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बिहार की औद्योगिक राजधानी बनने की ओर अग्रसर मधेपुरा

राज्य की कमान नीतीश कुमार जैसे सक्षम हाथों में, केन्द्र की मोदी सरकार का भी भरपूर सहयोग और जिला में सभी विकास कार्यों के क्रियान्वयन के लिए मो. सोहैल जैसे सक्षम व तत्पर जिला पदाधिकारी, भला क्यों न हो मधेपुरा का विकास और क्यों न कल को बने मधेपुरा राज्य की औद्योगिक राजधानी। जी हां, मधेपुरा में रेल इंजन कारखाने के सफलतापूर्वक आकार ले लेने के बाद देश और दुनिया के कई बिजनेस टाइकून की निगाह मधेपुरा पर है।

अभी हाल ही में इन पंक्तियों के लेखक को मधेपुरा रेल इंजन कारखाने के एक वरिष्ठ फ्रांसीसी अधिकारी के साथ पटना से मधेपुरा की यात्रा करने का मौका मिला और बहुत करीब से देखने को मिली उस अधिकारी की आंखों में मधेपुरा से जुड़ी उम्मीद और यहां से उपजे विश्वास की चमक। कहना गलत न होगा कि वो दिन दूर नहीं जब मधेपुरा भारत और विश्व के मानचित्र पर अपना अलग वजूद रखेगा।

मधेपुरा को लेकर यह विश्वास अकारण या अतिउत्साहवश नहीं है। अब कल की ही खबर लीजिए। जापान की कंपनी ‘तायकिसा इंजीनियरिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ के वरिष्ठ अधिकारियों की टीम लगभग 100 करोड़ के पूंजी निवेश का प्रस्ताव लेकर मधेपुरा पहुंची। मधेपुरा के विद्युत रेल इंजन कारखाने से बनकर निकलने वाले इंजन के लिए यह कंपनी पार्ट-पुर्जा बनाएगी। शनिवार को कंपनी के प्रबंध निदेशक युताका ओनोजोवा, वाइस प्रेसिडेंट एचएन मकवाना और जनरल मैनेजर सचिन क्षीरसागर मधेपुरा के डीएम मो. सोहैल से मिले और पूंजी निवेश के संबंध में प्रस्ताव रखा। बता दें कि यह कंपनी मधेपुरा में 13 तरह के पार्ट्स बनाएगी।

जापानी कंपनी तायकिसा के अधिकारियों ने मधेपुरा में पूंजी निवेश करने का प्रस्ताव देने के साथ-साथ मधेपुरा लोकोमोटिव विद्युत इंजन कारखाना परिसर और आसपास के क्षेत्र का दौरा किया। अभी इस बात का निर्णय होना है कि यह फैक्ट्री कारखाना परिसर के अदर लगेगी या बाहर लगाई जाएगी। हालांकि डीएम सोहैल ने तायकिसा के अधिकारियों का आश्वस्त किया कि कारखाना परिसर के बाहर भी अगर फैक्ट्री के लिए जमीन की आवश्यकता होगी तो उपलब्ध कराई जाएगी। यही नहीं, इसके अतिरिक्त अन्य सुविधाओं का ध्यान रखने में भी कोई कोताही नहीं बरती जाएगी।

कहने की जरूरत नहीं कि मधेपुरा अपने विकास का नया अध्याय लिख रहा है। इस बात की प्रबल संभावना है कि मधेपुरा में शीघ्र देश-विदेश की कई और कंपनियां निवेश का प्रस्ताव लेकर आएंगी। बस मधेपुरा यूं ही प्रगति का परचम फहराता रहे, बिहार और देश के विकास में अपनी भूमिका निभाता रहे!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अमेरिका में दिख रहे नए और परिपक्व राहुल

चाहे राजनीतिक दलों के रणनीतिकार हों, डिप्लौमैट हों या पॉलिसी मेकर्स – अपनी अमेरिका यात्रा से राहुल गांधी ने सबका ध्यान खींचा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष को हल्के में लेने वाले भी अब उन्हें गंभीरता से लेने को बाध्य दिखने लगे हैं। अपने ऊपर बने चुटकुलों में अक्सर ‘पप्पू’ कहे जाने वाले इस शख्स से देश की सत्ता पर निहायत मजबूती से काबिज भारतीय जनता पार्टी भी इधर परेशान दिख रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब आप अपनी कमियां भी बेबाकी से स्वीकार कर रहे हों तब सामने वाले के लिए कही गई बात को भी नज़रअंदाज करना मुश्किल होता है। भाजपा को ठीक यही बात परेशान कर रही है क्योंकि राहुल ने कांग्रेस की कमियों की बात करते हुए भाजपा की दुखती रगों पर भी ऊंगली रखी है, और खास बात यह कि बड़ी संजीदगी से रखी है।

