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कन्हैया कुमार : ‘देशद्रोही’ या बिहार के बीहट से निकली बड़ी ‘संभावना’?

कन्हैया कुमार… पिछले दस दिनों से देश की सारी सुर्खियाँ बस इस एक नाम के इर्द-गिर्द हैं। टीवी, अख़बार और सोशल मीडिया की सारी बहसें मंझोले कद के, दुबले-पतले-से, दाढ़ी वाले इस शख़्स को लेकर हो रही हैं। फिलहाल दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद इस शख़्स की रिहाई के लिए जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय ही नहीं गुजरात के वडोदरा विश्वविद्यालय और आंध्रप्रदेश की हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी तक के छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। एक ओर उसके नाम पर पटना की सड़कों पर झड़पें हो रही हैं तो दूसरी ओर उसका नाम केरल की विधानसभा में गूंज रहा है। गुआहाटी में पूरब के बुद्धिजीवी और कलाकार सड़कों पर उतर आए हैं तो चेन्नई में तमिल लोकगायक कोवान कन्हैया के लिए ‘गीत’ गाते हुए हिरासत में लिए जा रहे हैं। एक ओर अपार समर्थन मिल रहा है उसे तो दूसरी ओर गृहमंत्री उसे देश के लिए ‘खतरा’ बता रहे हैं और उस पर ‘देशद्रोह’ का मुकदमा चलाने की बात हो रही है। आखिर कौन है ये कन्हैया कुमार..? और उससे भी बड़ा सवाल ये कि क्यों है उसके नाम पर इतना बड़ा विरोधाभास..?

बिहार के बेगूसराय जिला स्थित बीहट गांव के बेहद गरीब परिवार से आते हैं कन्हैया कुमार। बीहट से निकलकर मोकामा और फिर पटना के कॉमर्स कॉलेज होते हुए जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष पद तक पहुँचना कतई आसान नहीं था उनके लिए। क्रांतिकारियों-सा जज्बा और कम्यूनिस्ट विचारधारा के प्रति ‘नि:स्वार्थ’ समर्पण उन्हें विरासत में मिला। कभी मजदूर रहे और अब लकवाग्रस्त हो चुके पिता का पुत्र जिसका घर आंगनबाड़ी सेविका माँ की नाममात्र कमाई से चल रहा हो उसका ना तो ‘संघर्ष’ झूठा हो सकता है और ना ही उसके कुछ कर गुजरने की ‘ललक’ में लेशमात्र छलावा हो सकता है। फिर क्यों इस कन्हैया के नाम पर ‘राजनीति’ की रोटियां सेकी जा रही हैं..?

सौ आने ‘सच्ची’ है कन्हैया के भीतर की ‘आग’ पर जब आग की लपटें ज्यादा तेज हों और उसे ‘आवारा’ हवा की थोड़ी भी संगत मिल जाए तो ‘दिशा’ भटक जाना कोई बड़ी बात नहीं। बस यही और इतना ही ‘कसूर’ था कन्हैया कुमार का। करीब 22 मिनट के उस विवादित दिन के वीडियो को गौर से देखें। इसमें कन्हैया संविधान, लोकतंत्र और तिरंगे के सम्मान की बात कर रहे हैं। व्यवस्था से शिकायत है उन्हें और बदलाव की जरूरत बता रहे हैं वो। हाँ, उन्होंने आरएसएस, भाजपा और मनुवाद की मुखालफत की बात भी की लेकिन क्या इसके लिए उन पर ‘देशद्रोह’ का मुकदमा ठोक दिया जाय..? नहीं, हरगिज नहीं। बात यहीं तक रहती तो ठीक था। पर अपनी ‘रौ’ में कन्हैया ये भी कह गए कि कौन है कसाब..? कौन है अफजल गुरु..? कौन हैं ये लोग जो अपने शरीर में बम बांधकर हत्या करने को तैयार हैं..? इन पर यूनिवर्सिटी में बहस होनी चाहिए।

अगर कन्हैया का विरोध “फांसी’ के लिए था और वो इस पर ‘बहस’ चाहते थे तो उन्हें बस वहीं तक रहना चाहिए था। उनके प्रति पूरी सहानुभूति होने के बावजूद कसाब या अफजल तक उनका पहुँचना अखरता है। वो बेजोड़ और जोशीले वक्ता हैं इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन जोश के साथ होश का ख्याल उन्हें हर हाल में रखना चाहिए था। तब तो और भी ज्यादा जब मुद्दा इतना संवेदनशील हो, कैंपस जेएनयू का हो और वो स्वयं छात्रसंघ के अध्यक्ष की हैसियत से बोल रहे हों। उस वक्त किसी भी तरह के ‘अतिवाद’ से बचने की नैतिक जिम्मेदारी बनती थी उनकी। माना कन्हैया से ‘भूल’ हुई लेकिन उस ‘भूल’ को ‘अपराध’ कहना और ‘देशद्रोह’ करार देना उससे भी बड़ी ‘भूल’ होगी। ऐसी कोशिश करने वालों को आँखें खोलकर देखना और सोचना चाहिए कि कन्हैया के समर्थन में हो रहे प्रदर्शनों में ‘भगत सिंह’ और ‘रोहित वेमुला’ की तस्वीरों वाली तख्तियां क्यों हैं..?

जेएनयू कैंपस में हुए 9 फरवरी के उस विवादित कार्यक्रम के ‘अलग-अलग’ विडियो सामने लाए जा रहे हैं। तस्वीरों से ‘छेड़छाड़’ की जा रही है। ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि कन्हैया ने देशविरोधी नारे लगाए और वो ‘देशद्रोही’ हैं। ये सारी कवायद तकलीफदेह है। जरूरत इस बात की है कि कन्हैया जैसे छात्रों की ‘धार’ से बदहाल व्यवस्था के ढाँचे और साँचे को तराशा जाय। उनके भीतर की ‘आग’ से देश के लिए ‘ऊर्जा’ पैदा की जाय। वामपंथ या दक्षिणपंथ का चश्मा लगाकर हम किसी ‘कन्हैया’ को करीब से नहीं जान पाएंगे। पहले हम ऐसे किसी भी चश्मे को उतारें, फिर देखें कि बिहार के बीहट से कितनी बड़ी ‘संभावना’ ने जन्म लिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इन पाँच ‘खिड़कियों’ से देखें… तब दिखेगी पूरी बसंत पंचमी

बसंत पंचमी यानि माघ महीने की शुक्ल पंचमी यानि ऋतुओं के राजा बसंत के आगमन का उद्घोष। इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है और प्रकृति नवयौवना-सी सजना-संवरना शुरू करती है। पेड़ों के पुराने पत्तों की जगह आप नई कोंपलों को देखते हैं और प्रकृति में जैसे नए जीवन का संचार हो उठता है। बसंत सच्चे अर्थों में प्रकृति का उत्सव है जिसका आगाज उसकी पंचमी से होता है। पर केवल इतनी ही नहीं है बसंत पंचमी। इस बसंत पंचमी को देखने की खातिर कई खिड़कियाँ हैं। चलिए उनमें से इन पाँच खिड़कियों को खोलें।

पहली खिड़की…

बसंत पंचमी से जुड़ी एक रोचक कथा है। भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना तो कर दी लेकिन वो स्वयं अपनी रचना से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें अपनी ही रची सृष्टि मलिन और उदास लगती थी। हर तरफ बस मौन ही मौन छाया रहता था। उन्हें लगा कहीं कुछ कमी रह गई है। बहुत सोचने के बाद उन्होंने विष्णु से आज्ञा लेकर पृथ्वी पर अपने कमंडल से जल छिड़का। जलकण के पड़ते ही पृथ्वी में कम्पन होने लगा और वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। वह एक चतुर्भुजी सुन्दर स्त्री थी जिसके एक हाथ में वीणा थी और दूसरा हाथ वर की मुद्रा में था। शेष दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। जी हाँ, वो शक्ति माँ सरस्वती थी। ब्रह्मा ने उनसे वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही माँ सरस्वती ने वीणा का मधुर नाद किया पूरी सृष्टि गुंजायमान हो गई। संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को ‘वाणी’ प्राप्त हो गई। तभी तो उन्हें वीणावादिनी और वाग्देवी जैसे नामों से पुकारते हैं। इस तरह बसंत पंचमी माँ सरस्वती का जन्मोत्सव भी है जिसे हम सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं।

दूसरी खिड़की…

बसंत पंचमी हमें त्रेता युग और रामकथा से भी जोड़ती है। सीताहरण के बाद श्रीराम उन्हें खोजते हुए दक्षिण की ओर बढ़े और जिन स्थानों पर वो गए उनमें एक दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नाम की भीलनी रहती थी जिसने राम की भक्ति में विभोर होकर उन्हें अपने जूठे बेर खिलाए थे। वह स्थान वर्तमान गुजरात के डांग जिले में है जहाँ शबरी का आश्रम था। आपको बता दें कि श्रीराम बसंत पंचमी के दिन ही शबरी के यहाँ गए थे।

तीसरी खिड़की…

बसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं। ये दिन हमें इतिहासप्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। पृथ्वीराज ने मोहम्मद गोरी को सोलह बार पराजित किया और हर बार उदारता दिखाते हुए उसे छोड़ दिया। पर जब सत्रहवीं बार वो स्वयं पराजित हुए तब गोरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आँखें फोड़ दीं। इसके बाद की घटना जगतप्रसिद्ध है। मोहम्मद गोरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा और पृथ्वीराज ने इस बार कोई भूल नहीं की। अपने साथी चंदबरदाई की मदद से उन्होंने पहले अपने बाण को गोरी के सीने में पहुँचाया और इसके बाद पृथ्वीराज और चंदबरदाई ने एक-दूसरे के पेट में छुरा भोंक आत्मबलिदान दे दिया। 1192 में ये ऐतिहासिक घटना बसंत पंचमी के दिन ही हुई थी।

चौथी खिड़की…

बसंत पंचमी का एक सूत्र ‘कूका पंथ’ की स्थापना करने वाले गुरु रामसिंह कूका से भी जुड़ा है। 1816 ई. में उनका जन्म बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। गुरु रामसिंह ने उस युग में ना केवल नारी उद्धार, अन्तर्जातीय विवाह, सामूहिक विवाह, स्वदेशी और गोरक्षा के लिए आवाज बुलंद की थी बल्कि अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी शहादत भी दी थी।

पाँचवीं खिड़की…

बसंत पंचमी के ही दिन 1899 में सरस्वती के वरदपुत्र महाकवि निराला का जन्म भी हुआ था। अपनी रचनाओं से हिन्दी को उन्होंने जैसा गौरव दिया उसकी कोई सानी नहीं। इस ‘महाप्राण’ को जाने बिना तो ‘सरस्वती’ की पूजा भी पूरी ना होगी।

बसंत पंचमी को चाहे प्रकृति में देखें चाहे पुराणों में… त्रेतायुग में ढूंढ़ें या आधुनिक भारत में… इतिहास की नज़र से देखें या साहित्य में गोते लगाकर… अन्त में हम बस यही पाएंगे कि यौवन हमारे जीवन का बसंत है और बसंत इस ‘सृष्टि’ और हमारे ‘संस्कार’ का यौवन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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आईपीएल में गुजरात लायंस की ओर से खेलेगा बिहार का ‘शेर’ ईशान

क्रिकेट की दुनिया में बिहार की उम्मीदों को पर देने वाले ईशान किशन आईपीएल के नौवें सत्र में गुजरात लायंस की ओर से खेलेंगे। आईसीसी अंडर-19 विश्व कप में भारत की जूनियर टीम के कप्तान ईशान आईपीएल के लिए चुने जाने वाले पटना के पहले और बिहार के दूसरे खिलाड़ी हैं। उनसे पहले नालंदा के तेज गेंदबाज वीर प्रताप सिंह का चयन आईपीएल की टीम सनराइजर्स हैदराबाद के लिए हुआ था। हालाँकि नौवें सत्र के लिए वीर प्रताप को किसी टीम नहीं खरीदा। अब बिहार की अपेक्षाओं का सारा भार ईशान के कंधों पर होगा। बता दें कि महेन्द्र सिंह धोनी को आदर्श मानने वाले ईशान उन्हीं की तरह विकेटकीपर बल्लेबाज हैं।

आईपीएल के लिए बेटे के चयन से फूले नहीं समा रहे पिता प्रणव किशन पांडेय कहते हैं कि ईशान का क्रिकेट के इस लोकप्रिय फॉर्मेट के लिए चुना जाना बिहार के लिए गौरव की बात है। दुनिया भर के बेहतरीन क्रिकेटरों के साथ खेलने से उसके खेल में और निखार आएगा। उन्होंने बताया कि यह ईशान के लिए खुद को साबित करने का शानदार मौका है। बता दें कि पटना के डीपीएस के छात्र रहे ईशान को क्रिकेट खेलने की वजह से एटेंडेंस पूरा नहीं कर पाने के कारण स्कूल से निकाल दिया गया था। लेकिन पिता ने हार नहीं मानी और बेटे की खेल प्रतिभा पर भरोसा कर उसका दाखिला अश्विनी पब्लिक स्कूल में कराया जहाँ उसे क्रिकेट खेलने की सुविधा मिली और वो अपने ‘गन्तव्य’ की ओर कदम बढ़ा पाया।

बिहार के प्रसिद्ध क्रिकेटर अमीकर दयाल के शिष्य ईशान ने क्रिकेट की बारीकियां पटना में ही सीखीं। तीन साल पहले क्रिकेट खेलने वे रांची गए जहाँ सेल के कप्तान अरुण विद्यार्थी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और सेल के लिए खेलने का मौका दिया। ईशान ने अपने करियर की शुरुआत रणजी ट्रॉफी ग्रुप सी (प्रथम श्रेणी क्रिकेट) में 2014 में की। इसके बाद इस होनहार खिलाड़ी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहले भारत की जूनियर टीम के कप्तान और अब आईपीएल के लिए चुने जाकर इस खिलाड़ी ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा साबित की है। बता दें कि गुजरात लायंस ने उनके लिए 35 लाख की बोली लगाई।

ईशान किशन जिस रफ्तार से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं उसे देखते हुए ये आशा की जानी चाहिए कि वे बहुत जल्द भारतीय टीम के सदस्य बनेंगे। ना केवल बिहार बल्कि झारखंड भी इस विकेटकीपर बल्लेबाज में अगले ‘धोनी’ को देख रहा है। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से क्रिकेट के इस ‘भविष्य’ को भविष्य के लिए ढेर सारी मंगलकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इतनी जल्दी खुल गई ‘महागठबंधन’ की गांठ..?

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब लालू ने कहा था कि नीतीश बिहार में शासन चलाएंगे और वे खुद महागठबंधन की ‘मशाल’ लेकर देश भर में घूमेंगे। महागठबंधन के ‘भीतर’ और ‘बाहर’ “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” का माहौल दिख रहा था। पर ये क्या बिहार का बॉर्डर पार कर यूपी पहुँचते-पहुँचते उस ‘मशाल’ की लौ धीमी पड़ गई। अब ख़बर ये आ रही है कि यूपी चुनाव में ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ की राह अलग-अलग होगी। इस बात का संकेत और किसी ने नहीं स्वयं जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने दिया है।

मंगलवार को वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि बिहार जैसा महागठबंधन उत्तर प्रदेश में भी बने, ऐसा जरूरी नहीं है। उन्होंने बताया कि यूपी के कई दलों ने नीतीश कुमार से सम्पर्क किया है। पार्टी की सोच है कि वहाँ नीतीश कुमार के ‘नेतृत्व’ में महागठबंधन बने। इस बाबत कई सामाजिक संगठन भी सम्पर्क में हैं। सिंह ने कहा कि यूपी में हमारा ‘हस्तक्षेप’ होगा। हम वहाँ चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारेंगे। आने वाले दिनों में नीतीश कुमार वहाँ राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेंगे। वैसे बता दें कि नीतीश कल भी गाजीपुर के एक कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।

यूपी चुनाव को लेकर जेडीयू का ये स्टैंड अकारण नहीं है। सूत्रों के अनुसार आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के बीच पारिवारिक रिश्ता होने के कारण इस बात की प्रबल सम्भावना है कि आरजेडी यूपी में समाजवादी पार्टी के खिलाफ सक्रिय नहीं होगी। दूसरी ओर, बिहार चुनाव से ठीक पहले महागठबंधन से सपा के अलग हो जाने के कारण जेडीयू मुलायम के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक तालमेल के पक्ष में नहीं है।

जेडीयू ने यूपी में अपनी जमीन तलाशने को लेकर सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और प्रधान महासचिव केसी त्यागी पहले से ही ‘मिशन यूपी’ पर थे। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद यूपी की किलेबंदी की कवायद में कूद पड़े हैं। नीतीश अभी दिल्ली प्रवास पर हैं और बताया जा रहा है कि इस प्रवास का मूल उद्देश्य यूपी चुनाव से जुड़ी सम्भावनाओं पर काम करना है। उनकी मुलाकात पूर्वी उत्तर प्रदेश में मजबूत पकड़ रखने वाली ‘पीस पार्टी’ के नेता अय्यूब अंसारी और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह से तय है। इसके अतिरिक्त जेडीयू ‘अपना दल’ के सम्पर्क में भी है।

ये तो हुई ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ की पार्टियों की बात। यूपी चुनाव को लेकर बिहार के महागठबंधन में शामिल तीसरी पार्टी कांग्रेस का रुख देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा। फिलहाल कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वैसे असम में नीतीश कांग्रेस को आगे कर जिस तरह ‘भाजपाविरोधी’ महागठबंधन की कोशिश में लगे हुए हैं उसे देखते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यूपी में भी नीतीश के प्रस्तावित महागठबंधन से देर-सबेर कांग्रेस का ‘जुड़ाव’ हो जाय। ऐसे में सबकी निगाह ‘अकेली’ पड़ गई आरजेडी की प्रतिक्रिया पर होगी और साथ में इस पर भी कि क्या उस ‘प्रतिक्रिया’ का बिहार पर भी कोई ‘असर’ होगा..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश कुमार को पेरियार इंटरनेशनल का सोशल जस्टिस अवार्ड   

अगर आप काम करेंगे तो तय है कि आपको पहचान मिलेगी और अगर आपका काम समाज को समर्पित है तो आप वास्तव में बड़े सम्मान के हकदार हैं। हम यहाँ बात कर रहे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जिन्हें ‘पेरियार इंटरनेशनल’ ने सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए ‘के. वीरमणि सोशल जस्टिस अवार्ड’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। नीतीश को यह सम्मान वर्ष 2015 के लिए दिया जाएगा। बता दें कि यह पुरस्कार महान समाज सुधारक और दलित आदर्श पेरियार ई.वी. रामासामी के अनिवासी भारतीय अनुयायियों द्वारा ‘द्रविड़ कड़गम’ के अध्यक्ष व तमिलनाडु स्थित पी.एम. यूनिवर्सिटी (Periyar Maniammai University) के चांसलर डॉ. के. वीरमणि के नाम पर शुरू किया गया है।

अमेरिका स्थित ‘पेरियार इंटरनेशनल’ सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करने वाला विश्वस्तरीय संगठन है। इस संगठन द्वारा इससे पूर्व यह सम्मान पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, एम करुणानिधि, सीताराम केसरी और मायावती जैसी 16 हस्तियों को दिया जा चुका है। चन्द्रजीत यादव, जीके मूपनार, वी. हनुमंत राव और छगन भुजबल भी यह पुरस्कार पा चुके हैं। अवार्ड समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण तमिल ने कहा कि पेरियार इंटरनेशनल नीतीश को यह सम्मान पटना में देने की योजना बना रहा है।

अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में नीतीश ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उनके कुछ निर्णयों की आलोचना भी हुई है। लेकिन न्याय के साथ विकास के लिए उन्होंने जो प्रतिबद्धता दिखाई है उसके कायल उनके विरोधी भी रहे हैं। बिहार चुनाव में महागठबंधन को मिली ऐतिहासिक सफलता ने प्रमाणित किया कि नीतीश की व्यक्तिगत छवि बिहार के तमाम राजनीतिक समीकरणों पर भारी है। बिहार जैसे जटिल सामाजिक व राजनीतिक संरचना वाले राज्य में ‘सुशासन’ की धाक जमा कर नीतीश ने ना केवल राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। नीतीश को दिया जाने वाला उपरोक्त पुरस्कार इसी बात की तस्दीक है।

बिहार और देश के हित में निरन्तर कार्य कर भविष्य में ऐसी अनेक उपलब्धियां हासिल करने के निमित्त ‘मधेपुरा अबतक’ सामाजिक न्याय के इस पुरोधा को अपनी शुभकामनाएं देता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में महिलाओं को 35% आरक्षण और सरकारी नौकरी का गणित

पंचायत व नगर निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण देने के बाद शिक्षक बहाली में 50 प्रतिशत आरक्षण, फिर सिपाही बहाली में 35 प्रतिशत आरक्षण और अब अन्य सभी सेवाओं या संवर्गों में 35 प्रतिशत आरक्षण। बिहार सरकारी नौकरी में महिलाओं को इतने बड़े पैमाने पर आरक्षण देने वाला पहला राज्य बन गया है। बिहार सरकार के फैसले के मुताबिक सभी नौकरियों के सभी पदों पर सीधी भर्ती में महिलाओं को 35 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाएगा। सरकार ने आरक्षित और गैर आरक्षित श्रेणी में भी महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है।

यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि बिहार की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को 3 प्रतिशत आरक्षण पहले से ही मिल रहा है। सरकार की इस नई घोषणा के बाद भी वह यथावत रहेगा। अर्थात् अभी जिस 35 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई है वह आरक्षित एवं गैर आरक्षित कोटे की शेष 97 प्रतिशत नौकरियों पर लागू होगा।

बता दें कि बिहार में वर्तमान में अनुसूचित जाति के लिए 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 1 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग के लिए 18 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग के लिए 12 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद यह गणित कुछ इस तरह होगा। अब अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 16 प्रतिशत में से महिलाओं के लिए 5.6 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 1 प्रतिशत में से .35 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित 18 प्रतिशत में से 6.3 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित 12 प्रतिशत में से 4.2 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित 50 प्रतिशत में से 17.5 प्रतिशत स्थान सुरक्षित रहेगा। कहने का अर्थ यह है कि महिलाओं को आरक्षण का लाभ जातिगत आधार पर ही मिलेगा। याद दिला दें कि केन्द्र में महिला आरक्षण बिल के लंबित होने का यह बड़ा कारण रहा है। कई विपक्षी दल जातिगत आधार पर ही महिलाओं को आरक्षण दिए जाने की मांग करते रहे हैं।

महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देते हुए यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों के लिए योग्य उम्मीदवार ना मिल पाने की स्थिति में रिक्त स्थानों को उसी भर्ती व्रर्ष में संबंधित वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों से भरा जाएगा।

विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने जो सात वादे (निश्चय) किए थे उनमें महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण एक बड़ा वादा था। उनकी सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाते हुए उस वादे को पूरा भी कर दिया। लेकिन यह बात सरकार भी जानती है, हम भी जानते हैं और जिन महिलाओं को आरक्षण मिला है वो भी जानती हैं कि इस आरक्षण का वास्तविक लाभ तभी मिल पाएगा जब महिलाएं सही मायने में पुरुषों के साथ कदमताल कर रही होंगी। उदाहरण के तौर पर पंचायत या नगर निकायों को ही लें। होने को वहाँ महिलाएं 50 प्रतिशत हैं लेकिन हम ह्रदय पर हाथ रख कर क्या ये कह पाने की स्थिति में हैं कि उनकी भागीदारी व्यवहार में भी 50 प्रतिशत है..?

सच तो यह है कि ‘आरक्षण’ की शुरुआत घर से होनी चाहिए। बेटे और बेटी के लिए 50-50 प्रतिशत का आरक्षण। अधिकार में भी और कर्तव्य में भी। स्नेह में भी और सम्मान में भी। जिस दिन ऐसा होगा उस दिन किसी ‘महिला आरक्षण’ की जरूरत ही नहीं होगी। और हाँ, यही फार्मूला जातियों के आरक्षण पर भी लागू हो सकता है। अगर हम समाज को परिवार मानें और सभी जातियों को उसकी संतानें।

कोई भी आरक्षण ‘वंचितों’ को समानता का अवसर प्रदान करने के लिए होना चाहिए। आरक्षण अगर हमें अपनी कमजोरी से लड़ने की ताकत दे तो ठीक है। अगर वो कमजोरी को ही हथियार बनाना सिखाए तो वो सत्ता में आने और बने रहने की राजनीति के सिवाय कुछ भी नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘हम’ ने शुरू की अपने ‘होने’ का अहसास कराने की जद्दोजहद

विधानसभा चुनाव के ‘सदमे’ से उबरने में बेशक थोड़ा वक्त लगा हो लेकिन ‘हम’ ने बिहार में अपने ‘होने’ का अहसास नए सिरे से कराने की जद्दोजहद शुरू कर दी है। हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा – सेक्युलर (‘हम’) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी के निर्देशन एवं प्रदेश अध्यक्ष वृषिण पटेल के आह्वान पर कल यानि सोमवार 12 जनवरी 2016 को पार्टी ने बिहार के सभी जिला मुख्यालयों पर ‘किसानविरोधी’ और ‘जनविरोधी’ सरकार के खिलाफ एकदिवसीय धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया।  मधेपुरा में भी जिला अध्यक्ष अध्यक्ष शौकत अली के नेतृत्व में ‘हम’ ने किसानों की समस्या एवं हत्या, अपहरण आदि की बढ़ती घटनाओं को लेकर राज्य सरकार के प्रति आक्रोश जताया और इस बहाने लोगों से जुड़ने और पार्टी की जड़ जमाने की कोशिश की।

मोहम्मद शौकत अली की अध्यक्षता में समाहरणालय गेट के सामने धरना देते हुए विभिन्न प्रखंडों के अध्यक्ष किसानों की धान की खरीद नहीं होने, बोनस नहीं दिए जाने और पूर्व बकाये का भुगतान नहीं किए जाने पर जमकर बरसे। मौके पर ‘हम’ के जिला छात्र अध्यक्ष नीतीश कुमार, उपाध्यक्ष रविन्द्र कुमार, जिला संगठन सचिव शिवदेव मंडल एवं जिला प्रवक्ता अशोक झा ने राज्य में अपराध व भ्रष्टाचार की बढ़ती घटनाओं को लेकर सरकार को घेरने की पुरजोर कोशिश की। इस अवसर पर जिला अध्यक्ष शौकत अली के साथ प्रखंड अध्यक्ष मनिका देवी (सिंहेश्वर), पवन गुप्ता (चौसा), राजेन्द्र चौधरी (बिहारीगंज), नित्यानंद ऋषिदेव (कुमारखंड), गुद्दर ऋषिदेव (घैलाढ़) सहित बनिलाल, प्रयाग व रामचन्द्र ऋषिदेव ने जिला पदाधिकारी को पार्टी की ओर से ज्ञापन भी सौंपा।

धरना-प्रदर्शन के बहाने ‘हम’ ने मधेपुरा का ध्यान तो खींचा लेकिन इसकी एक दूसरी वजह भी रही। जी हाँ, इसी दिन पार्टी की अन्दरूनी तनातनी और खेमेबाजी भी सामने आई। मोहम्मद शौकत अली की अध्यक्षता में समाहरणालय के समक्ष दिए जा रहे धरना के समानान्तर स्थानीय कला भवन के समक्ष एक और धरना दिया गया जिसकी अध्यक्षता सिंहेश्वर से पार्टी की प्रत्याशी रही मंजू देवी ने की और धरने का संचालन ‘हम’ के नेता ध्यानी यादव ने किया। इस धरने में चन्द्रदेव पंकज, मनोज यादव, भूषण झा, चन्दन मंडल, संजय राय, गजेन्द्र पासवान, सुरेन्द्र सरदार आदि उपस्थित थे।

उद्देश्य भले ही दोनों खेमों का समान हो और दोनों ही खेमे शीर्ष नेतृत्व के प्रति समर्पण भी जता रहे हों लेकिन जिले में चुनाव के बाद हो रहे पहले बड़े आयोजन में पार्टी के इस तरह दो खेमे में बंट जाने से इसके समर्थक निराश देखे गए। दोनों खेमे को आज नहीं तो कल ये समझना ही होगा कि उद्देश्य बड़ा हो तो छोटे मतभेदों को दूर कर लेना ही श्रेयस्कर होता है।

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‘बिहार’ की राजधानी ‘दिल्ली’ कहने वाले शिक्षकों का मूल्यांकन कैसे करेंगे पदाधिकारी..?

शिक्षा विभाग ने एक बड़ा फैसला लेते हुए प्राइमरी से प्लस टू तक के बच्चों एवं शिक्षकों के मूल्यांकन (एसेसमेंट) की घोषणा की है। मूल्यांकन का कार्य फरवरी 2016 से प्रारम्भ होगा। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार को लेकर शिक्षा विभाग ने ये ‘भगीरथ’ संकल्प ले तो लिया है लेकिन मूल्यांकन की ‘गंगा’ आसानी से ‘धरती’ पर उतरने वाली नहीं हैं। जी हाँ, राह में कई मुश्किलें हैं और उनसे वाकिफ होने पर आप भी कुछ ऐसा ही सोचेंगे।

आगे बात करें उससे पहले मूल्यांकन की प्रक्रिया और उसके उद्देश्य को जानें। शिक्षा विभाग के निर्देश के अनुसार जिले से प्रखंड स्तरीय सभी शिक्षा पदाधिकारी एक-एक स्कूल का निरीक्षण करेंगे और किए गए एसेसमेंट के आधार पर जिले के सभी पदाधिकारी यानि डीईओ, डीपीओ, बीईओ आदि की रैंकिंग की जाएगी। रैंकिंग के आधार पर ही इन पदाधिकारियों को वेतन व अन्य सुविधाएं दी जाएंगी। कहने का मतलब ये कि शिक्षा विभाग ने बच्चों एवं शिक्षकों के मूल्यांकन के बहाने बड़ी सफाई से सभी अधिकारियों की नकेल भी कस दी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षा विभाग का ये कदम स्वागतयोग्य है लेकिन ये तमाम पदाधिकारी उन शिक्षकों के एसेसमेंट में क्या लिखेंगे जो वर्ष के बारहों महीने का नाम अंग्रेजी में नहीं बोल पाते या फिर भारत की राजधानी पटना और बिहार की राजधानी दिल्ली बोलते हैं। समस्या केवल शिक्षकों की ‘अशिक्षा’ की ही नहीं है। दूसरी बड़ी समस्या ये है कि सैकड़ों की तादाद में शिक्षक ‘कामचोरी’ भी करते हैं। जी हाँ, वैसे शिक्षकों की तादाद भी कम नहीं है जो ‘साधन-सम्पन्न’ और ‘दबंग’ हैं और उनकी हाजिरी बिना उनके आए बन जाया करती है। बिना सूचना के कई दिनों या कुछ हफ्तों के लिए ‘गायब’ हो जाना तो मामूली बात है।

‘मधेपुरा अबतक’ ने जब इस बाबत स्थानीय शिक्षाविदों से बात की तो ना केवल उनकी चिन्ता और आक्रोश से हम रू-ब-रू हुए बल्कि कई महत्वपूर्ण सुझाव भी सामने आए। इन बुद्धिजीवियों की राय है कि ‘कामचोर’ व बिना सूचना के गायब रहने वाले शिक्षकों पर अविलम्ब कार्रवाई होनी चाहिए। जो शिक्षक पढ़ने-पढ़ाने में दिलचस्पी नहीं लें और उन्हें नौकरी में बनाए रखने की कोई ‘विवशता’ हो सरकार की तो उन्हें अन्य सरकारी कार्यों – पोलियो अभियान, जनगणना, चुनाव आदि – में स्थायी तौर लगा दिया जाना भी एक विकल्प हो सकता है। दूसरी ओर अच्छे शिक्षकों एवं अच्छी रैंकिंग वाले पदाधिकारियों को पर्याप्त सम्मान व सुविधा मिले, सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए।

सच तो ये है कि संकल्पित और समन्वित प्रयास से ही शिक्षा की गुणवत्ता वापस लौट सकती है। केवल सरकार को कोसने से काम नहीं होगा। इसके लिए पहले हमें जागना होगा। एक जागरुक समाज में ‘अशिक्षित’ और ‘कामचोर’ शिक्षक की जगह ना तो होनी चाहिए, ना हो सकती है। और हाँ, जब शिक्षक ‘कसौटी’ पर खरे उतरने लगेंगे तब बच्चों की ‘कसौटी भी स्वत: तैयार हो जाएगी। पर क्या इस कार्य के लिए बच्चों और शिक्षकों से पहले हमें खुद का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सुशील मोदीजी, बिहार में अगर अपराध बढ़े हैं तो जवाब सीएम देंगे या लालू..?

भाजपा समेत एनडीए के तमाम दल राज्य की कानून-व्यवस्था को मुद्दा बना बिहार की महागठबंधन सरकार को घेरने में लगे हैं। सरकार कहीं की और किसी भी पार्टी की हो, विपक्षी दल का काम ही है उसे घेरना। जरूरी हो तब भी, ना हो तब भी। इसमें कोई नई बात नहीं। जहाँ तक बिहार की कानून-व्यवस्था का प्रश्न है, उस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष की राय अलग-अलग हो सकती है और है भी। अगर थोड़ी देर के लिए मान लें कि बिहार में आपराधिक घटनाएं बढ़ी हैं तो भी सवाल सरकार के मुखिया से होना चाहिए ना कि सरकार में शामिल दलविशेष के मुखिया से। लेकिन बिहार में ऐसा नहीं हो रहा।

बिहार के मुख्य विपक्षी दल भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बिहार में ‘अपराधियों के कोहराम’ की बात करते हैं लेकिन सवाल पूछते हैं राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव से कि ‘ऐसा कब तक चलेगा’। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अगर पहले की तरह राबड़ी होतीं या सरकार तेजस्वी के नेतृत्व में चल रही होती या फिर मुख्यमंत्री राजद से ही कोई होता तो सुमो का लालू से सवाल करना समझ में आता। तब ये भी मान लिया जाता कि सरकार ‘रिमोट’ से चल रही है और सुमो बीच में वक्त जाया ना कर सीधे ‘रिमोट’ से मुखातिब हैं। लेकिन यहाँ सामने नीतीश हैं। ना केवल चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया बल्कि मुख्यमंत्री पद के वो घोषित उम्मीदवार थे। महागठबंधन के सरकार में आने के पीछे ये बहुत बड़ा, शायद सबसे बड़ा फैक्टर रहा है। मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश की क्षमता और सामर्थ्य भी संदेह से परे है। फिर सवाल उनसे ना कर लालू से क्यों..?

सुशील कुमार मोदी का कहना है कि लालू की नसीहत के बाद भी सरकार अपराधियों पर नकेल कसने में विफल रही है। उन्होंने कहा कि बैंक लूट, निर्माण कम्पनियों के अधिकारियों व कर्मियों को धमकाने और हत्या का सिलसिला अभी थमा भी नहीं कि अपराधियों ने पुलिस को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। वैशाली में एएसआई अशोक कुमार यादव की हत्या राज्य सरकार के लिए गम्भीर चुनौती है। लगभग डेढ़ माह पहले वैशाली के ही लालगंज में एक दारोगा की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। मोदी ने कहा कि ऐसी स्थिति में सरकार के बड़े घटक दल का नेता होने के नाते लालू को अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए और बताना चाहिए कि बिहार में अपराधियों का यह कोहराम कब तक चलता रहेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह की घटनाएं चिन्ता का विषय हैं। इनकी कड़ी निन्दा और भर्त्सना होनी चाहिए। लेकिन बात केवल यहीं तक नहीं रहती। राजनीति की ‘गुंजाइश’ ऐसे मौकों पर भी निकल जाती है या निकाल ली जाती है। अभी दो दिन बीते हैं जब एनडीए के घटक दल ‘हम’ के नेता मांझी ने कानून-व्यवस्था के ही मुद्दे पर नीतीश के ‘बेचारा’ होने की बात कही थी और ‘बदनामी’ मोल लेने के बजाए मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने की सलाह दी थी। इस्तीफे की सलाह देकर मांझी जहाँ पहुँचे, लालू से सवाल कर मोदी भी वहीं पहुँच रहे हैं लेकिन अलग कोण से। स्पष्ट है कि नीतीश को लालू के बहाने घेरने की कोशिश की जा रही है। यही कोशिश चुनाव के दौरान भी की गई थी। परिणाम क्या रहा, ये सबके सामने है। कम-से-कम कानून-व्यवस्था और विकास के मुद्दे पर तमाम दलों के बीच सीधा संवाद हो तो बेहतर है। वैसे भी नीतीश के साथ काम करने का सुमो का लम्बा अनुभव है। बदली हुई परिस्थितियों में दोनों आज भले ही अलग-अलग हों, राज्य के हित में कुछ मुद्दों पर तो साथ होकर सकारात्मक भूमिका निभा ही सकते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश के ‘बेचारा’ और ‘बदनाम’ होने से क्यों परेशान हैं मांझी..?

जी हाँ, कल तक जो मांझी नीतीश को ‘कीचड़’ से नहलाते नहीं थक रहे थे, आज वही परेशान हैं उनके ‘बेचारा’ और ‘बदनाम’ होने से। मांझी की मानें तो नीतीश ‘बेचारा’ हो गए हैं क्योंकि आज बिहार में ताज किसी और का और राज किसी और का है। ऐसे में बेवजह ‘बदनाम’ होने से बेहतर है कि नीतीश मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दें।

गुरुवार को अपने पटना स्थित सरकारी आवास पर पत्रकारों से बात करते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने कहा कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद से बढ़ते ‘अनुचित दबाव’ के कारण राज्य के करीब 35 आईएएस और आईपीएस अधिकारी लिखित रूप से केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा जता चुके हैं। इससे बिहार में शासन-व्यवस्था की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मांझी ने हाल के दिनों में दरभंगा और वैशाली जिलों में अभियंताओं की हत्या की चर्चा की और राज्य की बिगड़ती कानून-वयवस्था पर चिन्ता जताते हुए दावा किया कि बिहार में पिछले 60 दिनों के भीतर रंगदारी, अपहरण, बैंक डकैती, लूट और हत्या जैसी करीब 600 आपराधिक घटनाएं घटी हैं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ठोस कार्रवाई करने के बजाए ‘गीदड़ भभकी’ देने में लगे हैं।

मांझी ने हाल में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव द्वारा कथित तौर पर पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) का निरीक्षण करने को लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुचित बताया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में चर्चा है कि बिहार में ताज किसी और का और राज किसी और का है। अगर नीतीश कुमार इस कदर ‘बेचारा’ हो गए हैं और इतने दबाव में हैं कि कोई एक्शन नहीं ले सकते तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। बिहार में सचमुच जिनका राज है वे ही सत्ता चलाएं, नीतीश क्यों बेवजह बदनाम हो रहे हैं..?

इतना सब कुछ कहने के बाद मांझी ये कहना भी नहीं भूले कि वे नीतीश कुमार के प्रति ‘हमदर्दी’ रखते हैं क्योंकि नीतीश ने ही उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया था। यही कारण है कि वे उन्हें बेहतर सलाह दे रहे हैं। मांझी की मानें तो नीतीश इस्तीफा देकर ‘बदनाम’ होने से बच सकते हैं।

मांझी ने बहुत दिनों के बाद लेकिन बहुत सम्भल कर मुँह खोला है। एक ओर सरकार के कामकाज और राज्य की कानून-व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी और दूसरी ओर नीतीश को इस्तीफे के लिए कहना लेकिन उनके ‘योगदान’ को याद कर और उनसे ‘हमदर्दी’ जताते हुए, ये वास्तव में एक तीर से कई निशाने को साधने की कोशिश है। मांझी ने बेशक कड़ी आलोचना की है लेकिन हर बात के लिए ठीकरा सरकार में भागीदार लालू और उनकी पार्टी राजद पर फोड़ा है। बता दें कि विधानसभा चुनाव से पूर्व वो लालू ही थे जिन्होंने मांझी को भाजपा छोड़ महागठबंधन में आने का न्योता तक दिया था लेकिन आज जब मांझी ने मुँह खोला है तो उनके निशाने पर वही लालू हैं।

आखिर लालू के खिलाफ मोर्चा खोल क्या हासिल करेंगे मांझी..? चुनाव में एकमात्र अपनी सीट (और वो भी दो सीटों पर लड़ने के बाद) बचाने वाले मांझी को इन दिनों भाजपा से कोई तरजीह नहीं मिल रही। ऐसे में कहीं नई जमीन तलाशने की कोशिश तो नहीं कर रहे मांझी..? या फिर ‘बड़े भाई – छोटे भाई’ के बीच दरार पैदा करने के लिए ये भाजपा का ही ‘गेमप्लान’ है..?

जो भी हो, राजनीति में कभी सीधी चाल नहीं चली जाती। और आजकल तो ‘टेढ़ी’ चाल में भी इतने ‘मोड़’ और ‘घुमाव’ होने लगे हैं कि कुछ भी कहना बहुत मुश्किल हो गया है। हाँ, इतना जरूर है कि बदले हुए हालात में मांझी को अपनी ‘नाव’ और ‘पतवार’ दोनों पर फिर से विचार करना पड़ रहा है। ऐसा करना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है। नहीं तो कल तक तक खुद को बिहार में महादलितों का सबसे बड़ा नेता कहने वाले को कुछ दिनों के बाद ‘अस्तित्व’ के संकट से जूझना पड़ जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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