव के बाद ही कोई नई सरकार दिखेगी।
देखा जाय तो जम्मू-कश्मीर में चार महीने के असमंजस और मशक्कत के बाद सरकार गठन के साथ ही उसकी उलटी गिनती भी शुरू हो गई थी लेकिन भाजपा विपरीत विचारधारा के साथ भी सरकार चलाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाह रही थी। यही कारण है कि संघ की असहमति के बावजूद वह पीडीपी के साथ सरकार में थी। लेकिन तीन साल में जिस तरह मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और पीडीपी ने अपना आधार मजबूत करने के लिए अलगाववादियों के प्रति नरमी और जम्मू या लद्दाख की बजाय घाटी पर ध्यान केंद्रित रखा उसने भाजपा को परेशान कर दिया।
भाजपा जम्मू-कश्मीर में किस कदर परेशान हो चली थी इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि गठबंधन तोड़ने की घोषणा करने आए राष्ट्रीय महासचिव राम माधव के तेवर कुछ ऐसे थे जैसे कश्मीर के बारे में विपक्षी दलों के हुआ करते हैं। उन्होंने एक तरफ से आतंकी घटनाएं बढ़ने, कानून व्यवस्था ध्वस्त होने, जम्मू और लद्दाख क्षेत्र को नजरअंदाज किए जाने का आरोप लगाया। जबकि तीन साल तक भाजपा सरकार का हिस्सा भी रही है और केंद्र सरकार की ओर से आतंकियों के सफाए का दावा भी होता रहा है। यही नहीं कश्मीर में माहौल बदलने के लिए पीठ भी थपथपाई जाती रही है। लेकिन अब राग एकदम अलग है।
दरअसल भाजपा को अपनी गलती का अहसास उस वक्त पूरी तरह हो गया था जब रमजान के वक्त ऑपरेशन रोके जाने के बावजूद आतंकियों ने अपनी बंदूक नहीं छोड़ी और महबूबा इससे ऐतराज जताने की बजाय सस्पेंशन आफ ऑपरेशन को लागू करने की बात करती रहीं। महबूबा एक तरफ पत्थरबाजों को माफ करती रहीं और दूसरी तरफ सेना के मेजर गोगोई पर एफआइआर कर अपने कट्टरपंथी समर्थकों को खुश करने में जुटी रहीं। इतना ही नहीं हाल में कठुआ की घटना के बाद महबूबा सरकार पर सवाल उठा रहे मंत्रियों को भी जाना पड़ा। बताते हैं कि इन घटनाओं के कारण खासतौर से जम्मू क्षेत्र में भाजपा कार्यकर्ताओं व समर्थकों में बेहद रोष था।
एक अटकल यह है कि देर सबेर पीडीपी भी गठबंधन तोड़ने के बारे में सोच रही थी। ऐसे में भाजपा के लिए इससे उपयुक्त समय नहीं हो सकता था। गठबंधन तोड़ने के साथ ही भाजपा की ओर से यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि केंद्र से प्रदेश को 80 हजार से एक लाख करोड़ रुपये का विकास पैकेज दिया गया। लेकिन महबूबा इसका लाभ प्रदेश को नहीं पहुंचा पाई। बताते हैं कि भाजपा में गठबंधन तोड़ने का फैसला एक दिन पहले ही हो गया था लेकिन शीर्ष नेतृत्व स्थानीय नेतृत्व से औपचारिक चर्चा के बाद ही इसकी घोषणा करना चाहता था। बहरहाल, अब भाजपा वहां खुलकर अपना राष्ट्रवाद का एजेंडा अपनाएगी और उसका फायदा 2019 में देश भर में उठाना चाहेगी।

 

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नीति आयोग की बैठक में छाए रहे बिहार और नीतीश कुमार

राजधानी दिल्‍ली में रविवार को संपन्‍न नीति आयोग के गवर्निंग काउंसिल की बैठक में बिहार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार छाए रहे। मुख्यमंत्री ने इस बैठक में बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग एक बार फिर पुरजोर तरीके से रखी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग के शासी परिषद की चौथी बैठक में अपनी मांग दोहराते हुए उन्होंने विकास के मानकों के साथ-साथ मानव विकास से संबंधित सूचकांक में बिहार के पिछड़ेपन का मुद्दा भी उठाया। इसके साथ ही उन्होंने सात निश्चय के तहत चल रहे कार्यक्रमों तथा सामाजिक अभियान के अंतर्गत शराबबंदी, दहेज उन्मूलन व बाल विवाह के खिलाफ चल रहे अभियान के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध कराने की मांग भी रखी।

इस मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि यदि अंतर क्षेत्रीय एवं अंतरराज्यीय विकास के स्तर में भिन्नता से संबंधित आंकड़ों की समीक्षा की जाए तो पाया जाएगा कि कई राज्य विकास के मापदंड, जैसे प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा, सांस्थिक वित्त एवं मानव विकास सूचकांकों पर राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे हैं। ऐसी स्थिति में तर्कसंगत आर्थिक रणनीति वही होगी जो ऐसे निवेश और अंतरण की पद्धति को प्रोत्साहित करे जिससे पिछड़े राज्यों को एक निर्धारित समय सीमा में विकास के राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने में मदद मिले।

बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के पक्ष में प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि इससे केंद्र प्रायोजित योजनाओं के केंद्रांश में वृद्धि होगी और राज्य को अपने संसाधनों का उपयोग, विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं में करने का अवसर मिलेगा। वहीं केंद्रीय जीएसटी में अनुमान्य प्रतिपूर्ति मिलने से निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। साथ ही उन्होंने बीआरजीएफ के लंबित 1651.29 करोड़ के शीघ्र भुगतान की मांग भी गवर्निंग काउंसिल के सामने रखी।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में चल रहे सात निश्चय कार्यक्रम के साथ-साथ चल रहे पूर्ण शराबबंदी, दहेजबंदी, बाल विवाहबंदी जैसे सामाजिक अभियानों की चर्चा भी की और राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे इन कार्यक्रमों के लिए नीति आयोग के समर्थन व अतिरिक्त संसाधन की मांग की। आगे सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) की चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्यों को सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता का उल्लेख राष्ट्रीय दृष्टि पत्र 2030 में स्पष्ट रूप से किया जाना चाहिए।

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