अमेरिका के प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ संवाद करते हुए राहुल ने कहा कि केन्द्र की सरकार नौकरियां पैदा नहीं कर पा रही हैं, लिहाजा धीरे-धीरे लोगों के बीच सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि हर दिन रोजगार बाजार में 30,000 नए युवा शामिल हो रहे हैं और इसके बावजूद सरकार प्रतिदिन केवल 500 नौकरियां पैदा कर रही है। वर्तमान सरकार की आलोचना करते हुए राहुल ने पूर्व की कांग्रेस सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया और कहा, सच कहा जाए तो कांग्रेस पार्टी भी इस मोर्चे पर फेल रही थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी भी यहां फेल हो रहे हैं। यह एक ऐसी समस्या है जिसकी जड़ें गहरी हैं। इसके समाधान के लिए पहले हमें स्वीकार करना होगा कि यह एक समस्या है लेकिन इस समय कोई यह स्वीकार ही नहीं कर रहा।

राहुल के मुताबिक मोदी के उभार और ट्रंप के सत्ता में आने की वजह भारत और अमेरिका में रोजगार का प्रश्न होना है। उन्होंने कहा, हमारी बड़ी आबादी के पास कोई नौकरी नहीं है, वे अपना भविष्य नहीं देख सकते और इसलिए परेशान हैं। इन्हीं लोगों ने इस तरह के नेताओं का समर्थन किया। उन्होंने आगे कहा, मैं ट्रंप को नहीं जानता, मैं उस बारे में ज्यादा बात नहीं करुंगा। लेकिन, निश्चित ही हमारे प्रधानमंत्री रोजगार सृजन के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं। ऐसे में वही लोग जो एक दिन में 30,000 नौकरियां पैदा नहीं कर पाने से हमसे नाराज थे, वे मोदी से भी नाराज होंगे।

मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम पर बात करते हुए राहुल गाधी ने कहा कि उनकी तमन्ना थी कि ऐसे प्रोग्राम को कांग्रेस अपने कार्यकाल में लॉन्च की होती। हालांकि राहुल इसमें थोड़े बदलाव के हिमायती हैं। उन्होंने कहा, मुझे मेक इन इंडिया का कॉन्सेप्ट पसंद है, लेकिन ये प्रोग्राम जिन लक्ष्यों को लेकर चलना चाहिए उसे लेकर नहीं चल रहा है। अगर कांग्रेस इस प्रोग्राम को लागू करती तो उनका फोकस कुछ अलग होता। बकौल राहुल, प्रधानमंत्री मोदी इस प्रोग्राम के तहत बड़े कारखाने और फैक्ट्रियों को टारगेट कर रहे हैं, जबकि हमारा फोकस मध्यम और छोटे उद्योगों पर होना चाहिए। ये वो क्षेत्र हैं, जहां से नौकरियां आने वाली हैं।

राहुल ने छात्रों से बात करते हुए स्वीकार किया कि मोदी उनसे ‘बहुत अच्छे’ वक्ता हैं और वे समझते हैं कि एक भीड़ में अलग-अलग लोगों के समूहों से कैसे संवाद स्थापित करना है। छात्रों से उनके संवाद की बड़ी बात यह रही कि उन्होंने छात्रों के किसी प्रश्न का ‘टालू’ और ‘चालू’ जवाब नहीं दिया। अपने दो सप्ताह के अमेरिका प्रवास पर वो जहां भी जा रहे हैं, इसी तरह खुलकर और बेबाकी से बात कर रहे हैं और उनकी तटस्थता लोगों को भा रही है। कुल मिलाकर यह कि आगे की लड़ाई के लिए राहुल अमेरिका से तैयार होकर लौट रहे हैं, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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क्या आपने प्रधानमंत्री मोदी को जन्मदिन की शुभकामना दी ?

आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 67वां जन्मदिन है। अगर आप उनके आलोचक हैं तब भी इतना तो जरूर मानेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इस प्रधानमंत्री ने बहुत कम समय में अपनी वैश्विक पहचान बनाई है और उनकी लोकप्रियता देश और दल की सीमा को लांघ चुकी है। बात जहां तक भारतीय जनता पार्टी की है, तो उसके लिए ये दिन किसी उत्सव से कम नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री किसी दल का नहीं, पूरे देश का होता है और लीक से अलग हटकर काम करने की धुन में लगे इस शख्स पर 125 करोड़ भारतवासियों की अपेक्षाओं का भार है, इसलिए उन्हें हम सबकी ओर से जन्मदिवस की शुभकामना तो जरूर मिलनी चाहिए।

