पृष्ठ : बिहार अबतक

क्यों न जगेगी आस, जब डीएम लेंगे क्लास

पटना के डीएम कल स्थानीय बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल में थे। आप सोचेंगे वे स्कूल के प्रशासनिक दौरे पर गए होंगे, किसी सभा-सेमिनार का आयोजन होगा वहाँ, किसी चीज का शिलान्यास करना होगा उन्हें या फिर किसी कार्यक्रम का उद्घाटन कर रहे होंगे वे। आमतौर पर प्रशासन-तंत्र का सबसे व्यस्त अधिकारी स्कूल जाता भी इन्हीं कारणों से है। लेकिन अगर कहा जाय कि पटना के डीएम स्कूल में क्लास ले रहे थे, तो क्या यकीन करेंगे आप? और अगर कहा जाय कि डीएम समेत तमाम बड़े अधिकारी अब ऐसा नियमित रूप से करेंगे, तब तो आप पक्के तौर पर यकीन नहीं करेंगे। लेकिन जनाब, बिहार में पटना से ये अनूठी पहल हो चुकी है और यहाँ के डीएम संजय कुमार अग्रवाल समेत तमाम बड़े अधिकारी आपको राजधानी के विभिन्न स्कूलों में नियमित रूप से क्लास लेते हुए दिखा करेंगे।

गौरतलब है कि पटना के डीएम संजय कुमार अग्रवाल ने अपने ढंग की अनोखी मिसाल कायम करते हुए तमाम बड़े अधिकारियों को सप्ताह में एक दिन एक घंटा किसी एक सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का निर्देश दिया और शुक्रवार को पटना के बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल में खुद शिक्षक की भूमिका निभाकर इसकी शुरुआत भी कर दी। बकौल डीएम जिले के सब डिविजन और ब्लॉक स्तर के अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों में सप्ताह में एक घंटे के लिए अब इसी तरह शिक्षक की भूमिका में नज़र आएंगे। उन्होंने कहा कि इससे न केवल छात्र-छात्राओं में आत्मविश्वास का संचार होगा, बल्कि करियर काउंसलिंग भी हो पाएगी। इस पहल से सभी विद्यालयों में गुणात्मक सुधार आएगा। अधिकारीगण करंट अफेयर एवं एक्स्ट्राकरिक्युलर ऐक्टिविटी भी बच्चों को बताएंगे।

बता दें कि अब जिले के सभी स्कूलों में एक निरीक्षण पंजी रखी जाएगी, जिस पर अधिकारी रिमार्क लिखेंगे और उन चीजों को भी अंकित करेंगे जो वहाँ के बच्चों के लिए जरूरी हैं। स्कूलों में अधिकारियों के लगातार दौरा करने से छात्रों की उपस्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता और मिड-डे मील समेत तमाम मूलभूत सुविधाओं की गुणवत्ता में इजाफा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं।

पटना के डीएम संजय कुमार अग्रवाल को उनकी अनूठी पहल के लिए जितनी बधाई दी जाय कम है। बिहार में चिन्ता का सबब बन चुकी शिक्षा के सांचे और ढांचे में सुधार के लिए उन्होंने जो अलख जगाई है, उम्मीद है आने वाले समय में बाकी जिलों में भी इसकी लौ जलती दिखाई दे। ऐसे प्रयत्नों से ही बिहार बढ़ेगा और उस गौरव को फिर से हासिल करेगा जिसका वो हकदार है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


लालू ने कहा, आरक्षण खत्म करना चाहती है भाजपा

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने मंगलवार को पटना में कहा कि एमएस गोलवलकर के सिद्धांतों पर चलने वाली भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहती है। आरजेडी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर के जयंती समारोह में लालू ने कहा कि आरजेडी वंचितों और पिछड़ों के अधिकार के लिए संघर्ष करती रहेगी।

गौरतलब है कि लालू समारोह में गोलवलकर की एक किताब लेकर पहुंचे थे। किताब दिखाते हुए उन्होंने कहा कि ‘भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के लोग गोलवलकर के सिद्धांतों पर चलते हैं, गोलवलकर आरक्षण विरोधी थे, ये लोग भी आरक्षण विरोधी हैं। वोट पाने के लालच में आरक्षण समर्थक बन जाते हैं और जीतने पर फिर आरक्षण विरोधी हो जाते हैं।‘

उन्होंने कहा कि आरएसएस के लोग पहले तो अपने दिल में जो है, सो बोल देते हैं और जब भाजपा कहती है कि इससे वोट का नुकसान होगा, तब बात बदलने लगते हैं। ऐसी सांप्रदायिक शक्तियों के इरादे को कभी पूरा नहीं होने दिया जाएगा। लालू ने कहा कि सांप्रदायिक शक्तियों को बिहार ने तो सबक सिखा ही दिया, अब उन्हें उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी धूल चटानी है।

