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… इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है..!

समय के साथ सब कुछ बदलता है। आपके तौर-तरीके ही नहीं, त्योहार तक बदल जाते हैं। तकनीक ने हमें बाहर जितना विस्तार दिया, भीतर उसी अनुपात में सिमटते गए हम और इस ‘संकुचन’ को बड़ी बेशर्मी से ‘आधुनिकता’ का नाम दिया हमने। आयातित बोली, आयातित शिक्षा, आयातित परिधान, आयातित संगीत, आयातित नृत्य, आयातित साहित्य, आयातित सिनेमा, आयातित उपकरण… इस आधुनिकता में सब कुछ आयातित था। आयात-आधारित इस आधुनिकता में हम विचारधारा भी आयात करने लगे और अब तो त्योहार आयात करने में भी संकोच नहीं होता हमें। इसे हम समय के साथ बदलना कहने लगे हैं।

इस ‘आधुनिकता’ की होड़ में गांव बड़ी तेजी से शहरों में खोते जा रहे हैं। डिब्बाबंद दूध, ‘डेलिवर’ किए गए फास्ट फूड और बोतलबंद पानी पर बड़ी हुई पीढ़ी ‘ईएमआई’ चुकाना भले सीख ले, मिट्टी का ‘कर्ज’ चुकाने के संस्कार से वो कोसों दूर रहेगी। हम गौर से देखें, जड़ तक जाकर पड़ताल करें तो पाएंगे कि हमारे सारे व्रत और त्योहार हमारी मिट्टी से जुड़े हैं। हम आजीवन अपनी मिट्टी से जो लेते हैं दरअसल व्रत रखकर और त्योहार मनाकर उसी का आभार जताते हैं हम। पर लानत है हम पर कि अब हम अपनी मिट्टी तक में ‘मिलावट’ करने लगे हैं। इसी का परिणाम है कि होली, दीपावाली जैसे त्योहारों का बड़ी तेजी से ‘शहरीकरण’ होने लगा है। या यूँ कहें कि अब इन त्योहारों को हम ‘आधुनिक’ तरीके से मनाने लगे हैं।

आधुनिकता की इस चकाचौंध में भी अगर हमारी आँखें पूरी तरह चुंधिया नहीं गई हैं तो इसका बहुत बड़ा श्रेय छठ को जाता है। अपनी जड़ों से कटकर महानगरों के आसमान में उड़ना सीख गए बच्चे होली-दीपावली चाहे जहाँ मना लें पर छठ के लिए वे अपने ‘घोंसले’ को लौट आते हैं। उन बच्चों के बच्चे जान पाते हैं कि ‘टू बेडरूम फ्लैट’ से बाहर की दुनिया कितनी बड़ी होती है और दो इकाईयों के साथ रहने से बने परिवार और कई परिवारों के जुड़ने से बने परिवार में क्या फर्क होता है। वे समझ पाते हैं कि ‘डिस्कवरी’ पर नदियों को देखना और उसे छूकर महसूसना कितना अलग होता है। वे जान पाते हैं कि क्या होता है सूप, कैसा होता है दौउरा, कौन बनाते हैं इन चीजों को और समाज के कितने अभिन्न अंग हैं वे। छठ ही बताता है उन्हें डाभ, चकोतरा (टाब नींबू), सिंघाड़ा, अल्हुआ और सुथनी जैसे फलों का अस्तित्व।

छठ धर्म से ज्यादा समाज का, सामूहिकता का और समानता का त्योहार है। समाजवाद का सबसे जीवंत दृश्य आपको छठ घाट पर दिखेगा। मालिक और मजदूर दोनों एक समान सिर पर प्रसाद का दौउरा ढोते मिलेंगे आपको। सबके सूप का मोल-महत्व एक समान होगा। कोई आडम्बर नहीं। किसी को भी पुरोहित की ‘मध्यस्थता’ नहीं चाहिए होती। बस आस्था होनी चाहिए, आपकी पूजा सीधे छठी मईया तक पहुँच जाती है। हिन्दू-मुसलमान के बीच खड़ी ‘दीवार’ भी इस आस्था के आगे सिर झुकाती है। ऐसा कोई बाज़ार नहीं जिसमें छठ की पूजन सामग्री बेचने वालों में मुस्लिम समाज के लोग ना हों। उनकी श्रद्धा और उत्साह में रत्ती भर भी कमी निकाल कर दिखा दें आप। और तो और आप शिद्दत से ढूँढेंगे तो कुछ घाट ऐसे भी होंगे जहाँ अर्ध्य देतीं मुस्लिम माताएं और बहनें भी दिख जाएंगी आपको।

अगर छठ ना हो तो आज के युग में ‘डूबते सूरज’ को प्रणाम करना हम सीख ही नहीं पाएंगे। बेटियों को कोख में ही मार देने वाले कभी नहीं जान पाएंगे कि किसी पर्व में बेटियों की भी मन्नत मांगी जाती है। हिन्दू समाज का ये सम्भवत: एकमात्र पर्व है जिसमें अराधना के लिए किसी ‘मूर्ति’ की जरूरत नहीं पड़ती। व्रत करने वाली हर नारी छठी मईया का रूप होती है और उम्र में आपसे छोटी ही क्यों ना हों उनके पैर छूकर ही प्रसाद ग्रहण करना होता है आपको। नारी-सशक्तिकरण के किसी नारे में इतनी ताकत हो तो बताएं।

कोई पर्व एक साथ इतनी विलक्षण खूबियों को अपने में नहीं समा सकता, इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है। हमारी आस्था का, हमारे संस्कार का, हमारी पवित्रता का, हमारे विस्तार का ‘महापर्व’। मिट्टी के सोंधेपन से सने छठ के गीत सुनकर जब तक आपके रोम-रोम झंकृत होते रहेंगे तब तक समझिए अपनी जड़ से जुड़े हैं आप और तथाकथित ‘आधुनिकता’ की कैसी भी आंधी क्यों ना हो बहुत मजबूती से टिके हैं आप।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तीन करोड़ युवाओं को दुल्हन की दरकार, आखिर झुकी चीन की सरकार

चीन में तीन करोड़ युवाओं को अगले पाँच सालों में दुल्हन नहीं मिलेगी… अगले दस सालों में वहाँ काम करने के लिए युवा नहीं होंगे… और अगले पन्द्रह सालों में वहाँ की 75 प्रतिशत आबादी बूढ़ी होगी… हैरतअंगेज आंकड़े हैं ये, लेकिन सच हैं। इन्हीं वजहों से 37 साल के बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ को खत्म कर दिया है। अब वहाँ भी भारत की तरह ‘हम दो, हमारे दो’ का सिद्धांत लागू होगा। हमारा देश इस सिद्धांत के प्रति कितना ‘गम्भीर’ है ये बहस का विषय है लेकिन चीन की जैसी ‘विस्फोटक’ स्थिति हो गई है, उसे देखते हुए कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर वहाँ की सरकार दो बच्चों की नीति भी वैसी ही सख्ती से लागू करे जैसी सख्ती से ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ को लागू किया गया था। ये भी सम्भव है कि सरकार आने वाले दिनों में कुछ और ‘उदारता’ दिखाते हुए ‘दो से आगे’ जाने की छूट भी दे दे।

वर्तमान में 140 करोड़ की आबादी के साथ चीन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। इस देश की ये आबादी तब है जब 1979 से वहाँ ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ बहुत कड़ाई के साथ लागू है और पिछले 37 साल में 40 करोड़ बच्चों का जन्म रोका गया। इस नीति के तहत ज्यादातर शहरी दम्पतियों को एक बच्चे और ज्यादातर ग्रामीण दम्पतियों को दो बच्चे तक सीमित कर दिया गया था। दूसरे बच्चे की इजाजत तभी थी जब पहला बच्चा लड़की हो। ये नीति शुरू से ही विवादास्पद थी क्योंकि इसके चलते हजारों की संख्या में गर्भपात होते थे। कुछ मूलभूत खामियों के बावजूद चीन की जनसंख्या जिस रफ्तार से बढ़ रही थी उसे देखते हुए तत्कालीन रुदोंग सरकार की ये नीति पूरी तरह गलत भी नहीं कही जा सकती। दुनिया जानती है कि चीन को इसका फायदा भी मिला। लेकिन समय-समय पर इसकी समीक्षा जरूरी थी। पर ऐसा नहीं हुआ और स्थिति बिगड़ती चली गई। हालात बद से बदतर होते देख वर्तमान सरकार ने लगातार चार दिन तक बैठक की और ये बड़ा निर्णय लिया।

चीन में प्रति 117 पुरुषों पर मात्र 100 महिलाएं हैं। लिंगानुपात बिगड़ने से सामाजिक ढाँचा किस हद तक चरमरा चुका है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ एक लड़की से दो से ज्यादा लड़के शादी कर रहे हैं। अविवाहित युवकों की बढ़ती संख्या देख चीनी इकोनॉमिस्ट शी जुओशी ने सुझाव दिया कि दो पुरुषों की एक महिला से शादी कानूनी करार देनी चाहिए। दूर-दराज इलाके में लोग बाकायदा ऐसा कर भी रहे हैं क्योंकि लड़कियों की बोली लग रही है।

ये तो हुई लिंगानुपात से जुड़ी समस्या। अब चीन की ‘असंतुलित’ जनसंख्या को कुछ और कोणों से समझें। 1960 के दशक में चीन में ‘बेबी बूम’ की वजह से श्रमिकों की संख्या बढ़ी थी। ये आबादी 2021 तक रिटायर हो जाएगी। बाद के दिनों में आबादी पर अंकुश था इसलिए रिटायर हो रहे श्रमिकों की जगह लेने के लिए अब पर्याप्त आबादी ही नहीं है। बहुत जल्द दिहाड़ी मजदूरों का वहाँ ‘अकाल’ पड़ने वाला है। कहने का अर्थ ये है कि 2025 तक चीन की अर्थव्यवस्था धाराशायी हो सकती है।

2014 में चीन की 21.2 करोड़ की आबादी 60 साल पार कर चुकी थी। 2013 में यह संख्या करीब 17.5 करोड़ थी। इतनी तेजी से दुनिया के किसी देश में बुजुर्गों की संख्या नहीं बढ़ी। ऐसा ही रहा तो 2030 तक चीन की 75 प्रतिशत आबादी बूढ़ी होगी। दरअसल चीन में जन्म दर 1.18 बच्चा प्रति दम्पति है जबकि वैश्विक आँकड़ा 2.5 है। यही कारण है कि यहाँ युवा होने की दर सबसे धीमी है।

2014 में सरकार को उम्मीद थी कि 2 करोड़ बच्चे पैदा होंगे। लेकिन 1.69 करोड़ बच्चे ही जन्मे। एक दिलचस्प आंकड़ा यह भी है कि 2014 में योग्य 1.1 करोड़ दम्पति में से 14.5 लाख ने ही दूसरे बच्चे के लिए आवेदन दिया। और इस साल सितम्बर तक यह आँकड़ा आश्चर्यजनक रूप से मात्र 55 हजार है। स्थिति यह है कि पिछले 15 सालों में देश के आधे से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं। यानि ये समस्या दोतरफा है। सरकार की नीति ही केवल इसके लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि लोगों की दिलचस्पी भी दूसरे बच्चे में खत्म हो गई है।

खैर, देर से ही सही चीन की सरकार जागी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वहाँ के लोग भी अब जागेंगे और ‘असंतुलित’ जनसंख्या की भीषण समस्या धीरे-धीरे सुलझ जाएगी। जरूरी है कि चीन में फिर बच्चों की ‘बहार’ हो पर ये भी देखना होगा कि ‘पुरानी गलती’ फिर ना इस बार हो।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या मीसा उपमुख्यमंत्री, तेजप्रताप कैबिनेट मंत्री और तेजस्वी होंगे राजद के कार्यकारी अध्यक्ष..?

बिहार चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। “महागठबंधन या एनडीए” का सस्पेंस खत्म हो चुका है। महागठबंधन के जीतने पर नीतीश का मुख्यमंत्री होना तय था और अब तो उनके शपथ-ग्रहण का दिन और समय भी निश्चित हो चुका है। 20 नवम्बर को दोपहर दो बजे नीतीश पाँचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। अब सबकी निगाहें इस बात पर लगी हैं कि नीतीश के ठीक बाद शपथ लेने कौन जाएगा यानि कौन होगा बिहार का उपमुख्यमंत्री..? ये सवाल कितना मुश्किल है, कोई जाकर लालू से पूछे… जिन्हें यह ‘यक्षप्रश्न’ सुलझाना है।

बिहार में इस वक्त केवल यही चर्चा है कि लालू किसे और किस वजह से चुनेंगे..? मजे की बात तो यह है कि लोग इसी सवाल के जवाब में दूसरे बड़े सवाल का जवाब भी ढूँढ़ लेते हैं कि कौन होगा लालू का उत्तराधिकारी..? यानि लोग ये मानकर चल रहे हैं कि जो उपमुख्यमंत्री होगा, वही लालू का उत्तराधिकारी भी होगा। लेकिन देखा जाय तो दूसरा सवाल पहले सवाल से भी ज्यादा कठिन है और मौजूदा हालात में अधिक सम्भावना इसी बात की है कि लालू उपमुख्यमंत्री और उत्तराधिकारी दो अलग लोगों को बनाएं और वे दोनों उन्हीं के परिवार से हों।

लालू की पार्टी में पुराने और वफादार लोग कई हैं लेकिन उनमें खुद को उपमुख्यमंत्री पद का ‘दावेदार’ कहने की स्थिति में कोई भी नहीं। महागठबंधन की इतनी बड़ी जीत और उस जीत में लालू की बड़ी भूमिका के बाद तो हरगिज नहीं। हालांकि इस पद के लिए पार्टी से एक नाम की खूब चर्चा है और वो नाम अब्दुल बारी सिद्दीकी का है। सिद्दीकी वरिष्ठ हैं, लालू के विश्वासपात्र हैं और उनके ‘माय’ समीकरण को पूरा भी करते हैं। लेकिन लालू उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने की ‘उदारता’ दिखा पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। हाँ, ‘भरपाई’ के लिए लालू उन्हें विधान सभा का अध्यक्ष जरूर बनवा सकते हैं। उदय नारायण चौधरी के चुनाव हार जाने के बाद जेडीयू को भी इसमें विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

अब सवाल उठता है कि सिद्दीकी नहीं तो कौन..? सिद्दीकी के अलावे उपमुख्यमंत्री के तौर पर तीन और नाम चर्चा में हैं और वे तीनों लालू के परिवार से हैं। राघोपुर से विधायक बने तेजस्वी, महुआ से चुने गए तेजप्रताप और राजनीति में पहले से ‘सक्रिय’ लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती। रही बात उत्तराधिकारी की तो ये तय है कि वो उनके परिवार से होगा और उनका बेटा होगा। पप्पू यादव द्वारा उठाए गए ‘उत्तराधिकार’ के मुद्दे पर लालू यह पहले ही साफ कर चुके हैं।

उपमुख्यमंत्री पद के लिए मीसा का नाम आना ‘अकारण’ नहीं है। मीसा को इस पद पर बिठाकर लालू के एक पंथ कई काज हो जाएंगे। पहला कि ये कुर्सी उनके परिवार में आ जाएगी, दूसरा उनके दोनों बेटों के बीच अघोषित पर सम्भावित ‘टकराव’ टल जाएगा और तीसरा महिलाओं में एक बड़ा संदेश दिया जा सकेगा जिन्होंने जी खोलकर महागठबंधन को वोट दिया है। लालू ये बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि महिलाओं ने नीतीश को देखकर वोट दिया है। मीसा को आगे कर वो राजद की पैठ भी महिलाओं में बना सकते हैं और उनसे चिपका ‘जंगलराज’ का दाग भी बहुत हद तक धुल सकता है। हालांकि मीसा अभी किसी सदन की सदस्य नहीं हैं लेकिन विधान परिषद् जाते उन्हें कितनी देर लगेगी भला।

रही बात तेजप्रताप और तेजस्वी की तो यह स्पष्ट हो चुका है कि तेजस्वी में लालू और उनकी पार्टी दोनों ही सम्भावना देख रहे हैं। चुनाव के दौरान राघोपुर में तेजस्वी के लिए वोट मांगने के क्रम में लालू ने इसका संकेत भी दे दिया है। तेजस्वी राजद के युवा चेहरे के तौर पर उभरे हैं और तेजप्रताप की तुलना में राजनीतिक रूप से अधिक ‘परिपक्व’ भी दिखते हैं। अगर तेजस्वी लालू के एकमात्र बेटे होते तो उनका उपमुख्यमंत्री और उत्तराधिकारी दोनों होना तय होता। लेकिन तेजप्रताप ना केवल उनसे बड़े हैं और उन्हीं की तरह बाकायदा चुनाव जीतकर आए हैं बल्कि माँ राबड़ी के चहेते भी हैं। लालू के नजदीकी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि लालू का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ छोटे बेटे तेजस्वी के लिए है तो राबड़ी का बड़े बेटे तेजप्रताप के लिए। दोनों भाईयों के बीच लालू के सालों साधु और सुभाष वाली ‘प्रतिद्वंद्विता’ टालने के लिए भी मीसा को आगे किया जा सकता है।

ऊपर के विश्लेषण के बाद जरा देखें कि लालू के पास मीसा, तेजप्रताप और तेजस्वी को लेकर कौन-कौन से विकल्प हैं..? पहला, मीसा को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय और तेजप्रताप-तेजस्वी दोनों को कैबिनेट में जगह दी जाय। इस पर शायद नीतीश आपत्ति करें। दूसरा, तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय और तेजप्रताप को कैबिनेट में लिया जाय। इस पर तेजप्रताप और मीसा दोनों ‘रूठ’ जाएंगे। तीसरा, मीसा को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय, तेजप्रताप को कैबिनेट में भेजा जाय और पार्टी की बागडोर तेजस्वी के हाथ में सौंपी जाय उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर। यानि उत्तराधिकार तेजस्वी को मिले, उपमुख्यमंत्री का पद भाई-बहनों में सबसे बड़ी मीसा को और तेजप्रताप भी असंतुष्ट ना रहे।

ये भी सम्भव है कि मीसा-तेजप्रताप-तेजस्वी की भूमिका आपस में बदल जाय लेकिन इतना तय है कि लालू और राबड़ी ना तो इन तीनों में से किसी को किनारे कर सकते हैं और ना ही तीनों को एक साथ सरकार या संगठन में जगह दे सकते हैं। ऐसे में किन्हीं दो को सरकार में और एक को पार्टी में बड़ा यानि ‘नेक्स्ट टू लालू’ का पद देकर ‘परिवार’ की समस्या हल की जा सकती है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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महागठबंधन की बड़ी जीत और भाजपा की बड़ी हार के पाँच बड़े कारण

इधर बिहार में महागठबंधन की महाजीत का महाजश्न हो रहा है, उधर भयभीत भाजपा में भूचाल आया हुआ है। महागठबंधन की जीत और भाजपा की हार के कारण ढूँढ़े जा रहे हैं। हर चुनाव में हारने वाली पार्टी अपने हारने और अपने प्रतिद्वंद्वी के जीतने का कारण ढूँढ़ती है और ढूँढ़ना चाहिए भी। इसीलिए भाजपा के ऐसा करने में कुछ नया नहीं है। नया इस बात में है कि सारे कारण बीच चुनाव में दिख गए थे लेकिन भाजपा देख नहीं पाई। गांव-गली की गंवई जनता ने जो देख लिया उसे भाजपा के ‘हाईटेक’ रणनीतिकार देखने से चूक गए। वे भूल गए कि लाख संचार-क्रांति हो जाए तब भी चुनाव के मैदान में आपका हाथ ‘माउस’ से ज्यादा जनता की नब्ज पर होना चाहिए। तो चलिए कारणों की ‘भीड़’ से निकाल कर पाँच बड़े कारणों को देखें।

  1. ‘विकास’ में ‘सामाजिक न्याय’ का तड़का

वर्षों की दूरी और तमाम मतभेदों को किनारे कर जिस दिन नीतीश और लालू एक साथ आए उसी दिन उन्होंने आधी लड़ाई जीत ली थी। वक्त की नजाकत देख जेपी के दोनों शिष्यों ने ना केवल कांग्रेस से हाथ मिलाया बल्कि अंत तक निभाया। समूचा एनडीए पूरे चुनाव में महागठबंधन को ‘महास्वार्थबंधन’, ‘महालठबंधन’ और ना जाने क्या-क्या कहता रहा लेकिन जनता की नज़र में ये परफेक्ट कम्बिनेशन साबित हुआ। जिसमें एक ओर नीतीश की ‘विकासपुरुष’ की निर्विवाद छवि थी तो दूसरी ओर लालू के ‘सामाजिक न्याय’ का मजबूत आधार। नीतीश और लालू के एक साथ आने से इस सामाजिक न्याय को 25 साल पहले वाली ‘धार’ मिल गई। ये केवल ‘माय’ तक सीमित नहीं रहा।

यही नहीं, मात्र 41 सीटों पर लड़ रही कांग्रेस ने भी महागठबंधन में बड़ी भूमिका निभाई जिसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के साथ आने से ना केवल उसके राष्ट्रीय ‘कैनवास’ का सांकेतिक जुड़ाव महागठबंधन से हुआ बल्कि अगड़ी जातियों में भी थोड़ी-बहुत सेंधमारी करने में महागठबंधन को सफलता मिली।

  1. नीतीश का ‘चेहरा’ और तगड़ा टीमवर्क

नेताओं की बड़ी फौज के बावजूद मुख्यमंत्री पद के लिए एक अदद चेहरा ना ढूँढ़ पाना एनडीए की बड़ी कमजोरी साबित हुई। इस मामले में भाजपा का रवैया जरूरत से ज्यादा ‘डिफेंसिव’ रहा। उधर नीतीश कुमार का तपा-तपाया, हर तरह से आजमाया और सर्वमान्य ‘चेहरा’ था। नीतीश को नेता मानने और हर मंच से उन्हें अपना मुख्यमंत्री बताने में लालू ने सचमुच बड़े भाई जैसी ‘उदारता’ दिखाई। सोनिया और राहुल ने भी अपने भाषणों में नीतीश के नाम और काम को आगे रखा। टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव-प्रचार और पाँचों चरणों के मतदान तक कहीं भी महागठबंधन के टीमवर्क में कमी नहीं दिखी। जबकि एनडीए में ‘टीमवर्क’ नाम की चीज थी ही नहीं। टिकट में हिस्सेदारी को लेकर शुरू हुए पासवान, मांझी और कुशवाहा के आपसी मतभेद और खींचातानी ने अंतत: भाजपा की लुटिया डुबो दी।

सच तो ये है कि अपने साथियों को भाजपा ने उनकी ‘औकात’ से ज्यादा सीटें दीं। इससे उसकी अन्दरूनी कमजोरी दिखी। यही नहीं, आम जनता ने ये समझने में भी देर नहीं की कि पप्पू यादव भाजपा के द्वारा ‘स्पांसर्ड’ हैं, मुलायम सिंह के अचानक मुलायम पड़ने के पीछे स्पष्ट ‘डील’ है और ओवैसी का बिहार में अचानक कूद पड़ना भी ‘अकारण’ नहीं है।

  1. मोदी का ‘बड़े’ मंच से ‘छोटा’ व्यवहार

नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने तक और उसके बाद अपनी एक के बाद एक विदेश यात्राओं से दुनिया भर में जो सुर्खियां और तालियां बटोरीं और अपने कद में इजाफा किया उसे एकदम से दांव पर लगाने बिहार आ गए। वो नीतीश को हर मंच से अहंकारी कहते रहे लेकिन असल में अहंकार उनके बॉडी लैंग्वेज में था जिसे बिहार की जनता बहुत गहरे जाकर देख रही थी। उनके हाव-भाव से स्पष्ट दिख रहा था कि जिस नीतीश ने कभी प्रधानमंत्री पद के लिए मुझे चुनौती दी थी उसे मैं मुख्यमंत्री भी नहीं रहने दूंगा। उन्होंने बिहार चुनाव को इस कदर ‘पर्सनलाइज’ कर दिया कि भाजपा और एनडीए की जगह केवल वही दिख रहे थे। ये सचमुच दिखने की ‘अति’ थी। एक प्रधानमंत्री का और उसमें भी उनके कद के प्रधानमंत्री का एक राज्य के चुनाव लिए 26 रैलियां करना मन में कई तरह के सवाल खड़े करता है।

खैर, बात रैलियों तक रहती तो एक बात थी। रैलियों में उनका भाषण वो नहीं था जिसके लिए वो जाने जाते हैं। भाषण की भाषा और शैली तो हरगिज शोभा देने वाली नहीं थी। सबसे पहले उन्होंने नीतीश का ‘डीएनए’ खराब होने की बात कहकर और मुसीबत मोल लेने की शुरुआत कर दी। इसके बाद उन्होंने सवा लाख करोड़ का पैकेज दिया लेकिन जिस तरह से बोली लगा कर दिया उसने उनका और उस पैकेज दोनों का वजन कम कर दिया। इसी तरह राजद को बार-बार “रोजाना जंगलराज का डर” और जदयू को “जनता का दमन और उत्पीड़न” कहकर उन्होंने ‘हल्कापन’ दिखाया और अंतत: जनता का एक बड़ा ‘अस्वीकार’ उन्हें झेलना पड़ा। लोक -‘तांत्रिक’ वाली बात भी लोगों को हजम नहीं हुई। और हाँ, इन सबके बरक्स नीतीश ने अपने ‘संयम’ और ‘शालीनता’ से बिहार और बिहार के बाहर भी लोगों के दिल और दिमाग में जगह बनाई।

  1. आरक्षण, बीफ और पाकिस्तान में पटाखे

ऊपर के तीन कारण ही भाजपा की हार के लिए कम नहीं थे। जो कसर रही वो बीच चुनाव में मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान, गिरिराज सिंह जैसे नेताओं का बेवजह ‘बीफ’ को मुद्दा बनाने और अंत में अमित शाह के “महागठबंधन के जीतने पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे” वाले बयान ने पूरी कर दी। इन नकारात्मक मुद्दों को बिहार की परिपक्व जनता ने खारिज कर पूरे देश में एक बड़ा मैसेज दिया। नीतीश और लालू ने इन मुद्दों से हवा को अपने पक्ष में करने में कोई चूक नहीं की। एनडीए जहाँ इन अनर्गल मुद्दों पर आक्रामक होने का ‘स्वांग’ करने में उलझा रहा वहीं महागठबंधन इन सबका जवाब देने के साथ-साथ ‘नीतीश के सात निश्चय’ को भी जनता के बीच पहुँचाने में सफल रहा। एनडीए की लाख कोशिशों के बावजूद लोगों के मन में ‘जंगलराज’ का डर तो नहीं बैठा लेकिन लालू वोटरों में ये डर बिठाने में कामयाब रहे कि बीजेपी को सत्ता दोगे तो आरक्षण छिन जाएगा।

  1. अगड़ों की ‘आग’ से पिछड़ों का पिघलना

भाजपा ने बड़ी रणनीति के तहत रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, रामकृपाल यादव, भूपेन्द्र यादव, मुकेश सहनी जैसे प्रतीकों को खड़ा किया। उसे उम्मीद थी कि ऐसा कर वो दलित-महादलित और पिछड़े-अतिपिछड़े वोटों में बड़ी सेंधमारी कर पाएगी। और तो और प्रधानमंत्री को पहले पिछड़ा और फिर अतिपिछड़ा बताने की कोशिश भी की गई। लेकिन इन तमाम कोशिशों पर भाजपा के ‘अगड़े’ नेताओं का नीतीश-लालू के खिलाफ उग्र से उग्रतर होते जाना और ‘अपशब्दों’ का धड़ल्ले से प्रयोग करना भारी पड़ गया। अगड़ों ने आग क्या उगली, पिछड़े पिघलकर महागठबंधन से जा मिले।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी-शाह की करारी हार, नीतीश-लालू का हुआ बिहार

बिहार में लालू-नीतीश की जोड़ी मोदी और शाह पर बहुत भारी पड़ी। चुनाव में ना मोदी का भाषण काम आया, ना शाह का मैनेजमेंट। प्रधानमंत्री ने चुनाव को “केन्द्र बनाम बिहार” बनाया, पूरे कैबिनेट को प्रचार में झोंका, अपने कद तक को दांव पर लगा दिया लेकिन हाथ कुछ ना आया। एनडीए को जैसी हार और महागठबंधन को जैसी जीत मिली उससे तमाम सर्वे और एग्जिट पोल धाराशायी हो गए।

बिहार चुनाव में महागठबंधन अत्यन्त भव्य और ऐतिहासिक जीत दर्ज करने जा रही है। उसे 243 में से 178 सीटें मिलने जा रही है। एनडीए महज 59 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 80 सीटों के साथ राजद सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है और इस तरह अपने राजनीतिक जीवन की निर्णायक लड़ाई लालू प्रसाद यादव ने बड़े शान से जीती है। ‘चेहरा’ और ‘सेहरा’ नीतीश कुमार का रहा लेकिन ‘मैन ऑफ द मैच’ लालू रहे, इसमें कोई दो राय नहीं।

भाजपा और उसके तमाम सहयोगी दलों ने पूरे चुनाव में नीतीश पर सबसे अधिक तंज इस बात के लिए कसा कि उन्होंने लालू और कांग्रेस (खासकर लालू) के साथ गठबंधन किया। नीतीश के घोर समर्थक भी दबी जुबान से कहते रहे कि लालू के साथ खड़ा होना उनकी राजनीतिक सेहत के लिए ठीक नहीं। उन्हें अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ना चाहिए था। लेकिन बिहार की जनता ने जिस तरह अपने मत से महागठबंधन को निहाल किया है उससे तमाम आलोचक बस बगलें झाँक रहे हैं।

लालू, नीतीश और कांग्रेस ने टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव-प्रचार तक बहुत समझदारी से काम लिया। एनडीए एक ओर मोदी के ‘आभामंडल’ से उपजे अतिआत्मविश्वास का शिकार हुआ तो दूसरी ओर सहयोगी दलों की खींचातानी में उलझा रहा। उधर महागठबंधन ने एक-एक कदम बड़ी सावधानी से रखा और लगातार ‘टीमवर्क’ किया। जेडीयू ने अपनी वो सीटें उदारता से कुर्बान कीं जिन पर राजद और कांग्रेस भाजपा से ज्यादा बेहतर लोहा ले सकती थीं। इसका लाभ सामने है। आज भले ही जेडीयू की अपनी सीटें कम हो गई हों लेकिन नीतीश की मुहर महागठबंधन की सारी 179 सीटों पर लगी हुई है।

2010 में जेडीयू की 115, राजद की 22 और कांग्रेस की 4 सीटें थीं। इस बार जेडीयू को 71, राजद को 80 और कांग्रेस को 27 सीटें मिल रही हैं। लालू-नीतीश का साथ पाकर मुरझायी कांग्रेस में एक बार फिर जान आ गई। एनडीए की बात करें तो भाजपा और उसके तमाम सहयोगी दल मिलकर भी अकेले लालू या अकेले नीतीश से पीछे हैं। भाजपा को छोड़ दें तो पासवान, मांझी और कुशवाहा की सीटें मिलाकर भी कल तक ‘बेचारी’ कही जाने वाली कांग्रेस तक से चौथाई से भी कम रह गई है। पिछली बार नीतीश के साथ भाजपा को 91 सीटें मिली थीं। इस बार उसका खाता 53 पर बन्द हो रहा है। लोजपा को 3, रालोसपा को 2 और हम को महज 1 सीट मिल रही हैं। पिछली बार भी लोजपा को 3 ही सीटें मिली थीं। हम और रालोसपा तब अस्तित्व में नहीं थीं। अन्य के खाते में 6 सीटें जाती दिख रही हैं। पूरा परिणाम आने पर ये सीटें हो सकता है और कम रह जाएं।

कोसी की बात करें तो यहाँ की 13 में से 12 सीटों पर महागठबंधन का कब्जा होने जा रहा है। आलगनगर से नरेन्द्र नारायण यादव, सुपौल से बिजेन्द्र प्रसाद यादव, सिमरी बख्तियारपुर से दिनेश चन्द्र यादव जीत का परचम फहरा रहे हैं। एनडीए की ओर से बस नीरज कुमार बबलू (छातापुर) ही मैदान में टिक पाए हैं। कोसी या सीमांचल में पप्पू फैक्टर की चर्चा पूरे चुनाव के दौरान रही। दावा तो पप्पू पूरे बिहार पर कर रहे थे। लेकिन उनके तमाम उम्मीदवार महागठबंधन के झोंके में उड़ गए। ज्यादातर सीटों पर उनके उम्मीदवार हजार का आंकड़ा छूने को भी तरस गए। महागठबंधन का साथ बीच राह में छोड़ने वाले मुलायम भी पूरे परिदृश्य से जैसे अदृश्य हो गए।

कुल मिलाकर ये कि बिहार ने केन्द्र के लिए भले ही नरेन्द्र मोदी को चुना हो लेकिन बिहार के लिए उसका ऐतबार अभी भी नीतीश कुमार पर है। ‘विकासपुरुष’ के काम को लोगों ने सम्मान दिया। ये साफ हो गया कि मतदान में महिलाओं की लम्बी कतार नीतीश के लिए थी। महादलितों ने भी मांझी से अधिक नीतीश को तरजीह दी। कमोबेश सभी जातियों के वोट महागठबंधन को मिले। मुस्लिम पूरी तरह उसके पक्ष में एकजुट रहे।

पूरे चुनाव में नीतीश ने जो शालीनता बरती उससे उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ा है। लालू ने भी अपना खोया आत्मविश्वास इस चुनाव से हासिल किया है। कांग्रेस को भविष्य की राजनीति का सूत्र मिल गया। एनडीए के लिए अब बंगाल और उत्तर प्रदेश की डगर बहुत मुश्किल हो गई। मोदी और उनकी ‘अति आक्रामक’ टीम को अब समझना पड़ेगा कि सभाओं में भीड़ जुटना और भीड़ का वोट में तब्दील होना अलग-अलग बात है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में ‘कमल’ की बहार हो… पर नीतीशे कुमार हो..!

हेडलाईन पढ़कर जरूर चौंके होंगे आप। ये हेडलाईन जेडीयू के चुनाव-गीत “बिहार में बहार हो, फिर से नीतीशे कुमार हो” में ‘थोड़े’ पर ‘बहुत बड़े’ परिवर्तन के बाद बनी है। अगर कहा जाय कि रिकॉर्ड 60 प्रतिशत मतदान के साथ सम्पन्न हुए बिहार चुनाव के पाँचवें और अन्तिम चरण के उपरान्त तमाम न्यूज़ चैनलों पर दिखाए गए एग्जिट पोल का यही ‘वास्तविक’ निचोड़ है, तो गलत ना होगा। 2010 की तरह जेडीयू और भाजपा ने इस बार भी साथ चुनाव लड़ा होता तो 8 नवंबर को निकलकर आनेवाली तस्वीर बहुत कुछ वैसी ही दिखती जैसी हेडलाईन के साथ दी गई तस्वीर दिख रही है। जी हाँ, यही वो तस्वीर है जो बिहार की जनता देखना चाहती थी। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और बिहार में नीतीश कुमार। दोनों साथ-साथ। वहाँ भी और यहाँ भी।

बिहार की जनता का ‘द्वंद्व’ एग्जिट पोल से जैसे झाँक रहा है। हालाँकि सारे एग्जिट पोल का औसत निकाल कर देखें तो पलड़ा महागठबंधन का भारी है लेकिन अन्तिम समय में कौन बाजी मार ले जाएगा, कहना मुश्किल है। भोली-भाली जनता अब ‘चतुर’ हो गई है। उसने पूरी ‘पिक्चर’ को कुछ इस तरह निर्देशित किया है कि ‘सस्पेंस’ आखिरी दृश्य में ही खुलेगा। और वो ‘सस्पेंस’ उसके… केवल उसके मन का होगा… सारे नेता चाहे जो शोर मचाते रहें। बहरहाल, चलिए देखें कि एग्जिट पोल कह क्या रहे हैं।

एबीपी न्यूज़/नीलसन के अनुसार महागठबंधन को 130, एनडीएको 108 और अन्य को 5 सीटें मिल रही हैं। यानि स्पष्ट तौर पर महागठबंधन की सरकार बन रही है। एक और प्रमुख चैनल इंडिया टीवी/सी-वोटर्स ने महागठबंधन को 112-131, एनडीए को 101-121 और अन्य को 6-14 सीटें दी हैं। यानि सरकार महागठबंधन की बन रही है। न्यूज़ नेशन का आकलन भी कुछ ऐसा ही है। उसने अपने एग्जिट पोल में महागठबंधन को 125, एनडीए को 114 और अन्य को 4 सीटें दी हैं। न्यूज़ एक्स/सीएनएक्स ने महागठबंधन की जीत और बड़े फासले से होने की बात कही है। इस एग्जिट पोल में महागठबंधन को 130 से 140 सीटें मिल रही हैं, जबकि एनडीए के खाते में 90 से 100 सीटें ही जा रही हैं। अन्य को 7 सीटें मिल सकती हैं। टाइम्स नाउ/सी-वोटर के मुताबिक भी नीतीश की अगुआई वाला महागठबंधन आगे है। इस एग्जिट पोल में महागठबंधन को 112 से 132 सीटें मिलने का अनुमान है, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 101 से 121 सीटें मिल सकती हैं और अन्य के खाते में 6 से 14 सीटें जाने की बात कही गई है।

एबीपी न्यूज़, इंडिया टीवी, न्यूज़ नेशन, न्यूज़ एक्स और टाइम्स नाउ – इन पाँच चैनलों के मुताबिक महागठबंधन की सरकार बन रही है। इसके बरक्स एक और तस्वीर है जो न्यूज़ 24/टूडेज चाणक्या के एग्जिट पोल से निकल कर आई है। इस एग्जिट पोल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इसमें एनडीए को 155, महागठबंधन को 83 और अन्य को 5 सीटें दी गई हैं। यानि पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा के नेतृत्व में सरकार। बता दें कि दिल्ली चुनाव में ‘आप’ को दो तिहाई बहुमत की भविष्यवाणी भी न्यूज़ 24/चाणक्या ने ही की थी और वो सच साबित हुई थी।

अब एक नज़र आज तक पर दिखाए गए इंडिया टुडे/सिसरो के एग्जिट पोल पर डालें। इसमें एनडीए को 113 से 127, महागठबंधन को 111 से 123 और अन्य को 4-8 सीटें दी गई हैं। वोटों के प्रतिशत की बात करें तो इस एग्जिट पोल में एनडीए को 41, महागठबंधन को 40 और अन्य को 19 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं। कहने का मतलब ये कि कड़े मुकाबले में एनडीए थोड़ा आगे है।

इस तरह इन सात चैनलों के एग्जिट पोल में पाँच के अनुसार महागठबंधन की सरकार बन रही है और दो के अनुसार भाजपा की अगुआई में नई सरकार बनने जा रही है। इन सभी एग्जिट पोल का औसत निकालें तो महागठबंधन को 119, एनडीए को 117 और अन्य को 7 सीटें मिलती हैं। यानि मुकाबला सचमुच काँटे का है। ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कई सीटों पर वोटों का अन्तर बहुत कम होने की सम्भावना है। इस कारण भी ‘सस्पेंस’ अंत तक बना रहेगा।

8 नवंबर को चाहे जो हो, कम-से-कम एग्जिट पोल में तो महागठबंधन ने एनडीए को पटखनी दे ही दी है। अभी जितने सर्वे में महागठबंधन को आगे बताया गया है, सितम्बर-अक्टूबर के लगभग उतने ही प्री-पोल सर्वे में एनडीए की बढ़त थी।

चलिए, हमने सारे एग्जिट पोल को जान लिया। सीटों का जोड़-घटाव, गुणा-भाग कर लिया। लेकिन क्या इन सारे एग्जिट पोल में केवल सीटों का आंकड़ा ही देखा जाना चाहिए..? क्या इन सारे एग्जिट पोल से बिहार की जनता का ‘द्वंद्व’ नहीं झाँक रहा है..? क्या ये नहीं लग रहा कि बिहार भले ही नरेन्द्र मोदी में ‘सम्भावना’ देख रहा है लेकिन नीतीश कुमार में उसकी ‘आस्था’ अभी भी है। क्या ऊपर दी गई तस्वीर ही वो सच्चाई नहीं है जिसे दरअसल बिहार की जनता देखना चाहती थी..? अगर 2010 की तरह जेडीयू और भाजपा ने चुनाव साथ लड़ा होता तो शायद किसी एग्जिट पोल की जरूरत ही ना पड़ती। परिणाम सबको पता होता। खैर छोड़िए… चलिए 8 नवंबर का इंतजार करते हैं और देखते हैं कि होता क्या है..? समय बड़ा बलवान होता है, वो कब क्या कराएगा, कौन जानता है..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पाँचवें चरण में ‘माय’ की माया… किसके हिस्से में धूप, किसे मिलेगी छाया..?

बिहार चुनाव का आज पाँचवां और अंतिम चरण है। मतदान केन्द्रों पर लम्बी कतारें लगी हैं। शाम के 5 बजते ही न्यूज चैनलों पर एक्जिट पोल, विश्लेषण और मंथन का दौर शुरू हो जाएगा। नेता हों, कार्यकर्ता हों या आम जनता – सबकी निगाहें 8 नवंबर पर टिक जाएंगी। राजनीति के गलियारों में सम्भावनाओं और समीकरणों को लेकर गहमागहमी शुरू हो जाएगी। नई सरकार किसकी होगी, उस सरकार में कौन-कौन से चेहरे होंगे, किसका कद बुलंदियों पर होगा और कौन अपनी खोई साख को रोएगा – अब बातें इसी पर होंगी। फिलहाल एक नज़र पाँचवें चरण की खास बातों पर डालें।

पाँचवें चरण में नौ जिलों की 57 सीटों पर मतदान हो रहा है। सीमांचल और मिथिलांचल के ये नौ जिले हैं – मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा ( Madhepura ) , सहरसा और दरभंगा। 57 सीटों के लिए 58 महिलाओं सहित कुल 827 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनके भाग्य का फैसला एक करोड़ 55 लाख 36 हजार 660 मतदाता करेंगे। मतदान केन्द्रों की कुल संख्या 14061 है जिनमें 5518 ‘क्रिटिकल’ और 276 नक्सल प्रभावित केन्द्र हैं।

इस चरण में बिहार कैबिनेट के कई मंत्रियों की साख दांव पर लगी है। बिजेन्द्र प्रसाद यादव (सुपौल), नरेन्द्र नारायण यादव (आलमनगर), लेसी सिंह (धमदाहा), बीमा भारती (रूपौली), नौशाद आलम (ठाकुरगंज) और दुलालचंद गोस्वामी (बलरामपुर) की किस्मत आज ईवीएम में बंद हो जाएगी। इस चरण के अन्य दिग्गज उम्मीदवारों में बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी (अलीनगर), पूर्व मंत्री एवं जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्रा (झंझारपुर), एआईसीसी के सचिव शकील अहमद खान (कदवा), बिहार भाजपा के मुख्य प्रवक्ता विनोद नारायण झा (बेनीपट्टी), पूर्व सांसद एवं जदयू के उम्मीदवार दिनेश चन्द्र यादव (सिमरी बख्तियारपुर), पूर्व मंत्री एवं इस बार भाजपा के उम्मीदवार रवीन्द्र चरण यादव (बिहारीगंज), लालू यादव के बेहद खास भोला यादव (बहादुरपुर) एवं एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान (कोचाधामन) प्रमुख हैं।

2010 में इस चरण की 57 सीटों में 24 जेडीयू, 20 भाजपा, 8 राजद और 5 कांग्रेस के खाते में गई थीं। बदले समीकरणों के तहत इस बार एनडीए की ओर से भाजपा के 38, लोजपा के 11, रोलोसपा के 5 और ‘हम’ के 3 उम्मीदवार मैदान में हैं। महागठबंधन की ओर से जेडीयू के 25, राजद के 21 और कांग्रेस के 11 उम्मीदवार खड़े हैं। इन दोनों गठबंधनों के अतिरिक्त पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के 40 और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के 6 उम्मीदवार भी मैदान में हैं।

बिहार में बहुचर्चित ‘माय’ समीकरण के लिहाज से पाँचवां चरण खासा महत्वपूर्ण है। इस ‘माय’ समीकरण को लालू ने और लालू को ‘माय’ समीकरण ने एक अलग पहचान दी और इस बार इस समीकरण के चलने की जरूरत लालू (और उनके महागठबंधन के लिए) हर बार से ज्यादा है । अगर पप्पू और ओवेसी कई सीटों पर मुकाबले को तिकोना ना बना रहे होते तो लालू-नीतीश के महागठबंधन के लिए यह सबसे ‘सुरक्षित’ चरण था। उदाहरण के तौर पर मधेपुरा ( Madhepura )सीट को लें। ‘माय’ समीकरण को ध्यान में रख शायद ही इससे अनकूल कोई सीट महागठबंधन के लिए हो। लेकिन पप्पू के उम्मीदवार के भरोसे भाजपा इस सीट पर भी खुद को मुकाबले में ले आई है।

पाँचवें चरण में पप्पू यादव और असदउद्दीन ओवैसी (खासकर पप्पू यादव) अगर बड़े ‘वोटकटवा’ साबित नहीं हुए तो महागठबंधन के लिए विशेष चिन्ता की बात नहीं। लेकिन एनडीए ने महागठबंधन के ‘गढ़’ में सेंधमारी कर दी है, इससे हरगिज इनकार नहीं किया जा सकता। हाँ, ये सेंधमारी कितनी बड़ी है ये हम 8 नवंबर को जान पाएंगे। इसी ‘सेंधमारी’ पर सीमांचल, मिथिलांचल और ‘माय’ समीकरण की राजनीतिक दिशा तय होगी और कदाचित् बिहार की राजनीतिक दिशा भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अलग होकर जेडीयू और भाजपा ने क्या खोया, क्या पाया… तय करेगा चौथा चरण

बिहार चुनाव का चौथा चरण भी पूरा हुआ। इस चरण में सात जिलों की 55 सीटें दांव पर थीं। ये सात जिले हैं मुजफ्फरपुर, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चरण, सीतामढ़ी, शिवहर, गोपालगंज और सीवान। इन 55 सीटों के साथ ही कुल 186 सीटों के लिए मतदान हो चुका है। पाँचवें चरण में बाकी बची 57 सीटों के लिए मतदान होना है।

चौथे चरण में मतदान का प्रतिशत 58.3 रहा। पश्चिमी चम्पारण जिले में सर्वाधिक 60.56 प्रतिशत तो सीवान में सबसे कम 54 प्रतिशत मतदान हुआ। 55 सीटों के लिए उम्मीदवारों की कुल संख्या 776 थी, जिनमें 57 महिलाएं हैं। मतदाताओं की कुल संख्या थी 1,46,93,294 और उनके लिए कुल 14,139 मतदान केन्द्र बनाए गए थे। पिछले तीन चरणों की तरह इस चरण में भी महिला मतदाताओं की लम्बी कतारें देखी गईं।

इस चरण की सबसे खास बात ये है कि 2010 में इन 55 सीटों में 50 सीटें जेडीयू-भाजपा गठबंधन के हिस्से में गई थीं। जेडीयू ने 24 और भाजपा ने 26 सीटें जीती थीं। शेष 5 सीटों में 2 राजद और 3 निर्दलीय के खाते में गई थीं। इस बार परिदृश्य एकदम बदल गया है। पिछली बार साथ रहकर जबरदस्त सफलता हासिल करने वाली जेडीयू और भाजपा इस चुनाव में आमने-सामने है।

इस बार इन 55 सीटों पर महागठबंधन की ओर से जेडीयू के 21, राजद के 26 और कांग्रेस के 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। एनडीए की ओर से भाजपा ने 42, लोजपा ने 5 और ‘हम’ व रोलोसपा ने 4-4 उम्मीदवार उतारे हैं। इस चरण के प्रमुख उम्मीदवारों में वरिष्ठ मंत्री रमई राम (बोचहां), राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे (परिहार), भाजपा नेता सुनील पिन्टू (सीतामढ़ी) तथा ‘हम’ के महाचन्द्र प्रसाद सिंह (हथुआ) और लवली आनंद (शिवहर) शामिल हैं।

भाजपा के लिहाज से यह चरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अगर वो इस चरण की सीटों पर 2010 जैसा प्रदर्शन दोहराने में सफल रही तो महागठबंधन के लिए ये खतरे की घंटी हो सकती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा और एनडीए ने इन सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था। गौर करने की बात है कि चौथे चरण में पिछले तीन चरणों की तुलना में 4.04 प्रतिशत मत ज्यादा पड़े। पिछले चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर इस इजाफे को भाजपा और एनडीए अगर अपने पक्ष में कह रहे हैं तो कम से कम परिणाम आने तक इसे झुठलाना सम्भव नहीं। इतना तय है कि अलग होकर जेडीयू और भाजपा ने क्या खोया, क्या पाया… कौन कितने फायदे में रहा और किसने नुकसान उठाया… चौथा चरण इस बात की सबसे बड़ी गवाही देगा।

पुनश्च:

लोकतंत्र के प्रति आस्था और कर्तव्यबोध का अद्भुत उदाहरण देखने को मिला इस चौथे चरण में। बैकुंठपुर विधान सभा क्षेत्र के महम्मदपुर थाने के हकाम गांव में रहने वाले गफार मियां ने अपने 40 वर्षीय बेटे मोहम्मद हजरत के शव को दफनाने से पहले परिवार सहित जाकर मतदान किया। मोहम्मद हजरत की मृत्यु एक संक्रामक बीमारी से शनिवार रात को ही हो गई थी। रविवार की सुबह पड़ोसी और गांव वाले हजरत के शव को दफनाने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन मृतक के पिता ने कहा कि सभी चलकर पहले मतदान करें, उसके बाद कब्रिस्तान चलने की तैयारी करें। सबने ऐसा ही किया और मतदान के बाद मिट्टी देने की रस्म शुरू की गई। मधेपुरा ( Madhepura ) अबतक श्रद्धा और प्रेरणा से भर देने वाले गफार मियां के इस जज्बे को सलाम करता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘मंडल’ के मधेपुरा में ‘मोदी’ का मतलब

भारतीय राजनीति के ‘मंडल युग’ का जनक मधेपुरा… महागठबंधन का ‘गढ़’ माना जाने वाला मधेपुराआज साक्षी बना मोदी की झलक पाने को बेताब अपार जनसमूह का। जी हाँ, आज प्रधानमंत्री मोदी ने मधेपुरा में एक बड़ी रैली की। उनके साथ थे पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन तथा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी। रैली भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के नए परिसर में थी जहाँ प्रधानमंत्री दिन के 1.30 बजे आए। पूरा मधेपुरा  आज मोदीमय दिखा। ये सही है कि भीड़ से वोट को नहीं आंका जा सकता लेकिन जनमानस पर उनका क्या असर है, ये बताने के लिए मधेपुरा की आज की आबोहवा काफी थी।

गुजरात का ‘शेर’ आज नीतीश-लालू-शरद के ‘गढ़’ में गरज रहा था। उन्होंने कहा कि 25 साल से यहाँ बड़े भाई और छोटे भाई की सरकार थी लेकिन वे बिहार से पलायन को नहीं रोक सके। जनता इस बार इसका हिसाब ले। मोदी ने कहा कि जब बिहार में भाजपा सरकार में साथ थी तब राज्य में 17 हजार 500 करोड़ का निवेश हुआ लेकिन भाजपा के हटते ही यह घटकर महज छह हजार करोड़ रह गया।

प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री नीतीश को निशाने पर लेते हुए कहा कि पिछली बार उन्होंने कहा था कि अगर बिजली नहीं पहुँचाऊंगा तो वोट मांगने नहीं आऊँगा लेकिन अपना वादा पूरा किए बिना वो वोट मांगने आ गए। उन्होंने कहा कि इस बार अगर बिहार में एनडीए की सरकार आई तो उन चार हजार गाँवों में बिजली पहुँचाने का काम पूरा किया जाएगा जहाँ नीतीश सरकार बिजली नहीं पहुँचा सकी।

नरेन्द्र मोदी ने इस इलाके की समस्या को ‘पानी’ और ‘जवानी’ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यहाँ ‘पानी’ और ‘जवानी’ दोनों को बर्बाद किया जा रहा है। मोदी ने कहा कि बिहार में कोशी के पानी का उपयोग मछलीपालन के लिए किया जाय तो मछली का आयात कम होगा और लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार भी मिलेगा। बिहार में संसाधन होते हुए भी उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने खास अंदाज में “पढ़ाई, कमाई और दवाई” के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई और लोगों से बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सा लेने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के लोग 8 नवंबर को दिवाली मनाएंगे और पूरा देश 11 नवंबर को दिवाली मनाएगा।

स्पष्ट है कि 8 नवंबर को दिवाली मनाने से मोदी का मतलब एनडीए की सरकार बनने से है। मोदी के मन से बिहार में दिवाली मनती है या नहीं, ये तो आने वाला समय बताएगा लेकिन जो धरती ‘स्वभाव’ और ‘संस्कार’ से समाजवादियों की रही है, जिस इलाके में कल तक भाजपा की कोई पैठ नहीं थी, जहाँ जातिगत समीकरण भी एनडीए के लिए बहुत अनुकूल नहीं वहाँ मोदी का आना और लोगों का उनके लिए उमड़ जाना बड़ी बात है। आज की रैली से मोदी नीतीश-लालू-शरद की त्रिमूर्ति के लिए एक बड़ी चुनौती छोड़ गए हैं। ये चुनौती मधेपुरा ( Madhepura ) की चार या कोशी की तेरह सीटों से ज्यादा इस बात की है कि अब ‘मंडल’ के इलाके में भी ‘कमंडल’ अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगा है।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बताइए अमित शाह..! बिहार में बीजेपी हारी तो पाकिस्तान में पटाखे क्यों जलेंगे..?

क्या बीजेपी ने बिहार में हार मान ली है और वो भी दो चरण शेष रहते..? पहले एक राज्य के चुनाव के लिए मोदी के कद के प्रधानमंत्री को तमाम जिलों और केन्द्र के दर्जनों मंत्रियों को गली-मुहल्लों तक उतार देना, दूसरे इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का ‘अति’ आक्रामक उपयोग और तीसरे लालू और नीतीश पर जाति की राजनीति का आरोप लगाते-लगाते स्वयं उससे भी आगे निकल धर्म के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कुछ ऐसा ही बयां करती है।

भाजपा की ‘हिन्दूवादी’ छवि कोई छिपी हुई या छिपाई जाने वाली चीज नहीं। अब तक अपनी इस छवि को ‘भुनाने’ का शायद ही कोई मौका पार्टी ने छोड़ा हो। लेकिन सभाओं और बयानों में ‘राजनीतिक समझदारी’ और ‘सामाजिक जिम्मेदारी’ बरतने में कोई कोताही नहीं बरती जाती थी। भाजपा के ‘मोदीयुग’ में भी वाजपेयी का ‘संस्कार’ बहुत हद तक बचा था। पर अब उस ‘धरोहर’ की धज्जियां उड़ रही हैं। ये काम कोई भी करे, निन्दनीय होगा लेकिन जब ये काम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष करें तो बात निन्दा से आगे की हो जाएगी।

चौथे और पाँचवें चरण के प्रचार के क्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कल 29 अक्टूबर को बिहार के बेतिया में थे। यहाँ एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अगर बिहार में बीजेपी हारती है तो पटाखे पाकिस्तान में जलेंगे। शाह का कहना था कि बीजेपी के हारने पर सबसे ज्यादा खुश जेल में बंद शहाबुद्दीन होगा। चलिए मान लेते हैं कि आपराधिक छवि वाले बाहुबली नेता शहाबुद्दीन लालू की पार्टी से सांसद रह चुके हैं और इस कारण यहाँ तक जबरन उनकी बात का तुक निकाल लें तो भी इस बात का तुक भला कौन निकालेगा कि 8 नवंबर को परिणाम भले ही पटना में निकलेंगे लेकिन पटाखे पाकिस्तान में जलाए जाएंगे..?

क्या ‘पाकिस्तान’ से शाह का मतलब ‘मुसलमान’ से है..? अगर हाँ, तो क्या भाजपा के अध्यक्ष मान चुके हैं कि उनकी पार्टी को मुस्लिम मत बिल्कुल नहीं मिल रहे..? क्या ये हताशा नहीं है भाजपा की..? हाँ, इसे हताशा ही कहेंगे क्योंकि शाह का बयान जुबान फिसलने की सीमा से बहुत आगे की बात है।

सार्वजनिक मंच की एक अलग ‘गरिमा’ और ‘सीमा’ होती है और जब आप एक बड़े दल के बड़े नेता हों तो आपसे इन बातों की अतिरिक्त अपेक्षा होती है। अगर गरिमा और सीमा किसी कारण आप भूल भी रहे हों तब भी मूलभूत ‘समझदारी’ और ‘सभ्यता’ की उम्मीद तो आपसे की ही जाती है। पर ना जाने अमित शाह कैसे इस तरह की भूल कर बैठे..?

शाह उत्तर प्रदेश को दुहराने की प्रत्याशा में लम्बे समय से बिहार में कैम्प कर रहे हैं। पर अब लगता है कि उन्हें ‘दिल्ली’ की आशंका सताने लगी है। पिछले तीन चरणों में मतदान का जो प्रतिशत रहा है तथा जातियों की जिस तरह की गोलबंदी देखने को मिली है उससे भाजपा कुछ ज्यादा ही सशंकित हो गई है। भाजपा का खेल बिहार में अगर बिगड़ता है तो वो स्थानीय कारणों से कम और मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए बयान और अब शाह के पाकिस्तान में पटाखे छूटने वाले बयान से ज्यादा बिगड़ेगा। अमित शाह इस तरह के बयानों से गुजरात के अपने ‘दागदार अतीत’ की याद बिहार को ना दिलाएं तो ही बेहतर होगा उनके लिए और उनकी पार्टी के लिए भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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