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क्या प्रियंका हैं कांग्रेस की ‘संजीवनी’..?

मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी – ये सभी एक परिवार से जरूर हैं पर ‘परिवारवाद’ के तमाम आरोपों व आलोचनाओं के बावजूद सच यही है कि ये सारे नाम मिलकर कांग्रेस का ‘पर्याय’ लगते है। आप भले ही इसे आज की कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी कहें लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसे अब भी सांस, सम्बल और स्वीकार्यता मिलती है तो नेहरू-गांधी परिवार से ही।

बहरहाल, मोतीलाल नेहरू जिस समय अध्यक्ष थे उस समय कांग्रेस अपने मूल स्वरूप में थी और ‘परिवारवाद’ की कम-से-कम आज की तरह नग्न उपस्थिति तब नहीं थी। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते कांग्रेस में ‘संकुचन’ जरूर आने लगा लेकिन नेहरू का व्यक्तित्व इतना विराट था कि कमियां उसमें खो जाती थीं। इन्दिराजी के समय हालांकि कांग्रेस में ‘ई’ को चस्पां किया गया और असमय मृत्यु से पहले संजय गांधी ने इसे अपने तरीके से चलाना चाहा। फिर भी इन्दिराजी जो थीं अपने बूते थीं और अपने पिता के नाम और काम में उन्होंने कुछ जोड़ा ही, घटाया नहीं। उनके होने में ‘परिवार’ था लेकिन एक ‘विशेषण’ की तरह। हाँ, उनके बाद राजीव गांधी आए, फिर सोनिया गांधी आईं और अब अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी आने वाले हैं, तो मूल में (इन सबकी तमाम ‘योग्यताओं’ के बावजूद) परिवार ही था। बावजूद इसके समय-समय पर कांग्रेस को ‘संजीवनी’ इन्हीं से मिली है।

अब बात कांग्रेस के वर्तमान परिदृश्य की। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा की उठान से कांग्रेस अपनी ढलान पर तेजी से चल पड़ी है। तमाम तैयारी और तत्परता के बावजूद उपाध्यक्ष राहुल गांधी में वो परिपक्वता नहीं दिखती जो कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने के लिए अपेक्षित है। यही कारण है कि  कांग्रेस का एक बड़ा तबका, जो राहुल की सम्भावनाओं के साथ-साथ सीमाओं को भी जानता है, प्रियंका गांधी को सक्रिय भूमिका में लाने की वकालत कर रहा है। हालांकि ये तयप्राय है कि कांग्रेस के अगले अध्यक्ष राहुल ही होंगे, लेकिन इस तबके की सोच यह है कि राहुल के साथ प्रियंका के आ जाने से कांग्रेस को उसका खोया ‘एक्स’ फैक्टर मिल जाएगा।

हालांकि प्रियंका के लिए उठ रही मांग के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है कि पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए किसी एक व्यक्ति के पास जादुई छड़ी नहीं है। इसके लिए सम्मिलित प्रयास ही एकमात्र रास्ता है। सैद्धांतिक तौर पर जयराम रमेश गलत नहीं बोल रहे हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर सच्चाई क्या है, ये वो भी जानते हैं।

चलते-चलते बता दें कि यूपी के आगामी चुनाव के लिए कांग्रेस ने भले ही शीला दीक्षित पर दांव खेला है लेकिन वो चुनावी बिसात अपनी दादी की याद दिलाती प्रियंका के इर्द-गिर्द ही बिछाएगी, राजनीति के जानकार ये मानकर चल रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

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