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नीतीश के बेटे निशांत बिताएंगे आध्यात्मिक जीवन, नहीं करेंगे राजनीति

आज जबकि परिवारवाद की बात बेमानी हो चुकी है और छोटे-बड़े हर नेता की अगली पीढ़ी स्वयं को राजनीति में स्थापित करने में लगी है, ऐसे में राष्ट्रीय कद के एक नेता – जो किसी सत्ताधारी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और लगातार पांचवीं बार बिहार जैसे राज्य के मुख्यमंत्री हों – के पुत्र यह कहें कि उनकी राजनीति में जाने की कोई इच्छा नहीं है, तो क्या आप यकीन करेंगे? नहीं न? लेकिन हम ढूंढ़ें तो अवसारवाद की पराकाष्ठा के दौर में भी ‘अपवाद’ मिल जाते हैं। जी हाँ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत कुमार ऐसे ही ‘अपवाद’ हैं।

बीते शनिवार को अपनी मां मंजू सिन्हा की जयंती के मौके पर निशांत ने राजनीति के प्रति केवल अपनी अनिच्छा ही नहीं जताई बल्कि यहां तक कहा कि वे राजनीति में कभी नहीं जाएंगे और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में उन्होंने अपने पिता को बता दिया है। गौरतलब है कि निशांत, जो नीतीश की इकलौती संतान हैं, प्रारम्भ से कुछ अलग प्रकृति के हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश के शपथ-ग्रहण जैसे एकाध मौके को छोड़ दें तो राजनीति के गलियारे में वे शायद ही देखे जाते हैं। भीड़-भाड़ और किसी भी तरह के प्रचार से दूर उन्हें एकांत में समय बिताना अधिक पसंद है। बताया जाता है कि अपनी मां की असमय मृत्यु उनके एकांतप्रिय स्वभाव का एक बड़ा कारण है।

बहरहाल, निशांत कुमार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार के प्रमुख राजनेताओं की अगली पीढ़ी के सत्ता व पार्टी संभालने पर दिन-रात चर्चा और विमर्श का दौर चल रहा है। अभी हाल ही में राबड़ी देवी ने कहा है कि उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी में मुख्यमंत्री बनने के सारे गुण हैं। वहीं, महागठबंधन के ‘अभिवावक’ लालू प्रसाद ने बच्चों के नेतृत्व के सवाल पर कहा है कि उनकी व नीतीश की उम्र हो चली है और अब भविष्य बच्चों का है।

लालू के दोनों बेटे तेजस्वी-तेजप्रताप और बेटी मीसा न केवल राजनीति में सक्रिय हैं बल्कि कई पद भी संभाल रहे हैं। उधर रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी राजनीति को पूरी तरह अपना करियर बना चुके हैं और जमुई से सांसद होने के साथ-साथ लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। इन सबके बरक्स निशांत की राजनीति से इस कदर अरुचि सचमुच चौंकाने वाली है।

बता दें कि स्वर्गीय मंजू सिन्हा की जयंती के अवसर पर निशांत और उनके पिता नीतीश कुमार उनकी स्मृति में पटना के कंकड़बाग में बनाए गए पार्क में श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। इस दौरान पिता नीतीश के बारे में पूछे जाने पर निशांत ने कहा कि उनके पिता ने हमेशा बिहार की सेवा की है। वे बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद से लगातार बिहार के विकास के लिए काम करते रहे हैं और ईश्वर ने उन्हें इसके लिए आशीर्वाद दिया है। वहीं पिता नीतीश के प्रधानमंत्री बनने के सवाल पर निशांत का कहना था कि उनके पिता के पास विजन है। अगर देश की जनता चाहेगी और ईश्वर का आशीर्वाद होगा तो वे अवश्य प्रधानमंत्री बनेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ने मोदी से कहा, सिर्फ यादव का हो सकता है 56 इंच का सीना

ज्ञान का अद्भुत भंडार है लालूजी के पास। उत्तर प्रदेश के देवरिया में एक चुनावी सभा के दौरान उन्होंने एकदम नया ज्ञान बांटा कि 56 इंच का सीना सिर्फ यादव का ही हो सकता है। जी हाँ, उन्होंने भरी सभा में कहा कि मोदी कहते हैं कि मेरा सीना 56 इंच का है। उनको मालूम होना चाहिए कि 56 इंच का सीना सिर्फ यादव का ही हो सकता है। यही नहीं, इसके बाद अपने खास अंदाज में उन्होंने ये भी जोड़ दिया कि जब मैंने मोदी का सीना नापा तो 32 इंच का ही निकला।

प्रधानमंत्री मोदी के पीछे लालू जैसे हाथ धोकर पड़े थे। आगे उन्होंने कहा कि मोदी जब बनारस गए थे तो कहा कि हमें गंगा मईया ने बुलाया है। आप सभी को मालूम होगा कि गंगा मईया कब बुलाती हैं। मोदी यह भी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश ने हमें गोद ले लिया है। हम उनसे पूछते हैं कि उत्तर प्रदेश के लोग नि:संतानी हैं क्या कि आपको गोद लेंगे।

कालेधन के मुद्दे पर लालू ने तंज कसते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि विदेश से कालाधन लाकर सबके खाते में 15-15 लाख डाल देंगे। सब लोगों ने खाता खोल लिया, लेकिन किसी के खाते में एक भी पैसा नहीं आया। हमसे हमारी पत्नी राबड़ी देवी ने पूछा कि क्या 15 लाख रुपया हमलोगों को भी मिलेगा। हमने कहा कि हमलोग भारत की जनसंख्या से बाहर हैं क्या कि हमें नहीं मिलेगा। हमारे घर में 15 लोगों की टीम है। 15 से हमने गुणा किया तो करोड़ों रुपए हो गए, लेकिन आज तक एक रुपया किसी के खाते में नहीं आया।

नोटबंदी पर लालू ने कहा कि भाजपा ने अपना काला धन सफेद करा लिया और आमलोगों को लाइन में लगवा दिया। कल-कारखाना और कारोबार चौपट हो गया। दो हजार रुपए ला दिए गए वो अलग, जिसे देखकर दुकानदार वैसे ही भड़क जाते हैं जैसे लाल कपड़ा देख सांड भड़क जाता है।

बकौल लालू मोदी ने देश के लोगों को झांसा दिया है। उन्होंने कहा कि मोदी और उनकी पार्टी अखिलेश यादव के राज को गुंडाराज बता रहे हैं। बिहार में जब मेरी सरकार थी तो जंगलराज बोलते थे। मोदी अपनी जनसभा में बोल रहे हैं कि भाजपा की सरकार बनने जा रही है। यह कहकर लोगों को भ्रम में डाल रहे हैं। मैं आज वादा करता हूं कि पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार तीनों एकजुट हैं और 2019 में हम सब इन्हें मिलकर जवाब देंगे।

इतना सब बोलने के बाद जाहिर है कि लालू भाजपा की परिभाषा भी बताएंगे। सो उन्होने वो काम भी कर दिया और भाजपा को ‘भारत जलाओ पार्टी’ बताया। और लगे हाथ मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का जुड़वा भाई बना दिया। मोदी को तानाशाह की संज्ञा देते हुए लालू ने कहा कि अटलजी अच्छे नेता हैं, लेकिन भाजपा के पोस्टर में एक जगह भी उनका फोटो देखने को नहीं मिल रहा।

बता दें कि लालू ने आजकल सपा और काग्रेस के समर्थन में मोर्चा खोल रखा है और इन दिनों उत्तर प्रदेश में एक बाद एक चुनावी सभा कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन सभाओं में उनकी जुबान कितनी बार फिसली है। सच तो यह है कि ये ‘फिसलन’ ही आज की राजनीति का ‘ट्रेडमार्क’ बन गई है। और जब ‘कुएं’ में ही ‘भांग’ पड़ी हो तो आप कर भी क्या सकते हैं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप      

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महाशिवरात्रि के दिन हर शिवलिंग में मौजूद होते हैं शिव

आज हर शिवालय में शिवभक्तों की कतार लगी है। हर गांव, हर गली, हर नगर, हर डगर धूम है तो बस देवाधिदेव महादेव की। उत्तर प्रदेश में शिव की नगरी काशी हो या उत्तराखंड में उनकी जटा से निकली गंगा की धरती हरिद्वार, मध्यप्रदेश का उज्जैन हो या गुजरात का सोमनाथ, झारखंड का देवघर हो या बिहार का सिंहेश्वर या फिर पड़ोसी देश नेपाल का विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर… हर जगह आस्था की अजस्त्र लहरें कलकल-छलछल करती देखी जा सकती है। और ऐसा हो भी क्यों न! महाशिवरात्रि का महत्व ही कुछ ऐसा है। आज ही के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। कहते हैं कि फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि फरवरी-मार्च के महीने में पड़ने वाले इस त्योहार के दिन भगवान शिव का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है।

