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और इस तरह बदल जाएगी बैंकों की दुनिया

अब घर से निकलते ही आपको बैंक दिखेंगे। सड़कों को कौन पूछे, अब गली-गली में बैंक होंगे। क्या शहर, क्या कस्बा, क्या गांव… चौक हो, चौराहा हो या चौपाल और पेड़ की छांव… कहीं भी आप खड़े हों, यकीन मानिए आसपास कोई-ना-कोई बैंक आपको दिख ही जाएगा। जी हाँ, अब बदल जाएगी बैंकों की दुनिया। हम आपको बताते हैं कैसे। दरअसल एक बड़ा फैसला लेते हुए रिजर्व बैंक ने पेमेंट बैंक खोलने के लिए ग्यारह कम्पनियों की अर्जी मंजूर की है। इन कम्पनियों में कमोबेश सबसे आप परिचित होंगे। रिजर्व बैंक की मंजूरी हासिल करनेवाली इन कम्पनियों में रिलायंस, एयरटेल, आइडिया और वोडाफोन भी शामिल हैं। जी हाँ, ठीक समझ रहे हैं आप। अब इन टेलीकॉम कम्पनियों के भी बैंक होंगे। ये बैंक पेमेंट बैंक कहलाएंगे। हालांकि ये बैंक आपको लोन नहीं दे पाएंगे लेकिन पेमेंट और मनी ट्रांसफर जैसे काम बहुत आसान कर देंगे।

रिजर्व बैंक ने 19 अगस्त यानि बुधवार को जिन ग्यारह कम्पनियों को पेमेंट बैंक खोलने की मंजूरी दी है, वे हैं रिलायंस इंडस्ट्रीज, एयरटेल एम कामर्स, आदित्य बिरला नुवो लिमिटेड, वोडाफोन एम-पैसा, टेक महिंद्रा, डिपार्टमेंट ऑफ पोस्ट, नेशनल सिक्युरिटी डिपॉजिट लिमिटेड, फिनो पे टेक लिमिटेड, चोलामंडलम डिस्ट्रीब्यूशन सर्विस लिमिटेड, सन फार्मा और पे-टीएम। इन बैंकों में खाता खोलकर आप किसी भी तरह के बिल का भुगतान कर सकते हैं। अब इसके लिए आपको कैश की जरूरत नहीं पड़ेगी। इन पेमेंट बैंकों में इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा उपलब्ध होगी।

आपको बता दें कि ये बैंक डेबिट कार्ड तो जारी करेंगे लेकिन क्रेडिट कार्ड की सुविधा ये नहीं दे पाएंगे। फिर भी आज की व्यस्तता और भागदौड़ वाली दिनचर्या को देखते हुए ये पेमेंट बैंक किसी वरदान से कम नहीं होंगे। इन बैंकों का सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि आप अपने सभी बिल समय पर और सुविधा से जमा कर पाएंगे। इनकी बदौलत दूर देहात में पैसा पहुँचाना भी चुटकी बजाने जैसा होगा।

भारत में आज से 206 साल पहले 1809 में बैंक ऑफ बंगाल की स्थापना के साथ आधुनिक बैंकिंग की शुरुआत हुई। तब ब्रिटिश राज था। इसके बाद 1840 में बैंक ऑफ बॉम्बे और 1943 में बैंक ऑफ मद्रास अस्तित्व में आए। आगे चलकर इन तीनों बैंकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक बना और 1955 में उसका विलय भारतीय स्टेट बैंक में विलय कर दिया गया। इलाहाबाद बैंक भारत का पहला निजी बैंक था। भारत में ‘बैंकों का बैंक’ भारतीय रिजर्व बैंक 1935 में अस्तित्व में आया। एक दौर वो था जब बैंकों का कारोबार केवल वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों तक सीमित था और आज हर खास और आम की हर गतिविधि ही बैंकों से संचालित होने लग गई है।

एटीएम की सुविधा बैंकिंग की दुनिया में किसी क्रांति से कम नहीं थी। लेकिन बात इसी क्रांति पर नहीं रुकी। जल्द ही बैंक ने हमारे मोबाइल में जगह बना ली और अब हमारे सामने आ रहे हैं पेमेंट बैंक। इसे कहते हैं समय की करवट। बैंकों की दुनिया बदल रही है और बदल रही उसके साथ हमारी दुनिया भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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ये तेरा डीएनए, ये मेरा डीएनए

