All posts by Dr. A Deep

बिहार की आशा को ब्रिटेन का ‘एशियन बिजनेस वुमेन पुरस्कार’

13 साल की उम्र में जिस लड़की की पढ़ाई छूट हो गई हो, 15 साल की उम्र में शादी हो गई हो और 25 साल की उम्र तक जिसे अंग्रेजी न आती हो, आज उसके नाम ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित पुरस्कारों की पूरी फेहरिस्त हो तो क्या कहेंगे आप? और उस वक्त आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी जब आपको कहा जाय कि वो शख्सियत पिछड़े कहे जाने वाले बिहार की मिट्टी से निकली है? जी हां, मैं बात कर रहा हूं बिहार के सीतामढ़ी की रहने वाली 65 वर्षीया आशा खेमका की जिन्हें शुक्रवार को ब्रिटेन का प्रतिष्ठित ‘एशियन बिजनेस वुमेन पुरस्कार’ दिया गया। इससे पहले 2013 में उन्हें ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश अंपायर’ से नवाजा जा चुका है।

आशा खेमका पर आगे चर्चा हो, उससे पहले ये जानें कि वे हैं कौन? ब्रिटेन की नामचीन हस्तियों में शुमार आशा वर्तमान में वहां के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज की प्रिंसिपल हैं। उनकी सफलता की कहानी इसलिए बेहद खास है कि शादी के बाद जब वे ब्रिटेन गई थीं, तब उन्हें अंग्रेजी का कोई ज्ञान नहीं था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी। कुछ कर दिखाने की ऐसी अदम्य लालसा थी उनके भीतर कि अंग्रेजी पर उन्होंने जैसे अधिकार ही कर लिया।

आपको बता दें कि आशा 13 साल की थीं, जब उनकी पढ़ाई छूट गई थी। 15 साल की होते-होते परिवारवालों ने उनकी शादी डॉक्टर शंकर अग्रवाल से कर दी। शादी के बाद घर संभालते वह 25 वर्ष की हो गईं तब उनके पति को ब्रिटेन में नौकरी मिली। तब वो अपने बच्चों के साथ पति के पास ब्रिटेन आ गईं। स्वाभाविक था कि अंग्रेजी का ज्ञान न होने के कारण उनके शुरुआती दिन बहुत कठिन रहे होंगे। पर आशा ने टीवी पर बच्चों के लिए आने वाले शो को देख-देख अंग्रेजी सीखना शुरू किया।

प्रारम्भ में आशा साथी युवा महिलाओं से टूटी-फूटी अंग्रेजी मे बात करतीं, पर घबरातीं नहीं। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई, आत्मविश्वास बढ़ता गया और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कुछ सालों बाद कैड्रिफ यूनिवर्सिटी से उन्होंने बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री ली और ब्रिटेन के चुनिंदा कॉलेजों में शुमार वेस्ट नॉटिंघमशायर कॉलेज में लेक्चरर बनीं। अब वो इसी कॉलेज की प्रिंसिपल हैं।

आशा खेमका की कहानी आप तक पहुंचाने का उद्देश्य यह है कि अंग्रेजी या किसी भी भाषा या विषय का समुचित ज्ञान न होने के कारण स्वयं को हीन मान लेने वाले प्रेरणा पा सकें, क्योंकि हम और आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि न केवल बिहार बल्कि सम्पूर्ण देश में ग्रामीण या कस्बाई इलाके में रहने वाले अधिकांश परिवारों के लड़के-लड़कियां आमतौर पर ऐसी हीनता से ग्रसित होते हैं। जरा सोच कर देखें जब आशा ने उस मुल्क में अपनी ऐसी पहचान बनाई जिसने उसके अपने देश भारत समेत लगभग आधी दुनिया पर कभी राज किया हो, तो आप अपने देश में ऐसा क्यों नहीं कर सकते? क्या आशा की कहानी पढ़ने के बाद आपकी आशा को पंख नहीं लग जाएंगे!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप         

सम्बंधित खबरें


पटना महावीर मंदिर में क्यों हैं एक साथ दो हनुमानजी ?

