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भारतरत्न से विभूषित होंगे प्रणब, नानाजी और हजारिका

केन्द्र सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक नानाजी देशमुख और गायक भूपेन हजारिका को भारतरत्न देने की घोषणा की है। नानाजी देशमुख और भूपेन हजारिका को मरणोपरांत यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिलेगा। बता दें कि इस बार भारतरत्न की घोषणा चार साल बाद हुई है। इससे पहले 2015 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं स्वतंत्रता सेनानी और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के संस्थापक मदन मोहन मालवीय को भारतरत्न से नवाजा गया था।

2012 से 2017 तक देश के राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में रहे हैं। उनका जन्म 11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के मिराती में हुआ था। 1969 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और आगे चलकर वित्त, रक्षा, विदेश, विधि और वाणिज्य जैसे मंत्रालयों को संभाला। उनके संसदीय अनुभव और अद्भुत कार्यकुशलता का लोहा विरोधी भी मानते हैं। वे न केवल बहुत बड़े व सम्मानित स्टेट्समैन बल्कि अपने आप में चलते-फिरते संस्थान हैं।

नानाजी देशमुख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक, समाजसेवी और भारतीय जनसंघ के नेता थे। उनका जन्म महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के कडोली नामक छोटे से कस्बे में 11 अक्टूबर 1916 को हुआ था। नानाजी बाल गंगाधर तिलक की राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित होकर समाज सेवा के क्षेत्र में आए। इसके बाद संघ के सरसंघचालक डॉ. केवी हेडगेवार के संपर्क में आकर संघ के विभिन्न प्रकल्पों के जरिए पूरा जीवन राष्ट्रसेवा में लगा दिया। 27 फरवरी 2010 को 95 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 में असम के सादिया जिले में हुआ था। गायक, गीतकार और संगीतकार के रूप में उनकी अप्रतिम ख्याति है।1936 में उन्होंने अपना पहला गाना रिकॉर्ड किया था। 1977 में उन्हें पद्मश्री, 2001 में पद्मभूषण, 2012 में पद्म विभूषण (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। 5 नवंबर 2011 को उनका निधन हो गया। उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि उनकी अंतिम यात्रा में 5 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए थे।

चलते-चलते बता दें कि इन तीन विभूतियों से पहले 45 हस्तियों को भारतरत्न सम्मान दिया जा चुका है। अब यह संख्या 48 हो गई है।

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मुकेश अंबानी ग्लोबल थिंकर्स 2019 की सूची में शामिल

उद्योगपति मुकेश अंबानी के नाम एक गौरवपूर्ण उपलब्धि। उन्हें प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका ‘फॉरेन पॉलिसी’ ने थिंकर्स 2019 की प्रतिष्ठित सूची में शामिल किया है। इस सूची में अलीबाबा के संस्थापक जैक मा, अमेजन के सीईओ जेफ बेजोस और आईएमएफ की प्रमुख क्रिस्टिन लेगार्ड जैसे नाम मौजूद हैं। गौरतलब है कि पत्रिका ने अपनी वेबसाइट पर 2019 की सूची के 100 नामों में से कुछ का ऐलान किया है। पूरी सूची 22 जनवरी को जारी की जाएगी।
बता दें कि सबसे धनी भारतीय मुकेश अंबानी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक हैं और रिलायंस जिओ उनकी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की ही अनुषंगी है। ‘फॉरेन पॉलिसी’ ने उनके लिए कहा, “44.3 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ मुकेश अंबानी 2018 में जैक मा को पीछे छोड़ते हुए एशिया के सबसे धनी व्यक्ति बन गए। तेल, गैस और खुदरा क्षेत्र में वर्चस्व से उन्होंने यह संपत्ति अर्जित की है लेकिन उम्मीद है कि दूरसंचार क्षेत्र की कंपनी जिओ के जरिए वह भारत पर सबसे अधिक प्रभाव डालेंगे।”
पत्रिका ने आगे कहा, “जिओ की शुरुआत के बाद छह महीने तक सेल्यूलर डाटा और वॉयस सेवा की पेशकश कर उन्होंने 10 करोड़ से अधिक ग्राहक जोड़े और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में स्मार्टफोन इंटरनेट के जरिए क्रांति कर दी।” पत्रिका में कहा गया है कि अंबानी की योजना अगले चरण में अपने डिजिटल स्पेस का इस्तेमाल करते हुए सामग्री और जीवन-शैली से जुड़ी चीजें बेचना है और अंतत: गूगल और फेसबुक को टक्कर देनी है।
चलते-चलते बता दें कि 2019 में ‘फॉरेन पॉलिसी’ पत्रिका के ग्लोबल थिंकर्स की सूची को 10 साल पूरे हो रहे हैं, इसलिए उसने सूची को 10 अलग-अलग श्रेणियों में बांटने का निश्चय किया है। मुकेश अंबानी को प्रौद्योगिकी से जुड़ी 10 शीर्ष शख्सियतों में स्थान दिया गया है।

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संसार में सबसे अधिक महिला पायलट भारत में

इधर भारत की महिलाओं में जोश व जुनून इस कदर बढ़ता जा रहा है कि शिक्षा जगत से लेकर आकाश तक उसने अपना आधिपत्य जमा रखा है। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक सर्वाधिक गोल्ड मेडल महिलाओं के गले में शोभने लगी है।

यह भी बता दें कि बाहरहाल संसार में सबसे अधिक महिला पायलट भारत में है। आप जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि यहां हर आठवीं फ्लाइट की कमान महिला के हाथ में ही होती है। देश के 10,000 पायलटों में 1200 महिलाएं विमान उड़ाने से फ्लाइट सुपरवाइज करने तक हर स्तर पर काम कर रही है।

एक समय था जब भारत में महिला को जहाज उड़ाते देखने के लिए महिला दिवस का इंतजार करना पड़ता था। विगत कुछ ही वर्षों में स्थिति में तेजी से परिवर्तन हुआ है। तभी तो आज भारत में 1200 महिला कमर्शियल पायलट कार्यरत है जो विश्व में सर्वाधिक है।

मुंबई एवं दिल्ली जैसे बड़े-बड़े एयरपोर्ट की बात तो छोड़िये….. पटना जैसे छोटे एयरपोर्ट पर भी हर दिन आती-जाती हवाई जहाज उड़ाती महिला पायलट दिख ही जाती है। कई बार तो पूरी की पूरी फ्लाइट क्रू में महिलायें ही होती हैं।

यह भी जानिए कि इंडिगो एयरलाइंस की कैप्टन स्वाति साहनी महीने में चार-पांच बार महिला फ्लाइंग क्रू के साथ हवाई जहाज उड़ाती है और कहती है कि बिना पुरुष सहयोगी के हम ऐसा काम कर रहे हैं…. अच्छा लगता है। वह यह भी बताती है कि देश की सबसे बड़ी विमान कम्पनी “इंडिगो एयरलाइन” में 2013 में जहाँ 69 महिला पायलट  थी वह 5 वर्षों में बढ़कर 300 के पार हो गई है।

इस अवधि में स्पाइसजेट, गो एयरवेज और जेट एयरवेज में महिला पायलटों की संख्या में प्रत्येक वर्ष 25 से 35 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। बावजूद इसके फ्लाइट ऑपरेशन के उच्च पदों पर भी तैनात हो रही हैं महिलाएं।

चलते-चलते यह भी जान लीजिए कि बिहार के मधुबनी जिले के छोटे से गांव उमरी की बेटी अद्विका का वायुसेना में पायलट के पद पर चयन हुआ है। वह बिहार की दूसरी महिला पायलट होगी….. फिलहाल हैदराबाद के डूंडीगल में ट्रेनिंग ले रही है….. फिर उड़ायेगी लड़ाकू विमान……।

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साल 2018 में बेरोजगार हुए 1.10 करोड़ भारतीय !

भारत की 65 प्रतिशत आबादी युवाओं की है। कहने की जरूरत नहीं कि देश का भविष्य तय करने में इस आबादी की सबसे अहम भूमिका है। ऐसे में सोच कर देखिए कि अगर यही आबादी बेरोजगारी से बेहाल हो तो हमारी दशा और दिशा क्या होगी? विडंबना तो यह है कि इधर हाल के वर्षों में जबकि अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार मिलने की उम्मीद थी, साल 2018 में करीब 1.10 करोड़ भारतीयों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा, जिनमें से अधिकांश की उम्र 40 साल से नीचे थी।
जी हाँ, रोजगार के मामले में युवाओं के लिए पिछला साल खासा बुरा रहा। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी (CMIE) की रिपोर्ट के अनुसार कमजोर समूहों से संबंधित व्यक्तियों को 2018 में नौकरी के नुकसान से सबसे ज्यादा प्रभावित होना पड़ा। इस रिपोर्ट की मानें तो देश में बेरोजगारों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। बकौल CMIE दिसंबर 2017 में जहां नौकरी कर रहे लोगों की संख्या 4.79 करोड़ थी वो दिंसबर 2018 में घटकर 3.97 करोड़ रह गई।
उपर्युक्त रिपोर्ट से पता चलता है कि शहरी और ग्रामीण दोनों तरह के तबके को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है पर ग्रामीण क्षेत्र और खासकर कृषि से जुड़े लोगों की स्थिति अधिक बुरी रही। रिपोर्ट की मानें तो ग्रामीण भारत में 91 लाख लोगों की नौकरी गई जबकि शहरी भारत में 18 लाख लोगों की नौकरी चली गई। इस रिपोर्ट की एक बेहद चौंकाने वाली बात यह भी रही कि नौकरी से हाथ धोने वाले 1.10 करोड़ लोगों में महिलाओं की संख्या 88 लाख रही और पुरुषों की 22 लाख।
इस रिपोर्ट के हवाले से चलते-चलते यह भी बता दें कि भारत में साल 2018 में बेरोजगारी की दर 7.4 प्रतिशत थी। अगर भयावह तरीके से बढ़ रही इस बेरोजगारी पर समय रहते काबू ना पाया गया तो महाशक्ति बनने का भारत का सपना पूरा होना नामुमकिन होगा।

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शादी में समाजवाद की एक अनूठी परम्परा

भारत विविधताओं का देश है। विविध जातियों एवं भिन्न-भिन्न धर्मों के लोग…… अद्भुत परंपराएं….. न जाने कितने प्रकार की विचित्रताओं से भरा है यह भारत देश हमारा।

बता दें कि भारत का एक राज्य है छत्तीसगढ़- जहाँ के सुदूर वनांचल जशपुर जिले में बसी उरांव जनजाति में विवाह की एक अनूठी परंपरा है। यूँ तो संपूर्ण संसार में शादी और श्राद्ध के सैकड़ों तरीके हैं जिनमें एक अद्भुत तरीके वाली शादी यह भी है-

छत्तीसगढ़ के उरांव जनजाति में विवाह के समय दूल्हा और दुल्हन दोनों एक-दूसरे की मांग में सिंदूर भरते हैं जिसमें दंपति को वैवाहिक रिश्तों में बराबरी का एहसास होता है…… जिसे लोग शादी में समाजवाद की संज्ञा देने लगे हैं।

यह भी बता दें कि शादी का रस्म इस तरह पूरा किया जाता है- शादी के दौरान घर के आसपास स्थित बगीचे में दूल्हा आमंत्रण का इंतजार करता है और जब दुल्हन के रिश्तेदार दूल्हे को कंधे पर बैठाकर मंडप में लाते हैं तो यह रश्म पूरी की जाती है जिसमें दुल्हन के भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वह बहन की अंगुली पकड़ता है और दुल्हन उसके सहारे दूल्हे को बिना देखे यानी पीछे की ओर हाथ करके सिंदूर भरती है। यदि दुल्हन का कोई भाई नहीं तो यह रस्म बहन पूरा करती है।

यह भी जानिए कि दूल्हा-दुल्हन दोनों तीन-तीन बार एक-दूसरे की मांग पर सिंदूर भरते हैं। ऐसा करते समय पंच के रूप में गांव के पांच वरिष्ठ सदस्य चादर से एक घेरा बनाते हैं। जिसमें बतौर गवाह कुछ खास रिश्तेदार बार-बार आवाज देते हैं कि एक बार और अच्छे से एक दूसरे को देख लो….. फिर सिंदूर भरना।

चलते-चलते यह भी बता दें कि हाल ही में उच्च शिक्षा प्राप्त कर विवाह बंधन में बंधे मोना प्रधान और विनय निकुंज ने बताया कि यह परंपरा उनके लिए महत्वपूर्ण है और बराबरी का रिश्ता होने का एहसास भी उन्हें होता है। इसमें अतिमहत्वपूर्ण बात यह भी है कि दूल्हा और दुल्हन दोनों साथ में सिंदूर खरीदने जाते हैं।

 

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अब बेटियों के नाम ही लगने लगे हैं सभी घरों पर नेम प्लेटें

मध्य प्रदेश का एक जिला है – बैतूल। इस जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर है एक गांव – खंडारा।  वह खंडारा गांव बापू के सपनों को साकार करने में लगा है जहाँ हर घर पर न केवल नाम पट्टिकायें लगी हैं बल्कि इन पट्टिकाओं  यानी नेम प्लेटों पर घर की बेटियों का नाम आज की तारीख में शोभायमान हो रहा है।

बता दें कि खंडारा गांव से शुरू हुई यह मुहिम अब जिले के हर गांव और शहर में फैल चुकी है। बड़ी संख्या में वहां के लोग अपने-अपने घरों के ऊपर नेम प्लेटों पर अपनी बेटियों का नाम लिखा रहे हैं। यह भी जानिए कि खंडारा गांव निवासी अनिल यादव ने सर्वप्रथम इस मुहिम की शुरुआत की थी।

यह भी बता दें कि स्वयंसेवी अनिल यादव ने “डिजिटल इंडिया विद लाडो” अभियान के तहत लोगों को बेटियों के नाम नेमप्लेट लगाने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया था। अनिल ने मधेपुरा अबतक से बताया कि कुछ लोगों को वे बेटियों के नाम वाले नेम प्लेटें अपनी ओर से बनवाकर भी दिये थे। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि वर्तमान में खंडारा गांव के 200 घरों में से 155 घरों में बेटियां हैं। इन सभी घरों की पहचान अब बेटियों के नाम की पट्टिकाए लगाई जा चुकी हैं। इन घरों की पहचान अब बेटियों के नाम से होती है। अन्य गांव व शहरों की तरह घर के मुखिया के नाम से नेम प्लेट नहीं होती है।

अनिल यादव का यह प्रयास न केवल समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाया है बल्कि खंडारा गांव की तो पहचान ही अब बेटियों के नाम से हो गई है। जिला मुख्यालय बैतूल शहर के अखिलेश ठाकुर ने भी जहां एक ओर अपने मकान पर अब अपने नामवाले यानी नेमप्लेट को हटाकर बेटियाँ द्वय लहक व लक्ष्मी के नाम से पट्टीका लगा रखी है वहीं दूसरी और राजेश चौकीकर भी अपने नाम वाले नेमप्लेट चंद रोज कबल हटाकर अपनी बेटियाँ वैष्णवी व समीक्षा के नाम कर दी है।

चलते-चलते यह भी बता दें कि इस अभियान से प्रभावित होकर स्थानीय विधायक ने एक महती जनसभा को संबोधित करते हुए एक सरकारी भवन का नाम भी वहाँ की प्रतिभाशाली बेटी के नाम पर रखने की घोषणा कर दी है।

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अब बिना नाम लिए वेल में आने वाले सांसद स्वतः होंगे निष्कासित

अगली लोकसभा में अब सांसदों द्वारा वेल में आकर हंगामा नहीं होगा। अभी लोकसभा में स्पीकर, वेल के अंदर खड़े, जिस सांसद का नाम लेती हैं उसी का निष्कासन होता है।
बता दें कि शीत सत्र में लगातार हंगामे होते रहे। स्पीकर सुमित्रा महाजन सर्वाधिक सख्त दिखती रही। नियम समिति के सदस्यों के साथ संवाद करती रही…… बैठक बुलाकर कवायद भी की। चर्चा के दरमियान…. छत्तीसगढ़ विधानसभा में वेल में आनेवाले विधायकों के 5 दिन के निष्कासन का फार्मूला ‘ बना मॉडल….. क्योंकि पक्ष या विपक्ष के संसद सदस्यों के नारों के साथ तख्तियां लहराकर लोकसभा की कार्यवाही ठप करनेवाले सांसदों से सुमित्रा महाजन बेहद खफा रही।
जानिए कि यदि सुमित्रा महाजन की कोशिश कामयाब हुई तो 17वीं लोकसभा में विपक्ष हंगामा तो कर सकता है परंतु सदन की कार्यवाही ठप कराने की कोशिश बंद हो जाएगी। ऐसे सांसद सदन की कार्यवाही से स्वतः निर्धारित समय सीमा के लिए निष्कासित हो जाएंगे तथा कार्यवाही सुचारू रूप से चल पायेगी।
यह भी बता दें कि इस बाबत स्पीकर की अगवाई में लोकसभा की 15 सदस्यीय नियम समिति की बैठक हुई जिसमें नियमों में बदलाव का ड्राफ्ट बनाने हेतु स्पीकर को ही अधिकृत कर दिया गया है। बैठक में छत्तीसगढ़ के फार्मूला पर जमकर चर्चा हुई….. तथा सदस्यों ने यही कहा कि मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है जिसके फलस्वरूप यह आरोप भी नहीं लगेगा कि सत्तापक्ष जान-बूझकर अपने हितार्थ ऐसा कर रहा है।

 

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प्रधानमंत्री का पद और महागठबंधन की परीक्षा

डीएमके अध्यक्ष एम के स्टालिन की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित किए जाने के बाद गठबंधन के सहयोगी असहज दिख रहे हैं। अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि अभी यह सही समय नहीं है। ममता से पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस पर असहमति जताई थी।

बहरहाल, ममता बनर्जी ने इस संदर्भ में बड़े सधे हुए तरीके से कहा कि ‘यह सही समय नहीं है, चुनाव आने दीजिए। हम सब मजबूती से साथ हैं और साथ काम कर रहे हैं। जो भी पार्टियां तय करेंगी, वही इसका जवाब होगा।’  इससे पहले तृणमूल कांग्रेस की ओर से कहा गया था कि राहुल के नाम का ऐलान किए जाने से संभावित गठबंधन में शामिल होने वाले दलों में फूट पड़ सकती है इसलिए इसपर लोकसभा चुनाव के बाद फैसला लिया जाना चाहिए।

बता दें कि ममता से पहले बुधवार को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि ‘लोग बीजेपी से नाराज हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री (केसीआर), ममताजी और शरद पवारजी ने प्रयास किया है कि सभी नेता साथ आएं और एक गठबंधन बनाएं। ऐसे में अगर कोई अपनी राय दे भी रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि गठबंधन की भी वही राय है।’ गौरतलब है कि तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की प्रतिमा के अनावरण मौके पर डीएमके प्रमुख एम के स्‍टालिन ने आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीदवारी के लिए राहुल गांधी के नाम का प्रस्‍ताव रखा था और कहा था कि कांग्रेस अध्‍यक्ष में मोदी सरकार को हराने की काबिलियत है।

कुल मिलाकर देखा जाय तो स्टालिन ने जिस तरह मुखर होकर कांग्रेस अध्यक्ष की वकालत की है, वैसी किसी और सहयोगी दल ने अब तक नहीं की है। अभी-अभी आए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस का आत्मविश्वास बढ़ा जरूर है लेकिन वह अभी से गठबंधन का नेतृत्व अपने हाथ मे लेने की बात शुरू कर दे, यह संभव नहीं दिखता। सच यह है कि अभी सभी दल गठबंधन में अपने को मजबूत दिखाने और सीटों के गणित में आगे निकलने की होड़ में लगे हैं। महागठबंधन के लिहाज से समझदारी अभी इसी में है कि सभी दल पहले एनडीए के विरुद्ध अपनी एकता कायम रखें, अहं को आड़े ना आने दें और बड़े लक्ष्य के लिए छोटे त्याग करने से ना चूकें। अगर ऐसा नहीं होता है तो एनडीए 2019 में गिरते-पड़ते ही सही, सरकार बना ले जाएगी।

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टूट गई रालोसपा, कुशवाहा के लिए संकट की घड़ी

अभी-अभी एनडीए से अलग हुई रालोसपा आज दो भागों में बंट गई। बिहार में पार्टी के दोनों विधायक और एकमात्र विधानपार्षद ने एनडीए के साथ रहने की घोषणा करते हुए रालोसपा पर दावा तक ठोंक दिया। इन नेताओं ने स्वयं को असली रालोसपा का नेता बताते हुए अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा पर व्यक्तिगत राजनीति करने का आरोप लगाया।

पटना में रालोसपा के दोनों विधायकों – सुधांशु शेखर और ललन पासवान – के साथ विधानपार्षद संजीव श्याम सिंह ने संवाददाता सम्मेलन कर एनडीए में रहने की घोषणा की और कहा कि वे एनडीए में थे और आगे भी रहेंगे। उन्होंने कहा कि रालोसपा एनडीए से कभी अलग हुई ही नहीं है। गौरतलब है कि कुछ ही दिन पूर्व रालोसपा अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने एनडीए में ‘सम्मान’ नहीं मिलने के कारण अलग होने की घोषणा की थी।

बहरहाल, संवाददाता सम्मेलन में तीनों नेताओं ने रालोसपा पर दावा ठोंकते हुए कहा कि अगर जरूरत पडे़गी तो वे लोग निर्वाचन आयोग से मिलकर अपनी बात रखेंगे। उन्होंने दावा करते हुए कहा कि पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता भी उनके साथ हैं। उपेन्द्र कुशवाहा पर व्यक्तिवादी राजनीति करने का आरोप लगाते हुए इन नेताओं ने कहा कि वे केवल अपने लाभ की बात करते हैं। उन्हें ना पार्टी से मतलब रहा ना ही उन्हें बिहार से मतलब रहा।

कुल मिलाकर पहले ही कठिन दौर से गुजर रहे उपेन्द्र कुशवाहा के लिए ये सचमुच बहुत बुरी खबर है। पार्टी में दो फाड़ होने से स्पष्ट है कि महागठबंधन में भी उन्हें वो ‘भाव’ नहीं मिलेगा जिसकी उन्हेँ अपेक्षा होगी। कांग्रेस के दिन उधर अलग फिर गए हैं। तीन-तीन राज्यों में सत्ता में आने के बाद उसके हौसले बुलंद हैं और बहुत संभव है कि पार्टी बिहार में अधिक हिस्सेदारी चाहेगी। इसका खामियाजा भी कहीं ना कहीं रालोसपा को भुगतना पड़ेगा।

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अमिताव घोष को 2018 का ज्ञानपीठ पुरस्कार

अंग्रेजी के सुविख्यात साहित्यकार अमिताव घोष को वर्ष 2018 के लिए 54वां ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाएगा। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले वे अंग्रेजी के पहले लेखक हैं। शुक्रवार को प्रतिभा रॉय की अध्यक्षता में आयोजित ज्ञानपीठ चयन समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया। उल्लेखनीय है कि अंग्रेजी को तीन साल पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार की भाषा के रूप में शामिल किया गया था और अमिताव घोष देश के सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार से सम्मानित होने वाले अंग्रेजी के पहले लेखक हैं।

साहित्य अकादमी और पद्मश्री सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित अमिताव घोष का जन्म 1956 में पश्चिम बंगाल के कोलकाता में हुआ था। उन्हें लीक से हटकर काम करने वाले रचनाकार के तौर पर जाना जाता है। वे इतिहास के ताने बाने को बड़ी कुशलता के साथ वर्तमान के धागों में पिरोने का हुनर जानते हैं। ‘द सर्किल ऑफ रीजन’, ‘दे शेडो लाइन’, ‘द कलकत्ता क्रोमोसोम’, ‘द ग्लास पैलेस’, ‘द हंगरी टाइड’, ‘रिवर ऑफ स्मोक’ और ‘फ्लड ऑफ फायर’ आदि उनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

बता दें कि ज्ञानपीठ पुरस्कार के रूप में 11 लाख रुपये की राशि, वाग्देवी की प्रतिमा और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं। यह भी जानें कि पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 में मलयालम लेखक जी शंकर कुरूप को प्रदान किया गया था।

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