सम्बंधित खबरें


नीतीश भी लालू की राह पर, जेडीयू नहीं लड़ेगी यूपी का चुनाव

कल तक यूपी में चुनावी जमीन तलाश रही जेडीयू ने अचानक यू-टर्न लिया है। पहले वहाँ ‘महागठबंधन’, फिर ‘गठबंधन’ की तमाम कोशिशों के नाकाम रहने के बाद पार्टी ने मौजूदा विधानसभा चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में पटना में सोमवार को हुई पार्टी नेताओं की बैठक में तय किया गया कि जेडीयू यूपी में सेक्युलर वोटों का बिखराव नहीं करेगी और सेक्युलर ताकतों की जीत के लिए अपील करेगी।

जेडीयू के यूपी चुनाव में ताल ठोकने की दो बड़ी वजहें थीं – पहली, बिहार में महागठबंधन के प्रयोग को मिली बड़ी सफलता और दूसरी, यहाँ लागू की गई शराबबंदी को मिला राष्ट्रव्यापी समर्थन। जेडीयू को लगा कि यूपी में हाथ आजमाने का ये सही वक्त है। लेकिन सारी जद्दोजहद के बावजूद पार्टी वहाँ के समीकरण में खुद को फिट नहीं कर पाई। जो भी हो, जेडीयू ने देर से सही लेकिन दुरुस्त निर्णय लिया है। वैसे भी जेडीयू की कमोबेश वहाँ वैसी ही स्थिति रहती जैसी समाजवादी पार्टी की बिहार में रही है या रह सकती है। ऐसे में चुनाव से दूर रहकर नीतीश ने अपनी साख को बट्टा लगने से तो बचा ही लिया, साथ ही सपा-कांग्रेस की जीत की स्थिति में सेक्युलर वोटों के नहीं बिखरने का श्रेय भी लेंगे वो अलग।

हालांकि सच यह है कि पार्टी ने किसी ‘चमत्कार’ की प्रतीक्षा अंतिम क्षण तक की। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव, प्रधान महासचिव केसी त्यागी, नीतीश के करीबी आरसीपी सिंह और रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मदद से कोशिश की गई कि सपा-कांग्रेस गठबंधन में अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के शामिल होने की स्थिति में जेडीयू को भी कुछ सीटें मिल जाएं, लेकिन जब इस गठबंधन में यूपी के कुछ हिस्सों में अस्तित्व रखने वाली रालोद की जगह ही नहीं बन पाई तो फिर जेडीयू की बात ही क्या थी।

बहरहाल, नीतीश और उनकी पार्टी ने सूझ-बूझ वाला निर्णय लिया है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि इस निर्णय के पीछे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के यूपी चुनाव को लेकर लिए गए स्टैंड की भूमिका भी है। लालू ने पहले ही अपनी स्थिति भांप कर राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया था और चुनाव न लड़ने व सपा को साथ देने की बात की थी। अब जेडीयू भी कमोबेश उन्हीं के नक्शेकदम पर है। अच्छी बात है कि यूपी चुनाव के कारण बिहार के जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन में जो दूरी-सी आ गई थी, वो अब नहीं रहेगी। बिहार की राजनीतिक स्थिरता के लिए जहाँ ये अच्छा संकेत है, वहीं भाजपा इससे निराश हुई होगी – यूपी और बिहार दोनों के मद्देनज़र।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


विश्व-इतिहास की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला..! बधाई बिहार..!!

आपने नशे में झूमना तो सुना होगा, लेकिन लोग नशे कि विरोध में झूमें ऐसा केवल बिहार में हो सकता है। जी हाँ, लोग झूमे और सैकड़ों, हजारों, लाखों में नहीं, करोड़ों की संख्या में झूमे… एक साथ झूमे… एक-दूसरे का हाथ पकड़कर झूमे… और ऐसा झूमे कि पूरे तीन करोड़ लोगों की 11, 292 किलोमीटर लंबी श्रृंखला बन गई। जी हाँ, ये विश्व की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला है। अद्भुत, अभूतपूर्व, वर्णनातीत।