चुनाव के मुहाने पर खड़े बिहार में बहस छिड़ी है ‘डीएनए’ को लेकर। 25 जुलाई को मुजफ्फरपुर की रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने भोज पर बुलाकर थाली छीन लेने की बात उठाई… उठाकर उसे मांझी प्रकरण से जोड़ा… और यहां से उन्हें सीधा नीतीश कुमार के ‘डीएनए’ का रास्ता मिल गया। राजनीति में एक रास्ते से हमेशा कई और रास्ते जुड़े होते हैं। जाहिर है कि मोदीजी बिहार में अपना रास्ता खोजते हुए ही ‘डीएनए’ तक पहुँचे थे और ‘डीएनए’ के बाद की क्रिया-प्रतिक्रिया देखकर उन्हें बिहार में जल्द ही होनेवाली अपनी एक के बाद एक तीन रैलियों में आगे का रास्ता तय करना था। लेकिन बीच के समय में ‘डीएनए’ की गेंद नीतीश के कोर्ट में थी। नौ-दस दिन के सोच-विचार के बाद उन्होंने ट्वीटर का रास्ता पकड़ा, ‘डीएनए’ को पूरे बिहार से जोड़ा और मोदीजी के नाम खुला पत्र लिख डाला। अब बहस छिड़ी है कि ‘डीएनए’ नीतीश का खराब है या पूरे बिहार का..? मोदी ने नीतीश का अपमान किया या बिहार की गरिमा भंग की..?

“हरि अनंत हरि कथा अनंता”। राजनीति में इस तरह की बहस होती ही रहती है और आम तौर ऐसी बहसें किसी निष्कर्ष पर पहुंचती भी नहीं। या यूं कहें कि बहस करने वाले बहस का कोई निष्कर्ष चाहते ही नहीं। बहसों को येन-केन-प्रकारेण ‘डायलिसिस’ के सहारे वो जिन्दा रखते हैं ताकि राजनीति की उनकी दूकान घोर वैचारिक मंदी में भी चलती रहे। लेकिन यहां मसला ‘डीएनए’ का है और चाहे-अनचाहे बिहार से जुड़ गया है तो इसकी पड़ताल तो होनी ही चाहिए।

डीएनए आखिर है क्या..? डी-ऑक्सीरोईबोन्यूक्लिक एसिड यानि डीएनए अणुओं की उस घुमावदार संरचना को कहते हैं जो हमारी कोशिकाओं के गुणसूत्र में पाए जाते हैं और इन्हीं में हमारा आनुवांशिक कूट मौजूद रहता है। डीएनए की खोज जेम्स वाटसन और फ्रांसिस क्रिक नाम के दो वैज्ञानिकों ने 1953 में की थी और मानव-जाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण इस खोज के लिए उन्हें 1962 में नोबेल प्राइज से नवाजा गया था। लेकिन तब शायद ही उन्होंने इस बात की कल्पना की होगी कि आगे चलकर कभी यही डीएनए ‘विशुद्ध’ राजनीतिक बहस का केन्द्र भी बन सकता है।

यहां राजनीति के साथ ‘विशुद्ध’ शब्द का इस्तेमाल मैं बहुत सावधानी से और बहुत जोर देकर कर रहा हूँ क्योंकि ना तो डीएनए तक मोदी के पहुँचने में राजनीति के अलावा कुछ था और ना ही नीतीश द्वारा इसे बिहार से जोड़ देने में। दोनों नेता अपने-अपने तीर-तरकश को संभाले बस विधानसभाई ‘मछली’ की आँख देख रहे हैं। उन्हें इतनी फुरसत कहां कि डीएनए की ‘घुमावदार संरचना’ तक पहुंचे। हाँ, भोली-भाली जनता उनकी इस बहस से जितनी घूम जाय, उनका ‘डीएनए’ उतना ही सफल माना जाएगा।

हमें बहुत सचेत और सावधान होना होगा कि यहाँ ‘डीएनए’ की बहस में उस बिहार को घसीटा जा रहा है जहाँ की मिट्टी ने भारत को पहला सम्राट दिया और पहला राष्ट्रपति भी, जहाँ गांधी और जेपी के संघर्ष ने आकार लिया, जहाँ चाणक्य के राज-धर्म से लेकर कर्पूरी के समाज-धर्म तक मील के अनगिनत पत्थर हैं। और तो और जिस बुद्ध ने अपने ज्ञान से धर्म का और आर्यभट्ट ने ‘शून्य’ से विज्ञान का पूरा का पूरा ‘डीएनए’ ही बदल डाला, वे भी इसी बिहार के थे। ना तो किसी मोदी की सामर्थ्य हो सकती है कि इस बिहार के ‘डीएनए’ पर उँगली उठा दें और ना कोई नीतीश इतने बड़े हो सकते हैं कि इसके ‘डीएनए’ के प्रतीक हो जाएं।

सच तो ये है कि ‘डीएनए’ आज की राजनीति का दूषित हो गया है तभी ये बहस छिड़ी है या इस जैसी कोई भी बहस छिड़ती है। आज राजनीति में वो शुचिता, वो संस्कार, वो साधना ही नहीं रही जो हमें हमारी परम्परा से मिली। हम पड़ताल करें, अगर कर सकें, तो नीतीश हों या मोदी, जदयू हो या भाजपा, राजनीति के स्तर पर इनके ‘डीएनए’ में कोई खास फर्क नहीं दिखेगा। नाम बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं, संदर्भ बदल जाते हैं और सरकार बदल जाती है, अगर कुछ नहीं बदल पाता है तो वो है आजाद भारत में राजनीति का लगातार गिरता स्तर और दिन-ब-दिन और अधिक प्रदूषित होता उसका ‘डीएनए’। मतभेद तो गांधी और अंबेडकर या नेहरू और पटेल में भी थे लेकिन बात कभी ‘डीएनए’ तक नहीं पहुंचती थी। ये तेरा डीएनए, ये मेरा डीएनए करने की जगह क्यों ना हमलोग उस ‘डीएनए’ की तलाश में जुटें जो हमारे इन पुरखों में था। तब शायद इस तरह की किसी बहस की ना तो कोई जरूरत होगी, ना गुंजाइश।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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बिहार के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में बड़ा फेरबदल

चुनाव से पूर्व बिहार सरकार ने 48 आइएएस और 44 आइपीएस अधिकारियों को स्थानांतरित कर राज्य के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में बड़ा फेरबदल किया है। लक्ष्मी प्रसाद चौहान मधेपुरा के नए डीएम होंगे। वे गोपाल मीणा की जगह लेंगे। मीणा को कम्फेड के प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी दी गई है। इन तबादलों के बाद बलिया के एसडीपीओ कुमार आशीष मधेपुरा के एसपी बनाए गए हैं।

स्थानांतरित आइएएस और आइपीएस अधिकारियों की पूरी सूची इस प्रकार है :

स्थानांतरित आइएएस अधिकारी

नाम – स्थानांतरण से पहले – स्थानांतरण के बाद

रामेश्वर सिंह – महानिदेशक, सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस – विभागीय जांच आयुक्त, सामान्य प्रशासन

आनंद किशोर – कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति – प्रमंडल आयुक्त, पटना

कृष्ण मोहन – डीएम, गोपालगंज – संयुक्त सचिव, सहकारिता विभाग

कु. विनोद नारायण सिंह – डीएम, शिवहर – निदेशक, माध्यमिक शिक्षा

जीतेंद्र श्रीवास्तव – डीएम, पूर्वी चंपारण – कार्यपालक निदेशक, राज्य स्वास्थ्य समिति

लक्ष्मी प्रसाद चौहान – डीएम, सुपौल – डीएम, मधेपुरा

ललन जी – डीएम, नवादा – डीएम, कटिहार

प्रभाकर झा – डीएम, कैमूर – संयुक्त सचिव, स्वास्थ्य विभाग

नवीन चंद्र झा – डीएम, औरंगाबाद – राज्य परिवहन आयुक्त, पटना

कुंवर जंग बहादुर – डीएम, अरवल – उत्पाद आयुक्त सह डीजी निबंधन

प्रकाश कुमार – डीएम, कटिहार – संयुक्त सचिव, खाद्य व उपभोक्ता संरक्षण

शशिभूषण कुमार – डीएम, सहरसा – निदेशक, आइसीडीसीएस

राजेश कुमार – डीएम, पूर्णिया – सचिव, राजस्व पर्षद

प्रतिमा एसके वर्मा – डीएम, सीतामढ़ी – डीएम, पटना

पंकज कुमार पाल – डीएम, भोजपुर – डीएम, पूर्णिया

अनुपम कुमार – डीएम, मुजफ्फरपुर – डीएम, पूर्वी चंपारण

वीरेंद्र प्रसाद यादव – डीएम, भागलपुर – डीएम, भोजपुर

अभय कुमार सिंह – डीएम, पटना – अपर सचिव, सामान्य प्रशासन

आदेश तितरमारे – प्रबंध निदेशक, कम्फेड – डीएम, भागलपुर

धर्मेंद्र सिंह – कृषि निदेशक – डीएम, मुजफ्फरपुर

नरेंद्र कुमार सिंह – डीएम, अररिया – संयुक्त सचिव, नगर विकास एवं आवास

शशिकांत तिवारी – डीएम, जमुई – संयुक्त सचिव, पीएचइडी

विनोद सिंह गुंजियाल – डीएम, वैशाली – डीएम, सहरसा

मनोज कुमार – संयुक्त सचिव, स्वास्थ्य विभाग – डीएम, नवादा

गोपाल मीणा – डीएम, मधेपुरा – एमडी, कम्फेड

संजय कुमार सिंह – डीएम, सिवान – परियोजना निदेशक, बिहार शिक्षा परियोजना

राजेश्वर प्रसाद सिंह – संयुक्त सचिव, ग्रामीण कार्य – डीएम, कैमूर

उदय कुमार सिंह – संयुक्त सचिव, पीएचइडी – डीएम, लखीसराय

बैदयनाथ यादव – निदेशक, सामाजिक सुरक्षा – डीएम, सुपौल

प्रणव कुमार – डीएम, शेखपुरा – डीएम, समस्तीपुर

बी कार्तिकेय धनजी – डीएम, नालंदा – कृषि निदेशक

मनोज कुमार सिंह – डीएम, लखीसराय – डीएम, जहानाबाद

साकेत कुमार – डीएम, बांका – डीएम, सीतामढ़ी

एम रामचंद्रुडु – डीएम, समस्तीपुर – निदेशक, प्रा. शिक्षा

रचना पाटिल – डीडीसी, नालंदा – डीएम, वैशाली

चंद्रशेखर सिंह – डीडीसी, भागलपुर – डीएम, शेखपुरा

राजकुमार – डीडीसी, मधुबनी – डीएम, शिवहर

कंवल तनुज – डीडीसी, मुजफ्फरपुर – डीएम, औरंगाबाद

कौशल किशोर – डीडीसी, बेगूसराय – डीएम, जमुई

आलोक रंजन घोष – संयुक्त सचिव, मत्स्य व पशु संसाधन – डीएम, अरवल

राहुल कुमार – परियोजना निदेशक, राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी – डीएम, गोपालगंज

महेंद्र कुमार – नगर आयुक्त, दरभंगा – डीएम, सिवान

हिमांशु वर्मा – नगर आयुक्त, मुजफ्फरपुर – डीएम, अररिया

त्यागराजन एसएम – नगर आयुक्त, बिहारशरीफ – डीएम, नालंदा

निलेश रामचंद्र – नगर आयुक्त, गया – डीएम, बांका।

स्थानांतरित आइपीएस अधिकारी
नाम – स्थानांतरण से पहले – स्थानांतरण के बाद

अजिताभ कुमार – आईजी, बीएमपी – आईजी, सुरक्षा का अतिरिक्त प्रभार
प्रदीप कुमार श्रीवास्तव – पदस्थापना की प्रतीक्षा में – डीआईजी, मुजफ्फरपुर
उपेंद्र कुमार सिन्हा – डीआईजी, बीएमपी – डीआईजी, भागलपुर
शालीन – डीआईजी, पटना – डीआईजी, बीएमपी का अतिरिक्त प्रभार
मो. मंसूर अहमद – समादेष्टा, बीएमपी-11 – आईजी (प्रशिक्षण) के सहायक
चंद्रिका प्रसाद – सहायक निदेशक, पुलिस अकादमी – आईजी, बीएमपी के सहायक
विनोद कुमार – रेल एसपी, मुजफ्फरपुर – एसपी, सहरसा
राजेश कुमार – एसपी, मधुबनी – समादेष्टा, बीएमपी-5
अनिल कुमार सिंह – एसपी, गोपालगंज – एसपी, खगड़िया
विनय कुमार – समादेष्टा, बीएमपी10 – एसपी, पश्चिम चंपारण
नीरज कुमार – एसपी, शेखपुरा – समादेष्टा, बीएमपी-9
अख्तर हुसैन – आईजी, कल्याण के सहायक – एसपी, मधुबनी
क्षत्रनील सिंह – एसपी, कटिहार – समादेष्टा, बीएमपी-10
आनंद कुमार सिंह – समादेष्टा, बीएमपी-16 – एसपी, बगहा
पंकज कुमार सिन्हा – एसपी, सहरसा – एसपी, नवगछिया
शेखर कुमार – एसपी, नवगछिया – समादेष्टा, होमगार्ड
सुनील कुमार – आईजी रेल के सहायक – एसपी, निगरानी ब्यूरो
विजय कुमार वर्मा – एसपी, अररिया – पुलिस महानिरीक्षक निरीक्षण के सहायक
सुनील कुमार नायक – एसपी, कैमूर – एसपी, एसटीएफ
कुमार एकले – एसपी, एसटीएफ – एसपी, सुपौल
शिवकुमार झा – एसपी, शिवहर – एसपी, निगरानी अन्वेषण ब्यूरो
सिद्धार्थ मोहन जैन – एसपी, नालंदा – एसपी, कटिहार
पंकज राज – एसपी, सुपौल – समादेष्टा, बीएमपी-1
शिवदीप लांडे – एसपी, रोहतास – एसपी, एसटीएफ
राजेश त्रिपाठी – आईजी, बीएमपी के सहायक – आईजी, कल्याण के सहायक
मो. शफीउल हक – एसपी, बगहा – समादेष्टा, बीएमपी-11
किम – बीएमपी, होमगार्ड – पुलिस अधीक्षक, आर्थिक अपराध इकाई
विकास वर्मन – एसपी, सीवान – समादेष्टा, बीएमपी-3
नताशा गुड़िया – समादेष्टा, बीएमपी-5 – एसपी, गोपालगंज
एमएस ढिल्लों – एसपी, अरवल – एसपी, रोहतास
हरप्रीत कौर – एसपी, कमजोर वर्ग – एसपी, कैमूर
सौरभ कुमार साह – एसपी, बेतिया – एसपी, सिवान
सुधीर कुमार पोरिका – सिटी एसपी, पटना पूर्वी – एसपी, अररिया
धूरत सायली सबला राम – एसपी, खगड़िया – सिटी एसपी, पटना पूर्वी
राजेंद्र कुमार भील – सिटी एसपी, मुजफ्फरपुर – एसपी, शेखपुरा
आशीष भारती – एसपी, मधेपुरा – एसपी, निगरानी ब्यूरो
कुमार आशीष – एसडीपीओ, बलिया – एसपी, मधेपुरा
रविरंजन कुमार – एसडीपीओ, सदर खगड़िया – सिटी एसपी, गया
अवकाश कुमार – एसडीपीओ, महाराजगंज – सिटी एसपी, भागलपुर
आनंद कुमार – एसडीपीओ, समस्तीपुर – सिटी एसपी, मुजफ्फरपुर
दिलीप कुमार मिश्रा – एसपी, निगरानी ब्यूरो – एसपी, अरवल
अश्विनी कुमार – एसपी, निगरानी ब्यूरो – एसपी, शिवहर
विवेकानंद – एएसपी, नगर पटना – एसपी, नालंदा।

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ट्वीटर का ‘सांप’ और राजनीति का ‘जहर’

सूचना तकनीक के फायदे हैं तो नुकसान भी। व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्वीटर जैसी तकनीक ने जहाँ हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी को आसान किया है वहीं दूसरी ओर इसे जटिलताओं से भी भर दिया है। तीर कमान से निकला नहीं कि उस पर आपका कोई वश नहीं रह जाता, ये बात तो बचपन से सुनने को मिलती रही है लेकिन यहाँ तो बात कई कदम नहीं, कोसों आगे की है। अब इंटरनेट से जुड़े इन माध्यमों पर आपने मैसेज सेंड किया नहीं कि उसे वायरल होते देर नहीं लगती। तीर के कमान से निकलने पर किसी एक आदमी को नुकसान हो सकता है, यहां तो पल भर में हजारों प्रभावित हो जाते हैं और हजारों के लाखों और करोड़ों होने में भी देर नहीं लगती। यहां यह चर्चा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के उस ट्वीट के संदर्भ में है जिसने बिहार के राजनीतिक गलियारे में तूफान ला दिया।

बात आगे करें उससे पहले ये जान लें कि वो ट्वीट क्या था। दरअसल, नीतीश ने ट्वीटर पर ‘आस्क नीतीश’ नाम का प्लेटफॉर्म तैयार किया है जिस पर वो सप्ताह में दो दिन लोगों के सवाल का जवाब देते हैं। इसी के तहत सुनील चांडक नाम के व्यक्ति ने उनसे सवाल किया कि अगर चुनाव में लालू उनसे अधिक सीट जीत जाते हैं तो उनका मुख्यमंत्री बनना मुश्किल हो सकता है और अगर बन भी गए तो लालू चाहेंगे कि उनके अनुसार काम करें। इसके जवाब में मंगलवार को नीतीश ने लिखा कि बिहार का विकास मेरी प्राथमिकता है। इसके बाद उन्होंने रहीम का ये प्रसिद्ध दोहा उद्धृत कर दिया – जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग। बस फिर क्या था इस दोहे ने ट्वीट को वायरल कर दिया। लोगों ने और खासकर भाजपा ने तुरंत लालू और उनके साथ जदयू के गठबंधन से इसे जोड़ दिया। लालू आनन-फानन में इस दोहे के ‘भुजंग’ बना दिए गए। उधर मीडिया भी बड़े चाव से तिल का ताड़ करता रहा। खबर को मसालेदार बनाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।

जब ट्वीट शोर में तब्दील होने लगा तब नीतीश और उनकी पार्टी ने अपनी ओर से स्पष्ट किया कि ट्वीट लालू नहीं भाजपा को लेकर है। यानी भुजंग अर्थात् सांप लालू नहीं भाजपा है। लालू प्रसाद ने कहा कि ट्वीट तो भाजपा को लेकर है ही, ये सवाल पूछने वाला भी भाजपाई ही होगा। जदयू प्रवक्ता केसी त्यागा ने नीतीश कुमार को चंदन बताते हुए कहा कि 15 साल साथ रहने के बावजूद भाजपा के दर्गुण नीतीश कुमार में नहीं आए हैं। उधर सुशील मोदी की अपनी व्याख्या है। उनके अनुसार, सही कह रहे हैं नीतीश कुमार। संगत से ही सब कुछ होता है। जब तक बिहार में नीतीश कुमार भाजपा के साथ थे, बिहार में सुशासन कायम हो सका। अब जब उन्होंने लालू प्रसाद के साथ संगत की है तो सूबे में आतंकराज-2 का माहौल बन गया है।

कौन चंदन है और कौन सांप, इस पर विवाद शायद ही कभी थमे लेकिन ट्वीटर से निकले ‘सांप’ ने राजनीति का ‘जहर’ तो सामने ला ही दिया।

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बिहार चुनाव के लिए कमर कसने में लगे दल

चुनाव को करीब आता देख बिहार के सभी राजनीतिक दल कमर कसने में लग गए हैं। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए का ‘परिवर्तन’ रथ चलता देख जदयू, राजद और कांग्रेस अपनी रणनीति को और चुस्त-दुरुस्त बनाने में लग गए हैं। इन दलों ने बड़ी शिद्दत से सोचना शुरू कर दिया है कि उन्हें प्रचार अभियान मिलकर चलाना चाहिए। जिस ‘महागठबंधन’ की बात ये दल कर रहे हैं वह जमीन पर नहीं दिख रहा। सभी दल अलग-अलग कार्यक्रम कर रहे हैं। नीतीश के हर घर दस्तक कार्यक्रम से लालू प्रसाद नदारद हैं तो राजद के कार्यक्रमों में नीतीश और शरद की मौजूदगी नहीं है। कांग्रेस भी अपने अभियान को जैसे-तैसे ही सही लेकिन अपने तरीके से आगे बढा रही है। कुल मिलाकर इससे आम जनता के बीच ‘महागठबंधन’ को लेकर सकारात्मक संकेत नहीं जा रहा है।

इन तमाम बातों की पृष्ठभूमि में ये खबर आई कि 22 जुलाई को पटना के गांधी मैदान में लालू प्रसाद और जदयू के राष्ट्रीय अध्य़क्ष शरद यादव एक साथ धरना देंगे। यही नहीं 26 जुलाई को प्रस्तावित लालू के उपवास में भी शरद शामिल होंगे। बता दें कि शुक्रवार को शरद और लालू की मुलाकात हुई थी और शनिवार को पटना स्थित स्टेट गेस्ट हाउस में शरद से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लगभग दो घंटे तक बातचीत हुई। कहना ना होगा कि इन मुलाकातों का असर दिखने लगा है।

बिहार के राजनीतिक गलियारे में इस बात की भी चर्चा है कि चुनाव के और नजदीक आने पर ‘आप’ प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी संभवतः नीतीश के पक्ष में सभाएं करें। इन दोनों नेताओं की हाल-फिलहाल की मुलाकातों से इस चर्चा को और बल मिला है।

इन सबके बीच भाजपा भला निश्चिन्त कैसे रह सकती है। भाजपा ने ये तय कर लिया है कि चुनाव में किसी खास नेता को तवज्जो ना देकर सामूहिक नेतृत्व को सामने लाया जाय। पार्टी इस चुनाव में भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी उतारने जा रही है। खासकर पड़ोसी राज्य झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के बहाने एक साथ कई निशाना साधने की कोशिश की जा रही है। उनको आगे कर ना केवल वैश्य समाज को प्रभावित किया जा सकता है बल्कि पार्टी झारखंड में उनके द्वारा किए गए कार्यों को भी यहाँ भुना सकती है।

बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में किस दल की रणनीति कितनी कारगर साबित होती है। जो भी हो, बिहार का चुनाव खासा दिलचस्प होने जा रहा है, इसमें कोई संदेह नहीं।

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भाजपा ने किया रथ से ‘परिवर्तन’ का शंखनाद

‘परिवर्तन’ के 160 रथों को रवाना करने के साथ एनडीए ने बिहार में अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया। गुरुवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान, रालोसपा अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा तथा हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा प्रमुख जीतनराम मांझी की मौजूदगी में पटना के गांधी मैदान से भाजपा के परिवर्तन रथों को रवाना करते हुए चुनाव का शंखनाद किया। इस अवसर पर एनडीए के साथियों के साथ-साथ भाजपा के बिहार चुनाव प्रभारी अनंत कुमार, पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, प्रदेश अध्यक्ष मंगल पाण्डेय, केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद व राधामोहन सिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. सीपी ठाकुर आदि बिहार भाजपा के तमाम दिग्गज मौजूद रहे।

इस अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने बिहार की जनता और जनादेश के साथ धोखा किया है। उन्हें वोट मांगने का कोई अधिकार नहीं है। लालू और नीतीश फिर से बिहार में जंगलराज लाना चाहते हैं। अमित शाह ने कहा कि एनडीए बिहार को एक मजबूत सरकार देगी। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 25 जुलाई को मुजफ्फरपुर आएंगे और बिहार के विकास की रूपरेखा पेश करेंगे।

बता दें कि भाजपा का बहुचर्चित परिवर्तन रथ अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। सभी रथों में ऑडियो-वीडियो तथा जीपीएस की सुविधा है। इनमें 56 इंच की एलइडी लगी है जिस पर फिल्म भी दिखाई जाएगी। अभी 83 रथ और रवाना किए जाने हैं। बिहार में 243 विधानसभा क्षेत्र हैं इसीलिए रथों की संख्या भी उतनी ही (160+83=243) रखी गई है। भाजपा के रथ प्रत्येक विधानसभा में तीन-तीन राउंड लगाएंगे और हर दिन एक हजार से अधिक सभाएं होंगी। इस तरह सौ दिनों में एक लाख से अधिक सभाओं के आयोजन का लक्ष्य है। कहा जा सकता है कि भाजपा ने अपने तरीके से नीतीश कुमार के घर-घर दस्तक कार्यक्रम का जवाब ढूंढ़ा है।

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क्या रंग लाएगी नीतीश-केजरीवाल की दोस्ती..?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते मंगलवार को दिल्ली सचिवालय में मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से मुलाकात की और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अन्य पार्टियों के तालमेल के साथ जेडीयू इस मुद्दे को संसद में उठाएगी।

केजरीवाल से मुलाकात के बाद नीतीश ने कहा कि “दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। लोगों ने एक सरकार बनाने के लिए काफी उत्साह के साथ वोट डाला था। लोग उन्हें जानते हैं जिन्हें उन्होंने अपना वोट दिया है।” उन्होंने कहा कि,  “वे (लोग) सोचते हैं कि कानून व्यवस्था से लेकर अपराध और पुलिस तक सरकार के नियंत्रण में है। दिल्ली में पुलिस राज्य सरकार के तहत नहीं आती।”

बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि चूंकि सरकार लोगों के प्रति जवाबदेह है, इसलिए मुख्यमंत्री केजरीवाल के पास विभागीय सचिवों को चुनने की शक्ति होनी चाहिए। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए चलाए जा रहे अभियान को लोगों का पूर्ण समर्थन है।

बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी पार्टी संसद में यह मुद्दा उठाएगी और अन्य पार्टियों का समर्थन जुटाने की कोशिश करेगी। नीतीश ने बिहार पुलिस के कर्मियों को दिल्ली भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो में शामिल करने पर केजरीवाल का शुक्रिया भी अदा किया।

नीतीश और केजरीवाल दोनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के धुर विरोधी हैं। ऐसे में बिहार चुनाव से पहले दोनों नेताओं के बीच बैठक अलग मायने रखती है। नीतीश का आप को समर्थन अकारण नहीं है। वैसे भी राजनीति में बिना कारण कुछ भी नहीं होता, चुनावी मौसम में तो हरगिज नहीं। इसकी पुष्टि भी हो ही गई जब आप ने बिहार में बीजेपी के खिलाफ प्रचार और अपने उम्मीदवार नहीं उतारने के जरिए नीतीश का समर्थन करने का फैसला किया।

आप के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पार्टी बीजेपी के खिलाफ प्रचार करेगी और यदि जरूरत पड़ी तो अरविंद केजरीवाल भी इसके लिए उतर सकते हैं। बहरहाल, देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश-केजरीवाल की दोस्ती आगे क्या रंग लाती है।

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जातीय गणना पर राजद ने तेज की लड़ाई :  27 जुलाई को बिहार बंद, 26 को लालू का उपवास

जातीय जनगणना सार्वजनिक करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय जनता दल 27  जुलाई को बिहार बंद करेगा। इससे पहले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद 26 जुलाई को कदमकुआं स्थित जेपी आवास या अंबेडकर मूर्ति के समक्ष एक दिवसीय उपवास पर बैठेंगे । मंगलवार को अपने दोनों पुत्र तेज प्रताप और तेजस्वी,  प्रदेश अध्यक्ष रामचन्द्र पूर्वे तथा मुन्द्रिका सिंह यादव की उपस्थिति में संवाददाताओं से बात करते हुए लालू ने कहा कि राजद जातीय जनगणना की रिपोर्ट प्रकाशित कराने के लिए केंद्र के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ेगा। इसको राष्ट्रव्यापी मुद्दा बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि बिहार बंद के बाद भी केंद्र सरकार ने जातीय सर्वे का प्रकाशन नहीं किया तो बेमियादी बिहार बंद का आह्वान होगा। लालू के मुताबिक जातीय सर्वे प्रकाशित होने से सबसे अधिक अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों को लाभ होगा। उनकी जनसंख्या में 40 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। इसके आधार पर उनके आरक्षण के प्रतिशत में तिगुना वृद्धि हो जाएगी। संविधान में प्रावधान है कि अनुसूचित जाति व जनजाति को आबादी के आधार पर आरक्षण का लाभ मिलेगा।

लालू ने आरोप लगाया कि आरएसएस के दबाव पर केंद्र की भाजपा सरकार रिपोर्ट दबाकर बैठ गयी है। लालू ने कहा कि जातीय सर्वे से इसका खुलासा हो जाता कि किस जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति दयनीय है। उनको आगे बढ़ाने के लिए बजट में प्रावधान किया जाता। ऐसा नहीं होने से अमीर और अमीर होते जाएंगे। गरीब और गरीब बन जाएंगे। लालू के मुताबिक 10  प्रतिशत लोग 90 प्रतिशत की सभी सुविधाओं को चट कर जा रहे हैं। अंग्रेजों ने 1931  में जातीय गणना करायी थी। इसके आधार पर अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों  को आबादी के आधार पर आरक्षण का लाभ मिला।

बिहार बंद और राजद सुप्रीमो के उपवास से पूर्व 21  जुलाई को राजद के जिला अध्यक्षों तथा पूर्व व वर्तमान सांसद एवं विधायकों की बैठक बुलायी गई है। राजद के प्रस्तावित बंद से रेलवे, अस्पताल व एम्बुलेंस सेवा को अलग रखा गया है।

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आय प्रमाण-पत्र के बाद मिलेगी छात्रवृत्ति, पोशाक और साइकिल राशि

शिक्षा विभाग, बिहार के प्रधान सचिव आर.के. महाजन ने दिशा-निर्देश जारी कर कहा है कि संबधित कार्यालय के आय प्रमाण-पत्र देने पर ही अनारक्षित वर्ग के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति, पोशाक और साइकिल राशि का भुगतान किया जाएगा। अब इस योजना का लाभ उन्हीं छात्र-छात्राओं को मिलेगा जिनके अभिवावक की वार्षिक आय 1.50 लाख रुपये तक है।

बता दें कि उपरोक्त योजना की शुरुआत आर्थिक रूप से पिछड़े अनारक्षित वर्ग के जन समुदाय को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए की गई है। इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत अनारक्षित वर्ग के पहली कक्षा से दसवीं कक्षा में अध्यनरत सरकारी अथवा सहायता प्राप्त विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति, पोशाक और साइकिल राशि उपलब्ध कराई जाती है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार इस योजना के तहत 20 जुलाई से 27 जुलाई तक विद्यालयों में शिविर लगाकर राशि का वितरण किया जाएगा। इसमें पहली से चौथी कक्षा तक 50 रुपये प्रति माह, पांचवीं से छठी को 100 रुपये प्रति माह एवं सातवीं से दसवीं कक्षा तक 150 रुपये प्रति माह छात्रवृत्ति दी जाएगी। मुसहर समुदाय के वर्ग एक से चार तक के अध्यनरत छात्र-छात्राओं को दोगुनी छात्रवृत्ति दी जाएगी। इसका वितरण पंचायत प्रतिनिधियों और अभिवावकों की उपस्थिति में शिविर लगाकर किया जाएगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने बहाल की जदयू के बागियों की विधायकी

सुप्रीम कोर्ट ने जदयू से बर्खास्त किए गए चार बागी विधायकों की सदस्यता आज बहाल कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट की डबल बेंच के उस फैसले पर स्टे लगा दिया जिसमें ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू, रविंद्र राय, राहुल कुमार और नीरज बबलू की विधायकी समाप्त कर दी गई थी। अब इन बागी विधायकों के विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में शामिल होने का रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को जदयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

बता दें कि राज्यसभा चुनाव में दलविरोधी गतिविधियों की वजह से जदयू ने उक्त चारों विधायकों की सदस्यता समाप्त करने के लिए बिहार विधानसभा के स्पीकर उदय नारायण चौधरी को आवेदन दिया था और स्पीकर ने चारों को बर्खास्त कर दिया था। स्पीकर के इस फैसले पर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने भी अपनी मुहर लगा दी थी। इसके बाद इन विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

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