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भाजपा की पहली सूची तैयार, क्या आडवाणी-जोशी होंगे बाहर ?

लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की पहली सूची कभी भी जारी हो सकती है। ख़बर है कि सत्ताधारी दल ने लगभग 250 नाम तय कर लिए हैं और इन नामों में जहां कई नाम चौंकाने वाले हो सकते हैं, वहीं कई नामों का ना होना हैरान कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक भाजपा संसदीय समिति द्वारा तैयार की गई सूची में कई दिग्गजों का टिकट कटना तय है। ऐसे में अब सबकी नज़रें इस पर टिकी हैं कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी इस बार चुनावी मैदान में उतरेंगे या नहीं!

राजनीतिक गलियारे से मिल रही ख़बरों के मुताबिक उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी और बीएस कोश्यारी ने स्वयं ही चुनाव नहीं लड़ने का मन बनाया है। दोनों नेता चाहते हैं कि युवाओं को मौका दिया जाए। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र और झारखंड के करिया मुंडा भी चुनाव नहीं लड़ने के पक्ष में हैं। इससे इस बात की संभावना बढ़ गई है कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री शांता कुमार जैसे महारथियों को भी चुनावी दौड़ से बाहर कर दिया जाए या वे खुद अपना नाम आगे ना बढ़ाएं।

गौरतलब है कि आडवाणी फिलहाल 91 साल के है और मुरली मनोहर जोशी के साथ उन्हें भी पार्टी नेतृत्व ने 2014 में ही मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर दिया था। तब भाजपा ने संघ परिवार के साथ मिलकर तय किया था कि 75 साल से ऊपर के किसी शख्स को कार्यकारी जिम्मेदारियां नहीं दी जाएंगी। हालांकि इसके बावजूद दोनों नेता अभी तक सदन की शोभा बढ़ा रहे थे। पर इस बार 2014 जैसी स्थिति नहीं है। भाजपा को 2 सीटों से 180 सीटों तक पहुँचाने वाले इन नेताओं का आज की तारीख में सम्मान चाहे जितना हो, राजनीतिक निर्णयों में सहभागिता लगभग नगण्य है। बहरहाल, लंबे अरसे से हाशिए पर डाल दिए गए नेताओं की इस पीढ़ी का अबकी बार संसद में नहीं दिखना खलेगा जरूर। खैर, देखते हैं कि भाजपा की किसी भी क्षण आने वाली सूची इस बारे में अंतिम रूप से क्या कहती है!!

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मुफलिसी में शहीदों की ‘शहादत’ को मिले ‘सम्मान’ का सौदा करना पड़ता है परिजनों को

दो-दो हजार में ही बिक गये भारतीय शहीदों के वीरता पदक ! सैनिकों के वीरता पदकों का सौदा देश के लिए किसी विडंबना से कम है क्या ? इन पदकों को बेचने वाले कोई और नहीं बल्कि शहीदों के लाचार माता-पिता या फिर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए बेबस उनकी पत्नी या परिजन इस शर्त पर मेडल बेचते हैं कि खरीदने वाले कभी किसी को उनका नाम नहीं बताएंगे।

कितनी विडंबना है ! जो पिता अपने इकलौता सैनिक बेटे को बचपन में कंधे पर घुमाया करता वही लाचार बाप आज उस शहीद हुए सैनिक बेटे को कंधा देता है और 3 साल का शहीद-पुत्र अपने पिता को मुखाग्नि ! उसी लाचार बाप और अबोध सैनिक-पुत्र की परवरिश के लिए सैनिक की विधवा पत्नी लाचार होकर पति की ‘शहादत’ को मिले ‘सम्मान’ का सौदा करने, दुनिया की नजर से बचकर, किसी दुकान में जाती है। कोई रोटी के लिए तो कोई बच्चे की फीस के लिए सीने पर पत्थर का टुकड़ा रखकर उस अनमोल निशानी को बेमोल बेच देती है। देश कब जगेगा और सोचेगा उन शहीदों के लिए…..।

बता दें कि लुधियाना, पंजाब का एक शख्स है इंजीनियर नरिन्दर पाल सिंह। वह एक गैरतमंद इंसान है जो लुधियाना में ‘अकाली सहाय म्यूजियम’ चलाते हैं। वहीं विगत 5 साल में सैनिकों के 300 और स्वतंत्रता सेनानियों के लगभग 200 अनमोल मेडल 2-2 हजार तक में खरीदते और सहेजते आये हैं। वे ऐसे नेक दिल और प्रतिष्ठित इंसान हैं कि बेचने वालों का नाम किसी को नहीं बताते हैं।

यह भी बता दें कि सैन्य परिवारों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव  मधेपुरी ने हाल ही में पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए 44 शहीदों के परिजनों के बैंक एकाउंट को सार्वजनिक करने हेतु प्रधानमंत्री, गृह मंत्री एवं रक्षा मंत्री को पत्र लिखा है ताकि बुद्ध – नानक – कबीर…. से लेकर भूपेन्द्र-भीम-कर्पूरी…. डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम सरीखे दानवीरों से प्रेरित भारतवासी यदि उनके खाते में एक-एक रुपए भी डालें तो करोड़ों रुपए… होंगे और शहीदों के परिजनों को ये दिन नहीं देखना पड़ेगा।

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क्या खत्म हो गया महागठबंधन ?

देश को नया विकल्प देने की बात करने वाला महागठबंधन क्या खत्म हो गया? जी हाँ, मायावती और ममता बनर्जी के अलग रास्ता अख्तियार करने के बाद लगता कुछ ऐसा ही है। तेजी से बदले घटनाक्रम में बसपा सुप्रीमो मायावती के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मंगलवार को साफ कर दिया कि चुनाव में वे कांग्रेस से अलग हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनकी जंग न सिर्फ भाजपा की अगुआई वाले एनडीए से होगी, बल्कि कांग्रेस से भी होगी।

स्पष्ट है कि सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और तीसरे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में संभावित सहयोगियों के रुख ने न सिर्फ महागठबंधन को खारिज कर दिया है बल्कि कांग्रेस के लिए दूसरे राज्यों में भी चुनौतियां बढ़ा दी हैं। खासकर बिहार में इसका असर दिख सकता है। इन सबसे भाजपा के खिलाफ विपक्ष का बड़ा धड़ा बनाने की कांग्रेस की मुहिम खतरे में पड़ती दिख रही है।

बता दें कि कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 10 सीटों पर अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया था। इसके पीछे सीधा संदेश था कि बसपा-सपा गठबंधन इन सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी माने या फिर कांग्रेस की अलग चुनौती के लिए तैयार रहे। पर कांग्रेस का दांव उसी के गले पड़ गया। मायावती ने दो कदम आगे जाकर स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के साथ किसी भी राज्य में कोई समझौता नहीं होगा। यही नहीं, बसपा-सपा गठबंधन ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में भी दावा ठोक दिया है। उधर पिछले एक साल से लगातार विपक्षी दलों की बैठक में शामिल हो रहीं और अपने मंच पर कांग्रेस समेत दूसरे दलों को आने के लिए बाध्य कर रहीं ममता बनर्जी ने बंगाल की सभी 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं।

रही बात बिहार की तो यहां भी आरजेडी-कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया है। बताया जा रहा है कि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने सहयोगी दलों को साफ लहजे में बोल दिया है कि वे अपनी राजनीतिक हैसियत से ज्यादा न मांगे। यह बयान कांग्रेस के लिहाज से खासतौर पर अहम है क्योंकि पार्टी ने यहां अपने कद से बड़ा मुंह खोल रखा है।

अन्य राज्यों की बात करें तो तेलंगाना विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से साथ मिलकर लड़े आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू का रुख भी अब बदला-बदला है। प्रदेश की जनता को वह बताते फिर रहे हैं कि कांग्रेस के साथ केंद्र की रणनीति अलग है, लेकिन राज्य विधानसभा चुनाव में उनका कांग्रेस के साथ कोई लेना-देना नहीं है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच समझौते को भी खारिज ही किया जा रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि विपक्षी दलों का एक साझा घोषणापत्र तैयार करने की जो कवायद शुरू हुई थी अब उसका क्या होगा। ध्यान रहे कि अब तक विपक्षी दलों के जमावड़े में 21 दलों को गिना जाता था और इसमें बसपा, सपा, तृणमूल कांग्रेस, टीडीपी और आप भी शामिल हुआ करती थीं। इन दलों के बिना क्या महागठबंधन का कोई अस्तित्व रह जाएगा?

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भारतीय वीरता के अद्वितीय प्रतीक का अभिनंदन

पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराने वाले भारतीय वीरता के अद्वितीय प्रतीक अभिनंदन 55 घंटे से ज्यादा समय तक पड़ोसी मुल्क की हिरासत में रहने के बाद शुक्रवार रात करीब 9.20 बजे वतन पहुँचे। हालांकि आखिर तक पाकिस्तान ने उन्हें सौंपने में कागजी कार्रवाई का हवाला देते हुए घंटों की देरी की। इस बीच सम्पूर्ण देश अभिनंदन के अभिनंदन को आकुल-व्याकुल रहा। गौरतलब है कि पहले दोपहर 2 बजे का समय तय किया गया था लेकिन पाकिस्तान ने समय दो बार बदला और प्रक्रिया को अनावश्यक खींचने की कोशिश की। हालांकि इस दौरान रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण समेत सरकार व सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने समूचे घटनाक्रम पर बराबर नजर बनाए रखी।

उधर घंटों की देरी के बाद भी सुबह से रात तक बॉर्डर पर जमे भारतीयों का जोश और उत्साह देखने लायक था। यहां मौजूद लोग ढोल-नगाड़े बजाते हुए ‘अभिनंदन है, अभिनंदन है’ के नारे लगाते रहे। देश के इस बहादुर बेटे को देखने और उसका स्वागत करने के लिए बॉर्डर पर भारी संख्या में लोग पहुंचे थे। बहरहाल, देर शाम बॉर्डर पर अभिनंदन के पहुंचने के बाद कागजी कार्रवाई पूरी की गई। प्रोटोकॉल के तहत उनका मेडिकल चेकअप किया जाएगा। अभिनंदन को अटारी बॉर्डर से सीधे अमृतसर एयरपोर्ट की तरफ ले जाया जाएगा, जहां से वह वायुसेना के विशेष विमान से दिल्ली पहुंचेंगे।

बता दें कि एक दिन पहले भारत के संभावित एक्शन से घबराए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए अभिनंदन को छोड़ने की घोषणा की थी। दुश्मन के कब्जे में होने के बाद भी अभिनंदन ने पूरे साहस और दृढ़ता के साथ पाक अफसरों की आंखों में आंखें डालकर सवालों का उतना ही जवाब दिया, जितना जेनेवा कन्वेंशन के तहत ऐसे समय में दिया जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर सामने आए विडियो में साफ देखा गया कि पूछताछ के दौरान वह बड़ी बहादुरी से पाक अफसरों का जवाब देते रहे पर सिर को झुकने नहीं दिया और कोई महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी।

याद दिला दें कि दो दिन पहले पाकिस्तानी विमानों ने भारत के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी। जवाबी कार्रवाई के दौरान अभिनंदन के मिग-21 बाइसन ने पाकिस्तानी एफ-16 विमान को मार गिराया। हमले में उनका मिग-21 विमान भी चपेट में आ गया और अभिनंदन पैराशूट की मदद से नीचे उतरे लेकिन जहां वह उतरे वह धरती पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) थी, जिसके बाद पाकिस्तान ने अभिनंदन को हिरासत में ले लिया था।

 

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जवानों को अब होगी विमान से कश्मीर आने-जाने की सुविधा प्राप्त

पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। यह कि 7 लाख अस्सी हज़ार जवानों को दिल्ली-श्रीनगर एवं जम्मू-श्रीनगर रूट पर आने-जाने के लिए नियमित विमान सेवा उपलब्ध कराई जाएगी।

बता दें कि कश्मीर में सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स की 65 बटालियनों में 65 हज़ार जवान तैनात हैं। यहाँ पर बीएसएफ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल एवं राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड की ईकाइयाँ भी आंतरिक सुरक्षा के विभिन्न मोर्चों पर तैनात किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा अर्धसैनिक बलों के जवानों की सुरक्षा के लिए घोषित इस फैसले को देशभक्त बुद्धिजीवियों ने सराहा है। साथ ही कुछ संवेदनशील साहित्यकारों ने यह भी कहने से बाज नहीं आया कि एक साथ 45 जवानों की कीमती जान जाने के बाद ही सरकार की आंखें खुली ?

यह भी बता दें कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी आदेश में यह कहा गया है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के सभी जवानों को यह सुविधा मिलेगी। ड्यूटी ज्वाइन करने, ट्रांसफर पर जाने, टूर या छुट्टी पर जाने के लिए जवान अब विमान से यात्रा कर सकेंगे। यह सुविधा अब तक मिलती तो थी लेकिन इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर के अधिकारियों को ही मिलती थी।

चलते-चलते यह भी बता दें कि जहाँ गृह मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार अर्धसैनिक बलों के सभी जवान व्यावसायिक उडान से कश्मीर आने-जाने की टिकट बुक करा कर यानी पॉकेट से पैसे लगाकर यात्रा करेंगे और बाद में अपने संगठन या बल के माध्यम से खर्च की गई राशि का पुनर्भुगतान प्राप्त कर सकेंगे। वहीं इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एक सेवानिवृत्त सैनिक ने कहा कि यदि वह सैनिक शहीद हो जाए तो उसके तीन-चार वर्षीय इकलौते पुत्र को वह राशि वापस लेने में कितने वर्ष लगेंगे…..?

क्या सांसद एवं विधायकों की तरह उन सैनिकों को सरकार की ओर से कूपन मुहैया नहीं किया जा सकता ?

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आलोचना को ऊँचाई देने वाले ‘नामवर’ नहीं रहे

अपनी प्रगतिशील सोच से साहित्य को नया आयाम देने वाले नामवर सिंह नहीं रहे। डॉ. नामवर सिंह के रूप में न केवल हिन्दी साहित्य ने बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य ने एक बहुत बड़ा और विश्वसनीय चेहरा खो दिया। मंगलवार देर रात 92 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली और इसके साथ ही हिन्दी साहित्य के ‘नामवर युग’ का अंत हो गया। एक चलती-फिरती ‘संस्था’ जिनसे कई पीढ़ियों ने साहित्य की सही और सच्ची समझ हासिल की, बहुत बड़ी रिक्तता छोड़ हमसे रुख़सत हो गई। पिछले दिनों नामवर जी दिल्ली के अपने घर में गिर गए थे जिसके बाद उनके सिर में चोट लगी और उनको एम्स के ट्रामा सेंटर में भर्ती करवाया गया था।
नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई 1926 को वाराणसी के जीयनपुर गांव में हुआ था। उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की और 1941 में उनकी पहली कविता ‘क्षत्रिय मित्र’ में छपी। 1951 में उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एमए किया और फिर वहीं हिन्दी के व्याख्याता नियुक्त हुए। इसके बाद उन्होंने सागर विश्वविद्यालय में भी अध्यापन किया। लेकिन सबसे लंबे समय – 1974-1987 – तक वे दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रहे। यहां से सेवानिवृत्त होने के कुछ वर्षों बाद उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा का चांसलर बनाया गया।
डॉ. नामवर सिंह ने हिन्दी साहित्य खासकर आलोचना को कई कालजयी कृतियां दीं जिनमें ‘कविता के नए प्रतिमान’ विशेष रूप से चर्चित है। ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’, ‘पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य’, ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’, ‘कहानी: नई कहानी’, ‘दूसरी परंपरा की खोज’, ‘हिन्दी का गद्यपर्व’, ‘वाद विवाद संवाद’, ‘आलोचक के मुख से’, ‘बकलम खुद’ आदि उनकी अन्य महत्वपूर्ण कृतियां हैं। उनकी जितनी प्रतिष्ठा इन पुस्तकों को लेकर थी उतना ही सम्मान उन्हें प्रखर वक्ता के तौर पर हासिल था और इन सबके ऊपर थी उनकी बेबाकी और साफगोई। कुल मिलाकर, उन्होंने हिन्दी साहित्य, खासकर आलोचना की विधा को जो ऊँचाई दी और जैसा सम्मान दिलाया उसकी कोई सानी नहीं।
साहित्य अकादमी समेत कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित नामवर सिंह नि:संदेह हिन्दी के सार्वकालिक महान साहित्यकारों में अग्रगण्य हैं। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजलि..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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शहीदों को अंतिम विदाई देने उमड़ा देश !

शहीदों को अंतिम विदाई देने उमड़ा देश !

यादों का संदेश…. फिर भी….. रह गया कुछ शेष !!

पुलवामा आतंकी हमले में हुए भारत माता के सभी 44 शहीद सपूतों के सजदे में झुके संपूर्ण देश के आक्रोश में होने के बावजूद भी जहाँ पीएम नरेन्द्र मोदी ने उन बहादुर सैनिकों और उन्हें जन्म देने वाली माताओं को सलाम करते हुए यही कहा- “आज उन शहीदों के परिवार के साथ संपूर्ण देश खड़ा है….” वहीं इस हमले में सीआरपीएफ के जवान बिहार निवासी हवलदार संजय कुमार सिन्हा एवं सिपाही रतन कुमार ठाकुर द्वारा देश की सुरक्षा में अपने प्राणों की आहुति देने वालों के परिजनों को बिहार सरकार की ओर से सीएम नीतीश कुमार ने 36-36 लाख रुपए देने की घोषणा की है।

बता दें कि शहीदों की विदाई में उमड़ा जनसैलाब ! पूरा देश एकजुट ! आतंक पर वार के लिए सभी दल तैयार ! सारा देश सीआरपीएफ जवानों की शहादत से दु:खी और कुछ भी कर गुजरने को तैयार…. !!

Dr.Madhepuri
Dr. Bhupendra Madhepuri .

दु:ख की इस घड़ी में यह भी जान लें कि संवेदनशील समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उद्घोषणा- “शहीदों के परिजनों के साथ आज सारा देश खड़ा है” पर मधेपुरा अबतक से गंभीरतापूर्वक चर्चा की और इसके माध्यम से देश के गृहमंत्री एवं रक्षामंत्री से उन्होंने विनम्र अनुरोध किया है कि वे पुलवामा आतंकी हमले में शहीद हुए सभी शहीदों के परिजनों के बैंक खाते का नंबर देश के करोड़ों-करोड़ संवेदनशील देशवासियों की जानकारी में दें ताकि भारतरत्न डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम सरीखे करोड़ों संवेदनशील भारतीय 44 शहीदों के परिजनों के खाते में 1-1 रूपये डाल सकें तो करोड़ों रुपये हो जाएंगे….. उन्हें बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर शादी-विवाह या अन्य जरूरतों के लिए कभी विवश नहीं होना पड़ेगा…… और तभी सही मायने में दुनिया को “शहीदों के परिजनों के साथ संपूर्ण भारत खड़ा” दिखेगा।

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प्रधानमंत्री ने की परिक्रमा तो गृहमंत्री ने दिया कंधा

पुलवामा हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों के पार्थिव शरीर शुक्रवार को श्रीनगर से दिल्ली लाए गए। इस दौरान पालम एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और तीनों सेना के प्रमुखों के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी शहीदों को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान केन्द्रीय राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी मौजूद थे। प्रधानमंत्री ने इस दौरान हाथ जोड़कर शहीदों के शवों की परिक्रमा भी की। परिक्रमा का ये क्षण बड़ा ही भावुक कर देने वाला था। पूरा देश उस समय मानो परिक्रमारत था।

Home Minister Rajnath Singh carrying coffin of slain CRPF Soldier killed in Pulwama Attack.
Home Minister Rajnath Singh carrying coffin of slain CRPF Soldier killed in Pulwama Attack.

बहरहाल, खबर है कि प्रधानमंत्री मोदी ने सभी केन्द्रीय मंत्रियों और भाजपा शासित राज्यों के मंत्रियों को निर्देश दिया है वे अपने राज्यों के शहीदों के अंतिम संस्कार में हिस्सा लें और उनके परिवारों की हर संभव मदद करें। इससे पहले शहीद जवानों को गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बड़गाम में श्रद्धांजलि दी थी। उन्होंने शहीद के शव को कंधा भी दिया। यह एक तरह से सवा सौ करोड़ भारतीयों की भावना की अभिव्यक्ति थी।
बता दें कि केन्द्र सरकार ने शनिवार को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। यह बैठक केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में सुबह 11 बजे से संसद की लाइब्रेरी में होगी। माना जा रहा है कि सरकार सभी राजनीतिक दलों को हमले के बारे में पूरी जानकारी देगी और आगे की रणनीति पर भी चर्चा की जा सकती है। प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में शुक्रवार को हुई कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्यॉरिटी (सीसीएस) की बैठक में सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला लिया गया था।
सूत्रों की मानें तो मोदी सरकार इस हमले के बाद उठाए जाने वाले किसी भी कदम से पहले विपक्षी दलों को भी विश्वास में लेना चाहती है। इसके अलावा यह संदेश देने की भी कोशिश की जाएगी कि संकट की इस घड़ी में सभी पार्टियां साथ हैं। सरकार की कोशिश है कि विपक्ष को विश्वास में लेने के बाद कोई भी कदम उठाना आसान होगा। वैसे चलते-चलते बता दें कि केन्द्र में सरकार की सहयोगी पार्टी शिवसेना इस मुद्दे पर संसद का संयुक्त सत्र बुलाने की मांग कर चुकी है।

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अब जापान की बुलेट ट्रेनें भी मिथिला पेंटिंग्स से शीघ्र सजेंगी

प्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग मधुबनी की चहारदीवारी को लांघकर….. भारतीय सरहद को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय आकाश में उड़ान भरने लगी है। एक समय था जब मधुबनी पेंटिंग से मधुबनी स्टेशन को ही सजा-सजाकर दर्शनीय बनाया गया था। बाद में संपर्क क्रांति एक्सप्रेस के डब्बों पर बनी मधुबनी की मिथिला पेंटिंग्स दिल्ली के लोगों सहित विदेशियों को भी भाने लगा…. और अब तो जापान की बुलेट ट्रेनें भी मिथिला पेंटिंग से जल्द ही सजने जा रही हैं।

बता दें कि जापान से इस संबंध में भारतीय रेल मंत्रालय को सूचना आई है। जापान सरकार ने भारतीय रेल मंत्रालय से मधुबनी पेंटिंग्स के कलाकारों की टीम भेजने का आग्रह भी किया है। रेल मंत्रालय ने कलाकारों को भेजने की कवायद भी शुरू कर दी है। समस्तीपुर रेल मंडल के डीआरएम आर.के.जैन द्वारा इस आशय की जानकारी दी गई कि प्रसिद्धि प्राप्त मिथिला पेंटिंग अब किसी परिचय की मोहताज नहीं है। तभी तो पेंटिंगें जापानी बुलेट ट्रेनों की भी शोभा बढ़ायेंगी।

यह भी बता दें कि भारतीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने बताया कि पहली बार समस्तीपुर मंडल ने “बिहार संपर्क क्रांति एक्सप्रेस” को मिथिला पेंटिंग्स से सजाकर वाहवाही बटोरी थी। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी इसे सराहा था तथा ट्रेनों में उकेरी गई ‘मिथिला पेंटिंग्स’ से सर्वाधिक विदेशी प्रभावित हैं।

यह भी जानिए कि जापान इस धरती पर ऐसा देश है जहाँ “मिथिला म्यूजियम” भी है। इस म्यूजियम को बनाने का श्रेय जापान के महान संगीतकार टोकियो हासेगावा को जाता है। जापान-भारत सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने वाली संस्था के यशस्वी प्रतिनिधि हैं- हासेगावा !

चलते-चलते यह कि जापान ने मिथिला पेंटिंग की खूबसूरती देखकर इस कला से जुड़े चित्रकारों की विभिन्न टीमों को भेजने का अनुरोध भारतीय रेल मंत्रालय से किया है।

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जॉर्ज फर्नांडिस: बुझ गया भारतीय राजनीति का बेजोड़ सितारा

भारतीय राजनीति के सार्वकालिक महान शख्सियतों में शुमार जॉर्ज फर्नांडिस नहीं रहे। भारत के पूर्व रक्षामंत्री, प्रख्यात समाजवादी नेता, प्रखर वक्ता एवं समता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष जॉर्ज साहब के निधन से राजनीतिक चेतना से सम्पन्न हर व्यक्ति शोकाकुल है चाहे उसकी प्रतिबद्धता किसी भी दल के लिए क्यों न हो। बात जहाँ तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की है तो उनके लिए यह व्यक्तिगत क्षति है। जॉर्ज साहब को श्रद्धांजलि देते हुए उनका गला रूंध गया और वे रो पड़े। पटना स्थित जदयू मुख्यालय में आयोजित शोकसभा में उनके साथ पूरा जदयू परिवार मर्माहत दिखा। शोकसभा के बाद जॉर्ज साहब को श्रद्धांजलि देने व उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने नीतीश कुमार तत्काल दिल्ली के लिए रवाना हो गए।
जॉर्ज साहब के निधन की खबर मिलते हुए जदयू के पटना में उपस्थित तमाम नेता, पदाधिकारी व कार्यकर्ता पार्टी मुख्यालय में जुटने लगे। यहां आयोजित शोकसभा में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह, विधानसभा अध्यक्ष विजय चौधऱी, ऊर्जा मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव, जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जयकुमार सिंह, शिक्षा मंत्री कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा, खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री मदन सहनी, गन्ना उद्योग मंत्री खुर्शीद आलम, विधानपार्षद व पूर्व शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी, विधानपार्षद प्रो. रामवचन राय, संजय गांधी, ललन सर्राफ, राष्ट्रीय सचिव रविन्द्र सिंह, प्रदेश महासचिव व मुख्यालय प्रभारी डॉ. नवीन कुमार आर्य, अनिल कुमार, मुख्य प्रवक्ता संजय सिंह, जदयू मीडिया सेल के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अमरदीप समेत बड़ी संख्या में पार्टी के नेतागण एवं कार्यकर्तागण मौजूद रहे।
शोकसभा के बाद पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जॉर्ज साहब के निधन से हम सभी मर्माहत हैं। उनका जो योगदान इस देश की राजनीति में रहा है और जो कुछ भी उन्होंने समाज के लिए किया है वह सदैव याद रखा जाएगा। सिद्धांत के प्रति, समाजवादी विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सदैव रही। संसद में या रक्षा, रेल आदि मंत्रालयों में भी उनकी भूमिका भुलायी नहीं जा सकती। मुख्यमंत्री ने कहा कि जॉर्ज साहब हमलोगों के न सिर्फ नेता थे बल्कि वे अभिवावक भी थे। 1994 में उन्हीं के नेतृत्व में नई पार्टी बनी। उनके नेतृत्व और मार्गदर्शन में जो कुछ भी सीखने का अवसर मिला और आज जो कुछ भी लोगों की सेवा करने की कोशिश करते हैं इसमें उनका ही योगदान रहा है। मैं उनके चरणों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ।
जॉर्ज साहब के निधन पर दिल्ली स्थित जदयू के राष्ट्रीय कार्यालय में भी शोकसभा का आयोजन किया गया जिसमें राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) व राज्यसभा में दल के नेता आरसीपी सिंह, सांसद रामनाथ ठाकुर, सांसद कहकशां परवीन, राष्ट्रीय महासचिव संजय झा समेत कई राष्ट्रीय पदाधिकारी, दिल्ली के प्रदेश पदाधिकारी व कार्यकर्तागण उपस्थित रहे।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरसीपी सिंह व अन्य नेतागण दिल्ली के पंचशील पार्क स्थित स्व. जॉर्ज फर्नांडिस जी के आवास पर भी गए और उनके पार्थिव शरीर के दर्शन कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी और उनकी पत्नी व परिजनों से मिले। प्राप्त जानकारी के मुताबिक जॉर्ज साहब के पुत्र अमेरिका में रहते हैं। अंतिम संस्कार के लिए उनकी प्रतीक्षा की जा रही है। चलते-चलते बता दें कि जॉर्ज साहब के निधन पर बिहार में दो दिनों का राजकीय शोक घोषित किया गया है।

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