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अपने ‘निश्चय’ से मधेपुरा की ‘चेतना’ छू गए मुख्यमंत्री

निश्चय यात्रा के क्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कल मधेपुरा पहुँचे। उन्होंने यहाँ कई योजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया, अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की और स्थानीय बीएन मंडल स्टेडियम में ‘चेतना सभा’ को संबोधित किया। मधेपुरावासियों से अपने ‘विज़न’ को साझा करते हुए उन्होंने एक बार फिर विश्वास दिलाया कि उनके साहसिक और करिश्माई नेतृत्व में मधेपुरा समेत बिहार के सभी जिले विकास के पथ पर अबाध चलते रहेंगे।

गौरतलब है कि शुक्रवार से पूरे राज्य में युवा कौशल विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई। मधेपुरा में इसका शुभारंभ स्वयं मुख्यमंत्री ने किया। मधेपुरा बायपास रोड स्थित समिधा ग्रुप कम्प्यूटर संस्थान पहुंचकर उन्होंने कौशल विकास केन्द्र तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इसके उपरान्त बीएन मंडल स्टेडियम में आयोजित चेतना सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं के कौशल से बिहार का विकास होगा। युवाओं को प्रतिभा निखारने के लिए कम्प्यूटर की समुचित जानकारी दी जाएगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि अभी मात्र 13 प्रतिशत छात्र ही उच्च शिक्षा ले पाते हैं। इसमें बढ़ोतरी के लिए सरकार प्रयासरत है। छात्रों को चार लाख रुपये का क्रेडिट कार्ड दिया जा रहा है। युवाओं को रोजगार खोजने के लिए प्रतिमाह एक हजार रुपये भी दिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के सभी कॉलेजों में वाई-फाई की सुविधा मिलेगी। हर जिले में इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्निक, आईटीआई व पारा मेडिकल कॉलेज तथा जीएनम व एएनएम स्कूल खोले जाएंगे।

सात निश्चय योजना की बाबत मुख्यमंत्री ने कहा कि इसकी सफलता से बिहार की 75 प्रतिशत समस्याएं खत्म हो जाएंगी। आने वाले चार वर्षों में हर घर में शौचालय होगा। हर घर नल का जल होगा। हर गांव की गली पक्की होगी और नालियों का निर्माण होगा। साथ ही हर घर में बिजली का कनेक्शन होगा। इसके लिए सर्वे अंतिम चरण में है और लोगों की सूची बनाई जा रही है।

शराबबंदी को मजबूत निर्णय बताते हुए नीतीश कुमार ने लोगों से समर्थन मांगा। उन्होंने कहा कि शराबबंदी से समाज का वातावरण बदल गया है। उन्होंने बड़े विश्वास के साथ कहा कि यदि पूरे देश में शराब बंद कर दी जाए तो भारत विकास में चीन को भी पीछे छोड़ देगा। आगे उन्होंने कहा कि 21 जनवरी को शराबबंदी के दूसरे चरण की शुरुआत विशाल मानव-श्रृंखला के साथ की जाएगी जिससे बिहार का संदेश पूरे विश्व में जाएगा।

अपनी यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने मधेपुरा में निर्माणाधीन मेडिकल कॉलेज का निरीक्षण किया तथा सुखासन गांव में सात निश्चय के तहत हो रहे विकास कार्यों का जायजा लिया। सुखासन जाने के क्रम में वे मधेपुरा के पूर्व सांसद स्वर्गीय आरपी यादव के तुनियाही स्थित समाधि स्थल भी गए। शाम में उन्होंने स्थानीय झल्लू बाबू सभागार में अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की।

शुक्रवार के अतिव्यस्त कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री ने मधेपुरा में ही रात्रि विश्राम किया और आज सुबह 9 बजे देवाधिदेव महादेव के दर्शन हेतु सुप्रसिद्ध सिंहेश्वर स्थान गए। विगत कुछ वर्षों से आयोजित हो रहे और इस इलाके के आकर्षण का केन्द्र बन चुके ‘सिंहेश्वर महोत्सव’ का श्रेय उन्हें ही जाता है।

मुख्यमंत्री की यात्रा के दौरान उनके साथ जिले के प्रभारी सह ऊर्जा मंत्री विजेन्द्र यादव, आपदा प्रबंधन मंत्री प्रो. चन्द्रशेखर, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री अब्दुल गफूर, विधान परिषद के उपसभापति हारून रसीद, विकास आयुक्त शिशिर सिन्हा, डीजीपी पीके ठाकुर, डीएम मो. सोहैल आदि मौजूद रहे। अपने ‘निश्चय’ से मधेपुरा की ‘चेतना’ को छूकर मुख्यमंत्री निश्चय यात्रा के अगले पड़ाव सहरसा के लिए रवाना हो गए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जेडीयू ने कहा रघुवंश को कंट्रोल में रखें लालू

जेडीयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए अपने तल्ख तेवर और बयानों से चर्चा में रहने वाले आरजेडी के वरिष्ठ नेता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह को जेडीयू ने बड़े सख्त लहजे में कहा कि वे ‘महागठबंधन धर्म’ से बाहर निकल रहे हैं और साथ में ये भी कि अगर पार्टी सुप्रीमो लालू ने अपने इस नेता को ‘कंट्रोल’ नहीं किया तो ‘कार्रवाई’ की बात भी सोची जा सकती है।
गौरतलब है कि रघुवंश ने बुधवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर बयान दिया था कि इन दिनों नीतीश की नजदीकी भाजपा से बढ़ रही है और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पहले भी नीतीश भाजपा के साथ थे। ये बयान देकर रघुवंश ने जो ‘आग’ लगाई उसमें भाजपा नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने ये कहकर और ‘घी’ डाल दिया कि जो व्यक्ति 17 साल तक साथ रहने के बाद भाजपा को धोखा दे सकता है, वो किसी को भी दे सकता है। रघुवंश प्रसाद को लगता होगा कि जो भाजपा का नहीं हुआ वो लालू के साथ कब तक रहेगा?
इन बयानों के बाद तिलमिलाए जेडीयू के प्रवक्ता संजय सिंह ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा कि रघुवंश प्रसाद सिंह अपना दिमागी संतुलन खो चुके हैं और आजकल वे ‘पॉलिटिकल कोमा’ में हैं। आगे उन्होंने लालू से रघुवंश पर लगाम लगाने की अपील करते हुए कहा कि लालूजी हमारे महागठबंधन के वरिष्ठ नेता हैं और मैं उनसे अपील करता हूँ कि वो अपने नेता पर लगाम लगाएं।
पर रघुवंश तो रघुवंश ठहरे। वे कहाँ चुप रहने वाले थे। उन्होंने उल्टा जेडीयू से सवाल किया कि मुझे ‘महागठबंधन धर्म’ वाले लोग बताएं कि नोटबंदी पर अलग स्टैंड लेना कौन-सा गठबंधन धर्म है। इतना ही नहीं, उन्होंने एक बार फिर नीतीश पर आरोप लगाते हुए कहा कि नीतीश कुमार जानबूझकर मुझे गाली दिलवा रहे हैं।
बहरहाल, जेडीयू-आरजेडी के बीच आए दिन नोक-झोंक होती ही रहती है और ज्यादातर अवसरों पर कारण रघुवंश बाबू ही होते हैं। पार्टी ने उन्हें कई बार चेतावनी भी दी है लेकिन उनके बयानों की तल्खी घटने की जगह बढ़ती ही जा रही है। उन जैसे वरिष्ठ, अनुभवी व कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे नेता ऐसा ‘अगंभीर’ बर्ताव करेंगे यह बात पचती नहीं। ऐसे में एक सवाल यह उठ खड़ा होता है कि कहीं यह सब ‘प्रायोजित’ और ‘सोची-समझी रणनीति’ के तहत तो नहीं हो रहा? खैर, ये राजनीति है और राजनीति में ‘रघुवंश की रीत’ सदा से चली आई है। इन दांव-पेंचों में ज्यादा न ही उलझें तो बेहतर है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश की शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अहम फैसले के तहत सभी हाइवे पर शराब की बिक्री पर रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की बेंच द्वारा दिए गए इस फैसले में कहा गया है कि सभी राज्यों में नेशनल हाइवे पर या उसके आसपास पड़ने वाली शराब की दुकानों के लाइसेंस खत्म कर दिए जाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से बिहार के सत्तारूढ़ महागठबंधन में खुशी की लहर है। खास तौर पर जेडीयू के नेताओं का उत्साह देखते ही बनता है। पार्टी इसे अपने मुखिया नीतीश कुमार की शराबबंदी मुहिम पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर मान रही है।

बहरहाल, बता दें कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी नेशनल हाइवे और स्टेट हाइवे पर शराब की दुकानें पूरी तरह से बंद करवाने के लिए अगले साल एक अप्रैल तक की समयसीमा तय की गई है। इन शराब की दुकानों का एक अप्रैल के बाद रिन्युअल नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद जेडीयू में जैसे नई जान आ गई है। पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने कोर्ट के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि पार्टी ने शराबबंदी का फैसला किया और तमाम आलोचनाओं के बावजूद आज भी अडिग है। कोर्ट ने भी माना है कि शराबबंदी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की मुहिम रंग ला रही है और हम इस फैसले से बहुत ही खुश हैं। हमारे फैसले को संवैधानिक स्वीकृति मिली है।

उत्साह से लबरेज जेडीयू नेता व प्रवक्ता संजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर कहा कि बिहार सरकार की नीतियों पर अब पूरे देश को चलना होगा। अब केन्द्र की सरकार को भी शराबबंदी पूरे देश में लागू करने के लिए सोचना होगा। आरजेडी नेता और बिहार सरकार के मंत्री आलोक मेहता ने भी फैसले की तारीफ की और कहा कि लोग शराब पीकर हाइवे पर गाड़ी चलाते थे और दुर्घटना के शिकार होते थे। शराब हाइवे पर होने वाली दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी वजह थी। आज कोर्ट ने दुर्घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए अच्छा फैसला दिया है। अब बिहार सरकार की शराबबंदी की मुहिम आन्दोलन का रूप लेगी।

आगे जो भी हो, कोर्ट के इस फैसले के बाद नीतीश के हौसले में अनगिनत पर लग गए होंगे, इसमें कोई दो राय नहीं। अब अपनी भावी योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए वो दोगुनी ताकत से लगेंगे। कहने की जरूरत नहीं कि इसके बाद राज्य और देश में कई समीकरण बनेंगे और कई बिगड़ेंगे, जिन पर राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र होगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिग बी ने बताई सोशल मीडिया पर आने की ‘शर्त’

“अगर आप लोगों का गुस्सा, गालियां और तंज झेलने के लिए तैयार नहीं हैं तो आपको सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नहीं आना चाहिए।” यह कहना है बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का। बकौल अमिताभ आलोचना से अपना मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है, इसीलिए वे आलोचना को सकारात्मक तरीके से लेते हैं।
गौरतलब है कि बिग बी सोशल मीडिया के जरिए अपने फैंस से लगातार सम्पर्क बनाए रखते हैं। फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग के माध्यम से अपने प्रशंसकों को लगातार अपडेट करते रहते हैं। सोशल मीडिया को लेकर उम्र के 75वें पड़ाव पर वे जितने उत्सुक, उत्साहित, सजग और सक्रिय हैं उतना आज की पीढ़ी के कलाकार भी नहीं। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान वे और करन जौहर प्रशंसकों और मीडिया से बातचीत कर रहे थे। उस दौरान बॉलीवुड के शहंशाह ने मीडिया, सोशल मीडिया और फिल्मों में अपनी भूमिका को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि अगर आप लोगों का गुस्सा झेलने और ‘ट्रॉल’ किए जाने के लिए तैयार नहीं हैं तो आपको सोशल मीडिया पर नहीं आना चाहिए।
फिल्म को हिट बनाने के फॉर्मूले पर अमिताभ बच्चन का कहना है कि इतने साल काम करने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया हूँ कि कौन-सी फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी और कौन-सी नहीं। इसलिए मैं सिर्फ अपने काम को बेहतर करने का प्रयास करता हूँ। जरूरी होता है तो लेखक-निर्देशक से सलाह-मशविरा कर लेता हूँ।
अपने भीतर झाँकते रहना और जरूरी परिवर्तन करना यानि समय के साथ चलना, थोड़ा उसमें ढलना और थोड़ा उसे अपने अनुसार ढाल लेना – अमिताभ बच्चन या उन जैसी किसी भी सफल शख्सियत की सफलता की ये सबसे बड़ी कुंजी रही है। अमिताभ अपने जीवन में आने-वाले तमाम उतार-चढ़ाव के बीच इस एक कुंजी को थामे रहे हैं, इसीलिए आज वे अपने जैसे अकेले हैं, सदी के सैकड़ों नायकों के बीच अकेले महानायक हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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‘द नेशन हैज लॉस्ट एन आइकन’

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और वहाँ की सबसे लोकप्रिय नेता जे जयललिता का सोमवार रात 11.30 बजे निधन हो गया। रविवार को उनकी हृदयगति रुक जाने के बाद से विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक बड़ी टीम उनके इलाज में जुटी हुई थी, लेकिन हर संभव कोशिश और लाखों लोगों की दुआओं के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। बता दें कि जयललिता बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत के बाद 22 सितंबर से ही चेन्नई स्थित अपोलो अस्पताल में भर्ती थीं।
तमिलनाडु की राजनीति में ‘अम्मा’ के नाम से मशहूर जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को एक रूढ़िवादी तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता को शुरुआती लोकप्रियता एक नेता के तौर पर नहीं बल्कि अभिनेत्री के तौर पर मिली थी। दक्षिण भारतीय सिनेमा की अत्यन्त सफल अभिनेत्रियों में शुमार जयललिता का राजनीतिक करियर 1982 में शुरू हुआ। सिनेमा से लेकर राजनीति तक में लोकप्रियता का नया मापदंड रचने वाले और एआईएडीएमके के संस्थापक एमजी रामचंद्रन इस खूबसूरत अभिनेत्री को राज्य की राजनीति में लेकर आए थे।
1987 में एमजीआर की मृत्यु ने तमिलनाडु की राजनीति के साथ-साथ एआईएडीएमके की राजनीति में भी भूचाल ला दिया। पार्टी जयललिता और एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के बीच दो हिस्सों में टूट गई। वर्चस्व की लंबी लड़ाई और एआईएडीएमके में कई उतार-चढ़ाव के बाद जयललिता एमजीआर की राजनीतिक वारिस और तमिलनाडु की कद्दावर नेता बनकर उभरीं और 1991 में पहली बार कांग्रेस की मदद से राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2016 के विधानसभा चुनाव में सारे अनुमानों को धता बताते हुए उन्होंने तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन की परिपाटी को भी ध्वस्त कर दिया। इस जीत के बाद वो छठी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं।
जयललिता के निधन के बाद हमारे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गलत नहीं कहा कि ‘नेशन हैज लॉस्ट एन आइकन’। सच तो यह है कि जयललिता एक नहीं, कई लिहाज से आइकन थीं। पहले तो बहुत छोटी उम्र में वो सिनेमा की आइकन बनीं। वो भी ऐसी कि दक्षिण के सिनेमा का सबसे बड़ा नाम एमजीआर भी उनके बिना अधूरा है। एमजीआर ने एक नहीं, दो नहीं, पूरी अट्ठाइस फिल्में जयललिता के साथ कीं। और जब वही जयललिता राजनीति में आईं तब तमाम अवरोधों और विरोधों के बावजूद वो राजनीति की आइकन बनीं। वो भी ऐसी कि एमजीआर की मृत्यु से लेकर अपनी मृत्यु तक तमिलनाडु की राजनीति की धुरी रहीं। सिनेमा और राजनीति की आइकन होने के साथ-साथ वो तमिलनाडु की महिलाओं की आइकन भी थीं। वो भी ऐसी कि वहाँ की महिलाएं उन्हें भगवान मानती थीं और हजारों की संख्या में ऐसे पुरुष भी मिलेंगे आपको जो विमान से उनके उड़ जाने तक पूरी श्रद्धा से दंडवत किए रहते थे।
अपने समर्थकों के लिए जयललिता एक ऐसी महिला थीं, जिन्हें उनके विरोधियों ने खूब परेशान किया। खासकर विरोधी दल डीएमके के नेता करुणानिधि ने। जयललिता के लिए उनके समर्थकों की चाहत हर तर्क से परे थी और उसी अनुपात में ‘अम्मा’ उन पर लुभावनी योजनाओं की बौछार करती थीं। मिक्सी, ग्राइंडर, सिलाई मशीन, बकरी, बच्चों के लिए साइकिल, लैपटॉप जैसी चीजें उनके लिए आसानी से उपलब्ध थीं, उन्हें राशन की दुकानों से बीस किलो चावल के बैग मुफ्त मिलते थे और ‘अम्मा कैंटीन’ से वे रियायती दर पर मन भर खाना खा सकते थे।
देखा जाय तो जयललिता एक साधारण महिला ही थीं, लेकिन उनकी ज़िन्दगी असाधारण बन गई। उनके करिश्मे और पार्टी की उन पर निर्भरता ने एक ऐसा रिश्ता बना दिया जिसे बाहरी लोगों के लिए समझना मुश्किल है। बड़े-से-बड़े निर्णय वे बिना देर किए लेती थीं और अपने निकटतम लोगों से भी एक निश्चित दूरी बना कर रखती थीं। उनका आभामंडल कुछ ऐसा था कि शासन के दौरान सत्ता के गलियारों में डर का माहौल रहता था। मंत्री और उच्चाधिकारी चुप्पी साधे रहते थे। उनकी मर्जी के बिना कोई शब्द भी बोलने का साहस नहीं कर सकता था।
जयललिता का नाता कर्नाटक से था, उन्होंने एक ब्राह्ण परिवार में जन्म लिया और वो एक अभिनेत्री रह चुकी थीं। यानि उनके साथ तमाम ऐसी चीजें थीं जो उन्हें कामयाब होने से रोक सकती थीं, लेकिन वो एक द्रविड़ पार्टी की प्रमुख बनीं, जिसकी नींव ब्राह्मणों के विरोध के लिए पड़ी थी और वो अपने मेंटर एमजीआर की जगह लेने में कामयाब रहीं जिन्हें ‘देवतुल्य’ माना जाता था।
जयललिता पर भ्रष्टाचार के आरोपों में कई अदालती मामले थे। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में उन्हें कुछ देर के लिए ही सही, जेल भी जाना पड़ा। लेकिन वो अपनी पार्टी और राज्य के लिए किंवदंती थीं, इसमें कोई दो राय नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

The Last Journey of Jayalalitha
The Last Journey of Jayalalitha

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ओबामा, ट्रम्प और असांजे मिलकर भी मोदी से पीछे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘टाइम’ के ‘पर्सन ऑफ द इयर’ खिताब के लिए ऑनलाइन रीडर्स पोल जीत लिया है। इस खिताब के लिए उनका मुकाबला दुनिया भर के कई राजनेताओं, कलाकारों और अन्य क्षेत्रों की बड़ी हस्तियों के साथ है। गौरतलब है कि पाठकों द्वारा दिए जाने वाले वोटों के हिसाब से मोदी पहले नंबर पर जरूर हैं लेकिन यह खिताब किसे दिया जाए, इसका अंतिम निर्णय पत्रिका के संपादकों द्वारा किया जाता है। विजेता के नाम की घोषणा 7 दिसंबर को की जाएगी।

बहरहाल, रविवार रात को बंद की गई वोटिंग में मोदी को 18 प्रतिशत पाठकों के वोट मिले। दिलचस्प बात यह कि भारतीय प्रधानंमंत्री का नजदीकी मुकाबला जिन तीन महारथियों – बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रम्प और जूलियन असांजे – से रहा, वे तीनों एक साथ मिलकर भी महज 7 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाए। इस खिताब की दावेदारी में हिलेरी क्लिंटन (4 प्रतिशत) और मार्क जुकरबर्ग (2 प्रतिशत) भी थे। लेकिन मोदी ने लोकप्रियता में सबको बहुत पीछे छोड़ दिया। मोदी को मिले वोटों का विश्लेषण करने पर पाया गया कि उन्हें न केवल भारत से बल्कि अमेरिका के कैलिफोर्निया और न्यू जर्सी जैसे शहरों से भी काफी वोट मिले।

बता दें कि हर वर्ष ‘टाइम’ पत्रिका साल के सबसे प्रभावशाली शख्स का चुनाव करती है। इस खिताब के लिए चुनी गई हस्ती को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही कारणों से चुना जा सकता है। किस शख्स का प्रभाव इस साल पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा रहा, इस आधार पर विजेता के नाम का चुनाव किया जाता है। वैसे यह लगातार चौथा साल है, जब इस खिताब के दावेदारों में मोदी को शुमार किया गया है। इससे पहले साल 2014 में भी मोदी को ‘टाइम पर्सन ऑफ द इयर’ के ऑनलाइन पोल में जीत मिली थी, लेकिन पत्रिका के संपादकों द्वारा इस खिताब के लिए चुने गए आठ लोगों की सूची में वे जगह नहीं बना सके थे। चलते-चलते यह भी बता दें कि साल 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, 2013 में पोप फ्रांसिस, 2014 में इबोला फाइटर्स और 2015 में जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल को ‘टाइम पर्सन ऑफ द इयर’ घोषित किया गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से जुड़े पाँच अनछुए प्रसंग

कल स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की 132वीं जयंती थी। बिहार के जीरादेई में 3 दिसम्बर 1884 को जन्मे राजेन्द्र बाबू ने अपनी अन्तिम सांस भी बिहार में ही पटना स्थित सदाकत आश्रम में 28 फरवरी 1963 को ली। वे विलक्षण छात्र, आदर्श शिक्षक, सफल अधिवक्ता, प्रभावशाली लेखक, समर्पित गांधीवादी और स्वतंत्रता आन्दोलन में अपना सर्वस्व झोंक देने वाले सेनानी थे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ क्या होता है, ये समझने के लिए उनसे बेहतर उदाहरण हमें ढूंढ़े नहीं मिलेगा। 1950 से 1962 तक वे देश के ‘प्रथम नागरिक’ की भूमिका में रहे। अवकाश ग्रहण करने के बाद 1962 में ही उन्हें ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया। कहने की जरूरत नहीं कि उनका सारा जीवन ही अनमोल धरोहर है और उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें कई-कई तरह से याद किया। चलिए, आज बिहार को अखंड गौरव देने वाले इस सपूत से जुड़े कुछ ऐसे रोचक प्रसंग से रू-ब-रू होते हैं, जिनसे बहुत कम लोग वाकिफ हैं।

उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे राजेन्द्र बाबू के पूर्वज

राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआं गांव, अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। इनका कायस्थ परिवार था। यहाँ के कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया और वे वहाँ से बिहार के सारन जिले के एक गांव जीरादेई में जा बसे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी-सी रियासत थी – हथुआ। राजेन्द्र बाबू के दादा को पढ़े-लिखे होने के कारण इस हथिया रियासत की दीवानी मिल गई। वे 25-30 साल तक इस रियासत के दीवान रहे। धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल करते थे।

बारात के वधू के घर पहुँचने पर पालकी में सोए मिले वर राजेन्द्र प्रसाद

राजेन्द्र प्रसाद का विवाह 12 साल की उम्र में हुआ था। घोडों, बैलगाड़ियों और हाथी के साथ चली उनकी बारात को वधू राजवंशी देवी के घर पहुँचने में दो दिन लगे थे। वर राजेन्द्र प्रसाद चांदी की पालकी में सज-धज कर बैठे थे। लम्बी यात्रा के बाद बारात मध्य रात्रि को वधू के घर पहुँची। उस वक्त राजेन्द्र बाबू पालकी में सोए मिले। बड़ी कठिनाई से उन्हें विवाह की रस्म के लिए उठाया गया।

पत्नी के संग बहुत कम बिता पाते थे समय

राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी उन दिनों के रिवाज के अनुसार ज्यादातर पर्दे में ही रहती थीं। छुट्टियों में घर जाने पर अपनी पत्नी को देखने या उनसे बोलने का उन्हें बहुत ही कम अवसर मिलता था। बाद में जब राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए, तब पत्नी से मिलना और भी कम हो गया। वास्तव में विवाह के प्रथम पचास वर्षों में दोनों पति-पत्नी मुश्किल से पचास महीने साथ रहे होंगे।

धरी रह गई इंग्लैण्ड जाने की तैयारी

छात्रजीवन के दौरान राजेन्द्र प्रसाद आई.सी.एस. की परीक्षा देने के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे, पर उन्हें डर था कि परिवार के लोग इतनी दूर जाने की अनुमति कभी नहीं देंगे। इसीलिए उन्होंने बड़े ही गुप्त तरीके से जहाज से इंग्लैण्ड जाने के लिए सीट का आरक्षण करवाया और बाकी प्रबंध भी कर लिया। यहाँ तक कि इंग्लैण्ड में पहनने के लिए दो सूट भी सिलवा लिए। लेकिन जिसका उन्हें डर था वही हुआ। उनके पिता ने उन्हें अनुमति नहीं दी और उन्हें बड़ी अनिच्छा से इंग्लैण्ड जाने का विचार छोड़ना पड़ा।

आज भी चालू है उनका खाता

राजेन्द्र प्रसाद के देहावसान के 50 वर्ष से ज्यादा गुजर गए, लेकिन उनका बैंक खाता उनके सम्मान में आज भी चालू है। राजेन्द्र बाबू ने मृत्यु से कुछ समय पहले ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ‘पंजाब नेशनल बैंक’ में अपना खोता खोला था। यह खाता बैंक की पटना स्थित एग्जीबिशन रोड शाखा में 24 अक्टूबर 1962 को खोला गया था। बैंक उन्हें गर्व से अपना प्रथम ग्राहक कहता है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक फिलहाल उनके खाते में 1,213 से कुछ अधिक रुपए हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या सिनेमाहॉल में बजने से बढ़ जाएगा राष्ट्रगान का सम्मान ?

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने एक अहम फैसले में देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ को बजाना अनिवार्य कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि  राष्ट्रीय गान बजाते समय सिनेमाहॉल के पर्दे पर राष्ट्रीय ध्वज भी दिखाना होगा और हॉल में मौजूद सभी लोगों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश एक जनहित याचिका पर आया है जिसे मध्यप्रदेश निवासी श्याम नारायण चौकसे ने दायर की थी।

गौरतलब है कि इससे पूर्व सिनेमाहॉल संचालक अपने विवेकानुसार राष्ट्रगान बजाने या न बजाने का फैसला करते थे। कहीं राष्ट्रगान फिल्म शुरू होने से पहले बजाया जाता था तो कहीं खत्म होने के बाद और कई हॉल ऐसे भी थे जहाँ इसे बजाया ही नहीं जाता था। अब सुप्रीम कोर्ट न केवल इसे बजाना अनिवार्य करने के साथ-साथ इसका वक्त भी निर्धारित कर दिया है, बल्कि इससे संबंधित अन्य दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। मसलन, राष्ट्रगान के दौरान सिनेमाहॉल के दरवाजे पूरी तरह बंद रखे जाएंगे ताकि लोगों का हॉल में आना-जाना न चलता रहे। एक अन्य निर्देश के मुताबिक राष्ट्रगान के दौरान खड़ा होना अनिवार्य है लेकिन जो लोग शारीरिक या किसी अन्य मजबूरी के चलते खड़े होने की स्थिति में न हों, वे बैठकर भी राष्ट्रगान में हिस्सा ले सकते हैं।

व्यावहारिक तौर पर देखा जाय तो इससे पूर्व कई जगहों और अवसरों पर राष्ट्रगान या राष्ट्रीय ध्वज के प्रति यथोचित सम्मान न प्रदर्शित करने और उसके बाद उपजी अप्रिय स्थितियों की ख़बरें आती रही हैं। ऐसे में राष्ट्रगान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के इस नए और स्पष्ट फैसले के बाद क्या यह उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्रगान के समय किसी तरह की अव्यवस्था या असमंजस की स्थिति नहीं बनेगी? सिनेमाहॉल के संचालक और कर्मचारी ही नहीं, दर्शक भी (जिनमें बच्चे भी शामिल होंगे) राष्ट्रगान के लिए मानसिक रूप से सजग और सतर्क रहेंगे?

यह सच है कि राष्ट्रगान या राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों के प्रति सम्मान सुनिश्चित करना हमारे राष्ट्रीय दायित्व का हिस्सा है, लेकिन हमें इन पर जरूरत से ज्यादा जोर देने को लेकर सचेत रहना चाहिए। देशभक्ति हमारे अन्दर से उपजती है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे जबरन किसी पर थोपा जा सके। हमारे रोजमर्रा की ज़िन्दगी में यह अनेक रूपों में प्रकट होती रहती है, ठीक वैसे ही जैसे मन्दिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारे जैसे धार्मिक प्रतीकों के प्रति या माता-पिता-गुरु जैसे श्रद्धेय जनों के प्रति। यह व्यवहार से ज्यादा संस्कार की चीज है। हाँ, राष्ट्रीय संकट की स्थिति में इसके रूप अलग जरूर हो सकते हैं।

एक बात और, राष्ट्रीय प्रतीकों के लिए सम्मान दर्शाना अगर मजबूरी हो जाए तो वह धीरे-धीरे रस्म-अदायगी का रूप ले सकता है। सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजने की व्यवस्था अतीत में छोड़ी भी इसीलिए गई थी। बेहतर होगा कि एक विकसित समाज बनने की प्रक्रिया में हम प्रतीकात्मकता से ऊपर उठकर देशभक्ति को एक आंतरिक मूल्य के रूप में जिएं। वैसे भी जिन फिल्मों को आप परिवार के साथ देखने की स्थिति में नहीं होते, और आजकल सौ में से नब्बे फिल्में ऐसी ही होती हैं, उन फिल्मों से पहले राष्ट्रगान का बजना उसका सम्मान होगा या अपमान..? सर्वोच्च न्यायालय ने इस पहलू पर क्यों नहीं सोचा, ये समझ से परे है..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भाजपा ने बदली बिहार और दिल्ली की कमान

भाजपा आलाकमान ने दो महत्वपूर्ण राज्यों – बिहार और दिल्ली – में पार्टी का ‘चेहरा’ बदल दिया है। पार्टी नेतृत्व ने इन दोनों राज्यों में बड़ा परिवर्तन करते हुए नित्यानंद राय को बिहार का और मनोज तिवारी को दिल्ली का अध्यक्ष मनोनीत किया है। नित्यानंद राय बिहार में मंगल पांडेय और मनोज तिवारी दिल्ली में सतीश उपाध्याय की जगह लेंगे।

पहले बिहार की बात। बिहार भाजपा में काफी समय से बदलाव के कयास लगाए जा रहे थे। युवा नित्यानंद राय को पार्टी की जिम्मेदारी सौंपकर नेतृत्व ने युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। साथ ही उन्हें सामने लाकर लालू (और आगे चलकर तेजस्वी) के माय समीकरण की काट भी खोजी गई है। गौरतलब है कि नित्यानंद राय यादव समाज से आते हैं और उन्हें अघ्यक्ष बनाकर पार्टी ने यादव और पिछड़ा कार्ड एक साथ खेला है। बता दें कि राय वर्तमान में उजियारपुर से सांसद हैं और इससे पहले 2000, फरवरी 2005, अक्टूबर 2005 और 2010 में लगातार चार बार हाजीपुर से विधायक रह चुके हैं।

उधर दिल्ली की कमान मनोज तिवारी को देकर पार्टी में नई जान फूंकने की कोशिश की गई है। लोकसभा चुनाव में दिल्ली की नॉर्थ-ईस्ट सीट से जीत के बाद मनोज तिवारी दिल्ली भाजपा का एक महत्वपूर्ण चेहरा बन गए थे। गौरतलब है कि दिल्ली की राजनीति में एक समय पंजाबी समुदाय का वर्चस्व माना जाता था, बाद में वैश्य समुदाय का वर्चस्व बढ़ा और मौजूदा समय में पूर्वांचलियों का बोलबाला है। ऐसे में पार्टी आलाकमान को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो पूर्वांचली वोटरों को लुभा सके। कहने की जरूरत नहीं कि मनोज तिवारी पूर्वांचलियों में खासे लोकप्रिय हैं और यही बात उनके चयन के पक्ष में गई। यहाँ यह रेखांकित करना भी जरूरी है कि तिवारी बिहार के कैमूर जिले के अतरवलिया गांव से आते हैं और उन्हें सामने लाकर पार्टी ने दिल्ली में बिहारियों की ‘अपरिहार्यता’ को भी स्वीकार किया है।

बता दें कि भाजपा संविधान के मुताबिक हर तीन साल में पार्टी के अध्यक्ष बदले जाते हैं। पिछले साल दिल्ली और बिहार को छोड़कर सभी राज्यों के अध्यक्ष बदल दिए गए थे। अब दिल्ली और बिहार में भी इसी के तहत बदलाव हुए हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश के रुख से सकते में लालू-सोनिया

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा की बढ़ती नजदीकियों और उनके बीच ‘गुप्त’ बातचीत की अटकलों से महागठबंधन के सहयोगियों में बेचैनी है। इस बीच आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से फोन पर बातचीत की है। कांग्रेस से जुड़े सूत्र बताते हैं कि रविवार को हुई इस बातचीत के दौरान बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष और शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी भी मौजूद थे। इस बाबत पूछे जाने पर कोई भी टिप्पणी करने से आरजेडी के लोग परहेज कर रहे हैं।

गौरतलब है कि नोटबंदी के मुद्दे पर नीतीश कुमार जिस तरह खुलकर मोदी सरकार का समर्थन कर रहे हैं उसके कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। राजनीति के जानकारों का कहना है कि नीतीश का ‘नैतिक’ समर्थन अब ‘व्यावहारिक’ समर्थन में तब्दील हो गया है। तभी तो वो नोटबंदी के मुद्दे पर सोमवार को आयोजित विपक्षी दलों के ‘भारत बंद’ और ‘आक्रोश रैली’ से भी अपनी पार्टी को दूर रख रहे है, और उधर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान उनके ‘निर्णय’ और ‘सहयोग’ की खुली सराहना और स्वागत कर रहे हैं।

नीतीश के इस ‘यू-टर्न’ से आरजेडी और कांग्रेस का सकते में आना स्वाभाविक है। नोटबंदी का खुलकर विरोध कर रहीं दोनों पार्टियां यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि आखिर क्या वजह है जिससे नीतीश एक बार फिर से भाजपा के करीब जाने को मजबूर हैं। यह सही है कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता लेकिन किसी के करीब जाने या किसी से दूर होने की कोई छोटी या बड़ी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वजह तो होनी ही चाहिए। नहीं तो कल तक जो नीतीश मिशन-2019 को ध्यान में रख एक-एक कदम बढ़ाने और मोदी के बरक्स खुद को खड़ा करने में लगे थे, आज भाजपा के लिए उनका सोया (या मोदी के उदय के बाद मर चुका) प्यार यूं अचानक जग न गया होता!

यह सही है कि बिहार में लालू के दोनों लाल के साथ सत्ता संभालने में नीतीश बहुत ‘सहज’ नहीं महसूस करते लेकिन नैतिकता का तकाजा यह है कि वो मैनडेट का सम्मान करें और ईमानदारी से गठबंधन धर्म निभाएं। अन्यथा, आने वाले समय में जनता की सहानुभूति लालू (कांग्रेस के साथ) बटोर ले जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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