शिवपुराण के अनुसार सृष्टि के निर्माण के समय महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में शिव अपने रुद्र रूप में प्रकट हुए थे। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। इसी समय जीवनरूपी चन्द्रमा का मिलन शिवरूपी सूर्य के साथ होता है। अत: महाशिवरात्रि परमात्मा शिव के दिव्य ‘अवतरण’ की रात्रि है। देखा जाय तो यह त्योहार सम्पूर्ण सृष्टि को उनके निराकार से साकार रूप में आने की मंगल सूचना है। महाशिवरात्रि के दिन ग्रहों की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है।

कहने की जरूरत नहीं कि शिव इस सम्पूर्ण सृष्टि के आधार हैं। योग परम्परा में वे दुनिया के पहले गुरु माने जाते हैं जिनसे ज्ञान की उत्पत्ति हुई थी। इस मार्ग पर चलने वाले उनकी पूजा ईश्वर के रूप में नहीं बल्कि उन्हें आदिगुरु मानकर करते हैं। इतनी विशाल हैं इस ‘कैलाशवासी’ की बांहें कि उनमें सुर ही नहीं असुर भी समा जाएं। उदार इतने कि बेलपत्र और भांग-धतूरा चढ़ाकर जो चाहे मांग लो। देखा जाय तो एकमात्र शिव हैं जो सच्चे अर्थों में आपकी श्रद्धा देखते हैं केवल। आज भी संसार के हर मंदिर में उनकी पूजा, उनके भोग और उनके श्रृंगार में केवल प्रकृति-प्रदत्त और घर में सहज उपलब्ध चीजें ही चढ़ती हैं। फल न हो न सही, साग-सब्जी ही चढ़ा दो, दूध-दही-मधु न सही, लोटा भर जल ही उड़ेल दो।

शिव यूं ही नहीं हैं देवों के देव। ‘महादेव’ होने के लिए गले में विषधर और कंठ में सारे जगत का विष धारण करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। व्यक्तित्व आपका ऐसा हो कि ‘सत्यं-शिवं-सुन्दरं’ को परिभाषा मिल जाए, हर दिशा से ठुकराए हुए को जीने की आशा मिल जाए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तो मुसलमान मोदी के कारण अधिक बच्चे पैदा करते हैं!

अब जबकि यूपी चुनाव अपने चरम पर है, छोटे-बड़े सारे नेता अपनी जुबान पर नियंत्रण खोते दिख रहे हैं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के भाषणों में भी इन दिनों ‘हल्कापन’ आ गया है। कई अवसरों पर उनकी भाषा में भी अपेक्षित गरिमा का अभाव दिख जाता है। ऐसे में सपा नेता आजम खान के तो कहने ही क्या। विवादास्पद भाषणों और बयानों से तो उनका चोली-दामन का साथ रहा है। अब बीते शुक्रवार का ही वाकया लीजिए, सपा के इस कद्दावर नेता ने हजारों की भीड़ में कुछ ऐसा कह दिया जो न केवल हमें चौंकाता है बल्कि राजनीति में ‘विवेक’ और ‘मर्यादा’ के गिरते स्तर को लेकर चिंतित भी करता है।

हुआ यूं कि यूपी चुनावों के मद्देनज़र इलाहाबाद में रैली कर रहे आजम खान मुसलमानों की बदहाली पर बात करते हुए बोल पड़े कि मुसलमान ज्यादा बच्चे इसलिए पैदा करते हैं क्योंकि उनके पास करने को कोई और काम ही नहीं है। मुसलमानों की बेरोजगारी पर ‘फिक्रमंद’ आजम का कहना था कि बादशाह (मोदी) अगर काम देता तो मुसलमान कम बच्चे पैदा करता। हमारे यहां (मुसलमानों की) आबादी ज्यादा हो जाती है और काम कम है, इसलिए बच्चे ज्यादा पैदा हो जाते हैं। मुसलमान खाली बैठेगा तो बच्चे ही पैदा करेगा। हिन्दू ज्यादा बच्चे पैदा नहीं करते हैं क्योंकि उनके पास रोजगार है।

आजम खान यहीं नहीं रुके। मोदी पर तंज कसने पर आमादा आजम ने आगे कहा कि अपने दो साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री ने 80 करोड़ रुपए के कपड़े पहने। वह खुद को फकीर कहते हैं लेकिन फकीर इतने महंगे कपड़े नहीं पहनता। जिस देश का प्रधानमंत्री इतने महंगे कपड़े पहनेगा वह देश कैसा होगा।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के 15 लाख वाले बयान को जुमला बताने पर निशाना साधते हुए आजम खान ने कहा कि बादशाह ने हसीन ख्वाब दिखाया, लफ्फाजी की और बड़े सिर वाले (अमित शाह) ने कहा कि बादशाह ने मजाक किया था। यही नहीं, आजम ने लगे हाथ दावा भी किया कि एक बार हमें गद्दी देकर देखो, हम सबको 15 की जगह 25-25 लाख रुपए देंगे। देश आज भी सोने की चिड़िया है, यहाँ पैसे की कमी नहीं है। 25-25 लाख देकर भी देश सोने की चिड़िया बना रहेगा।

