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उड़ी की शहादत में सबसे आगे थे बिहार के बेटे

आज सुबह जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले में सेना के 17 जवान शहीद हो गए। प्राप्त जानकारी के मुताबिक शहीद जवानों में 15 बिहार रेजिमेंट और 2 डोगरा रेजिमेंट के हैं। बिहार रेजिमेंट के शहीद 15 जवानों में से 6 बिहार के सपूत हैं। इन शहीदों को लेकर जहाँ बिहार सहित पूरे देश में गर्वमिश्रित शोक की लहर है, वहीं लोग इनके बारे में जानने को भी आतुर हो रहे हैं। इनके नामों की सूची अभी जारी नहीं की गई है। ‘पाकिस्तान-प्रायोजित’ इस घटना को चार आतंकियों ने अंजाम दिया था जिन्हें हमारे जांबाज जवानों ने मार गिराया।

इस घटना में मारे गए आतंकवादियों के पास से कई ऐसी चीजें मिली हैं जिन पर पाकिस्तान की मार्किंग है यानि वे चीजें पाकिस्तान में बनी हैं। सबूतों के आधार पर माना जा रहा है कि इन आतंकियों का संबंध ‘जैश-ए-मोहम्मद’ से है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस नाजुक मौके पर ट्वीट कर देश को भरोसा दिलाया है कि इस घिनौने हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

बता दें कि पिछले 26 सालों में यह आर्मी बेस पर हुआ सबसे बड़ा हमला है। इस घटना से आहत देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आज स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि पाकिस्तान एक आतंकी देश है और उसकी पहचान करके उसे अलग-थलग कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं बेहद निराश हूँ कि पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकी संगठनों को लगातार मदद दे रहा है।

इस घटना के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी पाकिस्तान पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि इस तरह के वाकयों से राज्य में युद्ध जैसे हालात बनाने की कोशिश की जा रही है। वहाँ के उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह का भी कहना है कि हमारे इलाकों में तनाव पैदा करने के लिए अलगाववादी, आतंकी और पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

बहरहाल, इस हमले के बाद बिहार के सभी आर्मी कैंप की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि आतंकी हमले के खिलाफ केन्द्र सरकार कड़ी कार्रवाई करे, मैं आतंक के खिलाफ केन्द्र सरकार के समर्थन में खड़ा हूँ। वहीं, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आतंकियों के इस कायराना हमले के बाद केन्द्र सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के ‘56 इंच के सीने’ को ‘खोजते’ दिखे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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ग्यारह लाख नि:शक्तों को प्रतियोगिता परीक्षा शुल्क में छूट

बिहार सरकार द्वारा नि:शक्त परीक्षार्थियों को सभी प्रतियोगिता परीक्षा शुल्क में छूट दी जायेगी | निशक्तों को गैर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए निर्धारित शुल्क का एक चौथाई ही देना होगा |

यह भी जान लें कि बिहार सरकार ने नि:शक्त व्यक्ति अधिनियम, 1995 पारित कर उसके तहत नि:शक्त अभ्यर्थियों के परीक्षा शुल्क में छूट देने का निर्णय लिया है | इस अधिनियम के तहत राज्य के 23 लाख नि:शक्तजनों में से उन्हीं 11लाख नि:शक्तजनों को परीक्षा शुल्क में छूट मिलेगी जिन्हें राज्य सरकार की ओर से नि:शक्तता प्रमाण-पत्र प्रदान किया जा चुका है |

बता दें कि नि:शक्तता प्रमाण-पत्र चाहने वाले नि:शक्तजन सरकार के समाज कल्याण विभाग के नि:शक्तता निदेशालय द्वारा चलाये जा रहे शिविर में जाकर अथवा सरकारी अस्पतालों की अधिकृत चिकित्सकों से संपर्क कर ‘नि:शक्तता प्रमाण-पत्र’ अभी भी प्राप्त कर सकते हैं |

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‘मदर’ ने पूरा किया ‘सिस्टर’ से ‘संत’ का सफर