बिहार ने सचमुच इतिहास रच दिया। यह विश्व का अकेला ऐसा राज्य बन गया जिसने नशे को न कहने के लिए विश्व की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला की परिकल्पना की और उसे अमलीजामा पहना दिया। इससे पहले 2004 में बांग्लादेश में प्रतिपक्ष ने सरकार के खिलाफ 1050 किमी मानव-श्रृंखला बनाई थी। देखा जाय तो तीन करोड़ लोगों का एक मकसद से एक दिन और एक समय एकजुट होना लगभग असंभव-सी बात थी, जिसे बिहार ने संभव कर दिखाया और शराबबंदी का ऐसा संदेश दिया जिसे पूरी दुनिया ने आश्चर्यचकित होकर देखा और सराहा।

Human Chain_2
Human Chain_2

दिन में 12.15 से 1 बजे के बीच आयोजित इस ऐतिहासिक मानव-श्रृंखला की तस्वीर लेने के लिए तीन उपग्रहों तथा 40 ड्रोनों का इस्तेमाल किया गया। तीन उपग्रहों में एक विदेशी तथा दो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के थे। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के चार हेलीकॉप्टरों से भी एरियल फोटोग्राफी और विडियोग्राफी की गई। इस श्रृंखला को विश्व रिकॉर्ड में शामिल करने के लिए लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के लोग भी पटना में मौजूद रहे।

Human Chain_3
Human Chain_3

वैसे तो इस मानव-श्रृंखला का आयोजन बिहार सरकार ने किया लेकिन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर तमाम दलों ने इसमें जिस तरह बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया वह काबिलेतारीफ है। इसको लेकर जितने उत्साह में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता थे उतने ही भाजपा, लोजपा, रालोसपा समेत अन्य पार्टियों के लोग भी। विभिन्न राजनीतिक दलों के अधिकांश सांसद, विधायक एवं विधानपार्षद इस मौके के गवाह बने। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने पटना के गांधी मैदान में इस अभियान में हिस्सा लिया।

सरकारी कर्मचारी हों या स्कूली छात्र-छात्रा, विशिष्ट जन हों या आम नागरिक, स्त्री हों या पुरुष, बच्चे हों या बूढ़े सबके चेहरे पर अद्भुत उत्साह, सभी गर्व से ओतप्रोत। सभी जानते थे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आह्वान पर वे सभी इतिहास रचने को निकले हैं। अपने मुख्यमंत्री के संकल्प को जिस तरह पूरे राज्य की जनता ने साकार किया वो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया।

विश्व-इतिहास के इस महानतम आयोजन के लिए ‘मधेपुरा अबतक’ विकासपुरुष नीतीश कुमार, बिहार की महान जनता और राज्य के मुस्तैद प्रशासन को बधाई और साधुवाद देता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


ये दुर्घटना नहीं, 25 लोगों की ‘हत्या’ है मेरी सरकार!

अभी-अभी सम्पन्न हुए ऐतिहासिक प्रकाशोत्सव के दौरान अपनी तैयारी और मुस्तैदी से देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने वाली बिहार सरकार ने मकर संक्रान्ति की जैसी अनदेखी की, वह हैरान कर देने वाली है। प्रकाशोत्सव के दौरान देश और दुनिया के अलग-अलग कोनों से लगभग 8 लाख लोग पटना आए, पर क्या मजाल कि किसी को कोई चोट तक लगी हो। लेकिन 14 जनवरी को राजधानी पटना से लगे गंगा दियारा में पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित पतंग-उत्सव में महज कुछ हजार लोग जुटे और 25 लोग अपनी जान गंवा बैठे और कई लापता हैं! इस हादसे का वायरल हो चुका वीडियो देखें, प्रशासन का कोई आदमी आसपास भी नहीं दिखेगा आपको। क्या हमारा प्रशासन अब तक प्रकाश-पर्व की थकान मिटाने में लगा है और हमारी सरकार उस आयोजन के लिए मिली प्रशंसा के जश्न में खोई है?

जी हाँ, प्रशासनिक लापरवाही इस दुर्घटना की सबसे बड़ी वजह है। गौरतलब है कि प्रकाश-पर्व से जुड़ी तमाम तैयारियों की निगरानी मुख्य सचिव और डीजीपी स्तर के अधिकारियों के अलावा खुद मुख्यमंत्री कर रहे थे, जबकि मकर संक्रान्ति के लिए उसकी चौथाई तत्परता भी न थी। आखिर मकर संक्रान्ति के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? क्या सरकार का समूचा तंत्र इस दिन मुख्यमंत्री द्वारा आयोजित चूड़ा-दही भोज में व्यस्त था? अगर नहीं, तो प्रकाशोत्सव पर इतनी चुस्ती और पतंगोत्सव पर ऐसी चूक क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो अंतर्राष्ट्रीय आयोजन था और उसमें शामिल होने वाले लोग उसका प्रचार दूर-दूर तक करते, जबकि पतंगोत्सव में शामिल होनेवाले अधिकांश लोग राजधानी पटना और आसपास के थे? ये चिराग तले अंधेरा नहीं तो और क्या है?

बता दें कि आयोजन-स्थल के पास ही बना डॉल्फिन आइलैंड अम्यूजमेंट पार्क इस हादसे की दूसरी बड़ी वजह है। जिस जगह इस पतंगबाजी का आयोजन किया गया था उससे थोड़ी ही दूरी पर ये अम्यूजमेंट पार्क भी है, जहाँ लोग काफी संख्या में जुटे थे। स्थानीय लोगों के मुताबिक जो नाव डूबी, उस पर सवार लोगों में बड़ी संख्या इसी पार्क में घूमने आए लोगों की थी। जबकि आप आश्चर्य करेंगे कि इस अम्यूजमेंट का निर्माण ही अवैध है। इसे बिना किसी सरकारी या प्रशासनिक मंजूरी के ही बनाया गया है।

इस दर्दनाक घटना की तीसरी वजह थी नाव पर क्षमता से अधिक लोगों की मौजूदगी। इस नाव पर 50 से ज्यादा लोग मौजूद थे, जबकि होने चाहिएं थे आधे से भी कम। स्थानीय लोग बताते हैं कि शाम होने पर सब वापस लौटने की जल्दी में थे, पर प्रश्न उठता है कि उन्हें रोकने-टोकने और भीड़ को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी जिनके ऊपर थी, वो कहाँ थे? पर्याप्त संख्या में नाव और स्टीमर क्यों नहीं थे? और ऐसी आपातस्थिति से निबटने के लिए पर्याप्त गोताखोर क्यों नहीं थे?

बहरहाल, अनहोनी तो हो गई। पर क्या इसे दुर्घटना कहेंगे? क्या सरकार और प्रशासन की लापरवाही के कारण, अनजाने में ही हुई, ‘हत्या’ नहीं है ये? राज्य और केन्द्र सरकार अब मृतकों पर मुआवजों की बारिश करेगी। पर इससे होगा क्या? जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाईं उनके घरों की ‘मकर संक्रान्ति’ क्या फिर लौटेगी कभी?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


बनें श्रृंखला के भागीदार……. नशामुक्त बने बिहार !

बिहार की नीतीश सरकार द्वारा शराबबंदी के समर्थन में यह आह्वान किया गया था कि राज्य के बच्चे-बूढ़े एवं माता-बहनें सभी 21 January को 10:00 से 10:30 तक अपने-अपने घर के सामने मानव श्रृंखला (Human Chain) का हिस्सा बनेंगे जिसका समय अब 12:15 से 1:00 बजे तक बदल दिया गया है |

यह भी बता दें कि मानव श्रृंखला को सफल बनाने हेतु जिले से लेकर पंचायत के गांव-गांव एवं टोले-टोले तक में संयोजक समितियां बनने लगी तथा श्रृंखला में शामिल होने के लिए घर-घर निमंत्रण दिया जाने लगा | हर डगर, हर मोड़ पर एक दूसरे से यही कहते सुने जाते हैं- बनें श्रृंखला के भागीदार……. नशामुक्त बने बिहार ! और अब तो चौक-चौराहों से लेकर चाय-पान की दुकानों पर लोग यही कहते हैं- ऐतिहासिक होगी मानव श्रृंखला ! और दो करोड़ से अधिक लोग होंगे समर्थन श्रृंखला में शामिल !!

यह भी जानिए कि 11 हजार किलोमीटर से भी अधिक लंबी बननी है शराबबंदी (Liquor  Ban in Bihar) के समर्थन में मानव श्रृंखला जिसमें होंगे दो करोड़ से अधिक जागरुक बिहारवासी के लगभग 5 करोड़ कर्मठ हाथ | गौरतलब है कि इस मानव श्रृंखला की सेटेलाइट से तस्वीर ली जानी  है | दो दिनों से राज्य के मुख्य सचिव ने इसरो(ISRO) की टीम के साथ ‘ तारामंडल ’ में बैठक की, विचार-विमर्श किया तथा ऐतिहासिक मानव श्रृंखला की तस्वीर सेटेलाइट द्वारा लेकर बिहार की इतनी लंबी मानव श्रृंखला का विश्व रिकॉर्ड ( World Record of Human Chain) बनाकर देश-दुनिया को एक नया संदेश देंगे |

बता दें कि 3 सेटेलाइट के जरिये मानव श्रृंखला की तस्वीर ली जायेगी | छह हेलीकॉप्टर बिहार के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण करेंगे जिससे निगरानी के साथ-साथ वीडियो रिकॉर्डिंग भी होगी | 30 मिनट की फिल्म भी बनेगी |

Madhepura SDM Sanjay Kumar Nirala motivating people at Kumarkhand.
Madhepura SDM Sanjay Kumar Nirala motivating people at Kumarkhand.

यूँ तो मधेपुरा जिले के डायनेमिक डी.एम. मो.सोहैल (DM Md.Sohail) की टीम भी कमर कस ली है कि इस बार भी मधेपुरा इतिहास का हिस्सा बनेगा | तभी तो सदर अनुमंडलाधिकारी संजय कुमार निराला मानव श्रृंखला की सफलता हेतु कुमारखंड प्रखंड में पूर्वाभ्यास में मुस्तैद देखे गये | तमाम पदाधिकारियों के साथ, जो मानव श्रृंखला शंकरपुर से होकर कुमारखंड में जुड़ेगी, उसका स्थल निरीक्षण एस.डी.एम. संजय कुमार निराला ने किया | मौके पर डीसीएलआर रवि शंकर शर्मा, बीडीओ डॉ.मणिमाला कुमारी, सीओ मनोज वर्णवाल, एम ओ चंदन कुमार, पी.ओ. भोला दास, बीईओ अमरेन्द्र ठाकुर, जे.ई.पीके  प्रवीण एवं एलएस आदि पदाधिकारीगण मौजूद देखे गये | सभी अनुमंडलों एवं प्रखंडों में मानव श्रृंखला की तैयारी जोरों पर है |

सूबे के मुखिया नीतीश कुमार की “ सात निश्चय “ यात्रा भी तो युवाओं को जागृत करने में लगी है | हर जगह चर्चा हो रही है- सेटेलाइट ही श्रृंखला का फोटो खींचेगा, हेलीकॉप्टर निगरानी करेगा, श्रृंखला टूटने का भी चित्र ड्रोन द्वारा लिया जायगा | इसरो के वैज्ञानिकों- बी.नरेंद्र, पी श्रीनिवासन, डॉ.डी.गुप्ता, वाई के श्रीवास्तव आदि के निरीक्षण में कार्यक्रम संचालित होगा |

शराबबंदी की घोषणा के बाद से आपराधिक घटनाओं जैसे- हत्या, लूट, डकैती, फिरौती, बलात्कार आदि में आ रही कमी की चर्चाकर लोगों को जागरूक किया जा रहा हैं | कुछ विपक्षी पार्टियों को छोड़कर शेष सभी राजनीतिक पार्टियां तो शराबबंदी को समाजिक क्रांति कहने लगी है |

सम्बंधित खबरें


‘बड़े’ और ‘छोटे’ भाई ने दिया ‘समझदारी’ का परिचय

कहा जा रहा था कि 5 जनवरी को प्रकाश-पर्व के दौरान पटना के गांधी मैदान में हुए कार्यक्रम, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिरकत की थी, में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित अन्य चुनिंदा हस्तियों के साथ मंच पर नहीं बिठाए जाने से लालू सख्त नाराज हैं और इसकी शिकायत वे नीतीश से करेंगे। पर लालू ने संयम और समझदारी का परिचय देते हुए न केवल इस मसले को तूल नहीं दिया बल्कि यह कह कर सबको उलटा चौंका दिया कि “हमें किसी चीज की शिकायत नहीं है। पूजा-पाठ जमीन पर बैठकर करते हैं… और वह गुरु का दरबार था।“

गौरतलब है कि इस कार्यक्रम में लालू अपने दोनों बेटों के साथ मंच के सामने बिछी दरी पर बैठे थे। राजनीतिक गलियारे में इस बात की जमकर चर्चा हुई। आरजेडी खेमे में तो इस पर खासा हो-हल्ला मचा। पार्टी के उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने यहाँ तक कहा कि ऐसा नहीं लग रहा था कि गुरु गोविन्द सिंह जी के 350वें प्रकाश-पर्व के लिए इंतजाम महागठबंधन की सरकार ने किए थे। बल्कि ऐसा लग रहा था कि सत्ता में शामिल किसी एक पार्टी ने ये इंतजाम किए हों। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लालू को मंच पर जगह नहीं देना लोगों को पसंद नहीं आया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री अशोक कुमार चौधरी ने भी इसको लेकर विरोध जताया था। पर इन सबके उलट लालू, यहाँ तक कि विरोधियों द्वारा ‘अपरिपक्व’ कहे जाने वाले उनके बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी ने भी, कोई तल्ख बयान नहीं दिया। नीतीश के प्रति कोई भी ‘कड़वाहट’ उनकी ओर से तो नहीं ही दिखी, मीडिया को भी इस मुद्दे को हवा देने से उन्होंने रोका।

