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पदयात्रा पर जाते शिक्षा मंत्री से चंद सवाल

बिहार के शिक्षा मंत्री डॉ. अशोक चौधरी 17 जुलाई से राज्य भर की पदयात्रा करेंगे। उद्देश्य है लोगों में शिक्षा की भूख जगाना, आजादी के इतने वर्षों बाद भी ‘अक्षर’ की ताकत से अनजान परिवारों को जागरुक बनाना, सरकारी विद्यालयों की ‘गुणवत्ता’ और ‘अनियमितता’ की पड़ताल करना और शिक्षण संस्थाओं पर ‘सामाजिक अंकुश’ लगाना। यह विशुद्ध रूप से शिक्षा जागरुकता पदयात्रा होगी जिसमें महागठबंधन के तीनों दलों के संबंधित जिलाध्यक्ष, स्थानीय विधायक, जन प्रतिनिधि व शिक्षा महकमे के डीईओ, डीपीओ, बीईओ समेत अन्य पदाधिकारी भी शामिल होंगे।

बता दें कि पहले चरण में शिक्षा मंत्री सीमांचल और कोसी अंचल के पाँच जिलों कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, सहरसा और सुपौल की पदयात्रा करेंगे। पदयात्रा में मंत्री लोगों से पूछेंगे कि आपके इलाके में कहीं शिक्षा का फर्जी कारोबार चल रहा है तो जानकारी दीजिए, उस पर कार्रवाई की जाएगी। यह जानने की कोशिश भी की जाएगी कि जिस कॉलेज की क्षमता 500 विद्यार्थियों की है, वहाँ 2000 बच्चे कैसे  एडमिशन करा लेते हैं? और ये भी कि किसी विद्यालय में पाँच शिक्षक हैं और तीन ही क्यों आ रहे हैं?

हमारे शिक्षा मंत्री अपनी इस यात्रा में जानना चाहते हैं कि बच्चों के मिड डे मील की चोरी क्यों और कैसे हो रही है? वो बड़ी शिद्दत से जानना चाहते हैं कि पोशाक, साइकिल, किताब, मिड डे मील समेत तमाम प्रोत्साहन योजनाओं के बावजूद शिक्षा की रोशनी हर घर तक क्यों नहीं पहुँच पा रही है? और उतनी ही शिद्दत से इस यात्रा में वो सरकार के मुखिया नीतीश कुमार के शराबबंदी अभियान की बातें भी करना चाहते हैं।

ये तमाम बातें सुनकर शिक्षा मंत्री जी के प्रति आभार जताना लाजिमी है। हम आभार जताते भी हैं लेकिन कुछ सवाल भीतर कुलबुला रहे हैं जो उनसे पूछे बिना मन नहीं मान रहा। उनसे पहला सवाल ये कि क्या शिक्षा मंत्री समेत पूरी सरकार के ‘ज्ञान-चक्षु’ लालकेश्वर प्रसाद और बच्चा राय ने ही खोले हैं? क्या इन दो ‘महापुरुषों’ से पहले सब के सब ‘सावन के अंधे’ थे? दूसरा सवाल, क्या उन तक ‘बिहार की राजधानी दिल्ली’ कहने वाले और अपनी कक्षा ठेके पर देने वाले शिक्षकों की ‘महागाथा’ भी अब तक नहीं पहुँची है? तीसरा सवाल, सरकार की नाक के ठीक नीचे स्कूल और कॉलेज के नाम पर परीक्षा दिलाने और पास कराने की हजारों ‘फैक्ट्रियां’ दशकों से चल रही हैं और ‘पदयात्रा’ की जरूरत आज महसूस हुई है? क्या अब से पहले सरकार गांधीजी के तीन बंदरों का अनुसरण किए बैठी थी?

शिक्षा मंत्रीजी, सच तो यह है कि जो जानने के लिए आप पदयात्रा करने जा रहे हैं वो आप और आपकी सरकार के मुखिया पहले से जान रहे हैं। वो तो भला हो लालकेश्वर प्रसाद और बच्चा राय के ‘कुकृत्य’ का कि आप ‘लोकलाज’ से अपना आसन छोड़ लोगों के बीच जा रहे हैं। खैर, बहुत देर से सही, हम मान लेते हैं कि आपको अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो गया। लेकिन शिक्षा मंत्रीजी, आप समाज को उसकी जिम्मेदारी का अहसास दिलाने की बात नाहक ही कर रहे हैं, क्योंकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि इस समाज की चमड़ी में थोड़ी भी ‘सिहरन’ बची होती तो यहाँ शिक्षा या राजनीति के ‘सौदागर’ पैदा ही नहीं होते।

वैसे शिक्षामंत्रीजी, आपकी पदयात्रा की ये सोच बड़ी अच्छी है। ये तब और ज्यादा अच्छी लगती जब आपके साथ ‘विकास-पुरुष’ भी होते। लेकिन क्या ‘दिल्ली’ पर नज़र टिकाए आपकी सरकार के मुखिया ‘शराबबंदी’ से थोड़ा वक्त निकालकर आपके साथ इस पदयात्रा में चार कदम चलने की जहमत नहीं उठाएंगे?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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“मुझसे बड़ा एक्टर और कौन है”: लालू प्रसाद यादव

मौजूदा दौर के मंझे हुए अभिनेता इरफान खान कल ईद के दिन अपनी फिल्म ‘मदारी’ के प्रमोशन के लिए पटना में थे। इस दौरान उन्होंने आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। अपने खास अंदाज के लिए मशहूर लालू ने इस मौके पर इरफान को ईद की बधाई देने के साथ-साथ उन्हें फिल्म हिट करने के ‘टिप्स’ भी दिए और आखिर में अपने इस दावे से इरफान को लाजवाब कर दिया कि मुझसे बड़ा एक्टर और कौन है?

बहरहाल, फिल्म में अपने किरदार को ध्यान में रख इरफान लालू से मिलने डमरू के साथ आए थे। मजे की बात यह कि लालू ने उस डमरू को बजाया भी। एक तो ईद का माहौल और उस पर मस्तमौला लालू। उन्होंने ये भी कह ही डाला कि मुझ पर अगर फिल्म बनी तो मैं ही मेन रोल में रहूँगा। मुझसे अच्छी एक्टिंग कोई नहीं कर सकता। हाँ, अभिनेत्री कौन रहेगी, इसका फैसला इरफान कर सकते हैं।

लालू ने इरफान को ‘टिप्स’ देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने इरफान को सलाह देते हुए कहा कि आम आदमी को फोकस करती हुई फिल्मों में काम करिए, फिल्म सुपर हिट हो जाएगी। देश में आम आदमी सबसे ज्यादा परेशान है। इतने कानून बने, लेकिन आम आदमी को न्याय नहीं मिला। केन्द्र सरकार ने भी उनकी उपेक्षा की है। जातीय जनगणना रिपोर्ट में हर तरह से ‘पिछड़े’ आम आदमी का खुलासा नहीं किया गया है, जबकि गाय-भैंस-बकरी सबकी संख्या बता दी गई है।

बता दें कि इरफान की फिल्म ‘मदारी’ 22 जुलाई को रिलीज होने वाली है। इरफान ने बताया कि इस फिल्म में एक व्यक्ति के ‘जमूरा’ से ‘मदारी’ बनने की कहानी दिखाई गई है, जिसमें एक आम आदमी के संघर्ष की झलक देखी जा सकती है। इसमें किसी राज्यविशेष पर फोकस नहीं है बल्कि यह फिल्म सिस्टम की खामियों को दिखाती है।

चलते-चलते:

अब ये लालूजी से कौन पूछे कि जब अपने ऊपर बनने वाली फिल्म में हीरो वो खुद रहेंगे तो अभिनेत्री का फैसला उन्होंने इरफान पर क्यों छोड़ा? राबड़ीजी राज्य चला सकती हैं तो क्या उनकी सरपरस्ती में अभिनेत्री का किरदार नहीं निभा सकतीं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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नीतीश और मांझी को क्यों करीब ला रहे लालू..?

