All posts by Dr. A Deep

नीतीश ने लालू को 70 गुलाब के साथ दी 70वें जन्मदिन की बधाई

70 वर्ष के हो गए आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव। एक के बाद एक नए आरोप, चारा घोटाला मामले में फिर पेशी का दौर, विवादों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा… पर धूमधाम में कमी नहीं। एक दिन पहले से आवास और कार्यालय पर समर्थकों का जमावड़ा, तरह-तरह के फूलों की सजावट, बधाई वाले पोस्टर से पटे पटना के चौक-चौराहे और 70 पाउंड का केक… और क्या चाहिए। चाहे रिक्शा पर बैठकर जेल जाना हो या हाथी पर बैठकर बाहर आना – विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लिए आकर्षण पैदा कर लेने में लालू बेजोड़ रहे हैं। आज तो खैर उनका जन्मदिन ही है – उनके परिवार, उनकी पार्टी के लिए बेहद खास दिन। और कई मायनों में वर्तमान सरकार और सम्पूर्ण बिहार के लिए भी।

रात 12 बजते ही मीसा की बेटी, तेजस्वी, राबड़ी और परिवार के बाकी सदस्यों ने सोते लालू को केक काटने के लिए जगाया। रविवार सुबह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 70 गुलाब का गलदस्ता लिए लालू को बधाई देने उनके आवास पहुंचे। कहा, लालूजी ने अपना जीवन जनता की सेवा में लगा दिया है। छात्र जीवन से अब तक इन्होंने जो योगदान दिया है, वह अहमियत रखता है। साथ में ये भी कि मैं और लालू मिलकर बिहार का विकास कर रहे हैं। उधर तेजस्वी ने सोशल मीडिया पर अपने पिता के जन्मदिन का फोटो शेयर किया और लिखा “शेरदिल, न्याय के लिए लड़ने वाले, समाजवाद के गुरु, गरीबों के मसीहा लालू प्रसाद यादव जी को जन्मदिन की मुबारकबाद। आप पर गर्व है डैड।”

लालू के जन्मदिन को और खास बनाने के लिए आज ही के दिन नीतीश-तेजस्वी ने बिहार को दो मेगा पुल उपहार में दिए। ये दो पुल हैं – पटना (दीघा) से सोनपुर (पहलेजा) को जोड़ने वाला जेपी पुल और आरा से छपरा को जोड़ने वाला वीर कुंवर सिंह पुल। इन दोनों पुलों के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री के अलावे लालू प्रसाद यादव भी मौजूद थे। गौरतलब है कि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी ही पथ निर्माण विभाग के भी मंत्री हैं और इन दोनों पुलों के उद्घाटन के लिए पिता के जन्मदिन को चुनना निश्चित तौर पर अकारण नहीं था। भाजपा ने इस पर हो-हल्ला भी मचाया था।

बहरहाल, तमाम विरोधाभासों के बावजूद लालू बड़े नेता हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। बिहार ही नहीं देश की राजनीति में भी जब-जब सामाजिक न्याय की बात होगी, उनके बिना पूरी नहीं होगी। राजनीति की अपनी अनूठी शैली और गंवई पुट लिए भाव-भंगिमा से उन्होंने लाखों लोगों पर जो छाप छोड़ी है, वो आसानी से मिटने वाली नहीं। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


तो अमित शाह के हिसाब से ‘चतुर बनिया’ थे राष्ट्रपिता!

भारत के संपूर्ण इतिहास के उन चंद नामों में महात्मा गांधी का नाम शुमार है जिनकी स्वीकार्यता और जिनके प्रति सम्मान दल, जाति और धर्म ही नहीं, देश और काल की सीमा से परे है। ऐसे महान व्यक्तित्व के लिए किसी भी रूप में अशोभनीय शब्द का प्रयोग निन्दायोग्य ही नहीं बल्कि अक्षम्य है। पर इन दिनों मोदी के ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के नारे के झंडाबरदार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर हालिया चुनावी सफलताओं का नशा कुछ इस कदर चढ़ गया है कि वे मर्यादा की सारी सीमा लांघकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तक के लिए अनादरसूचक शब्द का इस्तेमाल कर बैठे। जी हां, उन्होंने भरी सभा में उन्हें ‘चतुर बनिया’ की संज्ञा दी। अब चाहे वो इसके संदर्भ की लाख दुहाई दे लें, सार्वजनिक जीवन में रहने वाले और भारत ही नहीं, दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष कहलाने वाले व्यक्ति से ऐसा कतई अपेक्षित नहीं।

बहरहाल, चलिए जानते हैं मामला क्या है। दरअसल अमित शाह शुक्रवार को छत्तीसगढ़ में एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस दौरान कांग्रेस की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, “कांग्रेस किसी एक विचारधारा के आधार पर, किसी एक सिद्धांत के आधार पर बनी हुई पार्टी ही नहीं है… यह तो आज़ादी हासिल करने के लिए एक साधन (पर्पस व्हीकल) की तरह थी। और इसीलिए महात्मा गांधी ने… बहुत चतुर बनिया था… उन्होंने कहा था कि कांग्रेस को आज़ादी के बाद बिखेर देना चाहिए।” आगे उन्होंने कहा, “भले ही महात्मा गांधी कांग्रेस को न बिखेर पाए हों, लेकिन अब वह काम कांग्रेस के ही लोग कर रहे हैं।”

अमित शाह के इस बयान की कांग्रेस समेत सारी पार्टियों ने एक स्वर से निन्दा की है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने शाह के बयान को देशद्राह की संज्ञा दी और कहा कि यह स्वतंत्रता सेनानियों, उनके बलिदान और महात्मा गांधी का अपमान है। उन्होंने अमित शाह को सत्ता का व्यापारी बताते हुए कहा कि वे देश की आज़ादी की लड़ाई को व्यापारिक मॉडल बता रहे हैं। सुरजेवाला ने कहा कि सच्चाई यह है कि आज़ादी से पहले गोरे अंग्रेज महासभा और संघ का इस्तेमाल देश के बंटवारे के लिए करते रहे और अब यही काम भाजपा के काले अंग्रेज मुट्ठी भर धन्नासेठों का स्पेशल पर्पस व्हीकल बनकर कर रहे हैं।

उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट कर कहा, सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रनायकों का उल्लेख बेहद सम्मान और संवेदनशीलता के साथ करना चाहिए। जबकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सीधे कुछ न कहकर ट्वीट के माध्यम से बस गांधीजी का ही एक कथन साझा किया, जो यह है – “मैं जब भी निराश होता हूं, मैं याद करता हूं इतिहास में हमेशा सच और प्यार की जीत हुई है। अत्याचारी और हत्यारे हुए और कुछ वक्त के लिए वो अजय भी जान पड़े, लेकिन अंत में उनका खात्मा हो ही गया… ये बात हमेशा याद रखिए।”

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


मध्य प्रदेश में किसानों से मिलने जा रहे राहुल गांधी गिरफ्तार

पहले अपनी मांगों को लेकर आवाज़ उठा रहे असहाय किसानों पर गोलीबारी, फिर उन किसानों से मिलने जा रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार, जेडीयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव समेत अन्य नेताओं को रोका जाना और फिर राहुल गांधी की गिरफ्तारी – क्या ये स्वस्थ लोकतंत्र की तस्वीर है? नहीं न? लेकिन हैरानी की बात यह कि मध्य प्रदेश में ये सब कुछ हो रहा है। हैरत तब और बढ़ जाती है जब ‘सबका साथ सबका विकास’ की बात याद आती है। ये वो नारा है जो भाजपा ने दिया और जिस नारे पर देश ने यकीन किया। सवाल उठता है, क्या इसी दिन के लिए? राजनीतिक तौर पर भी देखें, तो केन्द्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार है और इस नाते किसी ‘अवरोध’ का भी प्रश्न नहीं उठता, फिर भी किसानों का इस तरह मुद्दा बन जाना समझ से परे है।

बहरहाल, मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों से मिलने जा रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को गुरुवार दोपहर पुलिस ने हिरासत में ले लिया। राहुल के साथ ही दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, शरद पवार और शरद यादव भी थे, लेकिन इन सभी को मध्य प्रदेश बॉर्डर पर ही रोक लिया गया। इस तरह रोके जाने पर राहुल पुलिस और प्रशासन को चकमा देते हुए बाइक से मंदसौर जाने के लिए निकल पड़े, लेकिन उन्हें नीमच में रोक दिया गया। उस वक्त राहुल के साथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और काग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट भी थे। बाद में राहुल को खोर स्थित विक्रम सीमेंट के गेस्ट हाउस ले जाया गया। पुलिस ने इस जगह को तात्कालिक जेल बना दिया है।

हिरासत में लिए जाने के बाद राहुल गांधी ने कहा, “मैं सिर्फ किसानों से, जो हिन्दुस्तान के नागरिक हैं, उनसे मिलना चाहता हूं। मोदीजी किसान को सिर्फ गोली दे सकते हैं। उन्हें देश के सबसे बड़े आदमी का कर्ज माफ किया है, लेकिन किसानों का कर्ज माफ नहीं कर सकते।”

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के किसान कर्जमाफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य, जमीन के बदले मुआवजे और दूध के मूल्य को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। मंगलवार को मंदसौर में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने फायरिंग की थी, जिसमें पांच किसानों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद वहां किसानों का आंदोलन उग्र हो गया और प्रदर्शनकारियों ने सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया। गरीबों और किसानों के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश में लगे विपक्ष को इस घटना के बाद एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। उधर इन सारे घटनाक्रम पर प्रधानमंत्री मोदी की ओर से एक ट्वीट के अलावे वैसी कोई क्रिया-प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली, जो उनसे पूरे देश को अपेक्षित है। वैसे किसान आंदोलन से निपटने में प्रशासन की ओर से रही खामी के मद्देनज़र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंदसौर समेत तीन जिलों के जिलाधिकारियों का तबादला जरूर कर दिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


इन्होंने लगाए एक करोड़ पेड़, आपने ?

5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। इस दिन कई जगहों पर सरकारी आयोजन होंगे, कुछ पौधे लगाकर रस्म अदायगी होगी, भाषण दिए जाएंगे और हो जाएगी कर्तव्य की इतिश्री। बाकी दिनों तो बस पत्र-पत्रिकाओं में लेख ही लिखे जाएंगे। जहां तक व्यक्तिगत प्रयत्नों की बात है तो अपने घर-परिवार में या आसपास आपको कुछ ऐसे लोग जरूर दिखते होंगे (और हो सकता है आप स्वयं भी उन्हीं व्यक्तियों में शामिल हों) जिन्हें पेड़ों से प्रेम हों और जो नियमित तौर पर पेड़ लगाते हों। पेड़ों के साथ थोड़ा समय भी बिताते हों। पर्यावरण के प्रति जागरुक ऐसे किसी व्यक्ति से आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं, यही न कि अपने जीवन में उन्होंने सौ, दो सौ या कुछ हजार पेड़ लगा दिए होंगे। लेकिन अगर आपको कहा जाए कि आपके देश में कोई ऐसा भी है, जिसने अपने 71 साल के जीवन में पूरे एक करोड़ पेड़ लगाए हैं और यह क्रम अब भी जारी है, तो क्या प्रतिक्रिया होगी आपकी? आप शायद इस बात पर यकीन भी न करें, पर ये है सच, सौ फीसदी सच।

जी हां, तेलंगाना के खमाम जिले के रेड्डीपल्ली में रहने वाले 71 वर्षीय दरीपल्ली रमैया वो शख्स हैं जिन्होंने कुछ सौ या हजार नहीं, एक करोड़ पेड़ लगाए हैं। पहले इन्हें लोग पागल कहते थे जैसे बिहार के दशरथ मांझी को कहते थे। पर आज दशरथ मांझी ‘माउंटेनमैन’ कहलाते हैं और रमैया ‘ट्रीमैन’ के नाम से सम्मान पाते हैं। लोगों को इनके काम की अहमियत तब पता चली जब आज ग्लोबल वार्मिंग पर देश-दुनिया में मंथन हो रहा है। इनके अद्भुत कार्य को देखते हुए भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री अवार्ड से नवाजा है, तो एकेडमी ऑफ यूनिवर्सल ग्लोबल पीस ने डॉक्टरेट की उपाधि दी है।

रमैया को पेड़-पौधों के प्रति ये लगाव अचानक नहीं हुआ। पर्यावरण प्रदूषण के चलते जब उनका मन विचलित होने लगा तब उन्होंने अपने इस अनोखे अभियान की शुरुआत की। वे जेब में बीज और साईकिल पर पौधे रखकर जिले भर में घूमते और जहां भी खाली जमीन दिखती वहां पौधे लगा देते। आपको आश्चर्य होगा कि इन्होंने अपनी तीन एकड़ जमीन इसलिए बेच दी थी कि वे उन पैसों से बीज और पौधे खरीद सकें। पेड़ों के प्रति उनका प्रेम केवल उन्हें लगाने तक सीमित नहीं, बल्कि उनका बच्चों की तरह ख्याल भी रखते हैं। अगर कोई पेड़ सूख जाए तो इन्हें उतना ही कष्ट होता है जितने एक पिता को अपने बच्चे को परेशान देखकर होता है।

रमैया केवल पेड़-पौधे लगाने का जुनून ही नहीं रखते बल्कि वे वृक्षों का चलता-फिरता विश्वकोष भी हैं। वे पौधों की विभिन्न प्रजातियों, उनके उपयोग और लाभ आदि के विषय में विस्तृत जानकारी रखते हैं। उनके पास राज्य में पाए जाने वाले 600 से ज्यादा वृक्षों के बीजों का अनूठा संग्रह भी है।

हमेशा टीन की टोपी पहने, लोगों को हरियाली और पर्यावरण के प्रति जागरुक करते प्रकृति के इस कर्मठ पुत्र को हमारा नमन। और हां, क्या हम अपने भीतर रमैया का थोड़ा अंश भी नहीं पाल सकते?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


मोदीजी, फिर टीवी पर आईए! नोटबंदी का स्याह सच भी बताईए !

दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का तमगा हमने खो दिया। वित्तीय वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही में भारत की जीडीपी दर गिरकर 6.1 प्रतिशत पर आ गई, जबकि इस दौरान चीन की आर्थिक विकास दर 6.9 प्रतिशत रही। चारो तिमाही को मिलाकर यानि पूरे वित्तीय वर्ष की बात करें तो लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। पिछले साल जीडीपी दर 8 प्रतिशत थी, जबकि इस साल यह 7.1 प्रतिशत रही। जानकारों के मुताबिक अर्थव्यवस्था में इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण पिछले साल के अंत में मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी रही है।

हालांकि केन्द्रीय सांख्यिकी विभाग विकास दर में आई कमी के लिए केवल नोटबंदी को जिम्मेदार नहीं मानता। उसका कहना है कि गिरावट की कई वजहें हैं जिनमें से एक नोटबंदी भी है। वित्तमंत्री अरुण जेटली भी कह रहे हैं कि विकास की रफ्तार में आई गिरावट के लिए नोटबंदी नहीं, पूरे विश्व में जारी आर्थिक मंदी और यूपीए सरकार जिम्मेदार है। रही बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तो वे स्पेन जाकर भारत को निवेश के लिए पहले से अधिक मजबूत बता रहे हैं। जाहिर है, कोई सच मानने को तैयार नहीं। पर नोटबंदी का स्याह सच यह है कि अगर जीडीपी की गणना में छोटे व्यवसायों और असंगठित क्षेत्रों के आंकड़े शामिल कर दिए जाएं, जिन पर नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार पड़ी और जिन्हें हमारे देश की जीडीपी की गणना में शामिल नहीं किया जाता, तो स्थिति बद से बदतर होती दिखेगी।

देश को यह जानना चाहिए कि नोटबंदी के बाद एक कृषि को छोड़ सारे क्षेत्रों में – चाहे वो विनिर्माण हो, मैन्यूफैक्चरिंग हो या सेवा क्षेत्र – भारी गिरावट आई। कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, उर्वरक, इस्पात, सीमेंट और बिजली जैसे बुनियादी उद्योगों की वृद्धि दर एकदम से चरमरा गई।

नोटबंदी के बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि इससे जीडीपी में दो प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के मुताबिक नोटबंदी एक भूल थी। इसके बुरे परिणामों की आशंका जताते हुए उन्होंने कहा था कि इतने बड़े निर्णय के पीछे उन्हें कोई कारण नहीं दिखता। वर्ल्ड बैंक के पूर्व अर्थशास्त्री एवं वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी ने तो इसे पिछले 70 वर्षों में आर्थिक नीति की सबसे बड़ी भूल करार दिया था। क्या ये तमाम आशंकाएं आज सच होती नहीं नहीं दिख रहीं?

चलते-चलते एक बात और, केन्द्र सरकार ने नोटबंदी के बाद जितना कालाधन मिलने की बात कही, क्या उससे कई गुणा अधिक नुकसान जीडीपी में गिरावट से देश को नहीं हुआ? इसमें नए नोटों को छापने का खर्च मिला दें तो सोचिए नुकसान का आंकड़ा कहां तक जाएगा! और हां, नोटबंदी के कारण जो जानें गईं क्या वो कभी लौट के आएंगी? मोदीजी, आपसे करबद्ध प्रार्थना है कि एक बार फिर टीवी पर आईए और अपने ‘भाईयों एवं बहनों’ को नोटबंदी का स्याह सच भी बताईए!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

सम्बंधित खबरें


सम्पूर्ण क्रांति दिवस बनाम लालू का जन्मदिन

बिहार के दो अत्यंत महत्वपूर्ण पुल आरा-छपरा और दीघा-सोनपुर का लोकार्पण आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन 11 जून को होने जा रहा है। गौरतलब है कि संबंधित विभाग (पथ-निर्माण) के मंत्री लालू के छोटे पुत्र व सरकार में उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव हैं और इसी कारण बिहार भाजपा इसका पुरजोर विरोध करने की योजना बना रही है। पार्टी का तर्क है कि क्या ये तेजस्वी की पारिवारिक संपत्ति है जिसे वो ‘पापा’ को ‘गिफ्ट’ करने पर तुले हुए हैं।

इस बाबत भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार की जनता को यह बताना चाहिए कि क्या तेजस्वी ने अपने पिता को पुल ‘गिफ्ट’ करने का ऐलान उनकी सहमति से किया है। यही नहीं, लगे हाथ उन्होंने सरकार को एक बड़ी सलाह भी दे डाली कि इन दोनों पुलों का लोकार्पण लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति दिवस यानि 5 जून को किया जाय।

मोदी ने तंज कसते हुए आगे कहा कि विभिन्न घोटालों व विवादों से घिरे किसी शख्स के जन्मदिन पर पुलों का लोकार्पण कर सरकार बिहार की जनता को जलील न करे। तेजस्वी को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि अगर गिफ्ट ही करना है तो वो पटना में बन रहे बिहार के सबसे बड़े मॉल, दिल्ली की सैकड़ों करोड़ की जमीन और अपनी एक हजार करोड़ से अधिक की बेनामी सम्पत्ति गिफ्ट करें।

बहरहाल, इन दिनों मोदी हाथ धोकर लालू और उनके परिवार के पीछे पड़े हैं। उनके आरोपों का सोता जैसे सूखने का नाम ही नहीं ले रहा। आजकल ऐसा कोई मौका नहीं छूटता जब वे लालू और उनके बेटों के खिलाफ और लालू के पुत्र व प्रवक्ता मोदी के खिलाफ आग न उगलते हों। लिहाजा यहां आरोप-प्रत्यारोप ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं। हां, उनकी यह बात सोचने को जरूर बाध्य करती है कि ये लोकार्पण लालू के जन्मदिन से छह दिन पहले सम्पूर्ण क्रांति दिवस पर क्यों नहीं? हां, सम्पूर्ण क्रांति, पिछले तीन दशकों में बिहार की राजनीति की धुरी रहे लालू और नीतीश समेत मौजूदा दौर के कई बड़े हस्ताक्षर जिसकी उपज हैं। क्या समय बीतने पर प्राथमिकता के साथ-साथ प्रतीक भी बदल जाते हैं, और उनके मूल्य घट-बढ़ जाते हैं, सिक्कों की तरह?

जहां तक बात लालू प्रसाद यादव की है, तो बिहार की राजनीति से उनको खारिज करना संभव नहीं। पिछड़े तबकों के उभार में उनकी बड़ी भूमिका रही है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। तो क्या इसका अर्थ यह है कि उन्हें जेपी पर तरजीह दी जाए? अगर तेजस्वी ने ‘पितृप्रेम’ में ऐसा प्रस्ताव रखा भी और लालू इस सम्मान के लिए अनुपयुक्त न भी हों, तो क्या लालू का फर्ज नहीं था कि वे अपने बेटे को अधिक उपयुक्त निर्णय लेने के लिए मदद और मार्गदर्शन देते?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


देश के हर नागरिक को दिखानी चाहिए यह फिल्म

क्रिकेट के ‘भगवान’ बॉक्स ऑफिस पर भी छा गए। मैदान चाहे कोई भी हो, सचिन तो आखिर सचिन हैं। भारत में क्रिकेट के पर्याय बन चुके सचिन तेंदुलकर के जीवन पर आधारित फिल्म ‘सचिन ए बिलियन ड्रीम्स’ ने रिलीज के बाद पहले वीकेंड पर 27.85 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड कमाई कर ली है। गौरतलब है कि इस फिल्म ने रिलीज के पहले दिन भी रिकॉर्ड बनाया था। पहले दिन इस फिल्म ने 8.40 करोड़ की कमाई की थी।

आप सोच रहे होंगे कि ‘बाहुबली 2’ और ‘दंगल’ जैसी फिल्में, जिन्होंने 1500 करोड़ का अकल्पनीय क्लब तैयार कर लिया है, के रहते मैं ये किस रिकॉर्डतोड़ कमाई की बात कर रहा हूं। तो जनाब, जान लें कि सचिन पर बनी यह फिल्म कोई फीचर फिल्म नहीं है। यह एक डॉक्यू-ड्रामा है और इस श्रेणी में यह निर्विवाद रूप से अब तक की सबसे बड़ी ओपनिंग करने वाली फिल्म है। इतना ही नहीं, यह फिल्म इस साल रिलीज हुई फिल्मों में सबसे ज्यादा ओपनिंग वाली टॉप 10 फिल्मों में भी शामिल हो गई है।

अब थोड़ी चर्चा फिल्म पर। इस स्पोर्ट्स डॉक्यू-ड्रामा में सचिन की ज़िन्दगी और क्रिकेट के प्रति उनके योगदान व कड़ी मेहनत को दिखाया गया है। फिल्म में सचिन के बचपन को देखना कमाल की अनुभूति है। फिल्म जरूरत के मुताबिक उनके निजी जीवन में भी झांकती है। इस फिल्म में आप सचिन के फैमिली वीडियो भी देख सकते हैं।

‘सचिन ए बिलियन ड्रीम्स’ कई ऐतिहासिक मैचों की याद ताजा कर देती है। फिल्म में कई कमेंटेटर्स, क्रिटिक्स और साथी खिलाड़ियों के इंटरव्यू शामिल किए गए हैं। इनमें भारत से महेन्द्र सिंह धोनी, विराट कोहली, सौरव गांगुली, वीरेन्द्र सहवाग और हरभजन सिंह के नाम शामिल हैं।

फिल्म का एक बेहद ईमानदार पहलू यह है कि इसमें यादों के सुहाने सफर के अलावा क्रिकेट से जुड़ी कंट्रोवर्सी को भी जगह मिली है। और तो और फिल्म में सचिन के खराब प्रदर्शन के बारे में भी बात की गई है। यह फिल्म यह मैसेज देने में पूरी तरह सफल होती है कि सचिन जैसे महान खिलाड़ी केवल धैर्य, तैयारी और कड़ी मेहनत से बनते हैं।

चलते-चलते

बुधवार 24 मई को मुंबई में फिल्म का प्रीमियर रखा गया था, जिसमें बॉलीवुड और क्रिकेट जगत की कई बड़ी हस्तियां मौजूद थीं। महानायक अमिताभ बच्चन फिल्म को देख इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, यह फिल्म देश के हर नागरिक को दिखानी चाहिए। स्कूलों में भी बच्चों को यह फिल्म दिखाई जानी चाहिए। भावुक स्वर में अमिताभ ने यहां तक कहा कि उन्हें गर्व है कि वह उस देश में रहते हैं जहां सचिन जैसा महान क्रिकेटर रहता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

सम्बंधित खबरें


ये क्या नीतीशजी, सोनिया को ना, मोदी को हां !

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष का साझा उम्मीदवार खड़ा करने और इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से अगुवाई करने का आग्रह करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐन वक्त पर क्या यू-टर्न ले लिया? अब जबकि उनकी सलाह के मुताबिक सोनिया सक्रिय हुई हैं और राष्ट्रपति चुनाव के कुछ ही हफ्ते बचे हैं, नीतीश के एक कदम से विपक्ष की सारी कवायदों की हवा निकलती दिख रही है। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चाहे जो तर्क दे लें लेकिन ये बात हजम नहीं होती कि शुक्रवार को राष्ट्रपति चुनाव पर चर्चा के लिए सोनिया द्वारा आयोजित अहम भोज में उन्होंने शिरकत नहीं की, लेकिन शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ के सम्मान में दिए गए भोज में वे शामिल हुए। जबकि दोनों ही भोज की जगह दिल्ली थी और एक दिन पहले नीतीश की कोई असामान्य व्यस्तता भी नहीं थी।

गौरतलब है कि सोनिया द्वारा दिए गए भोज में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव  समेत 17 पार्टियों के नेताओं ने भाग लिया, जबकि जेडीयू की ओर से इसमें पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव शामिल हुए। नीतीश ने इस बैठक में अपने शामिल न होने पर सफाई देते हुए कहा कि उनके न जाने का गलत मतलब निकाला गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बैठक में जिन मुद्दों पर चर्चा होनी थी, उन पर वह पिछले महीने ही सोनिया गांधी से मिलकर चर्चा कर चुके थे। ठीक है कि पिछले महीने नीतीश सोनिया से मिले थे, राष्ट्रपति चुनाव की बाबत चर्चा भी हुई थी, लेकिन सोनिया की यह बैठक इस दिशा में अबतक का सबसे बड़ा प्रयास थी और उसमें शामिल न होकर उन्होंने गलत वक्त पर कयासों का बाज़ार गर्म करने का मौका दे दिया, क्या इसे झुठलाया जा सकता है ?

वैसे भी लालू से जुड़े ठिकानों पर आयकर विभाग के छापों के बाद लालू-नीतीश के संबंधों में आई तल्खी छिपी नहीं है। इसके बाद लालू के ट्वीट ‘बीजेपी को नए पार्टनर मुबारक हों’ ने भी अटकलों को हवा दी। इससे पहले लालू ने नोटबंदी का जितना खुलकर विरोध किया, नीतीश उतना ही खुलकर उसके समर्थन में सामने आए। बदले में प्रकाशोत्सव पर बिहार आए मोदी ने शराबबंदी पर नीतीश की सराहना की। हाल ही में उन्होंने नीतीश को उनके जन्मदिन पर ट्वीट कर बधाई भी दी। राजनीति के जानकार बताते हैं कि भाजपा जहां जरूरत पड़ने पर नीतीश में अपना स्वाभाविक साथी देख रही है, वहीं नीतीश के लिए यह लालू को हद में रखने की रणनीति है। गौरतलब है कि पिछले दिनों आरजेडी नेताओं द्वारा तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग जोरशोर से उठी थी, जिससे लालू के छिपे एजेंडे के तौर पर देखा गया था। बहराहाल, लालू का एजेंडा चाहे जो हो, नीतीश ने भी अपना एजेंडा छिपाकर नहीं रखा। बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाना, यही तो राजनीति है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


चंद्रास्वामी: बीते कल की ‘सुर्खी’ एक बार फिर सुर्खियों में

तांत्रिक, ज्योतिष, आध्यात्मिक गुरु, गॉडमैन या राजनेताओं और उद्योगपतियों के दलाल – क्या थे चंद्रास्वामी? 1990 के दशक में खासा चर्चित यह चेहरा जितना अपने ‘प्रभाव’ के लिए जाना जाता था उतना ही विवादों के लिए। पर पीवी नरसिम्हा राव के सत्ता के शीर्ष पर रहते एक दौर ऐसा भी रहा जब चंद्रास्वामी की तूती बोलती थी और उनके आभामंडल के आगे बड़े-से-बड़े नतमस्तक थे। कारण कि नरसिम्हा राव के तथाकथित आध्यात्मिक गुरु थे चंद्रास्वामी। वहीं भारत के एक और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सार्वजनिक तौर पर बेहिचक कहा करते कि चंद्रास्वामी हमारे दोस्त हैं।

चंद्रास्वामी का वक्त वर्षों पहले ढल चुका। सुर्खियों से उनकी विदाई कब की हो चुकी। पर बीते मंगलवार को इस दुनिया से उनकी विदाई ने उन्हें एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया। बताया जाता है वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। 1948 में जन्मे और अभी-अभी रुखसत हुए इस बेहद दिलचस्प शख्सियत का असली नाम नेमिचंद था और वे जैन समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

चंद्रास्वामी तंत्रविज्ञान के कितने बड़े ज्ञाता थे ये ठीक-ठीक कहना मुश्किल है लेकिन उनके ‘तंत्र’ का जाल कितनी दूर तक और कितने गहरे फैला था, इसका अंदाजा उनके मुरीदों की फेहरिस्त से लगाया जा सकता है, जिसमें भारत के सैकड़ों राजनेताओं, उद्योगपतियों, नौकरशाहों से लेकर हॉलीवुड अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर और ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर तक का नाम शामिल है। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अपनी किताब ‘वॉकिंग विद लायन्स: टेल्स फ्रॉम अ डिप्लोमेटिक पास्ट’ में लिखा है कि 1975 में ब्रिटेन में चंद्रास्वामी और मारग्रेट थैचर की मुलाकात हुई थी। उस मुलाकात में चंद्रास्वामी ने कह दिया था कि अगले तीन-चार साल में थैचर प्रधानमंत्री बनेंगी और 9, 11 या 13 वर्षों तक प्रधानमंत्री बनी रहेंगी। अब इसे संयोग कहें या चंद्रास्वामी की तथाकथित ‘तंत्र-शक्ति’ कि थैचर उनके कहे समय में प्रधानमंत्री बनीं और पूरे 11 साल तक रहीं। नटवर सिंह ने इस बात की भी पुष्टि की है कि थैचर उस मुलाकात में बकायदा चंद्रास्वामी के कहे मुताबिक लाल रंग के वस्त्र में आई थीं और यहां तक कि चंद्रास्वामी की दी ताबीज भी उन्होंने बांध रखी थी।

चंद्रास्वामी का विवादों से गहरा नाता रहा। कहा जाता है कि उनका ‘आश्रम’ फंडिग के लिए उद्योगपतियों को तलाश रहे नेताओं और अपने अनुकूल नीतियां बनवाने व लाइसेंस-परमिट पाने के लिए नेताओं को ढूंढ रहे उद्योगपतियों की मिलन-स्थली था। हथियारों के अंतर्राष्ट्रीय सौदागर अदनान खशोगी से उनके रिश्ते बताए जाते हैं। उन पर ये आरोप भी लगा कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या में उनका हाथ था। राजीव हत्याकांड की जांच करने वाले जैन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था। लंदन के एक बिजनेसमैन से एक लाख डॉलर की धोखाधड़ी के मामले में 1996 में वे जेल भी गए। उनके ऊपर विदेशी मुद्रा उल्लंघन के कई गंभीर मामले चले।

चंद्रास्वामी पर लगे आरोपों या सत्ता पर उनकी पकड़ के दावों में कितनी सच्चाई है, इसका लेखा-जोखा रखने से कुछ हाथ आने वाला नहीं, लेकिन एक व्यक्ति एक साथ कितने चेहरे रख सकता है और पद या पैसा पाने की ‘कमजोरी’ रखने वालों को सीढ़ी बनाकर कितने ‘ऊपर’ तक का सफर तय कर सकता है, इसकी समझ तो हासिल की ही जा सकती है।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

