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मुमकिन नहीं कलाम के ‘कद’ और ‘हद’ की कल्पना

महान वैज्ञानिक… बेमिसाल शिक्षक… मिसाईलमैन… पोखरण के नायक… भारतरत्न… भारतीय गणतंत्र के भूतपूर्व राष्ट्रपति… ईमानदारी से बतायें, क्या ये सारे विशेषण मिलकर भी एक कलाम को पूरा परिभाषित कर पाएंगे..? नहीं… बिल्कुल नहीं। सच तो यह है कि इनमें से कोई एक विशेषण भी किसी को गौरवान्वित करने के लिए काफी है, और जब ये सारे विशेषण मिलकर भी किसी एक व्यक्ति को परिभाषित ना कर पा रहे हों तो उसके ‘कद’ और उसकी ‘हद’ की कल्पना क्या की जा सकती है..?

“पृथ्वी को रहने लायक कैसे बनाया जाय” विषय पर बोलते-सोचते इस महामानव ने आज ही के दिन ये पृथ्वी छोड़ दी थी। उनके जाने से बना शून्य शायद ही भर पाए। बुद्ध, गांधी, मार्क्स, आईंस्टाईन और कलाम जैसे महामानव रोज-रोज नहीं आते। इन रत्नों को ईश्वर सहेज कर रखते हैं और बड़े मौके पर इन्हें धरती पर भेजते हैं। ऐसे लोग आते हैं और सदियों का अंधेरा दूर कर जाते हैं। बल्कि कहना तो ये चाहिए कि कलाम जैसे लोग रोशनी को भी रोशनी दिखा जाते हैं। आज जहाँ ‘मनुष्यता’ दिन-ब-दिन अपनी शर्मिन्दगी के बोझ तले दबती जा रही है वहाँ किसी ‘कलाम’ की ही बदौलत एक मनुष्य के रूप में हम सिर उठा पाते हैं।

कलाम आज बेशक सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हमारी सोच, हमारे सपनों से उन्हें भला कौन दूर कर सकता है! हमारी आनेवाली पीढ़ियां जब अपना लक्ष्य तय करेंगी, तब कलाम ही टोक रहे होंगे कि “छोटा लक्ष्य एक अपराध है”… और जब-जब हम आँखें बन्द कर सपने देखेंगे, तब कलाम ही हमें बता रहे होंगे कि “सपने वो नहीं जो हम बंद आँखों से देखते हैं, सपने तो वो हैं जो हमें सोने नहीं देते”। फेल (FAIL) को फर्स्ट अटेम्प्ट इन लर्निंग, एंड (END) को एफर्ट नेवर डाइज और नो (NO) को नेक्स्ट अपॉर्चुनिटी कहने का जीवन-दर्शन हमें कलाम से ही मिल सकता है और सफलता की गूढ़ पहेली कलाम ही इतनी आसानी से सुलझा सकते हैं कि “सफलता का रहस्य सही निर्णय है, सही निर्णय अनुभव से आता है और अनुभव गलत निर्णय से मिलता है।”

कलाम को किसी भी कोण से देख लें, देखने वाले का धन्य हो जाना तय है। गीता का कर्मयोग समझना हो तो कलाम के जीवन में एक बार झांक लेना काफी होगा। ‘स्थितप्रज्ञ’ होना क्या होता है इसे समझने के लिए कलाम से बेहतर उदाहरण हो नहीं सकता। सादगी और सहजता कितनी बड़ी पूंजी है गांधी के बाद किसी ने समझाया तो वो कलाम ही थे। जीवन का हर पल कैसे साधना का पर्याय हो सकता है इसकी गवाही तो उनके जीवन का आखिरी पल भी दे गया था।

कलाम जैसों के जीवन का हर पल संदेश है मानव-जाति के लिए। उन्होंने सिर्फ कहा नहीं कि “आप सूर्य की तरह चमकना चाहते हैं, तो आपको पहले सूर्य की तरह ही जलना भी होगा“, बल्कि सूर्य की तरह जलकर, फिर चमककर दिखाया भी। जिस सत्य को कलाम ने जिया नहीं, उसे उन्होंने कहा नहीं। फिर भी पूरे जीवन में उन्होंने एक झूठ जरूर बोला और वो ये कि “किसी को हरा देना बेहद आसान है, लेकिन जीतना बेहद मुश्किल”। आप ही बताएं, जिस शख्स ने बिना किसी को हराए पूरी कायनात जीत ली हो, उसकी ये बात सच मानी भी जाए तो कैसे?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘वेश्या’ कहने के जवाब में ‘बेटी को पेश करो’ का नारा

पिछले कुछ दशकों में राजनीति में किस कदर गिरावट आई है, अब ये चर्चा का विषय नहीं रहा। अब तो आलम यह है कि राजनीति के दंगल में उतरने वाला हर खिलाड़ी और अधिक ‘गिरने’ का कोई नया फार्मूला साथ लाता है, तभी उसकी ‘दूकान’ चल पाती है। पहले राजनीति को धर्म माना जाता था। राजनीतिज्ञ नीति-सिद्धांतों का सहारा लेकर मुद्दों पर तकरार करते थे, लेकिन हाल के वर्षों में ये धर्म, संप्रदाय, जाति से व्यक्ति स्तर पर उतर चुका है। नेता जनहित के मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का सहारा लेने से जरा भी गुरेज नहीं करते। व्यक्तिगत टिप्पणी के साथ-साथ बड़ी बेशर्मी से परिवार को भी निशाना बनाया जा रहा है। इसी का ताजा नतीजा मायावती-दयाशंकर सिंह विवाद है।

दरअसल, हाल के दिनों में जिन नेताओं ने बसपा छोड़ी थी, उन्होंने मायावती पर टिकट बेचने के आरोप लगाए थे। इसी मुद्दे पर मायावती को घेरने की कोशिश में उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने उनकी तुलना ‘वेश्या’ से कर दी। अगर वो मायावती पर केवल भ्रष्टाचार के आरोप लगाते तो बात कुछ और थी, लेकिन ‘अपशब्द’ का प्रयोग कर उन्होंने राजनीतिक मर्यादा की जिस तरह धज्जी उड़ाई उसकी निंदा पूरे देश ने की। हाल की चुनावी सफलताओं से उत्साहित भाजपा की गर्दन अपने एक वरिष्ठ पदाधिकारी की करतूत से झुक गई। दयाशंकर सिंह को पार्टी से निकाल देने के बावजूद उसकी गर्दन उठती नज़र ना आ रही थी। यूपी में उसकी भावी संभावनाओं पर ग्रहण-सा लगता दिखने लगा।

मायावती ने इस जलते तवे पर रोटी सेकने में जरा भी देर नहीं की। उन्होंने संसद में ललकार कर कहा कि यदि लोग (यानि उनके समर्थक और कार्यकर्ता) सड़कों पर उतर आएं तो ये उनकी जिम्मेदारी नहीं होगी। लोग सचमुच सड़कों पर उतरने भी लगे थे। मायावती के लिए ये मुद्दा किसी ‘संजीवनी’ से कम नहीं था। लेकिन हाय री मर्यादा, दयाशंकर सिंह ने तो उसे तार-तार किया ही था, मायावती की पार्टी ने तो उसका रेशा-रेशा निकाल कर रख दिया। बसपा महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने बड़ी निर्लज्जता से इस पूरे मामले में दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी को घसीट लिया। पार्टी के लोग “दयाशंकर की बेटी को पेश करो” जैसे अभद्र नारे तक लगाने में नहीं हिचके।

अपने लोगों की इस शर्मनाक हरकत के बाद की स्थिति को जब तक मायावती समझ और सम्भाल पातीं तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह उनसे पूछ रही थीं कि उन्हें उनके पति के शब्दों पर आपत्ति हुई तो क्या उनकी बेटी को पेश करने का नारा गलत नहीं था? मायावती और उनकी पार्टी के नेता बताएं कि मैं अपनी बेटी कहाँ पेश करूँ? स्वाति के इन सवालों का जवाब मायावती दें भी तो क्या? राजनीति की माहिर खिलाड़ी ‘बहनजी’ को दयाशंकर सिंह की गृहिणी पत्नी पटखनी दे चुकी थीं। कल तो जो लोग बसपा सुप्रीमो के पक्ष में खड़े नजर आ रहे थे, अब वही दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी के खेमे में दिख रहे थे। अपने प्रति जिस ‘सहानुभूति’ को मायावती वोट में तब्दील करने की जुगत में थीं वो उनसे छिटक कर स्वाति के आँचल से जा लगी थी।

दरअसल, स्वाति सिंह ने पूरे मामले को नारी अस्मिता से जोड़कर मायावती को उन्हीं की चाल से मात दे दी है। स्वाति सिंह पॉक्सो एक्ट के तहत अपने पति दयाशंकर सिंह, मायावती और नसीमुद्दीन सिद्दिकी पर एक जैसी कार्रवाई की मांग कर रही हैं। ऐसा नहीं होने पर उन्होंने धरने पर बैठने की चेतावनी दी है। स्वाति सिंह के इस कदम ने मायावती के सारे गणित को धता बता दिया है। कभी अपने बड़बोले बयानों और राजनीतिक तिकड़मों से विरोधियों के नाक में दम कर देने वाली मायावती आज स्वाति सिंह के इस पत्ते के आगे बेबस नजर आ रही हैं।

हमदर्दी का सैलाब जिस तरह स्वाति सिंह की ओर बह रहा है उसे देख मायावती की बौखलाहट बढ़ना स्वाभाविक है। आनन-फानन में लखनऊ पहुंचकर उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की क्लास लगाई है। मामले में कुछ नेताओं पर बिजली गिरने के भी संकेत मिल रहे हैं और पार्टी अब बचाव के लिए नई रणनीति तैयार कर रही है। इधर, भाजपा भी अब अपने ‘निर्वासित’ नेता के बचाव में खुलकर सामने आ गई है। यूपी भाजपा ने हाईकमान से दयाशंकर सिंह के निष्कासन को रद्द करने की मांग की है।

आने वाले वक्त में इस राजनीतिक उठा-पटक के कई और रंग देखने को मिलने वाले हैं। लेकिन, फिलहाल एक बात तो साफ हो गई है कि घर संभालने वाली साधारण सी महिला स्वाति सिंह ने कई बार यूपी को संभाल चुकीं मायावती को चारो खाने चित कर दिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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जरा सोचिए क्या होता अगर अमिताभ ना होते !

अमिताभ बच्चन के ‘होने’ पर ना जाने कितनी बातें हुई हैं और कितनी होंगी, पर क्या आपने कभी सोचा कि अमिताभ बच्चन ना होते तो क्या होता..? चलिए जरा सोच कर देखते हैं। अमिताभ अगर ना होते तो शायद हिन्दुस्तान संवादों में बात नहीं करता। डायलागबॉजी एक पूर्णत: विकसित कला नहीं होती। चार यार-दोस्तों या अजनबियों के सामने अपनी बात रखते वक्त हमारी आवाज भारी होकर ‘बैरीटोन’ नहीं होती। आलोचनाओं के परे भी जाया जा सकता है, यह सिखाने के लिए कोई नहीं होता। अगर अमिताभ बच्चन नहीं होते तो हमारे पास, हमारी फिल्मों के पास, हमारे देश के पास सचमुच बहुत कुछ नहीं होता।
सबसे पहले तो शायद यह होता कि किसी कवि या लेखक का लड़का हीरो बनने का सपना नहीं देखता। या उससे पहले यह होता कि कोई साधारण नैन-नक्श वाला हद से ज्यादा लंबा और पतला एक नौकरीपेशा नौजवान फिल्मों में हीरो बनने के बारे में सोचकर खुद पर हंसता और फिर इसे भूल जाता। जी हाँ, बच्चन नहीं होते, तो रेडियो में आवाज का रिजेक्ट होना ‘कूल’ नहीं होता। राजेश खन्ना के बाद अगला सुपरस्टार सीधे शाहरुख खान को होना होता। चालीस सालों तक कोई कमर्शियल इंटरटेनमेंट की विधा को रॉकस्टार अंदाज में इतना नहीं साध पाता। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और ‘क्या आप पांचवी पास से तेज हैं’, में कोई अंतर नहीं होता।

हॉलीवुड के रॉबर्ट डि नीरो, अल पचीनो, मार्लन ब्रांडो, क्लिंट ईस्टवुड, शॉन कॉनरी, हैरीसन फोर्ड का जवाब देने के लिए हमारे पास कोई अभिनेता नहीं होता। अमिताभ बच्चन नहीं होते, तो हीरो की बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से हमारी पहली मुलाकात गोविंदा ही कराते और हम कभी भी आईने के सामने खड़े होकर शराबी की तरह नहीं बहक पाते। बच्चन नहीं होते, तो तमाम तरह के आरोप लगाने के बावजूद हर निर्देशक का सपना उनके साथ काम करना नहीं होता। अभिनय ‘मेथड’ है या ‘नेचुरल’, हम इसी फेर में पड़े रह जाते।

बच्चन नहीं होते, तो नाम की तरह लिखे जाने वाले हमारे कुछ गिने-चुने सरनेमों में से एक कम हो जाता। हमारे पिता की पीढ़ी सफेद फ्रैंच कट दाढ़ी को नहीं अपनाती। सफेद शॉल फैशन नहीं बन पाती। तीन-चार पीढ़ियों को मिमिक्री का शौक नहीं लगता और हर शहर में बच्चन के बहरूपिये नहीं होते।

अगर बच्चन नहीं होते, तो हर बदलते वक्त में खुद को बदलने की अद्भुत क्षमता रखने वाले कलाकार से हमारा परिचय कभी नहीं हो पाता। री-इनवेंट कैसे किया जाता है अभिनय में, एक्टिंग क्लासों में नहीं सिखाया जा पाता, क्योंकि संदर्भ देने के लिए बच्चन नहीं होते। ‘मधुशाला’ महान ग्रंथ होता, लेकिन जनमानस में वैसे अंकित नहीं होता, जैसे अब है। एक कवि और उसकी कविताओं को नई टेक नहीं मिलती, नया आयाम नहीं मिलता, अगर उन कविताओं के साथ अमिताभ बच्चन नहीं होते।

अगर बच्चन नहीं होते तो हमें शाहरुख खान का इंतजार करना पड़ता यह समझने के लिए कि हर अभिनेता केवल फिल्मों में नहीं, हर वक्त अभिनय करता है। जहां कहीं भी जीवित मनुष्य पाया जाता है, अभिनेता अपनी ‘भूमिका’ में आ जाता है।

अगर बच्चन नहीं होते, हमें यह भी कम समझ आता कि राजनीति क्यूं हर किसी के बस की नहीं है। गांधी परिवार और बच्चन परिवार के बीच क्या बचा है और कितना टूट गया है, हमें कभी पूरा पता नहीं चलेगा, यह भी समझ नहीं आता। उत्तर प्रदेश में अपराध होते रहते, लेकिन वे विज्ञापन नहीं होते जो मुस्कुराते हुए बच्चन को अपराध कम हैं, कहने को मजबूर करते।

अमिताभ बच्चन ना होते तो ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ अश्लील हो जाता और हमारी होली ‘रंग बरसे’ बिना ही बीत जाती। कुछ लोग इस कदर निराले हो जाते हैं अपने काम से, कि फिर वे भले ही खराब फिल्में करें और दर्जनों घटिया विज्ञापन, हमें फर्क नहीं पड़ता, ये भी हम नहीं सीख पाते, अगर बच्चन नहीं होते।

अगर अमिताभ बच्चन नहीं होते, हमारा सिनेमा अभिनय के उस अनोखे मिजाज से महरूम रह जाता, जो किसी भी देश के सिनेमा की पहचान बनता है। वह घटना हिन्दुस्तान के इतिहास में नहीं होती, जिसमें किसी अभिनेता की सेट पर हुई दुर्घटना के बाद पूरा देश मिलकर उसके लिए प्रार्थना कर रहा था। बच्चन नहीं होते, तो गरिमा से बोली जाने वाली हिंदी अपने अस्तित्व को खोने के डर में जीती और फिल्मों में अंग्रेजी भाषा के रिक्त स्थानों को भरने वाली भाषा बनकर रह जाती।

वे अफवाहें और गॉसिप नहीं होतीं, जिसमें बच्चन होते। अमिताभ बच्चन रिटायर कब होंगे? क्या बच्चन विग पहनते हैं? सलमान खान को वे पसंद करते हैं या नहीं? रेखा से अभी भी बात-मुलाकात होती होगी क्या? बच्चन नहीं होते, तो हम यह भी नहीं सोचते कि सत्तर का हो जाने पर कौन-सा ‘खान’ उनके स्तर को छू पाएगा। कोई भी नहीं, हम यह भी नहीं कह पाते। ‘लिविंग लिजेंड’ जैसे शब्द को तमगा बनकर टंगने के लिए आदमी नहीं मिलता। देश को इकलौता ‘एंग्री यंग मैन’ नहीं मिलता। अमिताभ बच्चन नहीं होते, तो फिल्में थोड़ी कम अपनी लगतीं। हमें यह सब लिखने के लिए उपयुक्त इंसान नहीं मिलता। हम और हमारा देश, जितने हैं उतने, फिल्मी नहीं होते।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 [‘सत्याग्रह में प्रकाशित शुभम उपाध्याय के एक आलेख पर आधारित] 

 

 

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भारतीय क्रिकेट का ‘विराट’ इतिहास रचते कोहली

विराट दिन-ब-दिन और विराट होते जा रहे हैं। कल भारतीय क्रिकेट के इस धूमकेतु ने वेस्टइंडीज की धरती पर 200 रन बनाने के साथ ही कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए। 1932 में भारतीय टीम को टेस्ट का दर्जा मिलने के बाद विदेशी धरती पर किसी भारतीय कप्तान का ये पहला दोहरा शतक है। इस शतक के साथ ही भारत ने 41 साल बाद वेस्टइंडीज के बेमिसाल खिलाड़ी और कप्तान क्लाइव लॉयड के उस दोहरे शतक का जवाब भी दे दिया जो उन्होंने साल 1975 में भारत में लगाया था।

विराट कोहली की ये पारी कई मायनों में खास है। उनकी इस पारी ने विदेश में 19 साल के उस सूखे को समाप्त कर दिया जो 1997 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सचिन तेन्दुलकर द्वारा बनाए गए 169 रनों के बाद से ही चला आ रहा था। सचिन के बाद कोई भी भारतीय कप्तान विदेशी धरती पर 150 के आंकड़े को पार नहीं कर पाया था। विराट कोहली ने अपने इस दोहरे शतक से कप्तान के तौर पर भी अपने दम-खम को साबित किया है। उनसे पहले साल 1990 में मोहम्मद अजहरूद्दीन ने कप्तान के रूप में ऑकलैंड में 192 रनों की शानदार पारी खेली थी।

दोहरे शतक की बात करें तो विराट कोहली से पहले भारतीय टीम के चार कप्तान दोहरा शतक जमा चुके हैं। नवाब पटौदी, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और महेन्द्र सिंह धोनी ने सैंकड़ा तो पार किया था लेकिन उन्होंने ये दोहरे शतक भारतीय धरती पर ही लगाये थे। एक कप्तान के तौर पर विराट कोहली वो पहले क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन्होंने ये कमाल विदेशी धरती पर कर दिखाया है। इसी के साथ विराट कोहली ने पूर्व भारतीय बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग का एक बड़ा रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया। इस पारी के बाद विराट भारत के लिए 12 टेस्ट शतक पूरे करने वाले दूसरे सबसे तेज बल्लेबाज बन गए हैं। वो सहवाग की 77 पारियों में 12 शतकों के रिकॉर्ड को तोड़कर उनसे आगे निकल गए हैं। कोहली ने ये उपलब्धि महज 72 पारियों में अपने नाम कर ली है।

इस शतक के साथ ही विराट कोहली ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 12 हजार रन भी पूरे कर लिए। ऐसा करने वाले वो आठवें भारतीय कप्तान बन गए हैं। विराट का ये 8वां शतक एशिया के बाहर है। वैसे अभी तक एशिया से बाहर सबसे ज्यादा शतक तेंदुलकर ने लगाया है। उन्होंने 18 शतक विदेशी धरती पर जड़े हैं। ये भी बता दें कि विराट कोहली ने कप्तान के रूप में विदेशी सरजमीं पर अब तक 12 पारियों में 76.27 की औसत से 839 रन बनाये हैं। उनसे बेहतर औसत सिर्फ महान बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन का है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मधेपुरा ने कहा महर्षि वेदव्यास के नाम पर हो केन्द्रीय विश्वविद्यालय

समाजवाद की धरती कहे जाने वाले मधेपुरा से गीता के रचयिता महर्षि वेदव्यास के नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग उठी है। अवसर था महर्षि की जयंती का, जिसका आयोजन मंगलवार को स्थानीय वेदव्यास कॉलेज में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विधान मंडल में विरोधी दल के नेता डॉ. प्रेम कुमार ने किया और मुख्य अतिथि थे मधेपुरा स्थित भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति व पूर्व सांसद डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि।

अत्यन्त गरिमापूर्ण कार्यक्रम में बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि देश के अन्दर कुछ ऐसी शक्तियां हैं जो राम की जगह रावण और कृष्ण की जगह कंस को आदर्श बनाना चाहती हैं। यह प्रयास जघन्य और नकारात्मक है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता की मजबूती के लिए हमें पुन: अपने संस्कार और संस्कृति को जगाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि महर्षि वेदव्यास भविष्यद्रष्टा थे और अपनी कृतियों के जरिए उन्होंने भारतीय संस्कृति की जो नींव रखी, वह सदा स्तुत्य रहेगा।

मुख्य अतिथि के रूप में शिक्षा, साहित्य और राजनीति में एक समान पैठ रखने वाले डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि ने कहा कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत एवं गीता की रचना कर जहाँ मानव-जाति का कल्याण किया, वहीं भारतीय धर्म और संस्कृति को वैश्विक पटल पर स्थापित किया। उन्होंने कहा कि गीता कृष्ण की चिन्तना की अभिव्यक्ति है, जिसके माध्यम व्यास हैं। अगर व्यास ना होते तो हमें समाज की जाग्रत चेतना का बोध ना होता और ना ही हम सत्य और असत्य, नीति और अनीति, न्याय और अन्याय, अधिकार और कर्तव्य की सही और सच्ची व्याख्या कर पाते।

इस अवसर पर बोलते हुए पूर्व विधायक किशोर कुमार मुन्ना ने कहा कि महर्षि वेदव्यास के नाम पर शिक्षण-संस्थान की स्थापना किया जाना सराहना योग्य है। पूर्व विधायक संजीव झा ने कहा कि महाभारत और गीता को भूलने का घातक परिणाम सांस्कृतिक अवमूल्यन और देशद्रोह के रूप में देखने को मिल रहा है। बीएनएमयू के पूर्व प्रतिकुलपति डॉ. रामदेव प्रसाद ने कहा कि महर्षि-रचित महाभारत सिर्फ महाकाव्य ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य का अमरकोष है। वेदव्यास कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आलोक कुमार ने कहा कि महर्षि का कृतित्व आज भी प्रासंगिक है। वहीं अतिपिछड़ा आयोग के पूर्व सदस्य सूर्यनारायण कामत ने कहा कि वेदव्यास भारतीय संस्कृति के संस्थापक पुरुषों में थे। इन्हीं विचारों को आगे बढ़ाते हुए संस्थापक सचिव डॉ. रामचन्द्र प्रसाद मंडल ने कहा कि हम पूर्वजों से प्रेरणा लेकर ही वर्तमान और भविष्य का खाका तैयार करते हैं। व्यास और वाल्मीकि हमारे ऐसे ही पूर्वज हैं और ये दोनों भारतीय संस्कृति की जीवनधारा रहे हैं।

महर्षि वेदव्यास के नाम पर केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग इस जयंती समारोह की खास बात रही। नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार ने महर्षि के  नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही उनकी जयंती के दिन राजकीय अवकाश की मांग भी की। मुख्य अतिथि डॉ. रवि ने कहा कि महर्षि वेदव्यास जैसे ‘प्रतीकपुरुष’ हमारी समस्त पीढ़ियों के लिए धरोहर हैं। उनके नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना कर हम उनकी ‘थाती’ को सही स्वरूप में सहेज पाएंगे। मंच पर मौजूद गणमान्य अतिथियों एवं उपस्थित विशाल जनसमूह ने इस विचार का पुरजोर समर्थन किया।

उक्त जयंती समारोह में पूर्व प्रतिकुलपति डॉ. रामदेव प्रसाद और वरिष्ठ चिकिसक डॉ. सीताराम यादव को ‘व्यास शिखर पदक’ एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। जयंती के मौके पर महाविद्यालय परिसर में महर्षि वेदव्यास की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई और शहर में ‘व्यास रथ यात्रा’ भी निकाली गई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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क्या प्रियंका हैं कांग्रेस की ‘संजीवनी’..?

मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी – ये सभी एक परिवार से जरूर हैं पर ‘परिवारवाद’ के तमाम आरोपों व आलोचनाओं के बावजूद सच यही है कि ये सारे नाम मिलकर कांग्रेस का ‘पर्याय’ लगते है। आप भले ही इसे आज की कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी कहें लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसे अब भी सांस, सम्बल और स्वीकार्यता मिलती है तो नेहरू-गांधी परिवार से ही।

बहरहाल, मोतीलाल नेहरू जिस समय अध्यक्ष थे उस समय कांग्रेस अपने मूल स्वरूप में थी और ‘परिवारवाद’ की कम-से-कम आज की तरह नग्न उपस्थिति तब नहीं थी। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते कांग्रेस में ‘संकुचन’ जरूर आने लगा लेकिन नेहरू का व्यक्तित्व इतना विराट था कि कमियां उसमें खो जाती थीं। इन्दिराजी के समय हालांकि कांग्रेस में ‘ई’ को चस्पां किया गया और असमय मृत्यु से पहले संजय गांधी ने इसे अपने तरीके से चलाना चाहा। फिर भी इन्दिराजी जो थीं अपने बूते थीं और अपने पिता के नाम और काम में उन्होंने कुछ जोड़ा ही, घटाया नहीं। उनके होने में ‘परिवार’ था लेकिन एक ‘विशेषण’ की तरह। हाँ, उनके बाद राजीव गांधी आए, फिर सोनिया गांधी आईं और अब अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी आने वाले हैं, तो मूल में (इन सबकी तमाम ‘योग्यताओं’ के बावजूद) परिवार ही था। बावजूद इसके समय-समय पर कांग्रेस को ‘संजीवनी’ इन्हीं से मिली है।

अब बात कांग्रेस के वर्तमान परिदृश्य की। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा की उठान से कांग्रेस अपनी ढलान पर तेजी से चल पड़ी है। तमाम तैयारी और तत्परता के बावजूद उपाध्यक्ष राहुल गांधी में वो परिपक्वता नहीं दिखती जो कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने के लिए अपेक्षित है। यही कारण है कि  कांग्रेस का एक बड़ा तबका, जो राहुल की सम्भावनाओं के साथ-साथ सीमाओं को भी जानता है, प्रियंका गांधी को सक्रिय भूमिका में लाने की वकालत कर रहा है। हालांकि ये तयप्राय है कि कांग्रेस के अगले अध्यक्ष राहुल ही होंगे, लेकिन इस तबके की सोच यह है कि राहुल के साथ प्रियंका के आ जाने से कांग्रेस को उसका खोया ‘एक्स’ फैक्टर मिल जाएगा।

हालांकि प्रियंका के लिए उठ रही मांग के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है कि पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए किसी एक व्यक्ति के पास जादुई छड़ी नहीं है। इसके लिए सम्मिलित प्रयास ही एकमात्र रास्ता है। सैद्धांतिक तौर पर जयराम रमेश गलत नहीं बोल रहे हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर सच्चाई क्या है, ये वो भी जानते हैं।

चलते-चलते बता दें कि यूपी के आगामी चुनाव के लिए कांग्रेस ने भले ही शीला दीक्षित पर दांव खेला है लेकिन वो चुनावी बिसात अपनी दादी की याद दिलाती प्रियंका के इर्द-गिर्द ही बिछाएगी, राजनीति के जानकार ये मानकर चल रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

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पदयात्रा पर जाते शिक्षा मंत्री से चंद सवाल

बिहार के शिक्षा मंत्री डॉ. अशोक चौधरी 17 जुलाई से राज्य भर की पदयात्रा करेंगे। उद्देश्य है लोगों में शिक्षा की भूख जगाना, आजादी के इतने वर्षों बाद भी ‘अक्षर’ की ताकत से अनजान परिवारों को जागरुक बनाना, सरकारी विद्यालयों की ‘गुणवत्ता’ और ‘अनियमितता’ की पड़ताल करना और शिक्षण संस्थाओं पर ‘सामाजिक अंकुश’ लगाना। यह विशुद्ध रूप से शिक्षा जागरुकता पदयात्रा होगी जिसमें महागठबंधन के तीनों दलों के संबंधित जिलाध्यक्ष, स्थानीय विधायक, जन प्रतिनिधि व शिक्षा महकमे के डीईओ, डीपीओ, बीईओ समेत अन्य पदाधिकारी भी शामिल होंगे।

बता दें कि पहले चरण में शिक्षा मंत्री सीमांचल और कोसी अंचल के पाँच जिलों कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, सहरसा और सुपौल की पदयात्रा करेंगे। पदयात्रा में मंत्री लोगों से पूछेंगे कि आपके इलाके में कहीं शिक्षा का फर्जी कारोबार चल रहा है तो जानकारी दीजिए, उस पर कार्रवाई की जाएगी। यह जानने की कोशिश भी की जाएगी कि जिस कॉलेज की क्षमता 500 विद्यार्थियों की है, वहाँ 2000 बच्चे कैसे  एडमिशन करा लेते हैं? और ये भी कि किसी विद्यालय में पाँच शिक्षक हैं और तीन ही क्यों आ रहे हैं?

हमारे शिक्षा मंत्री अपनी इस यात्रा में जानना चाहते हैं कि बच्चों के मिड डे मील की चोरी क्यों और कैसे हो रही है? वो बड़ी शिद्दत से जानना चाहते हैं कि पोशाक, साइकिल, किताब, मिड डे मील समेत तमाम प्रोत्साहन योजनाओं के बावजूद शिक्षा की रोशनी हर घर तक क्यों नहीं पहुँच पा रही है? और उतनी ही शिद्दत से इस यात्रा में वो सरकार के मुखिया नीतीश कुमार के शराबबंदी अभियान की बातें भी करना चाहते हैं।

ये तमाम बातें सुनकर शिक्षा मंत्री जी के प्रति आभार जताना लाजिमी है। हम आभार जताते भी हैं लेकिन कुछ सवाल भीतर कुलबुला रहे हैं जो उनसे पूछे बिना मन नहीं मान रहा। उनसे पहला सवाल ये कि क्या शिक्षा मंत्री समेत पूरी सरकार के ‘ज्ञान-चक्षु’ लालकेश्वर प्रसाद और बच्चा राय ने ही खोले हैं? क्या इन दो ‘महापुरुषों’ से पहले सब के सब ‘सावन के अंधे’ थे? दूसरा सवाल, क्या उन तक ‘बिहार की राजधानी दिल्ली’ कहने वाले और अपनी कक्षा ठेके पर देने वाले शिक्षकों की ‘महागाथा’ भी अब तक नहीं पहुँची है? तीसरा सवाल, सरकार की नाक के ठीक नीचे स्कूल और कॉलेज के नाम पर परीक्षा दिलाने और पास कराने की हजारों ‘फैक्ट्रियां’ दशकों से चल रही हैं और ‘पदयात्रा’ की जरूरत आज महसूस हुई है? क्या अब से पहले सरकार गांधीजी के तीन बंदरों का अनुसरण किए बैठी थी?

शिक्षा मंत्रीजी, सच तो यह है कि जो जानने के लिए आप पदयात्रा करने जा रहे हैं वो आप और आपकी सरकार के मुखिया पहले से जान रहे हैं। वो तो भला हो लालकेश्वर प्रसाद और बच्चा राय के ‘कुकृत्य’ का कि आप ‘लोकलाज’ से अपना आसन छोड़ लोगों के बीच जा रहे हैं। खैर, बहुत देर से सही, हम मान लेते हैं कि आपको अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो गया। लेकिन शिक्षा मंत्रीजी, आप समाज को उसकी जिम्मेदारी का अहसास दिलाने की बात नाहक ही कर रहे हैं, क्योंकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि इस समाज की चमड़ी में थोड़ी भी ‘सिहरन’ बची होती तो यहाँ शिक्षा या राजनीति के ‘सौदागर’ पैदा ही नहीं होते।

वैसे शिक्षामंत्रीजी, आपकी पदयात्रा की ये सोच बड़ी अच्छी है। ये तब और ज्यादा अच्छी लगती जब आपके साथ ‘विकास-पुरुष’ भी होते। लेकिन क्या ‘दिल्ली’ पर नज़र टिकाए आपकी सरकार के मुखिया ‘शराबबंदी’ से थोड़ा वक्त निकालकर आपके साथ इस पदयात्रा में चार कदम चलने की जहमत नहीं उठाएंगे?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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दूसरी नहीं, पहली महिला प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं टेरीज़ा मे

आम मध्यवर्गीय परिवार से आने वाली टेरीज़ा मे, जो पहले टेरीजा ब्रेजियर थीं, जिनकी पढ़ाई सरकारी प्राथमिक स्कूल से शुरू हुई थी, जो गांव में रहती थीं, मूक नाटकों में हिस्सा लेती थीं और जेबखर्च के लिए शनिवार को बेकरी में काम करती थीं, की दिनचर्या भले ही छोटे-छोटे कामों से पूरी होती हो लेकिन उनके सपने हमेशा बड़े रहे। उनके दोस्त बताते हैं कि शुरुआत से ही वो काफी फैशनेबल थीं और कम उम्र में ही ब्रिटेन की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा करती थीं। आज, मारग्रेट थैचर के बाद ही सही, उस ‘महत्वाकांक्षी’ लड़की ने अपना सपना पूरा कर ही लिया।

महारानी एलिजाबेथ ने टेरीज़ा मे को मुश्किल दौर से गुजर रहे ब्रिटेन की प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। 59 साल की टेरीज़ा मे मारग्रेट थैचर के बाद ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनने वाली दूसरी महिला हैं। टेरीज़ा डेविड कैमरन सरकार में गृहमंत्री थीं। गौरतलब है कि यूरोपीय संघ के मुद्दे पर हुए जनमत संग्रह के बाद डेविड कैमरन को इस्तीफा देना पड़ा था। कैमरन ने पिछले साल हुए चुनावों में कंजरवेटिव पार्टी को चुनावी जीत दिलाई थी। लेकिन उम्मीद के विपरीत ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ का सदस्य बने रहने के सवाल पर हुए जनमत संग्रह में उनका साथ नहीं दिया था।

बहरहाल, अपने स्टाइल स्टेटमेंट और स्पष्ट नीतियों के कारण अलग पहचान रखने वाली टेरीज़ा 1997 से लगातार ब्रिटिश संसद की सदस्य हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाली टेरीज़ा के पिता चर्च में पादरी थे। जब टेरीज़ा 25 साल की थीं, उनके पिता की कार दुर्घटना में मौत हो गई।

टेरीज़ा के पॉलिटिकल करियर में सबसे अहम मोड़ 2009 में आया जब वो गृह मंत्री बनीं। ब्रिटेन का गृह मंत्रालय कई राजनेताओं के लिए ‘कब्रगाह’ रहा है लेकिन दृढ़ संकल्प की धनी टेरीज़ा ने इस धारणा को गलत साबित किया। उनकी नीतियां जितनी साफ रही हैं उनके पालन के लिए वो उतनी ही सख्त हैं, बहुत हद तक मारग्रेट थैचर की तरह। ब्रिटिश राजनीति के जानकार उन्हें एक ‘कठिन’ महिला मानते हैं।

ब्रेक्जिट की बात करें तो टेरीज़ा इस पर हुए फैसले के साथ हैं और इस मुद्दे पर दूसरा जनमत संग्रह नहीं कराना चाहतीं। हालांकि उन्होंने ये जरूर कहा है कि यूरोपीय संघ को छोड़ने के मसले पर आधिकारिक फैसला 2016 के समाप्त होने से पहले संभव नहीं होगा।

ये देखना दिलचस्प होगा कि टेरीज़ा मे का भारत के प्रति क्या रुख रहता है। उनके पूर्ववर्ती कैमरन भारत के साथ बेहतर संबंधों के हिमायती थे। उम्मीद की जा रही है कि टेरीज़ा उसी रास्ते को अपनाएंगी। हालांकि ये टेरीज़ा ही थीं जिन्होंने अप्रैल 2012 में पोस्ट स्टडी वर्क वीजा समाप्त कर दिया था, जिसका भारतीय छात्रों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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केजरीवाल के बहाने ‘ठुल्ला’ की पड़ताल

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से ‘ठुल्ला’ शब्द का अर्थ समझाने को कहा। बता दें कि केजरीवाल ने एक टेलीविजन चैनल पर चर्चा के दौरान दिल्ली पुलिस के लिए ठुल्ला शब्द का इस्तेमाल किया था। पुलिसकर्मी अजय कुमार तनेजा को ये संबोधन नागवार गुजरा और उन्होंने ‘आप’ नेता पर मानहानि का आपराधिक मुकदमा दायर कर दिया, जिस पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत ने केजरीवाल के लिए सम्मन जारी किया था।

सम्मन जारी करते हुए अदालत ने कहा था कि केजरीवाल का बयान प्रथमदृष्टया मानहानि का है और उन्हें 14 जुलाई को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था। केजरीवाल ने इसी संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। आज इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए मुक्ता गुप्ता ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेशी से छूट तो दे दी लेकिन साथ में यह भी कहा कि केजरीवाल को ‘ठुल्ला’ शब्द का अर्थ समझाना चाहिए, क्योंकि हिन्दी शब्दकोष में इस शब्द का उल्लेख नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि “यदि आप (केजरीवाल) किसी के लिए यह शब्द (ठुल्ला) इस्तेमाल करते हैं तो आपको इसका मतलब पता होना चाहिए। आपको न्यायालय को इस शब्द का अर्थ समझाना चाहिए।” इस मामले पर अगली सुनवाई अब 21 अगस्त को होगी।

केजरीवाल की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील एन. हरिहरण ने कहा कि ‘ठुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल सभी पुलिसकर्मियों के लिए नहीं, बल्कि गलत काम करने वाले पुलिसकर्मियों के लिए किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि इस शब्द का कोई मतलब नहीं है, इसलिए यह मानहानि से संबंधित नहीं है। लेकिन केजरीवाल के काबिल वकील ने यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि जब इस शब्द का कोई मतलब ही नहीं है तो फिर इस ‘निरर्थक’ शब्द का संबंध गलत काम करने वाले पुलिसकर्मियों से जोड़ने का क्या मतलब है?

बहरहाल, जब ‘ठुल्ला’ शब्द पर बहस दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुँच गई है तो क्यों ना इस शब्द की थोड़ी पड़ताल कर ली जाय। दरअसल ‘ठुल्ला’ एक तरह की कठबोली या स्लैंग (Slang) है। कठबोली किसी भाषा या बोली के उन अनौपचारिक शब्दों या वाक्यांशों को कहते हैं जो बोलने की भाषा या बोली में मानक तो नहीं माने जाते लेकिन बोलचाल में स्वीकार्य होते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली में पुलिसवालों को कठबोली में ‘ठुल्ला’ बोलते हैं और मुंबई में ‘मामा’। सिगरेट को ‘सुट्टा’ कहना, गाड़ी के मिस्त्री का गीयर के दाँत वाले पहियों को ‘गरारी’ कहना, बिना काम वाले को ‘निठल्ला’ कहना या फिर किसी के मरने पर कहना कि ‘टपक गया’ – कठबोली के ही उदाहरण हैं।

समाज या संगठन में ऊँचा दर्जा रखने वाले लोग खुली बातचीत में कठबोली का प्रयोग करने से कतराते हैं क्योंकि ये आमतौर पर संभ्रांत नहीं होती। लेकिन केजरीवाल तो केजरीवाल ठहरे। मुख्यमंत्री होकर जब वो धरने पर बैठ सकते हैं और पुलिसवालों को ‘ठुल्ला’ भी कह ही सकते हैं।

चलते-चलते:

इस क्रम में ये जानना दिलचस्प होगा कि पंजाब-हरियाणा के कुछ समुदायों में थानेदार या दारोगा के लिए ‘ठुल्ला’ शब्द का प्रयोग चार दशक पहले भी प्रचलित पाया गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अंतरिक्ष की नई महाशक्ति भारत

22 जून 2016 को सुबह करीब 9.15 बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी-सी 34) को सत्रह विदेशी उपग्रहों समेत कुल 20 सेटेलाइट के साथ अंतरिक्ष में भेजा। पीएसएलवी-सी 34 ने 26 मिनट 30 सेकेंड में सभी सेटेलाइट सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिए। प्रक्षेपित उपग्रहों में कॉर्टोसैट-2 सीरीज का पृथ्वी संबंधी सूचनाएं एकत्र करने वाला भारत का नया उपग्रह भी शामिल है। इसके अलावा दो उपग्रह भारतीय विश्वविद्यालयों के हैं। इनमें एक चेन्नई स्थित निजी विश्वविद्यालय का उपग्रह ‘सत्यभामा’ और दूसरा पुणे स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज का उपग्रह ‘स्वयम्’ है। शेष सत्रह उपग्रह अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और इंडोनेशिया के हैं। ये सारे विदेशी उपग्रह व्यावसायिक हैं और इनसे इसरो को कमाई होगी।

इसरो ने इससे पहले वर्ष 2008 में 10 उपग्रहों को पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में एक साथ प्रक्षेपित किया था। इस बार 20 उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित करके वो ऐसा करने वाले तीन देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है। इससे पहले ऐसा केवल अमेरिका और रूस ही कर पाए हैं।

बहरहाल, एक साथ 20 उपग्रह प्रक्षेपित करने और हाल में ही स्वदेशी स्पेस शटल के प्रक्षेपण के बाद दुनिया भर में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की धूम मची है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को प्रक्षेपित करने से मना कर दिया था। आज स्थिति यह है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक हैं। बता दें कि अमेरिका 20वां देश है जो कॉमर्शियल लॉन्च के लिए इसरो से जुड़ा है।

आज की तारीख में पूरी दुनिया में उपग्रहों के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं, इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्द्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं हैं क्योंकि कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की ताकत है। बता दें कि भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत ऐसे ही विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत की एक तिहाई भर है। बेहद कम लागत की वजह से अधिकांश देश स्वाभाविक तौर पर अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण करने के लिए भारत का रुख करेंगे। ऐसे परिदृश्य में अंतरिक्ष के क्षेत्र में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा।

वैसे भी मंगलयान और चंद्रयान -1 की बड़ी सफलता के साथ-साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का शतक लगाने के बाद इसरो का लोहा पूरी दुनिया मान ही चुकी है। चंद्रयान-1 को ही चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी मिला। भविष्य में इसरो उन सभी ताकतों को और भी टक्कर देने जा रहा है, जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रही हैं। भारत के पास साधन भले ही कम हों लेकिन प्रतिभाओं की बहुलता है। भारत द्वारा प्रक्षेपित उपग्रहों से मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर हम अब संचार, मौसम संबंधित जानकारी, शिक्षा, चिकित्सा में टेली मेडिसिन, आपदा प्रबंधन एवं कृषि के क्षेत्र में फसल अनुमान, भूमिगत जल के स्रोतों की खोज, संभावित मत्स्य क्षेत्र की खोज के साथ पर्यावरण पर भी नजर रख रहे हैं। भारत यदि इसी प्रकार अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

 

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