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डरने और विनम्र होने में फर्क होता है, राबड़ीजी!

‘मेरे बेटे तेजप्रताप और तेजस्वी सुशील मोदी से डरने वाले हैं क्या?’ ये कहना है बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी सुप्रीमो लालू के दोनों ‘तेज’ राबड़ी देवी की मां का। दरअसल राबड़ी देवी बुधवार को विधान परिषद के मुख्य द्वार पर मीडिया से मुखातिब थीं और बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील मोदी की उस टिप्पणी पर बोल रही थीं जो उन्होंने मंगलवार को स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव की सदन में अनुपस्थिति पर की थी। सुशील मोदी ने कहा था कि तेजप्रताप यादव को बांसुरी बजाने, घुड़सवारी करने और जलेबी छानने की फुर्सत है, लेकिन सदन में आने की नहीं।

गौरतलब है कि मोदी के इस बयान पर बिहार के राजनीति में तहलका मच गया है। उन्होंने लालू-राबड़ी के बड़े बेटे के कामकाज को लेकर सवाल उठाया था और विधानसभा में गैरहाजिर रहने के कारण उन्हें बर्खास्त करने की मांग की थी।

बहरहाल, मां ने तो जो कहना था कहा, जवाब देने में बेटा भी पीछे न रहा। तेजप्रताप ने सोशल मीडिया पर सुशील मोदी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सुशील मोदी जी लालू प्रसाद यादव के पीए रह चुके हैं और मैंने राजनीति लालू प्रसाद यादव से सीखी है। लिहाजा मुझे सुशील मोदी नसीहत न दें। पाठकों को बता दें कि छात्र राजनीति के दौरान सुशील मोदी लालू के साथ व पदेन उनके अधीन काम कर चुके हैं। लालू जिस समय अध्यक्ष (President) थे उस समय मोदी सचिव (Secretary) थे, जिसका तर्जुमा तेजप्रताप पीए (Private Assistant) कर रहे हैं।

खैर, तेजप्रताप यहीं नहीं रुके। आगे उन्होंने कहा कि जब सुशील मोदी जी जैसे लोग मुझे ट्रेनिंग की बात करते हैं तो उनकी योग्यता पर मुझे दया आती है…। इससे पहले भी तेजस्वी को मिले विवाह-प्रस्तावों के बाद मोदी द्वारा तेजप्रताप के विवाह के बारे में सवाल करने पर तेजप्रताप ने उन्हें न केवल अपने बेटे की चिन्ता करने की नसीहत दी थी, बल्कि यहां तक कह डाला था कि क्या उनका बेटा नपुंसक है?

बहरहाल, इस प्रकरण पर टिप्पणी की भी जाए तो क्या। हमलोग तो गुजर ही रहे हैं ढहते संस्कारों और बिकते विचारों के दौर में। फिर भी यह कहना पड़ेगा कि पहले तो सुशील मोदी जैसे गंभीर नेता को कोई अगंभीर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी। वे स्वास्थ्य मंत्री की अनुपस्थिति की बात जरूर कहते लेकिन  जलेबी छानने तक नहीं पहुंचते। और दूसरी और बेहद जरूरी बात यह कि राज्य के मुख्यमंत्री समेत कई महत्पूवर्ण पदों पर रह चुके लालू और राबड़ी को अपने बेटे को ऐसे मामलों में शह देने की बजाय विनम्रता और मर्यादा की सीख देनी चाहिए। यह न केवल उनके पुत्र के हित में होगा बल्कि उस पूरी पीढ़ी के हित में होगा जो अभी राजनीति में उतर रही है और अब भी इसमें संस्कार और विचार ढूंढ़ने की आस लगा रही है। उसे तो ‘डरने’ और ‘विनम्र होने’ का फर्क पता हो।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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विधान पार्षद संजीव हैट्रिक की राह पर……!!

चुनाव की तिथि 9 मार्च आने में अभी 3 दिन बांकी है और कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से खड़े त्रिदेवों- डॉ.संजीव कुमार सिंह, प्रो.जगदीश चन्द्र और नीतेश कुमार- में से किसी एक को विधान पार्षद चुनने के बाबत अभी से ही शिक्षक मतदाताओं के बीच चुनावी सरगर्मी परमान चढ़ने लगी है । इस चुनाव में 14 जिले (यानी 65 विधानसभा अथवा 12 लोकसभा क्षेत्र) में फैले 157 मतदान केंद्रों पर कुल 14 हज़ार 40 शिक्षक मतदाताओं द्वारा 9 मार्च को प्रातः 8:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक अपने मताधिकार का प्रयोग किया जायेगा ।

यह भी बता दें कि स्कूल, कॉलेज एवं विश्वविद्यालय के सभी मतदातागण अपने वर्तमान विधान पार्षद सह प्रत्याशी डॉ.संजीव कुमार सिंह की जीत सुनिश्चित करने के लिए आपस में चर्चाएं शुरु कर दी हैं । तभी तो किसी महाविद्यालय के प्राचार्य को अपने यहाँ के मतदाता शिक्षकों से यह कहते हुए सुना जा रहा है कि वोट के दिन आधार कार्ड, वोटर आईकार्ड, पेन कार्ड आदि में से कोई ‘एक’ साथ में रख लेना है तो सामने खड़ा कोई मतदाता शिक्षक बोलता है- सर ! मेरे साथ तो ड्राइविंग लायसेंस हमेशा रहता है । लगे हाथ तीसरा मतदाता शिक्षक ऊंची आवाज में कह उठता है- सावधान ! मतदान कक्ष के भीतर अपनी कलम का प्रयोग कोई नहीं करेगा बल्कि चुनाव आयोग द्वारा वहाँ रखी गई ‘कलम’ से ही संजीव कुमार सिंह या अन्य नाम के आगे प्रथम वरीयता का मत [।] यूँ अंकित करना होगा ।

चारों ओर यह भी चर्चा है कि वर्तमान विधान पार्षद डॉ.संजीव कुमार सिंह को दो तिहाई से अधिक मतदाताओं ने जहाँ हैट्रिक लगाने के लिए खुलकर हामी भरी है वहीं जीत के फासले का नया रिकॉर्ड बनाकर मतदाताओं के मनोबल को ऊंचाई प्रदान करने हेतु संजीव ने पूरी ताकत झोंक दी है ।

लोकतांत्रिक क्षरण के इस हालिया दौर में भी प्रत्याशी संजीव कुमार सिंह को अपने शिक्षकों अथवा रिटायर्ड अध्यापकों-प्राध्यापकों के दुख-दर्द में पिता शारदा प्रसाद सिंह की तरह संजीवनी बनकर हर परिस्थिति में खड़ा देखकर डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने शारदा बाबू की तरह उसे भी आदि से अंत तक सहयोग देते रहने का निश्चय कर लिया है ।

बता दे कि यह वही डॉ.मधेपुरी हैं जो बीएन मंडल विश्वविद्यालय में विकास पदाधिकारी, परीक्षा नियंत्रक, कुलानुशासक आदि अन्य कई महत्वपूर्ण पदों पर वर्षों कार्यरत रहकर सातो जिला मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया के कॉलेज शिक्षकों के बीच अपनी निष्ठा एवं सत्कर्मों की बदौलत उनके दिलों में जगह बना ली और संजीव की जीत के लिए विगत दो चुनावों में विनम्र आह्वान किया तो शिक्षक मतदाता बन्धुओं ने जीत भी दर्ज कराई ।

वर्तमान चुनाव प्रचार के दरमियान जब प्रत्याशी के रूप में संजीव कुमार सिंह मधेपुरा आए और डॉ.मधेपुरी के ‘वृन्दावन’ निवास पर पधारे तो बातें करते हुए मधेपुरी ने संजीव से यही कहा- “महागठबंधन में रहकर भी शिक्षकों के हित में अनुकूल निर्णय लागू कराने की दिशा में हमेशा अपनी बातें निर्भीकतापूर्वक रखें तथा अपने पिताश्री की तरह हमेशा बौद्धिक सजगता प्रदर्शित करते रहें । तभी तो  “समान कार्य-समान वेतन” के लिए किए जा रहे संघर्ष को सुप्रीम कोर्ट भी सार्थक संघर्ष कबूल किया है ।”                       

अंत में डॉ.मधेपुरी ने चलते-चलते हैट्रिक बनाने हेतु शुभाशीष देते हुए उन्हें यही जीवन-संदेश दिया- “संसार के प्रत्येक व्यक्ति पर माता,पिता एवं गुरु-ऋण के अतिरिक्त समाज का ऋण भी होता है । जो व्यक्ति राष्ट्रपथ पर कठोर कर्मयोगी बनकर कर लोकऋण चुकाता रहेगा वही विजेता बनेगा और वैसे ही व्यक्ति के जीवन में सदा फूल खिलते रहेंगे ।” विदा होते वक्त डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने भावुक होकर डॉ.संजीव कुमार सिंह के माथे पर हाथ रखते हुए बस इतना ही कहा-  कर्मयोगी पिता के यश और कीर्ति की ऊंचाइयों को  उर्ध्वगामी बनाये रखना……….!!

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बिहार के नए बजट में न कोई नया कर, न नोटबंदी का असर

बिहार की महागठबंधन सरकार का दूसरा बजट कई लुभावनी बातों के लिए याद रखा जाएगा, बशर्ते कि उन्हें अमलीजामा पहना दिया जाए। गौरतलब है कि शराबबंदी और नोटबंदी के बाद ये पहला बजट था। इस कारण हर आम और खास की नज़र इस बजट पर थी। बता दें कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की उपस्थिति में वित्तमंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी द्वारा वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए पेश किए गए इस बजट में पहली बार डेढ़ लाख करोड़ से अधिक (1 लाख 60 हजार करोड़) पूंजीगत व्यय का अनुमान है। बजट में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय, पिछड़ों के कल्याण और कैशलेस टैक्स कलेक्शन पर खास जोर दिया गया है। सबसे अहम ये कि नए बजट में कोई नया कर नहीं लगाया गया है।

वित्तमंत्री ने अपने 22 मिनट के अतिसंक्षिप्त भाषण में कहा कि नोटबंदी का बिहार पर कोई असर नहीं पड़ने देंगे। नोटबंदी के बाद के झंझावातों से उबरने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि बिहार में बैंकों की संख्या बढ़ाई जाएगी। खाताधारियों को प्लास्टिक मनी देने पर जोर दिया जाएगा। अभियान चलाकर पीओएस मशीनें लगाई जाएंगी और कर की चोरी रोकने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

वैसे देखा जाय तो कुल मिलाकर बजट मुख्यमंत्री के सात निश्चय कार्यक्रम पर केन्द्रित रहा। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क और कृषि समेत सात निश्चय कार्यक्रम के तहत होने वाले कार्यों को प्राथमिकता दी गई है। कुल बजट के विभागवार व्यय प्रतिशत की बात करें तो शिक्षा के मद में सर्वाधिक 17.93% व्यय होना है। शिक्षा के बाद ग्रामीण विकास हेतु 12.26% और ग्रामीण कार्य के लिए 10.74% बजट का प्रावधान किया गया है। अन्य विभागों की बात करें तो ऊर्जा के मद में 8.57%, पथ-निर्माण के मद में 7.19%, समाज-कल्याण के मद में 6.18%,  स्वास्थ्य के मद में 4.50%, जल संसाधन के मद में 3.57%, नगर विकास एवं आवास के मद में 3.45%, पंचायती राज के मद में 3.26%, कृषि के मद में 2.95% और योजना एवं विकास के मद में 2.66% बजट का प्रावधान किया गया है।

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के लिए प्राथमिकता के आधार पर आवास की व्यवस्था और कार्यरत सेवानिवृत कर्मचारियों के लिए प्रभावशाली स्वास्थ्य योजना लागू करने की बात कही। उन्होंने महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर खास फोकस करने और बुनकरों की स्थिति बेहतर करने  के लिए उनके कौशल विकास की बात भी कही।

गौरतलब है कि बिहार का पिछले वित्तीय वर्ष का बजट 1,44,696.27 करोड़ रुपए का था। इस तरह पिछले साल के मुकाबले इस साल का बजट लगभग 15 हजार करोड़ अधिक का है। यह भी जानें कि इस वित्तीय वर्ष में 18,112 करोड़ रुपए का राजकोषीय घाटा रहने का अनुमान है जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (6,32,180 करोड़ रुपए) के मुकाबले 2.87% है।

बकौल सिद्दीकी केन्द्र सरकार की प्रतिकूल नीतियों जैसे विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिए जाने, फंड शेयरिंग का पैटर्न बदल देने, विशेष पैकेज नहीं देने और नोटबंदी के झंझावात के बावजूद राज्य सरकार का उत्साह बना रहा है। उन्होंने कहा कि हम चांद और सूरज की बात नहीं करते, दीये की बात करते हैं, यह आम आदमी के जुझारूपन का प्रतीक है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश के बेटे निशांत बिताएंगे आध्यात्मिक जीवन, नहीं करेंगे राजनीति

आज जबकि परिवारवाद की बात बेमानी हो चुकी है और छोटे-बड़े हर नेता की अगली पीढ़ी स्वयं को राजनीति में स्थापित करने में लगी है, ऐसे में राष्ट्रीय कद के एक नेता – जो किसी सत्ताधारी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और लगातार पांचवीं बार बिहार जैसे राज्य के मुख्यमंत्री हों – के पुत्र यह कहें कि उनकी राजनीति में जाने की कोई इच्छा नहीं है, तो क्या आप यकीन करेंगे? नहीं न? लेकिन हम ढूंढ़ें तो अवसारवाद की पराकाष्ठा के दौर में भी ‘अपवाद’ मिल जाते हैं। जी हाँ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत कुमार ऐसे ही ‘अपवाद’ हैं।

बीते शनिवार को अपनी मां मंजू सिन्हा की जयंती के मौके पर निशांत ने राजनीति के प्रति केवल अपनी अनिच्छा ही नहीं जताई बल्कि यहां तक कहा कि वे राजनीति में कभी नहीं जाएंगे और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में उन्होंने अपने पिता को बता दिया है। गौरतलब है कि निशांत, जो नीतीश की इकलौती संतान हैं, प्रारम्भ से कुछ अलग प्रकृति के हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश के शपथ-ग्रहण जैसे एकाध मौके को छोड़ दें तो राजनीति के गलियारे में वे शायद ही देखे जाते हैं। भीड़-भाड़ और किसी भी तरह के प्रचार से दूर उन्हें एकांत में समय बिताना अधिक पसंद है। बताया जाता है कि अपनी मां की असमय मृत्यु उनके एकांतप्रिय स्वभाव का एक बड़ा कारण है।

बहरहाल, निशांत कुमार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार के प्रमुख राजनेताओं की अगली पीढ़ी के सत्ता व पार्टी संभालने पर दिन-रात चर्चा और विमर्श का दौर चल रहा है। अभी हाल ही में राबड़ी देवी ने कहा है कि उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी में मुख्यमंत्री बनने के सारे गुण हैं। वहीं, महागठबंधन के ‘अभिवावक’ लालू प्रसाद ने बच्चों के नेतृत्व के सवाल पर कहा है कि उनकी व नीतीश की उम्र हो चली है और अब भविष्य बच्चों का है।

लालू के दोनों बेटे तेजस्वी-तेजप्रताप और बेटी मीसा न केवल राजनीति में सक्रिय हैं बल्कि कई पद भी संभाल रहे हैं। उधर रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी राजनीति को पूरी तरह अपना करियर बना चुके हैं और जमुई से सांसद होने के साथ-साथ लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। इन सबके बरक्स निशांत की राजनीति से इस कदर अरुचि सचमुच चौंकाने वाली है।

बता दें कि स्वर्गीय मंजू सिन्हा की जयंती के अवसर पर निशांत और उनके पिता नीतीश कुमार उनकी स्मृति में पटना के कंकड़बाग में बनाए गए पार्क में श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। इस दौरान पिता नीतीश के बारे में पूछे जाने पर निशांत ने कहा कि उनके पिता ने हमेशा बिहार की सेवा की है। वे बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद से लगातार बिहार के विकास के लिए काम करते रहे हैं और ईश्वर ने उन्हें इसके लिए आशीर्वाद दिया है। वहीं पिता नीतीश के प्रधानमंत्री बनने के सवाल पर निशांत का कहना था कि उनके पिता के पास विजन है। अगर देश की जनता चाहेगी और ईश्वर का आशीर्वाद होगा तो वे अवश्य प्रधानमंत्री बनेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ने मोदी से कहा, सिर्फ यादव का हो सकता है 56 इंच का सीना

ज्ञान का अद्भुत भंडार है लालूजी के पास। उत्तर प्रदेश के देवरिया में एक चुनावी सभा के दौरान उन्होंने एकदम नया ज्ञान बांटा कि 56 इंच का सीना सिर्फ यादव का ही हो सकता है। जी हाँ, उन्होंने भरी सभा में कहा कि मोदी कहते हैं कि मेरा सीना 56 इंच का है। उनको मालूम होना चाहिए कि 56 इंच का सीना सिर्फ यादव का ही हो सकता है। यही नहीं, इसके बाद अपने खास अंदाज में उन्होंने ये भी जोड़ दिया कि जब मैंने मोदी का सीना नापा तो 32 इंच का ही निकला।

प्रधानमंत्री मोदी के पीछे लालू जैसे हाथ धोकर पड़े थे। आगे उन्होंने कहा कि मोदी जब बनारस गए थे तो कहा कि हमें गंगा मईया ने बुलाया है। आप सभी को मालूम होगा कि गंगा मईया कब बुलाती हैं। मोदी यह भी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश ने हमें गोद ले लिया है। हम उनसे पूछते हैं कि उत्तर प्रदेश के लोग नि:संतानी हैं क्या कि आपको गोद लेंगे।

कालेधन के मुद्दे पर लालू ने तंज कसते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि विदेश से कालाधन लाकर सबके खाते में 15-15 लाख डाल देंगे। सब लोगों ने खाता खोल लिया, लेकिन किसी के खाते में एक भी पैसा नहीं आया। हमसे हमारी पत्नी राबड़ी देवी ने पूछा कि क्या 15 लाख रुपया हमलोगों को भी मिलेगा। हमने कहा कि हमलोग भारत की जनसंख्या से बाहर हैं क्या कि हमें नहीं मिलेगा। हमारे घर में 15 लोगों की टीम है। 15 से हमने गुणा किया तो करोड़ों रुपए हो गए, लेकिन आज तक एक रुपया किसी के खाते में नहीं आया।

नोटबंदी पर लालू ने कहा कि भाजपा ने अपना काला धन सफेद करा लिया और आमलोगों को लाइन में लगवा दिया। कल-कारखाना और कारोबार चौपट हो गया। दो हजार रुपए ला दिए गए वो अलग, जिसे देखकर दुकानदार वैसे ही भड़क जाते हैं जैसे लाल कपड़ा देख सांड भड़क जाता है।

बकौल लालू मोदी ने देश के लोगों को झांसा दिया है। उन्होंने कहा कि मोदी और उनकी पार्टी अखिलेश यादव के राज को गुंडाराज बता रहे हैं। बिहार में जब मेरी सरकार थी तो जंगलराज बोलते थे। मोदी अपनी जनसभा में बोल रहे हैं कि भाजपा की सरकार बनने जा रही है। यह कहकर लोगों को भ्रम में डाल रहे हैं। मैं आज वादा करता हूं कि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार तीनों एकजुट हैं और 2019 में हम सब इन्हें मिलकर जवाब देंगे।

इतना सब बोलने के बाद जाहिर है कि लालू भाजपा की परिभाषा भी बताएंगे। सो उन्होने वो काम भी कर दिया और भाजपा को ‘भारत जलाओ पार्टी’ बताया। और लगे हाथ मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जुड़वा भाई बना दिया। मोदी को तानाशाह की संज्ञा देते हुए लालू ने कहा कि अटलजी अच्छे नेता हैं, लेकिन भाजपा के पोस्टर में एक जगह भी उनका फोटो देखने को नहीं मिल रहा।

बता दें कि लालू ने आजकल सपा और काग्रेस के समर्थन में मोर्चा खोल रखा है और इन दिनों उत्तर प्रदेश में एक बाद एक चुनावी सभा कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन सभाओं में उनकी जुबान कितनी बार फिसली है। सच तो यह है कि ये ‘फिसलन’ ही आज की राजनीति का ‘ट्रेडमार्क’ बन गई है। और जब ‘कुएं’ में ही ‘भांग’ पड़ी हो तो आप कर भी क्या सकते हैं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप      

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महाशिवरात्रि के दिन हर शिवलिंग में मौजूद होते हैं शिव

आज हर शिवालय में शिवभक्तों की कतार लगी है। हर गांव, हर गली, हर नगर, हर डगर धूम है तो बस देवाधिदेव महादेव की। उत्तर प्रदेश में शिव की नगरी काशी हो या उत्तराखंड में उनकी जटा से निकली गंगा की धरती हरिद्वार, मध्यप्रदेश का उज्जैन हो या गुजरात का सोमनाथ, झारखंड का देवघर हो या बिहार का सिंहेश्वर या फिर पड़ोसी देश नेपाल का विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर… हर जगह आस्था की अजस्त्र लहरें कलकल-छलछल करती देखी जा सकती है। और ऐसा हो भी क्यों न! महाशिवरात्रि का महत्व ही कुछ ऐसा है। आज ही के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। कहते हैं कि फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि फरवरी-मार्च के महीने में पड़ने वाले इस त्योहार के दिन भगवान शिव का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है।

शिवपुराण के अनुसार सृष्टि के निर्माण के समय महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में शिव अपने रुद्र रूप में प्रकट हुए थे। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। इसी समय जीवनरूपी चन्द्रमा का मिलन शिवरूपी सूर्य के साथ होता है। अत: महाशिवरात्रि परमात्मा शिव के दिव्य ‘अवतरण’ की रात्रि है। देखा जाय तो यह त्योहार सम्पूर्ण सृष्टि को उनके निराकार से साकार रूप में आने की मंगल सूचना है। महाशिवरात्रि के दिन ग्रहों की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है।

कहने की जरूरत नहीं कि शिव इस सम्पूर्ण सृष्टि के आधार हैं। योग परम्परा में वे दुनिया के पहले गुरु माने जाते हैं जिनसे ज्ञान की उत्पत्ति हुई थी। इस मार्ग पर चलने वाले उनकी पूजा ईश्वर के रूप में नहीं बल्कि उन्हें आदिगुरु मानकर करते हैं। इतनी विशाल हैं इस ‘कैलाशवासी’ की बांहें कि उनमें सुर ही नहीं असुर भी समा जाएं। उदार इतने कि बेलपत्र और भांग-धतूरा चढ़ाकर जो चाहे मांग लो। देखा जाय तो एकमात्र शिव हैं जो सच्चे अर्थों में आपकी श्रद्धा देखते हैं केवल। आज भी संसार के हर मंदिर में उनकी पूजा, उनके भोग और उनके श्रृंगार में केवल प्रकृति-प्रदत्त और घर में सहज उपलब्ध चीजें ही चढ़ती हैं। फल न हो न सही, साग-सब्जी ही चढ़ा दो, दूध-दही-मधु न सही, लोटा भर जल ही उड़ेल दो।

शिव यूं ही नहीं हैं देवों के देव। ‘महादेव’ होने के लिए गले में विषधर और कंठ में सारे जगत का विष धारण करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। व्यक्तित्व आपका ऐसा हो कि ‘सत्यं-शिवं-सुन्दरं’ को परिभाषा मिल जाए, हर दिशा से ठुकराए हुए को जीने की आशा मिल जाए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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राबड़ी ने कहा, जनता की इच्छा है कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बने

लीजिए, अभी ये चर्चा थमी भी नहीं थी कि लालू को पहले अपने बेटों को और ‘परिपरक्व’ होने देना चाहिए था और तब उन्हें उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जैसा पद सौंपना चाहिए था कि अब उनके छोटे साहबजादे तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग उठाई (या उठवाई) जा रही है। अरे भाई, ये राजनीति की ‘पाठशाला’ है, पढ़ने बैठो तो पूरी उम्र भी कम है और ये ‘पाठशाला’ देने बैठे तो महज कुछ पाठ पढ़कर सारी डिग्रियां ले लो!

बहरहाल, इधर हाल ही में आरजेडी के कई विधायकों और कार्यकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की ताजपोशी की तर्ज पर बिहार में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की मांग की थी। हालांकि बाद में तेजस्वी ने समझदारी दिखाते हुए यह कहकर इससे किनारा कर लिया था कि अभी महागठबंधन की सरकार ठीक ढंग से चल रही है और मुख्यमंत्री पद के लिए कोई ‘वैकेंसी’ नहीं है। पर अब तेजस्वी की मां और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने विधायकों की इस ‘मांग’ का समर्थन कर मामले को नई हवा दे दी है।

दरअसल गुरुवार को बिहार विधानसभा के बजट सत्र का पहला दिन था और राबड़ी विधानसभा परिसर में पत्रकारों से मुखातिब थीं। पत्रकार उनसे पूछ बैठे कि आरजेडी विधायकों और कार्यकर्ताओं की मांग पर उनकी क्या राय है? इस पर राबड़ी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा कि विधायकों की मांग सही है। लोकतंत्र में जनता मालिक होती है। जनता की यह इच्छा है कि तेजस्वी बिहार का मुख्यमंत्री बने। जो जनता चाहती है, वही होना चाहिए।

राबड़ी के इस बयान पर जेडीयू के महासचिव श्याम रजक ने कहा कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की सबको स्वतंत्रता है। महागठबंधन के सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार हैं। वहीं, कांग्रेस ने इसे आरजेडी का अंदरूनी मामला बताया। उधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मुद्दे पर अपने विधायकों को चुप रहने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि विधायक कोई ऐसी बात न बोलें जिससे महागठबंधन की सेहत पर असर पड़े। वैसे नीतीश को जानने वालों को यह अच्छी तरह पता है कि नीतीश ऐसी बातों पर अनावश्यक अपनी ऊर्जा खपाने की जगह मौके पर चौका मारने में कैसी महारत रखते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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मुख्यमंत्रीजी, शराब पीने पर ऐसी सजा तो चरित्रहीनता पर…?

अगर आप सरकारी कर्मचारी हैं तो शराब को भूल जाइए – न केवल ड्यूटी पर बल्कि ड्यूटी के बाद भी और न केवल बिहार में बल्कि बिहार के बाहर भी। जी हाँ, अगर आप कभी भी और कहीं भी शराब या ड्रग्स के साथ देखे गए तो आप अपनी नौकरी से हाथ धो सकते हैं। ये नया फरमान बिहार सरकार का है, जिसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हरी झंडी दे दी है।

गौरतलब है कि बुधवार को नीतीश कुमार ने बिहार सरकार के एंप्लायी कंडक्ट रूल्स, 1976 में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए सरकारी कर्मचारियों के लिए कई निषेधात्मक प्रावधान जोड़े जाने को स्वीकृति दे दी है। सरकार ने राज्य में पहले से लागू शराबबंदी को और मजबूती देने के लिए यह कदम उठाते हुए सरकारी कर्मचारियों व न्यायिक अधिकारियों के शराब पीने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है।

इस मौके पर पत्रकारों को संबोधित करते हुए कैबिनेट सचिव बृजेश महरोत्रा ने बताया कि मूल नियमों के मुताबिक ड्यूटी पर कोई सरकारी कर्मचारी नशा नहीं कर सकता था, लेकिन संशोधन के बाद अब वह कहीं भी मादक पदार्थों का सेवन नहीं कर सकता। नियम का उल्लंघन करने वाले पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी और सजा के तौर पर नौकरी तक जा सकती है। बिहार के सरकारी कर्मचारियों को न सिर्फ अपने राज्य में बल्कि अन्य राज्यों में भी नियम तोड़ते हुए पाए जाने पर सजा भुगतनी पर सकती है।

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि शराबबंदी के मामले में बिहार सरकार और इसके मुखिया ने जैसी प्रतिबद्धता दिखाई है उसकी देश और दुनिया भर में प्रशंसा हो रही है। लेकिन क्षमायाचना के साथ कहना चाहूंगा कि इस नए फरमान में ‘प्रतिबद्धता’ कम और ‘सनक’ ज्य़ादा दिख रही है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब दलविशेष से जुड़े कुछ लोग उत्तर प्रदेश और झारखंड में नशे में पाए गए थे। तो क्या उनके पद और अधिकार भी छीन लिए गए?

सच तो यह है कि केवल शराब से चरित्र और व्यक्तित्व का निर्धारण हरगिज नहीं हो सकता। डंडे के जोर पर तो और भी नहीं। आदतें न तो एक दिन में बनती हैं और न एक दिन में छूटती ही हैं। क्या सरकार और प्रशासन के लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि सामर्थ्यवान लोगों के लिए शराब अभी भी सुलभ है? हाँ, ये जरूर है कि उन्हें कीमत पहले से अधिक चुकानी पड़ती है।

शराबबंदी अच्छी चीज है। सरकार उस पर जरूर कायम रहे। नैतिकता की बात वो करे, लेकिन व्यावहारिकता के साथ। इस तरह नहीं कि सामने वाला ‘प्रतिक्रिया’ कर बैठे। वैसे इस ‘प्रतिक्रिया’ को कुछ लोग ‘विद्रोह’ की संज्ञा भी देते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार का कसूर बताएं, जेटलीजी!

2017-18 के केन्द्रीय बजट में आश्चर्यजनक ढंग से बिहार की अनदेखी हुई है। इस बार भी बिहार का हाथ खाली का खाली रह गया। क्या ये बिहार विधानसभा चुनाव में मनोनुकूल परिणाम न मिलने की सजा है? अगर नहीं, तो जेटलीजी बिहार का कसूर बताएं। वे बताएं कि इस बार के बजट में अगर झारखंड और गुजरात में एम्स दिया जा सकता है, तो फिर बिहार की उपेक्षा का क्या आधार है? क्या ये महज संयोग है कि इन दो राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और बिहार में नहीं?

कम-से-कम वित्तमंत्री अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वादे की लाज ही रख लेते, जिन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में बिहार को विशेष पैकेज और विशेष दर्जा देने की बात कही थी। मगर, दूसरी बार भी बिहारवासियों के हिस्से में निराशा ही क्यों? क्या बिहार को महाराष्ट्र, गुजरात जैसे विकसित राज्य के समकक्ष लाने के लिए केन्द्रीय बजट में यहाँ के लिए अतिरिक्त राशि का प्रावधान जरूरी नहीं?

सड़क, पुल और परिवहन के मामले में भी बिहार की उपेक्षा हुई है। बजट में राज्य के लिए इस क्षेत्र में कोई नई योजना नहीं दिखी। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित सवा लाख करोड़ पैकेज में पहले से चल रही जिन योजानाओं की चर्चा थी, उनकी भी गति तेज करने का कोई प्रयास नहीं दिखा।

किसी से छिपा नहीं है कि बिहार को हर साल नेपाल से आने वाली नदियों से भारी तबाही झेलनी पड़ती है और साथ ही सूखे का प्रकोप भी झेलना पड़ता है। फिर भी इस बजट में नदियों को जोड़ने की परियोजना, गाद प्रबंधन नीति और फरक्का बराज से पैदा हुए संकट से उबरने के उपाय नहीं किए गए।

और तो और, इस बजट में बिहार को बीआरजीएफ (Backward Regions Grant Fund) मद की बकाया राशि केन्द्र से मिलने की उम्मीद थी, मगर वो भी नहीं मिली। क्या ये बिहार के साथ भेदभाव नही? आश्चर्य तो ये है कि प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, केन्द्र में बैठे बिहार के आधा दर्जन मंत्री भी इस मसले पर चुप हैं।

ये तो हुई बिहार की बात। वैसे भी इस बजट में आर्थिक सुधार के लिए कोई रणनीतिक तैयारी की झलक नहीं मिलती है, जबकि यह निजी निवेश में बढ़ोतरी की अनिवार्य शर्त है। सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी के लिए भी खास नीति का जिक्र नहीं है। जो भी इन्सेंटिव दिया गया है, वह कुछ मायनों में हाउसिंग सेक्टर के लिए है। पर क्या देश का विकास सिर्फ इसी से हो जाएगा?

विकास के दो मुख्य आधार हैं – कृषि और उद्योग। लेकिन न तो कृषि को बढ़ावा देने की रणनीति पर कोई काम हुआ है, न ही उद्योग के नए क्षेत्रों के विकास पर बजट में कुछ खास कहा गया है। बजट में वैश्विक आधारभूत आय का जिक्र नहीं है, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण में इसका उल्लेख है। आमतौर पर बजट और आर्थिक सर्वेक्षण में तालमेल रहता है, मगर इस बार इसका ख्याल नहीं रखा गया है। क्या वित्तमंत्री इस पर रोशनी डालने की जहमत उठाएंगे?

अंत में माननीय वित्तमंत्री से एक सवाल और। उन्होंने अपने दो घंटे से भी ज्यादा लंबे भाषण में ये क्यों नहीं बताया कि नोटबंदी के क्या-क्या फायदे हुए? उन्होंने इससे भविष्य में बेहतर परिणाम की बात तो कही, लेकिन नोटबंदी से जिनका रोजगार छिन गया उनकी क्षतिपूर्ति के लिए सरकार वर्तमान में क्या कर रही है, इस पर क्या उन्हें कुछ बोलना नहीं चाहिए?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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किसी में हिम्मत हो तो ‘उनके’ धर्मगुरु पर फिल्म बनाए : गिरिराज

अपने विवादास्पद बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले भाजपा नेता एवं केन्द्र सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बार फिर गैरजिम्मेदाराना बयान दिया है। इस बार उनका बयान फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर आया है। गिरिराज का कहना है कि फिल्म में रानी पद्मावती को इस तरह दिखाने का मूल कारण यही है कि वो हिन्दू थीं। पद्मावती अगर हिन्दू नहीं होतीं तो शायद ही कोई इस तरह की हिम्मत दिखा पाता।

गौरतलब है कि 27 जनवरी को जयपुर के जयगढ़ किले में फिल्म ‘पद्मावती’ की शूटिंग के दौरान राजपूत संगठन करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने अचानक हमला बोल दिया था। उन्होंने सेट पर जमकर तोड़-फोड़ की, यूनिट के लोगों को मारा-पीटा और अभद्रता की पराकाष्ठा ये कि हिन्दी सिनेमा को कई यादगार फिल्में देने वाले इस फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने से भी वे नहीं झिझके। उनका आरोप था कि इस फिल्म के लिए अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) और रानी पद्मावती (दीपिका पादुकोण) के बीच कथित तौर पर ‘लव सीन’ फिल्माया जा रहा था, जिस पर उन्हें सख्त आपत्ति थी। हालांकि भंसाली फिल्म ऐसे किसी आपत्तिजनक प्रसंग से इनकार कर चुके हैं।

बहरहाल, करणी सेना को इस घटना से पूर्व राजस्थान से बाहर के लोग शायद ही जानते हों। इस तरह के कई संगठन विभिन्न राज्यों में हैं जो संकीर्ण विचारधारा से प्रेरित होते हैं और ‘तात्कालिक लाभ’ के लिए इस तरह के कार्य करते हैं। लेकिन केन्द्रीय कैबिनेट में बैठे किसी मंत्री से ऐसे बयान की आशा नहीं की जा सकती थी। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने उक्त घटना का समर्थन तक कर दिया। बकौल गिरिराज, ‘जनता ने भारतीय इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने वालों को सजा’ दी है। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि रानी पद्मावती ने अपने आपको मिटा दिया लेकिन मुगलों के आगे धुटना नहीं टेका, लेकिन इस देश में औरंगजेब और टीपू सुल्तान को आदर्श मानने वाले लोग इतिहास के साथ लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं।

गिरिराज इतने पर भी रुक जाते तो एक बात थी। पर वे तो अपनी आदत (या राजनीति) से लाचार ठहरे। आगे उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि हिन्दू देवी-देवताओं पर कोई भी फिल्म बना देता है। फिर एक खास समुदाय की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि किसी में हिम्मत हो तो उनके धर्मगुरु पर कोई फिल्म बनाकर दिखाए। क्या गांधी के इस देश में नेताओं का काम बस ‘आग’ में ‘घी’ डालना रह गया है?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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