लालू ने इस पूरे मामले को जिस तरह हैंडल किया और प्रकाशोत्सव को लेकर बिहार सरकार के काम की सराहना की उसका असर नीतीश पर भी दिखा। सोमवार को पटना में लोकसंवाद कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि प्रकाशोत्सव के शानदार आयोजन की चारों ओर चर्चा है, पर कुछ लोग लालू प्रसाद जी के नीचे बैठने की बात उछाल रहे हैं। उनको यह भी पता नहीं कि गांधी मैदान के दरबार हॉल में धार्मिक कार्यक्रम का मूल आयोजनकर्ता कौन था। मूल आयोजनकर्ता गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी थी। सिख समाज में सब लोग जमीन पर ही बैठते हैं। जो लोग मंच पर थे, वे भी कुर्सी पर नहीं बैठे थे। राष्ट्रपति और प्रधानंमत्री के कार्यक्रम में मंच पर कौन बैठेगा, यह दिल्ली से ही तय होता है। बहरहाल, इतना कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि ‘बड़े’ और ‘छोटे’ भाई ने पूरे मामले में अत्यंत समझदारी का परिचय दिया, और ये काबिलेतारीफ है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


मोदी-नीतीश हुए ‘नजदीक’ तो लालू हुए मंच से ‘दूर’!

पटना में आयोजित प्रकाश-पर्व अपनी अनूठे आतिथ्य और अभूतपूर्व भव्यता के साथ दो और कारणों से चर्चा में है – पहला, मोदी-नीतीश की जुगलबंदी से निकले नए सुर और दूसरा, लालू को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राज्यपाल रामनाथ कोविंद, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और मेजबान नीतीश कुमार के साथ मंच पर जगह नहीं मिलना, जबकि लालू अपने दोनों बेटों के साथ मंच के सामने ही विराजमान थे। बात अगर केवल मोदी और नीतीश द्वारा एक-दूसरे की तारीफ करने तक ही सीमित रहती तो थोड़ी देर के लिए कुछ और भी सोचा-समझा जा सकता था। लेकिन एक तरफ वे दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा के पुल बांध रहे थे और दूसरी तरफ राज्य के मुख्यमंत्री और केन्द्र में रेलमंत्री रह चुके और वर्तमान में सत्तारूढ़ महागठबंधन के सबसे बड़े दल के सर्वेसर्वा लालू प्रसाद यादव अपने दोनों ‘लाल’ के साथ अपनी ‘असह्य अनदेखी’ से अपमान का दंश झेल रहे थे। जाहिर है, बात करने वाले बात करेंगे ही।

प्रश्न उठता है, ऐसा क्यों हुआ? क्या लालू की शख्सियत इतनी आसानी से नज़रअंदाज कर दी जाने वाली है, और वो भी बिहार में? कायदे से मंच पर उनकी जगह तो बननी ही चाहिए थी, पदानुसार उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी को भी वहाँ होना चाहिए था। पर बाप-बेटे दोनों नदारद। मंच से भी और मोदी और नीतीश के संबोधन से भी। हालांकि प्रशासन के लोग ये तर्क दे रहे हैं कि केन्द्र के मंत्रियों को मंच पर जगह मिलनी चाहिए, ये पीएमओ की ओर से कहा गया था। चलिए ये मान लेते हैं। तो क्या ये भी मान लिया जाय कि लालू और तेजस्वी को मंच पर जगह न मिले, इसका भी निर्देश ‘ऊपर’ से ही था? क्या मेजबान नीतीश अपने विवेक का प्रयोग कर कम-से-कम लालू को मंच पर नहीं बुला सकते थे, जबकि मंच पर पर्याप्त जगह थी?

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब मोदी और नीतीश एक-दूसरे को फूटी आँख देखना पसंद नहीं करते थे। 17 साल तक एनडीए के साथ सत्ता का सुख भोग चुके नीतीश ने मोदी को प्रधानंमत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के साथ गठबंधन रिश्ते तोड़ डाले थे। बिहार के चुनाव में एक-दूसरे पर निशाना साधने में दोनों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मोदी ने नीतीश पर अपने सामने से ‘थाली’ खींच लेने का आरोप लगाया तो नीतीश ने ‘डीएनए’ को मुद्दा बनाकर बकायदा हस्ताक्षर अभियान चलाया था। ऐसे में दोनों के बीच रिश्तों में आई ‘गर्माहट’ से अटकलबाजियों का बाज़ार गर्म होना स्वाभाविक है।