 

सम्बंधित खबरें


पटना में शीघ्र होगा डॉ. कलाम के नाम पर साइंस सिटी का निर्माण

सार्वकालिक महानतम भारतीयों में शुमार पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का बिहार के लिए विशेष लगाव रहा। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। इसके अतिरिक्त भी उन्होंने कई अवसरों पर बिहार का मार्गदर्शन किया। उनका मानना था कि बिहार में देश का अगुआ बनने की प्रचुर संभावना है। इसके लिए आमजन, विशेष तौर पर युवाओं को प्रेरित करने के साथ-साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी अलग-अलग मौकों पर वे सुझाव देते रहे थे।

और एक अति महत्वपूर्ण सुझाव डॉ.कलाम ने पटना में ही लेखक डॉ.मधेपुरी को दी थी | बता दें कि 30 दिसंबर 2005 को पटना के हवाई अड्डे पर महामहिम राष्ट्रपति डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी की मुलाकात रात्रि के लगभग 9:00 बजे लाइब्रेरी के एक विशाल हॉल में तब हुई जब ‘अग्नि की उड़ान’ के सह-लेखक डॉ.अरुण कुमार तिवारी उपस्थित थे | मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपनी टीम के साथ उन्हें विदा करने हेतु आने ही वाले थे |

The President of India Dr.APJ Abdul Kalam with Dr.Bhupendra Madhepuri at Patna Airport .
The President of India Dr.APJ Abdul Kalam with Dr.Bhupendra Madhepuri at Patna Airport .

बता दें कि डॉ.मधेपुरी द्वारा जो दो पुस्तकें – एक डॉ.कलाम पर और दूसरी डॉ.कलाम के साथ लिखी गई हैं- उन्हीं पुस्तक द्वय के अवलोकन के क्रम में महामहिम डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने डॉ.मधेपुरी को राष्ट्रपति भवन आने के आमंत्रण के साथ ही यह मूल्यवान सुझाव भी दिया था –

“ये ऑंखें दुनिया को दोबारा नहीं देख सकती, अतएव तुम्हारे अंदर जो बेहतरीन है वो दुनिया को देकर जाना……… बच्चों को देकर जाना |”                       

ऐसे सार्वकालिक गांधीयन मिसाइलमैन की एक आदमकद प्रतिमा मधेपुरा समाहरणालय के उत्तरी खाली परिसर में लगा कर डॉ.कलाम सरीखे ऋषि की स्मृतियों को जीवंत रखने की तमन्ना पालते देखे जा रहे हैं समाजसेवी साहित्यकार डॉ.मधेपुरी , जिन्हें कुछ लोग “मधेपुरा का डॉ.कलाम” भी कहने लगे हैं | मधेपुरा आशा भरी निगाहों से देख रहा है कि यहां के डायनेमिक डीएम मो.सोहैल या फिर बिहार के क्रांतिकारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दोनों में से पहले किनकी सहमति प्राप्त होती है……… लेकिन फिलहाल तो सीएम उनके नाम पटना में साइंस सिटी बनाने में व्यस्त दिखने लगे हैं |

मिसाईलमैन की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए ही बिहार सरकार ने पटना में उनके नाम पर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की साइंस सिटी बनाने का निर्णय लिया, जिसका निर्माण अब शीघ्र शुरू होगा। मंगलवार को इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में 397 करोड़ खर्च करने की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई। इनमें से 94 करोड़ जल्द ही बिहार काउंसिल ऑन साइंस सिटी एंड टेक्नोलॉजी को बिहार आकस्मिकता निधि से दिया जाएगा, ताकि काम अविलंब शुरू हो।

गौरतलब है कि प्रस्तावित साइंस सिटी का निर्माण पटना के राजेन्द्र नगर स्थित मोइनुल हक स्टेडियम के नजदीक करीब 20 एकड़ भूमि में होना है। अपने ढंग के अनूठे इस साइंस सिटी में वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित कई प्रदर्श दीर्घा का निर्माण होगा। इसमें वैज्ञानिक सिद्धांतों की अनुभूति और इनका आम जन-जीवन में हो रहे प्रयोगों को भी दिखाया जाएगा। साथ ही पर्यटन स्थल के रूप में भी इसका विकास किया जाएगा। कलाम के करोड़ों चाहने वालों के लिए ये निश्चित रूप से अनमोल तोहफा होगा, जिसके लिए बिहार सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साधुवाद के पात्र हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें