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क्या सिनेमाहॉल में बजने से बढ़ जाएगा राष्ट्रगान का सम्मान ?

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने एक अहम फैसले में देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ को बजाना अनिवार्य कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि  राष्ट्रीय गान बजाते समय सिनेमाहॉल के पर्दे पर राष्ट्रीय ध्वज भी दिखाना होगा और हॉल में मौजूद सभी लोगों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश एक जनहित याचिका पर आया है जिसे मध्यप्रदेश निवासी श्याम नारायण चौकसे ने दायर की थी।

गौरतलब है कि इससे पूर्व सिनेमाहॉल संचालक अपने विवेकानुसार राष्ट्रगान बजाने या न बजाने का फैसला करते थे। कहीं राष्ट्रगान फिल्म शुरू होने से पहले बजाया जाता था तो कहीं खत्म होने के बाद और कई हॉल ऐसे भी थे जहाँ इसे बजाया ही नहीं जाता था। अब सुप्रीम कोर्ट न केवल इसे बजाना अनिवार्य करने के साथ-साथ इसका वक्त भी निर्धारित कर दिया है, बल्कि इससे संबंधित अन्य दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। मसलन, राष्ट्रगान के दौरान सिनेमाहॉल के दरवाजे पूरी तरह बंद रखे जाएंगे ताकि लोगों का हॉल में आना-जाना न चलता रहे। एक अन्य निर्देश के मुताबिक राष्ट्रगान के दौरान खड़ा होना अनिवार्य है लेकिन जो लोग शारीरिक या किसी अन्य मजबूरी के चलते खड़े होने की स्थिति में न हों, वे बैठकर भी राष्ट्रगान में हिस्सा ले सकते हैं।

व्यावहारिक तौर पर देखा जाय तो इससे पूर्व कई जगहों और अवसरों पर राष्ट्रगान या राष्ट्रीय ध्वज के प्रति यथोचित सम्मान न प्रदर्शित करने और उसके बाद उपजी अप्रिय स्थितियों की ख़बरें आती रही हैं। ऐसे में राष्ट्रगान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के इस नए और स्पष्ट फैसले के बाद क्या यह उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्रगान के समय किसी तरह की अव्यवस्था या असमंजस की स्थिति नहीं बनेगी? सिनेमाहॉल के संचालक और कर्मचारी ही नहीं, दर्शक भी (जिनमें बच्चे भी शामिल होंगे) राष्ट्रगान के लिए मानसिक रूप से सजग और सतर्क रहेंगे?

यह सच है कि राष्ट्रगान या राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों के प्रति सम्मान सुनिश्चित करना हमारे राष्ट्रीय दायित्व का हिस्सा है, लेकिन हमें इन पर जरूरत से ज्यादा जोर देने को लेकर सचेत रहना चाहिए। देशभक्ति हमारे अन्दर से उपजती है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे जबरन किसी पर थोपा जा सके। हमारे रोजमर्रा की ज़िन्दगी में यह अनेक रूपों में प्रकट होती रहती है, ठीक वैसे ही जैसे मन्दिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारे जैसे धार्मिक प्रतीकों के प्रति या माता-पिता-गुरु जैसे श्रद्धेय जनों के प्रति। यह व्यवहार से ज्यादा संस्कार की चीज है। हाँ, राष्ट्रीय संकट की स्थिति में इसके रूप अलग जरूर हो सकते हैं।

एक बात और, राष्ट्रीय प्रतीकों के लिए सम्मान दर्शाना अगर मजबूरी हो जाए तो वह धीरे-धीरे रस्म-अदायगी का रूप ले सकता है। सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजने की व्यवस्था अतीत में छोड़ी भी इसीलिए गई थी। बेहतर होगा कि एक विकसित समाज बनने की प्रक्रिया में हम प्रतीकात्मकता से ऊपर उठकर देशभक्ति को एक आंतरिक मूल्य के रूप में जिएं। वैसे भी जिन फिल्मों को आप परिवार के साथ देखने की स्थिति में नहीं होते, और आजकल सौ में से नब्बे फिल्में ऐसी ही होती हैं, उन फिल्मों से पहले राष्ट्रगान का बजना उसका सम्मान होगा या अपमान..? सर्वोच्च न्यायालय ने इस पहलू पर क्यों नहीं सोचा, ये समझ से परे है..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भाजपा ने बदली बिहार और दिल्ली की कमान

भाजपा आलाकमान ने दो महत्वपूर्ण राज्यों – बिहार और दिल्ली – में पार्टी का ‘चेहरा’ बदल दिया है। पार्टी नेतृत्व ने इन दोनों राज्यों में बड़ा परिवर्तन करते हुए नित्यानंद राय को बिहार का और मनोज तिवारी को दिल्ली का अध्यक्ष मनोनीत किया है। नित्यानंद राय बिहार में मंगल पांडेय और मनोज तिवारी दिल्ली में सतीश उपाध्याय की जगह लेंगे।

पहले बिहार की बात। बिहार भाजपा में काफी समय से बदलाव के कयास लगाए जा रहे थे। युवा नित्यानंद राय को पार्टी की जिम्मेदारी सौंपकर नेतृत्व ने युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। साथ ही उन्हें सामने लाकर लालू (और आगे चलकर तेजस्वी) के माय समीकरण की काट भी खोजी गई है। गौरतलब है कि नित्यानंद राय यादव समाज से आते हैं और उन्हें अघ्यक्ष बनाकर पार्टी ने यादव और पिछड़ा कार्ड एक साथ खेला है। बता दें कि राय वर्तमान में उजियारपुर से सांसद हैं और इससे पहले 2000, फरवरी 2005, अक्टूबर 2005 और 2010 में लगातार चार बार हाजीपुर से विधायक रह चुके हैं।

उधर दिल्ली की कमान मनोज तिवारी को देकर पार्टी में नई जान फूंकने की कोशिश की गई है। लोकसभा चुनाव में दिल्ली की नॉर्थ-ईस्ट सीट से जीत के बाद मनोज तिवारी दिल्ली भाजपा का एक महत्वपूर्ण चेहरा बन गए थे। गौरतलब है कि दिल्ली की राजनीति में एक समय पंजाबी समुदाय का वर्चस्व माना जाता था, बाद में वैश्य समुदाय का वर्चस्व बढ़ा और मौजूदा समय में पूर्वांचलियों का बोलबाला है। ऐसे में पार्टी आलाकमान को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो पूर्वांचली वोटरों को लुभा सके। कहने की जरूरत नहीं कि मनोज तिवारी पूर्वांचलियों में खासे लोकप्रिय हैं और यही बात उनके चयन के पक्ष में गई। यहाँ यह रेखांकित करना भी जरूरी है कि तिवारी बिहार के कैमूर जिले के अतरवलिया गांव से आते हैं और उन्हें सामने लाकर पार्टी ने दिल्ली में बिहारियों की ‘अपरिहार्यता’ को भी स्वीकार किया है।

बता दें कि भाजपा संविधान के मुताबिक हर तीन साल में पार्टी के अध्यक्ष बदले जाते हैं। पिछले साल दिल्ली और बिहार को छोड़कर सभी राज्यों के अध्यक्ष बदल दिए गए थे। अब दिल्ली और बिहार में भी इसी के तहत बदलाव हुए हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश के रुख से सकते में लालू-सोनिया

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और भाजपा की बढ़ती नजदीकियों और उनके बीच ‘गुप्त’ बातचीत की अटकलों से महागठबंधन के सहयोगियों में बेचैनी है। इस बीच आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से फोन पर बातचीत की है। कांग्रेस से जुड़े सूत्र बताते हैं कि रविवार को हुई इस बातचीत के दौरान बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष और शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी भी मौजूद थे। इस बाबत पूछे जाने पर कोई भी टिप्पणी करने से आरजेडी के लोग परहेज कर रहे हैं।

गौरतलब है कि नोटबंदी के मुद्दे पर नीतीश कुमार जिस तरह खुलकर मोदी सरकार का समर्थन कर रहे हैं उसके कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। राजनीति के जानकारों का कहना है कि नीतीश का ‘नैतिक’ समर्थन अब ‘व्यावहारिक’ समर्थन में तब्दील हो गया है। तभी तो वो नोटबंदी के मुद्दे पर सोमवार को आयोजित विपक्षी दलों के ‘भारत बंद’ और ‘आक्रोश रैली’ से भी अपनी पार्टी को दूर रख रहे है, और उधर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान उनके ‘निर्णय’ और ‘सहयोग’ की खुली सराहना और स्वागत कर रहे हैं।

नीतीश के इस ‘यू-टर्न’ से आरजेडी और कांग्रेस का सकते में आना स्वाभाविक है। नोटबंदी का खुलकर विरोध कर रहीं दोनों पार्टियां यह समझने की कोशिश कर रही हैं कि आखिर क्या वजह है जिससे नीतीश एक बार फिर से भाजपा के करीब जाने को मजबूर हैं। यह सही है कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता लेकिन किसी के करीब जाने या किसी से दूर होने की कोई छोटी या बड़ी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वजह तो होनी ही चाहिए। नहीं तो कल तक जो नीतीश मिशन-2019 को ध्यान में रख एक-एक कदम बढ़ाने और मोदी के बरक्स खुद को खड़ा करने में लगे थे, आज भाजपा के लिए उनका सोया (या मोदी के उदय के बाद मर चुका) प्यार यूं अचानक जग न गया होता!

यह सही है कि बिहार में लालू के दोनों लाल के साथ सत्ता संभालने में नीतीश बहुत ‘सहज’ नहीं महसूस करते लेकिन नैतिकता का तकाजा यह है कि वो मैनडेट का सम्मान करें और ईमानदारी से गठबंधन धर्म निभाएं। अन्यथा, आने वाले समय में जनता की सहानुभूति लालू (कांग्रेस के साथ) बटोर ले जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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मनोज वाजपेयी ने जीता एशिया पेसिफिक स्क्रीन अवार्ड

अपने संजीदा अभिनय से बॉलीवुड में बिहार को गौरवान्वित करने वाले अभिनेता मनोज वाजपेयी ने ‘एशिया पेसिफिक स्क्रीन अवार्ड्स’ (आप्सा) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार हासिल किया। नवाजुद्दीन सिद्दीकी को इसी कैटेगरी में स्पेशल अवार्ड से सम्मानित किया गया। फिल्म उद्योग में सर्वोच्च सम्मान के तौर पर पहचाने जाने वाले इस पुरस्कार की घोषणा शुक्रवार रात ब्रिस्बेन में हुए एक समारोह के दौरान की गई। इस समारोह को ऑस्ट्रेलियाई अभिनेता डेविड वेल्हम ने होस्ट किया।

बता दें कि इस साल आप्सा का 10वां सीजन था। आप्सा सिनेमा के लिए सजग विश्व के 70 देशों का साझा मंच है और यह पुरस्कार इन देशों में सिनेमा की उत्कृष्टता और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रदान किया जाता है। इसके आयोजन में इन सभी देशों की झलक एक साथ देखने को मिलती है। कहने की जरूरत नहीं कि इतने बड़े और विशिष्ट मंच पर ‘सर्वश्रेष्ठ’ कहलाना कितनी बड़ी उपलब्धि है।

मनोज वाजपेयी को यह पुरस्कार हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’ में निभाई उनकी प्रोफेसर सिरास की अविस्मरणीय भूमिका के लिए मिला। आप्सा में यह उनका दूसरा नॉमिनेशन था। इससे पहले 2012 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के लिए उन्हें नॉमिनेशन मिला था। नवाजुद्दीन को इस साल अनुराग कश्यप की ही फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ के लिए स्पेशल अवार्ड मिला।

फिल्म अलीगढ़ में मनोज ने प्रोफेसर सिरास की भूमिका को इतना जीवंत कर दिया है कि दर्शक न केवल उनके किरदार से बंध जाता है बल्कि उसे जीने लग जाता है। आप्सा इंटरनेशनल के जूरी सदस्य जेन चैपमैन ने उनकी भूमिका के लिए कहा कि “यह बेहतरीन और दमदार अभिनय है। इसके मानवीय पक्ष और गहराई ने मुझे प्रभावित किया।” जूरी के एक अन्य सदस्य श्याम बेनेगल के शब्दों में “उन्होंने असाधारण और बेहतरीन अभिनय किया। हर छोटी बात को विस्तार और गहराई से दर्शाया गया है, जो अभिनय में नज़र आता है।”

गौरतलब है कि अप्रैल में मनोज को अलीगढ़ के लिए ही दादा साहब फाल्के पुरस्कार (क्रिटिक्स च्वाइस) के लिए चुना गया। यहाँ भी उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार अपने नाम किया। बिहार के इस लाल को ‘मधेपुरा अबतक’ की बधाई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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नीतीश फिर भाजपा के करीब !

मीडिया में आ रही ख़बरों के मुताबिक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों भाजपा के संपर्क में हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा के एक बड़े नेता से उनकी बात हुई है और बहुत संभव है कि आने दिनों में जेडीयू और भाजपा फिर एक साथ दिखाई दें। दरअसल इस तरह की सुगबुगाहट तभी शुरू हो गई थी जब यूपी चुनाव को लेकर जेडीयू और आरजेडी ने अपनी राहें अलग कर लीं। पर पिछले दिनों नीतीश ने लालू और कांग्रेस के स्टैंड से एकदम उलट जिस तरह केन्द्र सरकार के नोटबंदी के फैसले की तारीफ की, उसके बाद इस चर्चा ने खासा जोर पकड़ लिया है।

टीवी रिपोर्ट्स के मुताबिक नीतीश ने भाजपा के एक बड़े नेता से बात की और नोटबंदी की तारीफ की। गौर करने की बात है कि यह ‘तारीफ’ उन तारीफों के अतिरिक्त है जो वे सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं। वैसे इन तारीफों के अलग मायने इसलिए भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि हाल के दिनों में जेडीयू और आरजेडी के बीच तल्खियां आम हो चली हैं। उदाहरण के तौर पर नीतीश की निश्चय यात्रा का संदर्भ ही लें। आरजेडी के वरिष्ठ नेता और उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस यात्रा को ‘बेकार’ करार दिया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि यात्रा के दौरान केवल बातें की जा रही हैं, धरातल पर काम नहीं दिख रहा। यह केवल जेडीयू की यात्रा बनकर रह गई है।

नोटबंदी जैसे बड़े मुद्दे पर लालू-नीतीश की बिखरती जुगलबंदी और खुलकर सामने आई। एक ओर लालू प्रसाद यादव अपने एक के बाद एक आक्रामक ट्वीट और बयानों में इसे ‘फर्जिकल स्ट्राइक’ करार दे रहे हैं तो दूसरी ओर नीतीश इस फैसले को ‘साहसिक’ बताते हुए इसका स्वागत कर रहे हैं। उनके बेहद करीबी और हाल में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हरिवंश भी नोटबंदी के पक्ष में लेख लिख रहे हैं। हाँ, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव जरूर इसके विरोध में खड़े दिख रहे हैं, पर जेडीयू की अंदरूनी राजनीति से वाकिफ लोग बखूबी जानते हैं कि पार्टी में उनका ‘स्थान’ और ‘सम्मान’ केवल सांकेतिक है।

अंदरखाने इस बात की भी चर्चा है कि लालू को राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश की बढ़ती दिलचस्पी रास नहीं आ रही। चाहे यूपी चुनाव में गठबंधन की कवायद हो या शराबबंदी को देशव्यापी अभियान बनाने की कोशिश, लालू अच्छी तरह समझ रहे हैं कि नीतीश दिन-रात एक कर 2019 में खुद को मोदी के बरक्स लाने में जुटे हैं। नीतीश की इस तरह की कोशिशों को लालू के करीबी ‘वादाखिलाफी’ करार देते हैं। कारण यह कि जब महागठबंधन की नींव रखी जा रही थी, तब तथाकथित तौर पर तय यह हुआ था कि नीतीश बिहार संभालेंगे और लालू देश भर में घूम-घूमकर महागठबंधन की राजनीति को विस्तार देंगे।

बहरहाल, कारणों को न खंगालें तो भी इतना तो तय है कि महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। नहीं तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी को न तो यह कहने की जरूरत पड़ती कि “महागठबंधन एकजुट है” और न यह दावा करने की कि “महागठबंधन में दरार पैदा करने की कोशिशें नाकाम साबित होंगी।”

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नोटबंदी पर सरकार के नए निर्देश

सरकार ने आज नोटबंदी से जुड़े कई अहम निर्देश जारी किए। 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को अब 24 नवंबर की आधी रात के बाद बैंक काउंटरों से एक्सचेंज नहीं कराया जा सकेगा। इसका मतलब यह कि शुक्रवार से इन नोटों को अब सिर्फ बैंक में जमा कराया जा सकेगा। ऐसे नोटों को जमा कराने की अवधि 30 दिसंबर तक है।

बता दें कि आज जारी निर्देशों में सरकार ने 1000 रुपये के पुराने नोटों को पूरी तरह बैन कर दिया है, पर राहत की बात यह कि कई जरूरी सेवाओं में 500 रुपये के पुराने नोटों के उपयोग की अवधि 15 दिसंबर तक के लिए बढ़ा दी गई है। इन नोटों के जरिए वर्तमान और बकाया बिजली और पानी के बिल भरे जा सकेंगे। साथ ही इनका इस्तेमाल पेट्रोल पम्पों, दवा दुकानों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों एवं हवाई अड्डों पर किया जा सकेगा। 500 के पुराने नोटों से 3 दिसंबर से 15 दिसंबर तक टोल टैक्स भी दिया जा सकेगा। 3 दिसंबर से इसलिए क्योंकि सरकार ने 2 दिसंबर तक टोल टैक्स फ्री कर दिया है।

वित्त मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के मुताबिक केन्द्र और राज्य सरकार के स्कूलों व म्युनिसिपैलिटी और स्थानीय निकाय के स्कूलों में भी प्रति छात्र 2000 तक की फीस 500 के पुराने नोटों के जरिए अदा की जा सकेगी। केन्द्र एवं राज्य सरकार के कॉलेजों की फीस भी इन नोटों से दी जा सकेगी। यही नहीं, उपभोक्ता सहकारी दुकानों से एक बार में अधिकतम 5000 की खरीद और 500 रुपये मूल्य तक के प्रीपेड मोबाइल फोन टॉप-अप में भी 15 दिसंबर तक 500 के पुराने नोट चलेंगे।

 

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विराट के वीरों की इंग्लैंड पर बड़ी जीत

कोहली और पुजारा की शानदार बल्लेबाजी, अश्विन के ऑलराउंड खेल और गेंदबाजों के दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने विशाखापत्तनम टेस्ट में शानदार जीत दर्ज करते हुए पाँच मैंचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त बना ली। सोमवार को पाँचवें और आखिरी दिन इंग्लैंड की दूसरी पारी 405 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए मात्र 158 रन पर ढेर हो गई। इसके साथ ही भारत को इंग्लैंड पर 246 रन की बड़ी जीत मिली। पहली पारी में 167 और दूसरी पारी में 81 रन बनाने वाले भारतीय कप्तान विराट कोहली ‘मैन ऑफ द मैच चुने गए।

ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि ऐसी बड़ी जीत मिले और जीत का श्रेय बल्लेबाजों को दिया जाय कि गेंदबाजों को, ये तय करने में धर्मसंकट वाली स्थिति हो जाए। बल्लेबाजी की बात करें तो पहली पारी में विराट कोहली (167), चेतेश्वर पुजारा (119) और आर अश्विन (58) तो दूसरी पारी में फिर विराट कोहली (81), अजिंक्य रहाणे (26) और जयंत यादव (27 नाबाद) ने महत्वपूर्ण पारियां खेलीं। जहाँ तक गेंदबाजी की बात है तो उसकी धुरी हालांकि मैच में 8 विकेट (पहली पारी में 5 और दूसरी पारी में 3) लेने वाले आर अश्विन रहे लेकिन बाकी गेंदबाजों ने भी उम्दा खेल दिखाया। पहला टेस्ट खेल रहे जयंत यादव ने अपनी यादगार शुरुआत की। उन्होंने पहली पारी में 1 और दूसरी पारी में 3 विकेट लिए। दूसरी पारी में 27 महत्वपूर्ण रन बनाए सो अलग। रविन्द्र जडेजा और मोहम्मद शमी को मैच में 3-3 विकेट मिले। उमेश यादव की झोली भी खाली नहीं रही और उन्होंने 1 विकेट हासिल किया।

इस मैच में गेंदबाजों का दबदबा कैसा था, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि जिस इंग्लैंड ने चौथे दिन 59.2 ओवर खेलकर दो विकेट गंवाए थे, पाँचवें दिन उसकी बल्लेबाजी 38.1 ओवर में ही ढेर हो गई। गौरतलब है कि दूसरी पारी में इंग्लैंड का पहला विकेट 75 रन पर गिरा था और बाकी के नौ विकेट गंवा कर उसने महज 83 रन पर हासिल किए। दूसरी पारी में उसके केवल चार खिलाड़ी – कुक (54), हमीद (25), रूट (25) और बेयरस्टा (34) – ही दहाई के आंकड़े तक पहुँच सके। बचे हुए बल्लेबाजों में तीन तो शून्य पर आउट हुए। जेम्स एंडरसन दोनों ही पारियों में शून्य पर आउट हुए।

इंग्लैंड के कप्तान एलिस्टेयर कुक जहाँ इस हार से खासे निराश हैं, वहीं भारतीय कप्तान विराट कोहली का आभामंडल इस जीत के बाद और भी ‘विराट’ हो गया। मैच में 8 विकेट लेने वाले दुनिया के नंबर वन गेंदबाज आर अश्विन इस मैच के बाद इस साल सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बन गए। उनके विकेटों की संख्या अब 55 हो गई है। उनके बाद श्रीलंका के रंगना हेराब (54 विकेट) और इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्रॉड (46 विकेट) का स्थान है। इस मैच में भारत की एक और उपलब्धि अपना पहला टेस्ट खेल रहे जयंत यादव हैं। शानदार गेंदबाजी के साथ-साथ बल्लेबाजी में भी हाथ दिखा कर उन्होंने भविष्य के लिए उम्मीद जगा दी। स्वयं कप्तान कोहली उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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अब बैंकों में होंगे ‘इस्लामिक विंडो’

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पारंपरिक बैंकों में ‘इस्लामिक विंडो’ खोलने का प्रस्ताव रखा है ताकि देश में धीरे-धीरे शरिया के अनुकूल या ब्याजमुक्त बैंकिंग लागू की जा सके। बता दें कि रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार लम्बे समय से इस्लामिक बैंकिंग शुरू करने की संभावना तलाश रहे हैं। इसका मकसद समाज के उन तबकों का वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करना बताया जा रहा है जो धार्मिक कारणों से अब तक फाइनेंसियल सिस्टम से बाहर हैं।

गौरतलब है कि इस्लामिक या शरिया बैंकिंग मुख्य रूप से ब्याज नहीं लेने के सिद्धांत पर आधारित है क्योंकि इस्लाम में सूदखोरी को हराम माना गया है। इस्लाम सूद के खिलाफ इसलिए है कि ब्याज की बुनियाद पर बनी व्यवस्था में बहुत सारे लोगों के पैसे चंद लोगों के हाथ में आ जाते हैं। इसके मुकाबले ‘जकात’ (बचत के एक हिस्से का दान) की व्यवस्था है, जिससे कुछ लोगों का पैसा बहुत सारे लोगों के पास जाता है। ब्याज की व्यवस्था के मुकाबले इस्लाम का कहना है कि नफे और नुकसान में कर्ज देने और लेने वाले दोनों ही बराबर के हिस्सेदार हैं। यानि संक्षेप में कहें तो इस्लामिक बैंकिंग साझेदारी वाली व्यवस्था है।

बहरहाल, वित्त मंत्रालय को लिखे पत्र में रिजर्व बैंक ने कहा है कि “सोच-विचार से बनी हमारी राय में इस्लामिक फाइनेंस की पेचीदगियों और इस मामले से जुड़े विभिन्न नियामिकीय एवं पर्यवेक्षीय चुनौतियों के मद्देनजर भारत में क्रमबद्ध तरीके से इस्लामिक बैंकिंग शुरू की जा सकती है।” रिजर्व बैंक मानता है कि इस क्षेत्र में भारतीय बैंकों को कोई अनुभव नहीं है। इसीलिए सरकार की ओर से जरूरी अधिसूचनाएं जारी किए जाने के बाद पारंपरिक बैंकों में इस्लामिक विंडो के जरिए शुरू-शुरू में कुछ ऐसे सामान्य प्रोडक्ट्स लाने पर विचार होगा जो पारंपरिक बैंकों से मिलते-जुलते हैं। नफे-नुकसान वाले पेचीदे प्रोडक्ट के साथ पूरी इस्लामिक बैंकिंग पर बाद में अनुभव के आधार पर विचार किया जाएगा।

वैसे चलते-चलते ये बताना निहायत जरूरी है कि भारत में इस्लामिक बैंकिंग के लिए दरवाजा खोलने का श्रेय किसी और को नहीं हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है। आपको शायद हैरत हो लेकिन भारत में पहला इस्लामिक बैंक खोलने को हरी झंडी उनके गृहराज्य और उन्हीं की पार्टी द्वारा शासित गुजरात में मिली। पारंपरिक बैंकों में इस्लामिक विंडो का प्रस्ताव वास्तव में इसका अगला चरण है, जिससे आगे चलकर देश भर में इस्लामिक बैंक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आ सकते हैं।

गौरतलब है कि भारत ऐसा पहला गैर इस्लामिक देश है जहाँ इस्लामिक बैंक की सेवा मौजूद होगी। इस ‘उदार’ पहल के लिए रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार की सराहना की जानी चाहिए लेकिन शर्त यह कि उससे पहले ‘समान नागरिक संहिता’ की पुनर्व्याख्या हो। नहीं तो देखने वाले इसके पीछे ‘तुष्टिकरण’ को देखेंगे और आप उनकी आँखें बंद नहीं कर पाएंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मोदी को समझने से पहले इंदिरा को समझें

हाल के कुछ वर्षों में नरेन्द्र मोदी देश की राजनीतिक बहसों का केन्द्र होते चले गए हैं। देश के किसी भी कोने में कोई भी पार्टी हो, मोदी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसकी रणनीति को प्रभावित करने की स्थिति में हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। प्रशासक के तौर पर देखें तो पिछले कुछ दिनों में सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी जैसे बड़े फैसलों के बाद उनकी ‘सख्त’ (सकारात्मक अर्थ में) छवि सामने आई है। उनके इन फैसलों को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। सर्जिकल स्ट्राइक पर तो अमूमन सारी पार्टियों ने दिल खोलकर उनका साथ दिया लेकिन नोटबंदी पर राजनीतिक पार्टियों से लेकर आम जनता तक बंटी नज़र आती है। हालांकि विरोध नोटबंदी से ज्यादा उसके बाद मची ‘अफरा-तफरी’ को लेकर है। कहा जा रहा है कि इतने बड़े फैसले से पहले सरकार ने पूरा ‘होमवर्क’ नहीं किया था। अगर इसे मान भी लिया जाय तो भी उनके राजनीतिक साहस और इच्छाशक्ति की सराहना उनके विरोधी तक कर रहे हैं, भले ही उनमें से कुछ सार्वजनिक तौर पर इसे स्वीकार न करें।

बहरहाल, मोदी के इन कठोर फैसलों के आलोक में विश्लेषक उनकी तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कर रहे हैं। आज जबकि संयोग से इंदिराजी की जयंती भी है, क्यों न उनके कुछ बेहद साहसी और कठोर फैसलों की चर्चा करें जिन्होंने भारत की दशा और दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई।

सबसे पहले 1971 का युद्ध। भारत और पाकिस्तान के बीच तीसरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी के कठोर तेवरों की बहुत चर्चा होती है। वो भी तब जब माना जा रहा था कि वैश्विक मंच पर अमेरिका पाकिस्तान को शह दे रहा था। उस युद्ध में पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और दुनिया को बांग्लादेश के तौर पर एक नया मुल्क मिला। उनके इस फैसले के कारण ही उन्हें ‘आयरन लेडी’ कहा जाता है।

इसके बाद आता है 1974 का परमाणु परीक्षण। इंदिरा गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री मई, 1974 में परमाणु परीक्षण करने की मंजूरी दी। राजस्थान के पोखरण में हुए इस परमाणु परीक्षण की भनक दुनिया के पांच शक्तिशाली देशों तक को नहीं लगी थी। इस परीक्षण के बाद ही भारत ने परमाणु संपन्न देश होने की दिशा में कदम बढ़ाए थे।

अब बात करें 1967 में शुरू हुई हरित क्रांति की। 1966 में जब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं, तब देश में भुखमरी की स्थिति थी। भारत अनाज के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर था। इन परिस्थितियों में हरित क्रांति शुरू हुई और भारत जल्द ही अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। इंदिरा गांधी ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी।

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक और ऐसा निर्णय था जो इंदिरा गांधी के कारण ही संभव हो पाया। 14 जुलाई 1969 की आधी रात को उन्होंने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनके लिए ये फैसला आसान नहीं था। यहां तक कि कांग्रेस के अंदर भी इस पर एक राय नहीं थी। लेकिन इंदिरा ने ये कठिन निर्णय लिया और देश में आर्थिक स्थायित्व का दौर शुरू हुआ।

इंदिरा गांधी की बात हो और उनके नारे ‘गरीबी हटाओ’ की बात न हो ऐसा नहीं हो सकता। 1971 के चुनाव से ठीक पहले उन्होंने देश भर में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया। गरीबों और बेरोजगारों के लिए उन्होंने कई योजनाएं शुरू कीं। हालांकि समय के साथ उनका ये नारा अपनी चमक खोता गया, लेकिन आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि मोदी के चुनावी नारे ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ से पहले तक यह देश का सबसे बड़ा चुनावी नारा बना रहा।

इन फैसलों के अलावे इंदिरा गांधी ने कुछ ऐसे फैसले भी लिए जो विवादास्पद रहे। जून 1975 में आपातकाल की घोषणा, जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार और अपने दो कार्यकाल में राष्ट्रपति शासन का हथियार की तरह (कुल 50 बार) इस्तेमाल करने को लेकर उन्हें खासी आलोचना झेलनी पड़ी। ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत तो उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी। इस ऑपरेशन के चार महीने बाद ही उनके सिख अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोलियों से छलनी कर उनकी हत्या कर दी।

इंदिरा गांधी को दिवंगत हुए 33 साल बीत गए। पर एक बात बिना किसी झिझक के कही जा सकती है कि इस 33 पर शून्य लग जाने के बाद भी उनके अवदानों को नहीं भुलाया जा सकता। स्वतंत्र भारत का इतिहास उनके बिना पूरा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ठीक वैसे ही जैसे हमारी इक्कीसवीं सदी का इतिहास मोदी के बिना पूरा होगा, ऐसा सोचना नामुमकिन है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ने कहा, नोटबंदी आम जनता का ‘फेक एनकाउंटर’ है !

नोटबंदी के बाद एक ओर देश भर में अफरातफरी मची है, बैंक और एटीएम में लोगों की कतार छोटी होने का नाम नहीं ले रही, तमाम विपक्षी दल संसद में सरकार को घेरने की रणनीति बना रहे हैं तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी कालेधन के खिलाफ जारी अपनी जंग को आगे भी जारी रखने की बात कह  रहे हैं और बेनामी सम्पत्ति उनका अगला निशाना होगी। नोटबंदी के बाद चाहे आमलोगों की परेशानी हो या फिर सियासी तकरार, बिहार में भी चरम पर है। सोमवार को इसको लेकर भाकपा, माले, आइसा और इनौस कार्यकर्ताओं ने राज्यव्यापी विरोध दिवस मनाया। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी महासचिव और सांसद तारिक अनवर ने भी विमुद्रीकरण को बिना सोचे समझे जल्दबाजी में उठाया कदम करार दिया। सत्तारूढ़ महागठबंधन भी अपने तरीके से राज्य से लेकर केन्द्र तक इस मुद्दे को उठाने में जुटा हुआ है।

इन सारी गहमागहमी के बीच आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर माहौल को और गरमा दिया है। उन्होंने 500 और 1000 बड़े नोट बंद करने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बड़े तल्ख अंदाज में पूछा है कि किसानों को किन पापों की सजा और पूंजीपति मित्रों को किन कर्मों का पुण्य दे रहे हैं? अपने ट्विटर हैंडल पर एक के बाद एक कई पोस्ट कर उन्होंने प्रधानमंत्री पर जमकर निशाना साधा और कहा कि गांवों में बैंक नहीं हैं और हैं भी तो उनमें पैसे नहीं हैं। किसानों की खरीफ पैदावार पड़ी है। कोई खरीदने वाला नहीं है। रबी की बुआई के लिए पैसा नहीं है। एसी कमरों में नीति बनाने वालों को किसानी का ‘क’ भी नहीं पता है। किसान मर रहे हैं। इन हालात में जनता को भाषण नहीं राशन चाहिए।

नोटबंदी को लेकर लालू पहले भी मोदी पर भड़ास निकाल चुके हैं। अपने एक बयान में उन्होंने नोटबंदी को मोदी का फर्जिकल स्ट्राइक बताया है। उन्होंने कहा कि इतनी परेशानी के बाद भी अगर जनता के खातों में 15-15 लाख नहीं आए तो इसका मतलब साफ होगा कि नरेन्द्र मोदी का यह फर्जिकल स्ट्राइक था। इसी के साथ आम जनता का फेक एनकाउंटर भी। लालू का कहना है कि वह खुद कालाधन के खिलाफ हैं, लकिन प्रधानमंत्री के काम में दूरदर्शिता का पूरा अभाव दिख रहा है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर मोदी कालाधन को समाप्त करना चाहते हैं तो फिर दो हजार का नोट क्यों ला रहे हैं?

बिहार के उपमुख्यमंत्री और लालू के छोटे बेटे तेजस्वी भी ट्वीट-युद्ध और मोदी पर तंज कसने में अपने पिता से पीछे नहीं। उन्होंने ट्वीट कर प्रधानमंत्री से कहा है कि जनता की परेशानी पर अगर दिल पसीज जाए तो थोड़ी रहम कर देंगे। बैंक में पैसा रहते पति का इलाज पैसे के अभाव में नहीं करा सकने के एक महिला के ट्वीट को रिट्वीट कर तेजस्वी ने कहा कि कहीं इससे पीएम का दिल पसीज जाए। इसी तरह इलाज न कराने का दर्द बयां करते एक विडियो भी उन्होंने ट्वीट किया और कहा कि पीएम इन पीड़ितों के लिए कुछ करें।

बहरहाल, अभी न तो बैंक और एटीएम की कतार छोटी हो रही, न ही नेताओं के बयान की तल्खियां। लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस विश्वास और संकल्प के साथ नोटबंदी का इतना बड़ा कदम उठाया, अगर वो सच साबित हो जाए तो स्थिति एकदम भिन्न होगी। तब शायद अभी की परेशानियां याद न रहें – आमलोगों के साथ-साथ नेताओं को भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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