गौरतलब है कि आरजेडी और जेडीयू में भले ही गठबंधन हो, लेकिन दागी आरजेडी विधायक राजवल्लभ से लेकर सांसद शहाबुद्दीन तक के मामलों पर दोनों दलों का टकराव सामने आ चुका है। जमानत पर कुछ दिन के लिए बाहर निकले शहाबुद्दीन ने नीतीश को अपना नेता मानने से ही इनकार कर दिया था। वरिष्ठ आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह खुलेआम कई बार नीतीश पर निशाना साध चुके हैं। नोटबंदी पर विपक्ष के एकजुट होने के प्रस्ताव पर जेडीयू के अलग होने पर भी आरजेडी सुप्रीमो लालू ने परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए इसे ‘इगो’ की समस्या कहा था।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि नीतीश का ताजा रुख लालू पर राजनीतिक दवाब कायम करने की कवायद हो सकती है। नीतीश लालू को मैसेज देना चाहते हैं कि उनके सामने विकल्प खुले हुए हैं। उधर भाजपा को लगता है कि उसे स्वाभाविक तौर पर एक अतिरिक्त सहयोगी मिल जाय तो हर्ज ही क्या है? राज्यसभा में केन्द्र के सत्ताधारी गठबंधन का कम संख्याबल भी भाजपा को जेडीयू से नजदीकी बढ़ाने को प्रेरित करता है। कई अहम बिल वहाँ पास होने हैं। ऐसे में अगर आने वाले समय में मोदी और नीतीश का एक-दूसरे के लिए उपजा ‘प्रेम’ और प्रगाढ़ हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

सम्बंधित खबरें


मोदी भी हुए मुरीद, प्रकाश-पर्व पर मेजबानी की मिसाल बना बिहार

और नरेन्द्र मोदी भी मुरीद हो गए बिहार और नीतीश कुमार के। गुरु गोविंद सिंह के 350वें प्रकाश-पर्व पर आज पटना आए प्रधानमंत्री ने दिल खोलकर इस अवसर पर की गई भव्य व्यवस्था और भावपूर्ण आतिथ्य की सराहना की। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुक्त कंठ से तारीफ की उनके शराबबंदी अभियान को लेकर और कहा कि देश और दुनिया के लिए मिसाल बनेगा बिहार। इससे पहले नीतीश कुमार ने भी शराबबंदी को लेकर गुजरात और इस संदर्भ में वहाँ के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी के योगदान की तारीफ की थी। अब परस्पर की गई ये ‘तारीफ’ कितनी ‘दूर’ तक जाती है, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, फिलहाल बात प्रकाश-पर्व की।

देखा जाय तो बिहार के लिए इससे सुंदर नहीं हो सकता था नए साल का आगाज। एक ओर राजधानी पटना में सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती पर प्रकाशोत्सव का आयोजन तो दूसरी ओर बुद्ध की नगरी गया में 34वीं कालचक्र पूजा का अनुष्ठान… पटना में देश-विदेश से आए सिख तो गया में बौद्ध श्रद्धालुओं का सैलाब… यानि अंतर्राष्ट्रीय महत्व के दो विशाल आयोजनों का मेजबान बनना था बिहार को। देश-दुनिया की निगाहें टिकी थीं बिहार पर और बिहार ने इतिहास रच दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में क्या शानदार इंतजाम किया हमारे शासन और प्रशासन ने!

पिछले साल सितंबर में प्रकाशोत्सव की कड़ी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सिख कॉनक्लेव ने ही यह संकेत दे दिया था कि बिहार एक नया इतिहास लिखने की राह पर है। इसे महसूस कर ही पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने उस समय कहा था कि बिहार जैसा तो पंजाब भी नहीं कर सका। तब और आज प्रकाशोत्सव पर आई विभिन्न क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों, श्रद्धालुओं, सेवादारों, जत्थेदारों के सुर एक हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और पंजाब कांग्रस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह, पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल, केन्द्रीय मंत्री एसएस अहलुवालिया से लेकर पंजाब सहित देश और दुनिया के अलग-अलग कोने से आए अनगिनत श्रद्धालु तक – सब के सब चकित हैं बिहार की व्यवस्था और आतिथ्य देखकर।

पटना स्थित हरमंदिर साहब गुरुद्वारा हो, वहीं स्थित बाललीला साहब हो, भव्य दरबार हॉल हो, गांधी मैदान, पटना बाईपास और पटना सिटी स्थित कंगन घाट पर टेंट सिटी का निर्माण हो, इन स्थलों पर अनवरत चलने वाले लाखों लोगों का लंगर हो, मंगल तालाब का लेजर शो हो, गांधी मैदान से गुरुद्वारे तक लगभग नौ किलोमीटर तक चला नगर-कीर्तन हो, गुरु गोविंद सिंह के चित्रों की प्रदर्शनी हो, हरमंदिर साहब और गांधी मैदान सहित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, भारतीय नृत्य कला मंदिर, रविन्द्र भवन आदि के सांस्कृतिक आयोजन हों, शहर के चप्पे-चप्पे की सफाई, सजावट और सुरक्षा हो, स्वागत-द्वार, होर्डिंग व बैनर से पटे चौक-चौराहे हों या फिर कदम-कदम पर बने हेल्प डेस्क – हर चीज अद्भुत, अभूतपूर्व और अविस्मरणीय। मुख्य आयोजन-स्थल पटना के गांधी मैदान में तो जैसे पूरा का पूरा शहर ही बसा दिया गया – हर सुविधा से लैस।

बीते कुछ वर्षों में असहिष्णुता देश में बड़ा सियासी व सामाजिक मुद्दा बनकर सामने आया है। इन्हीं कारणों से बड़े धार्मिक आयोजन भी संवेदनशील बनते गए हैं। ऐसे में इतने बड़े उत्सव का इतना सफल आयोजन कर बिहार ने न केवल देश बल्कि दुनिया भर में मिसाल कायम की है। उम्मीद है कि एक बार  फिर बिहार की धरती से सर्व धर्म समभाव का संदेश दुनिया भर में जाएगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


लालू के सारे सवाल ‘अनर्गल’ नहीं हैं प्रधानमंत्रीजी!

नोटबंदी के 50 दिन बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश को आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने पूरी तरह फ्लॉप शो करार दिया है। नववर्ष की पूर्व संध्या पर दिए गए प्रधानमंत्री के इस संदेश को शून्य अंक देते हुए लालू ने भावहीन, प्रभावहीन, उत्साहहीन और घुटनों के बल रेंगता हुआ प्री-बजट भाषण बताया। भाषण में नोटबंदी की चर्चा नहीं करने पर तंज कसते हुए लालू ने कहा कि प्रधानमंत्री ने भी मान लिया है कि उनका अभियान बुरी तरह फेल हो गया, इसीलिए इसकी कोई चर्चा नहीं की। उपलब्धि होती तो पीट-पीटकर ढोल फाड़ देते।

प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती देते हुए आरजेडी के मुखिया ने कहा कि त्याग-बलिदान की कथा और परमार्थ की बातें वे अपने अमीर मित्रों के सुनाकर देखें। दो मिनट में कुर्सी छिन जाएगी। इस ‘शुद्धि यज्ञ’ की ओट में गरीबों की बलि चढ़ाने का अधिकार उन्हें किसने दिया? प्रधानमंत्री पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए लालू ने कहा कि 50-50 दिन चिल्लाने वाले प्रधानमंत्री पर अब कोई भरोसा नहीं करेगा। सैकड़ों लोगों की जान चली गई। 25 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया। इसके बावजूद इतना संवेदनहीन और हृदयहीन भाषण। अफसोस का एक शब्द भी नहीं।

प्रधानमंत्री से सवालों की झड़ी लगाते हुए लालू ने पूछा कि अर्थव्यवस्था का कितना नुकसान हुआ? इसकी भरपाई कैसे होगी? जीडीपी में कितनी गिरावट आई? नए नोट छापने पर कितना खर्च हुआ? कितना कालाधन आया? बैंकों में कितना जमा हुआ? कितनी नौकरी गई? लालू ने कहा कि मोदी को बताना चाहिए था कि आम लोगों की इतनी फजीहत के बाद कितना कालाधन आया? कितने भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हुई? जो लोग कतारों में खड़े रहकर मर गए, उनके परिजनों को कितना मुआवजा दिया जाएगा? फैक्ट्रियों के बंद होने से बेरोजगार होने वाले लाखों युवाओं को सरकार कितनी राशि देगी?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नोटबंदी मोदी सरकार का साहसिक और कई मायनों में ऐतिहासिक निर्णय था। इसके दूरगामी परिणाम भी प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक होंगे, ये भी मान लेते हैं। लालू का इस तरह सवालों की बौछार करना भी उनकी राजनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन एक बार अपने हृदय पर हाथ रखें और कहें कि क्या सचमुच लालू के सारे सवाल तथ्यहीन और अनर्गल हैं? क्या नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री मोदी सचमुच उस ‘रंग’ में थे, जिसके लिए वे जाने जाते हैं? उनके बहुप्रतीक्षित संबोधन में कुछ लुभावनी घोषणाएं तो थीं, लेकिन क्या हमारे-आपके मन में उमड़ते-घुमड़ते कई प्रश्न अनुत्तरित नहीं रह गए?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें