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तीसरे चरण में नज़रें भाजपा के ‘हाल’ और लालू के दोनों ‘लाल’ पर

बिहार चुनाव के पाँच चरणों में सर्वाधिक ‘महत्वपूर्ण’ (और कदाचित् निर्णायक भी) तीसरा चरण कल सम्पन्न हुआ। मतदान का प्रतिशत 53.32 रहा जिससे कोई स्पष्ट संकेत या रुझान नहीं मिलता और इस तरह 8 नवंबर का ‘रहस्य’ और गहरा गया है। बहरहाल, इस चरण के ‘महत्व’ पर बात करने से पहले कुछ तथ्यों पर निगाह डाल लें।

तीसरे चरण में छह जिलों की 50 सीटों के लिए वोट डाले गए। इन छह जिलों में राजधानी पटना भी शामिल है। पटना के अलावे शेष पाँच जिले भोजपुर, बक्सर, नालंदा, सारण और वैशाली हैं। 2010 के चुनाव में इन छह जिलों में मतदान का प्रतिशत 50.08 था। पिछले दो चरणों की तरह इस चरण में भी बाजी महिला मतदाताओं के नाम रही। 52.05 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले लगभग 54 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इन छह जिलों में 53.62 प्रतिशत मतदान के साथ बक्सर सबसे आगे रहा, जबकि 51.82 प्रतिशत मतदान के साथ पटना सबसे पीछे।

तीसरे चरण में उम्मीदवारों की कुल संख्या 808 थी जिनमें 737 पुरुष और 71 महिला उम्मीदवार शामिल हैं। मतदाताओं की कुल संख्या एक करोड़ 45 लाख 18 हजार सात सौ पाँच और मतदान केन्द्रों की संख्या 13,648 थी। जिन 50 सीटों पर कल मतदान हुआ उनमें से 2010 में 23 सीटें जेडीयू, 19 सीटें भाजपा और 8 सीटें राजद ने जीती थीं। इस बार महागठबंधन की ओर से राजद 25, जेडीयू 18 और कांग्रेस सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि एनडीए की तरफ से भाजपा के 34, लोजपा के 10, हम के चार और रोसोसपा के दो उम्मीदवार मैदान में हैं।

अब बात इस पर करें कि ये चरण महत्वपूर्ण और बहुत हद तक ‘निर्णायक’ भी क्यों है। इसके कई कारण स्पष्ट तौर पर दिखते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों व समीक्षकों की मानें तो पहले दो चरणों में एनडीए का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा है। अगर इस चरण में भी मतदान उसके पक्ष में नहीं हुआ तो आगे के दो चरणों में उसकी राह और कठिन हो जाएगी। खास कर पाँचवें चरण में जिसमें सीमांचल का इलाका है और मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं। कहने की जरूरत नहीं कि मुस्लिम मतदाताओं का स्पष्ट झुकाव महागठबंधन की ओर है।

इस चरण के महत्वपूर्ण होने का दूसरा बड़ा कारण लालू के दोनों ‘लाल’ का चुनाव मैदान में होना है। तेजप्रताप महुआ से और तेजस्वी राघोपुर से भाग्य आजमा रहे हैं। तेजप्रताप का मुकाबला हम के रवीन्द्र राय से है तो तेजस्वी के सामने पिछले चुनाव में उनकी माँ राबड़ी को हराने वाले सतीश कुमार हैं। सतीश तब जेडीयू के उम्मीदवार थे और इस बार भाजपा की ओर से चुनाव लड़ रहे हैं। ये दोनों सीटें ना केवल लालू बल्कि उनकी पार्टी के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है।

भाजपा के दिग्गज नेता और विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष नंदकिशोर यादव (पटना साहिब), विधान सभा उपाध्यक्ष अमरेन्द्र प्रताप सिंह (आरा), विधान सभा में भाजपा के मुख्य सचेतक अरुण कुमार सिन्हा (कुम्हरार), भाजपा के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर के सुपुत्र विवेक ठाकुर (ब्रह्मपुर) और नीतीश कुमार के मुखर समर्थक से मुखर विरोधी बने ज्ञानेन्द्र सिंह ज्ञानू (बाढ़) के भाग्य का फैसला भी इसी चरण में होना है। जेडीयू के मंत्रियों श्याम रजक (फुलवारीशरीफ) और श्रवण कुमार (नालंदा) और जेल में बंद पूर्व जदयू विधायक और इस बार निर्दलीय प्रत्याशी बाहुबली अनंत सिंह (मोकामा) का चुनाव भी इसी चरण में है।

तीसरे चरण की राजनीतिक अहमियत इस कारण भी है कि नालंदा नीतीश कुमार का गृहक्षेत्र है, सारण लालू प्रसाद यादव का और हाजीपुर रामविलास पासवान का। इस तरह इन तीनों कद्दावर नेताओं का कद भी अन्य चरणों की तुलना में इस चरण में कहीं ना कहीं दांव पर अधिक लगा हुआ है।

कल सम्पन्न हुए तीसरे चरण के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि बिहार की जनता सारे दलों को ‘भरमा’ कर रखने में पूरी तरह सफल रही है। पहले जनता नहीं जान पाती थी कि चुनाव के बाद नेता क्या करेंगे और आज कोई भी नेता यह कहने की स्थिति में नहीं है कि जनता क्या करने जा रही है। यह अपने आप में एक बड़ा परिवर्तन है। इस चरण के मतदान में 2010 की तुलना में तीन प्रतिशत का इजाफा जरूर हुआ है और इस इजाफे पर महागठबंधन और एनडीए दोनों अपनी-अपनी मुहर भी लगा रहे हैं पर सच यही है कि ‘जश्न’ मनाने की स्थिति में कोई खेमा नहीं है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ‘शैतान’, शाह ‘नरभक्षी’, मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’… ये किस ‘नरक’ में आ गए हम..?

बिहार चुनाव की ताजा ख़बर। प्रधानमंत्री मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’ तो थे ही अब ‘गली के गुंडे’ भी हो गए हैं और इस उपाधि से उन्हें नवाजा ‘शैतान’ लालू की ‘बेचारी’ बेटी मीसा ने जिसे बकौल मोदी उसके पिता पिछले चुनाव में ‘सेट’ नहीं कर पाए थे। कैसा लगा पढ़कर..? हंसी आई, क्रोध हुआ, शर्मिंदगी महसूस की आपने या फिर गालियां निकलीं आपके श्रीमुख से..? चाहे जैसा लगा हो आपको, यही ‘सच’ और यही ‘हासिल’ है बिहार चुनाव का। सिर्फ बिहार को ही बदनाम क्यों करें, कमोबेश हर राज्य का और इस तरह पूरे देश का यही हाल है। ‘अपशब्दों’ के लिए ‘प्राथमिकियां’ दर्ज होना और चुनाव आयोग का ‘संज्ञान’ लेना अब आम बात हो चली है।

लालू ‘चाराचोर’, नीतीश ‘अहंकारी’, अमित शाह ‘मोटे’ और नरेन्द्र मोदी ‘जुमलेबाज’ तो थे ही लेकिन ज्यों-ज्यों चुनाव आगे बढ़ा लालू ‘शैतान’, नीतीश ‘खराब डीएनए वाले’, अमित शाह ‘नरभक्षी’ और नरेन्द्र मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’ हो गए। हाय री राजनीति..! गिरावट की भी कोई हद होती है कि नहीं..? राजनीति में आलोचना की जगह है, व्यंग्य की जगह है, कटाक्ष की जगह है लेकिन क्या अब इन शब्दों के लिए भी जगह बनानी होगी..? स्वस्थ लोकतंत्र में विरोध तो होना ही चाहिए, थोड़ी-बहुत तल्खियां भी बर्दाश्त की जा सकती हैं लेकिन क्या इन अपशब्दों की वकालत किसी तरह भी की जा सकती है..?

यहाँ चार नेताओं को मिली ‘उपाधियों’ की ही चर्चा की गई है। इनमें दो महागठबंधन के तो शेष दो एनडीए के सबसे बड़े चेहरे हैं। इसका ये मतलब कतई नहीं कि बाकी बचे ‘बेदाग’ हैं। सच तो यह है कि हमाम में सब नंगे हैं और इस कदर नंगे हैं कि उनका बस चले तो एक-दूसरे की चमड़ियां उतारकर ओढ़ लेने से भी परहेज ना करें। बहरहाल, बिहार चुनाव में ऐसे शब्दों और उपाधियों का पूरा ‘कोश’ तैयार हो रहा है और इसमें नई इंट्री हुई है ‘गली के गुंडे’ की जिसका प्रयोग किसी और के लिए नहीं प्रधानमंत्री मोदी के लिए किया गया है और वो भी लालू की बड़ी बेटी मीसा के द्वारा।

पूरा वाक्या कुछ यों है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी एक चुनावी रैली में कह दिया कि लालू प्रसाद ने पिछली बार ‘बेचारी’ बेटी को ‘सेट’ करने की कोशिश की थी और अब अपने बेटों को ‘सेट’ करने की कोशिश में पूरे बिहार को ‘अपसेट’ कर रहे हैं। इस पर मीसा ने अपने फेसबुक पेज पर पूछा कि यह ‘सेट’ करने की कोशिश क्या है..? क्या एक बाप अपनी बेटी को ‘सेट’ करने की कोशिश करता है..? मीसा ने लिखा कि किस तरह की बाजारू भाषा है ये..? वह भी एक महिला के लिए..?  देश का प्रधानमंत्री होकर एक सार्वजनिक मंच से एक महिला को ‘बेचारी’ कहने पर मीसा ने सख्त आपत्ति की और कहा कि एक तरफ आप ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा देकर स्वांग रचते हैं और दूसरी तरफ महिलाओं के लिए सरेआम अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं। और इस तरह मोदी को ‘गली का गुंडा’ करार देते हुए मीसा कहती हैं कि जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल प्रधानमंत्री अपने भाषणों में करते हैं वैसा कोई सभ्य व्यक्ति नहीं कर सकता।

खैर ये तो मोदी के घोर समर्थक भी मानेंगे कि चुनावी रैलियों में उनकी भाषा और शैली वो नहीं रहती जो ‘लालकिले’ या ‘सिलिकॉन वैली’ में रहती है। मीसा के लिए कहे गए शब्द भी प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप नहीं थे। दुनिया भर में उन्होंने अपनी जो छवि बनाई उसे वो बिहार में दांव पर क्यों लगा रहे हैं, ये भी समझ से परे है। पर मीसा अपने पिता द्वारा प्रधानमंत्री को ‘ब्रह्मपिशाच’ कहे जाने पर क्या बोलेंगी..? और जब उनके पिता ‘करिया कबूतर’ और ‘एक बोतल दारू’ से ‘मोदी के भूत’ को ‘झाड़’ रहे होते हैं और ‘भूत’ फिर भी ना भागे तो ‘करिया हड़िया’ में ‘सरसों’ और ‘लाल मिर्च’ जला रहे होते हैं, तब वो चुप क्यों रहती हैं..?

बिहार में चुनाव अपने चरम पर है। दो चरण हो चुके हैं और तीसरे चरण का मतदान आज हो रहा है। चौथा और पाँचवां चरण भी आ ही जाएगा… 8 नवंबर को मतगणना होगी… और फिर अगले कुछ दिनों में चाहे जिसकी भी हो, सरकार का गठन भी हो जाएगा। जीतने वाले सीना तानकर चलेंगे और हारने वाले गरदन झुकाकर। चुनाव है तो जीत-हार भी होनी ही है, सो हो जाएगी। लेकिन क्या सारी कहानी इसी जीत-हार पर आकर खत्म हो जाती है..? नहीं… बिल्कुल नहीं। सच तो ये है कि चुनाव चाहे जो जीते, ‘मनुष्यता’ की लड़ाई दोनों ही पक्ष – महागठबंधन और एनडीए (शेष दल भी अपवाद नहीं हैं) – हार चुके हैं। मनुष्यता की लड़ाई मर्यादा और संस्कार के ‘शस्त्रों’ से लड़ी जाती है पर बिहार चुनाव में सभी दलों के नेता इन शस्त्रों का ‘संधान’ भूल चुके हैं। वे सचमुच भूल बैठे हैं कि मर्यादा खोकर, संस्कार लुटाकर आपने ‘सिंहासन’ क्या पूरा संसार भी पा लिया तो भी ‘कंगाल’ ही कहलाएंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अब ‘ज्ञान’ मिला नागमणि को कि भाजपा के ‘एजेंट’ हैं मुलायम-पप्पू..!

राजनीति में और वो भी आज की राजनीति में पाला बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं। ‘मौसम’ और ‘अवसर’ के हिसाब से प्रतिबद्धता ‘बदल लेना’ और यहाँ तक कि ‘बदलते ही रहना’ भी किसी को अब चौंकाता नहीं। लेकिन पाँच में से दो चरणों के चुनाव के बाद अगर आपको ये ‘ज्ञान’ मिले कि कल तक आप जिनके साथ खड़े थे उनके कारण सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता ‘खतरे’ में थी और जिन्हें आप कोसते नहीं थक रहे थे दरअसल वही सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता नाम की दोनों ‘चिड़िया’ को तथाकथित ‘खतरे’ से बाहर निकाल सकते हैं, तो इसे क्या कहेंगे आप..? जाहिर तौर पर राजनीतिक अवसरवादिता की ये पराकाष्ठा है और पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा वर्तमान में समरस समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागमणि बिहार में सम्भवत: इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। लालू प्रसाद यादव से ‘मौसम वैज्ञानिक’ का खिताब पा चुके रामविलास पासवान से भी बड़े। अब तक कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसमें नागमणि जाकर ना हो आए हों।

नागमणि ने कल 24 अक्टूबर को प्रेस कांफ्रेंस कर बिहार चुनाव के अगले तीन चरणों में जदयू-राजद-कांग्रेस के महागठबंधन को समर्थन देने की घोषणा की। उन्होंने ‘संकेत’ में कुछ कहने की जगह सीधे तौर पर आरोप लगाया कि सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के संरक्षक पप्पू यादव भाजपा के ‘एजेंट’ हैं। उन्होंने कहा कि दोनों दल भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। दोनों दलों ने ज्यादातर टिकट यादव और मुसलमानों को दिया है ताकि उनके मतों का बिखराव हो और भाजपा को इसका लाभ मिले। बकौल नागमणि भाजपा के कारण बिहार में सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ गई है, ऐसे में उन्होंने महागठबंधन का साथ देने का निर्णय लिया है।

नागमणि ने यह भी कहा कि पिछड़ा, अतिपिछड़ा, दलित एवं अल्पसंख्यकों के हक-हुकूक के लिए नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी ने शहीद जगदेव की नीति और सिद्धांतों पर चलने का वादा किया है। लेकिन नागमणि ये नहीं कह पाए कि ये ‘वादा’ वो नीतीश-लालू से चुनाव शुरू होने के पूर्व क्यों नहीं ले पाए। खैर, जो ‘डील’ तब नहीं हुई, वो अब हो गई। वैसे बता दें कि नागमणि शहीद जगदेव के पुत्र हैं और अब तक के राजनीतिक करियर में उन्होंने जो भी हासिल किया है वो इसी कारण। 2005 में नीतीश कुमार की पहली सरकार में इनकी पत्नी मंत्री भी रह चुकी हैं।

गौरतलब है कि नागमणि से पहले एनसीपी के महासचिव तारिक अनवर ने तीसरे मोर्चे से अलग होने की घोषणा की थी। तारिक अनवर तीसरे मोर्चे की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा थे लेकिन मुलायम ने बिहार आकर भाजपा के पक्ष में लहर होने की बात कह दी और ऐसे में तारिक के लिए मोर्चे से अलग होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।

पहले तारिक अनवर (एनसीपी) और अब नागमणि (समरस समाज पार्टी) के अलग होने के बाद जो चार पार्टियां तीसरे मोर्चे में रह गई हैं, वो हैं मुलायम की समाजवादी पार्टी, पप्पू यादव की जनअधिकार पार्टी, देवेन्द्र यादव की समाजवादी जनता पार्टी और पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुलायम की अगुआई वाले इस तीसरे मोर्चे में शामिल पार्टियों की ‘तैयारी’ और ‘तालमेल’ की बात अब हास्यास्पद हो चली है।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी अब दुनिया के सबसे बड़े ‘स्टाईल आइकॉन’, 42 राष्ट्राध्यक्ष पहनेंगे उनका परिधान

नरेन्द्र मोदी के विरोधी चाहे जो बोलें उनका जादू ना केवल दिन-ब-दिन बढ़ रहा है बल्कि अब तो लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। मोदी की विदेश नीति कितनी सफल है इस पर भले ही ‘विवाद’ की गुंजाइश हो लेकिन भारत समेत दुनिया भर में उनका कैसा ‘असर’ है ये देखने के लिए एक ही दृश्य काफी होगा। जी हाँ, कल्पना करें उस दृश्य की जब एक नहीं, दो नहीं पूरे 42 राष्ट्राध्यक्ष उनके परिधान में दिखेंगे।

दरअसल, 26 से 29 अक्टूबर तक नई दिल्ली में इंडो-अफ्रीकन फोरम समिट (आईएएफएस) – 2015 का आयोजन होने जा रहा है। इस समिट में शामिल होनेवाले सभी 42 राष्ट्राध्यक्षों को प्रधानमंत्री मोदी बहुत खास उपहार देने जा रहे हैं। ये उपहार है मोदी स्टाईल की बंडी (मोदी जैकेट) और ‘इक्कत’ कुर्ते का जिस पर अब उनकी छाप लग चुकी है।

जरा रुकिए, अभी ख़बर पूरी नहीं हुई। असली ख़बर तो ये है कि समिट के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा दिए जानेवाले भोज में सभी राष्ट्राध्यक्ष ‘मोदी जैकेट’ में दिखेंगे। यही नहीं, अपने प्रवास के दौरान सभी राष्ट्राध्यक्ष मोदी स्टाईल के कुर्ते में भी दिखाई देंगे। इसके लिए सभी राष्ट्राध्यक्षों की पसंद को देखते हुए अलग-अलग रंग के कुर्ते बनाए जा रहे हैं। इससे पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी अपनी भारत-यात्रा के दौरान मोदी जैकेट में दिखे थे। बताया जाता है कि अफ्रीकी देशों के कई राजनेता मोदी के इस डिप्लोमेसी स्टाईल के कायल हो गए हैं।

यह पहला मौका है जब अफ्रीकी देशों के राष्ट्राध्यक्ष इतनी बड़ी संख्या में यहाँ मौजूद होंगे। राष्ट्राध्यक्षों के साथ-साथ इसमें अफ्रीकी देशों के 400 उद्योगपति भी शामिल हो रहे हैं। मोदी भविष्य की सम्भावनाओं के मद्देनज़र इस अवसर का महत्व जानते हैं। यही कारण है कि बिहार चुनाव को लेकर अपने अति व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद वो इस अवसर को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।

भारत और अफ्रीका के बीच ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। भारत अफ्रीका में एक बड़ा निवेशक है और हाल के वर्षों में वहाँ इसका व्यापार बहुत तेजी से बढ़ा है। वर्तमान में अफ्रीका के साथ भारत का कारोबार 75 अरब डॉलर का है और भारत ने पिछले चार सालों में अफ्रीकी महाद्वीप को 7.4 अरब डॉलर का कर्ज दिया है जिसका उपयोग 41 देशों की 137 परियोजनाओं मे हो रहा है।

यह भी जानें कि तंजानिया, सूडान, मोजांबिक, केन्या, युगांडा समेत कई अफ्रीकी देशों के पास बड़े पैमाने पर तेल और गैस के भंडार हैं। भारत अपने आर्थिक विकास के लिए ईंधन में विशेष रूप से निवेश चाहता है। इसके अलावा भारत समुद्र क्षेत्र से जुड़े कारोबार में भी अहम साझेदारी चाहता है। यही नहीं, भारत अफ्रीकी देशों के साथ कृषि, ऊर्जा, स्वास्थ्य क्षेत्र, आधारभूत ढाँचे और तकनीक में विस्तार के लिए भी काम करने की इच्छा रखता है।

इन तमाम तथ्यों की पृष्ठभूमि में इंडो-अफ्रीकन फोरम समिट का महत्व सहज ही समझा जा सकता है। बहरहाल, कूटनीतिक सम्भावना अपनी जगह है, फिलहाल तो मोदी की ‘पर्सनल डिप्लोमेसी’ के कारण ये समिट पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नोबेल विजेता सत्यार्थी बने ह्यूमैनिटेरियन अवार्ड पाने वाले पहले भारतीय

कैलाश सत्यार्थी के काम को एक और ‘सलाम’ मिला है। शांति के इस नोबेल पुरस्कार विजेता के नाम एक और प्रतिष्ठित पुरस्कार जुड़ गया है। पिछले सप्ताह उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित ‘हार्वर्ड ह्यूमैनिटेरियन ऑफ द ईयर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान बाल अधिकारों की रक्षा में उनके योगदान को देखते हुए दिया गया है। बता दें कि सत्यार्थी इस पुरस्कार को पाने वाले पहले भारतीय हैं।

‘ह्यूमैनिटेरियन’ पुरस्कार ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जिसने लोगों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में उल्लेखनीय काम किया हो और लोगों को अपने काम से प्रेरित किया हो। सत्यार्थी ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में बाल संरक्षण एवं कल्याण संबंधी प्रावधानों को शामिल कराने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। इन प्रावधानों का लक्ष्य बच्चों की दासता, तस्करी, जबरन श्रम और हिंसा को समाप्त करना है।

सत्यार्थी ने पुरस्कार स्वीकार करते हुए कहा- उन लाखों वंचित बच्चों की ओर से विनम्रतापूर्वक यह पुरस्कार स्वीकार करता हूँ जिनके अधिकारों की रक्षा के लिए हम प्रयास कर रहे हैं। आओ, हम सब मिलकर विश्व से बाल दासता को समाप्त करने का प्रण लें। इस अवसर पर उन्होंने एक बड़े ‘सत्य’ को रेखांकित किया कि अमेरिका समेत विकसित देशों में भी सैकड़ों गुलाम बच्चे हैं जिन्हें श्रम करने के लिए मजबूर किया जाता है, देह व्यापार में धकेला जाता है या घरेलू श्रम के लिए उनकी तस्करी की जाती है। कहने का अर्थ ये है कि आज ये समस्या विश्वव्यापी है। तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देश ही नहीं अपने ‘ऐश्वर्य’ पर इतराने वाले देश भी इससे अछूते नहीं। ऐसे में सत्यार्थी के काम की क्या अहमियत है, ये कहने की जरूरत नहीं।

कैलाश सत्यार्थी आज बालश्रम के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक बन चुके हैं। 1980 में उनके द्वारा शुरू किया गया ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ आज किसी परिचय का मोहताज नहीं। अपने इस आन्दोलन की बदौलत वो अब तक अस्सी हजार मासूमों की ज़िन्दगी संवार चुके हैं। कितनी बड़ी बात है कि इस ‘साधक’ ने इतनी बड़ी साधना अकेले अपने दम पे की, बिना किसी शोर-शराबे के। आज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी जो पहचान और स्वीकार्यता है उसके मूल में सिर्फ और सिर्फ उनका काम है, कोई सरकार, कोई सिफारिश, सोशल मीडिया पर चलाया गया कोई कैम्पेन या प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई चकाचौंध नहीं। ‘विज्ञापन’ के युग में ये बातें उन्हें भीड़ से एकदम अलग करती हैं। नोबेल के बाद ‘हार्वर्ड ह्यूमैनिटेरियन ऑफ द ईयर’ पुरस्कार इस बात की एक और तस्दीक है।

इस पुरस्कार के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सत्यार्थी से पहले यह पुरस्कार मार्टिन लूथर किंग सीनियर, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिवों कोफी अन्नान, बुतरस बुतरस-घाली और ज़ेवियर पेरिज डी कुईयार, नोबेल पुरस्कार विजेताओं जोस रामोस-होर्ता, बिशप डेसमंड टूटू, जॉन ह्यूम और एली वेसल तथा संयुक्त राष्ट्र के वर्तमान महासचिव बान की मून जैसी हस्तियों को मिल चुका है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘शत्रु’ का कहा ‘सच’ है या ‘शत्रुता’..?

बिहार में दो चरण के मतदान के बाद क्या सचमुच भाजपा नेताओं के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही हैं..? पहले और दूसरे चरण की वोटिंग के बाद कोई ‘स्पष्ट रुझान’ ना देख क्या भाजपा के तमाम रणनीतिकारों को ‘दिल्ली’ जैसी कोई सम्भावना दिखने लगी है..? क्या उम्मीद के विपरीत परिणाम की आशंका से प्रधानमंत्री मोदी की बिहार की कई प्रस्तावित रैलियां रद्द की गई हैं..? इन सारे सवालों के जवाब तो खैर समय आने पर मिलेंगे लेकिन भाजपा के अपने ही ‘घर’ के भीतर से जो बयान सामने आया है वो ‘समय’ से पहले ‘समय’ को आमंत्रित करने जैसा है।

भाजपा के घर के भीतर से ये बयान बीच चुनाव में ‘शत्रु’ के अलावे कौन दे सकता है भला। जी हाँ, ‘शत्रु’ यानि शत्रुघन सिन्हा। बीते 17 अक्टूबर को चैनल न्यूज़ 18 के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि “बिहार में पहले दो चरण के मतदान के बाद प्रदेश बीजेपी नेताओं के चेहरे की हवाईयां उड़ी हुई हैं।” उन्होंने सवाल उठाया कि अन्तिम समय में प्रधानमंत्री की जनसभाओं की संख्या कम करने से क्या नकारात्मक संदेश नहीं जा रहा है..? ‘शत्रु’ ने बिना रुके यह भी कहा कि भाजपा के नेता “हम तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे” वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं।

पहले सिनेमा, फिर राजनीति में अलग पहचान रखने वाले और अब अलग-थलग पड़ गए भाजपा सांसद शत्रुघन सिन्हा की नाराज़गी कोई नई बात नहीं। अपनी पार्टी के निर्णयों और नेताओं को लेकर आए दिन अपने बयानों से वो पार्टी को असहज स्थितियों में डालते रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने जो कहा है और वो भी बिहार के बीच चुनाव में, भाजपा को उससे बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

बहरहाल, शत्रुघन सिन्हा ने क्या कहा उसे भूल भी जाएं तो भी इस ‘थ्योरी’ को सिरे से नकारना मुश्किल है कि अगर ‘धुआँ’ है तो कम या ज्यादा कहीं ‘आग’ भी होगी ही। और फिर ‘शत्रु’ की बात की पुष्टि करते दिख रहे कुछ घटनाक्रम भी हैं जिन पर निगाह डालनी होगी। सबसे पहले तो ये कि ‘द वीक’ की ख़बर के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बिहार में प्रस्तावित रैलियों मे से छह रैलियाँ रद्द कर दी गई हैं। यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बिहार में लगे बड़े-बड़े पोस्टरों को उतारा जा रहा है। माना जा रहा है कि ऐसा उम्मीद के विपरीत नतीजे आने की स्थिति में बड़े नेताओं को ‘बचाने’ के लिए किया जा रहा है। मोदी और शाह की जगह सुशील कुमार मोदी, नंदकिशोर यादव, मंगल पांडेय, सीपी ठाकुर, हुकुमदेव नारायण यादव, अश्विनी चौबे जैसे स्थानीय नेताओं के पोस्टर लगाए जा रहे हैं। और तो और पार्टी ने अपना चुनावी नारा तक बदल दिया है। पहसे नारा था “अबकी बार, मोदी सरकार”, फिर इसे बदलकर किया गया “बदलिए सरकार, बदलिए बिहार” और अब कहा जा रहा है “विकास की होगी तेज रफ्तार, जब केन्द्र-राज्य में एक सरकार।”

हालांकि चुनावी मामलों के कई जानकार इसे भाजपा की सोची-समझी रणनीति बता रहे हैं। दूसरे चरण के मतदान के ठीक पहले भाजपा ने एक नए तरीके का विज्ञापन दिया जिसमें किसी नेता का फोटो नहीं, सिर्फ 11 वादे थे और शीर्षक था “भाजपा का साथ, सबका विकास।”  इसके अलावे एक और पोस्टर है जिस पर एक ओर रामविलास-मांझी-कुशवाहा और दूसरी ओर सुशील कुमार मोदी-नंदकिशोर यादव-मंगल पांडेय की तस्वीरें हैं। कहा जा सकता है कि भाजपा प्रचार में अपने केन्द्रीय और स्थानीय नेताओं के बीच ‘संतुलन’ बनाए रखने के लिए ऐसा कर रही है। जहाँ तक रैलियों की बात है, तो कुछ रैलियां अगर रद्द भी कर दी गई हों, फिर भी अभी प्रधानमंत्री की लगभग 40 सभाएं होनी हैं।

राजनीति का तकाजा है कि शत्रुघन के बयान की व्याख्या भाजपा के विरोधी अपनी तरह से करेंगे और भाजपा उसका जवाब अपने तरीके से देगी। लेकिन ‘शत्रु’ ने जो कहा वो ‘सच’ था या ‘शत्रुता’ थी उनकी, ये देखने की बात होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार चुनाव का दूसरा चरण : भय पर उत्साह की जीत

55 प्रतिशत मतदान के साथ बिहार चुनाव का दूसरा चरण भी पूरा हुआ। छह जिलों – रोहतास, जहानाबाद, कैमूर, अरवल, औरंगाबाद और गया – की जिन 32 सीटों के लिए कल मतदान हुआ उनमें 23 सीटें नक्सल प्रभावित थीं। इसके बावजूद मतदाताओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। लोकतंत्र के पर्व पर कहीं भी भय हावी नहीं हुआ। महिला मतदाताओं ने इस चरण में भी बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 2010 में इन्हीं सीटों पर 52 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार इसमें 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी स्वागत योग्य है।

वोटों के प्रतिशत की बात करें तो कैमूर में सबसे ज्यादा 57.86 प्रतिशत और अरवल में सबसे कम 52 प्रतिशत मत पड़े। वहीं रोहतास में 54.66 प्रतिशत, जहानाबाद में 56.49 प्रतिशत, औरंगाबाद में 52.50 प्रतिशत और गया में 55.54 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।

दूसरे चरण में कुल 456 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। इनमें 32 महिलाएं शामिल हैं। इस चरण में 86,13,870 मतदाताओं के लिए 9,119 मतदान केन्द्र बनाए गए थे और सुरक्षा की जबरदस्त व्यवस्था की गई थी। शान्तिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए अर्द्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस की कुल 993 कम्पनियां तैनात थीं।

इस चरण के प्रमुख उम्मीदवारों में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी (इमामगंज और मखदुमपुर), विधान सभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी (इमामगंज) और भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के तीन सम्भावित उम्मीदवार – पूर्व मंत्री और छह बार विधायक रहे प्रेम कुमार (गया), पूर्व राष्ट्रीय सचिव रामेश्वर चौरसिया (नोखा) और हाल ही में चर्चा में आए और झारखंड में संघ का चेहरा रहे राजेन्द्र सिंह (दिनारा) – शामिल हैं। भाजपा की राज्य इकाई के पूर्व प्रमुख गोपाल नारायण सिंह (नवीनगर), नीतीश सरकार के सहकारिता मंत्री जय कुमार सिंह (दिनारा), पंचायती राज मंत्री विनोद यादव (शेरघाटी) और मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन (कुटुम्बा) के भविष्य का फैसला भी इसी चरण में होना है। नीतीश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे रामधनी सिंह (करगहर) भी इसी चरण में चुनाव मैदान में हैं। बता दें कि जेडीयू से टिकट कटने पर इस बार वो सपा की ओर से चुनाव लड़ रहे हैं।

हालांकि सभी 32 सीटों पर कांटे का मुकाबला देखने को मिल रहा है लेकिन जिस सीट पर सबसे ज्यादा निगाहें लगी हैं वो है ‘सुरक्षित’ सीट इमामगंज। यहाँ दो दिग्गज आमने-सामने हैं। इस सीट के लिए हम के नेता जीतन राम मांझी का मुकाबला जेडीयू के वरिष्ठ नेता उदय नारायण चौधरी से है। चौधरी इस सीट को पाँच बार जीत चुके हैं। दोनों उम्मीदवारों के कद और ‘सांकेतिक महत्व’ को देखते हुए एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए ये सीट प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। हालांकि मांझी जहानाबाद की मखदुमपुर सीट से भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

महागठबंधन के लिए इस चरण में बहुत कुछ दांव पर लगा है क्योंकि पिछले चुनाव में 32 में से 19 सीटें जेडीयू ने जीती थीं। तब उसकी सहयोगी रही भाजपा के खाते में 10 सीटें गई थीं, जबकि दो सीटें राजद और एक सीट निर्दलीय के हिस्से में गई थी। इस बार महागठबंधन की ओर से जेडीयू और राजद ने 13-13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। शेष 6 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। वहीं एनडीए की ओर से भाजपा के 16, हम के 7, रालोसपा के 6 और लोजपा के तीन उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा विधान सभा के लिए नामांकन ने पकड़ी रफ्तार

पाँचवें चरण के नोटिफिकेशन के पाँचवें और नवरात्रि के प्रथम दिन यानि 13 अक्टूबर से मधेपुरा विधान सभा (क्षेत्र सं. 73) के लिए नामांकन कार्य में रफ्तार आई है। इस दिन महादलित व दलित परिवार के दो प्रत्याशियों ने नामांकन का पर्चा दाखिल किया। इनमें एक हैं पूर्व मंत्री नवल किशोर भारती के पुत्र ओम प्रकाश भारती जिन्होंने मानववादी जनता पार्टी से नामांकन का पर्चा भरा है और दूसरे प्रत्याशी हैं कपिलदेव पासवान जिन्होंने बहुजन समाज पार्टी से नामांकन का पर्चा दाखिल किया है। ये दोनों ही इंटर पास हैं। बड़े-से-बड़े दलित नेता भी जहाँ ‘सुरक्षित’ क्षेत्र की तलाश में दूरियां नापते कहीं से कहीं चले जाते हैं, वहाँ इन दोनों का ‘सामान्य’ क्षेत्र से किस्मत आजमाना सचमुच बड़ी बात है। इन दोनों ने शायद “मंगल मुखी सदा सुखी” सोच कर नामांकन के लिए मंगलवार का दिन चुना। अब ये कितने ‘सुखी’ हो पाएंगे ये तो 8 नवंबर यानि मतगणना के दिन ही पता चल पाएगा।

नवरात्रि के दूसरे दिन यानि 14 अक्टूबर, बुधवार को उन दो प्रत्याशियों ने नामांकन के पर्चे दाखिल किए जिनके बीच इस चर्चित सीट के लिए सीधा मुकाबला तय माना जा रहा है। ये दोनों हैं मधेपुरा के निवर्तमान विधायक और महागठबंधन के उम्मीदवार प्रो. चन्द्रशेखर तथा नगर परिषद् के निवर्तमान मुख्य पार्षद् और एनडीए प्रत्याशी डॉ. विजय कुमार विमल। अपने नामांकन से ‘असर’ पैदा करने में इन दोनों ने कोई ‘कसर’ नहीं छोड़ी लेकिन जनता के दरबार में किसकी फरियाद सुनी जाती है और बुधवार किसके लिए जीत का द्वार खोलता है, ये देखने की बात होगी।

निर्वाची पदाधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला से मधेपुरा अबतक को मिली जानकारी के अनुसार 14 अक्टूबर को इन दोनों के अलावे एक निर्दलीय ज्योति मंडल एवं चार अन्य प्रत्याशी जो कि अमान्यताप्राप्त दलों से ताल्लुक रखते हैं, ने भी नामांकन के पर्चे भरे हैं। इनके नाम हैं – मो. ताहिर, दिनेश यादव उर्फ फौजी, कमल कुमार एवं विजेन्द्र यादव।

बता दें कि पाँचवें चरण के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 15 अक्टूबर है। स्क्रूटनी के लिए 16 अक्टूबर का दिन निश्चित है तथा 19 अक्टूबर तक नाम वापस लिए जा सकते हैं। मतदान 5 नवंबर को होना है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार चुनाव के पहले चरण में 57 प्रतिशत मतदान : कौन खुश, कौन परेशान..?

बिहार में पहले चरण का चुनाव सम्पन्न हुआ। 10 जिलों की 49 सीटों पर कल हुए मतदान में 57 प्रतिशत वोट डाले गए। 2010 की तुलना में ये 6 प्रतिशत ज्यादा है। सबसे ज्यादा मतदान खगड़िया में 61 प्रतिशत और सबसे कम नवादा में 53 प्रतिशत रहा। वोट के मामले में महिलाएं पुरुषों से आगे रहीं। पुरुषों के 54.5 प्रतिशत मतदान के मुकाबले महिलाओं के मतदान का प्रतिशत 59.5 रहा।

सभी 49 सीटों पर महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधा मुकाबला है। महागठबंधन की बात करें तो इनमें से जेडीयू 24, राजद 17 और कांग्रेस 8 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। एनडीए की ओर से भाजपा के 27, लोजपा के 13, रालोसपा के 6 और हम के 3 उम्मीदवार मैदान में हैं।

पिछले चुनाव की तुलना में मतदान में हुए 6 प्रतिशत इजाफे को एनडीए ‘परिवर्तन की बयार’ कह रहा है तो महागठबंधन इसे नीतीश का ‘मेहनताना’ बता रहा है। दोनों दावों में कौन सही है, ये तो खैर आने वाला वक्त बताएगा लेकिन वोटों में ऐसा इजाफा भी नहीं हुआ कि उसे ‘एंटी इन्कम्बेंसी’ कह दिया जाय। खास तौर पर तब जबकि मुकाबला सीधा हो और थोड़ा भी ‘त्रिकोण’ बनने की स्थिति में पलड़ा किसी भी तरफ झुक जाने की गुंजाइश बन रही हो। हाँ, अगले चरणों में मतदान प्रतिशत और बढ़ता है तो उसे महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी जरूर मान सकते हैं क्योंकि वर्तमान ‘समीकरण’ को देखते हुए ऐसा होना ‘एंटी इन्कम्बेंसी’ या ‘मोदी फैक्टर’ का असर माना जाएगा। कुल मिलाकर कल के आंकड़ों से ना तो एनडीए पूरी तरह ‘आश्वस्त’ हो सकता है, ना ही महागठबंधन के लिए ‘हताश’ हो जाने की स्थिति है।

बहरहाल, कल जिन 10 जिलों में चुनाव हुए, वे हैं समस्तीपुर, बेगुसराय, खगड़िया, भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, नवादा और जमुई। इन 10 जिलों की 49 सीटों के लिए कुल 583 उम्मीदवार मैदान में थे जिनमें 54 महिला उम्मीदवार भी शामिल हैं। इस चरण में मतदान केन्द्रों की कुल संख्या 13 हजार 212 और मतदाताओं की कुल संख्या एक करोड़ 35 लाख 72 हजार 339 थी।

पहले दौर में जिन उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला होना है उनमें समस्तीपुर जिले की सरायरंजन सीट से चुनाव लड़ रहे जेडीयू विधायक दल के नेता और जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी प्रमुख हैं। उनका मुकाबला भाजपा के रंजीत निर्गुणी से है। जहाँ विजय चौधरी की गिनती राज्य के बड़े नेताओं में होती है वहीं निर्गुणी अभी जिला परिषद् के सदस्य हैं केवल। इस दौर के एक अन्य प्रमुख उम्मीदवार हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी हैं जो तारापुर से चुनाव लड़ रहे हैं। शकुनी का मुकाबला जेडीयू के मेवालाल चौधरी से है जो कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वीसी रह चुके हैं।

कहलगांव से कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह और अलौली से लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस भी इसी चरण में चुनाव मैदान में हैं। सदानंद सिंह का मुकाबला लोजपा के नीरज मंडल से है और पारस का मुकाबला राजद के चंदन राम से। ये दोनों अपनी-अपनी पार्टी के कद्दावर नेता हैं और इनकी जीत-हार से क्रमश: कांग्रेस और लोजपा की साख पर असर पड़ना तय है।

पहले दौर के अन्य महत्वपूर्ण उम्मीदवारों में नीतीश सरकार में मंत्री रहीं और इस बार भाजपा से किस्मत आजमा रहीं रेणु कुशवाहा (समस्तीपुर), जेडीयू सरकार के मंत्री दामोदर राउत (झाझा), युवा राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक मेहता (उजियारपुर) और राजद सांसद जय प्रकाश यादव के भाई विजय प्रकाश (जमुई) शामिल हैं।

राज्य के तीन नेताओं की अगली पीढ़ी की किस्मत भी कल इवीएम में बंद हो गई। भागलपुर से सांसद अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत (भाजपा), जेडीयू के पूर्व मंत्री और वर्तमान में हम के नेता नरेन्द्र सिंह के बेटे अजय प्रताप (भाजपा) और कल्याणपुर से लोजपा सांसद रामचन्द्र पासवान के बेटे प्रिंस राज (लोजपा) चुनाव मैदान में हैं। अब इन पिता-पुत्रों की धड़कनें 8 नवंबर तक तेज रहेंगी।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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स्वेतलाना एलेक्सिएविच ने बढ़ाया साहित्य, नोबेल और नारी का दायरा

इतिहास केवल समय के बहाव और उस पर अंकित तारीखों में नहीं होता, इतिहास मानव-मन के भीतर हिलोड़ें लेती भावनाओं का भी हो सकता है। अगर भीतर के इस इतिहास को आकार लेते देखना हो तो एक बार स्वेतलाना एलेक्सिएविच को जरूर पढ़ें जिन्हें 2015 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। स्वेतलाना साहित्य का नोबेल पानेवाली चौदहवीं महिला और पहली पत्रकार हैं। उन्हें यह सम्मान भावनाओं के इतिहास को संकलित करने वाली उनकी खोजी किताबों के लिए दिया गया है जिनमें पूर्व सोवियत संघ के लोगों के जीवन को उन्होंने गजब की बारीकी से उकेरा है। आज जबकि पत्रकारिता ‘सेंशेसन’ में खोती जा रही है, स्वेतलाना हमें बहुत शिद्दत से बताती हैं कि उसे कैसे सृजन से नया आयाम दिया जा सकता है।

दुनिया के इस सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए इस साल 198 लोगों को नामांकित किया गया था लेकिन चुना गया 67 साल की स्वेतलाना एलेक्सिएविच को। स्वेतलाना के नाम की घोषणा करते हुए नोबेल कमिटी ने तीन चीजों को खास तौर से रेखांकित किया। स्वेतलाना को भीड़ से अलग करने वाली  वे तीन चीजें हैं – ‘विविधता से भरा लेखन’, ‘पीड़ा का स्मारक’ और ‘हमारे समय में साहस’। प्रत्यक्षदर्शियों की जुबान से कहानी कहने में महारत रखने वाली स्वेतलाना की कृतियां ‘वॉयसेस ऑफ यूटोपिया’ कही जाती हैं। स्वीडिश अकादमी, स्टॉकहोम की सचिव सैरा डैनियुस ने बिल्कुल सही चिह्नित किया है कि उनके लेखन में ‘ऐतिहासिक घटनाएं नहीं’ बल्कि ‘भावनाओं का इतिहास’ है।

स्वेतलाना का जन्म 31 मई, 1948 को यूक्रेन के शहर स्तानिस्लाव में हुआ। उन्होंने यूक्रेन, फ्रांस और बेलारूस में लम्बा समय बिताया। उनके पिता बेलारूस के थे और माँ यूक्रेन की। 1962 में स्वेतलाना अपने माता-पिता के साथ बेलारूस आ गईं और यहीं पर अपनी पढ़ाई पूरी की। इस नोबेल पुरस्कार विजेता ने एक स्थानीय अखबार में रिपोर्टिंग करने के लिए स्कूल की पढाई छोड़ दी थी। खैर, स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पत्रकार व शिक्षिका के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध, सोवियत-अफगान युद्ध, सोवियत संघ के पतन और चेरनोबिल आपदा जैसे विषयों पर लिखा। 1985 में उनकी पहली किताब ‘वॉर्स अनवुमेनली फेस’ आई जिसकी अब तक 20 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। खोजी प्रकृति की स्वेतलाना ने इस किताब के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने वाली सैकड़ों महिलाओं का इंटरव्यू लिया था।

विषय-चयन और पूर्वतैयारी की बात करें तो स्वेतलाना एलेक्सिएविच सधी हुई पत्रकार हैं और जब वो ‘ट्रीटमेंट’ और विश्लेषण पर आती हैं तो करुणा से ओतप्रोत साहित्यकार दिखेंगी। यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र में 1986 में हुए हादसे पर लिखी गई उनकी बहुचर्चित किताब ‘वॉयसेस ऑफ चेरनोबिल’ इसका लाजवाब उदाहरण है। उनकी एक और किताब है ‘सेकैंड हैंड टाइम’ जिसमें वो बड़ी संवेदना के साथ पड़ताल करते दिखेंगी कि सोवियत संघ के विघटन के बाद सोवियतकालीन पीढ़ियों ने खुद को नई दुनिया में कैसे ढाला। ‘जिंकी ब्वॉयज’, ‘द लास्ट विटनेसेज : द बुक ऑफ अनचाइल्डलाइक स्टोरीज’ तथा ‘एनचांटेड विथ डेथ’ उनकी अन्य कृतियां हैं।

स्वेतलाना की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। कई अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं। उनकी स्वीकार्यता आज दुनिया भर में है लेकिन ये तथ्य हैरान करता है कि रूसी भाषा में लिखी उनकी कुछ किताबें ‘विवादों’ का शिकार होकर उनके अपने ही देश में प्रकाशित नहीं हो पाईं। कारण जो भी हो, अभिव्यक्ति पर इस तरह की ‘बंदिश’ बताती है कि आज भले ही चाँद के बाद मंगल पर भी दस्तक दे दी हो हमने, पर सच ये है कि धरती पर रहना भी हम ठीक से नहीं सीख पाए अब तक। स्वेतलाना एलेक्सिएविच, सलमान रश्दी या तसलीमा नसरीन जैसों का महत्व इस कारण भी है कि वे हमें इस बात की याद दिलाते रहते हैं।

साहित्य में पत्रकारिता की इतनी प्रांजल और संवेदनशील उपस्थिति स्वेतलाना से पहले नहीं थी, स्वेतलाना से पहले किसी पत्रकार को साहित्य का नोबेल नहीं मिला था और लेखकीय प्रतिबद्धता के लिए किसी नारी के ऐसे संघर्ष का उदाहरण भी कदाचित् नहीं दिखता। कहने की जरूरत नहीं कि स्वेतलाना एलेक्सिएविच ने अकेले अपने दम पर साहित्य, नोबेल और नारी तीनों का दायरा एक साथ बढ़ाया है।

चलते-चलते

अगर आप जानने को उत्सुक हैं कि स्वेतलाना एलेक्सिएविच से पहले किन तेरह महिलाओं को साहित्य का नोबेल मिला तो ये रही पूरी सूची – 1909 में सेल्मा ओटालिया लोविसा लाजरोफ (स्वीडन), 1926 में ग्रेजिया डेलेड्डा (इटली), 1928 में सिगरिड उंडसेट (नॉर्वे), 1938 में पर्ल एस. बक (अमेरिका), 1945 में गेब्रिएला मिस्त्राल (चिली), 1966 में नेली साक्स (स्वीडन-जर्मनी), 1991 में नेडिन गोर्डिमर (दक्षिण अफ्रीका), 1993 में टोनी मॉरिसन (अमेरिका), 1996 में विस्लावा सिम्बोर्सका (पोलैंड), 2004 में एल्फ्रीड जेलिनेक (ऑस्ट्रिया), 2007 में डोरिस लेसिंग (इंग्लैंड), 2009 में हर्टा म्यूलर (जर्मनी-रूमानिया), 2013 में एलिस मुनरो (कनाडा) और 2015 में स्वेतलाना एलेक्सिएविच (बेलारूस)।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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