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कल अपने बड़े बेटे और स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप के आवास पर इफ्तार पार्टी दी जिसमें भाजपा को छोड़ बिहार की तमाम पार्टियों के दिग्गज शामिल हुए। वैसे तो इस पार्टी में हाई प्रोफाइल लोगों की कोई कमी ना थी लेकिन सबकी निगाह लगी थी एकदम पास-पास बैठे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर। इसमें भी खास बात यह कि इन दोनों दिग्गजों को एक साथ बिठाकर इनके रिश्तों पर जमी बर्फ को हटाने का काम स्वयं लालू ने किया। जाहिर है कि यह हल्के में लेने की बात नहीं हो सकती।

बता दें कि नीतीश और मांझी की केवल कुर्सियां ही साथ-साथ नहीं थीं बल्कि दोनों बातचीत करते भी दिखे। यही नहीं इस मौके पर मांझी ने नीतीश की तारीफ भी कि और यहाँ तक कहा कि आज मैं जो कुछ भी हूँ वो उन्हीं की वजह से हूँ। हालांकि बाद में उन्होंने यह कहकर बचने की कोशिश की कि राजनीति अपनी जगह है और शिष्टाचार अपनी जगह। इसका कोई और मतलब ना निकाला जाए। नीतीश ने भी कहा कि ऐसे आयोजनों में लोग एक-दूसरे से मिलते रहते हैं और बातें भी होती हैं। बात-मुलाकात पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

एक तरफ नीतीश और मांझी थोड़ा बच-बचाकर बोल रहे थे, जो स्वाभाविक भी था, तो उधर लालू अपने अंदाज मे बोल रहे थे कि जीतनराम मेरे पुराने सहयोगी और भाई हैं। हमलोग खुद इनकी इफ्तार पार्टी में गए थे और इन्हें आमंत्रित किया था। गौरतलब है कि मांझी ने रविवार को इफ्तार पार्टी दी थी जिसमें लालू अपने उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी के साथ पहुँचे थे। यहाँ याद दिला देना जरूरी है कि विधान सभा चुनाव के समय भी लालू मांझी को साथ लेना चाहते थे लेकिन नीतीश के ऐतराज के कारण ये सम्भव नहीं हो सका था।

कहने की जरूरत नहीं कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। स्वयं लालू और नीतीश की दोस्ती इसका एक बड़ा उदाहरण है। आज अगर लालू मांझी और नीतीश को करीब ला रहे हैं तो ये अकारण हरगिज नहीं। फिलहाल इसके तीन कारण तो स्पष्ट दिख रहे हैं। पहला यह कि मांझी को महागठबंधन का हिस्सा बनाकर लालू भाजपाविरोधी राजनीति में अपनी ‘प्रासंगिकता’ बनाए चाहते हैं। दूसरा, इससे महादलितों के बीच उनकी पैठ बढ़ेगी और तीसरा कि नीतीश से रिश्ता बिगाड़े बिना वे महागठबंधन के भीतर की राजनीति में खुद को और मजबूत कर सकेंगे। बहरहाल, सुलझे-अनसुलझे रिश्तों का ये ताना-बाना आगे क्या शक्ल अख्तियार करता है, ये देखना सचमुच दिलचस्प होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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मानसून को किसकी नज़र लगी बिहार में ?

बिहार में मानसून समय से तो आया लेकिन जाने क्यों रूठ गया! आलम यह है कि बादल आते तो हैं लेकिन बिना बरसे चले जाते हैं! मानसून को जैसे किसी की नज़र लग गई। मायूस किसान की नज़रें आसमान को ताक-ताक कर निराश हो चली हैं। उनकी चिन्ता है कि बरही में मानसून की वर्षा नहीं होने के कारण वे खेती शुरू नहीं कर पा रहे हैं। बारिश के अभाव में खेतों में नमी नहीं है और ऐसे में जुताई टेढ़ी खीर है उनके लिए।

बता दें कि बिहार में अब तक एक चौथाई से भी कम बारिश हुई है। राज्य के 24 जिलों में अब तक इतनी बारिश भी नहीं हुई है कि धान के बीज डाले जाएं। एक आँकड़े के मुताबिक बिहार में अब तक 168.8 मिलीलीटर बारिश होनी चाहिए थी लेकिन हुई है मात्र 128.8 मिलीलीटर। गौरतलब है कि पिछले साल इस दौरान दो लाख तेरह हजार हेक्टेयर में धान की बुआई हो चुकी थी, जबकि इस साल अभी तक दो लाख दस हजार हेक्टेयर में ही धान की बुआई हो सकी है, जो कि लक्ष्य से 38 प्रतिशत कम है।

कहा जाता है कि आर्द्रा नक्षत्र में झमाझम बारिश होने के बाद ही धान की उपज अच्छी होती है लेकिन राज्य में अभी तक इस नक्षत्र में कहीं भी ऐसी बारिश नहीं हुई। कुल 27 नक्षत्रों में 9 नक्षत्र वर्षा ऋतु के होते हैं और इनमें से तीन गुजर चुके हैं लेकिन किसानों की मायूसी है कि दूर ही नहीं हो रही। हाँ, मक्के की खेती कमोबेश ठीक कही जा सकती है।

पटना मौसम विज्ञान केन्द्र के अनुसार राज्य के भोजपुर, रोहतास, कैमूर, भागलपुर, पूर्वी चम्पारण, लखीसराय सहित कई ऐसे जिले हैं जिनमें इस साल आवश्यकता से कम बारिश हुई है। दूसरी ओर मधुबनी, सुपौल, औंरंगाबाद, बक्सर और अररिया जैसे कुछ जिलों में औसत से कुछ ज्यादा बारिश हुई है। मानसून की यही अनियमितता हर साल बिहार की कमर तोड़ देती है और उसे बाढ़ और सुखाड़ का सामना एक साथ करना पड़ जाता है।

बहरहाल, राज्य सरकार ने मानसून का रुख देखते हुए सभी जिलाधिकारियों को बाढ़-सुखाड़ के खतरे को लेकर अलर्ट कर रखा है। किसानों को डीजल सब्सिडी जारी रखी गई है। आपदा प्रबंधन एवं कृषि विभाग के साथ-साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी स्थिति पर नज़र रख रहे हैं। वैसे मानसून के लिहाज से अगले कुछ दिन बड़े महत्वपूर्ण हैं। क्या पता मानसून की नाराज़गी दूर ही हो जाय!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

 

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अपनी शर्म छिपाने को रूबी का चेहरा ढंक रहा सिस्टम

कल गिरफ्तार की गई रूबी राय को आज एडीजे निगरानी की अदालत में पेश किया गया। एडीजे ने उम्मीद के विपरीत उसे जमानत देने की बजाय 14 दिनों के लिए जेल भेज दिया। अब रूबी को 8 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में बेउर जेल में रहना होगा। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने इंटर आर्ट्स टॉपर रूबी राय का रिजल्ट कल ही रद्द कर दिया था।

बता दें कि कल बोर्ड कार्यालय में रूबी को विशेषज्ञों के सामने साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था। मीडिया समेत सारे लोग मानकर चल रहे थे कि 3 और 11 जून की तरह 25 जून को भी वह ‘सच का सामना’ करने नहीं आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सबको चौंकाते हुए रूबी ना केवल बोर्ड कार्यालय पहुँची बल्कि लगभग दो घंटे तक तमाम सवालों का सामना भी किया। ये अलग बात है कि वह एक भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई और तुलसीदास पर निबंध लिखने को कहे जाने पर केवल ‘तुलसीदास प्रणाम’ लिख पाई। बहरहाल, साक्षात्कार के दौरान ही बोर्ड ने पुलिस को सूचना दे दी थी। अंदर साक्षात्कार चल रहा था और बाहर पुलिस रूबी का इंतजार कर रही थी। कार्यालय से बाहर निकलते ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

इस पूरे प्रकरण में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि रूबी को गिरफ्तार करने का ‘हासिल’ क्या है? यह तो वही बात हुई कि ‘ब़ाजार’ को पहले खिलौनों से भर दो, ‘खिलौने’ के ‘व्यापारियों’ को सरकारी प्रश्रय दो और फिर उन’ खिलौनों’ से खेलने वाले ‘बच्चों’ को जेल भेज दो। आज रूबी को जेल भेजकर पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका अपनी पीठ ऐसे ठोक रहे हैं जैसे उन्होंने सबसे बड़े गुनाहगार को उसके अंजाम तक पहुँचा दिया हो। जबकि सच यह है कि इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक नुकसान किसी का हुआ है तो वह रूबी राय ही है। जैसी सामाजिक अवमानना और मानसिक यंत्रणा वो इस वक्त झेल रही होगी वो शब्दों से परे है। और उसके कैरियर की ‘बलि’ तो पहले चढ़ ही चुकी है।

हैरत की बात तो यह कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी हमारे पॉलिटिशियन अपनी ‘जात’ नहीं छोड़ रहे। भाजपा ये बताने में लगी है कि लालकेश्वर और उनकी पत्नी उषा सिन्हा जेडीयू से जुड़े रहे हैं तो उपमुख्यमंत्री तेजस्वी सोशल मीडिया पर ये साबित करने में लगे हैं कि बच्चा राय के गहरे ताल्लुकात भाजपा के केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से हैं। यहाँ सभी नेताओं से एक सीधा-सा सवाल यह है कि क्या लालकेश्वर, उषा सिन्हा और बच्चा राय जैसों का ‘जुर्म’ किसी पार्टी या नेता से जुड़े होने के कारण कम या ज्यादा हो जाएगा? और रही बात नेताओं की तो ऐसे भ्रष्टाचारी समाज में पनपेंगे ही नहीं अगर उनका हाथ ऐसे लोगों के सिर पर ना हो। मजे की बात तो यह है कि हमाम में सब नंगे हैं ये सबको पता है पर मीडिया को ‘बाइट’ देने में कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता।

यहाँ एक और दिलचस्प वाकये से आपको वाकिफ कराना जरूरी है और वो यह कि रूबी को ले जाते वक्त पुलिस ने मीडिया की मौजूदगी को देखते हुए उसे ‘गमछा’ ओढ़ने को कहा पर रूबी ने इनकार कर दिया। उसने बड़े साहस के साथ कहा कि “अगर गमछा ही लगाना होता तो आज बोर्ड ऑफिस नहीं आती। मैं बच्चा राय थोड़े ही हूँ कि गमछा ओढ़ाए जा रहे हैं। मैं ऐसे ही मीडिया के सामने जाउँगी।” इसके बावजूद पुलिस ने उसे डांटकर गमछा ओढ़ा दिया। क्या आपको नहीं लगता कि अपनी शर्म छिपाने को रूबी का चेहरा ढंक रहा है सिस्टम?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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फादर्स डे पर इससे बड़ी खुशी क्या होगी एक पिता के लिए..!

मोहना सिंह, अवनी चतुर्वेदी और भावना कंठ – ये तीनों देश की पहली तीन बेटियां हैं जिन्हें भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट के रूप में शामिल किया गया। बता दें कि भारतीय वायुसेना सेना का पहला अंग है जिसने महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते हुए इन तीन महिला अधिकारियों को लड़ाकू विमान उड़ाने वाले दस्ते में शामिल किया। इसके साथ ही भारत दुनिया का 21वां देश हो गया जिसके फाइटर पायलट की टुकड़ी में महिलाएं शामिल हैं।

देश को गौरव से भर देने वाली इन तीन बहादुर बेटियों में मोहना राजस्थान के झुनझुन की, अवनी मध्य प्रदेश के सतना की और भावना बिहार के दरभंगा की रहने वाली हैं। गौरतलब है कि रक्षा मंत्रालय ने महिला पायलटों को लड़ाकू विमान उड़ाने के दस्ते में शामिल करने की मंजूरी पिछले वर्ष दी थी। इसके बाद इन तीन कैडेटों ने लड़ाकू पायलट का प्रशिक्षण लेने की सहमति प्रकट की थी। इन तीनों को पहले चरण में डेढ़ सौ घंटे से भी अधिक समय तक विमान उड़ाने का प्रशिक्षण दिया गया है। अब अगले छह महीनों में इन्हें उन्नत लड़ाकू विमान हॉक पर गहन प्रशिक्षण दिया जाएगा।

बहरहाल, अब बात बिहार की बेटी भावना की जिसने टॉपर घोटाले का दंश और अपमान झेल रहे इस राज्य को एक बार फिर सिर उठाने का स्वर्णिम मौका दिया। ऐसे में उस पिता की खुशी का अंदाजा लगाइए जिसकी बेटी को सिर्फ बिहार ही नहीं पूरा देश पलकों पर बिठा रहा हो। और उस पर भी जब दिन आज का यानि फादर्स डे का हो तो सोचिए कि वो खुशी कितनी बड़ी हो जाएगी। खास तौर पर उस पिता के लिए जो कभी स्वयं वायुसेना में जाना चाहता हो और आज उसकी बेटी वहाँ पहुँच जाए और वो भी देश की पहली महिला फाइटर पायलट बनकर। क्या किसी पिता के लिए आज के दिन इससे बड़ा उपहार हो सकता है?

भावना का जन्म 1 दिसंबर 1992 को दरभंगा के बाउर गांव में हुआ था। उनके पिता तेज नारायण कंठ इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन में अधिकारी हैं। उन्होंने 1986 में अपनी नौकरी की शुरुआत बरौनी रिफाइनरी से की थी। माँ राधा कंठ घरेलू महिला हैं।

बहुमुखी प्रतिभा की धनी भावना ने 10वीं की परीक्षा बरौनी रिफाइनरी टाउनशिप से पास करने के बाद 12वीं करने कोटा का रुख किया और वहाँ इंजीनियरिंग की तैयारी की। 2014 में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग किया और टाटा कंसलटेंसी में उनका कैंपस प्लेसमेंट भी हो गया पर नियति ने भावना के लिए कुछ और तय कर रखा था। उनका इंतजार तो भारतीय वायुसेना को था। तभी तो भावना वायुसेना के शॉर्ट सर्विस कमीशन यानि एसएससी के लिए चुन ली गईं और फ्लाइंग ऑफिसर बन गईं। उसके बाद की कहानी तो खैर अब भारतीय वायुसेना के इतिहास में नया अध्याय जोड़ चुकी है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बेहतर स्वास्थ्य सेवा कार्य योजना बने- विधानसभा अध्यक्ष

एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (ADRI) और सेंट्रल कैटेलाइजिंग चेंज (3C) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “बिहार में स्वास्थ्य एवं पोषण को प्राथमिकता” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का उद्घाटन बिहार विधानसभा के अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने किया | उन्होंने बिहार में बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए केवल सामाजिक कार्यकर्ताओं को ही नहीं बल्कि जनप्रतिनिधियों को भी एक साथ मिलकर काम करने का आह्वान विगत मंगलवार को पटना में किया |

विधानसभा अध्यक्ष श्री चौधरी ने अपने संबोधन में कहा कि समाज के विकास के केंद्र में स्वास्थ्य है | बेहतर स्वास्थ्य रखने वाला समाज ही आगे बढ़ता है | उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्ति के स्वस्थ रहने से ही समाज, प्रदेश और देश में उत्पादकता एवं आर्थिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती है | हर क्षेत्र में बेहतर आउटपुट प्राप्त होता है |

महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य पर सरकार द्वारा विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि महिलाओं का स्वस्थ रहना विशेष जरूरी है क्योंकि एक स्वस्थ पुरुष बेहतर वर्तमान दे सकता है जबकि एक स्वस्थ महिला देश का भविष्य सुधारती है और परिवार एवं समाज में खुशहाली लाती है | उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य के कंपोनेंट्स को बढ़ाया जाना चाहिए |

इस अवसर पर जहां आद्री के सचिव शैलाब गुप्ता ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि केरल के बाद बिहार देश का दूसरा राज्य होगा जहां आज सामाजिक मुद्दों को प्राथमिकता दी गई है वहीँ 3C की कार्यपालक निदेशिका अपराजिता गोगोई ने विषय प्रवेश करते हुए कहा कि महिलाओं का शिक्षित होना अत्यंत जरुरी है, तभी वह स्वस्थ रह सकती है और उसका परिवार आगे बढ़ सकता है |

सेमिनार में बिहार जन स्वास्थ्य अभियान के संयोजक डॉ.शकील, आद्री के डॉ.पी.पी.घोष ने स्वास्थ्य को सड़क, बिजली और पानी की तरह अति महत्वपूर्ण मुद्दा बताया और यह भी कहा कि बिहार में स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति 211 रूपया खर्च होता है जबकि राष्ट्रीय औसत 400 रुपया  है |

मौके पर विधान पार्षद अरुण सिन्हा एवं किरण घई, विधायक गीता कुमार एवं रंजू गीता सहित निवेदिता झा, तिलकराज गौरी, पुष्पराज, अजय कुमार आदि ने अपनी बातें रखीं और सबों ने कहा कि स्वास्थ्य एवं पोषण के लिए उचित बजटीय प्रावधान होना चाहिए |

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बिहार बोर्ड के अध्यक्ष और सचिव का इस्तीफा, अब जाएंगे जेल..?

बिहार बोर्ड पर रिजल्ट घोटाले की कालिख लगने के बाद बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद ने आज अपने पद से इस्तीफा दे दिया। शिक्षा मंत्री डॉ. अशोक चौधरी ने कहा कि सरकार ने लालकेश्वर प्रसाद को इस्तीफा देने का निर्देश दिया था। यही नहीं, अब उन पर गिरफ्तारी की तलवार भी लटक रही है। उधर बोर्ड के सचिव हरिहर नाथ झा ने भी पद से इस्तीफा दे दिया है। जानकारी के मुताबिक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आनंद किशोर बिहार बोर्ड के नए अध्यक्ष और अनूप सिन्हा नए सचिव हो सकते हैं।

बता दें कि पटना के एसएसपी मनु महाराज की अगुआई में एसआईटी की टीम ने बड़ी कार्रवाई करते हुए लालकेश्वर प्रसाद के निजी सचिव सहित सात लोगों को हिरासत में लिया और अब सबसे पूछताछ कर रही है। हिरासत में लिए गए लोगों में हाजीपुर के जीए इंटर कॉलेज की केन्द्राधीक्षक शैल कुमारी, कॉलेज के हेडक्लर्क, चपरासी और पटना के राजेन्द्र नगर ब्वायज हाईस्कूल के प्राचार्य शामिल हैं। बता दें कि जीए इंटर कॉलेज में ही विशुनराय कॉलेज के छात्रों की परीक्षा ली गई थी और कॉपियों का मूल्यांकन राजेन्द्र नगर ब्वायज हाईस्कूल में किया गया था।

चर्चा का केन्द्र बन चुके टॉपर्स घोटाले में एक नया मोड़ उस वक्त आया जब राजेन्द्र नगर ब्वायज हाईस्कूल के प्राचार्य सह मूल्यांकन केन्द्र के निदेशक विशेश्वर यादव ने यह खुलासा किया कि विशुनराय कॉलेज की कॉपियों का बंडल टूटे सील में मिला था, जबकि अन्य जिलों की कॉपियां सुरक्षित मिली थीं। प्रारम्भिक जाँच में इस बात के स्पष्ट सबूत मिले हैं कि अयोग्य छात्रों की कॉपियां बदलकर उन्हें टॉपर बना दिया गया।

बहरहाल, पुलिस ने लालकेश्वर प्रसाद के घर पर छापेमारी भी की। इस मुद्दे पर सरकार और प्रशासन के सख्त रवैये को देखते हुए उनकी या किसी भी आरोपी के बचने की सम्भावना नगण्य है। अध्यक्ष और सचिव के साथ ही बोर्ड के दूसरे अधिकारियों पर भी गाज गिरनी तय है। जिस तरह बिहार को शर्मसार करने वाले इस घोटाले में बोर्ड अधिकारियों की संलिप्तता सामने आ रही है, उसे देखते हुए इस बात की प्रबल सम्भावना है कि बोर्ड की पूरी टीम ही बदल दी जाय।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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निर्विरोध चुने गए शरद, मीसा, राम जेठमलानी, आरसीपी और गोपाल

आज नाम वापसी की समयसीमा खत्म होने के साथ बिहार से राज्य सभा के पाँचों उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए। जेडीयू से शरद यादव और रामचंद्र प्रसाद सिंह, आरजेडी से मीसा भारती और राम जेठमलानी और बीजेपी से गोपाल नारायण सिंह संसद के उच्च सदन में पहुँचे। बता दें कि महाठबंधन के चारों उम्मीदवारों ने 30 मई और बीजेपी के उम्मीदवार ने 31 मई को नामांकन दाखिल किया था।

उधर बिहार विधान परिषद के सात उम्मीदवार भी निर्विरोध चुने गए। इनमें महागठबंधन के तीन और बीजेपी के दो उम्मीदवार थे। जेडीयू ने गुलाम रसूल बलियावी और सीपी सिन्हा, आरजेडी ने कमर आलम और रणविजय सिंह, कांग्रेस ने तनवीर अख्तर और बीजेपी ने अर्जुन सहनी और विनोद नारायण झा को उम्मीदवार बनाया था।

राज्य सभा के लिए निर्वाचित होने वाले अन्य राज्यों के प्रमुख उम्मीदवारों में रेल मंत्री सुरेश प्रभु और कांग्रेस नेता अंबिका सोनी शामिल हैं। बीजेपी ने प्रभु को आंध्र प्रदेश से तो कांग्रेस ने अंबिका को पंजाब से उम्मीदवार बनाया था। निर्विरोध चुनाव जीतने वाले अन्य प्रमुख उम्मीदवार हैं – पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम, केन्द्र के वर्तमान और तेजतर्रार मंत्री पीयूष गोयल, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल तथा शिवसेना के संजय राउत। ये सभी महाराष्ट्र से उम्मीदवार थे।

बता दें कि बिहार के साथ ही महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब के सभी उम्मीदवार निर्विरोध संसद के उच्च सदन पहुँच रहे हैं। बस उत्तर प्रदेश में आखिरी क्षणों में निर्दलीय प्रीति महापात्र के 12वां उम्मीदवार बनने के कारण वहाँ की 11 सीटों का चुनाव जरूर दिलचस्प हो गया है। यहाँ अब अगले हफ्ते 11 जून को चुनाव होना तय है। इस चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार कपिल सिब्बल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होगी क्योंकि यूपी में कांग्रेस के केवल 29 विधायक हैं और राज्य सभा पहुँचने के लिए जरूरत 34 वोटों की है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में एक लाख की आबादी पर सत्ताइस की जगह हैं सात कॉलेज..!

बिहार इंटरमीडिएट परीक्षा के टॉपर्स रूबी राय (आर्ट्स) और सौरभ श्रेष्ठ (साइंस) की ख़बर अखबार, टीवी चैनल और तमाम सोशल साइट्स पर चर्चा का विषय बनी हुई है। हर कोई उनके ‘खोखले’ रिजल्ट की आलोचना कर रहा है और बिहार की शिक्षा-व्यवस्था कठघरे में है। ऐसी किसी घटना पर तत्काल अपनी राय देना और भड़ास निकाल लेना हमारी आदत बन चुकी है। होता ये है कि इधर भड़ास निकली नहीं कि उधर हम पूरे वाकये को भूल जाते हैं क्योंकि तब तक भड़ास निकालने को और कई ख़बरें हमारे सामने आ चुकी होती हैं। बहरहाल, यहाँ ये सब कहने का तात्पर्य ये है कि जब इन छात्रों को लेकर बहस छिड़ी ही है तो उसे सही अंजाम तक पहुँचाया जाय। और अंजाम तक हम तब पहुँचेंगे जब समस्या को जड़ से समझेंगे।

सच तो यह है कि जिस ‘रूबी’ और ‘सौरभ’ पर हम अपनी भड़ास निकाल रहे हैं वे स्वयं हमारी ‘अव्यव्स्था’ और हमारे नीति-निर्देशकों की ‘अदूरदर्शिता’ के शिकार हैं। चलिए हम कुछ आँकड़ों की मदद से इसे समझने की कोशिश करें। आपको ये जानकर हैरत होगी कि बिहार में एक लाख की आबादी पर मात्र सात कॉलेज हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 27 कॉलेज का है। यही नहीं, बिहार में प्रति कॉलेज 2098 विद्यार्थियों का नामांकन होता है, जबकि राष्ट्रीय औसत 764 है। ऐसे में आप कैसी शिक्षा और कैसे परिणाम की उम्मीद कर सकते हैं भला..?

खैर, ये तो बात हुई पढ़ने वालों की। अब जरा पढ़ाने वालों की बात करें। यहाँ तो स्थिति और भी भयावह है। क्या आप यकीन करेंगे कि बिहार में कई ऐसे कॉलेज हैं जिनमें कई-कई विषयों में एक भी प्राध्यापक नहीं हैं लेकिन ना केवल ‘जादुई’ तरीके से परीक्षा फॉर्म भरने के लिए जरूरी छात्रों की 75 प्रतिशत उपस्थिति पूरी हो जाती है बल्कि वे छात्र ‘रूबी’ और ‘सौरभ’ की तरह जादुई अंक भी पा लेते हैं।

मजे की बात तो यह कि ये सब कुछ सरकार की नाक के नीचे हो रहा होता है और सरकार कभी गांव-गांव में शराब के ठेके खुलवाने में व्यस्त होती है तो कभी बंद कराने में। माना कि शराब जहर है और उसे बन्द करना चाहिए लेकिन इन छात्रों के जीवन में जो ‘विष’ घुल रहा है उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा..? महज खानापूरी करने वाले उपायों के बदले ठोस पहल कब होगी..? क्यों नहीं इस बात की कोशिश करें कि राज्य में छात्रों की संख्या और आज की जरूरत के मुताबिक कॉलेज हों, उनमें पढ़ाने वाले शिक्षक हों और सबसे अहम बात ये कि आधारभूत ढाँचा भी हो। अगर अब भी हम नहीं चेते तो बिहार से हर साल होने वाले लाखों छात्रों का पलायन रुकने की बजाय बढ़ता ही चला जाएगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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