अब भला ये आजम खान से कौन पूछे कि 25-25 लाख वो किस ‘खजाने’ से देंगे? मोदी ने 80 करोड़ के कपड़े पहने, ये हिसाब उन्हें किसने बताया? और, ये भी कि क्या मुसलमानों की आबादी मौजूदा बादशाह (मोदी) के महज दो साल में ही इस कदर बेलगाम हो गई? आजमजी, मुसलमानों का नेता होना अच्छी बात है। आप मोदी को नापसंद करते हैं, जरूर करें, किसी को अधिकार नहीं कि आपको ऐसा करने से रोके। आप मुसलमानों के लिए फिक्रमंद हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं। लेकिन भोले-भाले लोगों को बरगलाएं नहीं। किसी का विरोध करना हो तो करें, लेकिन तर्क पर तौलकर। विवेक और मर्यादा को ताक पर रखकर नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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और सफलतम कप्तान से छीन ली गई आईपीएल की कप्तानी

सितारा चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वक्त के साथ ढलता है। अब महेन्द्र सिंह धोनी को ही देखिए। पूरी दुनिया उनकी कप्तानी का लोहा मानती है। उनकी गिनती न केवल भारत के बल्कि दुनिया के सफलतम कप्तानों में होती है। विराट की सेना आज टेस्ट, वनडे और टी-20 में जिस विजय-रथ पर सवार है उसके ‘पहिए’ धोनी ने तैयार किए थे, इसमें कोई दो राय नहीं। पर अब वही धोनी क्रिकेट के किसी भी प्रारूप में बतौर कप्तान नहीं खेल रहे होंगे। जी हाँ, आईपीएल टीम राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स के कप्तान के तौर पर भी नहीं।

अगर धोनी ने भारतीय टीम की तरह इस आईपीएल टीम की कप्तानी भी छोड़ दी होती तो एक बात थी, हद तो यह है कि उन्हें टीम की कप्तानी से हटा दिया गया है। बताया जा रहा है कि पुणे टीम का मैनेजमेंट पिछले सीजन में उनकी कप्तानी से खासा नाखुश था। इसीलिए इस सीजन के ऑक्शन से पहले बतौर कप्तान उन्हें हटाने का बड़ा निर्णय लिया गया।

वैसे आईपीएल की ही बात करें तो धोनी की कप्तानी में चेन्नई सुपरकिंग्स का सुनहरा सफर कौन भूल सकता है? लेकिन पिछले सीजन में आईपीएल की तस्वीर बदली और चेन्नई सुपरकिंग्स की जगह नई टीम राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स की कप्तानी उन्हें मिली। ये वो दौर था जब धोनी अपने ‘रंग’ में नहीं थे और ज्यादातर मौकों पर उनकी कप्तानी ‘क्लिक’ नहीं हो पा रही थी। नतीजा यह हुआ कि 2016 में धोनी की मौजूदगी के बावजूद पुणे को 14 में से 9 मैचों में हार मिली। हालांकि ऐसा दौर हर खेल में और हर बड़े खिलाड़ी के करियर में आता है लेकिन अब जबकि ‘बाज़ार’ खेल को नियंत्रित कर रहा है, आपको दूसरा मौका नहीं मिलता। आप चाहे धोनी ही क्यों न हों। इस बाज़ार में प्रासंगिक बने रहने के लिए हर दिन परफॉर्म करना आपकी ‘मजबूरी’ होती है।

बहरहाल, धोनी की जगह पुणे की कमान ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ को दी गई है, जिन्हें 2014-15 में ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट टीम की कप्तानी मिली थी। धोनी का स्थान लेने के बाद अब इस सीजन में उन पर अच्छा प्रदर्शन करने का अतिरिक्त दबाव होगा। स्पष्ट कर दें कि धोनी टीम का हिस्सा पूर्ववत बने रहेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कोई अखिलेश को ‘सौतेला’ न कहे!

यूपी की चुनाव-प्रक्रिया शुरू होने से लेकर अबतक चैनलों के प्राइम टाइम और अखबारों की सुर्खियों में जिस मामले को सबसे अधिक जगह मिली वो है समाजवादी पार्टी में चल रहा परिवार का ‘दंगल’। कभी शिवपाल-अखिलेश की तनातनी, कभी मुलायम-अखिलेश का मतभेद, कभी इन सबमें ‘चाणक्य’ रामगोपाल की भूमिका तो कभी सारी लड़ाई के मूल में मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का हाथ बताया जाना – जैसे मीडिया को और कोई काम ही न रह गया हो। वैसे देखा जाय तो सपाइयों की इस अन्दुरूनी लड़ाई से अखिलेश को नुकसान कम और लाभ ज्यादा मिला। उन्हें न केवल पार्टी के भीतर और बाहर की सहानुभूति मिली बल्कि सारे घटनाक्रम से दिनोंदिन उनके कद में इजाफा भी होता गया और अंतत: वो सपा के नए ‘सर्वेसर्वा’ के तौर पर सामने आए।

बहरहाल, आज की तारीख में यूपी चुनाव अपने परवान पर है। पहले दो दौर का चुनाव होते-होते और तीसरे दौर का मतदान आते-आते इस चुनाव में भाग्य आजमा रहे सत्तासीन यादव परिवार के सारे सदस्य ये अच्छी तरह समझ चुके थे कि उनकी चुनावी वैतरणी के लिए अखिलेश की पतवार किस कदर जरूरी है। तभी तो तीसरे दौर के मतदान में सारे लोगों की ‘भाषा’ से लेकर संबंधों की ‘परिभाषा’ तक ‘फील गुड’ वाली थी।

गौरतलब है कि तीसरे दौर की वोटिंग के दौरान रविवार को यादव परिवार ने अपने गढ़ सैफई में पूरी एकजुटता दिखाने की कोशिश की। वोट डालने आए पार्टी के संस्थापक और अब मार्गदर्शक की भूमिका में आ चुके मुलायम ने अपनी सारी ‘नाराजगी’ ताक पर रखते हुए बकायदा राज्य में सपा की सरकार बनने का दावा किया और खुलकर कहा कि अखिलेश यादव राज्य के सीएम होंगे। हां, अपने भ्रातृप्रेम को भी वे नहीं भूले और साथ में ये भी जोड़ दिया कि शिवपाल यादव मंत्री होंगे। मुलायम के साथ उनकी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता (अब यादव) और छोटी बहू अपर्णा यादव भी थीं। अखिलेश यादव, शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव इससे पहले अलग-अलग वोट डाल चुके थे।

मजे की बात देखिए कि अखिलेश जहाँ तमाम अटकलों के बावजूद चाचा शिवपाल के लिए अपना वोट डालने आए, वहीं शिवपाल ने भी पार्टी और परिवार में किसी प्रकार की कलह से इनकार करते हुए जोर देकर राज्य में सपा की सरकार बनने की बात कही। रामगोपाल ने तो खैर 300 सीटों का दावा किया ही। साथ में ये दोहराना भी नहीं भूले कि परिवार में कोई अंदरूनी कलह नहीं है।

सबसे दिलचस्प वाकया मुलायम की दूसरी पत्नी साधना यादव का रहा। मुलायम के साथ आईं साधना ने न केवल परिवार में कलह की ख़बरों का खंडन किया बल्कि चार कदम आगे जाकर अखिलेश और प्रतीक को अपनी ‘दो आँखें’ बताईं। उन्होंने कहा – “कोई अखिलेश को सौतेला बोलता है तो मुझे बुरा लगता है। हमलोगों में कोई सौतेलापन नहीं है। हमने अखिलेश की शादी कराई, उसके बच्चे हैं, हमारी बहू है। अखिलेश हमारा बड़ा बेटा है।” वहीं चुनाव लड़ रहीं मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव ने भी राज्य में पार्टी की जीत का दावा किया और कहा – “कलह की बात लोगों को कहने दीजिए। हम राज्य में सरकार बनाने जा रहे हैं। माहौल शानदार है।”

काश कि सबके ऐसे ही बोल चुनाव से पहले भी होते! तब शायद सत्ता के आईने में संवेदना और संबंध नंगे नहीं होते और एक परिवार अपवाद के तौर पर सामने आ पाता!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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अमेरिका-29, रूस-37, भारत-104 : अंतरिक्ष में छा गए हम

इसरो ने इतिहास रच दिया। आंध्र प्रदेश स्थित श्रीहरिकोटा स्पेस सेंटर से एक ही रॉकेट से अंतरिक्ष में 104 सैटेलाइट छोड़कर अमेरिका और रूस को कोसों पीछे छोड़ दिया इसरो ने। अभी तक एक साथ सबसे ज्यादा 37 सैटेलाइट छोड़ने का रिकॉर्ड रूस के नाम था। अमेरिका ने एक साथ 29 सैटेलाइट ही लॉन्च किया है और इस तरह वो तीसरे नंबर पर है।

बता दें कि पीएसएलवी-सी-37 कार्टोसैट-2 सीरीज सैटेलाइट मिशन को श्रीहरिकोटा से भारतीय समयानुसार सुबह 9 बजकर 28 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया। पहले 714 किलोग्राम वजन वाले कॉर्टोसैट -2 सीरीज के सैटेलाइट को पृथ्वी पर निगरानी के लिए प्रक्षेपित किया गया। इसके बाद 103 नैनो सैटेलाइट को पृथ्वी से करीब 520 किलोमीटर दूर पोलर सन सिंक्रोनस ऑर्बिट में एक-एक कर प्रविष्ट कराया गया।  सभी सैटेलाइट 28 मिनट बाद 9 बजकर 56 मिनट पर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हो गए।   गौरतलब है कि इन सभी सैटेलाइट को जिस पीएसएलवी-सी-37 रॉकेट से छोड़ा गया, उस रॉकेट का यह 39वां मिशन था।

मंगलयान की कामयाबी के बाद हमारी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता किस कदर बढ़ गई है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसरो की कमर्शियल इकाई ‘अंतरिक्ष’ को लगातार विदेशी सैटेलाइट लॉन्च करने के ऑर्डर मिल रहे हैं। याद दिला दें कि इसरो ने पिछले साल भी जून में एक साथ 20 सैटेलाइट लॉन्च किया था। इन 20 सैटेलाइट समेत इससे पहले 50 विदेशी सैटेलाइट इसरो लॉन्च कर चुका था। इस बार भी जो नैनो सैटेलाइट छोड़े गए हैं उनमें से 101 विदेशी हैं। इसरो के मुताबिक जिन देशों ने अपने सैटेलाइट को इसरो की मदद से अंतरिक्ष में भेजा है उनमें इजरायल, कजाखिस्तान, यूएई के साथ नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और अमेरिका जैसे देश भी शामिल हैं।

बहरहाल, इसरो की बेमिसाल कामयाबी से पूरा देश गौरवान्वित है। स्पेस तकनीक के मामले में यह लगातार नए कीर्तिमान बना रहा है। खास तौर पर कम कीमत पर लॉन्चिंग को लेकर इसने दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों को पीछे छोड़ दिया है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत तमाम बड़ी हस्तियों ने इसरो को उसकी उपलब्धि के लिए बधाई दी है। अमिताभ बच्चन के उद्गार थे – “भारतीय होने पर गर्व है।” जाहिर है आज हर भारतीय यही कहना चाहेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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और शशिकला से छिन गई परोसी थाली

जयललिता के बाद पार्टी और सरकार की सर्वेसर्वा बनने जा रही शशिकला के आगे से ‘परोसी थाली’ छिन गई। आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषी करार दिया है। कोर्ट ने उन्हें चार वर्ष की सजा सुनाई है और साथ ही 10 करोड़ का जुर्माना भी लगाया है। माना जा रहा है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद तमिलनाडु की सत्ता की कमान अब पन्नीरसेल्वम के हाथों में ही रहेगी। हालांकि शशिकला ने अभी हथियार नहीं डाले हैं। उन्होंने आनन-फानन में अपने समर्थकों के साथ मीटिंग की और पन्नीरस्वामी की पार्टी की प्राथमिक सदस्यता खत्म करने का ऐलान कर ई पलनिसामी को विधायक दल का नेता घोषित कर दिया। वो किसी भी कीमत पर पन्नीरसेल्वम के हाथों मे सत्ता जाने देना नहीं चाहतीं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सदन में कौन अपना बहुमत साबित करता है – ओ पन्नीरसेल्वम या ई पलनिसामी।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एआईएडीएमके की मौजूदा महसचिव वीके शशिकला को तुरंत सरेंडर करने को कहा है। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि उनका मुख्यमंत्री बनने का सपना न केवल अभी के लिए बल्कि अगले 10 वर्षों के लिए टूट गया। गौरतलब है कि उन्हें चार वर्षों की सजा मिली है और नियमानुसार इस सजा के छह वर्ष बाद तक वो चुनाव नहीं लड़ सकतीं। इस तरह शशिकला का यह ‘वनवास’ कम-से-कम 10 वर्षों का है। कहने की जरूरत नहीं कि राजनीति में 10 वर्ष कितनी बड़ी अवधि होती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर पूरे देश की निगाह लगी थी। इसी फैसले से तय होना था कि तमिलनाडु की राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा। माना जा रहा था कि राज्यपाल भी इस संभावित फैसले को ध्यान में रखकर ही शशिकला को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं कर रहे थे। अब जबकि देश की सबसे बड़ी अदालत ने फैसला सुना दिया है, तमिलनाडु का राजनीतिक तापमान बहुत तेजी से बढ़ेगा। एक ओर ई पलनिसामी अपनी रणनीति बनाएंगे, दूसरी ओर पन्नीरसेल्वम नई ऊर्जा के साथ अपनी दावेदारी पेश करेंगे। शशिकला की अनुपस्थिति में उनके समर्थक ई पलनिसामी के साथ खड़े होंगे या पन्नीरसेल्वम के, यह देखने की बात होगी।

चलते-चलते बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच के दो जजों ने अपने आदेश से पूर्व में दिए हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया है और ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। आय से अधिक संपत्ति के इस मामले में जयललिता को मुख्य आरोपी और शशिकला को सह आरोपी बनाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में दोनों को दोषी करार देते हुए सजा का ऐलान किया था और जयललिता को कैद के साथ 100 करोड़ जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह पलट दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए पुन: ट्रायल कोर्ट के फैसले को ही मान्य ठहराया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या हम खिमजी प्रजापति नहीं बन सकते?

गुजरात के मेहसाना में रहने वाले खिमजी प्रजापति को रोटरी क्लब ऑफ इंडिया ‘लिट्रेसी हीरो अवार्ड’ से सम्मानित करेगी। आप सोच रहे होंगे कि ये कौन-सी बड़ी ख़बर है जो ‘मधेपुरा अबतक’ वाले परोस रहे हैं! जरा ठहरिए, आप खुद कहेंगे कि ये कितनी बड़ी ख़बर है जब मैं बोलूंगा कि खिमजी प्रजापति एक भिखारी हैं। जी हाँ, भिखारी। धन से गरीब पर मन से इतने अमीर कि आप और हम झेंप जाएं। क्या आप यकीन करेंगे कि 68 साल के प्रजापति लड़कियों को शिक्षा देने के लिए प्रेरित करने हेतु सोने के कुंडल देते हैं। उनकी इस अनोखी समाजसेवा के लिए रोटरी क्लब उन्हें पुरस्कृत कर रहा है। उन्हें 1 लाख रुपये की इनामी राशि के साथ-साथ परोपकार के कार्यों के लिए प्रशंसापत्र भी दिया जाएगा।

बता दें कि रोटरी क्लब ने इस पुरस्कार के लिए खिमजी प्रजापति के अलावा तीन अन्य लोगों और एक संस्थान को भी चुना है। जिन चार लोगों को इस सम्मान के लिए चुना गया है, वे सभी जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं। अकेले प्रजापति हैं जिनके पास कोई संपत्ति नहीं है। उन्हें तो बस देकर खुशी मिलती है। वे कहते हैं कि मैं जब किसी जरूरतमंद को कुछ दे पाता हूं, तब ज्यादा खुश और संतुष्ट महसूस करता हूं।

फरवरी 2016 में प्रजापति का नाम तब सुर्खियों में आया था जब मेहसाना के मागपारा गांव स्थित आंगनबाड़ी स्कूल में पढ़ने वाली 10 लड़कियों को उन्होंने सोने के कुंडल दिए थे। इसके लिए उन्होंने इलाके में स्थित एक जैन मंदिर के बाहर भीख मांगकर पैसे जमा किए थे। समाज के लिए कुछ करने का उनका जुनून यहां रुक नहीं जाता। लड़कियों को स्कूल यूनिफॉर्म देने से लेकर उनका कन्यादान करने तक कई काम करते हैं वे, और बड़ी बात ये कि बिना किसी शोर, बिना किसी प्रचार के। उनकी एकमात्र इच्छा और अपने जीवन से एकमात्र उम्मीद यही है कि बच्चे पढ़ें, युवा पीढ़ी सशक्त बने और सब खुश रहें। कोई जरूरतमंद मिले तो खुले हाथों से वे मदद कर सकें।

खुद को मिल रहे पुरस्कार से उत्साहित खिमजी प्रजापति कहते हैं कि मैं ज़िन्दगी में कभी मेहसाना से बाहर नहीं गया। मैं एक साथ बहुत खुश भी हूं और घबराया हुआ भी। जिस ईश्वर ने मुझे औरों की मदद करने का हौसला दिया, वह मेरी मदद आगे भी करता रहेगा। गौरतलब है कि रोटरी क्लब ऑफ इंडिया का पुरस्कार ग्रहण करने के लिए उन्हें 3 मार्च को चेन्नई जाना है। हवाई जहाज से आने-जाने से लेकर होटल में उनके ठहरने व अन्य सुविधाओं का ध्यान क्लब की ओर से रखा जाएगा।

बहरहाल, खिमजी प्रजापति अपनी अद्भुत समाजसेवा के लिए अपने आसपास के इलाके में पहले से मशहूर थे। आज उनकी कीर्ति की खुशबू बाहर फैलने लगी है और हम-आप उनके बारे में पढ़ और लिख रहे हैं। यहां तक तो ठीक है, लेकिन एक बात मन-मस्तिष्क को लगातार कुरेद रही है और वो ये कि क्या हम खिमजी प्रजापति नहीं बन सकते? क्या आपके पास जवाब है इस सवाल का?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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क्या पहले चरण से शुरू हो जाएगी अखिलेश-राहुल की ‘होली’?

यूपी के चुनावी समर के लिए पहला चरण बहुत खास है। अगर कहें कि इस चरण में बाजी मारने वाली पार्टी या गठबंधन के हाथ में देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता की चाबी होगी तो गलत न होगा। इस चरण में यह तय हो जाएगा कि भाजपा अपने 2014 के लोकसभा चुनावों के प्रदर्शन को दुहराती है या सपा-कांग्रेस गठबंधन को निर्णायक बढ़त मिल जाती है? वैसे त्रिकोण बना रहीं मायावती को भी हम नज़रअंदाज नहीं कर सकते, जो अपने परंपरागत वोटों के साथ-साथ इस चुनाव में मुस्लिम वोटरों की पहली पसंद बनकर रेस में आगे निकलने का दावा कर रही हैं।

गौरतलब है कि पहले चरण में जिन 73 सीटों पर मतदान हो रहा है, 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनमें से मात्र 11 सीटें जीती थी, पर 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सबको चौंकाते हुए 68 सीटों पर बढ़त बनाई थी। 2012 में भाजपा को जहाँ 16.2 प्रतिशत मत मिले थे, वहीं 2014 में उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 50.4 हो गया। इस आलोक में अगर हम अबकी हो रहे चुनाव का विश्लेषण करें तो कहा जा सकता है कि अगर पार्टी इस चुनाव में 15 से 20 प्रतिशत वोट गंवा देती है, तब भी उसकी झोली में 30 से 35 प्रतिशत वोट आएंगे, जो 2012 में उसे मिले वोटों से लगभग दोगुना होंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बार भाजपा कुछ ऐसा ही मानकर चल भी रही थी लेकिन आज अगर पार्टी अपने प्रदर्शन को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रही तो उसकी वजह है अखिलेश और राहुल का एक साथ आ जाना। हालांकि सपा के लिए यह इलाका राज्य के बाकी हिस्सों के मुकाबले कमजोर रहा है। 2012 में जब उसे बहुमत मिला था तब भी इस इलाके की 73 में से 24 सीटें ही उसके हिस्से में आई थीं और उसका वोट प्रतिशत बसपा से 5.5 प्रतिशत कम था। पर इस बार सपा के साथ कांग्रेस का वोट बैंक जुड़ जाने के कारण भाजपा और बसपा को अपना-अपना खेल बिगड़ने का डर सता रहा है। बता दें कि कांग्रेस ने 2012 और 2014 का चुनाव अजित सिंह की आरएलडी के साथ लड़ा था, पर इस बार सपा के साथ होने से जाहिर है कि उसकी ‘प्रासंगिकता’ बढ़ गई है।

वैसे मायावती की पार्टी बसपा का पश्चिमी यूपी में खासा असर रहा है। पार्टी इस इलाके में राज्य के बाकी हिस्सों से ज्यादा मजबूत रही है। 2012 में उसे इन 73 सीटों पर सबसे ज्यादा वोट भी मिले थे। हालांकि सीटें उसे सपा के लगभग बराबर ही मिली थीं, पर बड़ी बात यह थी कि लगभग सारी सीटों पर बसपा मुख्य मुकाबले में थी। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण पार्टी तीसरे नंबर पर चली गई थी। लेकिन इस बार के चुनाव में सांप्रदायिक तनाव काफी हद तक कम हो चुका है और ऐसे में मायावती को अपने दलित-मुस्लिम गठजोड़ के चल निकलने की उम्मीद थी। पर सपा और कांग्रेस ने एक साथ आकर मुस्लिमों को पहले से अधिक मजबूत विकल्प दे दिया है। जाहिर है कि इन परिस्थितियों में मायावती चैन से नहीं बैठ पा रहीं।

कुल मिलाकर यह कि पहले चरण के नतीजे जो भी हों, इस चरण को छूकर जो ‘हवा’ निकलेगी वो सत्ता के गलियारे की दिशा बता देगी, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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