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‘वेश्या’ कहने के जवाब में ‘बेटी को पेश करो’ का नारा

पिछले कुछ दशकों में राजनीति में किस कदर गिरावट आई है, अब ये चर्चा का विषय नहीं रहा। अब तो आलम यह है कि राजनीति के दंगल में उतरने वाला हर खिलाड़ी और अधिक ‘गिरने’ का कोई नया फार्मूला साथ लाता है, तभी उसकी ‘दूकान’ चल पाती है। पहले राजनीति को धर्म माना जाता था। राजनीतिज्ञ नीति-सिद्धांतों का सहारा लेकर मुद्दों पर तकरार करते थे, लेकिन हाल के वर्षों में ये धर्म, संप्रदाय, जाति से व्यक्ति स्तर पर उतर चुका है। नेता जनहित के मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का सहारा लेने से जरा भी गुरेज नहीं करते। व्यक्तिगत टिप्पणी के साथ-साथ बड़ी बेशर्मी से परिवार को भी निशाना बनाया जा रहा है। इसी का ताजा नतीजा मायावती-दयाशंकर सिंह विवाद है।

दरअसल, हाल के दिनों में जिन नेताओं ने बसपा छोड़ी थी, उन्होंने मायावती पर टिकट बेचने के आरोप लगाए थे। इसी मुद्दे पर मायावती को घेरने की कोशिश में उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने उनकी तुलना ‘वेश्या’ से कर दी। अगर वो मायावती पर केवल भ्रष्टाचार के आरोप लगाते तो बात कुछ और थी, लेकिन ‘अपशब्द’ का प्रयोग कर उन्होंने राजनीतिक मर्यादा की जिस तरह धज्जी उड़ाई उसकी निंदा पूरे देश ने की। हाल की चुनावी सफलताओं से उत्साहित भाजपा की गर्दन अपने एक वरिष्ठ पदाधिकारी की करतूत से झुक गई। दयाशंकर सिंह को पार्टी से निकाल देने के बावजूद उसकी गर्दन उठती नज़र ना आ रही थी। यूपी में उसकी भावी संभावनाओं पर ग्रहण-सा लगता दिखने लगा।

मायावती ने इस जलते तवे पर रोटी सेकने में जरा भी देर नहीं की। उन्होंने संसद में ललकार कर कहा कि यदि लोग (यानि उनके समर्थक और कार्यकर्ता) सड़कों पर उतर आएं तो ये उनकी जिम्मेदारी नहीं होगी। लोग सचमुच सड़कों पर उतरने भी लगे थे। मायावती के लिए ये मुद्दा किसी ‘संजीवनी’ से कम नहीं था। लेकिन हाय री मर्यादा, दयाशंकर सिंह ने तो उसे तार-तार किया ही था, मायावती की पार्टी ने तो उसका रेशा-रेशा निकाल कर रख दिया। बसपा महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने बड़ी निर्लज्जता से इस पूरे मामले में दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी को घसीट लिया। पार्टी के लोग “दयाशंकर की बेटी को पेश करो” जैसे अभद्र नारे तक लगाने में नहीं हिचके।

अपने लोगों की इस शर्मनाक हरकत के बाद की स्थिति को जब तक मायावती समझ और सम्भाल पातीं तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह उनसे पूछ रही थीं कि उन्हें उनके पति के शब्दों पर आपत्ति हुई तो क्या उनकी बेटी को पेश करने का नारा गलत नहीं था? मायावती और उनकी पार्टी के नेता बताएं कि मैं अपनी बेटी कहाँ पेश करूँ? स्वाति के इन सवालों का जवाब मायावती दें भी तो क्या? राजनीति की माहिर खिलाड़ी ‘बहनजी’ को दयाशंकर सिंह की गृहिणी पत्नी पटखनी दे चुकी थीं। कल तो जो लोग बसपा सुप्रीमो के पक्ष में खड़े नजर आ रहे थे, अब वही दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी के खेमे में दिख रहे थे। अपने प्रति जिस ‘सहानुभूति’ को मायावती वोट में तब्दील करने की जुगत में थीं वो उनसे छिटक कर स्वाति के आँचल से जा लगी थी।

दरअसल, स्वाति सिंह ने पूरे मामले को नारी अस्मिता से जोड़कर मायावती को उन्हीं की चाल से मात दे दी है। स्वाति सिंह पॉक्सो एक्ट के तहत अपने पति दयाशंकर सिंह, मायावती और नसीमुद्दीन सिद्दिकी पर एक जैसी कार्रवाई की मांग कर रही हैं। ऐसा नहीं होने पर उन्होंने धरने पर बैठने की चेतावनी दी है। स्वाति सिंह के इस कदम ने मायावती के सारे गणित को धता बता दिया है। कभी अपने बड़बोले बयानों और राजनीतिक तिकड़मों से विरोधियों के नाक में दम कर देने वाली मायावती आज स्वाति सिंह के इस पत्ते के आगे बेबस नजर आ रही हैं।

हमदर्दी का सैलाब जिस तरह स्वाति सिंह की ओर बह रहा है उसे देख मायावती की बौखलाहट बढ़ना स्वाभाविक है। आनन-फानन में लखनऊ पहुंचकर उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की क्लास लगाई है। मामले में कुछ नेताओं पर बिजली गिरने के भी संकेत मिल रहे हैं और पार्टी अब बचाव के लिए नई रणनीति तैयार कर रही है। इधर, भाजपा भी अब अपने ‘निर्वासित’ नेता के बचाव में खुलकर सामने आ गई है। यूपी भाजपा ने हाईकमान से दयाशंकर सिंह के निष्कासन को रद्द करने की मांग की है।

आने वाले वक्त में इस राजनीतिक उठा-पटक के कई और रंग देखने को मिलने वाले हैं। लेकिन, फिलहाल एक बात तो साफ हो गई है कि घर संभालने वाली साधारण सी महिला स्वाति सिंह ने कई बार यूपी को संभाल चुकीं मायावती को चारो खाने चित कर दिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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जरा सोचिए क्या होता अगर अमिताभ ना होते !

अमिताभ बच्चन के ‘होने’ पर ना जाने कितनी बातें हुई हैं और कितनी होंगी, पर क्या आपने कभी सोचा कि अमिताभ बच्चन ना होते तो क्या होता..? चलिए जरा सोच कर देखते हैं। अमिताभ अगर ना होते तो शायद हिन्दुस्तान संवादों में बात नहीं करता। डायलागबॉजी एक पूर्णत: विकसित कला नहीं होती। चार यार-दोस्तों या अजनबियों के सामने अपनी बात रखते वक्त हमारी आवाज भारी होकर ‘बैरीटोन’ नहीं होती। आलोचनाओं के परे भी जाया जा सकता है, यह सिखाने के लिए कोई नहीं होता। अगर अमिताभ बच्चन नहीं होते तो हमारे पास, हमारी फिल्मों के पास, हमारे देश के पास सचमुच बहुत कुछ नहीं होता।
सबसे पहले तो शायद यह होता कि किसी कवि या लेखक का लड़का हीरो बनने का सपना नहीं देखता। या उससे पहले यह होता कि कोई साधारण नैन-नक्श वाला हद से ज्यादा लंबा और पतला एक नौकरीपेशा नौजवान फिल्मों में हीरो बनने के बारे में सोचकर खुद पर हंसता और फिर इसे भूल जाता। जी हाँ, बच्चन नहीं होते, तो रेडियो में आवाज का रिजेक्ट होना ‘कूल’ नहीं होता। राजेश खन्ना के बाद अगला सुपरस्टार सीधे शाहरुख खान को होना होता। चालीस सालों तक कोई कमर्शियल इंटरटेनमेंट की विधा को रॉकस्टार अंदाज में इतना नहीं साध पाता। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और ‘क्या आप पांचवी पास से तेज हैं’, में कोई अंतर नहीं होता।

हॉलीवुड के रॉबर्ट डि नीरो, अल पचीनो, मार्लन ब्रांडो, क्लिंट ईस्टवुड, शॉन कॉनरी, हैरीसन फोर्ड का जवाब देने के लिए हमारे पास कोई अभिनेता नहीं होता। अमिताभ बच्चन नहीं होते, तो हीरो की बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से हमारी पहली मुलाकात गोविंदा ही कराते और हम कभी भी आईने के सामने खड़े होकर शराबी की तरह नहीं बहक पाते। बच्चन नहीं होते, तो तमाम तरह के आरोप लगाने के बावजूद हर निर्देशक का सपना उनके साथ काम करना नहीं होता। अभिनय ‘मेथड’ है या ‘नेचुरल’, हम इसी फेर में पड़े रह जाते।

बच्चन नहीं होते, तो नाम की तरह लिखे जाने वाले हमारे कुछ गिने-चुने सरनेमों में से एक कम हो जाता। हमारे पिता की पीढ़ी सफेद फ्रैंच कट दाढ़ी को नहीं अपनाती। सफेद शॉल फैशन नहीं बन पाती। तीन-चार पीढ़ियों को मिमिक्री का शौक नहीं लगता और हर शहर में बच्चन के बहरूपिये नहीं होते।

अगर बच्चन नहीं होते, तो हर बदलते वक्त में खुद को बदलने की अद्भुत क्षमता रखने वाले कलाकार से हमारा परिचय कभी नहीं हो पाता। री-इनवेंट कैसे किया जाता है अभिनय में, एक्टिंग क्लासों में नहीं सिखाया जा पाता, क्योंकि संदर्भ देने के लिए बच्चन नहीं होते। ‘मधुशाला’ महान ग्रंथ होता, लेकिन जनमानस में वैसे अंकित नहीं होता, जैसे अब है। एक कवि और उसकी कविताओं को नई टेक नहीं मिलती, नया आयाम नहीं मिलता, अगर उन कविताओं के साथ अमिताभ बच्चन नहीं होते।

अगर बच्चन नहीं होते तो हमें शाहरुख खान का इंतजार करना पड़ता यह समझने के लिए कि हर अभिनेता केवल फिल्मों में नहीं, हर वक्त अभिनय करता है। जहां कहीं भी जीवित मनुष्य पाया जाता है, अभिनेता अपनी ‘भूमिका’ में आ जाता है।

अगर बच्चन नहीं होते, हमें यह भी कम समझ आता कि राजनीति क्यूं हर किसी के बस की नहीं है। गांधी परिवार और बच्चन परिवार के बीच क्या बचा है और कितना टूट गया है, हमें कभी पूरा पता नहीं चलेगा, यह भी समझ नहीं आता। उत्तर प्रदेश में अपराध होते रहते, लेकिन वे विज्ञापन नहीं होते जो मुस्कुराते हुए बच्चन को अपराध कम हैं, कहने को मजबूर करते।

अमिताभ बच्चन ना होते तो ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ अश्लील हो जाता और हमारी होली ‘रंग बरसे’ बिना ही बीत जाती। कुछ लोग इस कदर निराले हो जाते हैं अपने काम से, कि फिर वे भले ही खराब फिल्में करें और दर्जनों घटिया विज्ञापन, हमें फर्क नहीं पड़ता, ये भी हम नहीं सीख पाते, अगर बच्चन नहीं होते।

अगर अमिताभ बच्चन नहीं होते, हमारा सिनेमा अभिनय के उस अनोखे मिजाज से महरूम रह जाता, जो किसी भी देश के सिनेमा की पहचान बनता है। वह घटना हिन्दुस्तान के इतिहास में नहीं होती, जिसमें किसी अभिनेता की सेट पर हुई दुर्घटना के बाद पूरा देश मिलकर उसके लिए प्रार्थना कर रहा था। बच्चन नहीं होते, तो गरिमा से बोली जाने वाली हिंदी अपने अस्तित्व को खोने के डर में जीती और फिल्मों में अंग्रेजी भाषा के रिक्त स्थानों को भरने वाली भाषा बनकर रह जाती।

वे अफवाहें और गॉसिप नहीं होतीं, जिसमें बच्चन होते। अमिताभ बच्चन रिटायर कब होंगे? क्या बच्चन विग पहनते हैं? सलमान खान को वे पसंद करते हैं या नहीं? रेखा से अभी भी बात-मुलाकात होती होगी क्या? बच्चन नहीं होते, तो हम यह भी नहीं सोचते कि सत्तर का हो जाने पर कौन-सा ‘खान’ उनके स्तर को छू पाएगा। कोई भी नहीं, हम यह भी नहीं कह पाते। ‘लिविंग लिजेंड’ जैसे शब्द को तमगा बनकर टंगने के लिए आदमी नहीं मिलता। देश को इकलौता ‘एंग्री यंग मैन’ नहीं मिलता। अमिताभ बच्चन नहीं होते, तो फिल्में थोड़ी कम अपनी लगतीं। हमें यह सब लिखने के लिए उपयुक्त इंसान नहीं मिलता। हम और हमारा देश, जितने हैं उतने, फिल्मी नहीं होते।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 [‘सत्याग्रह में प्रकाशित शुभम उपाध्याय के एक आलेख पर आधारित] 

 

 

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भारतीय क्रिकेट का ‘विराट’ इतिहास रचते कोहली

विराट दिन-ब-दिन और विराट होते जा रहे हैं। कल भारतीय क्रिकेट के इस धूमकेतु ने वेस्टइंडीज की धरती पर 200 रन बनाने के साथ ही कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए। 1932 में भारतीय टीम को टेस्ट का दर्जा मिलने के बाद विदेशी धरती पर किसी भारतीय कप्तान का ये पहला दोहरा शतक है। इस शतक के साथ ही भारत ने 41 साल बाद वेस्टइंडीज के बेमिसाल खिलाड़ी और कप्तान क्लाइव लॉयड के उस दोहरे शतक का जवाब भी दे दिया जो उन्होंने साल 1975 में भारत में लगाया था।

विराट कोहली की ये पारी कई मायनों में खास है। उनकी इस पारी ने विदेश में 19 साल के उस सूखे को समाप्त कर दिया जो 1997 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सचिन तेन्दुलकर द्वारा बनाए गए 169 रनों के बाद से ही चला आ रहा था। सचिन के बाद कोई भी भारतीय कप्तान विदेशी धरती पर 150 के आंकड़े को पार नहीं कर पाया था। विराट कोहली ने अपने इस दोहरे शतक से कप्तान के तौर पर भी अपने दम-खम को साबित किया है। उनसे पहले साल 1990 में मोहम्मद अजहरूद्दीन ने कप्तान के रूप में ऑकलैंड में 192 रनों की शानदार पारी खेली थी।

दोहरे शतक की बात करें तो विराट कोहली से पहले भारतीय टीम के चार कप्तान दोहरा शतक जमा चुके हैं। नवाब पटौदी, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और महेन्द्र सिंह धोनी ने सैंकड़ा तो पार किया था लेकिन उन्होंने ये दोहरे शतक भारतीय धरती पर ही लगाये थे। एक कप्तान के तौर पर विराट कोहली वो पहले क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन्होंने ये कमाल विदेशी धरती पर कर दिखाया है। इसी के साथ विराट कोहली ने पूर्व भारतीय बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग का एक बड़ा रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया। इस पारी के बाद विराट भारत के लिए 12 टेस्ट शतक पूरे करने वाले दूसरे सबसे तेज बल्लेबाज बन गए हैं। वो सहवाग की 77 पारियों में 12 शतकों के रिकॉर्ड को तोड़कर उनसे आगे निकल गए हैं। कोहली ने ये उपलब्धि महज 72 पारियों में अपने नाम कर ली है।

इस शतक के साथ ही विराट कोहली ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 12 हजार रन भी पूरे कर लिए। ऐसा करने वाले वो आठवें भारतीय कप्तान बन गए हैं। विराट का ये 8वां शतक एशिया के बाहर है। वैसे अभी तक एशिया से बाहर सबसे ज्यादा शतक तेंदुलकर ने लगाया है। उन्होंने 18 शतक विदेशी धरती पर जड़े हैं। ये भी बता दें कि विराट कोहली ने कप्तान के रूप में विदेशी सरजमीं पर अब तक 12 पारियों में 76.27 की औसत से 839 रन बनाये हैं। उनसे बेहतर औसत सिर्फ महान बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन का है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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क्या प्रियंका हैं कांग्रेस की ‘संजीवनी’..?

मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी – ये सभी एक परिवार से जरूर हैं पर ‘परिवारवाद’ के तमाम आरोपों व आलोचनाओं के बावजूद सच यही है कि ये सारे नाम मिलकर कांग्रेस का ‘पर्याय’ लगते है। आप भले ही इसे आज की कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी कहें लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसे अब भी सांस, सम्बल और स्वीकार्यता मिलती है तो नेहरू-गांधी परिवार से ही।

बहरहाल, मोतीलाल नेहरू जिस समय अध्यक्ष थे उस समय कांग्रेस अपने मूल स्वरूप में थी और ‘परिवारवाद’ की कम-से-कम आज की तरह नग्न उपस्थिति तब नहीं थी। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते कांग्रेस में ‘संकुचन’ जरूर आने लगा लेकिन नेहरू का व्यक्तित्व इतना विराट था कि कमियां उसमें खो जाती थीं। इन्दिराजी के समय हालांकि कांग्रेस में ‘ई’ को चस्पां किया गया और असमय मृत्यु से पहले संजय गांधी ने इसे अपने तरीके से चलाना चाहा। फिर भी इन्दिराजी जो थीं अपने बूते थीं और अपने पिता के नाम और काम में उन्होंने कुछ जोड़ा ही, घटाया नहीं। उनके होने में ‘परिवार’ था लेकिन एक ‘विशेषण’ की तरह। हाँ, उनके बाद राजीव गांधी आए, फिर सोनिया गांधी आईं और अब अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी आने वाले हैं, तो मूल में (इन सबकी तमाम ‘योग्यताओं’ के बावजूद) परिवार ही था। बावजूद इसके समय-समय पर कांग्रेस को ‘संजीवनी’ इन्हीं से मिली है।

अब बात कांग्रेस के वर्तमान परिदृश्य की। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा की उठान से कांग्रेस अपनी ढलान पर तेजी से चल पड़ी है। तमाम तैयारी और तत्परता के बावजूद उपाध्यक्ष राहुल गांधी में वो परिपक्वता नहीं दिखती जो कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने के लिए अपेक्षित है। यही कारण है कि  कांग्रेस का एक बड़ा तबका, जो राहुल की सम्भावनाओं के साथ-साथ सीमाओं को भी जानता है, प्रियंका गांधी को सक्रिय भूमिका में लाने की वकालत कर रहा है। हालांकि ये तयप्राय है कि कांग्रेस के अगले अध्यक्ष राहुल ही होंगे, लेकिन इस तबके की सोच यह है कि राहुल के साथ प्रियंका के आ जाने से कांग्रेस को उसका खोया ‘एक्स’ फैक्टर मिल जाएगा।

हालांकि प्रियंका के लिए उठ रही मांग के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है कि पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए किसी एक व्यक्ति के पास जादुई छड़ी नहीं है। इसके लिए सम्मिलित प्रयास ही एकमात्र रास्ता है। सैद्धांतिक तौर पर जयराम रमेश गलत नहीं बोल रहे हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर सच्चाई क्या है, ये वो भी जानते हैं।

चलते-चलते बता दें कि यूपी के आगामी चुनाव के लिए कांग्रेस ने भले ही शीला दीक्षित पर दांव खेला है लेकिन वो चुनावी बिसात अपनी दादी की याद दिलाती प्रियंका के इर्द-गिर्द ही बिछाएगी, राजनीति के जानकार ये मानकर चल रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

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केजरीवाल के बहाने ‘ठुल्ला’ की पड़ताल

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से ‘ठुल्ला’ शब्द का अर्थ समझाने को कहा। बता दें कि केजरीवाल ने एक टेलीविजन चैनल पर चर्चा के दौरान दिल्ली पुलिस के लिए ठुल्ला शब्द का इस्तेमाल किया था। पुलिसकर्मी अजय कुमार तनेजा को ये संबोधन नागवार गुजरा और उन्होंने ‘आप’ नेता पर मानहानि का आपराधिक मुकदमा दायर कर दिया, जिस पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत ने केजरीवाल के लिए सम्मन जारी किया था।

