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बिहार में बनी सरकार… तो मिल गया मोदी पर मुकदमे का अधिकार..?

बिहार में चुनाव खत्म हो चुके। महागठबंधन की सरकार भी बन चुकी। लेकिन विकास के नाम पर राजनीति अब भी जारी है। जुम्मा-जुम्मा आठ दिन बीते कि भाजपा को बिहार में ‘जंगलराज’ दिखने लगा और राजद विशेष पैकेज को मुद्दा बना प्रधानमंत्री को अदालत में घसीटने की तैयारी करने लगी। जी हाँ, राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने बिहार के लिए घोषित सवा लाख करोड़ के विशेष पैकेज को नहीं देने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अदालत में घसीटने की धमकी दी है।

पूर्व केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि मोदी ने चुनाव के पहले ही बिहार को विशेष पैकेज देने की घोषणा की थी, जिसके मिलने की उम्मीद अभी तक नहीं दिख रही है। अब और इंतजार नहीं किया जा सकता। अब हिसाब होगा। ‘हिसाब’ करने के लिए राजद के इस दिग्गज नेता को ‘एकमात्र’ विकल्प अदालत का दिख रहा है और इसके लिए वो जल्द ही किसी अच्छे वकील से सलाह लेने वाले हैं।

प्रधानमंत्री पर बिहार की हकमारी और यहाँ की जनता के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि उन्होंने बिहार को विशेष पैकेज देने का वादा करके उलटे कई केन्द्रीय योजनाओं की राशि में कटौती कर दी है। यह बिहार के साथ अन्याय है। खासकर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की राशि में कटौती कर नरेन्द्र मोदी सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के काम और विचारों की हत्या कर दी है।

रघुवंश प्रसाद सिंह ना केवल राजद बल्कि बिहार के चुनिंदा नेताओं में गिने जाते हैं। राज्य और केन्द्र में वो कई जिम्मेदार पदों पर रह चुके हैं। बिहार के लिए उनकी चिन्ता स्वाभाविक है और सराहनीय भी। लेकिन उनका ‘अधैर्य’ समझ के परे है। बिहार में महागठबंधन की सरकार बन जाने का ये अर्थ कतई नहीं कि उन्हें या उनकी पार्टी को कभी भी और किसी पर भी मुकदमे का अधिकार मिल गया। चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने भी सात निश्चयों की घोषणा की थी। क्या सारे ‘निश्चय’ पूरे किए जा चुके..? बिहार ने नीतीश पर विश्वास किया है और वो उस विश्वास पर खरा उतरने की हर सम्भव कोशिश भी करेंगे लेकिन इसमें वक्त लगेगा। अगर नीतीश और उनकी राज्य सरकार को इसके लिए वक्त दिया जा सकता है तो केन्द्र की मोदी सरकार को क्यों नहीं..?

हर मुद्दे का राजनीतिकरण करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं। लेकिन ये बीमारी महामारी की तरह फैल चुकी है। इतनी जल्दी ‘नाउम्मीद’ होने और ‘मुकदमा’ में समय और पैसा खर्च करने के बदले रघुवंश बाबू और उनकी पार्टी महागठबंधन के अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार से बात करें तो शायद बिहार का अधिक भला हो। इस तरह के पैकेज की घोषणा चाहे केन्द्र की सरकार करे या राज्य की, उसे एक झटके में पूरा करना सम्भव नहीं। हमें समझना होगा कि कई तरह की प्रक्रियाओं से गुजरकर ही ऐसे वादों को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। हमें थोड़ा ‘धैर्य’ और थोड़ा ‘विश्वास’ राजनीति से ऊपर उठकर रखना होगा। विकास के लिए ‘टकराव’ भी एक रास्ता हो सकता है लेकिन ‘सहयोग’ की हर सम्भावना खत्म होने के बाद।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘विदेश-यात्रा’ ने फिर किया चमत्कार, इस बार राहुल ताजपोशी को तैयार

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अभी यूरोप में हैं और इधर उनको कांग्रेस की बागडोर सौंपने की तैयारी की जा रही है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार 8 जनवरी के बाद कभी भी उनकी वापसी हो सकती है और आने के साथ उनकी ताजपोशी की ‘औपचारिकता’ पूरी कर दी जाएगी। हाँ औपचारिकता क्योंकि ये तय था कि कांग्रेस के अगले अध्यक्ष वही होंगे। इस ‘सत्य’ को ना केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि पूरा देश ‘स्वीकार’ कर चुका है कि कांग्रेस मतलब नेहरू-गांधी परिवार। अब आपको अच्छा लगे या बुरा, आप इसे परिवारवाद का नाम दें या कुछ और कहें लेकिन सच यही है कि कांग्रेस की बात आने पर वर्तमान अध्यक्ष सोनिया और उपाध्यक्ष राहुल के बाद अगर कोई तीसरा नाम जेहन में या जुबान पर आता है तो पार्टी में किसी पद पर ना होने के बावजूद वो नाम भी उसी परिवार के सदस्य का यानि प्रियंका गांधी का होता है।

बहरहाल, पिछले साल भी इस बात की खूब चर्चा रही कि राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान सौंपी जा सकती है लेकिन सितम्बर में वर्किंग कमिटी की बैठक के बाद पार्टी के संगठनात्मक चुनावों को 2016 पर टाल दिया गया था। वैसे भी सोनिया का कार्यकाल इस साल दिसंबर में पूरा हो रहा है लिहाजा इस बात के कयास लगाए जाने लगे थे कि राहुल की ताजपोशी अब साल भर बाद होगी। यह भी कहा गया कि राहुल अभी इसके लिए तैयार नहीं है। लेकिन राहुल के विदेश जाते ही जाने क्या ‘चमत्कार’ हुआ कि वो अध्यक्ष पद संभालने को तैयार बताए जाने लगे।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब राहुल इसी तरह विदेश-यात्रा पर गए थे और लौटे तो एकदम नए अवतार के साथ। तब अपने अप्रत्याशित और आक्रामक तेवर से उन्होंने सबको चौंका दिया था और कांग्रेस में नई उम्मीद जग गई थी। कहा जाता है कि राहुल हर साल ‘विपश्यना’ के अभ्यास के लिए 10 दिनों के लिए विदेश जाते हैं। विपश्यना आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की एक बौद्ध साधना है जिसका राहुल के व्यक्तित्व पर गहरा असर है।

सम्भावना है कि यूरोप दौरे से राहुल के लौटते ही कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक बुलाई जाएगी और संगठनात्मक चुनावों से पहले ही उन्हें अध्यक्ष का पद सौंप दिया जाएगा। पार्टी के एक नेता ने कहा कि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं है कि राहुल असम विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की कमान सम्भालना चाहते हैं। वह जिम्मेदारी सम्भालने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। देखा जाय तो कांग्रेस में राहुल की नई भूमिका को लेकर माहौल पहले ही बनाया जा चुका है। कुछ महीने पहले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा था कि जमीनी कार्यकर्ता राहुल को कांग्रेस की कमान सम्भालते देखना चाहते हैं लेकिन इस बारे में कोई भी फैसला अध्यक्ष को ही लेना है। कांग्रेस की स्थापना दिवस पर जब ये सवाल अध्यक्ष सोनिया तक पहुँचा तो उन्होंने कहा कि इसके बारे में खुद उनसे ही पूछें। कहने का अर्थ ये है कि सब कुछ पहले से तय था। बस राहुल के फैसला लेने की देर थी।

बता दें कि सोनिया गांधी ने 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला था। 129 साल पुरानी पार्टी की वो सबसे लम्बे समय तक अध्यक्ष रहने वाली नेता हैं। इधर कुछ वर्षों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है। अब कांग्रेस की बागडोर सम्भालने जा रहे राहुल ने उपाध्यक्ष के तौर पर अपनी पारी 2013 में शुरू की थी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बुद्ध, विवेकानंद और गांधी के देश में ‘गूगल’ के शीर्ष पर सनी लियोनी

सुबह-सवेरे पार्क में टहलते, अपने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करते, चार लोगों के साथ चाय पीते, ट्रेन या बस में सफर करते या फिर सभाओं और सेमिनारों में हम चाहे जो कह लें, हमारे आज के भारत की रुचि, जिज्ञासा और खोज का चरम बिन्दु सनी लियोनी है। जी हाँ, गूगल ने साल 2015 में सर्वाधिक सर्च किए गए जिन 10 भारतीयों की सूची जारी की है, वो यही कहती है। इस सूची में लगातार चौथे साल शीर्ष पर सनी लियोनी हैं। शीर्ष पर यानि दीपिका पादुकोण और कटरीना कैफ ही नहीं शाहरुख और सलमान से भी ऊपर। यहाँ तक कि एपीजे अब्दुल कलाम और नरेन्द्र मोदी से भी ऊपर। क्या ऐसी सूची जिसमें कलाम और मोदी भी मौजूद हों, किसी ‘सनी लियोनी’ का शीर्ष पर होना यूं ही नज़रअंदाज कर देने वाली बात है..? क्या ये हमारी ‘गिरावट’ और ‘खोखलेपन’ की पराकाष्ठा नहीं..? क्या ये तथ्य आने वाले कल के लिए आपको आशंकित नहीं करता..?

खैर, आगे बढ़ने से पहले आप अपने देश के उन 10 लोगों को जानें जिन्हें 2015 में गूगल पर सबसे अधिक खोजा गया। क्रमानुसार वे 10 नाम हैं – सनी लियोनी, सलमान खान, एपीजे अब्दुल कलाम, कटरीना कैफ, दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान, यो यो हनी सिंह (रैप गायक), काजल अग्रवाल (तमिल और तेलुगु फिल्म एक्ट्रेस), आलिया भट्ट और नरेन्द्र मोदी। 2014 के टॉप 10 थे – सनी लियोनी, नरेन्द्र मोदी, सलमान खान, कटरीना कैफ, दीपिका पादुकोण, आलिया भट्ट, प्रियंका चोपड़ा, शाहरुख खान, पूनम पांडेय (सनी लियोनी की तरह ‘बोल्ड’ मॉडल और एक्ट्रेस) और विराट कोहली। 2013 का क्रम था – सनी लियोनी, सलमान खान, कटरीना कैफ, दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान, यो यो हनी सिंह, काजल अग्रवाल, करीना कपूर, सचिन तेन्दुलकर और पूनम पांडेय। अब एक निगाह 2012 की 10 शख्सियतों पर। वे थीं – सनी लियोनी, राजेश खन्ना, पूनम पांडेय, आलिया भट्ट, निर्मल बाबा, शर्लिन चोपड़ा (‘प्लेब्वॉय’ मैगजीन में न्यूड पोज देनेवाली पहली भारतीय मॉडल और एक्ट्रेस), यश चोपड़ा, सैफ अली खान, डायना पेंटी (शीर्ष इतालवी और भारतीय डिजाइनर्स के लिए रैम्प पर चलनेवाली मॉडल और एक्ट्रेस) और विलासराव देशमुख।

चार सालों की सूची आपके सामने है। ‘भारतरत्न’ कलाम केवल 2015 में इस सूची में हैं यानि जिस साल वे दिवंगत हुए। 2012 में राजेश खन्ना, यश चोपड़ा और विलासराव देशमुख को गूगल पर खोजे जाने का कारण भी उस वर्ष इन हस्तियों का गुजर जाना रहा। मोदी की जगह 2014 में बनी जब वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हुए और बने भी। लेकिन 2014 में वे दूसरे पायदान पर थे और इस साल दसवें स्थान पर। क्रिकेट के भगवान सचिन तेन्दुलकर भी केवल 2013 की सूची में दिखे जिस साल उन्होंने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया। 2012 में अगर निर्मल बाबा हैं तो उस वर्ष विवादों और आरोपों में घिरे होने के कारण। भारत में फिल्मों का क्रेज देखते हुए शाहरुख, सलमान, दीपिका, कटरीना जैसों का होना ज्यादा चौंकाता नहीं। लेकिन 2012 में इनमें से किसी की जगह सूची में नहीं बनी। केवल एक नाम है जो ना केवल इन चारों सालों में रहा बल्कि शीर्ष पर रहा – सनी लियोनी। आखिर कौन हैं ये सनी लियोनी..?

‘बिग बॉस 5’ में आने से पहले शायद ही कोई आम भारतीय करेनजीत कौर वोहरा उर्फ करेन मल्होत्रा उर्फ सनी लियोनी नाम की इस 34 वर्षीया इंडो-कनाडाई पॉर्न एक्ट्रेस से वाकिफ होगा। कभी ‘सारांश’ जैसी फिल्म देनेवाले और अब ‘राह’ भटक चुके निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट को सनी लियोनी में ‘संभावना’ दिखी और उन्होंने बिग बॉस शो के दौरान ही सनी से बाकायदा मुलाकात की और फिल्म का ऑफर दिया। ‘जिस्म-2’ से इस एडल्ट स्टार का बॉलीवुड करियर शुरू हुआ और आगे चलकर ‘रागिनी एमएमएस-2’, ‘जैकपॉट’ और ‘एक पहेली लीला’ जैसी फिल्में आईं। सनी ने टीवी शो ‘स्पिलट्सविला’ भी होस्ट किया। उनकी ताजा फिल्म ‘मस्तीजादे’ रिलीज होने से पहले ही चर्चा और विवादों में है।

आज भले ही सनी लियोनी फिल्म और टेलीविजन की दुनिया का पहचाना हुआ नाम हो लेकिन उनकी ‘ख्याति’ की असली ‘वजह’ कुछ और है। आज हर वो शख़्स उस ‘वजह’ को जानता है जो सनी लियोनी के नाम से वाकिफ है। वही ‘वजह’ सनी लियोनी के लगातार चार सालों से गूगल के शीर्ष पर रहने की ‘वजह’ भी है। आप  अगर सनी लियोनी की ‘तलाश’ को ‘मनोरंजन’ का नाम देना चाहते हैं तो जान लीजिए कि किसी भी समय किसी भी समाज में किसी ‘सनी लियोनी’ ने किसी का ‘मनोरंजन’ नहीं किया है। वास्तव में वे हमारी ‘कुंठा’ या ‘भूख’ का प्रतिबिम्बमात्र होती हैं। इसी ‘कुंठा’ और ‘भूख’ को मिटाने के लिए पुरुषों ने हर युग में स्त्री को ‘प्रोडक्ट’ बनाने की कोशिश की है। बदलते समय के साथ वो बड़ी चालाकी से उस प्रोडक्ट की पैकेजिंग और उसे पेश करने का तरीका बदल देता है। आप गौर से देखिए, आज वही ‘प्रोडक्ट’ सनी लियोनी के रूप में सामने है और उसे पेश करने के लिए इंटरनेट और गूगल जैसे नए माध्यम हैं।

हाँ, सदियों से चले आ रहे इस सिलसिले में एक बड़ा फर्क ये आया है कि अब वो ‘प्रोडक्ट’ खुद भी अपनी ‘मार्केटिंग’ करने लगा है और संचार-क्रांति के दौर में उसका असर पहले से कहीं अधिक व्यापक और गहरा हो चला है। 2015 को छोड़ पीछे के तीन सालों की टॉप 10 सूची में सनी लियोनी के अतिरिक्त पूनम पांडेय की मौजूदगी इसी ‘मार्केटिंग’ का परिणाम है। कभी ‘शून्य’ को खोजने वाला देश आज भोगवाद के ‘शून्य’ में खोता जा रहा है। बुद्ध, विवेकानंद और गांधी अपने ही देश में बिसराए जा रहे हैं। हम जब तक अपनी जड़ों की ओर नहीं लौटेंगे गूगल पर हमारी ‘खोज’ में एपीजे अब्दुल कलाम और नरेन्द्र मोदी किसी ना किसी ‘सनी लियोनी’ से पिछड़ते रहेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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एक साथ मिलकर भी इस शख़्स से पीछे हैं मोदी, राहुल, नीतीश और बॉलीवुड के तीनों ‘खान’

साल 2015 का सबसे बड़ा न्यूज मेकर कौन है..? अगर इस सवाल के जवाब में आप देश-विदेश में छाए रहने वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लेना चाहते हैं तो आप गलत हैं। कांग्रेस में नई जान फूंकने की कोशिश में लगे राहुल गांधी और बिहार चुनाव में करिश्माई जीत हासिल करने वाले नीतीश कुमार भी सही जवाब नहीं हैं। हो सकता है अब आप अपना जवाब करोड़ों दिलों पर राज करने वाले बॉलीवुड के तीनों ‘खान’ में ढूंढ़ना चाहें। तो जनाब जान लीजिए कि शाहरुख, सलमान और आमिर अलग-अलग तो क्या एक साथ मिलकर भी मुकाबले में नहीं ठहरेंगे। आपका दिल करे तो इन तीनों खान के साथ ऊपर के तीनों दिग्गज नेताओं के नाम भी जोड़ लें, फिर भी इन सबका पलड़ा हल्का पड़ेगा। हैरत में तो आप तब पड़ जाएंगे जब दूसरे पलड़े पर साधारण कद-काठी और सांवले रंग वाले महज 22 साल के एक अकेले शख़्स को देखेंगे। जी हाँ, साल 2015 के सबसे बड़े न्यूज मेकर हैं हार्दिक पटेल। गुजरात के पाटीदार आरक्षण आंदोलन के नेता।

देश के प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल एबीपी न्यूज़ पर 2015 के न्यूज़ मेकर यानि ‘व्यक्ति विशेष’, जिन्होंने आपको झकझोरा और जो पूरे साल सुर्खियों में रहे, को चुनने के लिए ऑन लाइन वोटिंग चल रही है जिसमें 32.56% वोट के साथ हार्दिक पटेल सबसे आगे चल रहे हैं। 20.23% वोट के साथ दूसरे स्थान पर हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। अपने भड़काऊ बयानों से लगातार चर्चा में रहने वाले एमआईएम के नेता असदउद्दीन ओवैसी तीसरे स्थान पर हैं। उन्हें 16.54% वोट मिले हैं। 11.76% वोट हासिल कर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल चौथे पायदान पर हैं। पाँचवें, छठे और सातवें स्थान पर क्रमश: संघप्रमुख मोहन भागवत (7.58%), ‘दिलवाले’ शाहरुख खान (4.6%) और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी (3.35%) हैं।

लालू के साथ गठबंधन कर बिहार की सत्ता पर पाँचवीं बार काबिज होने वाले नीतीश कुमार आठवें पायदान पर हैं। उन्हें आश्चर्यजनक रूप से मात्र 1.41% वोट मिले हैं। उनसे भी बुरा हाल है सलमान खान और आमिर खान का। सलमान ने इस साल ‘बजरंगी भाईजान’ और ‘प्रेम रतन धन पायो’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं तो आमिर ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे को लेकर चर्चा में रहे लेकिन न्यूज़ मेकर बनने की दौड़ में दोनों बहुत पीछे रह गए। सलमान को मात्र 1.27% मत मिले हैं और आमिर अभी तक 1% मत भी हासिल नहीं कर पाए हैं। उन्हें मात्र 0.69% मत मिले हैं।

अब थोड़ी बात सबसे बड़े न्यूज मेकर की। 20 जुलाई 1993 को चंदन नगरी, गुजरात में भरत और उष पटेल के घर जन्मे हार्दिक पटेल अहमदाबाद के सहजानन्द कॉलेज से बी.कॉम. पास हैं। कॉलेज छात्र संघ के वो निर्विरोध महासचिव रहे और साल 2012 में सरदार पटेल समूह से जुड़े। जुलाई 2015 में हार्दिक की बहन मोनिका राज्य सरकार की छात्रवृत्ति पाने में विफल हुई और इसी घटना ने उन्हें पाटीदार आरक्षण आंदोलन के लिए प्रेरित किया। जी हाँ, इसी घटना के बाद हार्दिक ने पाटीदार अनामत आरक्षण समिति की नींव रखी और गुजरात के ‘सवर्ण’ व ‘सम्पन्न’ पटेल समाज को पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करने की ऐसी अलख जगाई कि कुछ ही दिनों में उसकी चकाचौंध ना केवल पूरे गुजरात बल्कि देश भर में फैल गई। इस युवक की एक आवाज पर लाखों लोगों का जुट जाना बड़ी बात ना रही। इस आंदोलन का भविष्य जो भी हो, मोदी के गुजरात में मोदी के रहते दूसरे शेर ने ऐसी ‘दहाड़’ लगा दी ये बहुत बड़ी बात है। यही कारण है कि उन्हें इस साल का सबसे बड़ा न्यूज़ मेकर माना जा रहा है।

बता दें कि एबीपी न्यूज़ ने पहले दौर में 20 लोगों की सूची जारी की थी। वोटों के आधार पर उन 20 में से 10 लोग चुने गए। जो हस्तियां अन्तिम 10 में जगह नहीं बना पाईं उनमें प्रधानमंत्री मोदी से अपनी नजदीकियों के कारण सुर्खियों में रहने वाले उद्योगपति गौतम अडाणी, फ्लिपकार्ट के संस्थापक सचिन बंसल, रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन, भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, बिहार में शानदार वापसी करने वाले आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, बिहार चुनाव में नीतीश के ‘चाणक्य’ रहे प्रशांत किशोर, योगगुरू बाबा रामदेव और खेल जगत के तीन बड़े नाम विराट कोहली, सानिया मिर्जा और साइना नेहवाल शामिल हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘अच्छे दिन’ जाएंगे बीत मोदीजी..! ‘भय’ बिन होगी ना ‘प्रीत’ मोदीजी..!!

अटल बिहारी वाजपेयी की ऐतिहासिक ‘सद्भावना यात्रा’ के 11 साल बाद एक बार फिर किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की धरती पर कदम रखा लेकिन जिस तरह रखा उससे कई सवाल उठ खड़े हुए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रूस का दौरा समाप्त कर कल सुबह काबुल (अफगानिस्तान) पहुँचे और फिर काबुल से ही दिल्ली लौटते समय उन्होंने अचानक पाकिस्तान का रुख कर लिया। बता दें कि मोदी की अफगानिस्तान यात्रा की भी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई थी। पाकिस्तान का कार्यक्रम तो खैर कल्पनातीत था ही। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के शब्दों में ये ‘इनोवेटिव डिप्लोमेसी’ है। लेकिन ये ‘इनोवेसन’ सवा सौ करोड़ भारतीयों से जुड़ा है इसीलिए इसकी पड़ताल होनी ही चाहिए।

उद्देश्य चाहे जो हो, वो बहुत पवित्र और बहुत बड़ा ही क्यों ना हो, एक प्रधानमंत्री का एकदम फिल्मी अंदाज में किसी देश की यात्रा करना हैरान करेगा। उसमें भी जब पाकिस्तान सामने हो तो ये हैरानी और बढ़ जाएगी। पाकिस्तान की अनगिनत वादाखिलाफियां, सीमा पर हर दिन नापाक हरकतें, क्रिकेट तक के संबंध मधुर ना हों और अतीत के युद्धों की परछाईयां अब भी पीछा कर रही हों तो भला हमारे प्रधानमंत्री की इस अप्रत्याशित यात्रा पर सवाल कैसे ना उठें..? देश क्यों ना पूछे कि ‘सद्भावना’ की यात्रा को ‘गोपनीय’ रखने की जरूरत क्यों आन पड़ी..? सार्वजनिक तौर पर भले स्वीकार ना करें लेकिन सच ये है कि उनके कट्टर प्रशंसकों और उनकी पार्टी तक को ये बात हजम नहीं होगी। उनकी सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चाहे लाख कह लें लेकिन ये व्यवहार एक ‘स्टेट्समैन’ का तो हरगिज नहीं कहा जा सकता। वैसे राजनीति के गलियारों में कांग्रेस का ये आरोप भी चर्चा में है कि मोदी की ‘सद्भावना’ के मूल में एक व्यापारिक घराना था और ये यात्रा उसी को ‘फायदा’ पहुँचाने के लिए थी।

आजादी के बाद भारत की विदेश-नीति का ताना-बाना जवाहरलाल नेहरू ने बुना और उसे नया कलेवर देने में अटल बिहारी वाजपेयी ने बड़ी भूमिका निभाई। आज चीन से लेकर पाकिस्तान तक के साथ जिस ‘व्यावहारिक’ विदेश-नीति पर मोदी अमल कर रहे हैं उसकी बुनियाद वाजपेयी ने रखी थी। वैसे भी पड़ोसियों के साथ अच्छे सबंध को लेकर मोदी कितने गंभीर हैं इसकी झलक उनके शपथ-ग्रहण के दिन ही मिल गई थी। लेकिन पाकिस्तान शुरू से ही ‘टेढ़ी खीर’ रहा है। अपनी बात से पलटने का उसका लम्बा इतिहास है। अभी हाल ही में दोनों देशों के प्रधानमंत्री ऊफा (रूस) में मिले। फिर पेरिस (फ्रांस) में भी दोनों की संक्षिप्त मुलाकात हुई। लेकिन रिश्तों की बर्फ पिघलते-पिघलते फिर जमने लगी और कारण सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान ही था।

पिछले दिनों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के इस्लामाबाद दौरे से रिश्तों की बर्फ एक बार फिर पिघली और मोदी शायद अपनी इस यात्रा से उस बर्फ के फिर से जमने की हर गुंजाइश खत्म करना चाहते थे। दिन भी उन्होंने बहुत खास चुना। 25 दिसम्बर को अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ दोनों का जन्मदिन था। साथ ही नवाज की नवासी का निकाह भी। मोदी ने नवाज की माँ के पाँव छुए और नवाज मोदी को छोड़ने एयरपोर्ट तक आए। हर तरफ ‘फील गुड’ का माहौल था। लेकिन दो देशों का संबंध अन्तर्राष्ट्रीय मामला है और उसकी कुछ निहायत जरूरी औपचारिकताएं होती हैं। अगर आनन-फानन में यात्रा हो भी गई तो उसका हासिल क्या है, प्रधानमंत्री मोदी को इसका जवाब देना ही होगा। क्या वो देश को आश्वस्त कर सकते हैं कि अब सीमा पर पाक कोई नापाक हरकत नहीं करेगा..? इस यात्रा के बाद वो मोस्ट वांटेड अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम को उपहार-स्वरूप सौंप देगा या फिर मुंबई हमलों के मास्टर माइंड हाफिज सईद पर हमेशा के लिए लगाम कस देगा..?

ये हम सभी जानते हैं कि इनमें से कोई ‘चमत्कार’ नहीं होने जा रहा। वाजपेयी भी पाकिस्तान गए थे और कुछ समय बाद हमें ‘कारगिल’ का जख़्म मिला था। ‘अच्छे दिन’ बीत जाएं उससे पहले मोदी को तुलसीदास के कहे “भय बिन होय ना प्रीत” को समझना होगा। अगर सिर्फ ‘प्रेम’ से बात बननी होती तो कश्मीर उस कगार पर नहीं होता जहाँ अभी खड़ा है। हम आज भी ये कह रहे होते कि धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो वो यहीं है, यहीं है, यहीं है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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आतंकवाद नहीं इस्लाम का विरोध करेंगे अमेरिका के अगले राष्ट्रपति..?

2008 में जब बराक हुसैन ओबामा को दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका ने अपना राष्ट्रपति चुना तब से पूरी दुनिया ने अमेरिका को एक अलग नजरिये से देखना शुरू किया। ओबामा ना केवल अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे बल्कि उनके नाम के ‘बराक’ और ‘ओबामा’ के बीच ‘हुसैन’ भी मौजूद था। ओबामा को चुनकर अमेरिकी जनता ने सचमुच एक ऐतिहासिक फैसला लिया था। अब अमेरिका की छवि केवल वैभवशाली गोरी चमड़ी वाले देश की नहीं रही। ओबामा के रूप में उसने अपना उदारवादी चेहरा दुनिया के सामने रखा और ओबामा ने लगातार दो कार्यकाल में अपने अत्यन्त सहज आचरण से अमेरिकी जनता के उस फैसले को सही साबित किया।

अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में सम्पूर्ण विश्व की दिशा और दशा को प्रभावित करने की ताकत और क्षमता रखने के बावजूद ओबामा ने ना तो अपनी वाणी का संयम खोया ना अपने व्यवहार का। यहाँ तक कि ओसामा बिन लादेन के खिलाफ अपने बड़े और सफल अभियान के बाद भी उनकी ‘छवि’ नहीं बदली। उन्होंने जो किया वो आतंक का पर्याय बन चुके ओसामा के खिलाफ था। उसका इस्लाम से कोई लेना-देना ना तो होना चाहिए था, ना था। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। कल का ओसामा आज आईएसआईएस के रूप में सामने है और ओबामा का दूसरा कार्यकाल पूरा होने को है। अमेरिकी संविधान के अनुसार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं हुआ जा सकता इसीलिए तय है कि ओबामा की जगह कोई और आएगा। ऐसे में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ओबामा का उत्तराधिकारी उनकी नीति और छवि को विस्तार देगा या उसे किसी नई दिशा में मोड़ेगा..?

ओबामा के ‘उत्तराधिकारी’ के तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी से हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन पार्टी से डोनाल्ड ट्रंप के नाम खास तौर पर उभर कर सामने आए हैं। जहाँ तक हिलेरी की बात है उनके सौम्य पर सशक्त व्यक्तित्व से दुनिया पहले से वाकिफ है। हिलेरी की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व आर्थिक नीतियां कमोबेश ओबामा की तरह ही रहेंगी। पर रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप अगर सत्ता में आते हैं तब अमेरिका वो हरगिज नहीं रह जाएगा जो अभी है। आप पूछेंगे ऐसा क्यों..? चलिए जानने की कोशिश करते हैं।

डोनाल्ड ट्रंप… न्यूयॉर्क रियल एस्टेट की दुनिया में ये नाम स्टेटस का पर्याय माना जाता है। अगर आप न्यूयॉर्क में हैं और आपके पते में ‘ट्रंप टावर’, ‘ट्रंप प्लेस’, ‘ट्रंप प्लाजा’ या ‘ट्रंप पार्क’ लिखा है तो आप ‘खुशनसीब’ हैं। न्यूयॉर्क समेत अमेरिका के कई शहरों की शानदार गगनचुंबी इमारतें डोनाल्ड ट्रंप की सफलता की कहानी कहती हैं। साइंस ग्रेजुएट और कॉलेज के दिनों में छात्र नेता रहे 69 वर्षीय डोनाल्ड को रियल एस्टेट का कारोबार अपने पिता फ्रेडरिक ट्रंप से 40 साल पहले विरासत में मिला और आज वो करीब 100 कम्पनियों के मालिक हैं। फ्लोरिडा के पाम बीच पर बने बेहद आलीशान ‘ट्रंप पैलेस’ में रहने वाले डोनाल्ड की नज़र अब ‘व्हाइट हाउस’ पर है। डोनाल्ड अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार हैं और चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही अपने बयानों की वजह से अमेरिका समेत पूरी दुनिया में जाना-पहचाना नाम बन चुके हैं।

वैसे तो डोनाल्ड ट्रंप के कई बयान इन दिनों चर्चा में हैं पर जिस बयान ने पूरी दुनिया में हंगामा बरपा दिया वो है मुसलमानों को अमेरिका आने से रोकने वाला बयान। उन्होंने कहा कि अगर वो सत्ता में आए तो अमेरिका में मुसलमानों के आने पर प्रतिबंध लगा देंगे। देश को आतंकवाद से बचाने के लिए अमेरिका में मुसलमानों के डेटाबेस की व्यवस्था लागू की जाएगी। ट्रंप के अनुसार अमेरिका के मुसलमानों पर अभूतपूर्व निगरानी जरूरी है। यहाँ तक कि वो मस्जिदों पर भी निगाह रखने की बात कर रहे हैं।

डोनाल्ड जिस एजेंडा को लेकर मैदान में उतरने जा रहे हैं उसमें अमेरिका और मैक्सिको के बीच एक बड़ी दीवार बनाना भी शामिल है ताकि प्रवासी और सीरियाई शरणार्थी अमेरिका में ना घुस सकें। इसके अलावा वो अमेरिका में रह रहे लगभग एक करोड़ ‘अवैध’ प्रवासियों को भी वापस भेजना चाहते हैं। उनका दावा है कि अगर वो अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो आतंकी संगठन आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) पर इतनी कड़ी कार्रवाई करेंगे जितनी अब तक किसी ने नहीं की है।

आतंकवादियों का कोई ‘धर्म’ नहीं होता। उनके खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप चाहे जैसी कार्रवाई करें पर मुसलमानों को लेकर दिया गया उनका बयान अमेरिकी मूल्यों और संविधान के खिलाफ है। उनके बयान वैसे ही हैं जैसे भारत में ‘योगी आदित्यनाथ’ या ‘असदउद्दीन ओवैसी’ के होते हैं। हैरानी तो इस बात से होती है कि ऐसे बयानों से वो अमेरिका के एक बड़े तबके का भरोसा जीतने में सफल हो चुके हैं। इसकी पुष्टि हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण से होती है जिसमें 39% लोकप्रियता के साथ 11 अंक हासिल कर वो अपने बाकी प्रतिद्वंदियों टेड क्रूज, मार्को रूबियो और बेन कार्सन से काफी आगे निकल चुके हैं। उनकी बढ़ती लोकप्रियता के मूल में अमेरिका का वो कामकाजी तबका है जिसे मुसलमानों का ‘भय’ दिखाकर उन्होंने अपने पक्ष में कर लिया है। कट्टर विचारों वाले डोनाल्ड ट्रंप अत्यन्त कुशल वक्ता भी हैं और इसका उन्हें भरपूर लाभ मिल रहा है।

अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा, राष्ट्पति पद के लिए सम्भावित डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन, फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग, गूगल के सुंदर पिचाई समेत विश्व की कई जानी-मानी हस्तियों ने डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की कड़ी आलोचना की है। अमेरिका की डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के प्रमुख डेबी वासेरमैन शुल्ट्ज ने बिल्कुल सही कहा है कि यह एक खतरनाक और ‘गैरसमावेशी’ सोच है जिससे सात दशक पहले अमेरिका की महानतम पीढ़ी लड़ी और जीती थी। हो सकता है डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मुसलमानों का विरोध चुनाव जीतने का ‘ट्रिक’ मात्र हो लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसी सोच का फिर से पनपना और अमेरिकी आवाम को इस्लाम-विरोध के रास्ते पर डालना अमेरिका समेत पूरी दुनिया के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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हमें पता है हाफिज सईद और शाहरुख खान में फर्क, फिर ‘दिलवाले’ पर मुर्दाबाद क्यों..?

भारत की सफलतम फिल्मों में शुमार ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में राज (शाहरुख) और सिमरन (काजोल) की प्रेम कहानी ने पर्दे पर जैसे जादू-सा रच डाला था। उम्मीद की जा रही थी कि 20 साल बाद ‘दिलवाले’ में ये जोड़ी एक बार फिर कुछ वैसा ही कमाल दिखाएगी। उनके चाहनेवाले बेसब्री से इंतजार कर रहे थे शुक्रवार 18 दिसम्बर का। फिल्म तय दिन पर रिलीज भी हुई लेकिन ‘शाहरुख मुर्दाबाद’ के नारे के साथ। बिहार समेत भारत के कई राज्यों में इस फिल्म का विरोध किया जा रहा है। कहीं फिल्म के पोस्टर फाड़े जा रहे हैं तो कहीं शाहरुख का पुतला जल रहा है। लोगों से फिल्म नहीं देखने की अपील की जा रही है। कुछ जगहों पर विरोध-प्रदर्शन इतना उग्र हो गया कि पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा।

सबसे पहले तो ये जान लें कि देश के कई सिनेमाघरों में जिस ‘दिलवाले’ के शो स्थगित किये जा रहे हैं उसके कंटेंट से प्रदर्शनकारियों का कोई लेना-देना नहीं। फिल्म आज के हिट डायरेक्टर रोहित शेट्टी के निर्देशन में बनी है और शाहरुख-काजोल के अलावे वरुण धवन और कीर्ति सेनन ने भी इसमें अभिनय किया है। फिल्म का विरोध वास्तव में इसके नायक शाहरुख खान को लेकर है। अभिनय के अलावे शाहरुख इस फिल्म के निर्माण से भी जुड़े हैं और इसकी सफलता-असफलता पर बहुत कुछ टिका है उनका। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या कर दिया शाहरुख ने..? ‘दिलवाले’ का विरोध कर किस जुर्म की सजा दी जा रही है उन्हें..?

आज एक ओर विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू सेना, शिवराष्ट्र सेना जैसे हिन्दूवादी संगठन और दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता जिस वजह से शाहरुख की फिल्म का बहिष्कार कर रहे हैं उसके मूल में है पिछले कुछ महीने से भारतीय समाज और राजनीति के पटल पर धब्बे की तरह उभरा असहिष्णुता (Intolerance) का मुद्दा। पहले कन्नड़ लेखक कलबुर्गी और कुछ समय बाद यूपी के दादरी में गोमांस रखने के शक में अखलाक नामक शख्स की हत्या के बाद ये मुद्दा भड़का और पूरे देश में फैल गया। कई लेखकों, फिल्मकारों और वैज्ञानिकों ने देश में बढ़ रहे तथाकथित इन्टॉलरेंस के विरोध में अपने पुरस्कार लौटा दिए। इसी दौरान आमिर खान का देश छोड़ने वाला बयान सामने आया और शाहरुख उनके समर्थन में दिखे। 2 नवम्बर को अपने 50वें जन्मदिन पर एक चैनल से उन्होंने कहा कि “देश में इन्टॉलरेंस बढ़ रहा है। अगर मुझसे कहा जाता है तो एक सिम्बॉलिक जेस्चर के तहत मैं भी अवार्ड लौटा सकता हूँ। देश में तेजी से कट्टरता बढ़ी है।“

हालांकि ‘दिलवाले’ के रिलीज से पहले 16 दिसम्बर को शाहरुख ने कहा कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया। देश में कोई इन्टॉलरेंस नहीं है। अगर उन्होंने किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है तो वह माफी मांगते हैं। पर उन्हें ‘माफी’ नहीं मिली। खासकर उन राज्यों से जहाँ सत्ता में बीजेपी है। मसलन गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और झारखंड। वैसे विरोध-प्रदर्शन राजधानी दिल्ली और बिहार, यूपी जैसे राज्यों में भी हुए जहाँ बीजेपी का शासन नहीं है। पर विरोध करने वाले लोग हर जगह ‘समान विचार’ वाले  हैं।

हजारों साल का इतिहास गवाह है कि इन्टॉलरेंस यानि असिष्णुता इस देश के संस्कार में ही नहीं है। अगर ये देश असहिष्णु होता तो तीनों खान (शाहरुख-आमिर-सलमान) हिन्दी सिनेमा पर राज नहीं कर रहे होते। इस देश में इन्हें पलकों पर बिठाने वाले करोड़ों लोग हैं और ऐसे में आमिर और शाहरुख के बयानों से कुछ लोगों के ‘आहत’ होने को भी गलत नहीं कहा जा सकता। पर भावनाओं को ठेस पहुँचना एक बात है और उसे राजनीति का रंग देना दूसरी। अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नकारकर मान भी लें कि शाहरुख ने गलत कहा था तो भी क्या बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का शाहरुख को देशद्रोही कहना या फिर बीजेपी के ही सांसद योगी आदित्यनाथ का शाहरुख की तुलना आतंकी हाफिज सईद से करना और साध्वी प्राची का ये कहना कि वे पाकिस्तान के एजेंट हैं कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह की प्रतिक्रिया ही अपने आप में ‘असहिष्णुता’ है।

ना जाने कितने ‘हाफिज सईद’ हर पल इस ताक में रहते हैं कि कब इस तरह का मौका आए और वे हमारे किसी ‘शाहरुख’ को ट्वीट कर पाकिस्तान आने का ‘निमंत्रण’ दे। शाहरुख के मामले में हाफिज सईद ने ठीक यही किया भी। जब तक हम अपने-अपने स्वार्थ में असहिष्णुता (Intolerance) जैसे मुद्दों को हवा देते रहेंगे तब तक हाफिज सईद जैसे लोगों को भारतीय मुसलमानों से ‘छद्म’ सहानुभूति दिखाने का मौका मिलता रहेगा। हमें पूरी दृढ़ता से ये बताना होगा कि भारत सदियों से ‘शरण’ देता आया है। यहाँ से किसी को कहीं जाकर ‘शरण’ लेने की नौबत ना तो कभी आई है, ना आएगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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रामदरश मिश्र, मनमोहन झा, शमीम तारिक और साइरस मिस्त्री को साहित्य अकादमी पुरस्कार

‘असहिष्णुता’ को लेकर पुरस्कारवापसी का शोर अभी थमा ही था कि साहित्य अकादमी ने साल 2015 के लिए पुरस्कारों की घोषणा कर दी। हिन्दी में रामदरश मिश्र, मैथिली में मनमोहन झा, उर्दू में शमीम तारिक और अंग्रेजी में साइरस मिस्त्री को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया है। अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में कल हुई कार्यकारी मंडल की बैठक में 23 भारतीय भाषाओं के लिए पुरस्कार घोषित किए गए। बांग्ला भाषा के लिए पुरस्कार की घोषणा बाद में की जाएगी। पिछले दिनों 39 साहित्यकारों ने देश में कथित तौर पर बढ़ती ‘असहिष्णुता’ और साहित्य अकादमी के बोर्ड मेंबर एम. एम. कलबुर्गी की हत्या के विरोध में अपने पुरस्कार वापस कर दिए थे। अकादमी ने इस बाबत बड़ा निर्णय लेते हुए कहा कि लौटाए गए पुरस्कार वापस नहीं लिए जाएंगे। अकादमी की ओर से श्रीकांत बाहुलकर को भाषा सम्मान दिए जाने की घोषणा भी की गई।

अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासन राव के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस साल पुरस्कार के लिए छह कविता-संग्रह, छह कहानी-संग्रह, चार उपन्यास, दो निबंध-संग्रह, दो नाटक, दो समालोचना और एक संस्मरण का चयन किया गया है। रामदरश मिश्र को उनके कविता-संग्रह ‘आग की हंसी’, मनमोहन झा को कहानी-संग्रह ‘खिस्सा’, शमीम तारिक को समालोचना ‘तसव्वुफ और भक्ति’ और साइरस मिस्त्री को उनके उपन्यास ‘क्रॉनिकल ऑफ द कॉर्प्स बियरर’ के लिए पुरस्कार से नवाजा जाएगा। संस्कृत में इस वर्ष रामशंकर अवस्थी को उनके कविता-संग्रह ‘वनदेवी’ के लिए पुरस्कृत किया जाएगा।

भारतीय मानचित्र में सबसे ऊपर बैठे जम्मू-कश्मीर को देखें तो कश्मीरी में बशीर भद्रवाही को ‘जमिस त कशीरी मंज कशीर नातिया अदबुक’ (समालोचना) और डोगरी में ध्यान सिंह को ‘परछामें दी लो’ (कविता) के लिए सम्मानित किया जाएगा। ‘जन-गण-मन’ के ‘पंजाब-सिंध-गुजरात-मराठा’ की ओर चलें तो पंजाबी में जसविन्दर सिंह को उपन्यास ‘मात लोक’, सिंधी में माया राही को कहानी-संग्रह ‘महंगी मुर्क’, गुजराती में रसिक शाह को निबंध-संग्रह ‘अंते आरंभ’ (खंड एक और दो) और मराठी में अरुण खोपकर को संस्मरण ‘चलत-चित्रव्यूह’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाएगा। राजस्थानी में यह सम्मान मधु आचार्य ‘आशावादी’ को उनके उपन्यास ‘गवाड़’ और कोंकणी में उदय भेंब्रे को उनके नाटक ‘कर्ण पर्व’ के लिए दिया जाएगा।

‘द्रविड़’ यानि दक्षिण भारतीय भाषाओं की बात करें तो तमिल में ए. माधवन को ‘इक्किया सुवडुकल’ (निबंध), तेलुगु में वोल्गा को ‘विमुक्त’ (कहानी), कन्नड़ में के. वी. तिरूमलेश को ‘अक्षय काव्य’ (कविता) और मलयालम में के. आर. मीरा को ‘आराचार’ (उपन्यास) के लिए अकादमी पुरस्कार दिया जा रहा है। ‘उत्कल’ की ओर रुख करें तो ओड़िया में विभूति पटनायक को ‘महिषासुर मुहन’ (कहानी) के लिए चुना गया है।

उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ने पर असमिया में कुल सेइकिया को ‘आकाशेर छबि आर अनन्न गल्प’ (कहानी) के लिए, मणिपुरी में क्षेत्री राजन को ‘अहिड़ना येकशिल्लिबरा मड़’ (कविता)  के लिए, बोडो में ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा को ‘बायदी देंखे बायदी गाब’ (कविता) के लिए, संथाली में रबिलाल टुडू को ‘पारसी खातिर’ (नाटक) के लिए और नेपाली में गुप्त प्रधान को ‘समयका प्रतिविम्बहरू’ (कहानी) के लिए  पुरस्कार से नवाजा जा रहा है।

सभी घोषित पुरस्कार 16 फरवरी 2016 को दिल्ली के फिक्की सभागार में दिए जाएंगे। बता दें कि पुरस्कार के तौर पर विजेताओं को ताम्रपट्टिका, शॉल और एक लाख रुपये प्रदान किए जाते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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दिलीप कुमार अब ‘पद्म विभूषण’… ‘भारतरत्न’ क्यों नहीं..?

भारतीय सिनेमा के प्रति मोहम्मद युसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार के योगदान को रेखांकित करते हुए अमिताब बच्चन ने कहा है कि “जब भारतीय सिनेमा का इतिहास लिखा जाएगा तो वह दिलीप साहब से पहले और दिलीप साहब के बाद के काल में बंटेगा”। ये एक महानायक के दूसरे महानायक की महज प्रशंसा में कहे हुए शब्द नहीं हैं। ये सच है, सोलह आने सच। अपने अभिनय की गंगा बहाकर भारतीय सिनेमा के पर्दे को रंगमंच से अलग अस्तित्व दिलाने वाले ‘भगीरथ’ हैं दिलीप कुमार।

‘ट्रैजेडी किंग’ दिलीप कुमार को इस वर्ष ‘बिग बी’ अमिताब बच्चन, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, जानेमाने वकील केके वेणुगोपाल जैसी अन्य आठ हस्तियों के साथ देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार ‘पद्म विभूषण’ के लिए चुना गया था। इसकी घोषणा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हुई थी और पुरस्कार समारोह का आयोजन अप्रैल में राष्ट्रपति भवन में किया गया था। 93 वर्षीय दिलीप कुमार अस्वस्थ होने के कारण पुरस्कार ग्रहण करने नहीं जा सके थे। कल यानि रविवार 13 दिसम्बर 2015 को भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. विद्यासागर राव और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस के साथ उनके बांद्रा स्थित आवास पर जाकर उन्हें यह पुरस्कार दिया।

दिलीप साहब को ‘पद्म विभूषण’ मिला ये प्रसन्नता की बात है। ये प्रसन्नता और बढ़ गई जब देश के गृहमंत्री ने स्वयं जाकर उन्हें ये सम्मान दिया और जानने को मिला कि उन्हें ऐसा करने को प्रधानमंत्री ने कहा था। पर ये प्रसन्नता ‘पूर्ण’ तब होती जब दिलीप कुमार को ‘भारतरत्न’ दिया जाता क्योंकि कुछ महीने पहले सत्ता के गलियारों में इस बात की जबरदस्त चर्चा थी कि केन्द्र सरकार दिलीप साहब को ‘भारतरत्न’ देने की तैयारी में है। ना जाने ऐसा क्यों नहीं हो पाया..? काश ऐसा हुआ होता..!

‘पद्म विभूषण’ कोई छोटा सम्मान नहीं। पर यहाँ ये प्रश्न उठना भी लाजिमी है कि आखिर ‘भारतरत्न’ का पैमाना क्या है..? ‘भारतरत्न’ पुरस्कार की शुरुआत 1954 में हुई थी और अब तक कुल 45 लोगों को इससे नवाजा जा चुका है। कहने की जरूरत नहीं कि अपने-अपने क्षेत्र में ये सभी सचमुच के ‘रत्न’ थे। कला के क्षेत्र की बात करें तो अब तक कुल छह लोगों को ये सम्मान मिला है। वे हैं सत्यजीत रे, फिल्म निर्माता-निर्देशक (1992), एम.एस. सुब्बालक्ष्मी, शास्त्रीय गायिका (1998), पं. रविशंकर, सितारवादक (1999), लता मंगेशकर, पार्श्वगायिका (2001), उस्ताद बिस्मिल्ला खां, शहनाईवादक (2001) और पं. भीमसेन जोशी, शास्त्रीय गायक (2008)। वैसे 1988 में दक्षिण के बड़े अभिनेता एम. जी. रामचंद्रन को भी भारतरत्न (मरणोपरांत) दिया गया था लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि उन्हें केवल उनके अभिनय के लिए यह सम्मान मिला था क्योंकि उनका उत्तरार्द्ध राजनीतिज्ञ का था और वे तमिलनाडु के अत्यंत लोकप्रिय मुख्यमंत्री भी रह चुके थे।

कला के क्षेत्र में जिन लोगों को ये सम्मान मिला वे सभी नि:संदेह इसके योग्य थे। किसी दो राय का यहाँ कोई प्रश्न ही नहीं। लेकिन ये प्रश्न तो होना ही चाहिए कि पार्श्वगायन में जो स्थान लता मंगेशकर का है, क्या अभिनय में वही मुकाम दिलीप कुमार का नहीं..?  पं. रविशंकर अगर सितारवादन के, उस्ताद बिस्मिल्ला खां शहनाईवादन के और एम. एस. सुब्बालक्ष्मी या पं. भीमसेन जोशी शास्त्रीय गायन के पर्याय हैं तो क्या दिलीप कुमार अभिनय के पर्याय कहलाने योग्य नहीं.. ? दिलीप कुमार इनमें से किसी से भी कमतर नहीं। तो फिर उन्हें इस सम्मान से क्यों वंचित किया गया.. ?

सच तो ये है कि दिलीप कुमार अपने आप में अभिनय के ‘स्कूल’ हैं और 1944 में आई उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के समय मौजूद रही पीढ़ियों से लेकर अब तक की पीढियों को जोड़ें तो ऐसा मानने वाली पीढ़ियों की गिनती आधा दर्जन से अधिक ठहरेगी।  दाग (1952), देवदास (1955), नया दौर (1957), मधुमती (1958), मुगले आज़म (1960), गंगा जमुना (1961), लीडर (1964), राम और श्याम (1967), शक्ति (1982), मशाल (1984) और कर्मा (1986) जैसी फिल्में उन्हें जीवित किंवदंती बनाती हैं। अभिनय के द्वारा की गई देश की अविस्मरणीय सेवा को देखते हुए उन्हें 1991 में ही ‘पद्मभूषण’  मिल चुका था। ‘पद्म विभूषण’ देने में 24 साल का वक्त लगना समझ के परे है। और अगर वक्त लगा ही तो उसकी भरपाई ‘भारतरत्न’ देकर की जा सकती थी।

ये भी बता दें कि 24 साल के इस अन्तराल में दिलीप साहब को दो और बड़े पुरस्कार मिले। 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘दादा साहब फालके अवार्ड’ और 1997 में पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’। यानि हर तरह से अब बारी ‘भारतरत्न’ की थी। उन्हें ‘भारतरत्न’ मिलने पर केवल एक बेमिसाल कलाकार का ही नहीं बल्कि समूची अभिनय कला का सम्मान होता। काश केन्द्र सरकार उम्र के 93वें पड़ाव पर दिलीप साहब को पूरे देश की ओर से ये तोहफा दे पाती..! संयोग से दो दिन पहले 11 दिसम्बर को उनका जन्मदिन भी था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी के ‘मैजिक’ से चीन हुआ हलकान, काशी में एक हुए भारत-जापान

काशी के दशाश्वमेघ घाट पर देव दीपावली की तरह हुई भव्य गंगा आरती में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे एक साथ शामिल हुए और इन दो देशों के रिश्तों के अनगिनत दीप नई रोशनी से जगमगा उठे। इन दीपों की ‘जगमग’ कुछ ऐसी थी कि चीन की आँखें ‘चुंधिया’ गईं। आबे की भारत-यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक समझौतों को चीन अपने खिलाफ ‘गोलबंदी’ बता रहा है। वहाँ के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने चेतावनी के लहजे में लिखा कि भारत जापान के साथ मिलकर चीन के खिलाफ कोई ‘गोलबंदी’ ना करे। आखिर भारत-जापान की करीबी से क्यों तिलमिला उठा है चीन..?

चीन की ‘चिन्ता’ पर चर्चा से पहले भारत और जापान के बीच हुए अहम समझौतों को जानना जरूरी है जिनमें बुलेट ट्रेन से लेकर परमाणु समझौता तक शामिल है। सबसे पहले बात करते हैं बुलेट ट्रेन समझौते की। भारत में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए जापान 90 हजार करोड़ रुपए की फंडिग करेगा। जापान की मदद से 503 किलोमीटर लम्बे मुंबई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन दौड़ेगी जिसकी रफ्तार 300 किमी प्रति घंटे होगी। दूसरा महत्वपूर्ण समझौता भारत में जापानी लोगों के लिए ‘वीजा ऑन अराइवल’ का है जो भारत 1 मार्च 2016 से शुरू करेगा। अब जापान से आनेवाले पर्यटक एवं अन्य लोग भारत आकर वीजा ले पाएंगे। तीसरा समझौता असैन्य परमाणु सहयोग और चौथा रक्षा उपकरण और टेक्नोलॉजी के आदान-प्रदान को लेकर है। यही नहीं, भारत और अमेरिका के संयुक्त युद्धाभ्यास में अब जापान स्थायी रूप से शामिल रहेगा।

वैसे तो ये सारे समझौते चीन को खटक रहे हैं लेकिन पाँचवां समझौता उसे कुछ ज्यादा ही अखरा है। ये समझौता पूर्वोत्तर में सड़क निर्माण को लेकर है जो कि सामरिक दृष्टि से बहुत अहम है। इस समझौते के तहत जापान भारत के साथ मिलकर पूर्वोत्तर में चीन से सटी सीमा पर सड़क का निर्माण करेगा। इससे इस इलाके में भारत की ताकत बढ़ जाएगी।

भारत और जापान के बीच दोस्ती की इस नई और बड़ी कहानी की ईबारत पिछले साल लिखी गई थी जब प्रधानमंत्री मोदी जापान गए थे। चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर लम्बे अरसे से भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है। अब भारत ने जापान के साथ व्यापारिक, सामरिक और कूटनीतिक रिश्तों का नया अध्याय लिखकर चीन को सीधे जवाब देने की तैयारी कर ली है।

भारत, चीन और जापान के बीच रिश्तों के तानेबाने को समझने के लिए हमें इतिहास में भी झाँकना होगा। 1962 के युद्ध में चीन ने हमारी पीठ में छुरा घोंपा था और दूसरे विश्वयुद्ध में जापान ने चीन को रौंदा था। इतिहास की इस गाँठ को भूल पाना इन तीनों ही देशों के लिए संभव नहीं। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने कूटनीतिक तौर पर चीन के साथ भी आहार-व्यवहार में कोई कमी नहीं रखी है। लेकिन साथ ही बड़ी सूझबूझ से “तू डाल-डाल, मैं पात-पात” की नीति पर भी अमल किया है।

अंत में एक बात और। शिंजो आबे ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘बुलेट’ की रफ्तार से काम करनेवाला बताया है। उनके इस कथन में ये जोड़ना जरूरी है कि ‘कूटनीति’ के ईंधन से इस ‘बुलेट’ की रफ्तार और तेज हो गई है। साथ में मजे की बात ये कि मोदी कम-से-कम इस मामले में कोई ‘शोर’ नहीं मचाते और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हों या जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे, ‘जैकेट’ सबको पहनाते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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