आज सारी दुनिया एक ऐतिहासिक पल की गवाह बनी। गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए जीवन समर्पित करने वाली ‘भारतरत्न’ मदर टेरेसा को वेटिकन सिटी में संत की उपाधि दी गई। ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने लगभग एक लाख श्रद्धालुओं की मौजूदगी में उन्हें ‘संत’ की उपाधि से नवाजा। इस दौरान पीटर्स बेसीलिका पर मदर टेरेसा की एक बड़ी तस्वीर लगाई गई थी, जिसमें वह नीचे लोगों की ओर मुस्कराती प्रतीत हो रही थीं। गौरतलब है कि मदर टेरेसा को ‘संत’ की उपाधि उनकी 19वीं पुण्यतिथि से एक दिन पहले दी गई है। अब वो ‘संत मदर टेरेसा ऑफ कोलकाता’ के नाम से जानी जाएंगी।

मदर टेरेसा ने सिस्टर से संत बनने का सफर भारत में पूरा किया था। यहीं से उनकी ममता और करुणा की ज्योति पूरे संसार में फैली। स्वाभाविक है कि इस बेहद खास मौके पर वहाँ भारत का प्रतिनिधित्व हो। लिहाजा भारत की महानतम शख्सियतों में शुमार ‘मदर’ को संत की उपाधि दिए जाने के समय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ वेटिकन सिटी में मौजूद थीं। केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल के अलावा दिल्ली और पश्चिम बंगाल से दो राज्यस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी रोम में थे, जिनका नेतृत्व क्रमश: अरविन्द केजरीवाल और ममता बनर्जी ने किया। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की सुपीरियर जनरल सिस्टर मेरी प्रभा के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों से आईं लगभग 50 ननों का एक समूह भी इस समारोह के दौरान मौजूद रहा।

मेसेडोनिया की राजधानी स्कोप्ये में कोसोवर अल्बेनियाई माता-पिता के घर जन्मी मदर टेरेसा का मूल नाम गोंक्जा एग्नेस था। 1928 में महज 18 साल की उम्र में नन बनने की खातिर उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था। घर छोड़ने के बाद वो आयरलैंड स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी (सिस्टर्स ऑफ लोरेटो) के साथ जुड़ गईं। यहाँ उन्हें नया नाम मिला – सिस्टर मेरी और वो कोलकाता के लिए निकल पड़ीं। वर्ष 1931 में वो कोलकाता की लोरेटो एन्टाली कम्यूनिटी से जुड़ीं और लड़कियों के सेंट मेरी स्कूल में पढ़ाने लगीं। बाद में वो प्रिंसिपल बनीं। 1937 के बाद से उन्हें मदर टेरेसा के नाम से पुकारा जाने लगा। कहा जाता है कि 1941 में एक ट्रेन यात्रा के दौरान ईश्वर ने उन्हें गरीबों के लिए काम करने को प्रेरित किया। इसके बाद वो लोरेटो से इजाजत लेकर 1948 में मेडिकल ट्रेनिंग के लिए पटना आईं।

ये कम लोगों को पता है कि मदर टेरेसा ने पटना सिटी में होली फैमिली अस्पताल में मेडिकल ट्रेनिंग ली थी। पटना में ये अस्पताल पादरी की हवेली (सेंट मेरी चर्च) से सटा है। तीन महीनों की ट्रेनिंग के दौरान मदर इस हवेली के एक छोटे से कमरे में रहती थीं। उनकी याद में इस कमरे को अब तक सहेज कर रखा गया है। कहने की जरूरत है कि मदर को संत घोषित किए जाने के बाद ये जगह किसी तीर्थ से कम नहीं होगी। बहरहाल, 1948 के बाद ही मदर टेरेसा ने मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की स्थापना की और उसके बाद की कहानी से पूरी दुनिया वाकिफ है। 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था और 1980 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया था।

मदर टेरेसा को संत की उपाधि दिए जाने के लिए जरूरी था कि वैटिकन मदर टेरेसा से मदद के लिए की गई प्रार्थनाओं के परिणामस्वरूप हुए दो चमत्कारों को मान्यता दे। इस संबंध में स्मरणीय है कि 2002 में पोप ने एक बंगाली आदिवासी मोनिका बेसरा के ट्यूमर ठीक होने को मदर का पहला चमत्कार माना था। इसके बाद 2015 में ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त एक ब्राजीलियन पुरुष के ठीक होने को उनका दूसरा चमत्कार माना गया। दूसरे चमत्कार को मान्यता मिलने के साथ ही उन्हें ‘संत’ घोषित करने का रास्ता साफ हो गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नालंदा विश्वविद्यालय : पूरा हुआ कलाम का सपना

