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अटल बिहारी वाजपेयी : गरिमा और गौरव के 92 वर्ष

अटल बिहारी वाजपेयी, ये नाम न केवल भारतीय राजनीति के उन कुछ नामों में एक है जो जनमानस में गहरी पैठ रखता है, बल्कि यह भारत के सम्पूर्ण इतिहास के उन चंद नामों में शुमार है जिन्हें सहयोगियों के समान ही विरोधियों का भी विश्वास और आदर हासिल रहा है। यह उनका करिश्माई व्यक्तित्व ही था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े होने के बावजूद उनकी धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी छवि अक्षुण्ण रही और भाजपा संघर्ष की पगडंडियों से प्रशस्त राजपथ तक पहुँची। 25 दिसंबर 1924 को गवालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी आज अपने जीवन के 92 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं। गरिमा और गौरव से भरे 92 वर्ष, जिनका एक-एक पल किसी धरोहर से कम नहीं हमारे लिए।
वाजपेयी की जीवन-यात्रा एक ऐसे व्यक्तित्व का सफरनामा है, जिसने अपनी हर सांस के साथ भारतीय सभ्यता, संस्कृति, समाज और राजनीति को जिया और उसमें अपना निर्णायक योगदान दिया। उनकी लोकप्रियता दलगत सीमाओं से परे थी। यह उनके व्यक्तित्व का ही सम्मोहन था कि भाजपा के साथ उस समय नए सहयोगी दल जुड़ते गए, जब बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भाजपा अपने दक्षिणपंथी झुकाव के कारण राजनीतिक रूप से ‘अछूत’ मानी जाती थी।
वाजपेयी के लंबे राजनीतिक जीवन में एक अनोखी निरंतरता है, जो उन्हें जय-पराजय से कहीं ऊँचा उठा देती है। वह आलोचनाओं की ओर नहीं, अपने लक्ष्य की ओर देखते थे। वह जब चाहते, विपक्ष का इस्तेमाल कर लेते। विपक्षियों को भी उनके दरवाजे पर दस्तक देने में संकोच नहीं होता। वह स्वीकार्यता की सियासत करते थे, प्रतिरोध की नहीं। यह अकारण नहीं कि भारत को पहली बार छह-सात प्रतिशत की स्थिर जीडीपी ग्रोथ उन्हीं के वक्त में हासिल हुई।
कश्मीर आज की तरह तब भी बड़ी समस्या थी लेकिन वाजपेयी ने युक्तिपूर्वक कश्मीर को देश की मुख्यधारा से जोड़ने में बहुत हद तक कामयाबी हासिल कर ली थी। वे जानते थे कि ऐसा पाकिस्तान से दोस्ती के बिना संभव नहीं। साथ ही उन्हें यह भी मालूम था कि पड़ोसी सिर्फ मोहब्बत की भाषा नहीं समझता। इसीलिए 1998 में दोबारा सत्ता संभालने के दो महीने के भीतर पोखरण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने संदेश दिया कि भारत दोस्ती का तलबगार है, पर आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं। वह कभी झुकेगा नहीं। कंधार, कारगिल और संसद पर हमले के बावजूद उन्होंने सुलह की कोशिश नहीं छोड़ी। अगर आगरा शिखर-वार्ता सफल हो गई होती, तो यकीनन इस महाद्वीप की किस्मत बदल जाती। हालांकि यह वार्ता सिरे तक क्यों नहीं पहुँची, यह आज भी रहस्य है।
आज सड़क-यात्रा के शौकीन जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक फर्राटा भरने की ख्वाहिश व्यक्त करते हैं, तो एक बार फिर वाजपेयी याद आते हैं। कश्मीर को कन्याकुमारी से और कामाख्या को द्वारिका से जोड़ने का काम उनकी ‘स्वर्णिम चतुर्भुज योजना’ ने किया और उनके द्वारा लागू की गई ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ देश के यातायात को सुगम बनाने और हमारे विकास को गति देने में कितनी बड़ी भूमिका अदा कर रही है, यह कोई कहने की बात नहीं।
बीमारी ने आज इस प्रखर कवि और ओजस्वी वक्ता की वाणी और स्मृति पर कब्जा जमा लिया है। आज भाजपा के मोदीयुग की बात की जा रही है, पर देश और दुनिया को जब भी समग्रता में देखने की बात आएगी, तब मोदी को वाजपेयी बनकर ही सोचना और देखना होगा। मोदी भाजपा को विस्तार चाहे जितना दे लें, आधार वाजपेयी ही हैं और वाजपेयी ही रहेंगे। भारत-रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्मदिवस पर ‘मधेपुरा अबतक’ की ढेरों मंगलकामनाएं।

चलते-चलते

हम ये न भूलें कि आज भारत-रत्न मदन मोहन मालवीय की जयंती भी है। उन्हें हमारा शत-शत नमन।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अब माता-पिता की जगह गुरु का नाम लिख सकेंगे साधु और संन्यासी

केन्द्र सरकार ने साधु और संन्यासियों को एक बड़ी राहत दी है। अपनी जड़ों से वंचित ये लोग पासपोर्ट की अर्जी दाखिल करते समय फॉर्म में अपने माता-पिता के नाम की जगह अपने धार्मिक गुरु का नाम लिख सकते हैं। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को पासपोर्ट संबंधी नए नियमों की घोषणा की जिसमें इन लोगों को यह राहत दी गई।

मंत्रालय ने यह घोषणा करते हुए कहा है कि संत और संन्यासी अपने माता-पिता की जगह अपने गुरु का नाम लिखकर पासपोर्ट की अर्जी दाखिल कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए उन्हें एक सार्वजनिक दस्तावेज दिखाना होगा। इन दस्तावेजों में मतदाता परिचय पत्र, पैन कार्ड, आधार कार्ड आदि शामिल हैं, जिनमें उनमें गुरु का नाम उनके माता-पिता वाली जगह पर हो।

मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नए नियम नई जीवन-शैली और पारिवारिक मान्यताओं को दर्शाने वाले हैं। उदाहरण के तौर पर मंत्रालय ने अर्जी देने वाले को माता-पिता में से किसी एक का नाम देने की भी इजाजत दे दी है। अभी तक माता-पिता दोनों का नाम दिया जाना अनिवार्य था।

नए नियमों की घोषणा करते हुए विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने कहा कि साधु-संतों को लेकर दो मुद्दे थे। पहला सवाल उनके माता-पिता का था और दूसरा जन्मतिथि प्रमाण-पत्र का, जिसे उन्हें वैसे भी नए दस्तावेजों के तहत जमा करना होगा। मुख्य पासपोर्ट अधिकारी अरुण चटर्जी ने कहा कि यह इन लोगों की लंबे समय से लंबित मांग थी जिसे अब मंत्रालय ने मंजूर कर लिया है।

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और रामानुजन की माँ ने चुना ‘अल्पायु’ लेकिन ‘असाधारण’ बेटे का विकल्प

कल्पना कीजिए कि आज से 129 साल पहले ज्योतिष में विश्वास रखने वाली भारत की एक धर्मपरायण माँ जिसे उसके बेटे के बारे में कहा जाय कि उसकी जन्मपत्री में दो बाते हैं – पहली, वह एक दिन दुनिया भर में नाम कमाएगा लेकिन उसकी उम्र कम होगी या दूसरी, वह अपना पूरा जीवन जियेगा लेकिन एक साधारण व्यक्ति की तरह और वह माँ बिना किसी दुविधा के पहले विकल्प को चुने, वह कितनी असाधारण होगी! और जब माँ ऐसी हो तो आश्चर्य नहीं कि उसकी संतान रामानुजन हो। जी हाँ, मात्र 33 वर्ष की अल्पायु पाने वाले महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन, आज के कम्प्यूटर युग में भी जिनकी असाधारण प्रतिभा के आगे पूरी दुनिया सिर झुकाती है।
आपको आश्चर्य होगा कि तमिलनाडु के कोयंबटूर में 22 दिसंबर 1887 को जन्मे रामानुजन की गणित के प्रति ऐसी दीवानगी थी कि बाकी विषयों में वे फेल हो गए और उच्च शिक्षा से वंचित रह गए। इस तरह उन्होंने गणित खुद से सीखा और जीवन भर में गणित के 3384 प्रमेयों का संकलन किया, जिनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किए जा चुके हैं। रामानुजन बचपन से ही जिज्ञासु थे और उनकी जिज्ञासा आम बच्चों से बिल्कुल हटकर थी। संसार का पहला इनसान कौन था, आकाश और पृथ्वी के बीच की दूरी कितनी है, समुद्र कितना गहरा और बड़ा होता है जैसे प्रश्न बालक रामानुजन को परेशान करते और ऐसे प्रश्नों को पूछ-पूछ कर वे अपने शिक्षक की नाक में दम करते।
एक बार की बात है, इनके शिक्षक कक्षा में गणित पढ़ाने के क्रम में बता रहे थे कि अगर किसी संख्या को उसी संख्या से भाग दें तो उसका उत्तर 1 (एक) आएगा। ये सुनकर सभी छात्र संतुष्ट हो गए सिवाय रामानुजन के। उन्होंने तपाक से पूछा कि अगर शून्य को भी शून्य से भाग दें तो क्या उत्तर एक ही आएगा? ये सुनकर उनके शिक्षक का दिमाग चकरा गया। रामानुजन के इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं था। होता भी कैसे? घोर जिज्ञासु रामानुजन का ये सवाल उनकी उम्र से बहुत आगे का था।
26 अप्रैल 1920 को तपेदिक की बीमारी से इस विलक्षण प्रतिभाशाली गणितज्ञ का निधन हो गया। उनको गए सौ साल होने को आए लेकिन गणित के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कई कार्य अभी भी वैज्ञानिकों के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं। 33 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने गणित को जितना साध लिया था उतने के लिए सदियां भी कम हैं। उनके सम्मान में 2012 से हर वर्ष आज के दिन को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है। आर्यभट्ट की परंपरा को आगे बढ़ाकर भारत का गौरव बढ़ाने वाले इस गणितज्ञ को उनकी जयंती पर ‘मधेपुरा अबतक’ का नमन।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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दुनिया को बदलेंगे ये तीन किशोर

ब्रिटिश समाचार वेबसाइट ‘द गार्जियन’ ने दुनिया भर के 25 किशोरों की सूची तैयार की है। ये किशोर कलाकार, खिलाड़ी, वैज्ञानिक और उद्यमी हैं जो अपने कौशल से दुनिया में बदलाव ला सकते हैं। इन किशोरों में कुछ ने कम उम्र में ही महत्वपूर्ण आविष्कार किए हैं। हम भारतीयों के लिए गर्व की बात है कि इस विशिष्ट सूची में तीन भारतीय मूल के किशोर भी शामिल हैं। अमेरिका के पेंसिलवेनिया में रहने वाले मिहिर गारीमेला, कैलिफोर्निया में रह रहे शुभम बनर्जी और सुरे में रह रहे नित्यानंदम को उनके नायाब आविष्कारों के लिए सराहा गया है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की छोटी बेटी साशा ओबामा की भी उनके सामाजिक कार्यों के लिए प्रशंसा की गई है।
मिहिर गारीमेला
10वीं में पढ़ने वाले 16 वर्षीय मिहिर ने एक रोबोट तैयार किया है। इस रोबोट में मधुमक्खियों की आवाज़ की तरह साउंड सिस्टम लगाया गया है। यह रोबोट मक्खियों की तरह ही हर बाधा को पार कर उड़ने में सक्षम है। इसका इस्तेमाल बचाव कार्यों और आपदा प्रबंधन में किया जा सकता है। मिहिर को उनके आविष्कार के लिए साल 2014 का गूगल कम्प्यूटर साइंस अवार्ड मिल चुका है। मिहिर एक गणितीय रोबोटिक वायलिन पर भी काम कर रहे हैं जो दिमाग के इलाज के समय डॉक्टरों की मदद कर सकता है।
शुभम बनर्जी
15 वर्षीय शुभम ने स्कूल साइंस प्रोजेक्ट के तहत खेल में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के लीगो ब्रिक्स से दृष्टिबाधितों के लिए ब्रेल प्रिंटर तैयार किया है। उनकी इस खोज ने दृष्टिबाधित लाखों लोगों के लिए कम्प्यूटर का इस्तेमाल आसान कर दिया। ब्रेल प्रिंटर से इंटरनेट या कम्प्यूटर पर टाइप की हुई चीजें ब्रेल लिपि में प्रिंट हो सकती हैं।
नित्यानंदम
15 साल के नित्यानंदम ने अल्जाइमर बीमारी का पता लगाने के लिए एक नया एंटीबायोटिक तैयार किया है। इस एंटीबायोटिक की मदद से 10 साल पहले ही अल्जाइमर का पता लग सकता है। एंटीबायोटिक में मौजूद फ्लूरोसेंट के कण दिमाग की परत को स्कैन कर भविष्य में होने वाले अल्जाइमर का पता लगा लेते हैं। नित्यानंदम के मुताबिक उनकी खोज उन माता-पिता के लिए कारगर है जिनके बच्चे को अल्जाइमर का खतरा हो सकता है। वे पहले ही अपने बच्चे का इलाज शुरू कर सकते हैं और समय रहते इस बीमारी से रक्षा हो सकती है। नित्यानंदम को इस खोज के लिए 2015 का गूगल साइंस फेयर प्राइज भी मिल चुका है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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इंग्लैंड को फिर धूल चटाई भारत ने

विजय-रथ पर सवार भारत ने इंग्लैंड को चेन्नै टेस्ट में एक पारी और 75 रन से हराकर 5 मैचों की टेस्ट सीरीज पर 4-0 से कब्जा कर लिया। इस मैच में तिहरा शतक जड़ने वाले करुण नायर को ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया, वहीं सीरीज में 655 रन बनाने वाले कप्तान विराट कोहली ‘मैन ऑफ द सीरीज’ घोषित किए गए।
भारत ने मंगलवार को इंग्लैंड की दूसरी पारी को महज 207 रनों पर समेट दिया। भारत की ओर से इस पारी में रवीन्द्र जडेजा ने 7 विकेट लिए। चेन्नै टेस्ट में जडेजा के नाम कुल 10 विकेट रहे। इससे पहले इस मैच में भारत ने अपनी पहली पारी 7 विकेट पर 759 रन बनाकर घोषित की थी। इस पारी में करुण नायर ने नॉट आउट 303 रन बनाए, वहीं एक रन से दोहरा शतक चूक गए ओपनर केएल राहुल ने 199 रन बनाकर भारत की मजबूत बुनियाद रखी।
इस मैच के बाद भारतीय कप्तान विराट कोहली टेस्ट मैचों में अजेय रहने के मामले में पूर्व कप्तान कपिल देव से आगे निकल गए हैं। कपिल की कप्तानी में टीम इंडिया सितंबर 1985 से मार्च 1987 के बीच 17 टेस्ट मैच तक अजेय बनी रही। जबकि विराट कोहली की यह टीम 18 मैचों से अजेय है। इसके साथ ही टीम इंडिया टेस्ट रैंकिंग में नंबर 1 के पायदान पर भी बुलंदी के साथ काबिज है।
भारत के लिए यह सीरीज हर लिहाज से शानदार रही। करुण नायर और जयंत यादव जैसे खिलाड़ी इसी सीरीज की खोज हैं। कोहली, नायर और राहुल की शानदार बल्लेबाजी, आर अश्विन के लाजवाब 28 विकेट और जडेजा एवं यादव के ऑलराउड खेल के लिए यह सीरीज लम्बे समय तक याद रखी जाएगी। वैसे इस सीरीज में टीम इंडिया का शायद ही कोई खिलाड़ी हो जिसने किसी-न-किसी पारी में यादगार योगदान न दिया हो।

“मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश की शराबबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अहम फैसले के तहत सभी हाइवे पर शराब की बिक्री पर रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की बेंच द्वारा दिए गए इस फैसले में कहा गया है कि सभी राज्यों में नेशनल हाइवे पर या उसके आसपास पड़ने वाली शराब की दुकानों के लाइसेंस खत्म कर दिए जाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से बिहार के सत्तारूढ़ महागठबंधन में खुशी की लहर है। खास तौर पर जेडीयू के नेताओं का उत्साह देखते ही बनता है। पार्टी इसे अपने मुखिया नीतीश कुमार की शराबबंदी मुहिम पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर मान रही है।

बहरहाल, बता दें कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी नेशनल हाइवे और स्टेट हाइवे पर शराब की दुकानें पूरी तरह से बंद करवाने के लिए अगले साल एक अप्रैल तक की समयसीमा तय की गई है। इन शराब की दुकानों का एक अप्रैल के बाद रिन्युअल नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद जेडीयू में जैसे नई जान आ गई है। पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने कोर्ट के फैसले की सराहना करते हुए कहा कि पार्टी ने शराबबंदी का फैसला किया और तमाम आलोचनाओं के बावजूद आज भी अडिग है। कोर्ट ने भी माना है कि शराबबंदी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की मुहिम रंग ला रही है और हम इस फैसले से बहुत ही खुश हैं। हमारे फैसले को संवैधानिक स्वीकृति मिली है।

उत्साह से लबरेज जेडीयू नेता व प्रवक्ता संजय सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर कहा कि बिहार सरकार की नीतियों पर अब पूरे देश को चलना होगा। अब केन्द्र की सरकार को भी शराबबंदी पूरे देश में लागू करने के लिए सोचना होगा। आरजेडी नेता और बिहार सरकार के मंत्री आलोक मेहता ने भी फैसले की तारीफ की और कहा कि लोग शराब पीकर हाइवे पर गाड़ी चलाते थे और दुर्घटना के शिकार होते थे। शराब हाइवे पर होने वाली दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी वजह थी। आज कोर्ट ने दुर्घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए अच्छा फैसला दिया है। अब बिहार सरकार की शराबबंदी की मुहिम आन्दोलन का रूप लेगी।

आगे जो भी हो, कोर्ट के इस फैसले के बाद नीतीश के हौसले में अनगिनत पर लग गए होंगे, इसमें कोई दो राय नहीं। अब अपनी भावी योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए वो दोगुनी ताकत से लगेंगे। कहने की जरूरत नहीं कि इसके बाद राज्य और देश में कई समीकरण बनेंगे और कई बिगड़ेंगे, जिन पर राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र होगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिग बी ने बताई सोशल मीडिया पर आने की ‘शर्त’

“अगर आप लोगों का गुस्सा, गालियां और तंज झेलने के लिए तैयार नहीं हैं तो आपको सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नहीं आना चाहिए।” यह कहना है बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का। बकौल अमिताभ आलोचना से अपना मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है, इसीलिए वे आलोचना को सकारात्मक तरीके से लेते हैं।
गौरतलब है कि बिग बी सोशल मीडिया के जरिए अपने फैंस से लगातार सम्पर्क बनाए रखते हैं। फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग के माध्यम से अपने प्रशंसकों को लगातार अपडेट करते रहते हैं। सोशल मीडिया को लेकर उम्र के 75वें पड़ाव पर वे जितने उत्सुक, उत्साहित, सजग और सक्रिय हैं उतना आज की पीढ़ी के कलाकार भी नहीं। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान वे और करन जौहर प्रशंसकों और मीडिया से बातचीत कर रहे थे। उस दौरान बॉलीवुड के शहंशाह ने मीडिया, सोशल मीडिया और फिल्मों में अपनी भूमिका को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि अगर आप लोगों का गुस्सा झेलने और ‘ट्रॉल’ किए जाने के लिए तैयार नहीं हैं तो आपको सोशल मीडिया पर नहीं आना चाहिए।
फिल्म को हिट बनाने के फॉर्मूले पर अमिताभ बच्चन का कहना है कि इतने साल काम करने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया हूँ कि कौन-सी फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी और कौन-सी नहीं। इसलिए मैं सिर्फ अपने काम को बेहतर करने का प्रयास करता हूँ। जरूरी होता है तो लेखक-निर्देशक से सलाह-मशविरा कर लेता हूँ।
अपने भीतर झाँकते रहना और जरूरी परिवर्तन करना यानि समय के साथ चलना, थोड़ा उसमें ढलना और थोड़ा उसे अपने अनुसार ढाल लेना – अमिताभ बच्चन या उन जैसी किसी भी सफल शख्सियत की सफलता की ये सबसे बड़ी कुंजी रही है। अमिताभ अपने जीवन में आने-वाले तमाम उतार-चढ़ाव के बीच इस एक कुंजी को थामे रहे हैं, इसीलिए आज वे अपने जैसे अकेले हैं, सदी के सैकड़ों नायकों के बीच अकेले महानायक हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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‘द नेशन हैज लॉस्ट एन आइकन’

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और वहाँ की सबसे लोकप्रिय नेता जे जयललिता का सोमवार रात 11.30 बजे निधन हो गया। रविवार को उनकी हृदयगति रुक जाने के बाद से विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक बड़ी टीम उनके इलाज में जुटी हुई थी, लेकिन हर संभव कोशिश और लाखों लोगों की दुआओं के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। बता दें कि जयललिता बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत के बाद 22 सितंबर से ही चेन्नई स्थित अपोलो अस्पताल में भर्ती थीं।
तमिलनाडु की राजनीति में ‘अम्मा’ के नाम से मशहूर जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को एक रूढ़िवादी तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता को शुरुआती लोकप्रियता एक नेता के तौर पर नहीं बल्कि अभिनेत्री के तौर पर मिली थी। दक्षिण भारतीय सिनेमा की अत्यन्त सफल अभिनेत्रियों में शुमार जयललिता का राजनीतिक करियर 1982 में शुरू हुआ। सिनेमा से लेकर राजनीति तक में लोकप्रियता का नया मापदंड रचने वाले और एआईएडीएमके के संस्थापक एमजी रामचंद्रन इस खूबसूरत अभिनेत्री को राज्य की राजनीति में लेकर आए थे।
1987 में एमजीआर की मृत्यु ने तमिलनाडु की राजनीति के साथ-साथ एआईएडीएमके की राजनीति में भी भूचाल ला दिया। पार्टी जयललिता और एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के बीच दो हिस्सों में टूट गई। वर्चस्व की लंबी लड़ाई और एआईएडीएमके में कई उतार-चढ़ाव के बाद जयललिता एमजीआर की राजनीतिक वारिस और तमिलनाडु की कद्दावर नेता बनकर उभरीं और 1991 में पहली बार कांग्रेस की मदद से राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2016 के विधानसभा चुनाव में सारे अनुमानों को धता बताते हुए उन्होंने तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन की परिपाटी को भी ध्वस्त कर दिया। इस जीत के बाद वो छठी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं।
जयललिता के निधन के बाद हमारे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गलत नहीं कहा कि ‘नेशन हैज लॉस्ट एन आइकन’। सच तो यह है कि जयललिता एक नहीं, कई लिहाज से आइकन थीं। पहले तो बहुत छोटी उम्र में वो सिनेमा की आइकन बनीं। वो भी ऐसी कि दक्षिण के सिनेमा का सबसे बड़ा नाम एमजीआर भी उनके बिना अधूरा है। एमजीआर ने एक नहीं, दो नहीं, पूरी अट्ठाइस फिल्में जयललिता के साथ कीं। और जब वही जयललिता राजनीति में आईं तब तमाम अवरोधों और विरोधों के बावजूद वो राजनीति की आइकन बनीं। वो भी ऐसी कि एमजीआर की मृत्यु से लेकर अपनी मृत्यु तक तमिलनाडु की राजनीति की धुरी रहीं। सिनेमा और राजनीति की आइकन होने के साथ-साथ वो तमिलनाडु की महिलाओं की आइकन भी थीं। वो भी ऐसी कि वहाँ की महिलाएं उन्हें भगवान मानती थीं और हजारों की संख्या में ऐसे पुरुष भी मिलेंगे आपको जो विमान से उनके उड़ जाने तक पूरी श्रद्धा से दंडवत किए रहते थे।
अपने समर्थकों के लिए जयललिता एक ऐसी महिला थीं, जिन्हें उनके विरोधियों ने खूब परेशान किया। खासकर विरोधी दल डीएमके के नेता करुणानिधि ने। जयललिता के लिए उनके समर्थकों की चाहत हर तर्क से परे थी और उसी अनुपात में ‘अम्मा’ उन पर लुभावनी योजनाओं की बौछार करती थीं। मिक्सी, ग्राइंडर, सिलाई मशीन, बकरी, बच्चों के लिए साइकिल, लैपटॉप जैसी चीजें उनके लिए आसानी से उपलब्ध थीं, उन्हें राशन की दुकानों से बीस किलो चावल के बैग मुफ्त मिलते थे और ‘अम्मा कैंटीन’ से वे रियायती दर पर मन भर खाना खा सकते थे।
देखा जाय तो जयललिता एक साधारण महिला ही थीं, लेकिन उनकी ज़िन्दगी असाधारण बन गई। उनके करिश्मे और पार्टी की उन पर निर्भरता ने एक ऐसा रिश्ता बना दिया जिसे बाहरी लोगों के लिए समझना मुश्किल है। बड़े-से-बड़े निर्णय वे बिना देर किए लेती थीं और अपने निकटतम लोगों से भी एक निश्चित दूरी बना कर रखती थीं। उनका आभामंडल कुछ ऐसा था कि शासन के दौरान सत्ता के गलियारों में डर का माहौल रहता था। मंत्री और उच्चाधिकारी चुप्पी साधे रहते थे। उनकी मर्जी के बिना कोई शब्द भी बोलने का साहस नहीं कर सकता था।
जयललिता का नाता कर्नाटक से था, उन्होंने एक ब्राह्ण परिवार में जन्म लिया और वो एक अभिनेत्री रह चुकी थीं। यानि उनके साथ तमाम ऐसी चीजें थीं जो उन्हें कामयाब होने से रोक सकती थीं, लेकिन वो एक द्रविड़ पार्टी की प्रमुख बनीं, जिसकी नींव ब्राह्मणों के विरोध के लिए पड़ी थी और वो अपने मेंटर एमजीआर की जगह लेने में कामयाब रहीं जिन्हें ‘देवतुल्य’ माना जाता था।
जयललिता पर भ्रष्टाचार के आरोपों में कई अदालती मामले थे। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में उन्हें कुछ देर के लिए ही सही, जेल भी जाना पड़ा। लेकिन वो अपनी पार्टी और राज्य के लिए किंवदंती थीं, इसमें कोई दो राय नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

The Last Journey of Jayalalitha
The Last Journey of Jayalalitha

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ओबामा, ट्रम्प और असांजे मिलकर भी मोदी से पीछे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘टाइम’ के ‘पर्सन ऑफ द इयर’ खिताब के लिए ऑनलाइन रीडर्स पोल जीत लिया है। इस खिताब के लिए उनका मुकाबला दुनिया भर के कई राजनेताओं, कलाकारों और अन्य क्षेत्रों की बड़ी हस्तियों के साथ है। गौरतलब है कि पाठकों द्वारा दिए जाने वाले वोटों के हिसाब से मोदी पहले नंबर पर जरूर हैं लेकिन यह खिताब किसे दिया जाए, इसका अंतिम निर्णय पत्रिका के संपादकों द्वारा किया जाता है। विजेता के नाम की घोषणा 7 दिसंबर को की जाएगी।

बहरहाल, रविवार रात को बंद की गई वोटिंग में मोदी को 18 प्रतिशत पाठकों के वोट मिले। दिलचस्प बात यह कि भारतीय प्रधानंमंत्री का नजदीकी मुकाबला जिन तीन महारथियों – बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रम्प और जूलियन असांजे – से रहा, वे तीनों एक साथ मिलकर भी महज 7 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाए। इस खिताब की दावेदारी में हिलेरी क्लिंटन (4 प्रतिशत) और मार्क जुकरबर्ग (2 प्रतिशत) भी थे। लेकिन मोदी ने लोकप्रियता में सबको बहुत पीछे छोड़ दिया। मोदी को मिले वोटों का विश्लेषण करने पर पाया गया कि उन्हें न केवल भारत से बल्कि अमेरिका के कैलिफोर्निया और न्यू जर्सी जैसे शहरों से भी काफी वोट मिले।

बता दें कि हर वर्ष ‘टाइम’ पत्रिका साल के सबसे प्रभावशाली शख्स का चुनाव करती है। इस खिताब के लिए चुनी गई हस्ती को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही कारणों से चुना जा सकता है। किस शख्स का प्रभाव इस साल पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा रहा, इस आधार पर विजेता के नाम का चुनाव किया जाता है। वैसे यह लगातार चौथा साल है, जब इस खिताब के दावेदारों में मोदी को शुमार किया गया है। इससे पहले साल 2014 में भी मोदी को ‘टाइम पर्सन ऑफ द इयर’ के ऑनलाइन पोल में जीत मिली थी, लेकिन पत्रिका के संपादकों द्वारा इस खिताब के लिए चुने गए आठ लोगों की सूची में वे जगह नहीं बना सके थे। चलते-चलते यह भी बता दें कि साल 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, 2013 में पोप फ्रांसिस, 2014 में इबोला फाइटर्स और 2015 में जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल को ‘टाइम पर्सन ऑफ द इयर’ घोषित किया गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से जुड़े पाँच अनछुए प्रसंग

कल स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की 132वीं जयंती थी। बिहार के जीरादेई में 3 दिसम्बर 1884 को जन्मे राजेन्द्र बाबू ने अपनी अन्तिम सांस भी बिहार में ही पटना स्थित सदाकत आश्रम में 28 फरवरी 1963 को ली। वे विलक्षण छात्र, आदर्श शिक्षक, सफल अधिवक्ता, प्रभावशाली लेखक, समर्पित गांधीवादी और स्वतंत्रता आन्दोलन में अपना सर्वस्व झोंक देने वाले सेनानी थे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ क्या होता है, ये समझने के लिए उनसे बेहतर उदाहरण हमें ढूंढ़े नहीं मिलेगा। 1950 से 1962 तक वे देश के ‘प्रथम नागरिक’ की भूमिका में रहे। अवकाश ग्रहण करने के बाद 1962 में ही उन्हें ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया। कहने की जरूरत नहीं कि उनका सारा जीवन ही अनमोल धरोहर है और उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें कई-कई तरह से याद किया। चलिए, आज बिहार को अखंड गौरव देने वाले इस सपूत से जुड़े कुछ ऐसे रोचक प्रसंग से रू-ब-रू होते हैं, जिनसे बहुत कम लोग वाकिफ हैं।

उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे राजेन्द्र बाबू के पूर्वज

राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआं गांव, अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। इनका कायस्थ परिवार था। यहाँ के कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया और वे वहाँ से बिहार के सारन जिले के एक गांव जीरादेई में जा बसे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी-सी रियासत थी – हथुआ। राजेन्द्र बाबू के दादा को पढ़े-लिखे होने के कारण इस हथिया रियासत की दीवानी मिल गई। वे 25-30 साल तक इस रियासत के दीवान रहे। धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल करते थे।

बारात के वधू के घर पहुँचने पर पालकी में सोए मिले वर राजेन्द्र प्रसाद

राजेन्द्र प्रसाद का विवाह 12 साल की उम्र में हुआ था। घोडों, बैलगाड़ियों और हाथी के साथ चली उनकी बारात को वधू राजवंशी देवी के घर पहुँचने में दो दिन लगे थे। वर राजेन्द्र प्रसाद चांदी की पालकी में सज-धज कर बैठे थे। लम्बी यात्रा के बाद बारात मध्य रात्रि को वधू के घर पहुँची। उस वक्त राजेन्द्र बाबू पालकी में सोए मिले। बड़ी कठिनाई से उन्हें विवाह की रस्म के लिए उठाया गया।

पत्नी के संग बहुत कम बिता पाते थे समय

राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी उन दिनों के रिवाज के अनुसार ज्यादातर पर्दे में ही रहती थीं। छुट्टियों में घर जाने पर अपनी पत्नी को देखने या उनसे बोलने का उन्हें बहुत ही कम अवसर मिलता था। बाद में जब राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए, तब पत्नी से मिलना और भी कम हो गया। वास्तव में विवाह के प्रथम पचास वर्षों में दोनों पति-पत्नी मुश्किल से पचास महीने साथ रहे होंगे।

धरी रह गई इंग्लैण्ड जाने की तैयारी

छात्रजीवन के दौरान राजेन्द्र प्रसाद आई.सी.एस. की परीक्षा देने के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे, पर उन्हें डर था कि परिवार के लोग इतनी दूर जाने की अनुमति कभी नहीं देंगे। इसीलिए उन्होंने बड़े ही गुप्त तरीके से जहाज से इंग्लैण्ड जाने के लिए सीट का आरक्षण करवाया और बाकी प्रबंध भी कर लिया। यहाँ तक कि इंग्लैण्ड में पहनने के लिए दो सूट भी सिलवा लिए। लेकिन जिसका उन्हें डर था वही हुआ। उनके पिता ने उन्हें अनुमति नहीं दी और उन्हें बड़ी अनिच्छा से इंग्लैण्ड जाने का विचार छोड़ना पड़ा।

आज भी चालू है उनका खाता

राजेन्द्र प्रसाद के देहावसान के 50 वर्ष से ज्यादा गुजर गए, लेकिन उनका बैंक खाता उनके सम्मान में आज भी चालू है। राजेन्द्र बाबू ने मृत्यु से कुछ समय पहले ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ‘पंजाब नेशनल बैंक’ में अपना खोता खोला था। यह खाता बैंक की पटना स्थित एग्जीबिशन रोड शाखा में 24 अक्टूबर 1962 को खोला गया था। बैंक उन्हें गर्व से अपना प्रथम ग्राहक कहता है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक फिलहाल उनके खाते में 1,213 से कुछ अधिक रुपए हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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