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होली है, खुलने दो भेद सारा… जोगीरा सा रा रा रा

जोगीरा ना हो तो होली कैसी..? होली का असली रंग तो जोगीरा के साथ ही चढ़ता है। उत्तर भारत के जिन क्षेत्रों में नाथपंथी योगी (जोगी) सक्रिय रहे वहाँ जोगीरा गाने की परम्परा विशेष रूप से पाई जाती है। सम्भवत: इसकी उत्पत्ति जोगियों की हठ-साधना, वैराग्य और उलटबाँसियों का मजाक उड़ाने के लिए हुई हो। यह मूलत: एक समूह-गान है जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में एक समूह सवाल पूछता है तो दूसरा उसका जवाब देता है। जवाब प्राय: चौंकाने वाले होते हैं।

समय बदला तो जोगीरा भी बदलता गया। धीरे-धीरे यह रोजमर्रा की घटनाओं से जुड़ता चला गया। घर का आंगन हो, गांव का चौपाल हो या फिर राजनीति का गलियारा इसने हर जगह अपनी पहुँच बना ली। सम्भ्रान्त और शासक वर्ग पर अपना गुस्सा निकालने या यूँ कहें कि उन्हें ‘गरियाने’ का अनूठा जरिया बन गया जोगीरा।

होली में तो वैसे भी खुलकर और खिलकर कहने की परम्परा है। यह एक तरह से सामूहिक विरेचन का पर्व है। आज इस परम्परा को स्वस्थ रूप देते हुए इसे फिर से व्यक्तिगत और संस्थागत, सामाजिक और राजनीतिक विडम्बनाओं और विद्रूपताओं पर कबीर की तरह तंज कसने और हमले करने के अवसर में बदलने की जरूरत है।

होली की मंगलकामनाओं के साथ प्रस्तुत हैं कबीर की परम्परा के जनकवि आचार्य रामपलट दास के कुछ चुनिंदा जोगीरे। इन जोगीरों के मूल में कौन हैं और क्यों हैं ये कहने की जरूरत नहीं। ना ही ये कहने की जरूरत है कि बुरा ना मानो, होली है। हम तो कहेंगे बुरा मान ही लो, होली है… जोगीरा सा रा रा रा…

आचार्य रामपलट दास के जोगीरे

केकर खातिर पान बनल बा, केकरे खातिर बांस

केकरे खातिर पूड़ी पूआ, केकर सत्यानास

जोगीरा सा रा रा रा………………….

नेतवन खातिर पान बनल बा, पब्लिक खातिर बांस

अफसर काटें पूड़ी पूआ, सिस्टम सत्यानास

जोगीरा सा रा रा रा………………….

आधी टांग क धोती पहिरे, आधी पीठ उघार

पलटू कारन बजट क घाटा, बोल रहल सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

चिन्नी चाउर महंग भइल, महंग भइल पिसान

मनरेगा का कारड ले के, चाटा साँझ बिहान

जोगीरा सा रा रा रा………………….

खूब चकाचक जीडीपी बा चर्चा बा भरपूर

चौराहा पर रोज सबेरे बिक जाला मजदूर

जोगीरा सा रा रा रा………………….

दो सौ चालीस दाल हो गई, तेल सवा सौ पार

अच्छे दिन में कमी कहाँ है, पूछ रही सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

बाबा मांगे मुँह बा बा के, चेला दाँत चियार

श्री श्री मांगे नाच नाच के, झुकी खड़ी सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

पूँछ पटक कर कुक्कुर खाए, चाट-चाट बिल्लार

सफाचट्ट कर माल्या खाया, खोज रही सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

कौन दुल्हनिया डोली जाए, कौन दुल्हनिया कार

कौन दुल्हनिया झोंटा नोचे, नाम केकर सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

संघ दुल्हनिया डोली जाए, कारपोरेट भरि कार

धरम दुलहनिया झोंटा नोचे, बउरिया सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

रंग और गुलाल के साथ –

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या फिर कहलाएगा बिहार का इतिहास समूचे भारतवर्ष का इतिहास..?

भगवान बुद्ध के जन्म यानि ढाई हजार वर्ष पूर्व या बाद या फिर उनके समय में भी सदियों तक ‘बिहार’ नाम का कोई भू-भाग प्रकाश में नहीं आया था। 14वीं शताब्दी यानि 1320 ई. में मौलाना मिनहाजुद्दीन-अबु-उमर-ए—रहमान द्वारा ‘तबकात-ए-नासिरी’ जैसे दस्तावेज में सर्वप्रथम ‘बिहार’ शब्द का उल्लेख मिलता है। आगे इतिहास में उद्धृत तथ्यों के आधार पर कम-से-कम इस आशय को विश्वसनीय और प्रामाणिक माना जा सकता है कि ‘बिहार’ शब्द का उत्स बौद्ध धर्म की ‘विहार’ परम्परा से है। यानि बौद्ध विहारों या मठों की बहुसंख्यकता को देखते हुए ही भारत के एक भू-भाग को ‘बिहार’ की संज्ञा प्रदान की गई है। संक्षेप में ईसा के जन्म के 1200 वर्षों के बाद यानि 13वीं शताब्दी में ‘बिहार’ शब्द का जन्म माना जा सकता है और 15वीं-16वीं शताब्दी में जिस भारतीय भू-भाग को ‘बिहार’ राज्य की संज्ञा मिली वही चलते-चलते आज हमारा और आपका ‘बिहार’ बना है।

ये तो हुई ‘बिहार’ के नामकरण की बात। लगे हाथ इसकी राजधानी पटना के नामकरण की पृष्ठभूमि से भी वाकिफ हो लें। प्रारम्भ में बाग-बगीचे और बड़ी तायदाद में खिलने वाले फूलों के कारण गंगा, सोन और गंडक नदियों के संगम पर बसे नगर (वर्तमान पटना) को लोगों ने ‘कुसुमपुर’ कहा। आगे चलकर ‘पुत्रक’ नामक राजकुमार और ‘पाटलि’ नामक राजकुमारी ने विवाहोपरान्त संतान नहीं होने के कारण संतति के बिना भी अपने नाम को जीवित रखने के लिए ‘कुसुमपुर’ का नाम ‘पाटलिपुत्रक’ रख दिया। कालक्रम में ‘पाटलिपुत्रक’ से ‘पाटलिपुत्र’ बना और फिर ‘पटन देवी’ नाम से जुड़कर इसने ‘पटना’ का रूप धारण कर लिया।

1707 में औरंगजेब की मृत्यु होने के 25 वर्ष बाद तक ‘बिहार’ मुगल साम्राज्य का एक अलग प्रान्त बना रहा पर 1732 ई. में कुछ विशेष प्रशासनिक कारणों से इसका विलय ‘बंगाल प्रेसिडेन्सी ऑफ फोर्ट विलियम’ में कर दिया गया। इसके बाद अगले 180 वर्षों तक बिहार ‘बंगाल प्रेसिडेन्सी’ के अधीन रहा जब तक कि डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा, मजहरूल हक, अली इमाम आदि के अथक प्रयासों के बाद जॉर्ज पंचम ने 12 दिसम्बर 1911 को अलग बिहार राज्य को मंजूरी नहीं दे दी और 22 मार्च 1912 को बंगाल से अलग होकर बिहार, छोटा नागपुर और उड़ीसा एक प्रदेश के रूप में अस्तित्व में नहीं आ गए।

इस नए प्रदेश को अंग्रेजी में ‘बिहार एंड उड़ीसा प्रोविन्स’ कहा जाता रहा परन्तु आम जनता द्वारा इसे ‘बिहारोत्कल’ के रूप में स्वीकार किया गया। अधिसूचित पाँच प्रमंडल वाले ‘बिहारोत्कल’ प्रान्त में कुल 21 जिलों को शामिल किया गया जो इस प्रकार थे – 1. भागलपुर प्रमंडल – भागलपुर, पूर्णिया, मुंगेर और संथाल परगना (कुल चार जिले), 2. पटना प्रमंडल – पटना, गया और शाहाबाद (कुल तीन जिले), 3. तिरहुत प्रमंडल – मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सारण और चम्पारण (कुल चार जिले), 4. छोटानागपुर प्रमंडल – हजारीबाग, राँची, पलामू, सिंहभूमि और मानभूमि (कुल पाँच जिले) तथा 5. उड़ीसा प्रमंडल – कटक, बालासोर, अंगुल, पुरी और सम्बलपुर (कुल पाँच जिले)। बिहार के सोलह और उड़ीसा के पाँच जिलों को मिलाकर बने ‘बिहार-उड़ीसा’ नामक इस नए सूबे का शासनाधिकार ब्रिटिश हुकूमत के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर को सौंपा गया और राजधानी के रूप में अस्तित्व में आया ‘पाटलिपुत्र’ से बना ‘पटना’।

भारत के पहले सम्राट (चन्द्रगुप्त मौर्य) से लेकर पहले राष्ट्रपति (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद) तक की जन्मभूमि है बिहार। एक समय बिहार का इतिहास ही समूचे भारतवर्ष का इतिहास रहा है। शून्य (आर्यभट्ट) से लेकर पहला गणतंत्र (लिच्छवी) तक इसी ने दिया संसार को। माँ सीता का जन्म यहीं हुआ और यहीं महर्षि वाल्मीकि ने ‘रामायण’ की रचना की। बुद्ध और महावीर को यहीं ‘अपने होने का अर्थ’ मिला और यहीं सिक्खों के ‘दसवें गुरु’ गुरु गोविन्द सिंह ने जन्म लिया। महात्मा गांधी ने यहीं के चम्पारण में ‘सत्याग्रह’ का ‘बीज’ बोया और यहीं जयप्रकाश ने सम्पूर्ण क्रान्ति की ‘नींव’ रखी।

वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे मुनि, अशोक और शेरशाह जैसे शासक, विद्यापति और दिनकर जैसे कवि बिहार की मिट्टी की उपज हैं। चाणक्य जैसे गुरु, आर्यभट्ट जैसे खगोलविद्, जीवक जैसे चिकित्सक, पाणिनी जैसे शिक्षाविद्, याज्ञवल्क्य जैसे दार्शनिक, मंडन मिश्र जैसे शास्त्रज्ञ और बाबू कुंवर सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी की कर्मभूमि बिहार ही है। नालन्दा और विक्रमशिला जैसे ज्ञान के केन्द्र यहीं थे जिनसे कभी सारा संसार प्रकाशित होता था। पर आज हम कहाँ हैं..? बिहार के गौरवशाली इतिहास में हमने क्या और कितना जोड़ा है..? पहले ‘विशिष्टता’ में हमारी कोई सानी नहीं थी और आज हमें ‘विशेष राज्य’ की लड़ाई लड़नी पड़ रही है..?

आज हमारा बिहार 104 साल का हो गया। आज का दिन ‘मील’ के तमाम ‘पत्थरों’ को गिनने और उन्हें सहेजने के साथ-साथ उनमें मील के ‘नए’ पत्थरों को जोड़ने के संकल्प का दिन भी होना चाहिए। आज का दिन आत्ममंथन का होना चाहिए कि हमसे कहाँ और क्या चूक हुई। ‘बिहार दिवस’ पर जब पूरा बिहार रोशनी में नहा रहा होगा तब हमें अपने गौरवशाली अतीत के प्रति पूरी श्रद्धा से सिर झुका कर ये प्रण लेना चाहिए कि बिहार की हर शाम ऐसी ही हो, हमारी रोशनी से एक बार फिर पूरी दुनिया जगमगाए और एक बार फिर बिहार का इतिहास समूचे भारतवर्ष का इतिहास कहलाए..!

Bihar Vidhan Sabha decorated with lights on Bihar Diwas.
Bihar Vidhan Sabha decorated with lights on Bihar Diwas.

[डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी से परिचर्चा के आधार पर मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप]

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लालू-मुलायम के बिना नई पार्टी का ‘पेड़’ लगाकर क्या पाएंगे नीतीश..?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर अपनी चहलकदमी तेज कर दी है। आगामी यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कल दिल्ली में उन्होंने अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के साथ विलय के मुद्दे पर महत्वपूर्ण बैठक की। जेडीयू और रालोद के विलय के बाद एक नई पार्टी सामने आ सकती है जिसका नाम होगा ‘जन विकास पार्टी’ और चुनाव-चिह्न होगा ‘पेड़’। इस नई पार्टी में एचडी देवगौड़ा, ओमप्रकाश चौटाला और बाबूलाल मरांडी के भी शामिल होने की सम्भावना है। सूत्रों की मानें तो इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष अजित सिंह होंगे।

नीतीश के साथ इस महत्वपूर्ण ‘मिशन’ पर जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और महासचिव केसी त्यागी के अलावे बिहार जेडीयू के अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह और नीतीश के रणनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर भी दिल्ली में हैं। ख़बर ये भी है कि अगर यूपी में जेडीयू और रालोद का विलय हो जाता है तो अजित सिंह को बिहार से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जा सकता है।

नई पार्टी के ‘संभावित’ अध्यक्ष शरद यादव ने स्वयं विलय की बात की पुष्टि करते हुए कहा कि कुछ ही दिनों में विलय की तारीख की घोषणा हो जाएगी। यूपी चुनाव में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करने के लिए ‘अपना दल’ और ‘पीस पार्टी’ के नेताओं से भी जेडीयू की बातचीत लगातार जारी है।

