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नीतीश ने क्यों की अपनी मृत्यु की बात ?

आज जबकि पार्टियां प्राईवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाई जा रही हैं, ऐसे में किसी राजनीतिक पार्टी के शीर्ष नेता के परिवार से किसी का राजनीति में न रहना और उस नेता का अपने न रहने की स्थिति में पार्टी के अस्तित्व की चिन्ता करना सचमुच बड़ी बात है। ये चिन्ता बताती है कि वह नेता पद, पावर और परिवार के लिए नहीं, उन विचारों और मुद्दों के लिए परेशान है, जिसे अपनी पार्टी के माध्यम से वो मुकाम तक पहुंचाना चाहता है। यहां बात की जा रही है, बिहार के लोकप्रिय मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की, जिन्होंने रविवार को हुई राज्य कार्यकारिणी की बैठक में यह कहकर सबको चौंका दिया कि “अगर कल को मेरी मृत्यु हो जाती है, तो पार्टी का क्या होगा?”

बैठक में मौजूद वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में नीतीश कुमार ने हजारों सभाएं और बैठकें की हैं, लेकिन यह पहला मौका है जब उन्होंने इस तरह की बात कही हो। जब इस बारे में नीतीश से पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा तो उन्होंने जवाब दिया कि कौन जानता है कल क्या होगा? हालांकि आगे उन्होंने जोड़ा कि अरे ऐसे ही मुंह से निकल गया, कुछ खास नहीं।

यहां गौर करने की जरूरत है कि नीतीश कुमार हमेशा अपनी बातों को बड़े ही व्यावहारिक और तार्किक तरीके से रखने के लिए जाने जाते हैं। अब अगर उन्होंने अगर ऐसी चिन्ता जाहिर की है तो यह भी अकारण नहीं है। शायद वे ऐसा कहकर नेताओं और कार्यकर्ताओं को याद दिलाने चाहते हैं कि उन्होंने पार्टी के लिए कितनी मेहनत की है ताकि उसी अनुपात में पार्टी के बाकी लोग भी अपनी भूमिका निभाएं। अगर वो पार्टी के लोगों को जेडीयू की बुनियादी विचारधारा की याद दिलाने चाहते हैं, देश और समाज के लिए उनकी प्रतिबद्धता को एक नई धार देने चाहते हैं, अपने विचार का फैलाव अपने बाद भी चाहते हैं तो यह एक सच्चे और अच्छे नेता की निशानी है।

बहरहाल, राज्य कार्यकारिणी की बैठक में नीतीश ने कहा कि जब तक मैं जिन्दा हूं तब तक बिहार से शराबबंदी का निर्णय वापस नहीं लिया जा सकता। अगर किसी को मेरे निर्णय से समस्या है तो वह मुझे मार सकता है लेकिन मैं इस नियम को किसी सूरत में नहीं हटाऊंगा। यहां बता दें कि शराबबंदी के बाद नीतीश कुमार सामाजिक मुद्दों को लेकर बिहार में दो और बड़े दांव खेलने वाले हैं। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के मौके पर वे दहेज प्रथा और बाल विवाह को पूरी तरह बंद करने के लिए बड़े अभियान का श्रीगणेश करेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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प्रधानमंत्री मोदी ने शुरू की ‘सौभाग्य योजना’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को ‘सौभाग्य योजना’ का शुभारंभ किया। इस योजना के तहत सरकार का लक्ष्य 31 मार्च 2019 तक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिसा, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में हर घर में बिजली पहुंचाना है। 16320 करोड़ की इस महत्वाकांक्षी योजना का स्लोगन है – “रोशन होगा हर घर, गांव हो या शहर”।

गौरतलब है कि इस योजना के तहत जिनका नाम सामाजिक-आर्थिक जनगणना में है, ऐसे लोगों को मुफ्त में बिजली कनेक्शन दिया जाएगा। जिनका नाम सामाजिक-आर्थिक जनगणना में शामिल नहीं है, उन्हें 500 रु. में बिजली कनेक्शन दिया जाएगा। ये 500 रु. 10 किश्तों में जमा कराए जा सकेंगे। इस योजना के तहत बिजली कनेक्शन के साथ ही एक सोलर पैक भी दिया जाएगा। इस सोलर पैक में पांच एलईडी बल्ब, एक बैट्री पावर बैंक, एक डीसी पावर प्लग और एक डीसी पंखा दिया जाएगा।

कहने की जरूरत नहीं कि इस योजना के बाद मिट्टी के तेल का विकल्प बिजली होगी। शैक्षणिक, स्वास्थ्य और संचार सेवा में सुधार होगा। जनता की सुरक्षा में भी इस योजना से सुधार होने की उम्मीद है। यही नहीं, इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और जीवन-स्तर में भी सुधार होगा। खासकर महिलाओं को रोज के कामों में बड़ी सहूलियत मिलेगी।

चलते-चलते बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में ‘सौभाग्य योजना’ का ऐलान करने के साथ ही दीनदयाल ऊर्जा भवन का उद्घाटन भी किया। इस अवसर पर केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान एवं ऊर्जा मंत्री आरके सिंह भी मौजूद थे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार की औद्योगिक राजधानी बनने की ओर अग्रसर मधेपुरा

राज्य की कमान नीतीश कुमार जैसे सक्षम हाथों में, केन्द्र की मोदी सरकार का भी भरपूर सहयोग और जिला में सभी विकास कार्यों के क्रियान्वयन के लिए मो. सोहैल जैसे सक्षम व तत्पर जिला पदाधिकारी, भला क्यों न हो मधेपुरा का विकास और क्यों न कल को बने मधेपुरा राज्य की औद्योगिक राजधानी। जी हां, मधेपुरा में रेल इंजन कारखाने के सफलतापूर्वक आकार ले लेने के बाद देश और दुनिया के कई बिजनेस टाइकून की निगाह मधेपुरा पर है।

अभी हाल ही में इन पंक्तियों के लेखक को मधेपुरा रेल इंजन कारखाने के एक वरिष्ठ फ्रांसीसी अधिकारी के साथ पटना से मधेपुरा की यात्रा करने का मौका मिला और बहुत करीब से देखने को मिली उस अधिकारी की आंखों में मधेपुरा से जुड़ी उम्मीद और यहां से उपजे विश्वास की चमक। कहना गलत न होगा कि वो दिन दूर नहीं जब मधेपुरा भारत और विश्व के मानचित्र पर अपना अलग वजूद रखेगा।

मधेपुरा को लेकर यह विश्वास अकारण या अतिउत्साहवश नहीं है। अब कल की ही खबर लीजिए। जापान की कंपनी ‘तायकिसा इंजीनियरिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ के वरिष्ठ अधिकारियों की टीम लगभग 100 करोड़ के पूंजी निवेश का प्रस्ताव लेकर मधेपुरा पहुंची। मधेपुरा के विद्युत रेल इंजन कारखाने से बनकर निकलने वाले इंजन के लिए यह कंपनी पार्ट-पुर्जा बनाएगी। शनिवार को कंपनी के प्रबंध निदेशक युताका ओनोजोवा, वाइस प्रेसिडेंट एचएन मकवाना और जनरल मैनेजर सचिन क्षीरसागर मधेपुरा के डीएम मो. सोहैल से मिले और पूंजी निवेश के संबंध में प्रस्ताव रखा। बता दें कि यह कंपनी मधेपुरा में 13 तरह के पार्ट्स बनाएगी।

जापानी कंपनी तायकिसा के अधिकारियों ने मधेपुरा में पूंजी निवेश करने का प्रस्ताव देने के साथ-साथ मधेपुरा लोकोमोटिव विद्युत इंजन कारखाना परिसर और आसपास के क्षेत्र का दौरा किया। अभी इस बात का निर्णय होना है कि यह फैक्ट्री कारखाना परिसर के अदर लगेगी या बाहर लगाई जाएगी। हालांकि डीएम सोहैल ने तायकिसा के अधिकारियों का आश्वस्त किया कि कारखाना परिसर के बाहर भी अगर फैक्ट्री के लिए जमीन की आवश्यकता होगी तो उपलब्ध कराई जाएगी। यही नहीं, इसके अतिरिक्त अन्य सुविधाओं का ध्यान रखने में भी कोई कोताही नहीं बरती जाएगी।

कहने की जरूरत नहीं कि मधेपुरा अपने विकास का नया अध्याय लिख रहा है। इस बात की प्रबल संभावना है कि मधेपुरा में शीघ्र देश-विदेश की कई और कंपनियां निवेश का प्रस्ताव लेकर आएंगी। बस मधेपुरा यूं ही प्रगति का परचम फहराता रहे, बिहार और देश के विकास में अपनी भूमिका निभाता रहे!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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वित्तरहित व अन्य सभी कोटि के शिक्षकों के लिए बड़ी खबर

भारत में अगस्त को क्रान्ति का महीना कहा जाता है और सितंबर को शिक्षा में क्रान्ति का | तभी तो 5 सितंबर को बिहार के 8 शिक्षकों को राष्ट्रपति भवन में महामहिम द्वारा एवं 14 शिक्षकों को पटना में मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया गया…….. और 6 सितंबर को शिक्षा मंत्री की टीम के समक्ष कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी डॉ.संजीव कुमार सिंह ने सहयोगी द्वय के साथ वित्तरहित शिक्षकों के साथ-साथ नियोजित/नियमित, अल्पसंख्यक, मदरसा, संस्कृत व अन्य शिक्षकों के अनेक विसंगतियों को दूर करते हुए सातवें वेतनमान को लागू कराने की प्रक्रिया शुरू कराने पर बल दिया………|

……और 21 सितंबर को एमएलसी द्वय डॉ.संजीव कुमार सिंह एवं डॉ.डी.के. चौधरी ने बिहार के उपमुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री श्री सुशील कुमार मोदी  से मिलकर वित्तरहित शिक्षकों से लेकर अन्य सभी कोटि के शिक्षकों के दशहरा, दीपावली, छठ एवं मुहर्रम जैसे महत्वपूर्ण पर्व को दृष्टिपथ में रखते हुए उन्हें एक आवेदन हस्तगत कराया जिसमें स्पष्ट रुप से यही अंकित किया गया है-

………स्वागत करता हूँ कि अपने राज्यकर्मियों को आपने दशहरा पर्व के मद्देनजर माह सितंबर के तीसरे सप्ताह के अंत तक ही वेतन भुगतान का निर्णय लिया है | बड़ी कृपा होती यदि राज्य के सभी कोटि के विद्यालय के नियोजित/नियमित शिक्षकों व कर्मियों तथा महाविद्यालय/विद्यालय/विश्वविद्यालय शिक्षकों व कर्मियों को भी उक्त लाभ दिये जाने हेतु आपके स्तर से वैसा ही सकारात्मक निर्णय लिया जाता……. साथ ही राज्य के सभी कोटि के अनुदानित संस्थानों यथा माध्यमिक/उच्च माध्यमिक (इंटर) | वित्तरहित शिक्षकों की डिग्री ईकाइयों के लम्बित अनुदान की विमुक्ति का प्रस्ताव भी कैबिनेट में लाकर अबिलम्ब पारित किया जाता तो इन शिक्षाकर्मियों के छोटे-छोटे बच्चों व बीबी-बेटियों के चेहरे पर भी पर्वोत्सव की मुस्कान तथा घर-आंगन में खुशहाली नजर आने लगती………!

वर्तमान समय में समाज से लेकर सरकार तक में संवेदनशीलता की सर्वाधिक कमी नजर आने लगी है…… इसे दूर कर “सबका साथ सबका विकास” को सशक्त बनाने की महती योजना बनाई जाय……!!

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खलता है तस्लीमुद्दीन का इस तरह चला जाना

अपने कद्दावर व्यक्तित्व, निर्भीक अंदाज और बेबाक बयानों से बिहार, खासकर सीमांचल की राजनीति को लगभग पांच दशकों तक प्रभावित करने वाले मोहम्मद तस्लीमुद्दीन नहीं रहे। रविवार को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। आरजेडी के वरिष्ठ नेता तस्लीमुद्दीन का विवादों से भले ही चोली-दामन का रिश्ता रहा हो, बिहार में अल्पसंख्यकों के वे बड़ा चेहरा थे, इसमें कोई दो राय नहीं। जब तक आम जनता में पैठ न हो तब तक छह बार विधायक और पांच बार सांसद होना मुमकिन नहीं। तस्लीमुद्दीन अभी भी अररिया से सांसद थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान समेत सभी दलों के नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है।

मधेपुरा के पूर्व सांसद एवं दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे डॉ. आरके यादव रवि ने उन्हें भावुक होकर याद किया और कहा कि तस्लीमुद्दीन के रूप में मैंने अपना एक प्रिय मित्र खो दिया। सीमांचल के इस लोकप्रिय व जूझारू चेहरे के यूं अचानक चले जाने से बिहार की राजनीति में एक शून्यता-सी आ गई है। डॉ. रवि ने 1981 से लेकर 1989 तक बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में और 1989 के बाद लोकसभा व राज्यसभा के सदस्य के रूप में तस्लीमुद्दीन के साथ बिताए पलों को याद करते हुए ‘मधेपुरा अबतक’ के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

बता दें कि तस्लीमुद्दीन सरकारी आश्वासन समिति के टूर पर चेन्नई गए थे, जहां उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में तकलीफ और खांसी में खून आने की शिकायत थी। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया और बचाने की हर संभव कोशिश की गई, पर उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई और रविवार दोपहर बाद उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को दो बजे दिन में अररिया के जोकीहाट में राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

4 जनवरी 1943 को जन्मे तस्लीमुद्दीन छात्रजीवन में ही राजनीति में आ गए थे। 1969 में वे पहली बार जोकीहाट से कांग्रेस के विधायक बने। 1972 में उन्होंने यह सीट निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर और 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीती। 1980 और 1985 में वे अररिया से विधायक चुने गए। 1995 में फिर से वे जोकीहाट से विधायक बने। लेकिन इस बीच 1989 में वे जनता दल उम्मीदवार के तौर पर पूर्णिया से सांसद भी रहे। 1996 में वे किशनगंज से सांसद चुने गए और देवगौड़ा सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे। 1998 में यहां से उन्होंने फिर जीत दर्ज की पर 1999 में शाहनवाज हुसैन के हाथों यह सीट उन्हें गंवानी पड़ी। लेकिन 2004 में उन्होंने एक बार फिर यह सीट जीत ली। इसके बाद 2014 में वे अररिया से सांसद चुने गए। गौरतलब है कि केन्द्र में मंत्री रहने के अलावा तस्लीमुद्दीन बिहार सरकार में भी कई विभागों के मंत्री रहे थे। अपने जीवन का अधिकांश सार्वजनिक जीवन को देने वाले और कभी हार न मानने वाले तस्लीमुद्दीन का जिन्दगी की जंग इस तरह हार कर चला जाना सचमुच खलता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार था हिन्दी को आधिकारिक भाषा चुनने वाला पहला राज्य

हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है, हिन्दी हमारी राजभाषा है, हिन्दी में हिन्दुस्तान की आत्मा बसती है, हिन्दी ही पहचान है हमारी और फिर भी विडंबना देखिए कि कुछ संस्थाओं द्वारा रस्मअदायगी करने और कुछ सरकारी आयोजनों के अलावा हिन्दी दिवस पर उतनी भी चहल-पहल और रौनक नहीं जितनी ‘वेलेंटाइन डे’ तक पर देखने को मिल जाती है। आखिर हम जा कहां रहे हैं? क्या पश्चिम से आयातित तौर-तरीकों में अपनी शान समझने वाले हम भारतवासी (माफ कीजिए, ‘इंडियन’) बहुत तेजी से सांस्कृतिक गुलामी की तरफ नहीं बढ़ रहे? और क्या ये गुलामी सदियों की उस गुलामी से अधिक भयावह नहीं जिससे हम 15 अगस्त 1947 को मुक्त हुए थे?

जरा सोचकर देखिए, आज 14 सितंबर यानि हिन्दी दिवस है, क्या आप बता सकते हैं कि आज हम हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं? और अगर आप जानते हैं तो क्या विश्वास के साथ यह कह पाने की स्थिति में हैं कि आपने अपने बच्चों को भी इस दिन और इसके महत्व से अवगत कराया है? अगर पहले सवाल का जवाब आप ‘हां’ में दे भी दें तो दूसरे सवाल का जवाब (जैसा कि स्कूलों के सर्वे से पता चलता है) सौ में सत्तर फीसदी लोगों का ‘ना’ में होगा।

बहरहाल, 14 सितंबर के ही दिन 1949 में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिला था। संविधान के अनुच्छेद 343 में यह प्रावधान किया गया है कि देवनागरी लिपि के साथ हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। हिन्दी को लेकर एक गौरवशाली तथ्य बिहार से जुड़ा है। जी हां, बिहारवासियों को इस बात का गर्व होना चाहिए कि 1881 में बिहार ही वो पहला राज्य था, जिसने हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में चुना था।

आज की पीढ़ी को ये जरूर जानना चाहिए कि ‘हिन्दी’ शब्द फारसी शब्द ‘हिन्द’ से बना है, जिसका अर्थ ‘सिंधु नदी की भूमि’ है। 11वीं सदी में जब तुर्कों ने पंजाब और गंगा के मैदानों पर हमला किया, तब हिन्द शब्द का इस्तेमाल यहां रहने वाले लोगों के लिए किया गया था। हमें यह भी पता होना चाहिए कि दुनिया भर में 64 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है। 2015 के आंकड़ो के मुताबिक हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। यही नहीं, एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि जहां 70 प्रतिशत चीनी ही मंदारिन बोलते हैं, वहां भारत के 77 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं।

इंटरनेट की दीवाने युवाओं को यह जानकर खुशी होगी कि दुनिया में हर पांच में से एक व्यक्ति हिन्दी में इंटरनेट का उपयोग करता है। यही नहीं, हिन्दी भारत की उन सात भाषाओं में एक है, जिसका इस्तेमाल वेब एड्रेस बनाने में भी किया जाता है। हिन्दी की एक और खूबी जिससे आपको वाकिफ होना चाहिए, वो यह कि सीखने के लिहाज से यह विश्व की अन्य भाषाओं की तुलना में अधिक आसान है। इसमें शब्दों का वही उच्चारण होता है, जो लिखा जाता है।

चलते-चलते यह भी जानें कि विश्व हिन्दी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र के नागपुर से 1975 में हुई थी और 2006 में इस दिन को आधिकारिक दर्जा के साथ वैश्विक पहचान मिली।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

 

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सुनिए, चोट खाए शरद ने क्या कहा ?

अब जबकि चुनाव आयोग ने साफ कर दिया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला दल ही असली जेडीयू है और उनकी राज्यसभा सदस्यता जाने में औपचारिकता भर शेष है, फिर भी शरद यादव यह मानने को तैयार नहीं कि पार्टी के भीतर की लड़ाई वे हार चुके हैं। हां, उन्होंने इतना जरूर कहा कि हम पहाड़ से लड़ रहे हैं तो यह सोच कर ही लड़ रहे हैं कि चोट लगेगी ही।

दरअसल, जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता पर मंडराते संकट पर अपना पक्ष रख रहे थे। कल चुनाव आयोग द्वारा पार्टी पर शरद गुट के दावे पर संज्ञान नहीं लेने और राज्यसभा का नोटिस मिलने के बाद अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि इन पहलुओं को उनके वकील देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे देश की साझी विरासत पर आधारित संविधान की लड़ाई बचाने की बड़ी लड़ाई के लिए निकल पड़े हैं। बकौल शरद राज्यसभा की सदस्यता बचाना छोटी बात है, उनकी लड़ाई साझी विरासत बचाने की है। सिद्धांत के लिए वे पहले भी संसद की सदस्यता से दो बार इस्तीफा दे चुके हैं।

भविष्य की रणनीति के बारे में शरद ने कहा कि 17 सितंबर को पार्टी कार्यकारिणी और 8 अक्टूबर को राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद जेडीयू बड़े रूप में सामने आएगी। हालांकि कैसे आएगी, इस पर फिलहाल वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं। आगे नीतीश पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि हमारे मुख्यमंत्री मित्र ने खुद राजद प्रमुख लालू प्रसाद से जब महागठबंधन बनाने की पहल की थी, तब भी वह भ्रष्टाचार के आरोपों से बाहर नहीं थे। जबकि महागठबंधन की सरकार बनने के बाद अचानक शुचिता के नाम पर गठजोड़ तोड़ दिया। यह बिहार के 11 करोड़ मतदाताओं के साथ धोखा है। हमने सिद्धांत के आधार पर ही इसका विरोध किया।

समाजवाद के इस पुराने नेता ने आगे की लड़ाई साझी विरासत के मंच से लड़ने की बात कही। वे लड़ेंगे भी, क्योंकि वे शुरू से धूल झाड़कर फिर से खड़े होने वालों में रहे हैं। लेकिन क्या तमाम आरोपों और मुकदमों से घिरे लालू और उनके परिवार की ‘बैसाखी’ से उनके ‘सिद्धांत’ को कोई गुरेज नहीं है? क्या वे प्रकारान्तर से यह कहना चाहते हैं कि लालू पुत्रों का ‘मॉल’ और मीसा का ‘फॉर्म हाउस’ गरीबों को ‘सामाजिक न्याय’ दिलाने के लिए है? या फिर यह मान लिया जाए कि भारतीय राजनीति में अब भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जेडीयू पर शरद का दावा खारिज, अब राज्यसभा की बारी

चुनाव आयोग ने जेडीयू विवाद पर अपना निर्णय दे दिया। आयोग ने बिना किसी द्वंद्व के बड़े स्पष्ट शब्दों में पार्टी और उसके सिंबल पर शरद यादव की दावेदारी को खारिज कर दिया। इसके साथ ही ‘असली-नकली’ की जबरदस्ती लड़ी जा रही लड़ाई खत्म हुई और पार्टी विधिवत नीतीश कुमार की हो गई। हालांकि, शरद खेमे के अली अनवर ने आयोग के फैसले पर असंतोष जताते हुए कानूनी राय लेने और जरूरत पड़ने पर कोर्ट जाने की बात कही, लेकिन वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ होंगे की आगे की लड़ाई कितनी मुश्किल हो गई है।

गौरतलब है कि शरद खेमे ने बीते 25 अगस्त को पार्टी सिंबल पर अपना अधिकार जताया था, लेकिन शरद यादव अपने दावे के पक्ष में अपेक्षित कागजात जमा करने में विफल रहे। जबकि दूसरी ओर शुक्रवार को सांसद आरसीपी सिंह के नेतृत्व में चुनाव आयोग से मिलने गया जेडीयू का प्रतिनिधिमंडल सांसदों, विधायकों और 145 राष्ट्रीय परिषद सदस्यों के समर्थन की सूची से लैस था। ऐसे में आयोग को एक आसान फैसला लेना था, जो उसने ले लिया।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट तौर पर कहा कि शरद खेमे के दावे के साथ पर्याप्त समर्थन का दस्तावेज नहीं है। ऐसे में इस आवेदन पर कोई विचार ही नहीं किया जा सकता है। जबकि दूसरी ओर नीतीश खेमे के पास पर्याप्त से भी अधिक समर्थन है। हालांकि शरद यादव के पास फिर से आवेदन देने का अधिकार है, लेकिन यह जानते हुए कि जरूरी समर्थन और उसके लिए हस्ताक्षर जुटाना लगभग नामुमकिन है, शायद वो अपनी और किरकिरी न कराना चाहें।

उधर आयोग के इस फैसले के बाद जेडीयू महासचिव संजय झा ने कहा कि अब आयोग के फैसले की यह प्रति राज्यसभा में दी जाएगी ताकि इस आलोक में शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता को लेकर भी आसानी से फैसला लिया जा सके। बता दें कि पार्टी लाईन से अलग चल रहे शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए भी जेडीयू ने राज्यसभा के सभापति से आग्रह किया है और इसके बाद राज्यसभा सचिवालय ने नोटिस भेजकर शरद से स्पष्टीकरण भी मांगा है। हालांकि चुनाव आयोग के फैसले के बाद अब राज्यसभा के सभापति को निर्णय लेने में कोई दुविधा होगी, इसका कोई आधार नहीं दिखता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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एक चाय बेचने वाला भारत का प्रधानमंत्री कैसे बन गया ?

इस टाइटल को पढ़ने के बाद आप में से ज्यादा लोग यही सोचेंगे कि लक, किस्मत, नसीब ने नरेन्द्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाया, साईकिल पर चढ़ कर चूरन बेचने वाले रामदेव को फ़र्स से अर्श तक पहुचाया और भारत का बिज़नस टायकुन बनाया | क्या सच में होता है किस्मत ? किस्मत या फिर लक इस दुनिया की सबसे रहस्यमयी शक्ति है | ऐसा क्यों होता है हम में से कुछ लोगों के साथ हमेशा अच्छी चीजें होती है और किसी-किसी के साथ हमेशा बुरी | तो किस्मत या लक या फिर नसीब कहलें- क्या यह सब एक ‘इत्तेफाक’ है | कोई अगर लगातार 10 बार लौटरी जीत जाये तो क्या हम इसे उसका लक कहेंगे या फिर ‘इत्तेफाक’ | अगर लक कहेंगे तो क्या सबकुछ पहले से तय है जिससे कोई बार-बार लौटरी जीत रहा है तो कोई चाय बेचते-बेचते प्रधानमंत्री बन जाता है | या फिर ये सब एक इत्तेफाक है ! क्या ये इत्तेफाक (Randomness) हमारे ब्रह्मांड पर राज करता है ??

जब हमारी जिंदगी में सारी परिस्थितियां अनुकूल होती है तो हम इसे अपना गुड-लक मानते हैं और जब परिस्थितियां बुरी होती है तो हम उसे अपना बैड-लक मानते हैं | पर आखिर ऐसा क्यों होता है हमारे साथ ? क्या कोई रहस्यमयी चीज़ है जो हमारी परिस्थितियों को नियंत्रित करती है ? तो आइये जानते हैं कि विज्ञान क्या कहता है- वो शक्ति जो हमारी गुड-लक और बैड-लक परिस्थितियों को तय करती है वो हमारी शरीर की एक अवस्था है जिसका जवाब Physics में है, जी हाँ Quantum Physics में | अगर हम Quantum Physics की बात मानें तो हम एक विशुद्ध शक्ति पुंज हैं | हम में भी ठीक उसी प्रकार कम्पन होता है जैसा की किसी भी Charged Particle में | बस सिर्फ हमें बाहर से हमारा शरीर नजर आता है | हम सबों ने अपने भीतर की उस उर्जा को कभी न कभी जरुर  महसूस किया है |

तो आज हम आपको बतायेंगे कि एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री कैसे बन गया- Quantum Physics के वैज्ञानिकों ने फ्रीक्वेंसी मापक यंत्र  द्वारा ये साबित कर दिया है कि एक साधारण स्वस्थ मनुष्य का शरीर 60-72 मेगाहर्ज़ पर कम्पन करता है | और गड़बड़ी तब हो जाती है जब आपके शरीर का कम्पन 60 मेगाहर्ज़ से नीचे हो जाये | इस अवस्था में आप किसी काम के नहीं होते हैं | चारों ओर असंतोष व्याप्त होने लगता है, आपके साथ हमेशा बुरा होता है, आपकी किस्मत आपको छोड़ के जा चुकी होती है, आपसे कोई प्यार नहीं करता है, आप नशे के गिरफ्त में आ चुके होते हैं, जिंदगी बोझ बन जाती है और आप बन जाते हो धरती के बोझ ! तभी तो हमारे क्रन्तिकारी मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने बिहार में शराब बंदी करवाई जिससे की बिहार की जनता Low Frequency Zone में न जा सके…… और एक अच्छी जिंदगी बना सके |

बहरहाल अब हम बात करते हैं जब हमारे शरीर की फ्रीक्वेंसी 72 मेगाहर्ज़ से ऊपर यानि 75-80-82 हो तो हम एक खुशहाल जिंदगी की तरफ़ बढ़ रहे होते हैं, हमारा जीवन स्वस्थ होता है, लोग हमसे प्यार करते हैं, हमें एक कामयाब आदमी की पहचान मिलती है या कुल मिलाकर कहें हम एक बहुत ही कामयाब जिंदगी जी रहे होते है  और अगर ये फ्रीक्वेंसी 90 मेगाहर्ज़ के पार चले जाये तो हम बहुत ही किस्मत वाले हो जाते हैं, हमारे सारे सपने सच होने लगते हैं, हमारा प्रभाव दिन-ब-दिन बढ़ने लगता है | ठीक यही बात हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के साथ घटित हुई है उन्होंने अपने आप को Low Frequency Zone से High Frequency Zone में स्थापित किया और चाय बेचते-बेचते भारत के प्रधानमंत्री बन गये | वहीँ साईकिल पर चूरन बेचने वाला रामदेव- बिज़नस टायकुन चार्टर्ड प्लेन पर चढ़ने वाले बाबा रामदेव बन गये |

महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला ने कहा था-  “If you want to understand this Universe then think in terms of Energy, Vibration and Frequency”

तो एक बात साबित हो ही गई कि किस्मत उनकी चमकती है, लक उनका साथ देता है,नसीब उनका बनता है, मुकद्दर का सिकंदर वो होता है जिनकी फ्रीक्वेंसी हाई होती है |

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शरद की राज्यसभा सदस्यता की उल्टी गिनती शुरू !

जेडीयू से अलग राह पर निकल चुके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता खत्म कराने की कवायद पार्टी ने शुरू कर दी। राज्यसभा में जेडीयू के नेता आरसीपी सिंह और पार्टी के राष्ट्रीय सचिव संजय झा ने उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू से भेंटकर उन्हें जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पत्र सौंपा। पत्र में शरद और अनवर की राज्यसभा सदस्यता खत्म करने की बात कही गई है।

गौरतलब है कि ये दोनों नेता पार्टी लाईन से अलग जाकर 27 अगस्त को पटना में आयोजित आरजेडी की भाजपा भगाओ देश बचाओ रैली में शामिल हुए थे। इनके रैली की ‘लक्ष्मण रेखा’ पार करते ही जेडीयू ने स्पष्ट कर दिया था कि अब इन दोनों नेताओं की राज्यसभा सदस्यता खत्म कराने के लिए जल्द ही जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव संजय झा का कहना है कि शरद यादव और अली अनवर ने पार्टी के निर्देश का उल्लंघन कर आरजेडी के साथ मंच साझा किया। यह संविधान के दसवें अनुच्छेद के तहत स्वत: दल त्याग का मामला है। पूर्व में ऐसे मामलों में सदस्यता खत्म होने के दृष्टांत हैं। आगे उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के मसले पर आरजेडी से गठबंधन तोड़ने का निर्णय जेडीयू विधानमंडल दल की बैठक में और एनडीए में शामिल होने का फैसला पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में लिया गया था। यह कोई व्यक्तिगत निर्णय नहीं। शरद यादव जब पार्टी के निर्णय के खिलाफ हैं तो यह साफ है कि वह पार्टी में नहीं रहना चाहते। वह अकेले पार्टी नहीं हो सकते।

उधर शरद यादव ने अपनी राज्यसभा सदस्यता खत्म करने को लेकर जेडीयू की कोशिशों का विरोध किया है। और तो और, उन्होंने तो नीतीश कुमार के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहने को ही चुनौती दे दी है। उनका कहना है कि नीतीश ने खुद ही भाजपा के साथ सरकार बनाकर पार्टी के चुनाव घोषणापत्र और बुनियादी सिद्धांतों को त्यागकर स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है।

यह भी बता दें कि शरद यादव ने चुनाव आयोग के आदेश 1968 के पैरा 15 के तहत आयोग से कहा है कि पार्टी का बहुमत उनके साथ है इसलिए पार्टी का चुनाव चिह्न उन्हें दे दिया जाए। हालांकि वे अपने बहुमत को न तो दिखा पा रहे हैं, न ही समझा पा रहे हैं। बहरहाल, जेडीयू को लेकर इस ‘रस्साकसी’ का परिणाम भले ही नीतीश के पक्ष में तयप्राय है, पर ये है बड़ा दिलचस्प, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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