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‘अंधेरे’ से लड़कर ‘रोशनी’ की नई इबारत लिख रहा बिहार..!

अगले दो साल में बिहार का कोई गांव अंधेरे में नहीं रहेगा। ग्रामीण विद्युतीकरण के क्षेत्र में बिहार सरकार ने जैसी तत्परता दिखाई है उसकी सराहना देश भर में हो रही है। 2015-16 में बिहार को 1632 गांवों में बिजली पहुँचाने का लक्ष्य दिया गया था और बिजली पहुँचाई गई 1754 गांवों में। ग्रामीण विद्युतीकरण के मामले में बिहार ने सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। अभी हाल ही में बिहार आए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस उपलब्धि के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दिल खोलकर तरीफ की थी।

ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव सह बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कम्पनी के सीएमडी प्रत्यय अमृत ने बीते शनिवार को पटना में आयोजित बिहार-झारखंड राज्य विद्युत परिषद फील्ड कामगार यूनियन के 39वें स्थापना दिवस समारोह में बिहार की इस उपलब्धि को कुछ महत्वपूर्ण आँकड़ों से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि 2005 में राज्य में महज 700 मेगावाट बिजली की सप्लाई होती थी जो वर्तमान में 3531 मेगावाट है और 2017 में इसे बढ़ाकर 4500 मेगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी तरह ग्रीड सब स्टेशनों की बात करें तो 2005 में 45 ग्रीड सब स्टेशनों से बिजली सप्लाई की जाती थी जो वर्तमान में 98 है और 2017 तक इनकी संख्या 140 हो जाएगी। नि:संदेह ये आँकड़े उत्साह बढ़ाने के साथ-साथ उम्मीद भी बंधाते हैं।

बता दें कि वर्तमान में बिहार में 1415 गांव अविद्युतीकृत हैं और इनमें से 750 गांव अकेले कटिहार जिले में हैं। अब इन गांवों की तस्वीर भी बहुत जल्द बदलने वाली है। ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव ने बताया कि बिहार के पूर्ण विद्युतीकरण का लक्ष्य तय समय से पहले पूरा करने के लिए योजना तैयार की जा रही है। 2017 में बिहार पूर्ण विद्युतीकृत राज्य हो जाएगा।

बिहार के कदम उजाले की ओर बढ़ चुके हैं। ‘अंधरे’ से लड़कर यह राज्य ‘रोशनी’ की नई इबारत लिख रहा है। ‘मधेपुरा अबतक’ इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, ऊर्जा मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव और ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत को साधुवाद देता है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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जी हाँ, न्यूयार्क ने 14 अप्रैल को मनाया ‘बिन्देश्वर पाठक डे’

भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिन्देश्वर पाठक को न्यूयार्क शहर ने अनूठा सम्मान दिया। एक असाधारण कदम के तहत न्यूयार्क के मेयर बिल डी ब्लासियो ने 14 अप्रैल 2016 को ‘बिन्देश्वर पाठक डे’ घोषित किया। पाठक को अमानवीय स्थिति में काम करने वाले लाखों लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने के लिए यह सम्मान दिया गया। सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में पाठक के अभूतपूर्व योगदान से पूरी दुनिया वाकिफ है।

न्यूयार्क में आयोजित समारोह में 73 वर्षीय पाठक स्वयं उपस्थित थे। उन्हें ‘न्यूयार्क ग्लोबल लीडर्स ह्यूमैनिटेरियन अवार्ड’ प्रदान किया गया। इस अवसर पर मेयर ब्लासियो ने कहा कि “पाठक एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसने समाज में घोर अन्याय देखा, ऐसी चीज देखी जो बहुत सारे लोगों के लिए अव्यावहारिक एवं स्थायी है और जिसमें बदलाव लाने के लिए रचनात्मकता, ऊर्जा, प्रेरणा तथा उम्मीद थी।” आगे उन्होंने कहा कि “पाठक ने अपनी दृष्टि से शोषित वर्ग की मदद की और अपने काम एवं संगठन के जरिए नई प्रौद्योगिकी का निर्माण किया जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा पर्यावरण में सुधार किया और कई समुदायों के लिए मूल रूप में वास्तविकता बदल दी।”

बता दें कि डॉ. बिन्देश्वर पाठक का जन्म 2 अप्रैल 1943 को बिहार में हुआ था। सुलभ इंटरनेशनल की नींव इन्होंने 1970 में रखी थी जिसकी आज ना केवल भारत बल्कि विश्व भर में प्रतिष्ठा है। सुलभ इंटरनेशनल मानव अधिकार, पर्यावरणीय स्वच्छता, ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों और शिक्षा द्वारा सामाजिक परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली अग्रणी संस्था है। अपने विशिष्ट कार्यों के लिए ‘पद्मभूषण’ डॉ. पाठक 60 से ज्यादा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। 2003 में उनका नाम विश्व के 500 उत्कृष्ट सामाजिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की सूची में प्रकाशित किया गया था।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बान की मून, नरेन्द्र मोदी, शी जिनपिंग और नीतीश होंगे एक मंच पर

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काम और कद को अब अंतर्राष्ट्रीयता स्वीकार्यता मिल रही है। इसका अंदाजा नेपाल सरकार से उन्हें अभी-अभी मिले एक न्योते से लगाया जा सकता है। जी हाँ, नेपाल सरकार की ओर से भगवान बुद्ध की 2560वीं जयंती पर अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है जिसमें शामिल होने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून, भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राषट्रपति शी जिनपिंग के साथ-साथ नीतीश कुमार को भी न्योता भेजा गया है। नीतीश इस खास मौके पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल होंगे।

बता दें कि इस सेमिनार का आयोजन 19 और 20 मई को राजधानी काठमांडू में किया जा रहा है, जबकि 21 मई को लुंबनी में बुद्ध जयंती समारोह मनाया जाएगा। जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राज्यसभा सांसद केसी त्यागी ने इस आमंत्रण के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री का आभार जताया है।

बिहार के मुख्यमंत्री को मिले इस न्योते को किसी सरकार या पार्टीविशेष की उपलब्धि के रूप में ना देखकर सम्पूर्ण राज्य की उपलब्धि के तौर पर देखा जाना चाहिए। राजनीति की अपनी जगह है और रहेगी। पर बिहार की जनता इसे राजनीति से ऊपर उठकर देखेगी तो निश्चित रूप से उसे गौरव और आनंद की अनुभूति होगी।

चलते-चलते बता दें कि नीतीश इस वर्ष मार्च में नेपाल के दौरे पर गए थे। वे वहाँ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ-साथ माओवादी, नेपाली कांग्रेस और मधेसी नेताओं से मिले थे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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स्मृतिजी, आपके यूजीसी ने ‘मरहम’ लगाते-लगाते बहुत देर कर दी..!

एमफिल या पीएचडी में 11 जुलाई 2009 से पहले रजिस्ट्रेशन कराने वाले उम्मीदवारों को अब सहायक प्रोफेसर पद के आवेदन में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) पास करने से छूट दी जाएगी। हालांकि इसके लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इस फैसले से उन हजारों पीएचडी डिग्री धारकों को लाभ होगा जो यूजीसी के 2009 के दिशानिर्देशों से प्रभावित हुए थे। इसके तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर पद के आवेदन के लिए नेट और पीएचडी न्यूनतम योग्यता निर्धारित की गई थी।

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि 11 जुलाई 2009 से पूर्व एमफिल या पीएचडी में रजिस्ट्रेशन कराने वाले उम्मीदवारों के लिए शिक्षक नियुक्ति के पुराने नियम ही लागू होंगे। उन्हें नेट या समकक्ष राज्य की परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी। विश्वविद्यालय इसके बगैर भी सहायक प्रोफेसर नियुक्त कर सकेंगे।

सरकार के इस निर्णय से हजारों उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिलेगी लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें भी लगाई गई हैं। इन शर्तों के अनुसार सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए पीएचडी डिग्री रेगुलर मोड में मिली होनी चाहिए। थीसिस के मूल्यांकन में दो बाहरी परीक्षकों को शामिल होना चाहिए। पीएचडी के लिए ओपन वायवा हुआ होना चाहिए। उम्मीदवार के दो शोधपत्र प्रस्तुत होने चाहिएं जिनमें से एक किसी जर्नल में प्रकाशित हो। इसके अलावा उम्मीदवार को कम से कम दो सेमीनार या कांफ्रेंस में प्रस्तुति (प्रेजेंटेशन) देने का अनुभव होना चाहिए। यही नहीं, उपरोक्त उपलब्धियां तभी मान्य होंगी जब कुलपति, प्रतिकुलपति या डीन उन्हें अभिप्रमाणित करेंगे।

यूजीसी के चेयरमैन वेद प्रकाश ने माना कि उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की बेहद कमी है। यूजीसी के इस नए कदम से शैक्षिक पदों पर काफी संख्या में उम्मीदवारों को आवेदन का मौका मिलेगा। निश्चित तौर पर यूजीसी के इस निर्णय के लिए भारत की शिक्षा मंत्री और यूजीसी के चेयरमैन बधाई के पात्र हैं लेकिन क्या ये एक तरीके का भूल-सुधार नहीं है..? जुलाई 2009 के दिशा-निर्देशों में अगर कोई कमी नहीं रही होती तो क्या आज का ये निर्णय लिया जाता..? और सबसे बड़ा सवाल ये कि जो उम्मीदवार जुलाई 2009 के विवादास्पद दिशा-निर्देशों के कारण साक्षात्कार देने या नियुक्ति पाने से वंचित रह गए उनके भविष्य का क्या होगा..?

ताजा उदाहरण बिहार का ही लें। वर्षों के इन्तजार के बाद यहाँ सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति-प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन हजारों उम्मीदवार जुलाई 2009 के अपरिपक्व और अव्यावहारिक दिशा-निर्देशों की बलि चढ़ गए। इन दिशा-निर्देशों में ये सोचा ही नहीं गया कि उन छात्रों का क्या होगा जो देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार ही एमफिल या पीएचडी की डिग्री ले चुके थे..? इस तरह के दिशा-निर्देश आगे के उम्मीदवारों के लिए तो हो सकते थे लेकिन पूर्व के उम्मीदवारों को इनके दायरे में लाना समझ से परे था। सच तो ये है कि यूजीसी को आज किया जा रहा भूल-सुधार और पहले करना चाहिए था। खैर, देर से ही सही, अब जब ये सुधार किया ही जा रहा है तो क्या वैसे तमाम अभ्यर्थियों के लिए भावी नियुक्तियों में कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए..?

मधेपुरा’ अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जेडीयू अध्यक्ष के तौर पर नीतीश की ताजपोशी के निहितार्थ

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जेडीयू के नए अध्यक्ष चुन लिए गए। कल दिल्ली में सम्पन्न हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में स्वयं शरद यादव ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। लगातार तीन कार्यकाल तक पार्टी के अध्यक्ष रहे शरद यादव ने वक्त की ‘नजाकत’ देख चौथी बार अध्यक्ष का चुनाव लड़ने से मना कर दिया गया था। हालांकि पार्टी के संविधान में संशोधन कर ऐसा हो सकता था लेकिन नीतीश की ताजपोशी की ‘पटकथा’ पहले ही लिखी जा चुकी थी। वैसे अध्यक्ष बनने के पूर्व भी सरकार और संगठन पर ‘निर्णायक’ पकड़ नीतीश की थी लेकिन अब वे दोनों के ‘विधिवत’ सर्वेसर्वा हो गए।

नीतीश के कमान सम्भालते ही जेडीयू के नए युग की शुरुआत हो गई। अध्यक्ष पद छोड़ते हुए बेहद ‘भावुक’ हो रहे शरद के लिए नए ‘उत्साह’ से लबरेज नीतीश ने कहा कि शरद पार्टी के सबसे बड़े ‘मार्गदर्शक’ बने रहेंगे लेकिन नीतीश आज जिस मुकाम पर हैं और आगे जो ‘मुकाम’ पाना चाहते हैं उसे देखते हुए आने वाले दिनों में उनका अपना ‘मार्ग’ और अपना ‘दर्शन’ हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। नीतीश अब बिना देर किए राष्ट्रीय लोकदल, झारखंड विकास मोर्चा और समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के जेडीयू में विलय की प्रक्रिया में लगेंगे और यहीं से जेडीयू और शरद के आने वाले कल की झलक भी मिलनी शुरू हो जाएगी।

पाँचवीं बार बिहार की गद्दी सम्भाल रहे नीतीश अब अपनी राजनीति का ‘कैनवास’ बड़ा करना चाहते हैं। वे अच्छी तरह जानते थे कि मोदी और भाजपाविरोधी राजनीति की ‘धुरी’ बनने के लिए उनका अध्यक्ष पद पर काबिज होना जरूरी है। नीतीश उत्तर प्रदेश चुनाव में भी बेवजह दिलचस्पी नहीं ले रहे। वहाँ जिस तरह के समीकरण वे बिठा रहे हैं उसमें थोड़ी सफलता भी उनके लिए बड़ा रास्ता खोल सकती है और वो रास्ता 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के बरक्स खुद को प्रधानमंत्री पद के लिए एक मजबूत विकल्प के तौर पर पेश करने का है।

चलते-चलते बता दें कि चुनाव आयोग के निर्देशानुसार नए अध्यक्ष के चयन के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी का फैसला काफी नहीं है, इस पर राष्ट्रीय परिषद का अनुमोदन भी आवश्यक है। 23 अप्रैल को पटना में ये ‘औपचारिकता’ भी पूरी कर ली जाएगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अब बिहार में नशा पर ‘पूर्ण विराम’… नीतीश के ‘साहस’ को सलाम..!

बिहार में देसी के बाद विदेशी शराब पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब राज्य में किसी भी तरह की शराब बेचना, रखना और पीना पूरी तरह गैरकानूनी होगा। बिहार सरकार ने आज राज्य में पूर्ण शराबबंदी का आदेश जारी कर दिया। यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। इस आदेश का उल्लंघन करने वालों पर नई उत्पाद नीति के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सरकार के इस साहसिक और सराहनीय निर्णय के बाद बिहार अब गुजरात, नगालैंड और मिजोरम के बाद देश का चौथा ‘ड्राई स्टेट’ होगा।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कैबिनेट की बैठक के बाद कहा कि शराबबंदी के लिए बिहार पूरे देश में उदाहरण बनेगा। उन्होंने शराबबंदी के लिए राज्य के नागरिकों की भागीदारी के लिए उनका धन्यवाद किया। खासकर राज्य की महिलाओं को उन्होंने तहेदिल से शुक्रिया कहा। उन्होंने कहा कि राज्य में शराबबंदी का बेहतर माहौल है और अब तक एक करोड़ पच्चीस लाख अस्सी हजार लीटर शराब को नष्ट किया जा चुका है।

बता दें कि एक अप्रैल से राज्य में देसी और मसालेदार शराब पर पाबंदी लगाई गई थी। सरकार के इस निर्णय का स्वागत तो हुआ लेकिन ये आवाज़ भी उठी कि विदेशी शराब पर मेहरबानी क्यों..? अब विदेशी शराब पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा कर नीतीश ने तमाम आलोचकों का मुँह बंद कर दिया है। अब बिहार में होटलों और बार में शराब नहीं मिलेगी। यह केवल मिलिट्री कैंटीन में उपलब्ध होगी।

पूर्ण शराबबंदी के दायरे में ताड़ी को भी रखा गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि ताड़ी में भी मादक गुण होते हैं। वह भी नशीला पेय है। उस पर भी प्रतिबंध लागू होगा। अब हाट-बाज़ार या सार्वजनिक जगहों पर ताड़ी की दुकानें नहीं खुलेंगी। ताड़ी की जगह नीरा को प्रोत्साहित किया जाएगा। नीरा स्वास्थ्यवर्द्धक होता है और उसमें मादकता भी नहीं होती।

पूर्ण शराबबंदी के फैसले का हर तबके के लोगों ने दिल खोलकर स्वागत किया है। राज्य में खुशी के साथ ही जैसे नई ‘ऊर्जा’ का प्रवाह भी हो रहा हो। ये ‘ऊर्जा’ उस विश्वास को बल मिलने से उपजी है जिसने नीतीश को पाँचवीं बार बिहार की बागडोर दिलाई थी। नीतीश ने बिहारवासियों के विश्वास की लाज तो रखी ही, उनकी अपेक्षाओं को नए पंख भी दे दिए। इन पंखों की उड़ान बिहार को नई पहचान दिलाएगी, इस उम्मीद के साथ नीतीश और उनकी टीम को हमारी शुभकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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शरद यादव की जगह नीतीश कुमार होंगे जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष..!

जेडीयू के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे। वैसे भी नीतीश पार्टी के ‘स्वाभाविक’ और ‘सर्वमान्य’ नेता हैं और अब जबकि वर्तमान अध्यक्ष शरद यादव ने चौथी बार अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने से ‘इनकार’ कर दिया है, इस बात की केवल औपचारिक घोषणा ही शेष है। सूत्रों की मानें तो स्वयं शरद ने नीतीश के नाम का प्रस्ताव दिया है। हालांकि सब कुछ ‘तय’ है फिर भी ‘औपचारिकतावश’ अध्यक्ष के चुनाव पर विचार करने के लिए दिल्ली में राष्ट्रीय परिषद की बैठक भी बुला ली गई है।

बता दें कि शरद यादव लगातार तीन बार से जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते आ रहे हैं जबकि पार्टी संविधान किसी को भी दो बार से अधिक अध्यक्ष बनने की इजाजत नहीं देता। पिछली बार उन्हें पार्टी के संविधान में संशोधन कर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था। लेकिन इस बार शरद ने अध्यक्ष बनने से यह कहते हुए मना कर दिया कि पार्टी संविधान में दूसरी बार संशोधन करना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि वे भले ही अध्यक्ष नहीं रहें, लेकिन पहले की तरह ही सक्रिय रहेंगे।

जेडीयू के निर्माण और उत्थान में शरद यादव की बड़ी भूमिका रही है। वे साफ-सुथरी छवि वाले, मुद्दों के लिए लड़ने वाले, सुलझे हुए और संघर्ष में यकीन रखने वाले नेता रहे हैं। मंडल कमीशन को धरातल पर उतारने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज बिहार के दिग्गज नेताओं – लालू, नीतीश या रामविलास – का कद जितना भी बड़ा हो, इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय राजनीति में इन सबके उभरने के बहुत पहले से शरद की पहचान राष्ट्रीय स्तर की रही है। लेकिन समय ने ‘करवट’ ली और अब पार्टी की कमान नीतीश के हाथों में जा रही है।

देखा जाय तो नीतीश लम्बे समय से राष्ट्रीय राजनीति में अपना ‘कद’ और ‘कैनवास’ बढ़ाने की कोशिश में लगे रहे हैं। ऐसे में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर उनका सामने आना और भी अहम हो जाता है। देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश की ताजपोशी के बाद जेडीयू के ‘आन्तरिक समीकरण’ और ‘भाजपाविरोधी ध्रुवीकरण’ में क्या और कितना नया होगा..?

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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शराबबंदी को लेकर काश कायम रहे नीतीश सरकार की ‘इच्छाशक्ति’..!

बिहार सरकार ने शराबबंदी को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने 1915 में बने बिहार उत्पाद विधेयक में संशोधन करते हुए जहरीली शराब बनाने और बेचने वालों के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया है। बच्चों एवं महिलाओं को शराब के धंधे में लगाने पर दस लाख रुपये तक के जुर्माने के साथ-साथ दस साल तक की सजा मिल सकती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की योजना इन कड़े प्रतिबंधों के जरिये पहले गांव को शराब से मुक्त करने की है। इसके बाद शहरों की बारी आएगी। नया कानून कल यानि एक अप्रैल से प्रभावी हो जाएगा।

101 साल पुराने अधिनियम को बदलकर लाए गए नए प्रावधान में बच्चों एवं महिलाओं का खास ख्याल रखा गया है। 21 साल से कम उम्र के बच्चों एवं महिलाओं को शराब के कारोबार में लगाने के जुर्म का उल्लेख अलग से किया गया है। शराब के अवैध व्यापार में लिप्त रहने पर कारोबारी की सारी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी। मुख्यमंत्री की सख्त हिदायत है कि 31 मार्च को बची हुई सारी देसी और मसालेदार शराब को नष्ट कर दिया जाए।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अवैध कारोबारियों पर अंकुश लगाने के लिए पड़ोसी राज्यों से भी सम्पर्क किया है। दूसरे राज्यों से शराब लाकर बिहार में कारोबार की छूट नहीं दी जाएगी। सीमा पर चेकपोस्ट और बैरियर बनाए जा रहे हैं। पड़ोसी राज्यों से शराब या स्प्रिट लेकर बिहार में प्रवेश करने वाले वाहनों को सीमा पर ही लॉक कर दिया जाएगा, जो सीमा पार करने के बाद ही खुलेगा। यही नहीं, अब दूसरे राज्यों के सामान लेकर आने-जाने वाले वाहनों को चौबीस घंटे के भीतर बिहार से बाहर जाना होगा। रेलवे ट्रैक एवं स्टेशनों पर भी पुलिस की पेट्रोलिंग होगी। नदी मार्ग की भी निगरानी की जाएगी। इन सबके साथ-साथ होम्योपैथी दवाओं के नाम पर अवैध शराब और स्प्रिट के धंधे में लगे लोगों पर भी सरकार नज़र रखेगी।

सरकार केवल कड़े नियम बनाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान रही। वो शराब की लत छुड़ाने के मोर्चे पर भी काम कर रही है। इसके लिए अनवरत जनजागरण के साथ ही हर जिले में दस-दस बेड वाले डी-एडिक्शन सेन्टर भी खोले गए हैं। इन सेन्टरों पर 135 डॉक्टरों को तैनात किया गया है। इन सभी डॉक्टरों को बेंगलुरु में दो सप्ताह की ट्रेनिंग दिलाई गई है। सभी सेन्टरों पर काउंसलिंग की व्यवस्था विशेष तौर पर की गई है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शराबबंदी को लेकर बिहार सरकार ने अपनी दृढ़ ‘इच्छाशक्ति’ दिखाई है। मुख्यमंत्री इसके लिए बधाई के पात्र हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार की ‘इच्छाशक्ति’ यूँ ही कायम रहेगी और आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, हरियाणा व मिजोरम की तरह बिहार में शराबबंदी का प्रयोग विफल नहीं होगा..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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लो विलय का मौसम आया

बिहार चुनाव से पहले गठबंधन का दौर चला और अब विलय का मौसम आया है। एक ओर नीतीश रालोद और जेवीएम को लेकर नई पार्टी को आकार देने में लगे हैं तो दूसरी ओर लोजपा, हम और रालोसपा एक झंडे के नीचे आने की तैयारी में हैं। अगर सब कुछ ठीक रहा तो रामविलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा जून तक एक मंच पर दिखेंगे।

बता दें कि लोजपा, हम और रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीते सोमवार को हम के प्रदेश अध्यक्ष वृशिण पटेल के वैशाली स्थित फार्म हाउस पर एकत्रित हुए थे। इस बैठक में लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान समेत तीनों दलों के कई बड़े नेता मौजूद थे। इससे पहले तीनों दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली में भी मंत्रणा कर चुके हैं।

तीनों दलों के इस सम्भावित विलय से एक बात तो स्पष्ट हो ही गई कि एनडीए में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। एनडीए के ये तीनों घटक दल भाजपा से ‘नाराज’ बताए जाते हैं। इनका मानना है कि बिहार में भाजपा ‘सशक्त विपक्ष’ की भूमिका नहीं निभा रही है। उक्त बैठक में तीनों दलों के नेताओं ने तय किया कि अगर भाजपा राज्य सरकार की नीतियों का जोरदार तरीके से विरोध नहीं करती है तो वे भाजपा को साथ लिए बिना ही सरकार का विरोध करने को सड़क पर उतरेंगे।

ये तीनों दल लाख कह लें कि ‘समान विचारधारा’ वाले दलों का आपस में मिलकर एक बड़े दल के रूप में आना ‘वक्त की मांग’ है, पर सच ये है कि विलय के सारे समीकरण ‘राजनीतिक लाभ’ के गुणा-भाग पर आधारित हैं। वैसे देखा जाय तो इसमें कोई बुराई भी नहीं। छोटे दलों की कौन कहे, बड़े दलों के ‘पैर’ भी तो उनकी ‘चादर’ से बड़े ही होते हैं। सारे दल अपनी ‘ताकत’ बढ़ाने और ‘उपस्थिति’ जताने के लिए कभी गठबंधन तो कभी विलय का सहारा लेते हैं और लेते रहेंगे। नैतिकता और विचार के लिए प्रतिबद्धता अब भाषणों के सिवा कहीं दिखती कहाँ है..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार की बदली हुई परिस्थितियों में राजीव गांधी के मंदिर का बनना

बिहार में भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का मंदिर बनने जा रहा है। जी हाँ, यहाँ के बक्सर जिले के राजपुर प्रखंड के कथराई गांव में भूमि-पूजन के उपरान्त दो दिन पहले इस मंदिर का निर्माण-कार्य भी प्रारम्भ हो चुका है। इस मंदिर में दिवंगत कांग्रेसी नेता राजीव गांधी की मूर्ति स्थापित की जाएगी। राजीव गांधी के लिए बनने जा रहा यह देश का संभवत: पहला मंदिर होगा।

बता दें कि राजीव गांधी का यह मंदिर कांग्रेस खेलकूद प्रकोष्ठ के बक्सर जिला उपाध्यक्ष मृत्युंजय राय बनवा रहे हैं। मृत्युंजय की मानें तो “राष्ट्र के नवनिर्माण में राजीव गांधी के विशेष योगदान” के प्रति यह उनकी श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। उनका कहना है कि इस मंदिर के निर्माण में सभी कांग्रेसियों से सहायता मिल रही है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि माँ इन्दिरा गांधी की मृत्यु के बाद 1984 में सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर सम्भालने वाले राजीव गांधी आज भी लाखों लोगों के ह्रदय में स्थान रखते हैं। भारत में ‘कम्प्यूटर युग’ लाने में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। 21 मई 1991 को तमिलनाडु की एक चुनावी सभा में बम विस्फोट कर उनकी हत्या कर दी गई थी। अब इस घटना के 25 साल बाद श्रद्धा की ये ‘अभिव्यक्ति’ हो रही है।

देखा जाय तो नेता, अभिनेता, क्रिकेटर आदि के लिए सम्मान व्यक्त करने की ऐसी परिपाटी दक्षिण में खूब रही है, लेकिन उत्तर भारत में इस तरह के उदाहरण बिरले ही मिलते हैं। जहाँ तक बिहार की बात है, गठबंधन का हिस्सा बनकर ही सही, लम्बे समय के बाद कांग्रेस सत्ता में आई है। ऐसे में ये बात भी जेहन में आती है कि कहीं ये बदली हुई परिस्थितियों में अपनी ‘उपस्थिति’ दर्ज कराने का बहाना तो नहीं..! अगर इस तरह का काम यहाँ कांग्रेस के ‘संघर्ष’ के दिनों में होता तो बात कुछ अलग होती।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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