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आप ‘कृष्ण’ को कितना जानते हैं?

कृष्ण को सभी जानते हैं, पर महत्वपूर्ण यह है कि कितना जानते हैं। आप ही बताएं कि क्या हैं कृष्ण? देवकीसुत, यशोदानंदन या राधाकांत? सुदामा के सखा, अर्जुन के सारथि या द्वारका के अधिपति? महाभारत की धुरी, गीता के उपदेशक या विष्णु के अवतार? कृष्ण के अनंत रूप हैं और हर रूप की अनगिनत छवियां हैं। हम अपने मिथक से लेकर इतिहास तक खंगाल लें, कृष्ण से अधिक पूर्ण, कृष्ण से अधिक जीवंत, कृष्ण से अधिक विराट व्यक्तित्व ना तो हुआ है, ना होगा।

कृष्ण को जानने के लिए हमें श्रीमद्भागवत का ये प्रसंग जरूर जानना चाहिए। कृष्ण की इच्छा थी कि उनके देह-विसर्जन के पश्चात् द्वारकावासी अर्जुन की सुरक्षा में हस्तिनापुर चले जाएं। सो अर्जुन अन्त:पुर की स्त्रियों और प्रजा को लेकर जा रहे थे। रास्ते में डाकुओं ने लूटमार शुरू कर दी। यह देख अर्जुन ने तत्काल गाण्डीव के लिए हाथ बढ़ाया। पर यह क्या! गाण्डीव तो इतना भारी हो गया था कि प्रत्यंचा खींचना तो दूर, धनुष को उठाना तक संभव नहीं हो पा रहा था। महाभारत के विजेता, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी विवश होकर अपनी आँखों के सामने अपना काफिला लुटता देख रहे थे। विश्वास कर पाना मुश्किल था कि ये वही अर्जुन हैं जिन्होंने अजेय योद्धाओं को मार गिराया था। अर्जुन अचरज में डूबे थे कि तभी कृष्ण के शब्द बिजली की कौंध की तरह उनके कानों में गूंजे – “तुम तो निमित्त मात्र हो पार्थ।”

श्रीमद्भागवत का ये प्रसंग अकारण नहीं है। यहाँ अर्जुन को माध्यम बना हमें इस अखंड सत्य से अवगत कराया गया है कि जीवन में जब-जब ‘कृष्ण तत्व’ अनुपस्थित होता है, तब-तब मनुष्य इसी तरह ऊर्जारहित हो जाता है। कृष्ण के ना रहने का अर्थ है – जीवन में शाश्वत मूल्यों का ह्रास। प्राणी हो या प्रकृति, ‘प्राणवायु’ कृष्ण ही थे, कृष्ण ही हैं, कृष्ण ही रहेंगे।

कृष्ण का अवतरण मानवता के लिए एक क्रान्तिकारी घटना थी। वे हुए तो अतीत में लेकिन हैं भविष्य के। इतना अनूठा था उनका व्यक्तित्व कि हम आज भी उनके समसामयिक नहीं बन सके हैं। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं कि उसकी सोच और समझ में कृष्ण अंट जाएं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कृष्ण अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं। किसी भी बिन्दु पर रत्ती भर भी और पल भर के लिए भी उदास नहीं होते कृष्ण। उन्हें आप हमेशा हंसते हुए, नाचते हुए, जीवन का गीत गाते हुए पाएंगे। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। उदास और आँसुओं से भरा था। हंसता हुआ धर्म, जीवन को समग्र रूप से स्वीकार करने वाला धर्म अभी पैदा होने को है। जाहिर है कि वैसा जीवंत धर्म कृष्ण-तत्व से ही संभव है।

कृष्ण अकेले हैं जो समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उन्हीं के व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसीलिए इस देश ने सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है और कृष्ण को पूर्ण अवतार। राम भी अंश ही हैं परमात्मा के लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। पुरानी मनुष्य-जाति के इतिहास में वे अकेले हैं जो दमनवादी नहीं हैं। उन्होंने जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिया है। वे प्रेम से भागते नहीं। वे पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वे करुणा और प्रेम से भरे होकर भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। अमृत की स्वीकृति है उन्हें लेकिन विष से कोई भय भी नहीं है।

हम जब-जब ‘पूर्णता’ की बात करेंगे, हमारे सामने ‘कृष्ण’ ही होंगे, क्योंकि पूर्णता के पूर्ण प्रतिमान केवल वही हैं, और जिसे हम ‘जन्माष्टमी’ कहते हैं, वो वास्तव में उसी पूर्णता का प्रतीक पर्व है। वर्ष में एक बार ये दिन आता है तो हमें ये एहसास दिलाने कि ‘अधूरेपन’ से लड़ने की ताकत हममें से हर किसी में है और जब तक कृष्ण हैं ‘पूर्णता’ की हर संभावना शेष है। मजे की बात तो यह कि पूर्णता की ये यात्रा ‘कृष्ण’ के साथ है और ‘कृष्ण’ तक ही पहुँचने के लिए है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘आपदा’ में ‘एक’ हुए दो दिग्गज

बिहार के 38 में से 20 जिले बाढ़ से बेहाल हैं। पिछले तीन दिनों में 19 लोगों की मौत हो चुकी है और 5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं। दिन-ब-दिन बिगड़ती स्थिति के मद्देनज़र मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिले। उन्होंने प्रधानमंत्री को हालात से अवगत कराया और प्रधानमंत्री ने उन्हें हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।

मुलाकात के दौरान नीतीश कुमार ने फरक्का बांध का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि बाढ़ की यह स्थिति फरक्का बांध बनने के बाद गंगा में जमा हो रहे गाद के कारण बनी है। बिहार में गंगा की स्थिति पर उन्हें ‘रोने’ का मन करता है। हर साल बाढ़ से बचने का एकमात्र समाधान गंगा के तलछट की सफाई करना है। उन्होंने मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना को बिहार में तलछट प्रबंधन से जोड़ते हुए कहा कि अगर स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया तो इस परियोजना की सफलता पर भी प्रश्नचिह्न लगेगा। नीतीश ने बताया कि प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि उनकी मांगों पर तुरंत और सकारात्मक कार्रवाई की जाएगी जिसमें राष्ट्रीय तलछट प्रबंधन नीति बनाना शामिल है।

गौरतलब है कि बिहार में अभी तक 14 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसके बावजूद राज्य में बाढ़ की भयावह स्थिति है। दरअसल दूसरे राज्यों में बारिश के कारण बिहार को बाढ़ की विभीषिका झेलना पड़ रहा है। नेपाल और झारखंड के बाद अब मध्य प्रदेश में बारिश से बिहार में बाढ़ के हालात बने हुए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस ओर भी प्रधानमंत्री का ध्यान आकृष्ट किया।

बता दें कि केन्द्र सरकार ने बिहार और उत्तर प्रदेश के बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव कार्य में मदद करने के लिए एनडीआरएफ की 10 टीमें सोमवार को भेजी थीं। बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित राज्यों में एनडीआरएफ की कुल 56 टीमें राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश की स्थिति पर नज़र रखने के लिए दो डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल रैंक के अधिकारियों को लगाया गया है। इस मानसून सीजन में एनडीआरएफ की टीमें पूरे देश में 26,400 लोगों को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से निकाल चुकी हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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नीतीश की राह में केजरीवाल का रोड़ा

हमारे नीतीशजी इन दिनों बड़ी शिद्दत से अपने ‘अखिल भारतीय’ अभियान पर हैं। ‘विकास-पुरुष’ का जो तमगा उन्हें बिहार के लिए मिला उस पर पूरे देश की ‘मुहर’ चाहते हैं वो। 2019 में प्रधानमंत्री मोदी के बरक्स खुद को खड़ा करने करने के लिए शराबबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ नीतीशजी। वैसे देखा जाय तो 2019 के लिए मैदान में ‘भीड़’ है भी नहीं और मोदी के जवाब के तौर पर उन्हें राहुल गांधी से बेहतर मानने वालों की भी कमी नहीं। पर मोदी हैं कि हाथ लग ही नहीं रहे। और तो और, उनके और मोदी के बीच, बीच में ‘टपकने’ के लिए मशहूर अरविन्द केजरीवाल भी कूद पड़े हैं।

जी हाँ, इंडिया टुडे और कार्वी इनसाइट्स के सर्वे के मुताबिक गुड गवर्नेंस और लोकप्रियता में तो मोदी देश के किसी भी राजनेता से कोसों आगे हैं ही, मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी बिहार के मुख्यमंत्री से अधिक लोकप्रिय आंके गए हैं और मोदी के लिए ‘खतरे’ के तौर पर भी राहुल के बाद नीतीश के साथ-साथ लगभग बराबरी पर खड़े हैं।

सर्वे के मुताबिक देश के 53 प्रतिशत लोग बतौर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रदर्शन शानदार मानते हैं। सर्वे में शामिल आधे लोगों ने उन्हें देश का नंबर वन नेता माना है और प्रधानमंत्री पद के लिए बेहतर उम्मीदवार बताया है, जबकि 13 प्रतिशत लोग इसके लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष और 6 प्रतिशत उनकी माँ सोनिया गांधी को सही मानते हैं।

अगले लोकसभा चुनाव की बात करें तो राहुल गांधी मोदी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। 23 प्रतिशत लोगों ने 2019 के लिए राहुल को मोदी के लिए सबसे बड़ा खतरा माना है, जबकि 13 प्रतिशत लोगों ने नीतीश और 12 प्रतिशत लोगों ने केजरीवाल के पक्ष में अपनी राय दी है।

मुख्यमंत्रियों की बात करें तो दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल देश के सबसे बेहतर मुख्यमंत्री हैं। बिहार के नीतीश कुमार को दूसरा स्थान मिला है और तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी हैं। हालांकि केजरीवाल की लोकप्रियता 2015 के मुकाबले 2016 में कम हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में वो लोगों की पहली पसंद हैं।

बता दें कि इंडिया टुडे और कार्वी इनसाइट्स का ये सर्वे 15 जुलाई से 2 अगस्त के बीच किया गया और 19 राज्यों के 97 संसदीय और 194 विधानसभा क्षेत्रों में 12,321 लोगों से राय ली गई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सिंधू और साक्षी : देश की दो अनमोल बेटियां

आज ऑफिस से जल्दी आया था। करोड़ों भारतीयों की तरह मैं भी चाहता था कि ‘इतिहास’ को बनता हुआ देखूं। साक्षी के ब्रॉन्ज के बाद सिंधू का सिल्वर तो कल ही तय हो चुका था, पर आज उस सिल्वर का रंग ‘सुनहला’ होते देखना चाहता था। 21 साल की सिंधू ने दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी स्पेन की मरीन के साथ खेला भी लगभग बराबरी पर। पर खेल तो खेल है। जीत किसी एक की ही होनी थी, सो मरीन जीत गई। सिंधु के सिल्वर का रंग ‘सुनहला’ होते-होते रह गया। पर क्या हुआ कि सोने का पदक नहीं मिला सिंधू को, उसने तो वो कर दिखाया कि सोने से भी उसे तौल दें तो कम होगा। इतिहास तो देश की ये दोनों बेटियां कल ही रच चुकी थीं। रक्षाबंधन पर इन दोनों ने पूरे देश को वो उपहार दिया जो अद्भुत, अभूतपूर्व, अविस्मरणीय है।

बहरहाल, सिंधू ने आज रियो में बैडमिंटन महिला सिंगल्स का सांस रोक देने वाला फाइनल खेला और शुरुआत में पिछड़ने के बावजूद पहला सेट 21-19 से अपने नाम कर लिया। दूसरे सेट में मरीन ने वापसी की और 12-21 से जीत दर्ज की। निर्णायक तीसरे सेट में एक-एक प्वाइंट के लिए दोनों खिलाड़ियों का संघर्ष देखने लायक था। एक समय तो 10-10 की बराबरी पर थीं दोनों, पर अंतत: मरीन का अनुभव काम आया और उसने 15-21 से फाइनल जीत लिया।

सिंधू हारीं जरूर लेकिन सिल्वर जीतकर वो ओलंपिक में ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गईं। यही नहीं, भारतीय ओलंपिक इतिहास में ये किसी भी खिलाड़ी द्वारा चौथा व्यक्तिगत सिल्वर मेडल है। इससे पहले ये सफलता राज्यवर्द्धन सिंह राठौर (ट्रैप शूटिंग), सुशील कुमार (कुश्ती) और विजय कुमार (शूटिंग) ने हासिल की है।

अब जरा कल के दिन अपने ‘पसीने’ से रियो ओलंपिक में भारत के मेडल का ‘सूखा’ खत्म करने वाली साक्षी मलिक की बात। इस 23 वर्षीया भारतीय महिला पहलवान ने रियो में महिला रेसलिंग के 58 किलोग्राम फ्री स्टाइल मुकाबले में किर्गिस्तान की एसुलू तिनिवेकोवा को 8-5 से हराकर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। साक्षी पहली भारतीय महिला पहलवान हैं जिन्होंने फ्री स्टाइस कुश्ती में ये कामयाबी हासिल की है। इसके अलावा वो भारतीय ओलंपिक इतिहास की चौथी महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंने कांस्य हासिल किया है। उनसे पहले कर्णम मलेश्वरी, मैरी कॉम और साइना नेहवाल ही ये कमाल कर पाई हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ अपनी और अपने तमाम पाठकों की ओर से देश की इन दोनों बेटियों को सलाम करता है। काश कि हम ‘स्पोर्ट्स कल्चर’ और हमारी सरकारें ‘स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्टर’ के प्रति जागरुक और ईमानदार रहें और गौरव के ऐसे क्षण बार-बार आएं!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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रजनीकांत : कद, करिश्मा और ‘कबाली’

आमतौर पर बॉलीवुड के बड़े स्टार अपनी फिल्म की रिलीज के लिए दिवाली और ईद जैसे छुट्टी वाले दिन चुनते हैं लेकिन रजनीकांत की फिल्म जिस दिन रिलीज होती है उस दिन छुट्टी डिक्लेयर हो जाती है। रजनीकांत पर बने चुटकुलों में कई अविश्वसनीय बातें कही जाती हैं और आप शायद सोच रहे होंगे कि ये भी वैसी ही कोई बात है। अगर ऐसा है तो आप गलत हैं। पिछले महीने तमिल, तेलगु, हिन्दी और अंग्रेजी में एक साथ रिलीज हुई रजनीकांत की फिल्म ‘कबाली’ ने ऐसी कई असंभव-सी बातों को संभव कर दिया है।

जी हाँ, चेन्नई की तमाम बड़ी-छोटी कम्पनियों ने जिस दिन कबाली रिलीज हुई उस दिन यानि 22 जुलाई को छुट्टी घोषित कर दी थी। दक्षिण भारतीय महानायक की इस फिल्म की माया कुछ ऐसी थी  कि मलेशिया, जहाँ फिल्म मलय भाषा में रिलीज हुई, की सरकार ने रजनीकांत के सम्मान में ‘कबाली स्टैम्प’ जारी किया, एक एयरलाइन कम्पनी ने स्पेशल ‘कबाली फ्लाइट’ लॉन्च की और पूरे हवाई जहाज को ‘रजनीमय’ कर दिया, गूगल प्ले ने ‘कबाली ऐप’ लॉन्च किया और केरल की कम्पनी मुथूट फिनकॉर्प ने खास ‘कबाली चांदी के सिक्के’ जारी किए जिन पर रजनीकांत अपने ‘कबाली’ अवतार में छपे हुए हैं।

इतना सब सुनने के बाद सहज रूप से उत्सुकता होती है कि आखिर ‘कबाली’ में ऐसा क्या है? क्या कहानी है इसकी? कैसा अभिनय, कैसा निर्देशन, कैसा गीत-संगीत है इसका? किस क्रिटिक ने इसके रिव्यू में क्या लिखा? वगैरह-वगैरह। पर जनाब जिस फिल्म को देखने के लिए फैन्स रात के तीन बजे से ही टिकट काउंटर पर लाईन लगा लें और फिल्म की रिलीज से पहले ही सिनेमाघर हाउसफुल हो जाएं उस फिल्म को किसी रिव्यू की क्या दरकार? रजनीकांत की फिल्म में लोग केवल रजनीकांत को देखने आते हैं, बाकी क्या, क्यों और कैसा है, उनके फैन्स को ये सोचने की ना तो जरूरत होती है, ना फुरसत।

वैसे पा रंजीत के निर्देशन में बनी इस फिल्म की कहानी टिपिकल रजनीकांत फिल्मों की तरह है जहाँ रजनी एक नेक दिल आदमी हैं और गरीबों, दीन-दुखियों की दिल खोलकर सेवा करते हैं। उनके इस काम के लिए पैसा कहाँ से आता है, इसका पता नहीं चलता लेकिन कुछ लोग उनको दबी जुबान में डॉन कहते हैं। इसके बाद कहानी फ्लैशबैक में जाती है और ‘कबाली द डॉन’ के ‘कबाली द समाजसेवी’ बनने तक का सफर सामने आता है। फिर एंट्री होती है एक चाईनीज बिजनेसमैन की जो हर गलत काम करता है और कबाली को बर्बाद कर देना चाहता है। क्या कबाली उसे रोक पाता है? आप ही बताएं, इसका जवाब भला किसे पता नहीं होगा? अपने इन्हीं ‘जवाबों’ से तो रजनीकांत अपने करोड़ों फैन्स को दशकों से लाजवाब करते आए हैं।

रजनीकांत अपने फैन्स को निराश नहीं करते और उससे भी बड़ी बात ये कि अगर निराश करना भी चाहें तो उनके फैन्स निराश नहीं होते। उनके एक-एक डायलॉग में वो अदा है जो आपको सीटी बजाने पर मजबूर कर देगी और हॉल का माहौल आपको ऐसा महसूस करा देगा मानो आप सदी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म देख रहे हैं। और फिर इससे आगे फिल्म की बॉक्स आफिस रिपोर्ट तो है ही जहाँ लगभग 700 करोड़ का करिश्माई आँकड़ा आपका इन्तजार कर रहा है।

पर क्या ‘कबाली’ और रजनीकांत की चर्चा केवल इन्हीं बातों के लिए होनी चाहिए? प्रश्न यह उठता है कि साधारण शक्ल-सूरत और मामूली कद-काठी का, दक्षिण भारतीय लोगों की किसी भी भीड़ में आसानी से  खो जा सकने वाले एक सांवले शख्स में ऐसा क्या है जो उसे इतना खास बनाता है? सच तो यह है कि 70 के दशक में पर्दे पर जिस दमन, अन्याय और भ्रष्टाचार से लड़कर अमिताभ बच्चन हिन्दी फिल्मों के महानायक बने, वही ‘लड़ाई’ रजनीकांत आज तक लड़ रहे हैं, 65 साल की उम्र में भी। रजनीकांत का ‘महानायकत्व’ साबित करता है कि आम लोग आज भी ‘व्यवस्था’ से किस कदर त्रस्त हैं, कि उन्हें आज भी ‘मुक्ति’ का कोई मार्ग नहीं दिखता, कि वे पर्दे पर ‘रजनीकांत’ बनकर और समाज के ‘गुनहगारों’ को सजा देकर खुश हो लेते हैं। जब तक आम लोगों को ‘रजनीकांत’ बनकर खुशी मिलती रहेगी, ‘कबाली’ कमाल करती रहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

 

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जीएसटी : अब तक का सबसे ‘बड़ा’ और ‘कड़ा’ आर्थिक सुधार

सालों लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार कल राज्य सभा में जीएसटी बिल पास हो गया। कुछ सुझावों और शंकाओं के बावजूद कांग्रेस समेत अन्य दलों के समर्थन के बाद जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (वस्तु एवं सेवा कर) को लागू करने के लिए जरूरी संविधान संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग गई। यह अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा आर्थिक सुधार है क्योंकि इससे पूरे देश में एक समान कर लगेगा। बता दें कि राज्य सभा से बिल पास हो जाने पर अब केन्द्र सरकार इस पर लोकसभा की सहमति जुटाएगी। इसके बाद कई और विधायी प्रक्रिया प्रक्रिया पूरी करनी होंगी और नियम-कानून को अंतिम रूप देना होगा। तब कहीं जाकर ये बिल अगले साल एक अप्रैल से व्यावहारिक धरातल पर उतर पाएगा।

बहरहाल, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स केन्द्र और राज्यों के 20 से ज्यादा अप्रत्यक्ष करों की जगह लेगा। इसके लागू होने पर एक्साइज, सर्विस टैक्स, एडिशनल कस्टम ड्यूटी, वैट, सेल्स टैक्स, मनोरंजन कर, लग्जरी टैक्स और ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स जैसे कई टैक्स खत्म हो जाएंगे। पूरे देश में एक समान टैक्स लागू होने से कीमतों का अंतर घटेगा।

सरकार और उद्योग जगत दोनों का ही मानना है कि जीएसटी लागू होने से पूरे देश में कारोबार करना आसान होगा, जिससे जीडीपी में कम-सेकम दो प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। पर जीएसटी से जुड़ा एक और पहलू महंगाई का है जिसे नज़रअंदाज करना मुश्किल है। सच ये है कि पूरी दुनिया में जब भी किसी क्षेत्र में समान बिक्री कर लागू किया गया वहाँ थोड़े समय के लिए महंगाई बढ़ी। भारत में भी इससे महंगाई बढ़ेगी ये तयप्राय है। हालांकि सरकार ने पेट्रोल-डीजल, बिजली और शराब को फिलहाल जीएसटी से अलग रखकर महंगाई बढ़ने की सम्भावना को यथासंभव कम करने की कोशिश की है। इसलिए शुरुआत में इसका सबसे अधिक असर सेवाओं पर होगा।

देखा जाय तो जीएसटी अभी तक संसद में एक तकनीकी बहस का मुद्दा भर रहा है लेकिन पास होने के बाद ये सड़क पर एक राजनीतिक मुद्दा बनेगा। खास कर तब जब केन्द्र की मोदी सरकार महंगाई को काबू में रखने और राज्यों की अपेक्षा पूरी करने में असफल होगी। कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम पहले ही कह चुके हैं कि अगर टैक्स की दरें 18 प्रतिशत से अधिक रहीं तो सड़क पर विरोध किया जाएगा।

सच तो ये है कि 18 प्रतिशत की दर भी बहुत सारी चीजों को महंगा बना देगी, जैसे बाहर खाना, फोन बिल, सिनेमा और इसी तरह की कई सेवाएं। कहने की जरूरत नहीं कि ये सारी चीजें उच्च मध्यवर्ग को सीधे चुभेंगी और समग्र महंगाई में योगदान करेंगी सो अलग। आने वाले समय में जीएसटी भारत का एक विवादित विषय बन जाए तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं। लेकिन फिलहाल वित्त मंत्री अरुण जेटली और सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी के लिए इस साहसिक कदम पर बधाई तो बनती ही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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प्रेमचंद का ‘गोदान’ समझना हो तो होरी संग जरूरी है धनिया

हर बड़े रचनाकार के साथ मुख्यत: उसकी एक कृति का नाम जुड़ा होता है। वह कृति एक तरह से उस रचनाकार की, उसकी संवेदना, उसके विचार, उसके सम्पूर्ण कृतित्व की प्रतिनिधि, या यूँ कहें, पर्याय हो जाती है। तुलसीदास के साथ ‘रामचरितमानस’, कालिदास के साथ ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’, शेक्सपियर के साथ ‘हैमलेट’, टॉलस्टॉय के साथ ‘कामायनी’, टैगोर के साथ ‘गीतांजली’, प्रसाद के साथ ‘कामायनी’ और प्रेमचंद के साथ ‘गोदान’ का नाम इसी तरह से जुड़ा है। ‘गोदान’ प्रेमचंद की सर्वोत्तम कृति और हिन्दी के उपन्यास-साहित्य के विकास का उज्जवलतम प्रकाश-स्तंभ है। सच्चे अर्थों में यह उपन्यास भारतीय ग्राम्यजीवन और कृषि संस्कृति का ‘महाकाव्य’ है जिसका नायक है होरी और धनिया इसकी नायिका।

इसमें कोई दो राय नहीं कि होरी ‘गोदान’ की ‘आत्मा’ है लेकिन प्रेमचंद ने उस ‘आत्मा’ की ‘काया’ धनिया के सहारे ही गढ़ी है। ‘गोदान’ में प्रेमचंद जो होरी के माध्यम से नहीं कह पाए उसे उन्होंने धनिया के द्वारा अभिव्यक्ति दी है। अगर कहा जाय कि धनिया गोदान की ‘पूर्णता’ है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। स्वयं होरी के शब्दों में “धनिया सेवा और त्याग की देवी ; जबान की तेज पर मोम जैसा हृदय ; पैसे-पैसे के पीछे प्राण देने वाली, पर मर्यादारक्षा के लिए अपना सर्वस्व होम कर देने को तैयार” रहने वाली नारी है।

धनिया सच्चे अर्थों में ‘अर्द्धांगिनी’ है। चाहे जो कुछ हो जाय, वह होरी का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। उसमें ना तो होरी जैसी व्यवहारकुशलता है और ना वह लल्लो-चप्पो ही करना जानती है, पर अपने संकल्पित आचरण द्वारा वह होरी की सहायता करती है, उसे डगमगाने से बचाती है, ढाढ़स देती है। हाँ, सुनाती भी खूब है। आवेग में वह कभी-कभी अदूरदर्शितापूर्ण कार्य कर जाती है, पर तत्कालीन सामंती परिवेश में भी वह निर्भीक और निडर है, ये बड़ी बात है। उसमें प्रतिशोध-भावना है, जो होरी में नहीं है, पर कोमल भी वह उतनी ही है। तभी तो किसी की पीड़ा देख उसका आक्रोश दब जाता है।

‘गोदान’ में भारतीय किसान के संपूर्ण जीवन का जीता-जागता चित्र उपस्थित किया गया है। उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसे सहलाता, क्लेश और वेदना को झुठलाता,  ‘मरजाद’ की झूठी भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता,  तिल-तिल शूलों भरे पथ पर आगे बढ़ता,  भारतीय समाज का मेरुदंड यह किसान कितना विवश और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। होरी उसी भारतीय किसान का प्रतिनिधि चरित्र है। उसे हम पग-पग पर परिस्थितियों से दबते और समझौतों में ढलते देख सकते हैं लेकिन धनिया ऐसी कतई नहीं। वह जिस बात को ठीक समझती है, उसे जात-बिरादरी, समाज, कानून आदि की परवाह किए बिना करती है। कभी-कभी तो वह अपने आचरण द्वारा गाँव की ‘नाक’ तक रख लेती है।

एक नारी की भाँति धनिया मातृ-भावना और स्नेह से परिपूर्ण है। वह होरी की ऐसी ‘परछाई’ है जो उसकी ‘रिक्तता’ को भर देती है। होरी अगर भारतीय किसान का प्रतीक है तो धनिया कृषक-पत्नी की प्रतिनिधि। सच तो ये है कि धनिया के बिना ना तो किसी ‘होरी’ की परिकल्पना की जा सकती है, ना किसी किसान के घर की और ना ही भारत के ग्रामीण जीवन की। कुल मिलाकर, अगर धनिया नहीं होती तो प्रेमचंद को पूर्णता देनेवाला ‘गोदान’ भी ना होता। अगर होता भी तो वो नहीं होता जो अब है। इस तरह कहना गलत ना होगा कि प्रेमचंद, गोदान और होरी – तीनों की ‘पूर्णता’ है धनिया।

मधेपुरा अबतक के लिए रूपम भारती से साभार

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लालू, मांझी और यूपी का हासिल

यूपी चुनाव को लेकर बिहार के दो बड़े नेताओं ने अपना-अपना ‘स्टैंड’ स्पष्ट कर दिया। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने जहाँ महागठबंधन के शेष दो साथियों – जेडीयू और कांग्रेस – से अपना रास्ता अलग करते हुए यूपी चुनाव से दूर रहने का फैसला किया (और फिर तेजस्वी ने अखिलेश यादव के काम की सराहना करते हुए सपा को समर्थन देने की बात कही), वहीं ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने भी अपने गठबंधन (एनडीए) से अलग रास्ता अख्तियार किया, यूपी में अकेले लड़ने का फैसला कर।

कहने वाले भले ही कहें कि लालू ने यूपी में चुनाव ना लड़ने का फैसला कर मुलायम से अपनी रिश्तेदारी निभाई, लेकिन सच यह है कि उन्होंने बड़ा ही परिपक्व निर्णय लिया है। उन्हें पता था कि यूपी में उनकी ‘हैसियत’ उससे अधिक नहीं जितनी मुलायम की बिहार में है। ऐसे में वो अधिक-से-अधिक ‘वोटकटवा’ की भूमिका ही निभा सकते थे वहाँ। यूपी की मृग-मरीचिका में बिना भटके ही उन्हें यह कहने का मौका भी मिल गया कि भाजपा-विराधी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने ये फैसला किया। अच्छा है कि लालू नीतीश की तरह किसी ‘मुगालते’ के शिकार नहीं हुए। अपने कद को अखिल भारतीय करने के ‘मद’ में नीतीश ये मानने को तैयार ही नहीं कि यूपी में उनकी ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की’।

बहरहाल, नीतीश के लड़ने और लालू के ना लड़ने की बात तो समझ में आती है लेकिन मांझी ने किस गलतफहमी का शिकार हो यूपी जाने की सोची, ये समझ के परे है। बिहार में तो बमुश्किल अपनी सीट बचा पाए वो, यूपी में जाने क्या मिलने वाला है उन्हें! हाँ, यूपी के बिहार से सटे कुछ इलाकों में दलित वोटों के मामले में उनकी स्थिति कुछ-कुछ वैसी जरूर मानी जा सकती है जैसी कोसी के इलाके में यादव वोटों के मामले में जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव की। तो क्या यूपी में वो भाजपा के हक में उसके साथ दोस्ताना मैच खेल रहे हैं, जैसे पप्पू ने खेला था बिहार में?

वैसे मांझी का ये दोस्ताना मैच मुलायम के लिए भी हो सकता है और इसके दो बड़े स्पष्ट कारण हैं। पहला ये कि यूपी को जीतने के लिए मायावती के वोटबैंक में सेंध लगाने की जरूरत भाजपा से कहीं अधिक सपा को है और दूसरा ये कि उन्हें इस ‘मैच’ के लिए तैयार करने की खातिर मुलायम के समधी लालू हैं यहाँ। मांझी के लिए लालू का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ महागठबंधन के जन्मकाल से ही जगजाहिर है।

खैर, बिहार के इन नेताओं को यूपी से क्या हासिल होगा, ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन यूपी के चुनाव ने बिहार के दो बड़े गठबंधनों की गांठ ढीली कर दी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या रसूखवालों के लिए ही बना है न्याय ?

“समरथ को नहिं दोष गोसाईं” – तुलसीदासजी की कही ये बात आज अगर सबसे ज्यादा लागू होती है तो हमारी न्यायपालिका पर। सामर्थ्यवान लोग आए दिन हमारी न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाते हैं और हम मूकदर्शक बने रहते हैं। अब सलमान खान का चिंकारा मामला ही लीजिए। बॉलीवुड का ये सुपर स्टार आखिरकार चिंकारा मामले में भी बरी हो ही गया। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले से सलमान को बड़ी राहत दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चिंकारा के शिकार में बरामद गोलियां उनकी लाइसेंसी बंदूक से नहीं चलाई गई थी। शिकार के लिए जिस जीप का इस्तेमाल किया गया था उसके ड्राईवर के ‘लापता’ होने की वजह से भी अभियोजन के पक्ष को कमजोर माना गया।

बता दें कि सलमान खान के खिलाफ 26-27 सितम्बर को 1998 को भवाद गांव में दो चिंकारा और 28-29 सितम्बर 1998 में मथानिया (घोड़ा फॉर्म) में एक चिंकारा के शिकार के संबंध में वन्य जीव संरक्षण की धारा 51 के तहत मामले दर्ज किए गए थे। निचली अदालत (सीजेएम) ने उन्हें दोनों मामलों में दोषी ठहराते हुए 17 फरवरी 2006 को एक साल और 10 अप्रैल 2006 को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई थी। सजा के खिलाफ सलमान खान ने हाईकोर्ट में अपील की थी। गौर करने की बात है कि जिस ‘संदेह’ के आधार पर निचली अदालत ने सलमान को सजा सुनाई थी, उसी ‘संदेह’ का लाभ हाईकोर्ट ने सलमान को देते हुए उन्हें मामले में बरी कर दिया।

हिरण के शिकार में इस्तेमाल की गई जिप्सी के ड्राईवर ने मजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा 164 में अपना बयान भी दर्ज करवाया था। लेकिन, इसका क्रॉस एग्जामिनेशन नहीं होने पर अदालत ने उस बयान को खारिज कर दिया। पुलिस के छापे में सलमान खान के कमरे में पहले तो कोई हथियार नहीं मिला और बाद में बरामदगी में एयरगन को दिखाकर खुलेआम कानून के साथ आंखमिचौली खेली गई। हद तो तब हो गई जब बरामदगी में एक ऐसे चाकू को दिखाया गया जिससे हिरण का गला काटा जाना संभव ही नहीं था। ऊपर से सलमान खान के हथियार के लाइसेंस को एक्सपायर्ड बताते हुए उन पर मामूली आर्म्स एक्ट का मुकदमा किया गया।

चिंकारा मामले में फैसले के आते ही लोगों के बीच ये सवाल फिर से उठने लगा है कि क्या न्याय ऊंची रसूख और पहुंच वाले लोगों के लिए ही बना है? जबकि गरीबों को इसके लिए बार-बार पैर घसीटने होते हैं। अदालतों के चक्कर लगा-लगाकर उनकी जिंदगी बीत जाती है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस वी. एन. खरे ने खुद स्वीकार किया था कि हमारे देश में गरीबों के लिए न्याय के रास्ते करीब-करीब बंद हो चुके हैं। उन्होंने कहा था कि बिना पैसों के अदालत की ओर देखना भी गुनाह है।

सलमान खान के केस में जिस तरह से सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई और उन्हें तोड़ा-मरोड़ा गया वो पूर्व जस्टिस के बयान की पुष्टि करता है। इस मामले में जिस तरह न्याय का मजाक उड़ाया गया उस पर सोशल मीडिया में खुलकर सवाल उठाये जा रहे हैं। ऊंची पहुंच वाले लोगों के मामले में आज जिस प्रकार न्यायपालिका अपना काम कर रही है वो आम लोगों के मन में उसकी प्रतिष्ठा को तो कम करता ही है, निष्पक्ष न्याय को लेकर आशंका और अविश्वास को भी बल देता है। अगर समय रहते हम नहीं संभले तो इसके दूरगामी परिणाम निश्चित तौर पर बहुत घातक होंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मुमकिन नहीं कलाम के ‘कद’ और ‘हद’ की कल्पना

महान वैज्ञानिक… बेमिसाल शिक्षक… मिसाईलमैन… पोखरण के नायक… भारतरत्न… भारतीय गणतंत्र के भूतपूर्व राष्ट्रपति… ईमानदारी से बतायें, क्या ये सारे विशेषण मिलकर भी एक कलाम को पूरा परिभाषित कर पाएंगे..? नहीं… बिल्कुल नहीं। सच तो यह है कि इनमें से कोई एक विशेषण भी किसी को गौरवान्वित करने के लिए काफी है, और जब ये सारे विशेषण मिलकर भी किसी एक व्यक्ति को परिभाषित ना कर पा रहे हों तो उसके ‘कद’ और उसकी ‘हद’ की कल्पना क्या की जा सकती है..?

“पृथ्वी को रहने लायक कैसे बनाया जाय” विषय पर बोलते-सोचते इस महामानव ने आज ही के दिन ये पृथ्वी छोड़ दी थी। उनके जाने से बना शून्य शायद ही भर पाए। बुद्ध, गांधी, मार्क्स, आईंस्टाईन और कलाम जैसे महामानव रोज-रोज नहीं आते। इन रत्नों को ईश्वर सहेज कर रखते हैं और बड़े मौके पर इन्हें धरती पर भेजते हैं। ऐसे लोग आते हैं और सदियों का अंधेरा दूर कर जाते हैं। बल्कि कहना तो ये चाहिए कि कलाम जैसे लोग रोशनी को भी रोशनी दिखा जाते हैं। आज जहाँ ‘मनुष्यता’ दिन-ब-दिन अपनी शर्मिन्दगी के बोझ तले दबती जा रही है वहाँ किसी ‘कलाम’ की ही बदौलत एक मनुष्य के रूप में हम सिर उठा पाते हैं।

कलाम आज बेशक सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हमारी सोच, हमारे सपनों से उन्हें भला कौन दूर कर सकता है! हमारी आनेवाली पीढ़ियां जब अपना लक्ष्य तय करेंगी, तब कलाम ही टोक रहे होंगे कि “छोटा लक्ष्य एक अपराध है”… और जब-जब हम आँखें बन्द कर सपने देखेंगे, तब कलाम ही हमें बता रहे होंगे कि “सपने वो नहीं जो हम बंद आँखों से देखते हैं, सपने तो वो हैं जो हमें सोने नहीं देते”। फेल (FAIL) को फर्स्ट अटेम्प्ट इन लर्निंग, एंड (END) को एफर्ट नेवर डाइज और नो (NO) को नेक्स्ट अपॉर्चुनिटी कहने का जीवन-दर्शन हमें कलाम से ही मिल सकता है और सफलता की गूढ़ पहेली कलाम ही इतनी आसानी से सुलझा सकते हैं कि “सफलता का रहस्य सही निर्णय है, सही निर्णय अनुभव से आता है और अनुभव गलत निर्णय से मिलता है।”

कलाम को किसी भी कोण से देख लें, देखने वाले का धन्य हो जाना तय है। गीता का कर्मयोग समझना हो तो कलाम के जीवन में एक बार झांक लेना काफी होगा। ‘स्थितप्रज्ञ’ होना क्या होता है इसे समझने के लिए कलाम से बेहतर उदाहरण हो नहीं सकता। सादगी और सहजता कितनी बड़ी पूंजी है गांधी के बाद किसी ने समझाया तो वो कलाम ही थे। जीवन का हर पल कैसे साधना का पर्याय हो सकता है इसकी गवाही तो उनके जीवन का आखिरी पल भी दे गया था।

कलाम जैसों के जीवन का हर पल संदेश है मानव-जाति के लिए। उन्होंने सिर्फ कहा नहीं कि “आप सूर्य की तरह चमकना चाहते हैं, तो आपको पहले सूर्य की तरह ही जलना भी होगा“, बल्कि सूर्य की तरह जलकर, फिर चमककर दिखाया भी। जिस सत्य को कलाम ने जिया नहीं, उसे उन्होंने कहा नहीं। फिर भी पूरे जीवन में उन्होंने एक झूठ जरूर बोला और वो ये कि “किसी को हरा देना बेहद आसान है, लेकिन जीतना बेहद मुश्किल”। आप ही बताएं, जिस शख्स ने बिना किसी को हराए पूरी कायनात जीत ली हो, उसकी ये बात सच मानी भी जाए तो कैसे?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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