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना का जो सपना पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने देखा था, वह पूरा हुआ। नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह के साथ करीब आठ सदी के बाद नालंदा के गौरवशाली इतिहास ने एक बार फिर करवट लिया। काश कि ‘मिसाईलमैन’ जीवित होते और इस ऐतिहासिक समारोह की शोभा बढ़ाते! खैर, वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बीते शनिवार को आयोजित भव्य दीक्षांत समारोह में 12 छात्रों को सम्मानित किया और इसके साथ ही युगपुरुष डॉ. कलाम की परिकल्पना हकीकत में तब्दील हो गई।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दीक्षांत समारोह में इस विश्वविद्यालय के निमित्त डॉ. कलाम के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि आज भले ही नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का आयोजन हो रहा हो परन्तु इसको पुनर्जीवित करने की परिकल्पना का श्रेय कलाम साहब को जाता है। बता दें कि 28 मार्च 2006 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने अपने बिहार दौरे के क्रम में इस प्राचीन विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने की सलाह दी थी। यह विचार उन्होंने बिहार विधानमंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए रखा था।

गौरतलब है कि पाँचवीं सदी में बने नालंदा विश्वविद्यालय में करीब दस हजार छात्र पढ़ते थे, जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे। छात्रों में अधिकांश एशियाई देशों चीन, कोरिया, जापान से आने वाले बौद्ध भिक्षु होते थे। इतिहासकारों के मुताबिक चीनी भिक्षु ह्वेनसांग ने भी सातवीं सदी में नालंदा में शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक में नालंदा विश्वविद्यालय की भव्यता का उल्लेख किया है।

एक समय नालंदा विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षण-केन्द्र था, परन्तु 1200 ई. में बख्तियारपुर खिलजी के आक्रमण के दौरान यह विश्वविद्यालय पूर्णत: धरती के गर्भ में समा गया। हाल ही में यूनेस्को ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर को विश्व धरोहर (वर्ल्ड हेरिटेज साइट) में शामिल किया है। 446 एकड़ में बनने जा रहे वर्तमान विश्वविद्यालय का निर्माण-स्थल प्राचीन विश्वविद्यालय के इस खंडहर से करीब 10 किलामीटर दूर राजगीर में है। दीक्षांत समारोह में भाग लेने आए राष्ट्रपति ने राजगीर के पिल्खी गांव में विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर की आधारशिला भी रखी। अभी यह विश्वविद्यालय एक सरकारी भवन में चलाया जा रहा है।

विश्वविद्यालय की कुलपति गोपा सबरवाल ने जानकारी दी कि विश्वविद्यालय के पहले सत्र में दो विषयों में तीन देशों के 12 छात्र थे, जबकि वर्तमान सत्र में तीन विषयों में 13 से अधिक देशों के 130 छात्र-छात्राएं हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में यहाँ आठ से ज्यादा विषयों की पढ़ाई होगी और 1600 छात्र नामांकित होंगे। दीक्षांत समारोह के मौके पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति जॉर्ज यीओ, पूर्व कुलाधिपति अमर्त्य सेन एवं सदस्य लॉर्ड मेघनाद देसाई समेत कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे ।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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आप ‘कृष्ण’ को कितना जानते हैं?

कृष्ण को सभी जानते हैं, पर महत्वपूर्ण यह है कि कितना जानते हैं। आप ही बताएं कि क्या हैं कृष्ण? देवकीसुत, यशोदानंदन या राधाकांत? सुदामा के सखा, अर्जुन के सारथि या द्वारका के अधिपति? महाभारत की धुरी, गीता के उपदेशक या विष्णु के अवतार? कृष्ण के अनंत रूप हैं और हर रूप की अनगिनत छवियां हैं। हम अपने मिथक से लेकर इतिहास तक खंगाल लें, कृष्ण से अधिक पूर्ण, कृष्ण से अधिक जीवंत, कृष्ण से अधिक विराट व्यक्तित्व ना तो हुआ है, ना होगा।

कृष्ण को जानने के लिए हमें श्रीमद्भागवत का ये प्रसंग जरूर जानना चाहिए। कृष्ण की इच्छा थी कि उनके देह-विसर्जन के पश्चात् द्वारकावासी अर्जुन की सुरक्षा में हस्तिनापुर चले जाएं। सो अर्जुन अन्त:पुर की स्त्रियों और प्रजा को लेकर जा रहे थे। रास्ते में डाकुओं ने लूटमार शुरू कर दी। यह देख अर्जुन ने तत्काल गाण्डीव के लिए हाथ बढ़ाया। पर यह क्या! गाण्डीव तो इतना भारी हो गया था कि प्रत्यंचा खींचना तो दूर, धनुष को उठाना तक संभव नहीं हो पा रहा था। महाभारत के विजेता, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी विवश होकर अपनी आँखों के सामने अपना काफिला लुटता देख रहे थे। विश्वास कर पाना मुश्किल था कि ये वही अर्जुन हैं जिन्होंने अजेय योद्धाओं को मार गिराया था। अर्जुन अचरज में डूबे थे कि तभी कृष्ण के शब्द बिजली की कौंध की तरह उनके कानों में गूंजे – “तुम तो निमित्त मात्र हो पार्थ।”

श्रीमद्भागवत का ये प्रसंग अकारण नहीं है। यहाँ अर्जुन को माध्यम बना हमें इस अखंड सत्य से अवगत कराया गया है कि जीवन में जब-जब ‘कृष्ण तत्व’ अनुपस्थित होता है, तब-तब मनुष्य इसी तरह ऊर्जारहित हो जाता है। कृष्ण के ना रहने का अर्थ है – जीवन में शाश्वत मूल्यों का ह्रास। प्राणी हो या प्रकृति, ‘प्राणवायु’ कृष्ण ही थे, कृष्ण ही हैं, कृष्ण ही रहेंगे।

कृष्ण का अवतरण मानवता के लिए एक क्रान्तिकारी घटना थी। वे हुए तो अतीत में लेकिन हैं भविष्य के। इतना अनूठा था उनका व्यक्तित्व कि हम आज भी उनके समसामयिक नहीं बन सके हैं। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं कि उसकी सोच और समझ में कृष्ण अंट जाएं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कृष्ण अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं। किसी भी बिन्दु पर रत्ती भर भी और पल भर के लिए भी उदास नहीं होते कृष्ण। उन्हें आप हमेशा हंसते हुए, नाचते हुए, जीवन का गीत गाते हुए पाएंगे। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। उदास और आँसुओं से भरा था। हंसता हुआ धर्म, जीवन को समग्र रूप से स्वीकार करने वाला धर्म अभी पैदा होने को है। जाहिर है कि वैसा जीवंत धर्म कृष्ण-तत्व से ही संभव है।

कृष्ण अकेले हैं जो समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उन्हीं के व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसीलिए इस देश ने सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है और कृष्ण को पूर्ण अवतार। राम भी अंश ही हैं परमात्मा के लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। पुरानी मनुष्य-जाति के इतिहास में वे अकेले हैं जो दमनवादी नहीं हैं। उन्होंने जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिया है। वे प्रेम से भागते नहीं। वे पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वे करुणा और प्रेम से भरे होकर भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। अमृत की स्वीकृति है उन्हें लेकिन विष से कोई भय भी नहीं है।

हम जब-जब ‘पूर्णता’ की बात करेंगे, हमारे सामने ‘कृष्ण’ ही होंगे, क्योंकि पूर्णता के पूर्ण प्रतिमान केवल वही हैं, और जिसे हम ‘जन्माष्टमी’ कहते हैं, वो वास्तव में उसी पूर्णता का प्रतीक पर्व है। वर्ष में एक बार ये दिन आता है तो हमें ये एहसास दिलाने कि ‘अधूरेपन’ से लड़ने की ताकत हममें से हर किसी में है और जब तक कृष्ण हैं ‘पूर्णता’ की हर संभावना शेष है। मजे की बात तो यह कि पूर्णता की ये यात्रा ‘कृष्ण’ के साथ है और ‘कृष्ण’ तक ही पहुँचने के लिए है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘आपदा’ में ‘एक’ हुए दो दिग्गज

बिहार के 38 में से 20 जिले बाढ़ से बेहाल हैं। पिछले तीन दिनों में 19 लोगों की मौत हो चुकी है और 5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं। दिन-ब-दिन बिगड़ती स्थिति के मद्देनज़र मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिले। उन्होंने प्रधानमंत्री को हालात से अवगत कराया और प्रधानमंत्री ने उन्हें हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।

मुलाकात के दौरान नीतीश कुमार ने फरक्का बांध का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि बाढ़ की यह स्थिति फरक्का बांध बनने के बाद गंगा में जमा हो रहे गाद के कारण बनी है। बिहार में गंगा की स्थिति पर उन्हें ‘रोने’ का मन करता है। हर साल बाढ़ से बचने का एकमात्र समाधान गंगा के तलछट की सफाई करना है। उन्होंने मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना को बिहार में तलछट प्रबंधन से जोड़ते हुए कहा कि अगर स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया तो इस परियोजना की सफलता पर भी प्रश्नचिह्न लगेगा। नीतीश ने बताया कि प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि उनकी मांगों पर तुरंत और सकारात्मक कार्रवाई की जाएगी जिसमें राष्ट्रीय तलछट प्रबंधन नीति बनाना शामिल है।

गौरतलब है कि बिहार में अभी तक 14 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसके बावजूद राज्य में बाढ़ की भयावह स्थिति है। दरअसल दूसरे राज्यों में बारिश के कारण बिहार को बाढ़ की विभीषिका झेलना पड़ रहा है। नेपाल और झारखंड के बाद अब मध्य प्रदेश में बारिश से बिहार में बाढ़ के हालात बने हुए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस ओर भी प्रधानमंत्री का ध्यान आकृष्ट किया।

बता दें कि केन्द्र सरकार ने बिहार और उत्तर प्रदेश के बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव कार्य में मदद करने के लिए एनडीआरएफ की 10 टीमें सोमवार को भेजी थीं। बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित राज्यों में एनडीआरएफ की कुल 56 टीमें राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश की स्थिति पर नज़र रखने के लिए दो डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल रैंक के अधिकारियों को लगाया गया है। इस मानसून सीजन में एनडीआरएफ की टीमें पूरे देश में 26,400 लोगों को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से निकाल चुकी हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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नीतीश की राह में केजरीवाल का रोड़ा

हमारे नीतीशजी इन दिनों बड़ी शिद्दत से अपने ‘अखिल भारतीय’ अभियान पर हैं। ‘विकास-पुरुष’ का जो तमगा उन्हें बिहार के लिए मिला उस पर पूरे देश की ‘मुहर’ चाहते हैं वो। 2019 में प्रधानमंत्री मोदी के बरक्स खुद को खड़ा करने करने के लिए शराबबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ नीतीशजी। वैसे देखा जाय तो 2019 के लिए मैदान में ‘भीड़’ है भी नहीं और मोदी के जवाब के तौर पर उन्हें राहुल गांधी से बेहतर मानने वालों की भी कमी नहीं। पर मोदी हैं कि हाथ लग ही नहीं रहे। और तो और, उनके और मोदी के बीच, बीच में ‘टपकने’ के लिए मशहूर अरविन्द केजरीवाल भी कूद पड़े हैं।

जी हाँ, इंडिया टुडे और कार्वी इनसाइट्स के सर्वे के मुताबिक गुड गवर्नेंस और लोकप्रियता में तो मोदी देश के किसी भी राजनेता से कोसों आगे हैं ही, मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी बिहार के मुख्यमंत्री से अधिक लोकप्रिय आंके गए हैं और मोदी के लिए ‘खतरे’ के तौर पर भी राहुल के बाद नीतीश के साथ-साथ लगभग बराबरी पर खड़े हैं।

सर्वे के मुताबिक देश के 53 प्रतिशत लोग बतौर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रदर्शन शानदार मानते हैं। सर्वे में शामिल आधे लोगों ने उन्हें देश का नंबर वन नेता माना है और प्रधानमंत्री पद के लिए बेहतर उम्मीदवार बताया है, जबकि 13 प्रतिशत लोग इसके लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष और 6 प्रतिशत उनकी माँ सोनिया गांधी को सही मानते हैं।

अगले लोकसभा चुनाव की बात करें तो राहुल गांधी मोदी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। 23 प्रतिशत लोगों ने 2019 के लिए राहुल को मोदी के लिए सबसे बड़ा खतरा माना है, जबकि 13 प्रतिशत लोगों ने नीतीश और 12 प्रतिशत लोगों ने केजरीवाल के पक्ष में अपनी राय दी है।

मुख्यमंत्रियों की बात करें तो दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल देश के सबसे बेहतर मुख्यमंत्री हैं। बिहार के नीतीश कुमार को दूसरा स्थान मिला है और तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी हैं। हालांकि केजरीवाल की लोकप्रियता 2015 के मुकाबले 2016 में कम हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में वो लोगों की पहली पसंद हैं।

बता दें कि इंडिया टुडे और कार्वी इनसाइट्स का ये सर्वे 15 जुलाई से 2 अगस्त के बीच किया गया और 19 राज्यों के 97 संसदीय और 194 विधानसभा क्षेत्रों में 12,321 लोगों से राय ली गई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लंदन का ये ‘आत्मविश्वास’ बनाए रखना तेजस्वी !

बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव दस दिनों के विदेश दौरे पर हैं। 8 से 15 अगस्त तक वो इंगलैंड में रहेंगे, जबकि 16 और 17 अगस्त को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में आयोजित बिहार आधारित एक कार्यक्रम में शामिल होंगे। अपनी इस यात्रा के दौरान 11 अगस्त को लंदन में उन्होंने प्रवासी भारतीयों से मुलाकात कर बिहार में निवेश की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की। उपमुख्यमंत्री ने प्रवासी भारतीयों को बिहार के गौरवशाली इतिहास के साथ-साथ विगत वर्षों में सकल घरेलू राज्य उत्पाद (जीएसडीपी) में बिहार राज्य के शीर्ष पर होने के कारणों की चर्चा भी की।

तेजस्वी ने बताया कि Ease of Doing Business में देश भर में बिहार कैसे प्रथम स्थान पर है और कैसे यहाँ की इंडस्ट्री पॉलिसी इन्वेस्टमेंट फ्रेंडली है। उन्होंने भारतीय मूल के व्यवसायियों को आंकड़ों के साथ बताया कि देश के तमाम विकसित राज्यों को पछाड़ते हुए बिहार 15.6 प्रतिशत विकास दर के साथ अव्वल राज्य रहा है।

तेजस्वी ने बिहार सरकार के सात निश्चय और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की चर्चा करते हुए औद्योगिक समूहों को बिहार आने का न्योता दिया। बता दें कि प्रवासी भारतीयों ने बिहार में शिक्षा, स्वास्थ्य, टूरिज्म, स्पोर्ट्स एवं हॉस्पिटैलिटी के क्षेत्र में निवेश की इच्छा जाहिर की और उपमुख्यमंत्री ने सभी को बिहार सरकार की तरफ से हर प्रकार की सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने ब्रिटेन में फुटबॉल फॉर यूनिटी के संस्थापक चरणजीत गिल एवं साउथ हॉल फुटबॉल क्लब के प्रबंध निदेशक के साथ बिहार में फुटबॉल अकादमी खोलने की योजना पर भी गहन चर्चा की।

इससे पहले 10 अगस्त को तेजस्वी ने लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स को संबोधित किया और नॉलेज ट्रांसफर सेशन में भाग लिया। इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स में उन्होंने बिहार को लेकर अपना विज़न पेश किया। उन्होंने कहा कि बिहार के लिए वैज्ञानिक और समयबद्ध तरीके से रोड मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है। इस मास्टर प्लान के तहत अगले बीस वर्षों में 500 किमी नए नेशनल हाईवे, 6000 किमी नए स्टेट हाइवे और विभिन्न जिलों को जोड़ने वाली करीब 25000 किमी महत्वपूर्ण सड़कों के निर्माण का प्रस्ताव है और इस प्लान को पूरा करने में लगभग 14 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च होंगे। गौरतलब है कि बिहार में पथ निर्माण विभाग उपमुख्यमंत्री तेजस्वी ही देख रहे हैं।

अपने युवा उपमुख्यमंत्री को लंदन में देखना और उनके मुँह से विकासशील बिहार की बात सुनना निश्चित तौर पर राज्य के लोगों को अच्छा लगना चाहिए। महज नौवीं पास होने के कारण जिन तेजस्वी के ऊपर ना जाने कितने ‘तंज’ कसे गए उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर आत्मविश्वास से लबरेज देखना सचमुच सुखद है। पर ये सब तब और ज्यादा अच्छा लगता जब बिहार में अक्षरश: वही माहौल होता जिसकी बात तेजस्वी लंदन में कर रहे हैं। ये अजीब विरोधाभास है कि जिस दौरान तेजस्वी लंदन के प्रवासी भारतीयों को बिहार में अच्छे माहौल का भरोसा दिला रहे थे उसी दौरान बेखौफ अपराधियों ने यहाँ बेतिया में पूर्व मंत्री वैद्यनाथ प्रसाद कुशवाहा से 1 करोड़ 20 लाख की रंगदारी वसूलने के लिए उनके घर पर बम फेंका, अरवल में पुलिस लाइन के सामने से रिटायर्ड दारोगा के पोते का अपहरण हुआ, मुजफ्फरपुर में एक कैश कलेक्शन एजेंसी के 4.84 लाख लूटे गए और पूर्णिया में 11 लाख की डकैती को अंजाम दिया गया।

बिहार के युवा उपमुख्यमंत्री अपने मुख्यमंत्री के साथ मिलकर बस इस विरोधाभास को दूर कर दें, फिर वो अपनी ऐसी तमाम यात्राओं के लिए विशेष बधाई के हकदार होंगे। वैसे उनका प्रयास अभी भी सही दिशा में है और इसके लिए उन्हें बधाई तो दी ही जानी चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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तो क्या गाय सचमुच केवल दूध देती है, वोट नहीं ?

लालू तंज कसने में कभी नहीं चूकते, बस मौका मिलना चाहिए। और जब सामने प्रधानमंत्री मोदी हों तो कहना ही क्या। अब जबकि छोटे भाई नीतीश के लिए उनका सत्रह साल पुराना ‘प्रेम’ फिर से जग गया है, कांग्रेस से भी ‘अपनापा’ है, मांझी पर ‘डोरे’ ही डालने में लगे हैं और रामविलास समेत बाकी लोगों की खास चिन्ता उन्हें है नहीं, तो बचता भी कौन है भाजपा और नरेन्द्र मोदी के सिवा। हाँ, नेता तो प्रदेश भाजपा के भी कई हैं लेकिन उन्हें ना तो लालू और ना नीतीश तंज कसने के ‘लायक’ मानते हैं।

बहरहाल, ताजा मामला प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान से जुड़ा है जिसमें उन्होंने कहा था कि गाय की रक्षा के नाम पर असामाजिक तत्व अपनी दुकान चला रहे हैं। राजद सुप्रीमो ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि आखिरकार मोदीजी को ये बात समझ आ गई कि गाय दूध देती है, वोट नहीं।

बता दें कि कल प्रधानमंत्री ने गोरक्षा के नाम पर गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई के संदर्भ में बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि गोरक्षा के नाम पर असामाजिक तत्व अपनी दुकान चला रहे हैं। ऐसे लोगों पर उन्हें गुस्सा आता है। कुछ लोग पूरी रात एंटी सोशल एक्टिविटी करते हैं लेकिन दिन में गोरक्षक का चोला पहन लेते हैं। उन्होंने राज्य सरकारों कहा कि ऐसे जो स्वयंसेवी निकले हैं उनका जरा डोजियर तैयार करें, इनमें से 70-80 फीसदी एंटी सोशल एलिमेंट निकलेंगे।

इतना सुनना था कि लालू ने बिना देर किए अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा – “नागपुर वालों, यह सत्य की विजय और पाखंड की पराजय है। लगता है मेरे द्वारा दो दिन पहले कही गई बात मोदीजी को अच्छे से समझ में आ गई कि गाय दूध देती है, वोट नहीं।“ लालू ने आगे लिखा – “गौमाता इनकी सरकार बनवाना तो दूर, बनी बनाई सरकारों को हिला रही है। ये हमारी जीत और उनकी हार है।“

लालू आखिर लालू ठहरे। वो इतने पर भी नहीं रुके। उन्होंने ये भी कह डाला कि “गौमाता के नाम पर बेवकूफ बनाने चले थे, अब दाँव उल्टा पड़ गया तो भाषा बदल रही है।… आप लोग बिहार चुनाव में कैसे बड़े-बड़े विज्ञापन निकालते थे। ये उन विज्ञापनों की पराकाष्ठा थी कि चुनाव में दाल नहीं गली। हाँ, अब आपका दल जरूर गल जाएगा।”

बिहार चुनाव में महागठबंधन को और खासकर लालूजी की पार्टी को जैसी सफलता मिली उसे देखते हुए लालू अगर कह रहे हैं कि बिहार चुनाव में भाजपा की दाल नहीं गली तो गलत भी नहीं कह रहे लेकिन फिलहाल दिन-ब-दिन ‘बड़ी’ होती भाजपा के लिए गल जाने की बात हजम नहीं होती। लालूजी और उनके छोटे भाई अक्सर भूल जाते हैं कि बिहार से बाहर जहाँ और भी हैं। और हाँ, लालूजी से ये पूछना भी बनता है कि क्या उनके गठबंधन, उनके दल और खास तौर पर उनके लिए क्या सचमुच ‘गाय’ ने केवल दूध ही दिया है अब तक, कभी वोट नहीं दिलाए..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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लालू, मांझी और यूपी का हासिल

यूपी चुनाव को लेकर बिहार के दो बड़े नेताओं ने अपना-अपना ‘स्टैंड’ स्पष्ट कर दिया। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने जहाँ महागठबंधन के शेष दो साथियों – जेडीयू और कांग्रेस – से अपना रास्ता अलग करते हुए यूपी चुनाव से दूर रहने का फैसला किया (और फिर तेजस्वी ने अखिलेश यादव के काम की सराहना करते हुए सपा को समर्थन देने की बात कही), वहीं ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने भी अपने गठबंधन (एनडीए) से अलग रास्ता अख्तियार किया, यूपी में अकेले लड़ने का फैसला कर।

कहने वाले भले ही कहें कि लालू ने यूपी में चुनाव ना लड़ने का फैसला कर मुलायम से अपनी रिश्तेदारी निभाई, लेकिन सच यह है कि उन्होंने बड़ा ही परिपक्व निर्णय लिया है। उन्हें पता था कि यूपी में उनकी ‘हैसियत’ उससे अधिक नहीं जितनी मुलायम की बिहार में है। ऐसे में वो अधिक-से-अधिक ‘वोटकटवा’ की भूमिका ही निभा सकते थे वहाँ। यूपी की मृग-मरीचिका में बिना भटके ही उन्हें यह कहने का मौका भी मिल गया कि भाजपा-विराधी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने ये फैसला किया। अच्छा है कि लालू नीतीश की तरह किसी ‘मुगालते’ के शिकार नहीं हुए। अपने कद को अखिल भारतीय करने के ‘मद’ में नीतीश ये मानने को तैयार ही नहीं कि यूपी में उनकी ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की’।

बहरहाल, नीतीश के लड़ने और लालू के ना लड़ने की बात तो समझ में आती है लेकिन मांझी ने किस गलतफहमी का शिकार हो यूपी जाने की सोची, ये समझ के परे है। बिहार में तो बमुश्किल अपनी सीट बचा पाए वो, यूपी में जाने क्या मिलने वाला है उन्हें! हाँ, यूपी के बिहार से सटे कुछ इलाकों में दलित वोटों के मामले में उनकी स्थिति कुछ-कुछ वैसी जरूर मानी जा सकती है जैसी कोसी के इलाके में यादव वोटों के मामले में जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव की। तो क्या यूपी में वो भाजपा के हक में उसके साथ दोस्ताना मैच खेल रहे हैं, जैसे पप्पू ने खेला था बिहार में?

वैसे मांझी का ये दोस्ताना मैच मुलायम के लिए भी हो सकता है और इसके दो बड़े स्पष्ट कारण हैं। पहला ये कि यूपी को जीतने के लिए मायावती के वोटबैंक में सेंध लगाने की जरूरत भाजपा से कहीं अधिक सपा को है और दूसरा ये कि उन्हें इस ‘मैच’ के लिए तैयार करने की खातिर मुलायम के समधी लालू हैं यहाँ। मांझी के लिए लालू का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ महागठबंधन के जन्मकाल से ही जगजाहिर है।

खैर, बिहार के इन नेताओं को यूपी से क्या हासिल होगा, ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन यूपी के चुनाव ने बिहार के दो बड़े गठबंधनों की गांठ ढीली कर दी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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