आप बिहार के हैं और राजधानी पटना न आए हों सामान्यतया ऐसा नहीं हो सकता और पटना आने पर स्टेशन स्थित प्रसिद्ध महावीर मंदिर आपने न देखा हो ये भी मुमकिन नहीं। आपने जरूर सुना या पढ़ा होगा कि इस मंदिर की गिनती उत्तर भारत के गिने-चुने मंदिरों में होती है। लेकिन सच यह है कि देश भर के चुनिंदा मंदिरों की सूची बनाई जाए जहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती हो और चढ़ावों का अंबार लगता हो, तब भी पटना का हनुमान जी का ये मंदिर तिरुपति के बालाजी मंदिर, शिर्डी के सांई बाबा मंदिर और जम्मू के वैष्णो देवी मंदिर आदि के साथ शीर्ष के कुछ मंदिरों में शुमार किया जाएगा। रामनवमी के दिन तो इस मंदिर में श्रद्धालुओं की लाईन कई किलोमीटर तक लगी होती है। एक अनुमान के मुताबिक इस दिन राम के इस अप्रतिम भक्त के दर्शन के लिए तीन से चार लाख श्रद्धालु जुटते हैं।

Patna Mahavir Mandir
Patna Mahavir Mandir

तो चलिए रामनवमी के पावन अवसर पर इस मंदिर की विशेषताओं से रूबरू होते हैं। सबसे पहली और अहं बात यह कि यहां आकर शीश नवाने वाले किसी भक्त ने आज तक ये नहीं कहा कि उसकी मनोकामना पूरी नहीं हुई। इस मंदिर की स्थापना 1730 ई. में स्वामी बालानंद ने की थी। तब यह मंदिर बैलगाड़ी से चंदे में एक-एक ईंट एकत्र कर बना था। साल 1900 तक यह मंदिर रामानंद संप्रदाय के अधीन रहा। उसके बाद 1948 तक इस पर गोसांई संन्यासियों का कब्जा रहा। साल 1948 में पटना हाईकोर्ट ने इसे सार्वजनिक मंदिर घोषित कर दिया। उसके बाद आचार्य किशोर कुणाल के प्रयास से साल  1983 से 1985 के बीच वर्तमान मंदिर का निर्माण शुरू हुआ और आज इस मंदिर का भव्य स्वरूप सबके सामने है।

इस मंदिर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर है और मंदिर में हनुमानजी समेत सारे देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं, परन्तु गर्भगृह में बजरंग बली की मूर्ति है और कमाल की बात यह कि एक नहीं एक साथ दो मूर्तियां हैं – हनुमानजी की युग्म मूर्तियां। आप याद करें, जब भी आप इस मंदिर गए होंगे, फूलवाले ने आपको दो माला दी होगी ताकि हनुमानजी की दोनों मूर्तियों पर माला चढ़ सके। कभी आपने सोचा कि यहां एक साथ दो मूर्तियां क्यों हैं? देश भर में हनुमानजी के हजारों मंदिर हैं लेकिन कहीं आपने ऐसा नहीं देखा होगा। चलिए, आज हम बताते हैं। दरअसल यहां हनुमानजी की दो मूर्तियां दो अलग आशय से रखी गई हैं। कहा जाता है कि दो मूर्तियों में एक मूर्ति अच्छे लोगों के कार्य पूर्ण करती है और दूसरी बुरे लोगों की बुराई दूर करती है। एक तरह से भक्तों के शीघ्र कल्याण के लिए स्वयं को ही दो हिस्सों में बांट लिया हनुमानजी ने। है न कमाल की बात!

अब बात हनुमानजी के प्रिय भोग लड्डू की। आपको आश्चर्य होगा कि 1930 तक यहां लड्डू की एक भी दुकान न थी और आज आलम यह है कि प्रतिदिन औसतन 25 हजार किलो लड्डू की बिक्री केवल एक दुकान से होती है जो मंदिर परिसर में मंदिर प्रशासन द्वारा ही चलाई जाती है। यहां तिरुपति के कारीगर खास तौर पर नैवेद्यम लड्डू तैयार करते हैं। इसके अतिरिक्त अगल-बगल दर्जनों अन्य दुकानें भी हैं जिनमें बेसन और मोतीचूर के कई किस्म के लड्डू आप खरीद सकते हैं।

सच ही कहा गया है – हरि अनंत हरि कथा अनंता। अभी इस मंदिर से जुड़ी कई ऐसी बाते हैं जो आपको चकित करेंगी। फिलहाल चलते-चलते बस एक बात और। इस मंदिर के दूसरे तल पर आप कांच का एक बड़ा बरतन देखेंगे, जिसमें रामसेतु का पत्थर रखा हुआ है। आप उस समय दांतो तले ऊंगली दबा लेंगे जब देखेंगे कि 15 किलो वजन वाला यह पत्थर कितने आराम से पानी में तैरता रहता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