बहरहाल, फेसबुक और ट्विटर पर उनके लिए बधाईयों का अंबार लगा है। देश-विदेश की तमाम बड़ी हस्तियां उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दे रही हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ट्वीट कर उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके स्वस्थ जीवन और दीर्घ आयु की कामना की। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि मां भारती की सेवा के लिए प्रभु आपको निरोग और दीर्घायु प्रदान करें। वहीं बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने उन्हें ‘नये भारत का विश्वकर्मा’ कहते हुए अपनी शुभकामनाएं दीं।

प्रधानमंत्री के जन्मदिन को भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारें सेवा दिवस के तौर पर मना रही हैं और श्रमदान के साथ-साथ शौचालय निर्माण व स्वच्छता अभियान चलाए जा रहे हैं। बिहार में भी भाजपा कार्यकर्ता स्वच्छता अभियान चला रहे हैं। कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर झाड़ू लगाने उतरे अश्विनी कुमार चौबे , जिन्हें हाल ही में मोदी कैबिनेट में जगह मिली है, ने कहा कि महात्मा गांधी के बाद नरेन्द्र मोदी पहले ऐसे शख्स हैं जिन्होंने स्वच्छता के प्रति जन-जन को जागरुक करने का काम किया है।

बता दें कि अपने जन्मदिन पर अपने गृहराज्य पहुंच कर प्रधानमंत्री मोदी ने जहां अपनी मां का आशीर्वाद लिया, वहीं देश को एक बड़ा तोहफा भी दिया। आज उन्होंने नर्मदा नदी पर बना सरदार सरोवर बांध देश को समर्पित किया। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और भारत का सबसे बड़ा व ऊंचा बांध है, जिससे गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान को लाभ होगा। गौरतलब है कि 65 हजार करोड़ रुपये की लागत से बने इस बांध को बनने में 56 साल लगे हैं। 5 अप्रैल 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसका शिलान्यास किया था।

चलते-चलते

हमें नहीं भूलना चाहिए कि आज ही के दिन मधेपुरा को अपनी सेवा और संस्कार से सींचने वाले डॉ. (मेजर) उपेन्द्र नारायण मंडल की 92वीं जयंती भी है। पेशे से चिकित्सक, व्यक्तित्व से मेजर, व्यवहार से समाजसेवी और संस्कार से संत ‘मेजर साहब’ को मधेपुरा अबतक का शत्-शत् नमन!!

और अंत में आप सभी को विश्वकर्मा पूजा की ढेरों शुभकामनाएं!!!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप           

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बिहार था हिन्दी को आधिकारिक भाषा चुनने वाला पहला राज्य

हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है, हिन्दी हमारी राजभाषा है, हिन्दी में हिन्दुस्तान की आत्मा बसती है, हिन्दी ही पहचान है हमारी और फिर भी विडंबना देखिए कि कुछ संस्थाओं द्वारा रस्मअदायगी करने और कुछ सरकारी आयोजनों के अलावा हिन्दी दिवस पर उतनी भी चहल-पहल और रौनक नहीं जितनी ‘वेलेंटाइन डे’ तक पर देखने को मिल जाती है। आखिर हम जा कहां रहे हैं? क्या पश्चिम से आयातित तौर-तरीकों में अपनी शान समझने वाले हम भारतवासी (माफ कीजिए, ‘इंडियन’) बहुत तेजी से सांस्कृतिक गुलामी की तरफ नहीं बढ़ रहे? और क्या ये गुलामी सदियों की उस गुलामी से अधिक भयावह नहीं जिससे हम 15 अगस्त 1947 को मुक्त हुए थे?

जरा सोचकर देखिए, आज 14 सितंबर यानि हिन्दी दिवस है, क्या आप बता सकते हैं कि आज हम हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं? और अगर आप जानते हैं तो क्या विश्वास के साथ यह कह पाने की स्थिति में हैं कि आपने अपने बच्चों को भी इस दिन और इसके महत्व से अवगत कराया है? अगर पहले सवाल का जवाब आप ‘हां’ में दे भी दें तो दूसरे सवाल का जवाब (जैसा कि स्कूलों के सर्वे से पता चलता है) सौ में सत्तर फीसदी लोगों का ‘ना’ में होगा।

बहरहाल, 14 सितंबर के ही दिन 1949 में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिला था। संविधान के अनुच्छेद 343 में यह प्रावधान किया गया है कि देवनागरी लिपि के साथ हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। हिन्दी को लेकर एक गौरवशाली तथ्य बिहार से जुड़ा है। जी हां, बिहारवासियों को इस बात का गर्व होना चाहिए कि 1881 में बिहार ही वो पहला राज्य था, जिसने हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में चुना था।

आज की पीढ़ी को ये जरूर जानना चाहिए कि ‘हिन्दी’ शब्द फारसी शब्द ‘हिन्द’ से बना है, जिसका अर्थ ‘सिंधु नदी की भूमि’ है। 11वीं सदी में जब तुर्कों ने पंजाब और गंगा के मैदानों पर हमला किया, तब हिन्द शब्द का इस्तेमाल यहां रहने वाले लोगों के लिए किया गया था। हमें यह भी पता होना चाहिए कि दुनिया भर में 64 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है। 2015 के आंकड़ो के मुताबिक हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। यही नहीं, एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि जहां 70 प्रतिशत चीनी ही मंदारिन बोलते हैं, वहां भारत के 77 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं।

इंटरनेट की दीवाने युवाओं को यह जानकर खुशी होगी कि दुनिया में हर पांच में से एक व्यक्ति हिन्दी में इंटरनेट का उपयोग करता है। यही नहीं, हिन्दी भारत की उन सात भाषाओं में एक है, जिसका इस्तेमाल वेब एड्रेस बनाने में भी किया जाता है। हिन्दी की एक और खूबी जिससे आपको वाकिफ होना चाहिए, वो यह कि सीखने के लिहाज से यह विश्व की अन्य भाषाओं की तुलना में अधिक आसान है। इसमें शब्दों का वही उच्चारण होता है, जो लिखा जाता है।

चलते-चलते यह भी जानें कि विश्व हिन्दी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र के नागपुर से 1975 में हुई थी और 2006 में इस दिन को आधिकारिक दर्जा के साथ वैश्विक पहचान मिली।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

 

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सुनिए, चोट खाए शरद ने क्या कहा ?

अब जबकि चुनाव आयोग ने साफ कर दिया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला दल ही असली जेडीयू है और उनकी राज्यसभा सदस्यता जाने में औपचारिकता भर शेष है, फिर भी शरद यादव यह मानने को तैयार नहीं कि पार्टी के भीतर की लड़ाई वे हार चुके हैं। हां, उन्होंने इतना जरूर कहा कि हम पहाड़ से लड़ रहे हैं तो यह सोच कर ही लड़ रहे हैं कि चोट लगेगी ही।

दरअसल, जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता पर मंडराते संकट पर अपना पक्ष रख रहे थे। कल चुनाव आयोग द्वारा पार्टी पर शरद गुट के दावे पर संज्ञान नहीं लेने और राज्यसभा का नोटिस मिलने के बाद अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि इन पहलुओं को उनके वकील देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे देश की साझी विरासत पर आधारित संविधान की लड़ाई बचाने की बड़ी लड़ाई के लिए निकल पड़े हैं। बकौल शरद राज्यसभा की सदस्यता बचाना छोटी बात है, उनकी लड़ाई साझी विरासत बचाने की है। सिद्धांत के लिए वे पहले भी संसद की सदस्यता से दो बार इस्तीफा दे चुके हैं।

भविष्य की रणनीति के बारे में शरद ने कहा कि 17 सितंबर को पार्टी कार्यकारिणी और 8 अक्टूबर को राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद जेडीयू बड़े रूप में सामने आएगी। हालांकि कैसे आएगी, इस पर फिलहाल वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं। आगे नीतीश पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि हमारे मुख्यमंत्री मित्र ने खुद राजद प्रमुख लालू प्रसाद से जब महागठबंधन बनाने की पहल की थी, तब भी वह भ्रष्टाचार के आरोपों से बाहर नहीं थे। जबकि महागठबंधन की सरकार बनने के बाद अचानक शुचिता के नाम पर गठजोड़ तोड़ दिया। यह बिहार के 11 करोड़ मतदाताओं के साथ धोखा है। हमने सिद्धांत के आधार पर ही इसका विरोध किया।

समाजवाद के इस पुराने नेता ने आगे की लड़ाई साझी विरासत के मंच से लड़ने की बात कही। वे लड़ेंगे भी, क्योंकि वे शुरू से धूल झाड़कर फिर से खड़े होने वालों में रहे हैं। लेकिन क्या तमाम आरोपों और मुकदमों से घिरे लालू और उनके परिवार की ‘बैसाखी’ से उनके ‘सिद्धांत’ को कोई गुरेज नहीं है? क्या वे प्रकारान्तर से यह कहना चाहते हैं कि लालू पुत्रों का ‘मॉल’ और मीसा का ‘फॉर्म हाउस’ गरीबों को ‘सामाजिक न्याय’ दिलाने के लिए है? या फिर यह मान लिया जाए कि भारतीय राजनीति में अब भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जेडीयू पर शरद का दावा खारिज, अब राज्यसभा की बारी

चुनाव आयोग ने जेडीयू विवाद पर अपना निर्णय दे दिया। आयोग ने बिना किसी द्वंद्व के बड़े स्पष्ट शब्दों में पार्टी और उसके सिंबल पर शरद यादव की दावेदारी को खारिज कर दिया। इसके साथ ही ‘असली-नकली’ की जबरदस्ती लड़ी जा रही लड़ाई खत्म हुई और पार्टी विधिवत नीतीश कुमार की हो गई। हालांकि, शरद खेमे के अली अनवर ने आयोग के फैसले पर असंतोष जताते हुए कानूनी राय लेने और जरूरत पड़ने पर कोर्ट जाने की बात कही, लेकिन वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ होंगे की आगे की लड़ाई कितनी मुश्किल हो गई है।

गौरतलब है कि शरद खेमे ने बीते 25 अगस्त को पार्टी सिंबल पर अपना अधिकार जताया था, लेकिन शरद यादव अपने दावे के पक्ष में अपेक्षित कागजात जमा करने में विफल रहे। जबकि दूसरी ओर शुक्रवार को सांसद आरसीपी सिंह के नेतृत्व में चुनाव आयोग से मिलने गया जेडीयू का प्रतिनिधिमंडल सांसदों, विधायकों और 145 राष्ट्रीय परिषद सदस्यों के समर्थन की सूची से लैस था। ऐसे में आयोग को एक आसान फैसला लेना था, जो उसने ले लिया।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट तौर पर कहा कि शरद खेमे के दावे के साथ पर्याप्त समर्थन का दस्तावेज नहीं है। ऐसे में इस आवेदन पर कोई विचार ही नहीं किया जा सकता है। जबकि दूसरी ओर नीतीश खेमे के पास पर्याप्त से भी अधिक समर्थन है। हालांकि शरद यादव के पास फिर से आवेदन देने का अधिकार है, लेकिन यह जानते हुए कि जरूरी समर्थन और उसके लिए हस्ताक्षर जुटाना लगभग नामुमकिन है, शायद वो अपनी और किरकिरी न कराना चाहें।

उधर आयोग के इस फैसले के बाद जेडीयू महासचिव संजय झा ने कहा कि अब आयोग के फैसले की यह प्रति राज्यसभा में दी जाएगी ताकि इस आलोक में शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता को लेकर भी आसानी से फैसला लिया जा सके। बता दें कि पार्टी लाईन से अलग चल रहे शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए भी जेडीयू ने राज्यसभा के सभापति से आग्रह किया है और इसके बाद राज्यसभा सचिवालय ने नोटिस भेजकर शरद से स्पष्टीकरण भी मांगा है। हालांकि चुनाव आयोग के फैसले के बाद अब राज्यसभा के सभापति को निर्णय लेने में कोई दुविधा होगी, इसका कोई आधार नहीं दिखता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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संतों की बड़ी पहल, 14 फर्जी बाबाओं की सूची जारी

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की काली दुनिया के सामने आने और साध्वी से दुष्कर्म के मामले में सजा मिलने के बाद हिन्दू धर्मगुरुओं के चरित्र पर उठ रहे सवालों के बीच अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने एक बड़ी पहल की है। अखाड़ा परिषद ने आज इलाहाबाद में आयोजित विशेष बैठक में 14 फर्जी बाबाओं की सूची जारी की। इनमें गुरमीत राम रहीम के साथ ही आसाराम बापू उर्फ आशुमल शिरमानी, निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह, राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर, ओमबाबा उर्फ विवेकानंद झा आदि के नाम शामिल हैं।

अखाड़ा परिषद ने इन बाबाओं का देशव्यापी बहिष्कार करने की अपील की है। इन बाबाओं के अलावा इस सूची में सच्चिदानंद गिरि उर्फ सचिन दत्ता, इच्छाधारी भीमानंद उर्फ शिवमूर्ति द्विवेदी, स्वामी असीमानंद, ऊँ नम: शिवाय बाबा, नारायण सांई, रामपाल, कुश मुनि, बृहस्पति गिरि और मलखान गिरि के नाम शामिल हैं।

अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरि ने कहा कि इन तथाकथित बाबाओं की वजह से सनातन धर्म को बहुत नुकसान हुआ है। अब इस सूची को केन्द्र सरकार, सभी राज्य सरकारों, चारों पीठों के शंकराचार्यों और 13 अखाड़ों के पीठाधीश्वरों को भेजा जाएगा और इनके बहिष्कार की मांग की जाएगी। अखाड़ा परिषद की कोशिश होगी कि इन बाबाओं को कुंभ, अर्द्धकुंभ और दूसरे धार्मिक समागमों में प्रवेश ना मिले। इसके अलावा परिषद ने ‘संत’ की उपाधि देने के लिए एक प्रक्रिया तय करने का फैसला किया है ताकि गुरमीत राम रहीम जैसे पाखंडी इसका गलत इस्तेमाल ना कर सके।

बता दें कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद 13 अखाड़ों की संयुक्त संस्था है जिसमें निर्मोही अखाड़ा भी शामिल है, जो अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन का चेहरा है। यह भी बता दें कि विश्व हिन्दू परिषद अखाड़ा परिषद के साथ मिलकर काम करता है। आज की महत्वपूर्ण बैठक में सभी 13 अखाड़ों से 2-2 संत यानि कुल 26 संत शामिल थे।

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एक चाय बेचने वाला भारत का प्रधानमंत्री कैसे बन गया ?

इस टाइटल को पढ़ने के बाद आप में से ज्यादा लोग यही सोचेंगे कि लक, किस्मत, नसीब ने नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया, साईकिल पर चढ़ कर चूरन बेचने वाले रामदेव को फ़र्स से अर्श तक पहुचाया और भारत का बिज़नस टायकुन बनाया | क्या सच में होता है किस्मत ? किस्मत या फिर लक इस दुनिया की सबसे रहस्यमयी शक्ति है | ऐसा क्यों होता है हम में से कुछ लोगों के साथ हमेशा अच्छी चीजें होती है और किसी-किसी के साथ हमेशा बुरी | तो किस्मत या लक या फिर नसीब कहलें- क्या यह सब एक ‘इत्तेफाक’ है | कोई अगर लगातार 10 बार लौटरी जीत जाये तो क्या हम इसे उसका लक कहेंगे या फिर ‘इत्तेफाक’ | अगर लक कहेंगे तो क्या सबकुछ पहले से तय है जिससे कोई बार-बार लौटरी जीत रहा है तो कोई चाय बेचते-बेचते प्रधानमंत्री बन जाता है | या फिर ये सब एक इत्तेफाक है ! क्या ये इत्तेफाक (Randomness) हमारे ब्रह्मांड पर राज करता है ??

जब हमारी जिंदगी में सारी परिस्थितियां अनुकूल होती है तो हम इसे अपना गुड-लक मानते हैं और जब परिस्थितियां बुरी होती है तो हम उसे अपना बैड-लक मानते हैं | पर आखिर ऐसा क्यों होता है हमारे साथ ? क्या कोई रहस्यमयी चीज़ है जो हमारी परिस्थितियों को नियंत्रित करती है ? तो आइये जानते हैं कि विज्ञान क्या कहता है- वो शक्ति जो हमारी गुड-लक और बैड-लक परिस्थितियों को तय करती है वो हमारी शरीर की एक अवस्था है जिसका जवाब Physics में है, जी हाँ Quantum Physics में | अगर हम Quantum Physics की बात मानें तो हम एक विशुद्ध शक्ति पुंज हैं | हम में भी ठीक उसी प्रकार कम्पन होता है जैसा की किसी भी Charged Particle में | बस सिर्फ हमें बाहर से हमारा शरीर नजर आता है | हम सबों ने अपने भीतर की उस उर्जा को कभी न कभी जरुर  महसूस किया है |

तो आज हम आपको बतायेंगे कि एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री कैसे बन गया- Quantum Physics के वैज्ञानिकों ने फ्रीक्वेंसी मापक यंत्र  द्वारा ये साबित कर दिया है कि एक साधारण स्वस्थ मनुष्य का शरीर 60-72 मेगाहर्ज़ पर कम्पन करता है | और गड़बड़ी तब हो जाती है जब आपके शरीर का कम्पन 60 मेगाहर्ज़ से नीचे हो जाये | इस अवस्था में आप किसी काम के नहीं होते हैं | चारों ओर असंतोष व्याप्त होने लगता है, आपके साथ हमेशा बुरा होता है, आपकी किस्मत आपको छोड़ के जा चुकी होती है, आपसे कोई प्यार नहीं करता है, आप नशे के गिरफ्त में आ चुके होते हैं, जिंदगी बोझ बन जाती है और आप बन जाते हो धरती के बोझ ! तभी तो हमारे क्रन्तिकारी मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने बिहार में शराब बंदी करवाई जिससे की बिहार की जनता Low Frequency Zone में न जा सके…… और एक अच्छी जिंदगी बना सके |

बहरहाल अब हम बात करते हैं जब हमारे शरीर की फ्रीक्वेंसी 72 मेगाहर्ज़ से ऊपर यानि 75-80-82 हो तो हम एक खुशहाल जिंदगी की तरफ़ बढ़ रहे होते हैं, हमारा जीवन स्वस्थ होता है, लोग हमसे प्यार करते हैं, हमें एक कामयाब आदमी की पहचान मिलती है या कुल मिलाकर कहें हम एक बहुत ही कामयाब जिंदगी जी रहे होते है  और अगर ये फ्रीक्वेंसी 90 मेगाहर्ज़ के पार चले जाये तो हम बहुत ही किस्मत वाले हो जाते हैं, हमारे सारे सपने सच होने लगते हैं, हमारा प्रभाव दिन-ब-दिन बढ़ने लगता है | ठीक यही बात हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के साथ घटित हुई है उन्होंने अपने आप को Low Frequency Zone से High Frequency Zone में स्थापित किया और चाय बेचते-बेचते भारत के प्रधानमंत्री बन गये | वहीँ साईकिल पर चूरन बेचने वाला रामदेव- बिज़नस टायकुन चार्टर्ड प्लेन पर चढ़ने वाले बाबा रामदेव बन गये |

महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला ने कहा था-  “If you want to understand this Universe then think in terms of Energy, Vibration and Frequency”

तो एक बात साबित हो ही गई कि किस्मत उनकी चमकती है, लक उनका साथ देता है,नसीब उनका बनता है, मुकद्दर का सिकंदर वो होता है जिनकी फ्रीक्वेंसी हाई होती है |

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मोदी कैबिनेट का विस्तार: कुछ अहम पहलू

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को कैबिनेट का तीसरा विस्तार किया। इस विस्तार में कुल 13 मंत्रियों ने शपथ ली, जिनमें 9 नए हैं, जबकि 4 मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री के रूप में प्रमोशन दिया गया। इस विस्तार में बिहार को आरके सिंह (ऊर्जा और नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री) और अश्विनी कुमार चौबे (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री) के रूप में दो नए मंत्री मिले। लेकिन देखा जाय तो इस विस्तार में बिहार की किरकिरी भी कम नहीं हुई। पहली किरकिरी तो यह कि बिहार के सारण से सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी इकलौते ऐसे मंत्री रहे जिनके लिए कहा जा रहा है कि उनका प्रदर्शन संतोषजनक न होने के कारण उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया गया। वैसे तर्क उन्हें संगठन में लाए जाने का दिया जा रहा है। और दूसरी किरकिरी यह कि मीडिया में तमाम चर्चा के बावजूद जेडीयू को इस विस्तार में शामिल नहीं किया गया।

बहरहाल, अब उन चार मंत्रियों पर एक नजर जिन्हें प्रमोशन मिला। ये चार मंत्री हैं – निर्मला सीतारमण, धर्मेन्द्र प्रधान, पीयूष गोयल और मुख्तार अब्बास नकवी। सबसे अहम बात यह कि निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्रालय का भार सौंपा गया। मोदी ने एक बार फिर साबित किया कि जो उनके भरोसे पर खरा उतर रहा हो, उसको लेकर वो चौंकाने वाला फैसला कर सकते हैं। जेएनयू की छात्रा रहीं सीतारमण ने वाणिज्य  मंत्री के तौर पर उन्हें प्रभावित किया और परिणाम सामने है। गौरतलब है कि महिलाओं में निर्मला से पहले केवल इंदिरा गांधी ने रक्षा मंत्रालय संभाला है और वो भी तब, जब वो प्रधानमंत्री थीं। निर्मला के बाद मोदी ने पीयूष गोयल और धर्मेन्द्र प्रधान पर भरोसा जताया है। गोयल को रेल मंत्रालय सौंपा गया, जबकि कोयला मंत्रालय उनके पास पूर्ववत रहेगा ही। वहीं प्रधान को कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय का जिम्मा दिया गया है और इसके साथ पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय भी उन्हीं के पास रहेगा। बचे नकवी, अब वो अल्पसंख्यक मामलों के कैबिनेट मंत्री होंगे।

इस विस्तार की एक खास बात यह भी रही कि प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल में जिन नौ नए मंत्रियों को शामिल किया है, उनमें चार पूर्व नौकरशाह हैं। ये हैं – पूर्व गृह सचिव आरके सिंह, पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर सतपाल सिंह, सेवानिवृत्त डिप्लोमैट हरदीप सिंह पुरी और सेवानिवृत्त आईएएस केजे अल्फोंस। इनमें से पुरी और अल्फोंस तो सांसद भी नहीं हैं। यहां तक कि अल्फोंस का रुझान वामपंथी राजनीति की तरफ रहा है। दूसरी ओर आरके सिंह इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा पर अपराधियों से पैसे लेकर उन्हें टिकट बेचने का आरोप लगा चुके हैं। तो क्या मान लिया जाय कि भाजपा के पास योग्य और अनुभवी सांसदों की इतनी कमी है कि वो समझौता करने और यहां तक कि आयातित करने तक को तैयार हैं? वैसे ‘आयातित’ करने की बात चली ही तो बता दें कि रेल मंत्री के रूप में इस्तीफे की पेशकश करने वाले सुरेश प्रभु अब वाणिज्य मंत्रालय देखेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्यों टूट रही है बिहार कांग्रेस ?

कुछ अपनी कमजोरी, कुछ क्षेत्रीय दलों का उभार, कुछ परिस्थितियों का दोष और बाकी अच्छे दिन का नारा देकर बहुत अच्छे दौर से गुजर रही भाजपा की बेजोड़ रणनीति – कुल मिलाकर कांग्रेस पस्तहाल है। केन्द्र में उसकी स्थिति सबको पता है। वहां तो मोदीयुग चल ही रहा है। हां, बिहार में महागठबंधन बनने के बाद जब उसे 27 सीटें मिलीं, तब जरूर लगा था कि मुरझाती कांग्रेस में फिर हरियाली आ जाएगी। थोड़ी आई भी। पर नीतीश ने महागठबंधन क्या छोड़ा, कांग्रेस की वो हरियाली अब जाने को है। जी हां, सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के 27 विधायकों में से 14 विधायकों ने अलग औपचारिक समूह बना लिया है और कहा जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में वे जेडीयू में शामिल हो जाएंगे। इस समूह को बस इंतजार है पार्टी के चार और विधायकों के अपने गुट में आने का, ताकि टूट के लिए जरूरी दो तिहाई आंकड़े का इंतजाम हो जाए और पार्टी से अलग होकर भी उनकी सदस्यता बची रहे।

गौरतलब है कि पार्टी में टूट की आशंका के मद्देनज़र कांग्रेस आलाकमान ने बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी और कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह को गुरुवार को दिल्ली बुलाया था। बताया जाता है कि इन दोनों नेताओं ने पार्टी में पक रही बगावती खिचड़ी से खुद को अनजान बताया, जिस पर नाराजगी जाहिर करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें हर हाल में यह टूट रोकने को कहा।

बिहार कांग्रेस के भीतर चल रहा असंतोष अब भले ही सतह पर आ गया हो, इसकी शुरुआत उसी दिन हो गई थी जब पार्टी के 27 विधायकों व छह विधानपार्षदों में से केवल चार को ही सत्ता का सुख मिला। महागठबंधन सरकार में दो एमएलसी अशोक चौधरी एवं मदन मोहन झा और दो एमएलए अब्दुल जलील मस्तान एवं अवधेश कुमार को जगह मिली, जबकि बाकी लोग ‘उपेक्षा’ और ‘प्रतीक्षा’ के बीच भटकते रहे। कुछ लोगों को आस थी कि उन्हें बोर्ड और निगम में तो जगह मिल ही जाएगी, लेकिन जेडीयू के एनडीए से जुड़ जाने के बाद उनकी वो उम्मीद भी जाती रही।

वैसे यह कहना भी गलत होगा कि ये विधायक केवल पद की लालसा में परेशान हैं। इनकी परेशानी की एक बड़ी वजह लालू प्रसाद यादव हैं। नीतीश की अनुपस्थिति में अब लालू कांग्रेस के लिए एकमात्र विकल्प हैं और यह बात उन विधायकों को आशंकित कर रही है, जिन्हें अपनी जीत के लिए अगड़ों के वोट की सख्त जरूरत है। जब तक नीतीश साथ थे उनकी ‘छवि’ अगड़ों के लालू विरोध को ‘बैलेंस’ कर देती थी, लेकिन अब वो सहारा भी जाता रहा। ऐसे में ये विधायक करें तो क्या करें।

बहरहाल, कांग्रेस नेता अभी यह कहने में जुटे हैं कि पार्टी में टूट की कोई आशंका नहीं, लेकिन राजनीति के गलियारे में यह चर्चा आम है कि इसमें अब केवल औपचारिकता ही शेष है। हालांकि पार्टी में टूट की आशंका के मद्देनज़र कांग्रेस ने ‘डैमेज कंट्रोल’ 11 अगस्त को ही शुरू कर दिया था, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया विधायकों की नाराजगी दूर करने पटना पहुंचे थे। पर अब ‘डैमेज’ ‘कंट्रोल’ से बाहर जा चुका है। बात जहां तक नीतीश कुमार की है, कांग्रेस के टूटने पर पर उनके ‘बेस’ और मनोबल दोनों में इजाफा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप      

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