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रमई, अर्जुन, विजय वर्मा समेत 21 नेता जेडीयू से निकाले गए

पूर्व अध्यक्ष शरद यादव के रुख से उपजा जेडीयू का घमासान अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। पार्टी लाईन से अलग बगावती सुर अलाप रहे शरद के 21 करीबी नेताओं को जेडीयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। इन नेताओं में पूर्व मंत्री रमई राम, सीतामढ़ी के पूर्व सांसद अर्जुन राय और मधेपुरा के पूर्व विधानपार्षद विजय वर्मा शामिल हैं। गौरतलब है कि ये सारे नेता शरद की तीन दिवसीय संवाद यात्रा में उनके साथ देखे गए थे। इससे पूर्व शरद समर्थक राष्ट्रीय महासचिव अरुण श्रीवास्तव और राज्यसभा सांसद अली अनवर पर पार्टी कार्रवाई कर चुकी है। शरद यादव को भी राज्य सभा में जेडीयू के नेता पद से हटाया जा चुका है। अब पार्टी से उनकी विधिवत विदाई की केवल औपचारिकता ही शेष है।

बहरहाल, जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने आज जिन 21 नेताओं को जेडीयू की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित किया, उनके नाम इस प्रकार हैं: रमई राम (पूर्व मंत्री), अर्जुन राय (पूर्व सांसद, सीतामढ़ी), राजकिशोर सिन्हा (पूर्व विधायक, वैशाली), विजय वर्मा (पूर्व स.वि.प.), धनिकलाल मुखिया (जिलाध्यक्ष, सहरसा), सियाराम यादव (पूर्व जिलाध्यक्ष, मधेपुरा), बिन्देश्वरी सिंह (पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, श्रमिक प्रकोष्ठ), इसराईल मंसूरी (राज्य परिषद सदस्य, मुजफ्फरपुर), मिथिलेश कुशवाहा (तकनीकी प्रकोष्ठ), निरंजन राय (जिला परिषद सदस्य, मुजफ्फरपुर), देवकांत राय (दरभंगा), टिन्कू कसेरा (व्यावसायिक प्रकोष्ठ), जयकुमार सिंह (प्रखंड अध्यक्ष, सोनबरसा), धीरेन्द्र यादव (प्रखंड अध्यक्ष, कहरा), उदयचंद्र साहा (व्यावसायिक प्रकोष्ठ), बिरेन्द्र आजाद (प्रखंड अध्यक्ष, बिहारीगंज), सुरेश यादव (प्रखंड अध्यक्ष, सतर कटैया), विजेन्द्र यादव (प्रखंड अध्यक्ष, सौर बाजार), रमण सिंह (किसान प्रकोष्ठ, मधेपुरा), कमल दास (मधेपुरा नगर परिषद) एवं देवेन्द्र साह (जिला परिषद उपाध्यक्ष, सीतामढ़ी)।

कहने की जरूरत नहीं कि जेडीयू के वर्तमान व पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष की तनातनी अब सतह पर आ गई है। दोनों ही नेताओं ने इधर खुलकर एक-दूसरे के विरुद्ध टिप्पणी की है। नीतीश कुमार ने जहां शरद को लेकर कहा कि पार्टी अपना फैसला ले चुकी है, वे कोई भी कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं। वहीं, शरद यादव ने नीतीश पर टिप्पणी की कि जेडीयू सिर्फ उनकी पार्टी नहीं है, यह मेरी भी पार्टी है। और तो और, शरद खेमा अब अपने ‘असली’ जेडीयू होने का दावा भी कर रहा है। ऐसी स्थिति में बहुत संभव है कि 19 अगस्त को पटना में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले ही शरद यादव की विदाई की औपचारिकता पूरी कर दी जाए।

 

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क्यों और कैसे मनाएं जन्माष्टमी ?

कल जन्माष्टमी है। यानि विष्णु के समस्त अवतारों में पूर्वावतार कहे जाने श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव। समस्त गुणों का आगर होने के साथ-साथ कृष्ण की सबसे अनोखी बात यह है कि उनके भक्त उन्हें जिस रूप में पूजते हैं वे उनके साथ उसी रूप में हो लेते हैं। एकमात्र वही हैं जिन्हें कोई पुत्र के रूप में, कोई सखा के रूप में, कोई सारथि के रूप में, कोई गुरु के रूप में तो कोई प्रेमी और यहां तक कि पति के रूप में चाहता और पूजता है और वो उस भक्त के प्रेम को उसी रूप में स्वीकार कर लेते हैं। यही कारण है कि भक्तों का जैसा तादात्म्य श्रीकृष्ण के साथ है वैसा किन्हीं अन्य देवता के साथ नहीं।

पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने हेतु श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। उनका अवतरण देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा में हुआ और एक मान्यता के मुताबिक यह दिव्य घटना 5 हजार 243 वर्ष पूर्व हुई।

जन्माष्टमी का त्योहार भारत सहित पूरे विश्व में वर्णनातीत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन कहीं रंगों की होली होती है तो कहीं डांडिया का उत्सव, कहीं दही-हांडी फोड़ने की उमंग होती है तो कहीं भगवान कृष्ण की मोहक छवियों की झांकी। मंदिरों की रौनक इस दिन देखते ही बनती है। भगवान कृष्ण को इस दिन विशेष तौर पर सजाए गए झूले पर झुलाया जाता है और साथ ही कृष्ण रासलीलाओँ का आयोजन होता है।

शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत का पालन करने से भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है। बताया जाता है कि इस दिन व्रत रखने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है, लक्ष्मी स्थिर होती है और सारे बिगड़ते काम बन जाते हैं। और हां, याद रखें कि इस दिन आपकी पूजा तभी पूर्ण होगी जब कृष्ण का नाम लेने के साथ ही आप देवकी, वासुदेव, नंद, यशोदा, राधा और लक्ष्मी का नाम भी श्रद्धापूर्वक लें। माना जाता है कि ये सभी कृष्ण के व्यक्तित्व के अनिवार्य अंग हैं और इन सबके बिना न तो उनकी पूजा पूरी होती है और न ही स्वीकार।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

 

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अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस

‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से 12 अगस्त यानि अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। ये संयोग है कि हमारे राष्ट्रीय युवा दिवस की तिथि भी 12 ही है, लेकिन महीना जनवरी है। 12 जनवरी स्वामी विवेकानंद, जिन्हें विश्व-इतिहास में युवा-शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, का जन्मदिवस है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को राष्ट्र-निर्माण की धुरी माना था और जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने की घोषणा की थी, तब भी उसका उद्देश्य यही बताना था कि युवाओं के बिना कोई भी राष्ट्र अपने विकास का लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता।

गौरतलब है कि पिछले साल मनाए गए विश्व युवा दिवस का विषय था – “लक्ष्य 2030: गरीबी उन्मूलन और सतत खपत और उत्पादन हासिल करना।” कहने की जरूरत नहीं कि 2030 तक इस लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है जब युवा इसके लिए अग्रणी भूमिका निभाएं। ये अत्यंत दुख व आश्चर्य का विषय है कि आज एक ओर हम मंगल तक पहुंच गए हैं, दूसरी ओर आज भी गरीबी और भूख भारत समेत पूरे विश्व की, खासकर तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देशों की, सबसे बड़ी समस्या है। एक अर्थ में यह समस्या वैश्विक आतंकवाद से भी बड़ी है। भूख से लड़े और उससे जीते बिना हम आतंकवाद से क्या पड़ पाएंगे? सच तो यह है कि जिस दिन सबके पेट में रोटी बराबर पहुंचने लग जाएगी उस दिन आतंकवाद की समस्या ही मिट जाएगी।

जिस तरह स्वस्थ शरीर में स्वस्थ आत्मा का निवास होता है, उसी तरह स्वस्थ युवाओं में ही स्वस्थ राष्ट्र और विश्व का बीज पनप सकता है। चाहे स्वास्थ्य शरीर का हो, मन और मस्तिष्क का हो, विचार और संस्कार का हो, या फिर विकास के किसी भी क्षेत्र और दुनिया के किसी भी कार्य-व्यापार का हो। भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सत्य तो भलीभांति जानते हैं। उनका शायद ही कोई भाषण हो, जिसमें वे युवाओं का आह्वान न करते हों और देश के सर्वांगीण विकास के लिए उनकी सहभागिता को अनिवार्य न बताते हों।

‘मधेपुरा अबतक’ सभी युवाओं का आह्वान करता है और कहना चाहता है कि वे जहां हैं, जिस क्षेत्र में हैं, वहां से इस देश के निमित्त अपना योगदान दे सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे खेतों में काम कर रहे हैं या विज्ञान की प्रयोगशाला में बैठे हैं, देश की सीमा की रखवाली कर रहे हैं या खेल के मैदान में पसीना बहा रहा रहे हैं, कोई साहित्य, चित्र या प्रतिमा गढ़ रहे हैं या आने वाले चुनावों में खड़े होने की तैयारी कर रहे हैं। वे जहां हैं, वहां अपना सर्वोत्तम दें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप’

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जेडीयू से विदाई की कगार पर शरद यादव

नीतीश कुमार के महागठबंधन छोड़ने और एनडीए के साथ सरकार बनाने के फैसले के खिलाफ शरद यादव खुलकर सामने आ गए हैं। जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष बिहार में महागठबंधन टूटने से नाखुश तो पहले से थे, लेकिन वक्त की नजाकत देख उन्होंने चुप्पी साध रखी थी। पर अब उनकी चुप्पी टूट चुकी है और ‘जो’ कुछ उनके भीतर चल रहा था, ‘वो’ बाहर आ गया है।

गौरतलब है कि शरद यादव इन दिनों तीन दिनों की बिहार यात्रा पर हैं। कल दौरे के पहले दिन पटना पहुंचने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने नीतीश कुमार पर बिहार की जनता को ‘धोखा’ देने का आरोप लगाया और कहा कि वे यह जानने आए हैं कि जनता की इस पर क्या राय है। साथ ही उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वे अब भी महागठबंधन के साथ हैं। शरद यादव के इस रुख के बाद जेडीयू द्वारा उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तयप्राय हो गई है।

बता दें कि अपनी तीन दिनों की यात्रा के दौरान शरद यादव बिहार के सात जिलों – वैशाली, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, सुपौल, मधेपुरा और सहरसा – में दो दर्जन से ज्यादा जगहों पर जाकर जनता से ‘संवाद’ करेंगे। उनकी इस यात्रा को नीतीश कुमार व जेडीयू से उनके औपचारिक अलगाव के तौर पर देखा जा रहा है। कल हवाई अड्डे पर उनके स्वागत के लिए जुटे लोगों में ज्यादातर आरजेडी के थे और हद तो तब हो गई जब उनके जिन्दाबाद के साथ नीतीश मुर्दाबाद के नारे भी लगे। स्वाभाविक तौर पर जेडीयू ने उनके इस कार्यक्रम से अपने तमाम कार्यकर्ताओं को दूर रहने का कड़ा निर्देश दिया है।

इस बीच बिहार जेडीयू के अध्यक्ष व सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि शरद यादव की ये गतिविधियां जारी रहीं तो पार्टी निकट भविष्य में कोई भी निर्णय ले सकती है। बिहार जेडीयू ने उन पर और उनकी यात्रा में साथ दिख रहे रमई राम पर कार्रवाई की अनुशंसा भी कर दी है। इसका मतलब साफ है कि नीतीश कुमार किसी बड़े निर्णय पर पहुंच चुके हैं। इसकी झलक तभी देखने को मिल गई थी जब राष्ट्रीय महासचिव अरुण श्रीवास्तव को गुजरात के राज्यसभा चुनाव में नीतीश के निर्णय के खिलाफ जाकर पोलिंग एजेंट बहाल करने और वहां के एकमात्र जेडीयू विधायक का वोट कांग्रेस उम्मीदवार को जाने के कारण निलंबित कर दिया गया था। अरुण श्रीवास्तव शरद के कितने करीबी हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है।

गौर करने की बात की है कि हाल के दिनों में शरद यादव ने कई बार पार्टी लाईन से अलग स्टैंड लिया है। प्रथम दृष्टया किसी मुद्दे पर अलग राय होना गलत भी नहीं। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब तेजस्वी के मुद्दे पर महागठबंधन छोड़ने में उन्हें जनता के साथ धोखा दिखता है लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति को ताक पर रख देने में कोई आपत्ति नहीं है। लालू और उनके परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर उन्होंने चुप्पी साध रखी है। वो यह भी नहीं देख पा रहे कि पार्टी का एक भी विधायक उनके स्टैंड के साथ नहीं है।

एक बात और, 17 अगस्त को उन्होंने दिल्ली में विपक्षी दलों के सम्मेलन की योजना भी बना रखी है। अगर उन्हें विपक्षी दलों के समर्थन का इतना ही भरोसा है तो वे राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा क्यों नहीं दे देते? डेढ़ दर्जन पार्टियों में से कोई उन्हें चुनकर दुबारा भेज दे सकती है! पर शरद जानते हैं कि ऐसा होना कितना मुश्किल है। ऐसे में कहना गलत न होगा कि उन्होंने अपनी ‘विदाई की पटकथा’ स्वयं लिखी, ताकि पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दे और उनकी राज्यसभा की सदस्यता बची रहे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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‘जनादेश अपमान यात्रा’ पर निकले तेजस्वी

9 अगस्त से जनादेश अपमान यात्रा शुरू करने के लिए लालू के छोटे बेटे व पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव घर से निकल गए हैं। उनकी मां व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने आज आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के समक्ष तिलक लगाकर उन्हें विदा किया। तेजस्वी के साथ उनके बड़े भाई व पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव भी गए हैं।

यात्रा पर निकलने से पहले नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मीडिया को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोला और कहा कि कल तक वे संघमुक्त भारत की बात करते थे और आज आरएसएस युक्त बिहार की बात कर रहे हैं। भाजपा नेता व मौजूदा उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के बारे में उन्होंने कहा कि उन पर कई मुकदमा है। ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ’ रैली में वे तर्क के साथ अपनी बात रखेंगे।

चम्पारण जाने के क्रम में जैसे-जैसे तेजस्वी का कारवां आगे बढ़ता गया, पार्टी समर्थकों ने हर जगह उनका स्वागत किया। यात्रा के हर पड़ाव पर तेजस्वी अपना अनुभव तस्वीरों के साथ ट्वीट करते रहे। अपने ट्वीट में उन्होंने जनता में आक्रोश होने की बात कही और नीतीश कुमार को चुनाव कराने की चुनौती दी।

बता दें कि तेजस्वी की इस यात्रा का उद्देश्य जनादेश के तथाकथित अपमान के बारे में जनता को बताना और आरजेडी की 27 अगस्त को प्रस्वावित रैली के लिए पटना बुलाना है। पर तेजस्वी से एक बात पूछे बिना नहीं रहा जाता कि आज इन सब बातों में वे जितनी ऊर्जा खर्च कर रहे हैं, उसका थोड़ा अंश उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों पर ‘बिन्दुवार स्पष्टीकरण’ देने में क्यों नहीं खर्च किया? अगर वो ऐसा करते तो महागठबंधन टूटने की नौबत न आती और वो खुद न सही लेकिन उनकी पार्टी सरकार में बनी रहती।

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पति-पत्नी ने शुरू किया था भाई-बहन का त्योहार

यह संसार रिश्तों से बना है और हर रिश्ते की अपनी अहमियत होती है, लेकिन भाई-बहन का रिश्ता अपने आप में अद्भुत है। यही एक रिश्ता है, जिसकी कोई एक परिभाषा गढ़ पाना मुश्किल है। सोच कर देखिए, अगर आपकी बहन आपसे बड़ी है तो उसमें मां की झलक पाएंगे आप, छोटी है तो बेटी लगेगी वह। दोस्त तो वो हर हाल में है ही। आप जो सुख-दुख कई बार माता-पिता से नहीं बांट पाते वो अपनी बहन से बांट लेते हैं। एक बहन ही है जो आपकी कमियों के लिए आपको डांटती नहीं और अपना ऐसा कोई सुख नहीं जो आपसे बांटती नहीं। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के इसी अटूट प्यार की निशानी है, जिसे सदियों से मनाया जाता रहा है। भाई-बहन के विश्वास को बनाए रखने वाला यह त्योहार श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। लेकिन इसकी शुरुआत कब और क्यों हुई, इसके पीछे कई दिलचस्प कहानियां हैं। चलिए जानने की कोशिश करते हैं।

आपको जानकर हैरत होगी कि भाई-बहन के इस त्योहार की शुरुआत पति-पत्नी ने की थी। पुराणों के अनुसार एक बार दानवों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता दानवों से हारने लगे। देवराज इंद्र की पत्नी शुचि ने देवताओं की हो रही हार से घबरा कर उनकी विजय के लिए तप करना शुरू कर दिया। तप से उन्हें एक रक्षासूत्र प्राप्त हुआ, जिसे उन्होंने श्रावण मास में पूर्णिमा के दिन अपने पति इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इस रक्षासूत्र से देवताओं की शक्ति बढ़ गई और उन्होंने दानवों पर जीत प्राप्त की। उसी दिन से यह परंपरा शुरू हुई कि आप जिसकी भी रक्षा व उन्नति की इच्छा रखते हैं, उसे रक्षासूत्र यानि राखी बांध सकते हैं, चाहे वह किसी भी रिश्ते में क्यों न हो।

वैसे हमारे इतिहास, खासकर पौराणिक इतिहास में ऐसी कई कहानियां दर्ज हैं जो रक्षाबंधन या राखी के महत्व को दर्शाती हैं। इनमें एक कहानी महाभारत काल से भी जुड़ी है। इस कहानी के अनुसार श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने चक्र से किया था। शिशुपाल का सिर काटने के बाद जब चक्र वापस लौटा तब उसे पुन: धारण करने के क्रम में कृष्ण की उंगली थोड़ी कट गई। उंगली से रक्त बहता देख पांडवों की पत्नी द्रौपदी से रहा नहीं गया और उन्होंने तुरंत अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर कृष्ण की उंगली में बांध दिया। इस पर भावुक होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वचन दिया कि वे आजीवन उनकी साड़ी की लाज रखेंगे। आगे चलकर दु:शासन ने जब द्रौपदी का चीरहरण करना चाहा तो उन्होंने पूरी तत्परता से अपना कहा पूरा किया।

रक्षाबंधन से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी का ताल्लुक हमारे मध्यकालीन इतिहास से है। यह कहानी रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं से संबंधित है और उस दौर को दर्शाती है जब राजपूत शासकों और मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था। रानी कर्णावती चित्तौड़ के राजा की विधवा थीं। राजा की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया। अपने राज्य व प्रजा की रक्षा की खातिर चिन्तित रानी ने हुमायूं से मदद मांगी। उन्होंने हुमायूं को एक राखी भेजी और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। हुमायूं ने उस राखी की मर्यादा रखी और रानी को बहन का दर्जा देते हुए उनके राज्य को सुरक्षित कर अपना दायित्व पूरा किया।

रक्षाबंधन से जुड़ी बाकी कहानियां फिर कभी। फिलहाल हमें इजाजत दें और हमारी मंगलकामनाएं स्वीकार करें। शुभ रक्षाबंधन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तो तेजस्वी को मिल गया शरद का ‘आशीर्वाद’!

राजनीति सचमुच अनिश्चितता का खेल है। इतना अनिश्चित कि यहां प्रतिबद्धता का पता पलक झपकते बदल जाता है और आप हक्के-बक्के रहने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। कौन जानता था कि महज 20 महीनों में ऐसी परिस्थिति आएगी कि नीतीश को महागठबंधन छोड़ना पड़ेगा और विधानसभा में उनके साथ बैठना होगा जिनके खिलाफ उन्होंने वोट मांगा था। और कौन जानता था कि तब नीतीश के निर्णय की ‘अध्यक्षता’ कर रहे शरद यादव आज उन्हीं के खिलाफ शुरू हो रही तेजस्वी की यात्रा में शामिल होने की तैयारी कर रहे होंगे।

जी हां, सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक शरद यादव 8 अगस्त को पटना आएंगे और इस बात के पूरे आसार हैं कि वे नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की 9 अगस्त से मोतिहारी से माधोपुर तक होने वाली यात्रा में उनका साथ देंगे। ख़बर है कि वे इस दौरान बिहार में भाजपाविरोधी दलों के साथ मिलकर आगे की रणनीति तय करेंगे। बताया जाता है कि नीतीश से नाराज चल रहे शरद की आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से बातचीत अन्तिम रूप ले चुकी है और तेजस्वी उनसे लगातार संपर्क बना कर चल रहे हैं।

बताया जा रहा है कि शरद यादव ‘तकनीकी’ कारणों से आरजेडी की सदस्यता ग्रहण नहीं करेंगे, लेकिन भाजपाविरोधी लड़ाई में लालू के साथ खड़े नज़र आएंगे। आरजेडी ज्वाइन करने पर उनकी राज्यसभा की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है। हां, जेडीयू अगर उन्हें असंबद्ध घोषित कर दे तो उनकी यह ‘बाधा’ दूर हो जाएगी, जैसे आरजेडी द्वारा असंबद्ध मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव की सदस्यता बची हुई है।

बहरहाल, गौरतलब है कि पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव नीतीश के विरोध व लगे हाथ ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ’ रैली की तैयारी के सिलसिले में 8 अगस्त को पटना से मोतिहारी रवाना हो रहे हैं, जहां से 9 अगस्त को उनकी यात्रा विधिवत शुरू होगी। इसके लिए आरजेडी ने भारत छोड़ो आन्दोलन की 75वीं वर्षगांठ को चुना है। इस दिन भाजपाविरोधी अन्य दलों के प्रमुख नेता भी मौजूद रहेंगे।

 

 

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क्या है शरद का सस्पेंस ?

शरद यादव का अगला कदम क्या होगा? वे अंतत: नीतीश के निर्णय का समर्थन करेंगे या अपनी अलग राह चुनेंगे? अलग राह चुनने की स्थिति में वे अपनी नई पार्टी बनाएंगे या किसी और पार्टी का दामन थाम लेंगे? देश और विशेषकर बिहार की राजनीति में उनके साथ या बगावत का क्या और कितना असर होगा? ऐसे जाने कितने ही सवाल हवा में हैं जिनका फिलहाल एक निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता।

बिहार का सत्ता समीकरण बदलने के बाद 2-3 दिनों तक शरद यादव ने चुप्पी साधे रखी। इस दौरान कभी राहुल गांधी तो कभी अरुण जेटली, कभी सीताराम येचुरी तो कभी डी राजा, कभी लालू प्रसाद यादव तो कभी अली अनवर से उनकी बात या मुलाकात की ख़बरें आती रहीं। इधर दो दिनों से वे मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं। तेवर हालांकि बगावती हैं, लेकिन अभी बोल रहे हैं संभलकर। संसद में फसल बीमा योजना को लेकर तो ट्वीटर पर कालाधन के मुद्दे पर उन्होंने केन्द्र सरकार की खिंचाई भी की लेकिन मर्यादित तरीके से।

आखिर शरद चाह क्या रहे हैं? मीडिया और उनसे जुड़े लोग उन्हें ‘दुखी’, ‘नाराज’, ‘आश्चर्यचकित’ बता रहे हैं, लेकिन उनका कोई स्पष्ट निर्णय या बयान सामने नहीं आ रहा। मधेपुरा, जहां पिछले 26 सालों से वे संसदीय राजनीति कर रहे हैं, में उनके करीबी विजय कुमार वर्मा, पूर्व विधानपार्षद बयान देते हैं कि शरद यादव महागठबंधन में रहकर उसे मजबूत करेंगे, तो दिल्ली में उनके अत्यंत करीबी केसी त्यागी, जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव 19 अगस्त को पटना में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनके शामिल होने की बात कह रहे हैं।

इधर मीडिया के कुछ लोग उनमें यूपीए की अगुआई करने और भाजपाविरोधी खेमे की ‘धुरी’ बनने की संभावना  देखने लगे हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है? दूसरी ओर बदले हालात में क्या नीतीश, जेडीयू और एनडीए के लिए उनकी इतनी ‘प्रासंगिकता’ बची है कि उन्हें केन्द्र में मंत्रीपद देकर ‘संतुष्ट’ किया जा सके? यहां उल्लेखनीय है कि 2019 को लेकर नीतीश ने कल कहा था कि मोदी के मुकाबले कोई है ही नहीं। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। इस पर शरद यादव ने आज यह तो कहा कि 2019 में किसी के हारने-जीतने का सवाल अभी दूर है, लेकिन नीतीश या मोदी को ‘आंख’ नही दिखाई।

सौ बात की एक बात यह कि राजनीति ‘गिव एंड टेक’ का खेल है। शरद यादव के अनुभव, वरिष्ठता और उनकी राष्ट्रीय पहचान पर उनके विरोधी को भी संदेह नहीं हो सकता लेकिन इससे भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि इतने लंबे राजनीतिक करियर में उनकी अपनी कोई ‘राजनीतिक जमीन’ नहीं बन पाई। मूल जनता दल से लेकर अब तक अलग-अलग समय पर और अलग-अलग पार्टियों में उनका ‘सांकेतिक’ महत्व जो भी रहा हो, उनमें वोट ट्रांसफर करने की क्षमता कतई नहीं। हां, ‘टेबल पॉलिटिक्स’ के महारथी वे जरूर हैं और मुद्दों की भी अच्छी समझ रखते हैं। अपनी इन खूबियों के बल पर अगले कुछ दिनों में वे क्या निर्णय लेते हैं, इस पर सबकी निगाहें लगी रहेंगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश: नई टीम, नई चुनौतियां

नीतीश की नई टीम के शपथ-ग्रहण के साथ बिहार में चल रही राजनीतिक अनिश्चितता और नाटकीय घटना-क्रम का पहला दौर पूरा हो गया दिखता है। पॉलिटिकल ड्रामा के दूसरे चरण की बात करें तो वह ‘विश्वासघात’ का आरोप लगा रही आरजेडी की रणनीति, मंत्रिमंडल में हम और रालोसपा को जगह न मिल पाने के कारण जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा की नाराजगी और नीतीश द्वारा ‘विश्वास’ में न लिए जाने के कारण शरद यादव की चुप्पी पर निर्भर कर रहा है।

बहरहाल, नीतीश की नई टीम में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के अतिरिक्त कुल 27 मंत्रियों को जगह मिली है, जिनमें कोशी कमिश्नरी के तीन चेहरे – बिजेन्द्र प्रसाद यादव (सुपौल), दिनेश चन्द्र यादव (सिमरी बख्तियारपुर) और रमेश ऋषिदेव (सिंहेश्वर) – शामिल हैं। ये तीनों मंत्री जेडीयू कोटे से हैं, जबकि इस इलाके से भाजपा के एकमात्र विधायक नीरज कुमार बबलू (छातापुर) की दावेदारी को नज़रअंदाज कर दिया गया। कल शपथ लेने वाले 27 मंत्रियों में 14 जेडीयू के, 12 भाजपा के और 1 लोजपा के हैं। गौरतलब है कि लोजपा से शपथ लेने वाले पशुपति कुमार पारस फिलहाल विधायक नहीं हैं, लेकिन रामविलास पासवान उनके लिए जगह बनवाने में सफल रहे, जबकि मांझी और कुशवाहा की अपनी-अपनी पार्टी के लिए यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

बता दें कि मधेपुरा जिला से नीतीश मंत्रिमंडल में जगह पाने वाले रमेश ऋषिदेव पहली बार मंत्री बने हैं। जेडीयू से लगातार तीसरी बार विधायक ऋषिदेव वर्तमान में विधानसभा की अनुसूचित जाति-जनजाति समिति के सभापति थे। अब वे इसी विभाग के मंत्री होंगे। मंत्रिमंडल में सहरसा का प्रतिनिधित्व करने वाले दिनेश चन्द्र यादव दूसरी बार मंत्री बने हैं। इससे पूर्व वे 2005-2010 के बीच नीतीश मंत्रिमंडल के ही सदस्य रहे थे। उन्हें लघु सिंचाई एवं आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी मिली है। महागठबंधन सरकार में मधेपुरा के प्रो. चन्द्रशेखर (आरजेडी) आपदा प्रबंधन मंत्री थे। लगातार 27 वर्षों से सुपौल से चुनाव जीत रहे और तब से लगभग हर सरकार में मंत्री रहे बिजेन्द्र प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के बाद मंत्रिमंडल के वरीयता क्रम में तीसरी जगह मिली है। उन्हें पूर्व की तरह ऊर्जा के साथ-साथ उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग की जिम्मेदारी मिली है।

चलिए एक नज़र डालते हैं सारे मंत्रियों और उनके विभागों पर –  1. नीतीश कुमार – गृह, सामान्य प्रशासन, निगरानी, 2. सुशील कुमार मोदी – वित्त, वाणिज्य कर, वन एवं पर्यावरण, आईटी, 3. बिजेन्द्र प्रसाद यादव – ऊर्जा, उत्पाद व मध्य निषेध, 4. प्रेम कुमार- कृषि, 5. नंदकिशोर यादव – पथ निर्माण, 6. राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह – जल संसाधन,  योजना विकास, 7. श्रवण कुमार – ग्रामीण विकास, संसदीय कार्य, 8. राम नारायण मंडल – राजस्व व भूमि सुधार, 9. जय कुमार सिंह – उद्योग व विज्ञान प्रौद्योगिकी, 10. मंगल पांडेय – स्वास्थ्य, 11. प्रमोद कुमार – पर्यटन, 12. कृष्ण नंदन वर्मा – शिक्षा, 13. महेश्वर हजारी – भवन निर्माण,  14. विनोद नारायण झा – पीएचईडी, 15. शैलेश कुमार – ग्रामीण कार्य, 16. सुरेश शर्मा – नगर विकास एवं आवास, 17. मंजू वर्मा – समाज कल्याण, 18. विजय कुमार सिन्हा – श्रम संसाधन, 19. संतोष कुमार निराला – परिवहन,  20. राणा रंधीर सिंह – सहकारिता, 21. खुर्शीद आलम उर्फ फिरोज अहमद – अल्पसंख्यक कल्याण व गन्ना उद्योग, 22. विनोद कुमार सिंह – खान व भूतत्व, 23. मदन सहनी – खाद्य एवं उपभोक्ता मामले, 24. कपिल देव कामत – पंचायती राज, 25. दिनेश चन्द्र यादव – लघु सिंचाई, आपदा प्रबंधन, 26. रमेश ऋषिदेव – अनुसूचित जाति एवं जनजाति विभाग, 27. पशुपति कुमार पारस – पशु एवं मत्स्य पालन विभाग,  28. कृष्ण कुमार ऋषि – कला-संस्कृति,  29. ब्रिजकिशोर बिंद – पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा विभाग।

सभी मंत्रियों को ‘मधेपुरा अबतक’ की शुभकामनाएं। हमें उम्मीद है कि नीतीश कुमार अपनी नई टीम के साथ सात निश्चय समेत अपने सभी निश्चयों को पूरा करेंगे, जिनमें बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाना भी शामिल है। अब जबकि राज्य और केन्द्र का ‘दिल-दिमाग’ एक है, इसमें किसी व्यवधान या विलम्ब का प्रश्न नहीं उठना चाहिए।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में हुई साकार नीतीश-‘मोदी’ सरकार

अभी चौबीस घंटे भी नहीं हुए और बिहार की सियासत ने नई करवट ले ली। कल सुबह 10 बजे नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री थे, शाम 5 बजे अपनी पार्टी की बैठक करते हुए भी वे महागठबंधन सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, पर अभी घंटा भी नहीं बीता कि आबोहवा बदलनी शुरू हो गई और शाम के 7 बजते-बजते वे राज्यपाल को बतौर मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा सौंप कर मीडिया के सामने मुखातिब थे और आज सुबह 10 बजे वे एनडीए विधायक दल के नेता के तौर पर छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे और उसके कुछ ही मिनटों बाद उनकी बगल की कुर्सी पर बतौर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बैठे थे। जी हां, तेजस्वी-प्रकरण का पटाक्षेप चार साल बाद जेडीयू-भाजपा के दुबारा हाथ मिलाने और सत्ता में साथ वापस आने से हुआ।

बता दें कि आरजेडी के साथ चल रही तनातनी में अपनी ‘नाक’ झुकाने से इनकार करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार शाम जेडीयू की बैठक के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। गौरतलब है कि जेडीयू उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सीबीआई के एफआईआर मामले में लगातार ‘बिन्दुवार स्पष्टीकरण’ और प्रकारांतर से इस्तीफे की बात कह रही थी, लेकिन आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने न केवल इस्तीफे से साफ इंकार किया बल्कि पूरे मामले पर न तो उन्होंने और न ही तेजस्वी ने ‘स्पष्टीकरण’ ही दिया। बकौल नीतीश कुमार ऐसी परिस्थिति में उनके लिए महागठबंधन सरकार को चलाना संभव नहीं रह गया था।

बहरहाल, नीतीश कुमार के इस्तीफे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में जुड़ने के लिए’ बधाई दी। इसके बाद लालू और उनकी पार्टी अभी ‘विश्वासघात’ का आरोप लगाते हुए अपनी भड़ास ही निकाल रहे थे कि घटनाक्रम तेजी से बदला और भाजपा ने बिना देर किए नीतीश को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। फिर ये ख़बर भी आते देर न लगी कि 1 अणे मार्ग पर भाजपा और जेडीयू विधायकों की संयुक्त बैठक हो रही है और नीतीश कुमार को एनडीए का नेता चुन लिया गया है। महज चंद घंटों में बिहार की सियासत की तस्वीर पूरी तरह बदल गई और ये स्पष्ट हो गया कि मानसून सत्र से पहले नीतीश सरकार अपने नए अवतार में होगी।

नीतीश कुमार ने ये साबित किया कि अगर आपके पास अपनी ‘छवि’ की पूंजी हो और आप धुन के पक्के हों तो सितारे भी आपके मुताबिक चलने लगते हैं और आप एक ही दिन में मुख्यमंत्री का पद छोड़कर फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। जहां तक लालू की बात है, उन्होंने जरा भी राजनीतिक परिपक्वता नहीं दिखाई। अगर उन्होंने समय रहते तेजस्वी से इस्तीफा दिलवा दिया होता तो न केवल उनका और तेजस्वी का कद बढ़ता और जनता की सहानुभूति उन्हें मिलती, बल्कि उनकी पार्टी सरकार में भी बनी रहती और महागठबंधन भी अटूट रहता। एक बात और, ऐसी स्थिति में वे वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी को उपमुख्यमंत्री बनवा कर अपने ‘माय’ समीकरण को भी मजबूत कर सकते थे। दूसरी ओर नीतीश कुमार हैं, उन्होंने समय की नब्ज को समझा और नैतिकता के साथ अपनी सरकार भी बचा ली। रही बात बेचारी कांग्रेस की, बिहार के इन दो बड़े दलों के बीच वो पिस कर रह गई है। जेडीयू-भाजपा के साथ आने के बाद अब उसके पास अधिक विकल्प ही नहीं हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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