बहरहाल, राष्ट्रीय राजनीति में अपनी धमक पैदा करने के लिए नीतीश अनवरत ‘प्रयोग’ में लगे हैं। यूपी के अलावे असम और बंगाल चुनाव के लिए भी वे अपनी कार्ययोजना बना रहे हैं। पर इन सारी कवायद से लालू और मुलायम को दूर रखा जा रहा है। यहाँ एक साथ कई प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या लालू से ‘दूरी’ बनाकर बिहार की राजनीतिक ‘स्थिरता’ को खतरे में नहीं डाल रहे नीतीश..? दूसरा, क्या मुलायम के बिना यूपी में किसी बड़ी ‘सम्भावना’ पर काम किया जा सकता है..? तीसरा, समाजवाद की बात करें तो नीतीश की तुलना में मुलायम और लालू समाजवाद के अधिक बड़े ‘प्रतीक’ ठहरेंगे, ऐसे में इन दोनों के बिना क्या ‘जन विकास पार्टी’ की स्वीकार्यता समाजवादियों के लिए बन पाएगी..? चौथा और सबसे बड़ा सवाल ये कि यूपी में (विशेष स्थिति में बंगाल और असम में भी) भाजपाविरोधी मतों में सेंध लगाकर क्या अप्रत्यक्ष रूप से नीतीश भाजपा को ही लाभ नहीं पहुँचा रहे होंगे..?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नीतीश राजनीति में प्रारम्भ से ही ‘प्रयोगधर्मी’ रहे हैं और ‘प्रयोग’ से उन्होंने पाया भी है बहुत कुछ। लेकिन प्रयोग का ये अर्थ कतई नहीं कि हर नए राज्य में नए तर्क के साथ साथी तलाशे जाएं। ऐसे में तात्कालिक लाभ भले ही हो जाए, विश्वसनीयता और नैतिकता पर प्रश्नचिह्न भी लगने लगते हैं। एक बात और, मुलायम ने जो गलती बिहार चुनाव में की, क्या वही गलती अब नीतीश भी (खासतौर पर यूपी में) नहीं कर रहे..? अगर नीतीश राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे विकल्प की सम्भावना को लेकर सचमुच गम्भीर हैं तो उन्हें सारे ‘स्वाभाविक’ साथियों को साथ लाने और जोड़े रखने के लिए किसी ‘फेविकोल’ के फार्मूले पर काम करना होगा। अन्यथा उनकी सारी कोशिश ‘पॉलिटिकल स्टंट’ से अधिक कुछ भी ना होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी और नीतीश : विकास के दो प्रतीकपुरुष कब तक एक मंच पर..?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कल की बिहार-यात्रा ना केवल बिहार के विकास बल्कि केन्द्र-राज्य-संबंध के लिहाज से भी ऐतिहासिक कही जा सकती है। वर्तमान भारतीय राजनीति के दो अलग ध्रुवों पर खड़े नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के हाथ ही नहीं दिल भी कल मिलते दिखे, ये सुखद आश्चर्य से कम नहीं। विकास के इन दोनों प्रतीकपुरुषों ने तमाम ‘राजनीति’ से ऊपर उठकर बिहार की बाबत कल जिस तरह और जैसे माहौल में उम्मीद बंधाई है, उसे दोनों कायम रख पाएं तो बिहार के स्वर्णिम अतीत को लौटने से कोई नहीं रोक सकता।

नरेन्द्र मोदी इससे पहले जब भी बिहार आए, उनके और नीतीश कुमार के राजनैतिक और वैचारिक मतभेद ही सुर्खियों में रहे। मौका चाहे 2010 के भाजपा अधिवेशन का हो या गठबंधन टूटने के बाद का, लोकसभा चुनाव हो या हाल का बिहार चुनाव, एक-दूसरे पर निशाना साधने का कोई मौका दोनों कभी नहीं चूके। दोनों के बीच की तल्खी बिहार की सियासी आबोहवा पर लगातार हावी रही। पर कल जैसे कोई चमत्कार हो गया हो। दोनों नेताओं में ना मतभेद दिखा कल, ना मनभेद।

कल प्रधानमंत्री ने ना केवल ये कहा कि बिहार का भाग्य बदलेगा तभी देश का भाग्य बदलेगा बल्कि गाँवों में बिजली पहुँचाने को लेकर नीतीश की तारीफ भी की उन्होंने। उधर नीतीश भी पीछे नहीं रहे। हवाई अड्डे पर अगवानी करने से लेकर विदा करने तक प्रधानमंत्री के साथ रहे वे। बिहार आने के लिए उन्होंने दिल से आभार जताया उनका और अनुरोध किया कि इस राज्य के विकास के लिए बार-बार आएं। दोनों के बीच किसी दुराव या अलगाव, हिचक या झिझक के लिए जैसे कोई जगह ही ना हो।

मोदी बिहार आकर जा चुके हैं। पटना हाईकोर्ट के शताब्दी समारोह के समापन पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के साथ-साथ दीघा में गंगा नदी पर रेल पुल, पाटलिपुत्र से लखनऊ के लिए ट्रेन चलना, मुंगेर में नवनिर्मित पुल का उद्घाटन, मोकामा में राजेन्द्र पुल के समानान्तर पुल का शिलान्यास जैसी सौगातें दे गए वे। तरक्की के कई रास्ते खुले बिहार के लिए। कई उपलब्धियां जुड़ीं बिहार के खाते में। पर सबसे बड़ी उपलब्धि रही इन दो दिग्गजों का एक मंच पर आना और बिहार के विकास के लिए साझे तौर पर संकल्प और प्रतिबद्धता जताना। ना केवल बिहार बल्कि देश की करोड़ों जनता की निगाह अब इस पर लगी रहेगी कि कब तक ‘राजनीति’ फिर बीच में नहीं आएगी और विकास के ये दो ‘प्रतीकपुरुष’ यूँ ही एक मंच पर रहेंगे..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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महाशिवरात्रि अर्थात् परमात्मा शिव के दिव्य ‘अवतरण’ की रात्रि

आज देश भर में महाशिवरात्रि की धूम है। उत्तर प्रदेश में शिव की नगरी काशी हो या उत्तराखंड में उनकी जटा से निकली गंगा की धरती हरिद्वार, मध्यप्रदेश का उज्जैन हो या गुजरात का सोमनाथ, झारखंड का देवघर हो या बिहार का सिंहेश्वर… भारत के कोने-कोने में स्थित शिवालयों से लेकर पड़ोसी देश नेपाल के विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर तक शिवभक्तों की भीड़ उमड़ रही है। इस बार की महाशिवरात्रि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चार साल के बाद शिव के प्रिय दिन सोमवार को महाशिवरात्रि का त्योहार आया है। इस साल महाशिवरात्रि पर दुर्लभ शिवयोग का संयोग बन रहा है। कहा जाता है कि इस विशेष योग में भक्तों को शिव की आराधना का कई गुणा अधिक फल प्राप्त होता है।

महाशिवरात्रि का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। ऐसी मान्यता है कि आज ही के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि फरवरी-मार्च के महीने में पड़ने वाला ये त्योहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि माना जाता है कि आज के दिन भगवान शिव का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है।

शिवपुराण के अनुसार सृष्टि के निर्माण के समय महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में शिव अपने रुद्र रूप में प्रकट हुए थे। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। इसी समय जीवनरूपी चन्द्रमा का मिलन शिवरूपी सूर्य के साथ होता है। अत: महाशिवरात्रि परमात्मा शिव के दिव्य ‘अवतरण’ की रात्रि है। देखा जाय तो यह त्योहार सम्पूर्ण सृष्टि को उनके निराकार से साकार रूप में आने की मंगल सूचना है। महाशिवरात्रि के दिन ग्रहों की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है।

योग परम्परा में शिव दुनिया के पहले गुरु माने जाते हैं जिनसे ज्ञान की उत्पत्ति हुई थी। इस मार्ग पर चलने वाले शिव की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं बल्कि उन्हें आदिगुरु मानकर करते हैं।

एकमात्र शिव हैं जो स्वयं विष पीकर जग को अमृत देते हैं। उनके अलावा कौन है जिसकी पूजा ‘सुर’ ही नहीं ‘असुर’ भी करें। महज बेलपत्र और भांग-धतूरे से प्रसन्न हो जाने वाले शिव ‘सर्वहारा वर्ग’ के एकमात्र देवता हैं। शिवपुराण की ईशानसंहिता में कहा गया है कि आदिदेव शिव महाशिवरात्रि में करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इस कथन की व्यावहारिक व्याख्या करें तो हम पाएंगे कि शिव का प्रभाव, उनका आभामंडल सचमुच ऐसा है कि उसमें करोड़ों देव समा जाएं… तभी तो वे देवों के देव हैं… महादेव हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालूजी, ‘मानसिक आज़ादी’ की ये ‘लड़ाई’ अभी और इस तरह क्यों..?

बिहार में गरीबों को मानसिक आज़ादी 1990 के बाद मिली यानि लालू के मुख्यमंत्री बनने पर। जी हाँ, ये कहना है स्वयं आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का। वे केवल इतना ही कहते तो एक बात थी, उन्होंने साथ में ये भी कहा कि उनके उलट भाजपा के लोग आरएसएस के गुरु गोलवलकर की विचारधारा पर चलते हैं। उनकी विचारधारा दलितों और गरीबों का दमन करने की है। उनका आरोप है कि उनके बार-बार कहने पर भी केन्द्र जातीय जनगणना से भागता रहा।

पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए लालू ने कहा कि हम और नीतीश अलग थे इसलिए भाजपा का दांव लोकसभा चुनाव में चल गया। संसद में जिस तरह केन्द्र के मंत्री भाषण दे रहे हैं, उसे देख अफसोस होता है कि हम वहाँ नहीं हैं। हम वहाँ होते तो उनको जवाब मिलता। उन्होंने कहा कि जेएनयू में कन्हैया ने मेरे और नीतीश कुमार के सवालों को उठाया तो केन्द्र सरकार उसे देशद्रोही कह रही है, जबकि वह खुद देशद्रोही है। नरेन्द्र मोदी के शासनकाल में ही जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा फहराया गया।

लालू के अनुसार भाजपा राज्य सरकार को ‘अस्थिर’ करने का मौका खोज रही है। भाजपा के लोग कहते हैं कि लालू प्रसाद सरकार नहीं चलने देंगे। उन्होंने कहा कि लोगों में गलत संदेश ना जाय इसीलिए वे और नीतीश कुमार फूंक-फूंक कर कदम रखते हैं।

नीतीश के साथ अपनी एकजुटता बताने और जताने के लिए लालू ये कहना भी नहीं भूले कि राज्य सरकार का ‘सात निश्चय’ हमारा संकल्प है जिसे पूरा करना है। उक्त कार्यक्रम में कला-संस्कृति मंत्री शिवचंद्र राम, सहकारिता मंत्री आलोक मेहता, एससी-एसटी मंत्री संतोष निराला, पूर्व मंत्री श्याम रजक, विधायक चंदन राम, राजेन्द्र राम, मुंद्रिका सिंह यादव आदि उपस्थित थे।

बिहार की राजनीति में लालू की अहमियत जितना उनके समर्थक मानते हैं, शायद उससे कहीं अधिक उनके विरोधी। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि बिहार में जब भी ‘सामाजिक न्याय’ की बात होगी, वो लालू के बिना पूरी नहीं होगी। पर जहाँ तक गरीबों को मानसिक आज़ादी दिलाने के दावे का प्रश्न है, बेहतर यह होता कि लालू ये औरों को कहने देते। अगर उनका ‘अवदान’ सचमुच इतना बड़ा है तो समय उसका ‘मूल्यांकन’ हर हाल में करेगा। ‘मानसिक आज़ादी’ की ये ‘लड़ाई’ अभी और इस तरह क्यों..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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… और लालू ने दी अपने उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी को चेतावनी..!

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने अपने छोटे बेटे और महागठबंधन सरकार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को भरी सभा में चेतावनी दे डाली। ‘प्यार’ और ‘अधिकार’ भरी ये चेतावनी बिहार के नौजवानों को बेरोजगारी भत्ता दिलाने के लिए थी।

मौका सहकारिता सम्मेलन का था। लालू ने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी को अपने ख़ास अंदाज में चेतावनी देते हुए कहा कि “तेजस्वी, अगर बेरोजगारों को भत्ता नहीं मिला तो तुम समझ लेना, क्या हाल होगा।” लालू के मुँह से अचानक ऐसी बात सुन सम्मेलन में एकबारगी सन्नाटा छा गया।

लालू ने इस अवसर पर केन्द्र सरकार पर भी हमला बोला। ‘मेक इन इंडिया’ नारे को ढकोसला करार देते हुए उन्होंने कहा कि इससे कुछ होने वाला नहीं है। देश का दिवाला निकल रहा है और मोदी सरकार बुलेट ट्रेन की बात कह जनता को गुमराह कर रही है।

लालू ने आज जिस तरह तेजस्वी को चेतावनी दी, ठीक उसी तरह उनके समधी और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी अपने बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ‘ख़बर’ लेते हैं। आए दिन कार्यकर्ताओं के बीच और यहाँ तक कि सरकारी सभाओं में भी उनके द्वारा अखिलेश को ‘फटकार’ लगाने की ख़बरें आती हैं। ऐसा कर ये दिग्गज जहाँ अपनी अगली पीढ़ी को राजनीति का ‘पाठ’ पढ़ा रहे होते हैं वहीं आम लोगों के बीच उनकी ‘छवि’ भी बन रही होती है।

हाल के दिनों में बिहार में आपराधिक घटनाओं में इजाफा हुआ है और विपक्ष इसके लिए लगातार लालू को ‘घेरने’ की कोशिश में लगा हुआ है। ऐसे में लालू ने तेजस्वी को चेतावनी दे एक तीर से कई निशाना साधने की कोशिश की है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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महागठबंधन का पहला बजट : क्या सचमुच बिहार में शिक्षा के दिन बहुरेंगे..?

वित्तमंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी ने आज महागठबंधन सरकार का पहला बजट पेश किया। 2016-17 के इस बजट के केन्द्र में नीतीश के ‘सात निश्चय’ हैं। बजट में सभी तबकों का ध्यान रखा गया है और बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग दुहराई गई है। सबसे ख़ास बात ये कि इस बजट में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। अब उम्मीद की जा सकती है कि बिहार में शिक्षा के दिन बहुरेंगे।

बिहार के वित्त मंत्री ने 2016-17 के लिए पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 24,491 करोड़ रुपये अधिक का बजट पेश किया। बीते वर्ष का कुल बजट 1,20,185 करोड़ था जबकि इस वर्ष का बजट 1,44,696 करोड़ है। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि बिहार का विकास दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। पिछले दस सालों में बिहार का विकास दर 10.50 प्रतिशत रहा है।

सिद्दीकी ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शिक्षा पर सबसे अधिक जोर दिया है। इस कारण सरकार ने शिक्षा के लिए सर्वाधिक 21,897 करोड़ की राशि आवंटित की है। यह राशि योजना एवं गैर योजना मद, दोनों को मिलाकर है। शिक्षा के बाद बजट में सरकार का जोर ऊर्जा पर है। ऊर्जा के लिए 14,370.84 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। तीसरे नंबर पर स्वास्थ्य विभाग है। स्वास्थ्य के लिए इस बजट में 8,234.70 करोड़ का प्रावधान है।

बजट में उपरोक्त क्षेत्रों के अतिरिक्त पेयजल, स्वच्छता, सड़क, सिंचाई एवं आधारभूत संरचना विकास, कृषि क्षेत्र में उत्पादकता एवं तकनीकी प्रशिक्षण, युवाओं के लिए कौशल विकास, नारी-सशक्तिकरण और पंचायती व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण का भी ध्यान रखा गया है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि महागठबंधन सरकार अपने पहले बजट से उम्मीद बंधाती नज़र आती है। सरकार ने बजट तैयार करने में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी नज़र रखी है। बजट में ऐसी कई बातें हैं जो सुनने और पढ़ने में अच्छी लगती हैं लेकिन बात तो तब बनेगी जब सपने ज़मीन पर उतरेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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केन्द्र से अधिक ‘स्मार्ट’ होने का दावा नीतीश का ‘असंयम’ या ‘आत्मविश्वास’..?

बिहार चुनाव में महागठबंधन की जीत के कई कारण गिनाए गए हैं लेकिन सच ये है कि जिस चीज ने नीतीश की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई वो है नीतीश का ‘संयम’ जिसे उन्होंने तमाम ‘वार’ झेलते हुए भी पूरे चुनाव में निभाया। दूसरी ओर शुरुआती हवा एनडीए के पक्ष में दिखने के बावजूद मोदी और उनकी टीम का ‘असंयमित’ व्यवहार उनकी हार का कारण बना। लेकिन लालू और कांग्रेस का साथ लेकर सरकार चला रहे नीतीश के संयम की डोर शायद थोड़ी ‘ढीली’ पड़ रही है..! अब ये उनका ‘असंयम’ है या ‘आत्मविश्वास’ ये तो आने वाला वक्त बताएगा, बहरहाल आज उन्होंने ये बयान दिया है कि केन्द्र केवल ‘बातों’ में स्मार्ट है, जबकि ‘हम’ काम करने में स्मार्ट हैं।

आज सीएम सचिवालय के संवाद कक्ष में विभिन्न योजनाओं की शुरुआत एवं लोकार्पण करते हुए स्मार्ट सिटी के मुद्दे पर केन्द्र को आड़े हाथ लेते हुए नीतीश ने कहा कि हमें स्मार्ट सिटी की चिन्ता नहीं है। केन्द्र सरकार प्रत्येक स्मार्ट सिटी को हर वर्ष सौ करोड़ रुपये देगी। इससे क्या होगा..? कोई शहर कितना स्मार्ट बनेगा..? पाँचवें राज्य वित्त आयोग की अनुशंसा के तहत हम आठ हजार करोड़ रुपये देंगे।

नीतीश कुमार ने कहा कि केन्द्र सरकार ने सौ शहरों को स्मार्ट बनाने की बात की थी, जबकि चयन केवल बीस का ही किया गया। बिहार को छोड़ दिया गया। अब हम अपने प्रयासों से शहरों को मजबूत बनाएंगे। इसके लिए शहरी अभियंत्रण संगठन बनाया जा रहा है जो निकायों के लिए इंजीनियरिंग क्षेत्र में लाभप्रद होगा।

बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने सात निश्चयों को मिशन मोड में पूरा करने का संकल्प जताया। उन्होंने कहा कि शहर से लेकर गांव तक हमें हर हाल में नल का पानी उपलब्ध कराना है। पेयजल योजनाओं को नगर निकायों के माध्यम से पूरा किया जाएगा। सात निश्चयों में शामिल ‘हर घर में शौचालय’ के लिए भी उन्होंने प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि केन्द्र से इसके लिए सिर्फ चार हजार रुपये दिए जाते हैं। राज्य सरकार ने इसमें अपनी ओर से आठ हजार रुपये जोड़े हैं ताकि शौचालय निर्माण में कोई कमी ना रह जाय। उन्होंने नाली निर्माण और हर घर में बिजली के मुफ्त कनेक्शन की बात भी दुहराई।

नीतीश-राज में जनप्रतिनिधि आमतौर पर ‘अफसरशाही’ से त्रस्त रहे हैं। लेकिन आज नीतीश ने कहा कि निर्णय जनप्रतिनिधि को लेना है। अफसर का काम उन्हें क्रियान्वित करना है। उन्होंने अफसरों को काम के जरिए ‘पावरफुल’ होने की नसीहत दी और कहा कि काम से ही किसी के दिल में जगह बनती है।

नीतीश काम करने के लिए जाने जाते हैं। बिहार की जनता ने उन्हें पाँचवीं बार चुना भी इसीलिए है। नीतीश जैसे ‘मैच्योर्ड’ राजनेता को अच्छी तरह पता है कि केन्द्र से ‘सकारात्मक’ संबंध के बिना किसी राज्य का ‘निर्बाध’ विकास सामान्यतया संभव नहीं है। उन्हें चाहिए कि राज्य के हित के लिए ‘राजनीति’ से ऊपर उठें और जनता के विवेक पर भरोसा करें। सूचना-क्रांति के इस युग में जनता तक सही-गलत पहुँचने में वैसे भी देर नहीं लगती। और हाँ, अपना ‘संयम’ और अपनी ‘शालीनता’ तो वो हर हाल में बना कर रखें क्योंकि ये उनकी या किसी भी सफल व्यक्ति की सबसे बड़ी ‘पूंजी’ होती है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पप्पू की मानें तो “90% सांसद और विधायक नहीं रह सकते शराब और शबाब के बिना”..!

इसमें कोई दो राय नहीं कि हम सब ‘गिरावट’ के दौर से गुजर रहे हैं। निजी या सार्वजनिक जीवन में संस्कार, विचार, चरित्र और व्यवहार की जैसी गिरावट अभी देखने को मिल रही है वैसी मानव-सभ्यता के सम्पूर्ण इतिहास में शायद ढूंढे ना मिले। पर वो ‘गिरावट’ क्या इस कदर ‘गिर’ गई है कि सौ में नब्बे उसकी गिरफ्त में दिखने लगें। अपने विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में रहने वाले जन अधिकार पार्टी के नेता और मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव की मानें तो राजनीति के क्षेत्र में गिरावट का आंकड़ा यही ठहरता है। जी हाँ, पप्पू ने अपने एक सनसनीखेज बयान में कहा है कि 90% सांसद और विधायक शराब और शबाब के बिना नहीं रह सकते।

एक निजी कार्यक्रम के सिलसिले में सीवान पहुँचे पप्पू यादव ने पिछले दिनों राजद विधायक राजबल्लभ यादव पर लगे एक ‘नाबालिग’ से दुष्कर्म के आरोप की पृष्ठभूमि में कहा कि अब ठेकेदार, रंगदार, अपराधी, बिल्डर और अपहरणकर्ता सांसद और विधायक बन रहे हैं। ऐसे में राजनीति में ‘नैतिकता’ और ‘स्वच्छता’ आ ही नहीं सकती। राजबल्लभ प्रकरण में उन्होंने यह भी कहा कि जिस महिला ने विधायक तक ‘नाबालिग’ को पहुँचाया था, उसने खुद कहा है कि वह कई सांसदों-विधायकों को लड़कियां ‘सप्लाई’ करती है। ऐसे तमाम नेताओं की जाँच होनी चाहिए।

बीते विधानसभा चुनाव में अपने तमाम दावों के धाराशायी होने के बाद पहली बार आक्रामक दिख रहे पप्पू ने राज्य की वर्तमान स्थिति पर बड़ी तल्ख टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि यहाँ अपराध और अपराधी बेलगाम हो गए हैं। उनके अनुसार ये स्थिति इसलिए है कि तीन-तीन सीएम मिलकर राज्य की सरकार चला रहे हैं। नीतीश कुमार राजनीतिक सीएम हैं, प्रशांत किशोर टेक्निकल सीएम और लालू सर्वेसर्वा सीएम, जो अपराधियों को संचालित करते हैं। ऐसे में राज्य में अपराध बढ़ना लाजिमी है।

स्वयं पप्पू यादव के साथ उनके राजनीतिक जीवन के आरंभ से ही ‘बाहुबली’ का टैग लगा हुआ है। सच ये है कि इस ‘टैग’ से उन्हें ‘नुकसान’ कम और ‘लाभ’ अधिक हुआ है। ऐसे में वो अगर आज की राजनीति को बदलने की बाद करते हैं तो ये बात चौंकाने के साथ-साथ कहीं-ना-कहीं थोड़ी उम्मीद भी बंधाती है। लेकिन ये कैसे भूला जा सकता है कि पप्पू जिस लालू को आज अपराधियों का ‘संचालक’ बता रहे हैं, हाल तक उन्हीं की राजनीतिक विरासत पर वो अपना दावा ठोक रहे थे।

लेकिन हाँ, पप्पू के इस दावे पर जरूर लम्बी और बड़ी बहस होगी कि 90% सांसद और विधायक शराब और शबाब के बिना नहीं रह सकते। जो व्यक्ति स्वयं तकरीबन ढाई दशक से विधायक और सांसद रहता आया हो उसका ऐसा दावा करना कतई हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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