सम्मन जारी करते हुए अदालत ने कहा था कि केजरीवाल का बयान प्रथमदृष्टया मानहानि का है और उन्हें 14 जुलाई को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था। केजरीवाल ने इसी संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। आज इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए मुक्ता गुप्ता ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेशी से छूट तो दे दी लेकिन साथ में यह भी कहा कि केजरीवाल को ‘ठुल्ला’ शब्द का अर्थ समझाना चाहिए, क्योंकि हिन्दी शब्दकोष में इस शब्द का उल्लेख नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि “यदि आप (केजरीवाल) किसी के लिए यह शब्द (ठुल्ला) इस्तेमाल करते हैं तो आपको इसका मतलब पता होना चाहिए। आपको न्यायालय को इस शब्द का अर्थ समझाना चाहिए।” इस मामले पर अगली सुनवाई अब 21 अगस्त को होगी।

केजरीवाल की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील एन. हरिहरण ने कहा कि ‘ठुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल सभी पुलिसकर्मियों के लिए नहीं, बल्कि गलत काम करने वाले पुलिसकर्मियों के लिए किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि इस शब्द का कोई मतलब नहीं है, इसलिए यह मानहानि से संबंधित नहीं है। लेकिन केजरीवाल के काबिल वकील ने यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि जब इस शब्द का कोई मतलब ही नहीं है तो फिर इस ‘निरर्थक’ शब्द का संबंध गलत काम करने वाले पुलिसकर्मियों से जोड़ने का क्या मतलब है?

बहरहाल, जब ‘ठुल्ला’ शब्द पर बहस दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुँच गई है तो क्यों ना इस शब्द की थोड़ी पड़ताल कर ली जाय। दरअसल ‘ठुल्ला’ एक तरह की कठबोली या स्लैंग (Slang) है। कठबोली किसी भाषा या बोली के उन अनौपचारिक शब्दों या वाक्यांशों को कहते हैं जो बोलने की भाषा या बोली में मानक तो नहीं माने जाते लेकिन बोलचाल में स्वीकार्य होते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली में पुलिसवालों को कठबोली में ‘ठुल्ला’ बोलते हैं और मुंबई में ‘मामा’। सिगरेट को ‘सुट्टा’ कहना, गाड़ी के मिस्त्री का गीयर के दाँत वाले पहियों को ‘गरारी’ कहना, बिना काम वाले को ‘निठल्ला’ कहना या फिर किसी के मरने पर कहना कि ‘टपक गया’ – कठबोली के ही उदाहरण हैं।

समाज या संगठन में ऊँचा दर्जा रखने वाले लोग खुली बातचीत में कठबोली का प्रयोग करने से कतराते हैं क्योंकि ये आमतौर पर संभ्रांत नहीं होती। लेकिन केजरीवाल तो केजरीवाल ठहरे। मुख्यमंत्री होकर जब वो धरने पर बैठ सकते हैं और पुलिसवालों को ‘ठुल्ला’ भी कह ही सकते हैं।

चलते-चलते:

इस क्रम में ये जानना दिलचस्प होगा कि पंजाब-हरियाणा के कुछ समुदायों में थानेदार या दारोगा के लिए ‘ठुल्ला’ शब्द का प्रयोग चार दशक पहले भी प्रचलित पाया गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अंतरिक्ष की नई महाशक्ति भारत

22 जून 2016 को सुबह करीब 9.15 बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी-सी 34) को सत्रह विदेशी उपग्रहों समेत कुल 20 सेटेलाइट के साथ अंतरिक्ष में भेजा। पीएसएलवी-सी 34 ने 26 मिनट 30 सेकेंड में सभी सेटेलाइट सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिए। प्रक्षेपित उपग्रहों में कॉर्टोसैट-2 सीरीज का पृथ्वी संबंधी सूचनाएं एकत्र करने वाला भारत का नया उपग्रह भी शामिल है। इसके अलावा दो उपग्रह भारतीय विश्वविद्यालयों के हैं। इनमें एक चेन्नई स्थित निजी विश्वविद्यालय का उपग्रह ‘सत्यभामा’ और दूसरा पुणे स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज का उपग्रह ‘स्वयम्’ है। शेष सत्रह उपग्रह अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और इंडोनेशिया के हैं। ये सारे विदेशी उपग्रह व्यावसायिक हैं और इनसे इसरो को कमाई होगी।

इसरो ने इससे पहले वर्ष 2008 में 10 उपग्रहों को पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में एक साथ प्रक्षेपित किया था। इस बार 20 उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित करके वो ऐसा करने वाले तीन देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है। इससे पहले ऐसा केवल अमेरिका और रूस ही कर पाए हैं।

बहरहाल, एक साथ 20 उपग्रह प्रक्षेपित करने और हाल में ही स्वदेशी स्पेस शटल के प्रक्षेपण के बाद दुनिया भर में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की धूम मची है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को प्रक्षेपित करने से मना कर दिया था। आज स्थिति यह है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक हैं। बता दें कि अमेरिका 20वां देश है जो कॉमर्शियल लॉन्च के लिए इसरो से जुड़ा है।

आज की तारीख में पूरी दुनिया में उपग्रहों के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं, इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्द्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं हैं क्योंकि कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की ताकत है। बता दें कि भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत ऐसे ही विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत की एक तिहाई भर है। बेहद कम लागत की वजह से अधिकांश देश स्वाभाविक तौर पर अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण करने के लिए भारत का रुख करेंगे। ऐसे परिदृश्य में अंतरिक्ष के क्षेत्र में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा।

वैसे भी मंगलयान और चंद्रयान -1 की बड़ी सफलता के साथ-साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का शतक लगाने के बाद इसरो का लोहा पूरी दुनिया मान ही चुकी है। चंद्रयान-1 को ही चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी मिला। भविष्य में इसरो उन सभी ताकतों को और भी टक्कर देने जा रहा है, जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रही हैं। भारत के पास साधन भले ही कम हों लेकिन प्रतिभाओं की बहुलता है। भारत द्वारा प्रक्षेपित उपग्रहों से मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर हम अब संचार, मौसम संबंधित जानकारी, शिक्षा, चिकित्सा में टेली मेडिसिन, आपदा प्रबंधन एवं कृषि के क्षेत्र में फसल अनुमान, भूमिगत जल के स्रोतों की खोज, संभावित मत्स्य क्षेत्र की खोज के साथ पर्यावरण पर भी नजर रख रहे हैं। भारत यदि इसी प्रकार अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

 

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क्यों हैं सलमान बॉलीवुड के ‘सुल्तान’?

‘मैंने प्यार किया’ का शर्मीला-सा प्रेम आज बॉलीवुड का ‘सुल्तान’ है। वो एक बार पूछ ले ‘हम आपके हैं कौन’ तो हिन्दी फिल्मों की सफलता के मापदंड बदल जाते हैं। जी हाँ, कोई ‘दबंगई’ करके भी आपका प्यार पा ले तो वो सलमान ही हो सकते हैं। बॉलीवुड की खान तिकड़ी के इस खान में ना आमिर वाली संजीदगी है, ना शाहरुख वाला जुनून, फिर ऐसा क्या है उसमें कि हर अगली फिल्म के साथ उसकी ‘सल्तनत’ और बड़ी हो जाती है? इस सवाल का जवाब अगर पाना हो तो आपको ‘सुल्तान’ देखनी चाहिए जिसने रिलीज के महज तीसरे दिन 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर इतिहास रच दिया है।

आज के दर्शक जो पहले से ज्यादा व्यस्त और चतुर हैं और जिनके पास मनोरंजन के लिए सैकड़ों चैनल और हजारों साइट्स हैं, उन्हें सिनेमा हॉल तक खींच लाना और उनके पॉकेट से पैसे निकलवा लेना कतई साधारण बात नहीं। ऐसे में सुल्तान ‘सलमान’ की दसवीं फिल्म है जिसने 100 करोड़ का आंकड़ा पार किया है। 100 करोड़ के क्लब में शामिल उनकी इससे पहले की नौ फिल्में हैं – दबंग (2010), रेडी (2011), बॉडीगार्ड (2011), एक था टाइगर (2012), दबंग-2 (2012), जय हो (2014), किक (2014), बजरंगी भाईजान (2015) और प्रेम रतन धन पायो (2016)।

हिन्दी फिल्मों में 100 करोड़ क्लब को सलमान क्लब कह दें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी और इसकी वजह बेहद साफ है। सलमान ने जहाँ ये कमाल दस बार दिखाया है वहीं शाहरुख छह, अक्षय कुमार और अजय देवगन पाँच-पाँच, आमिर खान चार और रितिक रोशन केवल तीन ही बार ऐसा कर पाए हैं।

बहरहाल, सलमान की फिल्म ‘सुल्तान’ ने भारत में तीन दिनों में कुल 105 करोड़ की कमाई की है। इसने पहले दिन 36.54 करोड़, दूसरे दिन 37.50 करोड़ और तीसरे दिन 31.50 करोड़ कमाए और इसके साथ ही कई रिकॉर्ड ध्वस्त कर डाले। ये फिल्म सलमान की ऐसी पहली बड़ी फिल्म बन गई है जिसने तीन दिनों में 105 करोड़ की कमाई की। इससे पहले ‘बजरंगी भाईजान’ ने तीन दिनों में 102 करोड़ और प्रेम रतन धन पायो ने तीन दिनों में 101 करोड़ की कमाई की थी। 2016 की बात करें तो सुल्तान से पहले ‘एयरलिफ्ट’ के नाम तीन दिनों में सबसे ज्यादा कमाई का रिकार्ड था। ‘एयरलिफ्ट’ ने तीन दिन में 83.50 करोड़ कमाए थे।

स्पोर्ट्स पर बनने वाली फिल्मों की बात करें तो उस लिस्ट में भी ‘सुल्तान’ सबसे ऊपर दर्ज हो गई है। फरहान अख्तर की ‘भाग मिल्खा भाग’ ने पहले तीन दिन में 52.44 करोड़ की कमाई की थी और प्रियंका चोपड़ा की ‘मैरी कॉम’ की पहले तीन दिन की कमाई 12.7 करोड़ थी।

सबसे खास बात ये कि इस फिल्म को केवल सलमान के प्रशंसक ही नहीं आम दर्शक और फिल्म समीक्षकों ने भी अच्छा बताया है। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो इसे सलमान खान के कैरियर की सबसे बेहतरीन फिल्म मान रहे हैं। इसमें बहुत मेहनत से बनाई गई सलमान की बॉडी है, थिरकने को मजबूर कर दने वाले गाने हैं, आकर्षक अनुष्का हैं, रणदीप हुड्डा की ट्रेनिंग है, सांस रोक देने वाले फाइट सीन्स हैं, पर बॉलीवुड के सारे मसालों के बीच भी जो चीज आपको सबसे ज्यादा छूती है वो है सलमान का अभिनय। ‘बजरंगी भाईजान’ से सलमान ने जो सफर शुरू किया वो ‘सुल्तान’ से आगे बढ़ा है। इस फिल्म ने तीन दिन में कितने कमाए उससे अधिक महत्व सलमान के प्रशंसकों के लिए इस बात का है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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“मुझसे बड़ा एक्टर और कौन है”: लालू प्रसाद यादव

मौजूदा दौर के मंझे हुए अभिनेता इरफान खान कल ईद के दिन अपनी फिल्म ‘मदारी’ के प्रमोशन के लिए पटना में थे। इस दौरान उन्होंने आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। अपने खास अंदाज के लिए मशहूर लालू ने इस मौके पर इरफान को ईद की बधाई देने के साथ-साथ उन्हें फिल्म हिट करने के ‘टिप्स’ भी दिए और आखिर में अपने इस दावे से इरफान को लाजवाब कर दिया कि मुझसे बड़ा एक्टर और कौन है?

बहरहाल, फिल्म में अपने किरदार को ध्यान में रख इरफान लालू से मिलने डमरू के साथ आए थे। मजे की बात यह कि लालू ने उस डमरू को बजाया भी। एक तो ईद का माहौल और उस पर मस्तमौला लालू। उन्होंने ये भी कह ही डाला कि मुझ पर अगर फिल्म बनी तो मैं ही मेन रोल में रहूँगा। मुझसे अच्छी एक्टिंग कोई नहीं कर सकता। हाँ, अभिनेत्री कौन रहेगी, इसका फैसला इरफान कर सकते हैं।

लालू ने इरफान को ‘टिप्स’ देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने इरफान को सलाह देते हुए कहा कि आम आदमी को फोकस करती हुई फिल्मों में काम करिए, फिल्म सुपर हिट हो जाएगी। देश में आम आदमी सबसे ज्यादा परेशान है। इतने कानून बने, लेकिन आम आदमी को न्याय नहीं मिला। केन्द्र सरकार ने भी उनकी उपेक्षा की है। जातीय जनगणना रिपोर्ट में हर तरह से ‘पिछड़े’ आम आदमी का खुलासा नहीं किया गया है, जबकि गाय-भैंस-बकरी सबकी संख्या बता दी गई है।

बता दें कि इरफान की फिल्म ‘मदारी’ 22 जुलाई को रिलीज होने वाली है। इरफान ने बताया कि इस फिल्म में एक व्यक्ति के ‘जमूरा’ से ‘मदारी’ बनने की कहानी दिखाई गई है, जिसमें एक आम आदमी के संघर्ष की झलक देखी जा सकती है। इसमें किसी राज्यविशेष पर फोकस नहीं है बल्कि यह फिल्म सिस्टम की खामियों को दिखाती है।

चलते-चलते:

अब ये लालूजी से कौन पूछे कि जब अपने ऊपर बनने वाली फिल्म में हीरो वो खुद रहेंगे तो अभिनेत्री का फैसला उन्होंने इरफान पर क्यों छोड़ा? राबड़ीजी राज्य चला सकती हैं तो क्या उनकी सरपरस्ती में अभिनेत्री का किरदार नहीं निभा सकतीं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल: किसका बढ़ा कद, किससे छिना पद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल अपने मंत्रिमंडल में बहुप्रतीक्षित फेरबदल करते हुए कैबिनेट में 19 नए मंत्रियों को शामिल किया। इसके साथ ही कई मंत्रियों के विभागों में भी बड़ा फेरबदल किया गया। स्मृति ईरानी से मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कार्यभार लेकर उन्हें कम महत्व वाले कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी दे दी गई वहीं अब तक पर्यावरण मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कद बढ़ाते हुए उन्हें यह अहम मंत्रालय सौंपा गया।
कैबिनेट में उठापटक के बाद संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद भी ताकतवर बनकर उभरे हैं। सदानंद गौड़ा से लेकर उन्हें कानून मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। गौड़ा अब सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का काम देखेंगे। वहीं शहरी विकास मंत्री एम वैंकेया नायडू को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया है। हालांकि उनसे संसदीय कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी वापस ले ली गई है। यह जिम्मेदारी अब रसायन एवं उर्वरक मंत्री अनंत कुमार संभालेंगे।
एक अन्य बदलाव के तहत नरेन्द्र सिंह तोमर को ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया है। इस विभाग को अब तक हरियाणा के जाट नेता चौधरी बीरेन्द्र सिंह देख रहे थे। अब बीरेन्द्र सिंह इस्पात मंत्रालय देखेंगे। पहले यह मंत्रालय तोमर के पास था। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा को वित्त मंत्रालय से हटाकर नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री बनाया गया है। इस पद पर अब तक महेश शर्मा थे। शर्मा अब सिर्फ संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालेंगे।
मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए चेहरों में विजय गोयल, एमजे अकबर, एसएस अहलूवालिया, अनुप्रिया पटेल (अपना दल) और रामदास अठावले (आरपीआई) के नाम महत्वपूर्ण हैं। विजय गोयल को युवा मामलों एवं खेल मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार का राज्य मंत्री बनाया गया है। असम का ‘सिंहासन’ मिलने से पहले इस मंत्रालय को सर्वानंद सोनोवाल सम्भाल रहे थे। एमजे अकबर को विदेश राज्य मंत्री बनाया गया है। बता दें कि विदेश मंत्रालय में वीके सिंह एक अन्य राज्य मंत्री हैं।
मंत्रिमंडल विस्तार में प्रधानमंत्री मोदी ने दलित चेहरों को खास तवज्जो दी है। आरपीआई के अठावले (महाराष्ट्र) के अतिरिक्त कल शामिल किए गए मंत्रियों में अजय टम्टा (उत्तराखंड), अर्जुन राम मेघवाल (राजस्थान), कृष्णा राज (उत्तर प्रदेश) और रमेश सी जीगाजिनगी (कर्नाटक) भी दलित समुदाय से आते हैं। वैसे इस विस्तार में मोदी की नज़र उन राज्यों पर भी रही है जहाँ आगे चुनाव होने हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश से जहाँ तीन-तीन वहीं राजस्थान से चार मंत्री कैबिनेट में शामिल किए गए हैं।
कल के फेरबदल में पाँच मंत्रियों को बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा है। कैबिनेट से बाहर किए गए पाँच मंत्री हैँ – रसायन और उर्वरक मंत्री निहाल चंद, मानव संसाधन राज्य मंत्री रामशंकर कठेरिया, आदिवासी कल्याण राज्य मंत्री मनसुख भाई वसावा और जल संसाधन राज्य मंत्री सांवर लाल जाट। वहीं हटाए जाने की तमाम अटकलों के बावजूद नजमा हेपतुल्ला, कलराज मिश्र और गिरिराज सिंह अपना मंत्रीपद बचाने में सफल रहे।
अन्त में एक बार फिर बात स्मृति ईरानी की। ‘महत्वहीन’ कपड़ा मंत्रालय दिए जाने के बाद जहाँ ये माना जा रहा है कि उनका कद घटा दिया गया है, वहीं ये कयास लगाने वालों की भी कमी नहीं है कि स्मृति को 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भाजपा के प्रचार का चेहरा बनाया जा रहा है और इसी कारण उन्हें यह ‘महत्वहीन’ मंत्रालय दिया गया है ताकि वो प्रचार के लिए ज्यादा वक्त निकाल सकें।
मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सातवें वेतन आयोग की सौगातें, जानिए खास बातें

केन्द्रीय कैबिनेट ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है। इन सिफारिशों के तहत केन्द्रीय कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में 23.5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की जाएगी। इसमें बेसिक सैलरी में 14.27 प्रतिशत और भत्तों में 67 प्रतिशत का इजाफा शामिल है। जबकि पेंशनधारकों को 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी दी जाएगी। खास बात यह कि इन सिफारिशों में वेतन में 3 प्रतिशत सालाना बढ़ोतरी को भी बरकरार रखा गया है।

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2016 से लागू होंगी। इसका अर्थ यह है कि कर्मचारियों का बढ़ा हुआ वेतन 1 जनवरी से जोड़ा जाएगा और उसका भुगतान एरियर के रूप में होगा। इन सिफारिशों के लागू होने से 50 लाख कर्मचारी और 58 लाख पेंशनधारी सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे।

वेतन आयोग की इन सिफारिशों से सरकार के खजाने पर करीब 1.02 लाख करोड़ रुपए का सालाना बोझ बढ़ेगा, जबकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2016-17 के आम बजट में पे-कमीशन लागू करने के लिए 70,000 करोड़ रुपए का प्रावधान ही किया था। यह भी जानें कि इस 1 लाख करोड़ रुपए के बोझ में से 28,450 करोड़ रुपए से अधिक का बोझ रेलवे बजट और शेष 73,450 करोड़ रुपए का बोझ आम बजट पर आएगा।

बता दें कि वेतन आयोग ने कर्मचारियों के लिए न्यूनतम 18,000 रुपए प्रतिमाह और अधिकतम (कैबिनेट सचिव और इस स्तर के अधिकारी के लिए) 2,25,000 रुपए की सिफारिश की थी। इसके अनुसार अब तक 90,000 रुपए प्रति माह कमाने वाले अधिकारी को अब ढाई गुना से ज्यादा वेतन मिलेगा। पर सचिवों की अधिकार प्राप्त समिति इससे भी संतुष्ट नहीं है। समिति ने 18,000 रुपए के स्थान पर करीब 23,500 रुपए और 2,25,000 रुपए के स्थान पर 3,25,000 रुपए करने की सिफारिश की है।

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें बेसिक पे मामले में पिछले सात दशक में सबसे कम वृद्धि की सिफारिश की गई है। इसके बावजूद यह भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 प्रतिशत है।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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