प्रणब मुखर्जी पूरा करेंगे बिहार के लिए डॉ. कलाम का सपना

बिहार के लिए बड़े सौभाग्य सौभाग्य की बात है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति मिसाईलमैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने यहां के प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के पुनरुत्थान के लिए जो किया, कुछ वैसा ही वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी विक्रमशिला विश्वविद्यालय के लिए करने जा रहे हैं। आठवीं-नौवीं सदी के इस गौरवशाली विश्वविद्यालय का भग्नावशेष देखने भागलपुर के कहलगांव अंतीचक पहुंचे महामहिम ने कहा कि विक्रमशिला में ऊंचा से ऊंचा स्तरीय विश्वविद्यालय बनना चाहिए। ऐसी धरोहर को केवल म्यूजियम का शो पीस बनाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात करेंगे।

President Pranab Mukherjee Visiting Vikramshila University Ruins
President Pranab Mukherjee Visiting Vikramshila University Ruins

विक्रमशिला के भग्नावशेषों का मुआयना कर अभिभूत दिख रहे राष्ट्रपति ने कहा कि एक जमाना था जब राजा और आमलोग बड़े-बड़े विश्वविद्यालय स्थापित करते थे। तीसरी सदी से तक्षशिला, चौथी सदी से नालंदा और आठवीं-नवीं सदी से विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने लोगों का मार्गदर्शन किया। शिक्षा, शोध और तंत्र को प्रोत्साहन दिया। यहां पढ़ने के लिए चीन, यूनान और मिस्र से छात्र, शिक्षक व शोधकर्ता आते थे। उन्होंने बताया कि जब वे कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ते थे उस समय से उनके मन में इन धरोहरों को देखने की इच्छा थी। विदेश मंत्री के रूप में जब वे पाकिस्तान गए थे तो उन्हें तक्षशिला को देखने का मौका मिला था। वहीं पर विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में नालंदा के पुनरुत्थान का प्रस्ताव सिंगापुर और चीन से आया, जिसे भारत सरकार ने मंजूर किया और नालंदा एक बार फिर जी उठा। अब विक्रमशिला की बारी है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2015 में लोकसभा में विक्रमशिला में केन्द्रीय विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा की थी और इसके लिए चार-पांच सौ करोड़ रुपए भी मंजूर किए थे। तेज धूप में विक्रमशिला भग्वानवेष परिसर के बाहर खड़े हजारों लोगों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने इस बात का उल्लेख किया और इसके गौरव को वापस हासिल करने का भरोसा दिलाया।

अब आप ही बताएं, बिहार के लिए डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के सपनों को पूरा होने और यहां के गौरवशाली अतीत को एक बार फिर करवट लेने से भला कौन रोकेगा! जब देश के प्रथम नागरिक स्वयं इसकी घोषणा कर रहे हों और इस घोषणा को अमलीजामा पहनाने के लिए केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और राज्य में नीतीश कुमार जैसे सजग-सक्षम-सक्रिय प्रहरी हों!

चलते-चलते बता दें कि इस मौके पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद, केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूड़ी, गोड्डा (झारखंड) के सांसद निशिकांत दूबे, बिहार के जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री शहनवाज हुसैन भी उपस्थित थे। इसके बाद भागलपुर से लौटकर दिल्ली जाने के क्रम में राज्यपाल रामनाथ कोविंद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महामहिम को पटना हवाई अड्डे पर विदाई दी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


आतंकवाद से अधिक खतरनाक है प्यार !

अगर कहा जाय कि प्यार आतंकवाद से अधिक खतरनाक होता है, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? आप चौंकेंगे, हंसेंगे या सवाल करने वाले के मानसिक संतुलन को संदेह से देखेंगे? आप कुछ सोचें या करें उससे पहले बीते 15 सालों के सरकारी आंकड़ों पर नज़र दौड़ाएं, जो चीख-चीख कर बता रहे हैं कि भारत में आतंकवाद से ज्यादा जानें प्यार के चलते गई हैं।

जिन आंकड़ों की बात हम कर रहे हैं, वे साल 2001 से 2015 की अवधि के हैं। इन 15 सालों में आतंकवादी घटनाओं में जहां 20,000 लोगों की जानें गईं, वहां इसी अवधि में प्यार से जुड़े मामलों में 38,585 हत्या और गैर इरादतन हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दिया गया। यही नहीं, इसी दौरान प्यार में हारने और इससे जुड़ी अन्य वजहों से करीब 79,189 लोगों ने मौत को गले लगा लिया। इस अवधि में 2.6 लाख अपहरण के केस भी दर्ज किए गए, जिनमें महिला के अपहरण की मुख्य वजह उससे शादी रचाने का इरादा था।

आंकड़ों के मुताबिक इन 15 सालों में प्रतिदिन 7 हत्याओं, 14 आत्महत्याओं और 47 अपहरण के मामलों का जिम्मेदार था प्यार। प्यार को लेकर परिजनों का अस्वीकार, एकतरफा प्यार और जबरन शादी जैसे कारण इसमें शामिल हैं। दूसरी ओर इसी दौरान आतंकवादी घटनाओं में जिन 20,000 लोगों की मौत हुई, उनमें सुरक्षा बल और आम नागरिक दोनों शामिल हैं।

आंकड़े बताते हैं कि आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश प्यार के मकसद से की गई हत्याओं के मामलों में सबसे आगे हैं। इन सभी राज्यों में इस अवधि में 3,000 से ज्यादा हत्याएं प्रेम-प्रसंगों के चलते हुईं। वहीं, प्यार में की गई आत्महत्या के मामलों में पश्चिम बंगाल शीर्ष पर है, जबकि राज्य के 2012 के आंकड़े नहीं मिल सके हैं। आपको हैरत होगी कि सांस्कृतिक रूप से अत्यन्त समृद्ध इस राज्य में बीते 14 सालों में 15,000 खुदकुशी के मामलों की वजह प्रेम-संबंध थे। इन 15 सालों में प्यार में जान देने वालों में दूसरे पायदान पर तमिलनाडु है, जहां प्रेम प्रसंगों के चलते 9,405 लोगों ने मौत को गले लगा लिया। इसके बाद असम, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश का नंबर आता है। इन सभी राज्यों में 5,000 से अधिक लोगों ने प्यार में जान दे दी।

सच तो यह है कि प्यार जिस अहसास का नाम है उससे अधिक कोमल, उससे अधिक निश्चल, उससे अधिक पवित्र और उससे अधिक महान इस संसार में कुछ भी नहीं। सबसे अधिक कविताएं इसी प्यार पर बनीं, सबसे अधिक कहानियां इसी प्यार को लेकर रची गईं, सबसे अधिक मूर्तियां इसी प्यार को लेकर गढी गईं, सबसे अधिक चित्र इसी प्यार को लेकर उकेरे गए, नृत्य और अभिनय की अधिकांश भंगिमाएं इसी प्यार की ऋणी हैं, हर सृजन के मूल में यही प्यार है और सोच कर देखिए, ऊपर दिए गए आंकड़े भी इसी प्यार के हैं! ये कैसा विरोधाभास है? क्या इस विरोधाभास के रहते हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी हैं?

जरा अपने भीकर झांककर देखें। आखिर क्या है प्यार के इस हश्र का कारण? जनाब कारण कहीं बाहर नहीं, हमारे ही भीतर है। हमारे ही अहं और अविवेक का परिणाम है ये। इक्कीसवीं सदी में भी हम पुरुषवादी व सामंती सोच से ऊपर नहीं उठ सके हैं। हम अब भी वोट से लेकर बेटी तक जाति देखकर ही देते हैं। हमारी ये व्यवस्था किसी और ने नहीं, हमने ही बनाई हैं और सच यह है कि हम ही उसे तोड़ भी पाएंगे। और जब तक ऐसा नहीं होगा, ऐसे आंकड़े हमारे सामने आते रहेंगे और हम मुंह छिपाते रहेंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


कांग्रेस के मुस्लिम नेता ने की भागवत को राष्ट्रपति बनाने की वकालत!

इसे ‘वक्त’ का तकाजा कहें या राजनीति की विडंबना..! कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व रेल मंत्री सी.के. जाफर शरीफ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को राष्ट्रपति बनाने की वकालत की है। उन्होंने कहा है कि संघप्रमुख भागवत की राष्ट्रभक्ति और संविधान के प्रति निष्ठा पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता है।

29 मार्च को लिखे अपने पत्र में शरीफ ने कहा, मैं व्यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूं कि देश के राष्ट्रपति के तौर पर मोहन भागवत के नाम पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भागवत के नाम का विरोध करके किसी को इस मुद्दा नहीं बनाना चाहिए क्योंकि संघ प्रमुख ऐसे देशभक्त हैं जो लोकतंत्र के प्रति वफादार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हर मुश्किल समय में राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से निभाता आया है।

गौरतलब है कि बीते दिनों शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी भागवत के नाम की वकालत की थी। राउत ने कहा था कि देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संघ प्रमुख भागवत राष्ट्रपति पद के लिए अच्छी पसंद होंगे। राष्ट्रपति का पद देश में सर्वोच्च पद है। इस पद पर साफ छवि वाले किसी व्यक्ति को बैठना चाहिए। हालांकि, राउत ने कहा था कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के फैसले के बाद ही पार्टी भागवत के नाम पर सहमति दर्ज कराएगी।

बहरहाल, शिवसेना अगर भागवत की वकालत करे तो बात समझ में आती है, लेकिन सी.के. जाफर शरीफ का इस तरह का पत्र लिखना समझ के परे है। कहने की जरूरत नहीं कि उनका प्रस्ताव कांग्रेस की सोच और संस्कृति के एकदम उलट है। वैसे फौरी तौर पर शरीफ के इस कदम की दो व्याख्या हो सकती है – पहली यह कि वे कांग्रेस से ‘असंतुष्ट’ हैं और भाजपा से ‘कुछ’ पाने’ की चाहत रखते हैं और (एक प्रश्नचिह्न के साथ) दूसरी यह कि भाजपा और संघ को लेकर मुस्लिमों की राय बदल रही है या बदल सकती है और शरीफ का मोदी को पत्र लिखना उसी का अक्श है?

वैसे चलते-चलते बता दें कि संघप्रमुख खुद इस तरह की खबरों का खंडन करते हुए कह चुके हैं कि वह राष्ट्रपति नहीं बनना चाहते हैं। उन्होंने तो यहां तक कह दिया है कि अगर उनके सामने ऐसा प्रस्ताव आता भी है तो वह उसे स्वीकार नहीं करेंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


नीतीश कुमार को अणुव्रत सम्मान

बिहार में शराबबंदी लागू करने और इसे राष्ट्रव्यापी चर्चा का विषय बनाने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अणुव्रत सम्मान से सम्मानित किया गया। बता दें कि जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ अणुव्रत समिति का यह सर्वोच्च पुरस्कार है, जिसमें प्रतीक चिह्न के अतिरिक्त 1 लाख 51 हजार की सम्मान-राशि भी दी जाती है। इस राशि को नीतीश ने मुख्यमंत्री राहत कोष में दे दिया। मंगलवार को पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित इस सम्मान-समारोह में बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद सहित कई गणमान्य उपस्थित थे।

इस मौके पर नीतीश कुमार ने कहा कि यह पुरस्कार उन लोगों के लिए है जिन्होंने शराबंबदी के बाद शराब से मुक्ति पा ली। उन्होंने कहा कि शराबबंदी से लोगों के चेहरे की खुशी लौटी है। चारों तरफ आज शांति का माहौल है। हर धर्म और संप्रदाय के लोग शराबबंदी के समर्थन में हैं। पूरे देश में शराबबंदी की आवाज़ उठ रही है। मुझे पक्का भरोसा है कि जो लोग शासन में हैं उन पर इसका असर पड़ेगा। शराबबंदी का निर्णय कोई राजनीतिक निर्णय नहीं है। मैं इसे सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद मानता हूं।

शराबबंदी के लिए आत्मानुशासन पर जोर देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आप चाहे जितना सख्त कानून बना लीजिए पर इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात है आत्मानुशासन। बगैर इसके शराबबंदी सफल नहीं हो सकती। नीतीश ने शराबबंदी के कारण राजस्व के नुकसान की आशंका जताए जाने की चर्चा भी की और  कहा कि इससे कुछ फर्क नहीं दिखा है। इस बार राजस्व संग्रह उस स्तर पर पहुंच गया है जो इसके पूर्व के वित्तीय वर्ष में था।

इस अवसर पर अपने सारगर्भित संबोधन में नीतीश ने यह भी कहा कि देश में आज अतिवाद का दौर है और समाज में असहिष्णुता का माहौल व्याप्त है, जिससे हमें बाहर निकलना होगा। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह स्थिति केवल भारत की ही नहीं बल्कि वैश्विक है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


तो यूपी चुनाव ने मुसलमानों का ‘डीएनए टेस्ट’ कर दिया?

यूपी में भगवा रंग छाने और उसके बाद वहां की बागडोर योगी आदित्यनाथ के हाथों में जाने के बाद  भाजपा के बयानवीरों ने ‘हिन्दुत्व’ की राजनीति को नए सिरे से भुनाना शुरू कर दिया है। वे अब एक के बाद एक ऐसे बयान दे रहे हैं जो ऊपर से दिखते तो ‘उदात्त’ हैं, पर इनके भीतर एक नए किस्म के ‘तनाव’ का बीज छिपा है। अब गिरिराज सिंह का ताजा बयान ही देख लीजिए। उन्होंने कहा है कि ‘अयोध्या में राम मंदिर जरूर बनेगा’ और नई बात ये कि इसे हिन्दू और मुसलमान ‘मिलकर बनाएंगे’। आप पूछेंगे कि ये चमत्कार क्योंकर होगा तो उसका भी जवाब तैयार है जनाब, ऐसा इसलिए संभव होगा कि बकौल गिरिराज ‘हिन्दू और मुसलमानों का डीएनए एक है’।

जी हां, भाजपा के केन्द्रीय मंत्री ने जोर देकर कहा कि अयोध्या में भव्य राममंदिर बनेगा और दो सौ प्रतिशत बनेगा। हम और मुसलमान दोनों मिलकर राम मंदिर बनाएंगे क्योंकि मुसलमान भी हमारे वंशज हैं। दोनों के डीएनए एक हैं। हिन्दू और मुसलमानों के पूर्वज एक ही हैं। गिरिराज का कहना है कि धर्म अलग-अलग हैं, इबादत अलग-अलग हैं, लेकिन पूर्वज एक हैं। राम मंदिर में मुसलमानों की भी आस्था है और अपने पूर्वजों की याद में हम मिलकर मंदिर बनाएंगे।

जब गिरिराज ऐसा बोल रहे हों तो भला साक्षी महाराज कहां चुप रहने वाले थे? उन्होंने गिरिराज का साथ देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी चाहता है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों मिलकर राम मंदिर बनाए। साक्षी ने कहा – हम सब भाई-भाई हैं और हिन्दू-मुसलमान मिलकर राम मंदिर बनाएंगे।

बहरहाल, यह सब सुनते-पढ़ते-लिखते मन में कई बातें उथल-पुथल मचाती हैं। सबसे पहले तो यह कि सारे मुसलमानों का एकदम से डीएनए टेस्ट कैसे हो गया? अगर ये बात ‘जुमले’ के तौर पर नहीं सांस्कृतिक एकता की सूख रही जड़ों को जिन्दा करने के लिए कही गई है तो बाबरी मस्जिद टूटी ही क्यों थी? छोड़िए बाबरी मस्जिद की ‘पुरानी’ बात। ताजा उदाहरण अभी खत्म हुए चुनाव का। इस बात का क्या जवाब है गिरिराज और साक्षी महाराज के पास कि यूपी की 403 सीटों में से एक पर भी समान ‘डीएनए’ वाले ‘भाई’ की याद क्यों नहीं आई? हिन्दुत्व के ‘हीरो’ योगी और ‘सुपर हीरो’ मोदी जब ‘श्मसान-कब्रिस्तान’ के मुद्दे पर घमासान कर रहे थे, तब ‘डीएनए’ कहां था? क्या मरने के बाद ‘डीएनए’ अलग हो जाता है?

गिरिराज और साक्षी महाराज के पहले के एक नहीं दर्जनों बयान हैं जो उनके अब के बयान का मुंह चिढ़ाते दिख रहे हैं। खैर, अगर ये बात इनलोगों ने उकसाने या समुदायविशेष पर दबाव बनाने और अपना ‘वोटबैंक’ चमकाने के लिए नहीं कही होती तो जरूर इनका हृदय से स्वागत किया जाना चाहिए था! चलते-चलते एक बात और। क्या मंदिर-मस्जिद का झगड़ा छोड़ विवादित स्थल पर कोई अस्पताल या स्कूल खोल देना बेहतर विकल्प नहीं है, जो ‘समान’ नहीं ‘सारे’ डीएनए वालों के लिए होता?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

सम्बंधित खबरें


अब बिहार में भी एंटी-रोमियो स्क्वॉयड!

बिहार में ‘योगी इफेक्ट’ दिखने लगा है। गुरुवार को भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार ने यूपी की तरह बिहार में भी अवैध बूचड़खानों को बंद करने की मांग की थी और अब पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यूपी की ही तर्ज पर बिहार में भी मनचलों पर नकेल कसने के लिए एंटी-रोमियो स्क्वॉयड बनाने की मांग की है।

दरअसल मोदी शुक्रवार को पत्रकारों से रूबरू थे। इस दौरान उन्होंने महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए बिहार में एंटी-रोमियो स्क्वॉयड की जरूरत बताई और सरकार से इस बाबत कदम उठाने की मांग की। पूर्व उपमुख्यमंत्री ने हाल के दिनों में सड़कों पर महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ बढ़ते अपराध की चर्चा करते हुए कहा कि ऐसे दस्ते को महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में तथा स्कूल और कॉलेजों के इर्द-गिर्द तैनात किया जाना चाहिए।

अवैध बूचड़खानों को लेकर भी मोदी ने यूपी की राह पर चलने की वकालत की और प्रेम कुमार की मांग का पुरजोर समर्थन किया। यही नहीं, उन्होंने एक कदम आगे बढ़कर आरोप लगाया कि बिहार में बूचड़खाने सरकार की मदद से चल रहे हैं। मोदी ने यह भी कहा कि बूचड़खानों के लिए 1995 में बनाए गए कानून में संशोधन होना चाहिए।

गौरतलब है कि यूपी में भाजपा की सरकार बनते ही अवैध बूचड़खानों को बंद किया जा रहा है। 31 मार्च के बाद वहां बूचड़खानों के लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा। साथ ही वहां सभी जिलाधिकारियों को एंटी रोमियो स्क्वॉयड बनाने का आदेश दिया गया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


यूपी में विधिवत शुरू हुआ ‘योगीराज’

यूपी में योगीराज की विधिवत शुरुआत हो गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नई कैबिनेट ने शपथ ले ली। राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री और उनके कैबिनेट व राज्य मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के पूर्व मेयर दिनेश शर्मा ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में आयोजित शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत 13 राज्यों के मुख्यमंत्री, 15 केंद्रीय मंत्री और दर्जनों सांसद मौजूद रहे। परंपरा निभाते हुए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी शपथग्रहण समारोह में शामिल हुए।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री समेत कुल 49 सदस्यीय मंत्रिमंडल में कुल 17 ओबीसी, 8 ब्राह्मण, 8 कायस्थ-वैश्य, 7 ठाकुर, 6 अनुसूचित जाति और 2 जाट को जगह मिली है। 403 में से एक भी सीट पर किसी मुस्लिम को उम्मीदवारी न देने वाली भाजपा ने मंत्रिमंडल में एक मुस्लिम चेहरे को भी रखा है। वहीं, ओबीसी मंत्रियों में एक यादव को जगह मिली है। यादव और मुस्लिम के इन सांकेतिक चेहरों को राज्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह का नाम आश्चर्यजनक रूप से मंत्रियों की सूची में नहीं है। हां, लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन अपना स्थान बनाने में जरूर सफल रहे। महिलाओं में कांग्रेस से आईं रीता बहुगुणा जोशी ने कैबिनेट मंत्री के तौर पर तो महज कुछ महीने पहले और वो भी आकस्मिक रूप से राजनीति में आईं स्वाति सिंह ने स्वतंत्र प्रभार वाली राज्य मंत्री के तौर पर अपनी जगह बनाई।

बहरहाल, योगी कैबिनेट में स्थान पाने वाले कैबिनेट मंत्रियों के नाम इस प्रकार हैं – सूर्य प्रताप शाही, सुरेश खन्ना, स्वामी प्रसाद मौर्य, सतीश महाना, राजेश अग्रवाल, रीता बहुगुणा जोशी, दारा सिंह चौहान, धर्मपाल सिंह, एस. पी. सिंह बघेल, सत्यदेव पचौरी, रमापति शास्त्री, जय प्रकाश सिंह, बृजेश पाठक, ओम प्रकाश राजभर, लक्ष्मी नारायण चौधरी, चेतन चौहान, श्रीकांत शर्मा, राजेन्द्र प्रताप सिंह (मोती सिंह), सिद्धार्थ नाथ सिंह, मुकुट बिहारी वर्मा, आशुतोष टंडन और नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’।

स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री के तौर पर जिन लोगों को स्थान मिला, वे हैं – अनुपमा जायसवाल, सुरेश राणा, उपेंद्र तिवारी, महेंद्र सिंह, स्वतंत्रदेव सिंह, भूपेंद्र सिंह चौधरी, धरम सिंह सैनी, स्वाति सिंह और अनिल राजभर। वहीं राज्य मंत्री के रूप में गुलाब देवी, बलदेव औलख, अतुल गर्ग, संदीप सिंह, मोहसिन रजा, अर्चना पाण्डे, रणवेंद्र प्रताप सिंह (घुन्नी सिंह), मन्नु कोरी, ज्ञानेंद्र सिंह, जय प्रकाश निषाद, गिरीश यादव, संगीता बलवंत, नीलकंठ तिवारी, जयकुमार सिंह जैकी और सुरेश पासी को जगह मिली।

                                                                                ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ.ए. दीप

सम्बंधित खबरें


योगी को मिला यूपी, साथ में दो ‘डिप्टी’ भी

हवा में तैर रहे कई नामों को एक झटके में किनारे कर भाजपा आलाकमान ने ‘फायरब्रांड’ सांसद योगी आदित्यनाथ को यूपी की कमान सौंप दी। शनिवार को विधायक दल की बैठक में उन्हें औपचारिक तौर पर नेता चुन लिया गया। बतौर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के चयन के साथ ही यूपी भाजपा के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के पूर्व मेयर दिनेश शर्मा के रूप में दो उपमुख्यमंत्री बनाने की घोषणा भी की गई। सत्ता के शीर्ष पर दो अगड़ों (योगी राजपूत हैं और शर्मा ब्राह्मण) के साथ एक पिछड़े (ओबीसी मौर्य) को आगे कर जातिगत समीकरण साधने की भी भरसक कोशिश की गई है।

उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत के रूप में राजपूत चेहरा चुनने के बाद ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि यूपी में गैर सवर्ण सीएम चुना जाएगा। इस लिहाज से केशव प्रसाद मौर्य रेस में आगे निकलते दिख रहे थे, लेकिन यूपी में हिन्दुत्ववादी राजनीति का चेहरा होना योगी आदित्यनाथ के पक्ष में गया। पार्टी आलाकमान ने शनिवार सुबह अचानक योगी को दिल्ली बुला लिया। इसके बाद राज्य भर में ये ख़बर फैलते देर न लगी कि योगी ही प्रदेश के मुखिया होने जा रहे हैं।

गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ का मूल नाम अजय सिंह है। उनका जन्म 5 जून 1972 को वर्तमान उत्तराखंड के गढ़वाल में हुआ था। उन्होंने 22 साल की उम्र में संन्यास लिया और 26 साल की उम्र में गोरखपुर से सांसद बने। 1998 से 2014 के बीच वे इस सीट से लगातार पांच बार लोकसभा पहुंचे। लव जिहाद और धर्मांतरण जैसे मुद्दों से चर्चा में रहने वाले गोरखपुर मंदिर के महंत योगी का पूर्वांचल में अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसके अतिरिक्त भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व में पहुंच का भी उन्हें लाभ मिला।

अब बात करें केशव प्रसाद मौर्य की। 7 मई 1969 को कौशांबी जिले में जन्मे मौर्य वर्तमान में फूलपुर से सांसद हैं। विश्व हिन्दू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के करीबी रहे मौर्य ने एक समय चाय और अखबार भी बेचा है। कार्यकर्ताओं में उनकी अच्छी पहुंच मानी जाती है और संघ से उनके अच्छे रिश्ते हैं। उन्हें जातिगत समीकरणों और प्रमुख पिछड़ा चेहरा होने का अतिरिक्त लाभ भी मिला। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके नेतृत्व में ही पार्टी ने यूपी की सत्ता में वापसी की है।

दूसरे उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा का जन्म 12 फरवरी 1964 को हुआ था। वे लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। 2008 और 2012 में वे लखनऊ के मेयर रहे। 2014 में उऩ्हें भाजपा का राष्ट्रीय सदस्यता प्रभारी बनाया गया। भाजपा सदस्यों की संख्या 1 करोड़ से 11 करोड़ तक पहुंचाने में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। उनकी छवि साफ-सुथरी और मिलनसार है और नरेन्द्र मोदी व अमित शाह दोनों के वे करीबी माने जाते हैं। संघ से भी उनका जुड़ाव रहा है और पार्टी के ब्राह्मण चेहरे तो वो हैं ही।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें